आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 64
बाहुक बनकर नल का ऋतुपर्ण की सेवा में जाना
दसवें दिन नल अयोध्या पहुँचते हैं और राजा ऋतुपर्ण के सामने स्वयं को बाहुक बताते हैं, जो घोड़े हाँकने में अद्वितीय है और पाकविद्या तथा हर कला में निपुण है। ऋतुपर्ण उन्हें अच्छे वेतन पर अपने अश्वों का अध्यक्ष बनाते हैं और वार्ष्णेय तथा जीवल को उनकी सेवा में लगाते हैं। हर सन्ध्या नल दमयन्ती की याद में एक ही श्लोक दोहराते हैं; जब जीवल पूछता है कि वे किसके लिए शोक करते हैं, तो नल मानो किसी और की बात कहते हुए एक मूर्ख पति की कथा सुनाते हैं जिसने अपनी पतिव्रता पत्नी को वन में छोड़ दिया था, और राजा के भवन में अज्ञात रूप से रहते रहते हैं।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.64.1)
तस्मिन्नन्तर्हिते नागे प्रययौ नैषधो नलः । ऋतुपर्णस्य नगरं प्राविशद्दशमेऽहनि ॥
tasminnantarhite nāge prayayau naiṣadho nalaḥ | ṛtuparṇasya nagaraṃ prāviśaddaśame'hani
नाग के अन्तर्धान हो जाने पर निषधराज नल चल पड़े और दसवें दिन ऋतुपर्ण के नगर में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 2 (3.64.2)
स राजानमुपातिष्ठद्बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् । अश्वानां वाहने युक्तः पृथिव्यां नास्ति मत्समः ॥
sa rājānamupātiṣṭhadbāhuko'hamiti bruvan | aśvānāṃ vāhane yuktaḥ pṛthivyāṃ nāsti matsamaḥ
वे राजा के पास उपस्थित हुए और बोले — "मैं बाहुक हूँ। घोड़े हाँकने में पृथ्वी पर मेरे समान कोई नहीं है।"
नल उवाच
श्लोक 3 (3.64.3)
अर्थकृच्छ्रेषु चैवाहं प्रष्टव्यो नैपुणेषु च । अन्नसंस्कारमपि च जानाम्यन्यैर्विशेषतः ॥
arthakṛcchreṣu caivāhaṃ praṣṭavyo naipuṇeṣu ca | annasaṃskāramapi ca jānāmyanyairviśeṣataḥ
"कठिन कार्यों में और कुशलता वाले कामों में भी मुझसे परामर्श लिया जा सकता है, और भोजन बनाने की कला मैं दूसरों से कहीं अधिक जानता हूँ।"
श्लोक 4 (3.64.4)
यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन्यच्चैवान्यत्सुदुष्करम् । सर्वं यतिष्ये तत्कर्तुमृतुपर्ण भरस्व माम् ॥
yāni śilpāni loke'sminyaccaivānyatsuduṣkaram | sarvaṃ yatiṣye tatkartumṛtuparṇa bharasva mām
"इस संसार में जितनी भी कलाएँ हैं, और जो कुछ भी अत्यन्त कठिन है, वह सब करने का मैं प्रयत्न करूँगा। हे ऋतुपर्ण, मेरा भरण-पोषण कीजिए।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 5 (3.64.5)
इत्युक्तः स नलेनाथ ऋतुपर्णो नराधिपः । उवाच सुप्रीतमनास्तं प्रेक्ष्य च महीपते ॥
ityuktaḥ sa nalenātha ṛtuparṇo narādhipaḥ | uvāca suprītamanāstaṃ prekṣya ca mahīpate
हे महीपते, नल के ऐसा कहने पर राजा ऋतुपर्ण ने प्रसन्न मन से उनकी ओर देखकर कहा —
ऋतुपर्ण उवाच
श्लोक 6 (3.64.6)
वसबाहुक भद्रं ते सर्वमेतत्करिष्यसि । शीघ्रयाने सदा बुद्धिर्ध्रियते मे विशेषतः ॥
vasabāhuka bhadraṃ te sarvametatkariṣyasi | śīghrayāne sadā buddhirdhriyate me viśeṣataḥ
"बाहुक, तुम यहीं रहो, तुम्हारा कल्याण हो; यह सब तुम करोगे। मेरा मन सदा विशेष रूप से तेज़ सवारी में लगा रहता है।"
श्लोक 7 (3.64.7)
स त्वमातिष्ठ योगं तं येन शीघ्रा हया मम । भवेयुरश्वाध्यक्षोऽसि वेतनं ते शतंशतम् ॥
sa tvamātiṣṭha yogaṃ taṃ yena śīghrā hayā mama | bhaveyuraśvādhyakṣo'si vetanaṃ te śataṃśatam
"तुम ऐसा उपाय करो जिससे मेरे घोड़े तेज़ हो जाएँ। तुम अश्वशाला के अध्यक्ष हो; तुम्हारा वेतन सौ-सौ (मुद्राएँ) होगा।"
श्लोक 8 (3.64.8)
त्वामुपस्थास्यतश्चैव नित्यं वार्ष्णेयजीवलौ । एताभ्यां रंस्यसे सार्धं वस वै मयि बाहुक ॥
tvāmupasthāsyataścaiva nityaṃ vārṣṇeyajīvalau | etābhyāṃ raṃsyase sārdhaṃ vasa vai mayi bāhuka
"वार्ष्णेय और जीवल सदा तुम्हारी सेवा में रहेंगे; उनके साथ तुम आनन्द से रहोगे। बाहुक, तुम मेरे पास रहो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 9 (3.64.9)
एवमुक्तो नलस्तेन न्यवसत्तत्रपूजितः । ऋतुपर्णस्य नगरे सहवार्ष्णेयजीवलः ॥
evamukto nalastena nyavasattatrapūjitaḥ | ṛtuparṇasya nagare sahavārṣṇeyajīvalaḥ
उनके ऐसा कहने पर नल वार्ष्णेय और जीवल के साथ ऋतुपर्ण के नगर में सम्मानपूर्वक रहने लगे।
श्लोक 10 (3.64.10)
स वै तत्रावसद्राजा वैदर्भीमनुचिन्तयन् । सायंसायं सदा चेमं श्लोकमेकं जगाद ह ॥
sa vai tatrāvasadrājā vaidarbhīmanucintayan | sāyaṃsāyaṃ sadā cemaṃ ślokamekaṃ jagāda ha
राजा नल वहाँ विदर्भकुमारी का ही चिन्तन करते हुए रहते थे, और हर साँझ यह एक श्लोक कहा करते थे —
नल उवाच
श्लोक 11 (3.64.11)
क्व नु सा क्षुत्पिपासार्ता श्रान्ता शेते तपस्विनी । स्मरन्ती तस्य मन्दस्य कं वाऽऽसाद्योपतिष्ठति ॥
kva nu sā kṣutpipāsārtā śrāntā śete tapasvinī | smarantī tasya mandasya kaṃ vā''sādyopatiṣṭhati
"भूख-प्यास से व्याकुल, थकी हुई वह तपस्विनी अब कहाँ सोती होगी, उस मूर्ख को याद करती हुई? और वह किसके पास जाकर रह रही होगी?"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 12 (3.64.12)
एवं ब्रुवन्तं राजानं निशायां जीवलोऽब्रवीत् । कामेनां शोचसे नित्यं श्रोतुमिच्छामि बाहुक । आयुष्मन्कस्य वा नारी यामेवमनुशोचसि ॥
evaṃ bruvantaṃ rājānaṃ niśāyāṃ jīvalo'bravīt | kāmenāṃ śocase nityaṃ śrotumicchāmi bāhuka | āyuṣmankasya vā nārī yāmevamanuśocasi
एक रात राजा को ऐसा कहते सुनकर जीवल ने कहा — "बाहुक, तुम सदा किसके लिए शोक करते हो? मैं सुनना चाहता हूँ। हे आयुष्मन्, वह किसकी पत्नी है जिसके लिए तुम इस तरह शोक करते हो?"
श्लोक 13 (3.64.13)
तमुवाच नलो राजा मन्दप्रज्ञस्य कस्यचित् । आसीद्बहुमता नारी तस्या दृढतरश्च सः ॥
tamuvāca nalo rājā mandaprajñasya kasyacit | āsīdbahumatā nārī tasyā dṛḍhataraśca saḥ
राजा नल ने उससे कहा — "किसी मन्दबुद्धि पुरुष की एक पत्नी थी जिसे वह बहुत मानता था, और वह उससे और भी दृढ़ता से बँधा हुआ था।"
नल उवाच
श्लोक 14 (3.64.14)
स वै केनचिदर्थेन तया मन्दो व्ययुज्यत । विप्रयुक्तः स मन्दात्मा भ्रमत्यसुखपीडितः ॥
sa vai kenacidarthena tayā mando vyayujyata | viprayuktaḥ sa mandātmā bhramatyasukhapīḍitaḥ
"किसी कारणवश वह मूर्ख उससे बिछुड़ गया; उससे अलग होकर वह मन्दमति दुःख से पीड़ित होकर भटक रहा है।"
श्लोक 15 (3.64.15)
दह्यमानः स शोकेन दिवारात्रमतन्द्रितः । निशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गायति ॥
dahyamānaḥ sa śokena divārātramatandritaḥ | niśākāle smaraṃstasyāḥ ślokamekaṃ sma gāyati
"शोक में जलता हुआ, दिन-रात बिना सोए, वह रात होने पर उसे याद करके एक ही श्लोक गाता है।"
श्लोक 16 (3.64.16)
स विभ्रमन्महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किंचन । वसत्यनर्हस्तद्दुःखं भूय एवानुसंस्मरन् ॥
sa vibhramanmahīṃ sarvāṃ kvacidāsādya kiṃcana | vasatyanarhastadduḥkhaṃ bhūya evānusaṃsmaran
"सारी पृथ्वी पर भटकते हुए वह कहीं किसी ठिकाने पर आकर रह रहा है — ऐसे दुःख के अयोग्य होकर भी — और उस दुःख को बार-बार याद करता है।"
श्लोक 17 (3.64.17)
सा तु तं पुरुषं नारी कृच्छ्रेऽप्यनुगता वने । त्यक्ता तेनाल्पभाग्येन दुष्करं यदि जीवति ॥
sā tu taṃ puruṣaṃ nārī kṛcchre'pyanugatā vane | tyaktā tenālpabhāgyena duṣkaraṃ yadi jīvati
"और वह स्त्री, जो कठिनाई में भी उस पुरुष के पीछे-पीछे वन में गई, उस अभागे ने उसे छोड़ दिया — यदि वह जीवित हो तो यह बड़ी कठिन बात है।"
श्लोक 18 (3.64.18)
एका बालाऽनभिज्ञा च मार्गमाणाऽतथोचिता । क्षुत्पिपासापरीताङ्गी दुष्करं यदि जीवति ॥
ekā bālā'nabhijñā ca mārgamāṇā'tathocitā | kṣutpipāsāparītāṅgī duṣkaraṃ yadi jīvati
"अकेली, कम आयु की, अनजान, ऐसे जीवन की अभ्यस्त नहीं, उसे खोजती हुई, भूख-प्यास से क्षीण शरीर वाली — यदि वह जीवित हो तो यह बड़ी कठिन बात है,"
श्लोक 19 (3.64.19)
श्वापदाचरिते नित्यं वने महति दारुणे । त्यक्ता तेनाल्पभाग्येन मन्दप्रज्ञेन मारिष ॥
śvāpadācarite nityaṃ vane mahati dāruṇe | tyaktā tenālpabhāgyena mandaprajñena māriṣa
"हिंसक पशुओं से सदा भरे उस विशाल और भयानक वन में, उस अभागे और मन्दबुद्धि पुरुष द्वारा छोड़ी हुई, हे आर्य।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 20 (3.64.20)
इत्येवं नैषधो राजा दमयन्तीमनुस्मरन् । अज्ञातवासं न्यवसद्राज्ञस्तस्य निवेशने ॥
ityevaṃ naiṣadho rājā damayantīmanusmaran | ajñātavāsaṃ nyavasadrājñastasya niveśane
इस प्रकार निषधराज नल दमयन्ती को याद करते हुए उस राजा के भवन में अज्ञात रूप से रहने लगे।