आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 65
चेदि में सुदेव को दमयन्ती का मिलना
राज्य हारकर नल जब अपनी पत्नी सहित कहीं लुप्त हो गए, तब विदर्भराज भीम ने सब दिशाओं में ब्राह्मण भेजे और उन दोनों को खोज लाने वाले को, यहाँ तक कि उनका समाचार देने वाले को भी, भारी पुरस्कार देने की घोषणा की। उनमें से सुदेव नामक ब्राह्मण ने चेदिराज के महल में एक अनुष्ठान के समय दुबली और शोकाकुल दमयन्ती को पहचान लिया, और उसके रूप तथा दुःख पर विचार करके उसके सामने अपना परिचय दिया। दमयन्ती को रोते देख सुनन्दा ने अपनी माता को सूचना दी, और राजमाता ने सुदेव से पूछा कि यह स्त्री कौन है और कैसे अपने लोगों से बिछुड़ गई।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.65.1)
हृतराज्ये नले भीमः सभार्येऽदर्शनं गते । चिन्तयामास बहुशः सहामात्यैर्नराधिपः ॥
hṛtarājye nale bhīmaḥ sabhārye'darśanaṃ gate | cintayāmāsa bahuśaḥ sahāmātyairnarādhipaḥ
राज्य छिन जाने के बाद जब नल अपनी पत्नी सहित कहीं अदृश्य हो गए, तब नरेश भीम ने अपने मन्त्रियों के साथ इस विषय पर बहुत विचार किया।
श्लोक 2 (3.65.2)
समाहूय द्विजान्सर्वानिदं वचनमब्रवीत् । अग्रहारं च दास्यामि ग्रामं नगरसंमितम् ॥
samāhūya dvijānsarvānidaṃ vacanamabravīt | agrahāraṃ ca dāsyāmi grāmaṃ nagarasaṃmitam
उन्होंने सब ब्राह्मणों को बुलाकर यह वचन कहा — "मैं अग्रहार की भूमि और नगर जितना बड़ा एक गाँव दूँगा;
भीम उवाच
श्लोक 3 (3.65.3)
दमयन्तीं नलं चैव पर्यन्वेषति यो द्विजः । गवां शतसहस्राणि दाता तस्मै द्विजातये ॥
damayantīṃ nalaṃ caiva paryanveṣati yo dvijaḥ | gavāṃ śatasahasrāṇi dātā tasmai dvijātaye
जो ब्राह्मण दमयन्ती और नल को खोज निकालेगा, उस द्विज को एक लाख गौएँ दी जाएँगी।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 4 (3.65.4)
इत्युक्त्वा ब्राह्मणान्सर्वान्समाहूय द्विजोत्तमान् । प्रस्थापयामास तदा तयोर्दर्शनकाङ्क्षया ॥
ityuktvā brāhmaṇānsarvānsamāhūya dvijottamān | prasthāpayāmāsa tadā tayordarśanakāṅkṣayā
यह कहकर और सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को एकत्र करके, उन दोनों को फिर देखने की इच्छा से राजा ने उन्हें रवाना किया।
श्लोक 5 (3.65.5)
संदिदेश च तान्भीमो वसु दत्त्वा च पुष्कलम् । मृगयध्वं नलं चैव दमयन्तीं च मे सुताम् ॥
saṃdideśa ca tānbhīmo vasu dattvā ca puṣkalam | mṛgayadhvaṃ nalaṃ caiva damayantīṃ ca me sutām
भीम ने उन्हें प्रचुर धन देकर आदेश दिया — "नल को और मेरी पुत्री दमयन्ती को खोजो।
भीम उवाच
श्लोक 6 (3.65.6)
अस्मिन्कर्मणि निष्पन्ने विज्ञाते निषधाधिपे । गवां सहस्रं दास्यामि यो वस्तावानयिष्यति ॥
asminkarmaṇi niṣpanne vijñāte niṣadhādhipe | gavāṃ sahasraṃ dāsyāmi yo vastāvānayiṣyati
यह कार्य पूरा होने पर, जब निषधराज का पता चल जाए, तब तुममें से जो उन दोनों को ले आएगा, उसे मैं एक हज़ार गौएँ दूँगा।
श्लोक 7 (3.65.7)
अग्रहारांश्च दास्यामि ग्रामं नगरसंमितम् । हिरण्यं च सुवर्णं च दासीदासं तथैव च ॥
agrahārāṃśca dāsyāmi grāmaṃ nagarasaṃmitam | hiraṇyaṃ ca suvarṇaṃ ca dāsīdāsaṃ tathaiva ca
मैं अग्रहार की भूमि भी दूँगा, नगर जितना बड़ा गाँव भी, और साथ ही धन, सोना तथा दास-दासियाँ भी।
श्लोक 8 (3.65.8)
न चेच्छक्याविहानेतुं दमयन्ती नलोऽपि वा । ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम् ॥
na cecchakyāvihānetuṃ damayantī nalo'pi vā | jñātamātre'pi dāsyāmi gavāṃ daśaśataṃ dhanam
और यदि दमयन्ती या नल यहाँ न लाए जा सकें, तो केवल उनका पता लगा लेने पर भी मैं एक हज़ार गौओं का धन दूँगा।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 9 (3.65.9)
इत्युक्तास्ते ययुर्हृष्टा ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम् । पुरराष्ट्राणि चिन्वन्तो नैषधं सह भार्यया । नैव क्वापि प्रपश्यन्ति नलं वा भीमपुत्रिकाम् ॥
ityuktāste yayurhṛṣṭā brāhmaṇāḥ sarvato diśam | purarāṣṭrāṇi cinvanto naiṣadhaṃ saha bhāryayā | naiva kvāpi prapaśyanti nalaṃ vā bhīmaputrikām
यह सुनकर ब्राह्मण प्रसन्न होकर सब दिशाओं में चल पड़े। वे नगरों और राज्यों में पत्नी सहित निषधराज को ढूँढ़ते फिरे, पर कहीं भी उन्हें नल या भीम की पुत्री दिखाई नहीं दी।
श्लोक 10 (3.65.10)
ततश्चेदिपुरीं रम्यां सुदेवो नाम वै द्विजः । विचिन्वानोऽथ वैदर्भीमपश्यद्राजवेश्मनि ॥
tataścedipurīṃ ramyāṃ sudevo nāma vai dvijaḥ | vicinvāno'tha vaidarbhīmapaśyadrājaveśmani
तब सुदेव नामक एक ब्राह्मण ने विदर्भकुमारी को खोजते हुए रमणीय चेदि नगरी में राजमहल के भीतर उसे देखा।
श्लोक 11 (3.65.11)
तयैव राजमाता च ब्राह्मणान्पर्यवेषयत् । भोजनार्थे सुदेवोऽपि तत्रैव प्रविवेश ह ॥
tayaiva rājamātā ca brāhmaṇānparyaveṣayat | bhojanārthe sudevo'pi tatraiva praviveśa ha
राजमाता उसी के साथ मिलकर ब्राह्मणों को भोजन परोस रही थीं, और सुदेव भी भोजन के लिए वहीं आ पहुँचे थे।
श्लोक 12 (3.65.12)
कृशां विवर्णां मलिनां भर्तृशोकपरायणाम् । पुण्याहवाचने राज्ञः सुनन्दासहितां स्थिताम् ॥
kṛśāṃ vivarṇāṃ malināṃ bhartṛśokaparāyaṇām | puṇyāhavācane rājñaḥ sunandāsahitāṃ sthitām
वह दुबली, फीकी और मैली थी, पति के शोक में पूरी तरह डूबी हुई थी, और राजा के पुण्याहवाचन के अनुष्ठान में सुनन्दा के साथ खड़ी थी।
श्लोक 13 (3.65.13)
मन्दं प्रख्यायमानेन रूपेणाप्रतिमेन ताम् । निबद्धां धूमजालेन प्रभामिव विभावसोः ॥
mandaṃ prakhyāyamānena rūpeṇāpratimena tām | nibaddhāṃ dhūmajālena prabhāmiva vibhāvasoḥ
उसका अनुपम रूप मन्द-मन्द ही झलक रहा था, मानो धुएँ के जाल में बँधी अग्नि की प्रभा हो।
श्लोक 14 (3.65.14)
तां समीक्ष्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् । तर्कयामास भैमीति कारणैरुपपादयन् ॥
tāṃ samīkṣya viśālākṣīmadhikaṃ malināṃ kṛśām | tarkayāmāsa bhaimīti kāraṇairupapādayan
उस विशाल नेत्रों वाली, अत्यन्त मलिन और दुबली स्त्री को ध्यान से देखकर, लक्षणों के आधार पर उन्होंने निश्चय किया कि यह भीम की पुत्री ही है।
सुदेव उवाच
श्लोक 15 (3.65.15)
यथेयं मे पुरा दृष्टा तथारूपेयमङ्गना । कृतार्थोस्म्यद्य दृष्ट्वेमां लोककान्तामिव श्रियं ॥
yatheyaṃ me purā dṛṣṭā tathārūpeyamaṅganā | kṛtārthosmyadya dṛṣṭvemāṃ lokakāntāmiva śriyaṃ
"जैसी मैंने इसे पहले देखा था, वैसा ही इस स्त्री का रूप है। सारे संसार को प्रिय लक्ष्मी के समान इसे देखकर आज मैं कृतार्थ हो गया।
श्लोक 16 (3.65.16)
पूर्णचन्द्राननां श्यामां चारुवृत्तपयोधराम् । कुर्वन्तीं प्रभया देवीं सर्वावितिमिरा दिशः ॥
pūrṇacandrānanāṃ śyāmāṃ cāruvṛttapayodharām | kurvantīṃ prabhayā devīṃ sarvāvitimirā diśaḥ
पूर्ण चन्द्रमा जैसे मुख वाली, षोडशी, सुन्दर गोल स्तनों वाली यह देवी अपनी प्रभा से सब दिशाओं का अन्धकार दूर कर रही है।
श्लोक 17 (3.65.17)
चारुपद्मविशालाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव । इष्टां समस्तलोकस्य पूर्णचन्द्रप्रभामिव ॥
cārupadmaviśālākṣīṃ manmathasya ratīmiva | iṣṭāṃ samastalokasya pūrṇacandraprabhāmiva
कमल-सी सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखों वाली यह कामदेव की पत्नी रति के समान है, और पूर्ण चन्द्रमा की चाँदनी की भाँति सारे संसार को प्रिय है।
श्लोक 18 (3.65.18)
विदर्भसरसस्तस्माद्दैवदोषादिवोद्धृताम् । मलपङ्कानुलिप्ताङ्गीं प्रम्लानां नलिनीमिव ॥
vidarbhasarasastasmāddaivadoṣādivoddhṛtām | malapaṅkānuliptāṅgīṃ pramlānāṃ nalinīmiva
मानो दुर्भाग्यवश विदर्भ रूपी उस सरोवर से उखाड़ ली गई हो — कीचड़ और मैल से लिपटे अंगों वाली, मुरझाई हुई कमलिनी जैसी।
श्लोक 19 (3.65.19)
पौर्णमासीमिव निशां राहुग्रस्तनिशाकराम् । पतिशोकाकुलां दीनां कृशस्रोतां नदीमिव ॥
paurṇamāsīmiva niśāṃ rāhugrastaniśākarām | patiśokākulāṃ dīnāṃ kṛśasrotāṃ nadīmiva
वह उस पूर्णिमा की रात जैसी है जिसके चन्द्रमा को राहु ने ग्रस लिया हो; पति के शोक से व्याकुल और दीन, क्षीण धारा वाली नदी के समान।
श्लोक 20 (3.65.20)
विध्वस्तपर्णकमलां वित्रासितविहंगमाम् । हस्तिहस्तपरिक्लिष्टां व्याकुलामिव पद्मिनीम् ॥
vidhvastaparṇakamalāṃ vitrāsitavihaṃgamām | hastihastaparikliṣṭāṃ vyākulāmiva padminīm
वह उस कमल-सरोवर जैसी है जिसे हाथी की सूँड़ ने मथ डाला हो — जिसके पत्ते और कमल नष्ट हो गए हों, पक्षी डरकर उड़ गए हों और सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया हो।
श्लोक 21 (3.65.21)
सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम् । दह्यमानामिवार्केण मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥
sukumārīṃ sujātāṅgīṃ ratnagarbhagṛhocitām | dahyamānāmivārkeṇa mṛṇālīmiva coddhṛtām
कोमल, सुगठित अंगों वाली और रत्नजटित भवन में रहने योग्य यह स्त्री जल से निकाली गई उस कमलनाल जैसी है जिसे सूर्य झुलसा रहा हो।
श्लोक 22 (3.65.22)
रूपौदार्यगुणोपेतां मण्डनार्हाममण्डिताम् । चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाभ्रसंवृताम् ॥
rūpaudāryaguṇopetāṃ maṇḍanārhāmamaṇḍitām | candralekhāmiva navāṃ vyomni nīlābhrasaṃvṛtām
रूप, उदारता और गुणों से सम्पन्न, आभूषणों के योग्य होकर भी बिना आभूषण के, वह आकाश में काले बादलों से ढकी नई चन्द्रकला जैसी है।
श्लोक 23 (3.65.23)
कामभोगैः प्रियैर्हीनां हीनां बन्धुजनेन च । देहं धारयतीं दीनं भर्तृदर्शनकाङ्क्षया ॥
kāmabhogaiḥ priyairhīnāṃ hīnāṃ bandhujanena ca | dehaṃ dhārayatīṃ dīnaṃ bhartṛdarśanakāṅkṣayā
प्रिय भोग-विलासों से वंचित और बन्धु-बान्धवों से भी बिछुड़ी हुई यह स्त्री केवल पति के दर्शन की आशा में अपनी दीन देह को धारण किए हुए है।
श्लोक 24 (3.65.24)
भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूषणैर्विना । एषा हि रहिता तेन शोभमाना न शोभते ॥
bhartā nāma paraṃ nāryā bhūṣaṇaṃ bhūṣaṇairvinā | eṣā hi rahitā tena śobhamānā na śobhate
स्त्री के लिए पति ही परम आभूषण है, आभूषणों के बिना भी। उससे बिछुड़कर यह सुन्दरी होते हुए भी शोभा नहीं पाती।
श्लोक 25 (3.65.25)
दुष्करं कुरुतेऽत्यन्तं हीनो यदनया नलः । धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनापि सीदति ॥
duṣkaraṃ kurute'tyantaṃ hīno yadanayā nalaḥ | dhārayatyātmano dehaṃ na śokenāpi sīdati
नल सचमुच बड़ा कठिन काम कर रहे हैं, जो इससे बिछुड़कर भी अपनी देह धारण किए हुए हैं और शोक से टूट नहीं जाते।
श्लोक 26 (3.65.26)
इमामसितकेशान्तां शतपत्रायतेक्षणाम् । सुखार्हां दुःखितां दृष्ट्वा ममापि व्यथते मनः ॥
imāmasitakeśāntāṃ śatapatrāyatekṣaṇām | sukhārhāṃ duḥkhitāṃ dṛṣṭvā mamāpi vyathate manaḥ
काले केशों वाली, शतदल कमल जैसी लम्बी आँखों वाली, सुख के योग्य इस स्त्री को दुःखी देखकर मेरा मन भी व्यथित हो उठता है।
श्लोक 27 (3.65.27)
कदा नु खलु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा । भर्तुः समागमात्साध्वी रोहिणी शशिनो यथा ॥
kadā nu khalu duḥkhasya pāraṃ yāsyati vai śubhā | bhartuḥ samāgamātsādhvī rohiṇī śaśino yathā
यह कल्याणी साध्वी पति से मिलकर कब अपने दुःख के पार पहुँचेगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमा से मिलती है?
श्लोक 28 (3.65.28)
अस्या नूनं पुनर्लाभान्नैषधः प्रीतिमेष्यति । राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनर्लब्ध्वेव मेदिनीम् ॥
asyā nūnaṃ punarlābhānnaiṣadhaḥ prītimeṣyati | rājā rājyaparibhraṣṭaḥ punarlabdhveva medinīm
निश्चय ही इसे फिर पाकर निषधराज वैसे ही प्रसन्न होंगे जैसे राज्य से च्युत राजा फिर से पृथ्वी पाकर प्रसन्न होता है।
श्लोक 29 (3.65.29)
तुल्यशीलवयोयुक्तां तुल्याभिजनसंवृताम् । नैषधोऽर्हति वैदर्भीं तं चेयमसितेक्षणा ॥
tulyaśīlavayoyuktāṃ tulyābhijanasaṃvṛtām | naiṣadho'rhati vaidarbhīṃ taṃ ceyamasitekṣaṇā
शील, आयु और कुल में समान विदर्भकुमारी के योग्य निषधराज ही हैं, और यह श्याम नेत्रों वाली भी उन्हीं के योग्य है।
श्लोक 30 (3.65.30)
युक्तं तस्याप्रमेयस्य वीर्यसत्त्ववतो मया । समाश्वासयितुं भार्यां पतिदर्शनलालसाम् ॥
yuktaṃ tasyāprameyasya vīryasattvavato mayā | samāśvāsayituṃ bhāryāṃ patidarśanalālasām
उचित है कि मैं उस अपरिमेय, पराक्रम और धैर्य से सम्पन्न पुरुष की पत्नी को, जो पति के दर्शन के लिए लालायित है, सान्त्वना दूँ।
श्लोक 31 (3.65.31)
अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । अदृष्टदुःखां दुःखार्तां ध्यानरोदनतत्पराम् ॥
ahamāśvāsayāmyenāṃ pūrṇacandranibhānanām | adṛṣṭaduḥkhāṃ duḥkhārtāṃ dhyānarodanatatparām
मैं पूर्ण चन्द्रमा जैसे मुख वाली इस स्त्री को धीरज बँधाऊँगा, जिसने पहले कभी दुःख नहीं देखा था और जो अब दुःख से पीड़ित होकर चिन्ता और रुदन में डूबी है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 32 (3.65.32)
एवं विमृश्य विविधैः कारणैर्लक्षणैश्च ताम् । उपगम्य ततो भैमीं सुदेवो ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥
evaṃ vimṛśya vividhaiḥ kāraṇairlakṣaṇaiśca tām | upagamya tato bhaimīṃ sudevo brāhmaṇo'bravīt
इस प्रकार अनेक कारणों और लक्षणों से उसके विषय में विचार करके ब्राह्मण सुदेव भीमकुमारी के पास गए और बोले।
सुदेव उवाच
श्लोक 33 (3.65.33)
अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दयितः सखा । भीमस्य वचनाद्राज्ञस्त्वामन्वेष्टुमिहागतः ॥
ahaṃ sudevo vaidarbhi bhrātuste dayitaḥ sakhā | bhīmasya vacanādrājñastvāmanveṣṭumihāgataḥ
"विदर्भकुमारी! मैं सुदेव हूँ, तुम्हारे भाई का प्रिय मित्र। राजा भीम की आज्ञा से मैं तुम्हें खोजने यहाँ आया हूँ।
श्लोक 34 (3.65.34)
कुशली ते पिता राज्ञि जननी भ्रातरश्च ते । आयुष्मन्तौ कुशलिनौ तत्रस्थौ दारकौ च ते ॥
kuśalī te pitā rājñi jananī bhrātaraśca te | āyuṣmantau kuśalinau tatrasthau dārakau ca te
रानी! तुम्हारे पिता सकुशल हैं, तुम्हारी माता और भाई भी। वहाँ रह रहे तुम्हारे दोनों बच्चे भी जीवित और सकुशल हैं।
श्लोक 35 (3.65.35)
त्वत्कृते बन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवासते । अन्वेष्टारो ब्राह्मणाश्च भ्रमन्ति शतशो महीम् ॥
tvatkṛte bandhuvargāśca gatasattvā ivāsate | anveṣṭāro brāhmaṇāśca bhramanti śataśo mahīm
तुम्हारे कारण सारे बन्धु-बान्धव निष्प्राण-से बैठे हैं, और तुम्हें खोजने वाले सैकड़ों ब्राह्मण पृथ्वी पर घूम रहे हैं।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 36 (3.65.36)
अभिज्ञाय सुदेवं तं दमयन्ती युधिष्ठिर । पर्यपृच्छत तान्सर्वान्क्रमेण सुहृदः स्वकान् ॥
abhijñāya sudevaṃ taṃ damayantī yudhiṣṭhira | paryapṛcchata tānsarvānkrameṇa suhṛdaḥ svakān
हे युधिष्ठिर! सुदेव को पहचानकर दमयन्ती ने एक-एक करके अपने सभी स्वजनों का हाल पूछा।
श्लोक 37 (3.65.37)
रुरोद च भृशं राजन्वैदर्भी शोककर्शिता । दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम् ॥
ruroda ca bhṛśaṃ rājanvaidarbhī śokakarśitā | dṛṣṭvā sudevaṃ sahasā bhrāturiṣṭaṃ dvijottamam
हे राजन्! शोक से दुर्बल विदर्भकुमारी अपने भाई के प्रिय उस श्रेष्ठ ब्राह्मण सुदेव को अचानक देखकर फूट-फूटकर रोने लगी।
श्लोक 38 (3.65.38)
ततो रुदन्तीं तां दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिता । सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्तीं च भारत ॥
tato rudantīṃ tāṃ dṛṣṭvā sunandā śokakarśitā | sudevena sahaikānte kathayantīṃ ca bhārata
हे भारत! तब शोक से व्याकुल सुनन्दा ने उसे रोते हुए और एकान्त में सुदेव से बातें करते देखा,
श्लोक 39 (3.65.39)
जनित्र्याः प्रेषयामास सैरन्ध्री रुदते भृशम् । ब्राह्मणेन सहागम्य तां विद्धि यदि मन्यसे ॥
janitryāḥ preṣayāmāsa sairandhrī rudate bhṛśam | brāhmaṇena sahāgamya tāṃ viddhi yadi manyase
और अपनी माता के पास सन्देश भेजा — "सैरन्ध्री एक ब्राह्मण से मिलकर फूट-फूटकर रो रही है। आप उचित समझें तो उसके विषय में पता कीजिए।"
श्लोक 40 (3.65.40)
अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चान्तःपुरात्तदा । जगाम यत्र सा बाला ब्राह्मणेन सहाभवत् ॥
atha cedipatermātā rājñaścāntaḥpurāttadā | jagāma yatra sā bālā brāhmaṇena sahābhavat
तब चेदिराज की माता राजा के अन्तःपुर से निकलकर वहाँ गईं जहाँ वह युवती ब्राह्मण के साथ थी।
श्लोक 41 (3.65.41)
ततः सुदेवमानाय्य राजमाता विशांपते । पप्रच्छ भार्या कस्येयं सुता वा कस्य भामिनी ॥
tataḥ sudevamānāyya rājamātā viśāṃpate | papraccha bhāryā kasyeyaṃ sutā vā kasya bhāminī
हे प्रजानाथ! तब राजमाता ने सुदेव को अपने पास बुलवाकर पूछा — "यह सुन्दरी किसकी पत्नी है, या किसकी पुत्री है?
राजमातोवाच
श्लोक 42 (3.65.42)
कथं च नष्टा ज्ञातिभ्यो भर्तुर्वा वामलोचना । त्वया च विदिता विप्र कथमेवंगता सती ॥
kathaṃ ca naṣṭā jñātibhyo bharturvā vāmalocanā | tvayā ca viditā vipra kathamevaṃgatā satī
यह सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री अपने स्वजनों से या अपने पति से कैसे बिछुड़ गई? और हे विप्र, ऐसी दशा में होने पर भी तुमने इसे कैसे पहचाना?
श्लोक 43 (3.65.43)
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः सर्वमशेषतः । तत्त्वेन हि ममाचक्ष्व पृच्छन्त्या देवरूपिणीम् ॥
etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tvattaḥ sarvamaśeṣataḥ | tattvena hi mamācakṣva pṛcchantyā devarūpiṇīm
यह सब मैं तुमसे पूरा-पूरा सुनना चाहती हूँ। इस देवरूपिणी के विषय में मैं पूछ रही हूँ, मुझे ठीक-ठीक बताओ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 44 (3.65.44)
एवमुक्तस्तया राजन्सुदेवो द्विजसत्तमः । सुखोपविष्ट आचष्ट दमयन्त्या यथातथम् ॥
evamuktastayā rājansudevo dvijasattamaḥ | sukhopaviṣṭa ācaṣṭa damayantyā yathātatham
हे राजन्! उनके ऐसा कहने पर द्विजश्रेष्ठ सुदेव ने आराम से बैठकर दमयन्ती का सारा वृत्तान्त ज्यों का त्यों कह सुनाया।