आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 67
दमयन्ती का सन्देश दूर-दूर तक
दमयन्ती अपनी माता से कहती है कि यदि नल को वापस न लाया गया तो वह जीवित नहीं रहेगी। रानी यह बात राजा भीम तक पहुँचाती हैं, और वे फिर से ब्राह्मणों को भेजते हैं। दमयन्ती उन्हें एक सन्देश देती है जिसे हर सभा में दोहराना है — उस जुआरी को उलाहना जिसने उसका आधा वस्त्र काटकर उसे वन में सोती छोड़ दिया — और कहती है कि जो इसका उत्तर दे, उसका पता लगाकर उसे बताया जाए। ब्राह्मण नगरों, गाँवों और आश्रमों में खोजते हुए हर जगह उसके वचन सुनाते हैं, पर नल नहीं मिलते।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 1 (3.67.1)
मां चेदिच्छसि जीवन्तीं मातः सत्यं ब्रवीमि ते । नलस्य नरवीरस्य यतस्वानयने पुनः ॥
māṃ cedicchasi jīvantīṃ mātaḥ satyaṃ bravīmi te | nalasya naravīrasya yatasvānayane punaḥ
"माँ, मैं तुमसे सच कहती हूँ — यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो, तो नरश्रेष्ठ नल को फिर से लाने का प्रयत्न करो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 2 (3.67.2)
दमयन्त्या तथोक्ता तु सा देवी भृशदुःखिता । बाष्पेणापिहिता राज्ञी नोत्तरं किंचिदब्रवीत् ॥
damayantyā tathoktā tu sā devī bhṛśaduḥkhitā | bāṣpeṇāpihitā rājñī nottaraṃ kiṃcidabravīt
दमयन्ती के ऐसा कहने पर अत्यन्त दुःखी रानी आँसुओं से रुँध गईं और कुछ भी उत्तर न दे सकीं।
श्लोक 3 (3.67.3)
तदवस्थां तु तां दृष्ट्वा सर्वमन्तःपुरं तदा । हाहाभूतमतीवासीद्भृशं च प्ररुरोद ह ॥
tadavasthāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā sarvamantaḥpuraṃ tadā | hāhābhūtamatīvāsīdbhṛśaṃ ca praruroda ha
उन्हें उस दशा में देखकर सारे अन्तःपुर में हाहाकार मच गया और सब फूट-फूटकर रोने लगे।
श्लोक 4 (3.67.4)
ततो भीमं महाराजं भार्या वचनमब्रवीत् । दमयन्ती नृप भृशं भर्तारमनुशोचति ॥
tato bhīmaṃ mahārājaṃ bhāryā vacanamabravīt | damayantī nṛpa bhṛśaṃ bhartāramanuśocati
तब रानी ने महाराज भीम से कहा — "राजन्! दमयन्ती अपने पति के लिए बहुत शोक कर रही है।
भीमभार्योवाच
श्लोक 5 (3.67.5)
अपकृष्य च लज्जां सा स्वयमुक्तवती विभो । प्रयतन्तु तव प्रेष्याः पुण्यश्लोकस्य दर्शने ॥
apakṛṣya ca lajjāṃ sā svayamuktavatī vibho | prayatantu tava preṣyāḥ puṇyaślokasya darśane
स्वामी! उसने लज्जा छोड़कर स्वयं मुझसे कहा है — 'आपके सेवक पुण्यश्लोक नल को खोजने का प्रयत्न करें।'"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 6 (3.67.6)
तया प्रचोदितो राजा ब्राह्मणान्वशवर्तिनः । प्रास्थापयद्दिशः सर्वा यतध्वं नलदर्शने ॥
tayā pracodito rājā brāhmaṇānvaśavartinaḥ | prāsthāpayaddiśaḥ sarvā yatadhvaṃ naladarśane
रानी के प्रेरित करने पर राजा ने अपने आज्ञाकारी ब्राह्मणों को सब दिशाओं में यह कहकर भेजा — "नल को खोजने का यत्न करो।"
श्लोक 7 (3.67.7)
ततो विदर्भाधिपतेर्नियोगाद्ब्राह्मणास्तदा । दमयन्तीमथापृच्छ्य प्रस्थितास्ते तथाऽब्रुवन् ॥
tato vidarbhādhipaterniyogādbrāhmaṇāstadā | damayantīmathāpṛcchya prasthitāste tathā'bruvan
तब विदर्भराज की आज्ञा से ब्राह्मणों ने दमयन्ती से विदा ली और उससे कहा कि वे प्रस्थान कर रहे हैं।
श्लोक 8 (3.67.8)
अथ तानब्रवीद्भैमी सर्वराष्ट्रेष्विदं वचः । ब्रूत वै जनसंसत्सु तत्रतत्र पुनः पुनः ॥
atha tānabravīdbhaimī sarvarāṣṭreṣvidaṃ vacaḥ | brūta vai janasaṃsatsu tatratatra punaḥ punaḥ
तब भीमकुमारी ने उनसे कहा — "सब राज्यों में, जहाँ-जहाँ लोगों की सभाएँ हों, वहाँ बार-बार ये वचन कहना —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 9 (3.67.9)
क्व नु त्वं कितव च्छित्त्वा वस्त्रार्धं प्रस्थितो मम । उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥
kva nu tvaṃ kitava cchittvā vastrārdhaṃ prasthito mama | utsṛjya vipine suptāmanuraktāṃ priyāṃ priya
'हे जुआरी! मेरा आधा वस्त्र काटकर, अपनी अनुरागिणी प्रिया को वन में सोती छोड़कर, हे प्रियतम, तुम कहाँ चले गए?
श्लोक 10 (3.67.10)
सा वै यथा त्वया दृष्टा तथाऽऽस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी । दह्यमाना भृशं बाला वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ॥
sā vai yathā tvayā dṛṣṭā tathā''ste tvatpratīkṣiṇī | dahyamānā bhṛśaṃ bālā vastrārdhenābhisaṃvṛtā
वह युवती, जैसी तुमने उसे अन्तिम बार देखा था, वैसी ही आधे वस्त्र में लिपटी, शोक से जलती हुई तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है।
श्लोक 11 (3.67.11)
तस्या रुदन्त्याः सततं तेन शोकेन पार्थिव । प्रसादं कुरु वै देव प्रतिवाक्यं वदस्व च ॥
tasyā rudantyāḥ satataṃ tena śokena pārthiva | prasādaṃ kuru vai deva prativākyaṃ vadasva ca
हे राजन्! वह उसी शोक में निरन्तर रो रही है। हे देव, उस पर कृपा करो और उसे उत्तर दो।'
श्लोक 12 (3.67.12)
एवमन्यच्च वक्तव्यं कृपां कुर्याद्यथा मयि । वायुना धूयमानो हि वनं दहति पावकः ॥
evamanyacca vaktavyaṃ kṛpāṃ kuryādyathā mayi | vāyunā dhūyamāno hi vanaṃ dahati pāvakaḥ
यह और ऐसी ही दूसरी बातें कहना, जिससे उन्हें मुझ पर दया आए — 'हवा से भड़की आग पूरे वन को जला देती है।
श्लोक 13 (3.67.13)
भर्तव्या रक्षणीया च पत्नी पत्या हि नित्यदा । तन्नष्टमुभयं कस्माद्धर्मज्ञस्य सतस्तव ॥
bhartavyā rakṣaṇīyā ca patnī patyā hi nityadā | tannaṣṭamubhayaṃ kasmāddharmajñasya satastava
पति को सदा पत्नी का भरण-पोषण और रक्षा करनी चाहिए। तुम तो धर्म के ज्ञाता हो, फिर तुममें ये दोनों बातें क्यों नष्ट हो गईं?
श्लोक 14 (3.67.14)
ख्यातः प्राज्ञः कुलीनश्च सानुक्रोशो भवान्सदा । संवृत्तो निरनुक्रोशः शङ्के मद्भाग्यसंक्षयात् ॥
khyātaḥ prājñaḥ kulīnaśca sānukrośo bhavānsadā | saṃvṛtto niranukrośaḥ śaṅke madbhāgyasaṃkṣayāt
तुम सदा बुद्धिमान, कुलीन और दयालु प्रसिद्ध थे; अब तुम निर्दय हो गए हो — मुझे लगता है, मेरे भाग्य के क्षीण होने से।
श्लोक 15 (3.67.15)
तत्कुरुष्व नरव्याघ्र दयां मयि नरर्षभ । आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः ॥
tatkuruṣva naravyāghra dayāṃ mayi nararṣabha | ānṛśaṃsyaṃ paro dharmastvatta eva hi me śrutaḥ
इसलिए हे नरव्याघ्र, हे नरश्रेष्ठ, मुझ पर दया करो। मैंने तुम्हीं से सुना है कि क्रूरता का अभाव ही परम धर्म है।'
श्लोक 16 (3.67.16)
एवं ब्रुवाणान्यदि वः प्रतिब्रूयाद्धि कश्चन । स नरः सर्वथा ज्ञेयः कश्चासौ क्व नु वर्तते ॥
evaṃ bruvāṇānyadi vaḥ pratibrūyāddhi kaścana | sa naraḥ sarvathā jñeyaḥ kaścāsau kva nu vartate
इस प्रकार कहते हुए यदि कोई तुम्हें उत्तर दे, तो हर तरह से पता लगाना कि वह व्यक्ति कौन है और कहाँ रहता है।
श्लोक 17 (3.67.17)
यश्चैवं वचनं श्रुत्वा ब्रूयात्प्रतिवचो नरः । तदादाय वचस्तस्य ममावेद्यं द्विजोत्तमाः ॥
yaścaivaṃ vacanaṃ śrutvā brūyātprativaco naraḥ | tadādāya vacastasya mamāvedyaṃ dvijottamāḥ
और जो व्यक्ति ये वचन सुनकर उत्तर दे, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, उसका वह उत्तर लेकर मुझे बताना।
श्लोक 18 (3.67.18)
यथा च वो न जानीयाच्चरतो भीमशासनात् । पुनरागमनं चेह तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥
yathā ca vo na jānīyāccarato bhīmaśāsanāt | punarāgamanaṃ ceha tathā kāryamatandritaiḥ
ऐसी सावधानी से काम करना कि उसे यह पता न चले कि तुम भीम की आज्ञा से घूम रहे हो, और न यह कि तुम यहाँ लौटकर आओगे।
श्लोक 19 (3.67.19)
यदि वाऽसौ समृद्धः स्याद्यदि वाऽप्यधनो भवेत् । यदि वाऽप्यसमर्थः स्याज्ज्ञेयमस्य चिकीर्षितम् ॥
yadi vā'sau samṛddhaḥ syādyadi vā'pyadhano bhavet | yadi vā'pyasamarthaḥ syājjñeyamasya cikīrṣitam
वह चाहे समृद्ध हो, चाहे निर्धन, या चाहे असमर्थ हो, यह जानना कि वह क्या करना चाहता है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 20 (3.67.20)
एवमुक्तास्त्वगच्छंस्ते ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम् । नलं मृगयितुं राजंस्तदा व्यसनिनं तथा ॥
evamuktāstvagacchaṃste brāhmaṇāḥ sarvato diśam | nalaṃ mṛgayituṃ rājaṃstadā vyasaninaṃ tathā
हे राजन्! ऐसा आदेश पाकर वे ब्राह्मण संकट में पड़े नल को खोजने के लिए सब दिशाओं में चल पड़े।
श्लोक 21 (3.67.21)
ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान्घोषांस्तथाऽऽश्रमान् । अन्वेषन्तो नलं राजन्नाधिजग्मुर्द्विजातयः ॥
te purāṇi sarāṣṭrāṇi grāmānghoṣāṃstathā''śramān | anveṣanto nalaṃ rājannādhijagmurdvijātayaḥ
हे राजन्! उन ब्राह्मणों ने नगरों, राज्यों, गाँवों, ग्वालों की बस्तियों और आश्रमों में नल को खोजा, पर वे उन्हें नहीं मिले।
श्लोक 22 (3.67.22)
तच्च वाक्यं तथा सर्वे तत्र तत्र विशांपते । श्रावयांचक्रिरे विप्रा दमयन्त्या यथेरितम् ॥
tacca vākyaṃ tathā sarve tatra tatra viśāṃpate | śrāvayāṃcakrire viprā damayantyā yatheritam
हे प्रजानाथ! और जहाँ-जहाँ वे गए, उन सभी ब्राह्मणों ने दमयन्ती के कहे वे वचन ज्यों के त्यों सुनाए।