आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 68
पर्णाद का समाचार और दमयन्ती की युक्ति
बहुत समय बाद ब्राह्मण पर्णाद अयोध्या से लौटते हैं। राजा ऋतुपर्ण ने दमयन्ती के सन्देश का कोई उत्तर नहीं दिया, पर उनके सारथि बाहुक ने — जो कुरूप है और घोड़ों तथा रसोई में निपुण है — पर्णाद को एकान्त में ले जाकर रोते हुए उसका उत्तर दिया कि कुलीन पत्नी को भाग्य के मारे और विपत्ति में पड़े पति पर क्रोध नहीं करना चाहिए। यह बात पिता से छिपाकर दमयन्ती पर्णाद को पुरस्कार देती है और सुदेव को अयोध्या भेजती है कि वे ऋतुपर्ण से कहें कि वह अगले दिन सूर्योदय पर दूसरा स्वयंवर करेगी।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.68.1)
अथ दीर्घस्य कालस्य पर्णादो नाम वै द्विजः । प्रत्येत्य नगरं भैमीमिदं वचनमब्रवीत् ॥
atha dīrghasya kālasya parṇādo nāma vai dvijaḥ | pratyetya nagaraṃ bhaimīmidaṃ vacanamabravīt
बहुत समय बीतने पर पर्णाद नामक एक ब्राह्मण नगर में लौटे और भीमकुमारी से यह वचन बोले —
पर्णाद उवाच
श्लोक 2 (3.68.2)
नैषधं मृगयाणेन दमयन्ति दिवानिशम् । अयोध्यां नगरीं गत्वा भाङ्गस्वरिरुपस्थितः ॥
naiṣadhaṃ mṛgayāṇena damayanti divāniśam | ayodhyāṃ nagarīṃ gatvā bhāṅgasvarirupasthitaḥ
"हे दमयन्ती! निषधराज को दिन-रात खोजते हुए मैं अयोध्या नगरी गया और भङ्गासुर के पुत्र (ऋतुपर्ण) के पास पहुँचा।
श्लोक 3 (3.68.3)
श्रावितश्च मया वाक्यं त्वदीयं स महाजने । ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि ॥
śrāvitaśca mayā vākyaṃ tvadīyaṃ sa mahājane | ṛtuparṇo mahābhāgo yathoktaṃ varavarṇini
हे सुन्दरी! एक बड़ी सभा में मैंने महाभाग ऋतुपर्ण को तुम्हारे वचन ठीक वैसे ही सुनाए जैसे तुमने कहे थे।
श्लोक 4 (3.68.4)
तच्छ्रुत्वा नाब्रवीत्किंचिदृतुपर्णो नराधिपः । न च पारिषदः कश्चिद्भाष्यमाणो मयाऽसकृत् ॥
tacchrutvā nābravītkiṃcidṛtuparṇo narādhipaḥ | na ca pāriṣadaḥ kaścidbhāṣyamāṇo mayā'sakṛt
उन्हें सुनकर नरेश ऋतुपर्ण ने कुछ नहीं कहा; मेरे बार-बार कहने पर भी उनके सभासदों में से किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
श्लोक 5 (3.68.5)
अनुज्ञातं तु मां राज्ञा विजने कश्चिदब्रवीत् । ऋतुपर्णस्य पुरुषो बाहुको नाम नामतः ॥
anujñātaṃ tu māṃ rājñā vijane kaścidabravīt | ṛtuparṇasya puruṣo bāhuko nāma nāmataḥ
पर जब राजा ने मुझे जाने की अनुमति दे दी, तब एकान्त में मुझसे ऋतुपर्ण का एक सेवक बोला, जिसका नाम बाहुक है।
श्लोक 6 (3.68.6)
सूतस्तस्य नरेन्द्रस्य विरूपो ह्रस्वबाहुकः । शीघ्रयानेषु कुशलो मृष्टकर्ता च भोजने ॥
sūtastasya narendrasya virūpo hrasvabāhukaḥ | śīghrayāneṣu kuśalo mṛṣṭakartā ca bhojane
वह उस राजा का सारथि है — कुरूप, छोटी भुजाओं वाला, तेज़ रथ चलाने में निपुण और स्वादिष्ट भोजन बनाने वाला।
श्लोक 7 (3.68.7)
स विनिःश्वस्य बहुशो रुदित्वा च पुनः पुनः । कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभाषत ॥
sa viniḥśvasya bahuśo ruditvā ca punaḥ punaḥ | kuśalaṃ caiva māṃ pṛṣṭvā paścādidamabhāṣata
उसने कई बार लम्बी साँसें लीं, बार-बार रोया, और मेरा कुशल पूछकर फिर यह कहा —
श्लोक 8 (3.68.8)
वैषम्यमपि संप्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥
vaiṣamyamapi saṃprāptā gopāyanti kulastriyaḥ | ātmānamātmanā satyo jitaḥ svargo na saṃśayaḥ
'कुलीन स्त्रियाँ विपत्ति में पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। ऐसी सती स्त्रियों ने स्वर्ग जीत लिया है, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 9 (3.68.9)
रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन । प्राणांश्चारित्रकवचान्धारयन्ति वरस्त्रियः ॥
rahitā bhartṛbhiścaiva na kupyanti kadācana | prāṇāṃścāritrakavacāndhārayanti varastriyaḥ
पतियों से बिछुड़कर भी वे कभी क्रोध नहीं करतीं; श्रेष्ठ स्त्रियाँ सदाचार को कवच बनाकर अपने प्राणों को धारण करती हैं।
श्लोक 10 (3.68.10)
विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च । यत्सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ॥
viṣamasthena mūḍhena paribhraṣṭasukhena ca | yatsā tena parityaktā tatra na kroddhumarhati
विपत्ति में पड़े, मोहग्रस्त और सुख से वंचित उस पुरुष ने यदि उसे त्याग दिया, तो इस पर उसे क्रोध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 11 (3.68.11)
प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः । आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ॥
prāṇayātrāṃ pariprepsoḥ śakunairhṛtavāsasaḥ | ādhibhirdahyamānasya śyāmā na kroddhumarhati
जो जीवन-निर्वाह का उपाय खोज रहा था, जिसका वस्त्र पक्षी ले उड़े, और जो मानसिक पीड़ाओं से जल रहा था, उस पर उस श्यामा को क्रोध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 12 (3.68.12)
सत्कृताऽसत्कृता वाऽपि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् । भ्रष्टराज्यं श्रिया हीनं श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ॥
satkṛtā'satkṛtā vā'pi patiṃ dṛṣṭvā tathāgatam | bhraṣṭarājyaṃ śriyā hīnaṃ śyāmā na kroddhumarhati
उसके साथ अच्छा व्यवहार हुआ हो या बुरा, अपने पति को ऐसी दशा में — राज्य से च्युत और श्री से हीन — देखकर उस श्यामा को क्रोध नहीं करना चाहिए।'
श्लोक 13 (3.68.13)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा त्वरितोऽहमिहागतः । श्रुत्वा प्रमाणं भवती राज्ञश्चैव निवेदय ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā tvarito'hamihāgataḥ | śrutvā pramāṇaṃ bhavatī rājñaścaiva nivedaya
उसकी यह बात सुनकर मैं शीघ्र यहाँ आ गया हूँ। सुनकर अब तुम्हीं निर्णय करो, और राजा को भी बता दो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 14 (3.68.14)
एतच्छ्रुत्वाऽश्रुपूर्णाक्षी पर्णादस्य विशांपते । दमयन्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभाषत ॥
etacchrutvā'śrupūrṇākṣī parṇādasya viśāṃpate | damayantī raho'bhyetya mātaraṃ pratyabhāṣata
हे प्रजानाथ! पर्णाद की यह बात सुनकर आँसुओं से भरी आँखों वाली दमयन्ती एकान्त में अपनी माता के पास गई और बोली —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 15 (3.68.15)
अयमर्थो न संवेद्यो भीमे मातः कदाचन । त्वत्सन्निधौ नियोक्ष्येऽहं सुदेवं द्विजसत्तमम् ॥
ayamartho na saṃvedyo bhīme mātaḥ kadācana | tvatsannidhau niyokṣye'haṃ sudevaṃ dvijasattamam
"माँ, यह बात पिता भीम को कभी नहीं बतानी है। आपकी उपस्थिति में मैं द्विजश्रेष्ठ सुदेव को इस काम में लगाऊँगी।
श्लोक 16 (3.68.16)
यथा न नृपतिर्भीमः प्रतिपद्येत मे मतम् । तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत्प्रियमिच्छसि ॥
yathā na nṛpatirbhīmaḥ pratipadyeta me matam | tathā tvayā prakartavyaṃ mama cetpriyamicchasi
यदि आप मेरा प्रिय करना चाहती हैं, तो ऐसा कीजिए जिससे राजा भीम को मेरे इस विचार का पता न चले।
श्लोक 17 (3.68.17)
यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु बान्धवान् । तेनैव मङ्गलेनाद्य सुदेवो यातु मा चिरम् ॥
yathā cāhaṃ samānītā sudevenāśu bāndhavān | tenaiva maṅgalenādya sudevo yātu mā ciram
जिस प्रकार सुदेव मुझे शीघ्र मेरे स्वजनों के पास ले आए थे, उसी मंगल-शकुन के साथ सुदेव आज ही बिना देर किए जाएँ,
श्लोक 18 (3.68.18)
समानेतुं नलं मातरयोध्यां नगरीमितः । ऋतुपर्णस्य नगरे निवसन्तमरिन्दमम् ॥
samānetuṃ nalaṃ mātarayodhyāṃ nagarīmitaḥ | ṛtuparṇasya nagare nivasantamarindamam
माँ, यहाँ से अयोध्या नगरी तक, ऋतुपर्ण के नगर में रह रहे शत्रुदमन नल को वापस लाने के लिए।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 19 (3.68.19)
विश्रान्तं तु ततः पश्चात्पर्णादं द्विजसत्तमम् । अर्चयामास वैदर्भी धनेनातीव भामिनी ॥
viśrāntaṃ tu tataḥ paścātparṇādaṃ dvijasattamam | arcayāmāsa vaidarbhī dhanenātīva bhāminī
इसके बाद जब द्विजश्रेष्ठ पर्णाद विश्राम कर चुके, तब सुन्दरी विदर्भकुमारी ने बहुत धन देकर उनका सत्कार किया।
श्लोक 20 (3.68.20)
उवाच चैनं महता संपूज्य द्रविणेन वै । नले चेहागते विप्र भूयो दास्यामि ते वसु ॥
uvāca cainaṃ mahatā saṃpūjya draviṇena vai | nale cehāgate vipra bhūyo dāsyāmi te vasu
बहुत धन से उनका सम्मान करके उसने उनसे कहा — "हे विप्र! नल के यहाँ आ जाने पर मैं आपको और भी धन दूँगी।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 21 (3.68.21)
त्वया हि मे बहु कृतं यदन्यो न करिष्यति । यद्भर्त्राऽहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ॥
tvayā hi me bahu kṛtaṃ yadanyo na kariṣyati | yadbhartrā'haṃ sameṣyāmi śīghrameva dvijottama
हे द्विजोत्तम! आपने मेरा बहुत बड़ा उपकार किया है, जैसा कोई दूसरा नहीं करेगा, क्योंकि इससे मैं शीघ्र ही अपने पति से मिलूँगी।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 22 (3.68.22)
स एवमुक्तोऽथाश्वास्य आशीर्वादैः सुमङ्गलैः । गृहानुपययौ चापि कृतार्थः सुमहामनाः ॥
sa evamukto'thāśvāsya āśīrvādaiḥ sumaṅgalaiḥ | gṛhānupayayau cāpi kṛtārthaḥ sumahāmanāḥ
ऐसा कहे जाने पर उन महामना ब्राह्मण ने मंगलमय आशीर्वादों से उसे धीरज बँधाया और कृतार्थ होकर अपने घर चले गए।
श्लोक 23 (3.68.23)
ततः सुदेवमानाय्य दमयन्ती युधिष्ठिर । अब्रवीत्सन्निधौ मातुर्दुःखशोकसमन्विता ॥
tataḥ sudevamānāyya damayantī yudhiṣṭhira | abravītsannidhau māturduḥkhaśokasamanvitā
हे युधिष्ठिर! तब दमयन्ती ने सुदेव को बुलवाया और दुःख-शोक से भरकर माता की उपस्थिति में उनसे कहा —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 24 (3.68.24)
गत्वा सुदेव नगरीमयोध्यावासिनं नृपम् । ऋतुपर्णं वचो ब्रूहि पतिमन्यं चिकीर्षती ॥
gatvā sudeva nagarīmayodhyāvāsinaṃ nṛpam | ṛtuparṇaṃ vaco brūhi patimanyaṃ cikīrṣatī
"सुदेव! अयोध्या नगरी जाकर वहाँ रहने वाले राजा ऋतुपर्ण से यह बात कहिए — 'दूसरा पति चुनने की इच्छा से
श्लोक 25 (3.68.25)
आस्थास्यति पुनर्भैमी दमयन्ती स्वयंवरम् । तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥
āsthāsyati punarbhaimī damayantī svayaṃvaram | tatra gacchanti rājāno rājaputrāśca sarvaśaḥ
भीमकुमारी दमयन्ती फिर से स्वयंवर करेगी। वहाँ सब ओर से राजा और राजकुमार जा रहे हैं।
श्लोक 26 (3.68.26)
तथा च गणितः कालः श्वोभूते स भविष्यति । यदि संभाविनीयं ते गच्छ शीघ्रमरिंदम ॥
tathā ca gaṇitaḥ kālaḥ śvobhūte sa bhaviṣyati | yadi saṃbhāvinīyaṃ te gaccha śīghramariṃdama
गणना के अनुसार वह कल ही होगा। हे शत्रुदमन! यदि आपके लिए यह सम्भव हो, तो शीघ्र जाइए।
श्लोक 27 (3.68.27)
सूर्योदये द्वितीयं सा भर्तारं वरयिष्यति । न हि स ज्ञायते वीरो नलो जीवन्मृतोपि वा ॥
sūryodaye dvitīyaṃ sā bhartāraṃ varayiṣyati | na hi sa jñāyate vīro nalo jīvanmṛtopi vā
सूर्योदय होते ही वह दूसरा पति चुन लेगी, क्योंकि किसी को पता नहीं कि वीर नल जीवित हैं या मर गए।'"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 28 (3.68.28)
एवं तथा यथोक्तो वै गत्वा राजानमब्रवीत् । ऋतुपर्णं महाराज सुदेवो ब्राह्मणस्तदा ॥
evaṃ tathā yathokto vai gatvā rājānamabravīt | ṛtuparṇaṃ mahārāja sudevo brāhmaṇastadā
हे महाराज! उसके इस प्रकार समझाने पर ब्राह्मण सुदेव गए और उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से वैसा ही कहा।