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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 69

विदर्भ-यात्रा के लिए बाहुक का अश्व जोतना

बृहदश्व नल की कथा आगे सुनाते हैं। सुदेव से दमयन्ती के दूसरे स्वयंवर का समाचार पाकर ऋतुपर्ण बाहुक से एक ही दिन में विदर्भ पहुँचाने को कहते हैं। दमयन्ती के प्रति संदेह और विश्वास के बीच झूलते नल सहमत हो जाते हैं, ऐसे दुबले पर शुभ लक्षणों वाले घोड़े चुनते हैं जिन्हें देखकर राजा पहले क्रुद्ध होता है, और इतने वेग से रथ हाँकते हैं कि वह मानो उड़ने लगता है। वार्ष्णेय सोचता है कि बाहुक कहीं मातलि, शालिहोत्र या स्वयं नल तो नहीं, और ऋतुपर्ण अपने सारथि की कुशलता देखकर हर्षित होते हैं।

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

बृहदश्व उवाच

श्लोक 1 (3.69.1)

श्रुत्वा वचः सुदेवस्य ऋतुपर्णो नराधिपः । सारथीन्स समानीय वार्ष्णेयप्रभृतीन्नृपः । कथयामास यद्वृत्तं ब्राह्मणेन श्रुतं तथा ॥

śrutvā vacaḥ sudevasya ṛtuparṇo narādhipaḥ | sārathīnsa samānīya vārṣṇeyaprabhṛtīnnṛpaḥ | kathayāmāsa yadvṛttaṃ brāhmaṇena śrutaṃ tathā

सुदेव की बात सुनकर नरेश ऋतुपर्ण ने वार्ष्णेय आदि अपने सारथियों को बुलाया और ब्राह्मण से जैसा सुना था, वैसा सारा वृत्तान्त उन्हें कह सुनाया।

श्लोक 2 (3.69.2)

बाहुकं च समाहूय दमयन्त्याः स्वयंवरम् । सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा बाहुकं प्रत्यभाषत ॥

bāhukaṃ ca samāhūya damayantyāḥ svayaṃvaram | sāntvayañślakṣṇayā vācā bāhukaṃ pratyabhāṣata

उसने बाहुक को भी बुलाकर दमयन्ती के स्वयंवर की बात बताई, और फिर कोमल वाणी से उसे सान्त्वना देते हुए बाहुक से कहा —

ऋतुपर्ण उवाच

श्लोक 3 (3.69.3)

विदर्भान्यातुमिच्छामि दमयन्त्याः स्वयंवरम् । एकाह्ना हयतत्त्वज्ञ मन्यसे यदि बाहुक ॥

vidarbhānyātumicchāmi damayantyāḥ svayaṃvaram | ekāhnā hayatattvajña manyase yadi bāhuka

"हे अश्वों का तत्त्व जानने वाले बाहुक, यदि तुम सम्भव समझो, तो मैं दमयन्ती के स्वयंवर के लिए एक ही दिन में विदर्भ पहुँचना चाहता हूँ।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 4 (3.69.4)

एवमुक्तस्य कौन्तेय तेन राज्ञा नलस्य ह । व्यदीर्यत मनो दुःखात्प्रदध्यौ च महामनाः ॥

evamuktasya kaunteya tena rājñā nalasya ha | vyadīryata mano duḥkhātpradadhyau ca mahāmanāḥ

हे कुन्तीनन्दन, राजा के ऐसा कहने पर नल का हृदय दुःख से फटने लगा और वह महामना गहरे सोच में डूब गया।

बाहुक उवाच

श्लोक 5 (3.69.5)

दमयन्ती भवेदेवं किंनु दुःखेन मोहिता । अस्मदर्थे भवेद्वाऽयमुपायश्चिन्तितो महान् ॥

damayantī bhavedevaṃ kiṃnu duḥkhena mohitā | asmadarthe bhavedvā'yamupāyaścintito mahān

"क्या दमयन्ती सचमुच दुःख से मोहित होकर ऐसी हो गई है? या फिर यह मेरे ही लिए सोचा गया कोई बड़ा उपाय है?

श्लोक 6 (3.69.6)

नृशंसं बत वैदर्भी कर्तुकामा तपस्विनी । मया क्षुद्रेण निकृताकृपणा पापबुद्धिना । स्त्रीस्वभावश्चलो लोके मम दोषश्च दारुणः ॥

nṛśaṃsaṃ bata vaidarbhī kartukāmā tapasvinī | mayā kṣudreṇa nikṛtākṛpaṇā pāpabuddhinā | strīsvabhāvaścalo loke mama doṣaśca dāruṇaḥ

हाय, वह तपस्विनी विदर्भकुमारी कोई निष्ठुर काम करना चाहती है — वही भोली स्त्री, जिसे मुझ नीच और पापबुद्धि ने छला था। संसार में स्त्री का स्वभाव चंचल होता है, और मेरा अपराध भी भयंकर है।

श्लोक 7 (3.69.7)

मम शोकेन संविग्ना नैराश्यात्तनुमध्यमा । नैवं सा कर्हिचित्कुर्यात्सापत्या च विशेषतः ॥

mama śokena saṃvignā nairāśyāttanumadhyamā | naivaṃ sā karhicitkuryātsāpatyā ca viśeṣataḥ

मेरे शोक से व्याकुल और निराश होकर क्या वह कृशकटि ऐसा करेगी? नहीं, वह ऐसा कभी नहीं करेगी — विशेषकर तब, जब वह सन्तानवती है।

श्लोक 8 (3.69.8)

यदत्र सत्यं वाऽसत्यं गत्वा वेत्स्यामि निश्चयम् । ऋतुपर्णस्य वै काममात्मार्थं च करोम्यहम् ॥

yadatra satyaṃ vā'satyaṃ gatvā vetsyāmi niścayam | ṛtuparṇasya vai kāmamātmārthaṃ ca karomyaham

यह सच है या झूठ, वहाँ जाकर मैं निश्चित रूप से जान लूँगा। ऋतुपर्ण की इच्छा भी पूरी करूँगा और अपना प्रयोजन भी साधूँगा।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 9 (3.69.9)

इति निश्चित्य मनसा बाहुको दीनमानसः । कृताञ्जलिरुवाचेदमृतुपर्णं जनाधिपम् ॥

iti niścitya manasā bāhuko dīnamānasaḥ | kṛtāñjaliruvācedamṛtuparṇaṃ janādhipam

मन में यह निश्चय करके, उदास मन वाले बाहुक ने हाथ जोड़कर नरेश ऋतुपर्ण से यह कहा —

बाहुक उवाच

श्लोक 10 (3.69.10)

प्रतिजानामि ते वाक्यं गमिष्यामि नराधिप । एकाह्ना पुरुषव्याघ्र विदर्भनगरीं नृप । तत्रादित्योदये काले श्वो विदर्भान्गमिष्यसि ॥

pratijānāmi te vākyaṃ gamiṣyāmi narādhipa | ekāhnā puruṣavyāghra vidarbhanagarīṃ nṛpa | tatrādityodaye kāle śvo vidarbhāngamiṣyasi

"हे नराधिप, मैं आपकी बात स्वीकार करता हूँ; हे पुरुषसिंह राजन्, मैं एक ही दिन में विदर्भ नगरी चलूँगा। कल सूर्योदय के समय आप विदर्भ के लिए चल पड़ेंगे।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 11 (3.69.11)

एवमुक्तोऽब्रवीद्राजा बाहुकं प्रहसन्निव । किं ते कामं करोम्यद्य तुष्टोऽस्मि तव बाहुक ॥

evamukto'bravīdrājā bāhukaṃ prahasanniva | kiṃ te kāmaṃ karomyadya tuṣṭo'smi tava bāhuka

ऐसा सुनकर राजा ने मानो हँसते हुए बाहुक से कहा — "बाहुक, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; आज मैं तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ?"

बाहुक उवाच

श्लोक 12 (3.69.12)

यावद्यानमिदं सज्जमृतुपर्ण करोम्यहम् ॥

yāvadyānamidaṃ sajjamṛtuparṇa karomyaham

"ऋतुपर्ण, बस तब तक ठहरिए, जब तक मैं यह रथ तैयार करता हूँ।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 13 (3.69.13)

ततः परीक्षामश्वानां चक्रे राजन्स बाहुकः । अश्वशालामुपागम्य भागस्वरिनृपाज्ञया ॥

tataḥ parīkṣāmaśvānāṃ cakre rājansa bāhukaḥ | aśvaśālāmupāgamya bhāgasvarinṛpājñayā

हे राजन्, तब बाहुक ने अश्वशाला में जाकर राजा भाङ्गस्वरि की आज्ञा से घोड़ों की परीक्षा की।

श्लोक 14 (3.69.14)

स त्वर्यमाणो बहुश ऋतुपर्णेन बाहुकः । अश्वाञ्जिज्ञासमानो वै विचार्य च पुनःपुनः । अध्यगच्छत्कृशानश्वान्समर्थानध्वनि क्षमान् ॥

sa tvaryamāṇo bahuśa ṛtuparṇena bāhukaḥ | aśvāñjijñāsamāno vai vicārya ca punaḥpunaḥ | adhyagacchatkṛśānaśvānsamarthānadhvani kṣamān

ऋतुपर्ण के बार-बार शीघ्रता कराने पर बाहुक ने घोड़ों को परखा, बार-बार विचार किया, और ऐसे दुबले घोड़े चुने जो समर्थ थे और लम्बा मार्ग सह सकते थे —

श्लोक 15 (3.69.15)

तेजोबलसमायुक्तान्कुलशीलसमन्वितान् । वर्जिताँल्लक्षणैर्हीनैः पृथुप्रोथान्महाहनून् ॥

tejobalasamāyuktānkulaśīlasamanvitān | varjitām̐llakṣaṇairhīnaiḥ pṛthuprothānmahāhanūn

जो तेज और बल से युक्त, उत्तम कुल और स्वभाव वाले, अशुभ लक्षणों से रहित, चौड़े नथुनों और बड़े जबड़ों वाले थे,

श्लोक 16 (3.69.16)

शुद्धान्दशभिरावर्तैः सिन्धुजान्वातरंहसः । दृश्यमानान्कृशानङ्गैर्जवेनाप्रतिमान्पथि ॥

śuddhāndaśabhirāvartaiḥ sindhujānvātaraṃhasaḥ | dṛśyamānānkṛśānaṅgairjavenāpratimānpathi

जिनके दसों भँवर शुद्ध थे, जो सिन्धु देश में जन्मे और वायु के समान वेगवान् थे — देखने में दुबले अंगों वाले, पर मार्ग में वेग में अनुपम।

श्लोक 17 (3.69.17)

तान्दृष्ट्वा दुर्बलान्राजा प्राह कोपसमन्वितः । किमिदं प्रार्थितं कर्तुं प्रलब्धव्या न ते वयम् ॥

tāndṛṣṭvā durbalānrājā prāha kopasamanvitaḥ | kimidaṃ prārthitaṃ kartuṃ pralabdhavyā na te vayam

उन दुर्बल दिखने वाले घोड़ों को देखकर राजा ने क्रोध से कहा — "यह तुम क्या करना चाहते हो? हम तुम्हारे छल में नहीं आएँगे।

ऋतुपर्ण उवाच

श्लोक 18 (3.69.18)

कथमल्पबलप्राणा वक्ष्यन्तीमे हया रथम् । महानध्वा स चैकाह्ना गन्तव्यः कथमीदृशैः ॥

kathamalpabalaprāṇā vakṣyantīme hayā ratham | mahānadhvā sa caikāhnā gantavyaḥ kathamīdṛśaiḥ

इतने कम बल और प्राण वाले ये घोड़े रथ कैसे खींचेंगे? मार्ग लम्बा है और उसे एक ही दिन में पार करना है — ऐसे घोड़ों से यह कैसे होगा?"

बाहुक उवाच

श्लोक 19 (3.69.19)

एको ललाटे द्वौ मूर्ध्नि द्वौद्वौ पार्श्वोपपार्श्वयोः । द्वौद्वौ वक्षसि विज्ञेयौ प्रयाणे चैक एव तु ॥

eko lalāṭe dvau mūrdhni dvaudvau pārśvopapārśvayoḥ | dvaudvau vakṣasi vijñeyau prayāṇe caika eva tu

"माथे पर एक भँवर, सिर पर दो, दोनों पार्श्वों और उपपार्श्वों पर दो-दो, छाती पर दो-दो, और पीठ पर एक — ये लक्षण इस प्रकार जानने चाहिए।

श्लोक 20 (3.69.20)

एते हया गमिष्यन्ति विदर्भान्नात्र संशयः । यानन्यान्मन्यसे राजन्ब्रूहि तान्योजयामिते ॥

ete hayā gamiṣyanti vidarbhānnātra saṃśayaḥ | yānanyānmanyase rājanbrūhi tānyojayāmite

ये घोड़े विदर्भ पहुँच जाएँगे, इसमें कोई संशय नहीं। पर हे राजन्, यदि आप किन्हीं दूसरों को ठीक समझते हैं, तो बताइए, मैं उन्हीं को आपके लिए जोत दूँ।"

ऋतुपर्ण उवाच

श्लोक 21 (3.69.21)

त्वमेव हयतत्त्वज्ञः कुशलो ह्यसि बाहुक । यान्मन्यसे समर्थास्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय ॥

tvameva hayatattvajñaḥ kuśalo hyasi bāhuka | yānmanyase samarthāstvaṃ kṣipraṃ tāneva yojaya

"बाहुक, अश्वों का तत्त्व तुम्हीं जानते हो, तुम्हीं कुशल हो। जिन्हें तुम समर्थ समझो, उन्हीं को शीघ्र जोत दो।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 22 (3.69.22)

ततः सदश्वांश्चतुरः कुलशीलसमन्वितान् । योजयामास कुशलो जवयुक्तान्रथे नलः ॥

tataḥ sadaśvāṃścaturaḥ kulaśīlasamanvitān | yojayāmāsa kuśalo javayuktānrathe nalaḥ

तब कुशल नल ने उत्तम कुल और स्वभाव वाले, वेग से भरे चार श्रेष्ठ घोड़े रथ में जोत दिए।

श्लोक 23 (3.69.23)

ततो युक्तं रथं राजा समारोहत्त्वरान्वितः । अथ पर्यपतन्भूमौ जानुभिस्ते हयोत्तमाः ॥

tato yuktaṃ rathaṃ rājā samārohattvarānvitaḥ | atha paryapatanbhūmau jānubhiste hayottamāḥ

राजा उतावली में जुते हुए रथ पर चढ़ा, और उसी क्षण वे उत्तम घोड़े घुटनों के बल धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 24 (3.69.24)

ततो नरवरः श्रीमान्नलो राजा विशांपते । सान्त्वयामास तानश्वांस्तेजोबलसमन्वितान् ॥

tato naravaraḥ śrīmānnalo rājā viśāṃpate | sāntvayāmāsa tānaśvāṃstejobalasamanvitān

हे प्रजानाथ, तब नरश्रेष्ठ श्रीमान् राजा नल ने तेज और बल से भरे उन घोड़ों को पुचकारकर शान्त किया।

श्लोक 25 (3.69.25)

रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेष सः । सूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम् ॥

raśmibhiśca samudyamya nalo yātumiyeṣa saḥ | sūtamāropya vārṣṇeyaṃ javamāsthāya vai param

लगामें सँभालकर नल ने चलने की तैयारी की; सारथि वार्ष्णेय को रथ पर बिठाकर उन्होंने परम वेग पकड़ा।

श्लोक 26 (3.69.26)

ते चोद्यमाना विधिवद्बाहुकेन हयोत्तमाः । समुत्पेतुरिवाकाशं रथिनं मोहयन्ति च ॥

te codyamānā vidhivadbāhukena hayottamāḥ | samutpeturivākāśaṃ rathinaṃ mohayanti ca

बाहुक के विधिपूर्वक हाँकने पर वे उत्तम घोड़े मानो आकाश में उड़ चले, और रथ पर बैठे राजा को चकित करने लगे।

श्लोक 27 (3.69.27)

तथा तु दृष्ट्वा तानश्वान्वहतो वातरंहसः । अयोध्याधिपतिः श्रीमान्विस्मयं परमं ययौ ॥

tathā tu dṛṣṭvā tānaśvānvahato vātaraṃhasaḥ | ayodhyādhipatiḥ śrīmānvismayaṃ paramaṃ yayau

उन घोड़ों को वायु के वेग से रथ ले जाते देखकर श्रीमान् अयोध्यापति अत्यन्त विस्मित हुआ।

श्लोक 28 (3.69.28)

रथघोषं तु तं श्रुत्वा हयसंग्रहणं च तत् । वार्ष्णेयश्चिन्तयामास बाहुकस्य हयज्ञताम् ॥

rathaghoṣaṃ tu taṃ śrutvā hayasaṃgrahaṇaṃ ca tat | vārṣṇeyaścintayāmāsa bāhukasya hayajñatām

रथ की वह गड़गड़ाहट सुनकर और घोड़ों पर वैसा नियन्त्रण देखकर वार्ष्णेय बाहुक के अश्वज्ञान पर विचार करने लगा —

वार्ष्णेय उवाच

श्लोक 29 (3.69.29)

किंनु स्यान्मातलिरयं देवराजस्य सारथिः । तथा तल्लक्षणं वीरे बाहुके दृश्यते महत् ॥

kiṃnu syānmātalirayaṃ devarājasya sārathiḥ | tathā tallakṣaṇaṃ vīre bāhuke dṛśyate mahat

"कहीं यह देवराज का सारथि मातलि तो नहीं? वीर बाहुक में वैसा ही महान् लक्षण दिखाई देता है।

श्लोक 30 (3.69.30)

शालिहोत्रोऽथ किंतु स्याद्धयानां कुलतत्त्ववित् । मानुषं समनुप्राप्तो वपुः परमशोभनम् ॥

śālihotro'tha kiṃtu syāddhayānāṃ kulatattvavit | mānuṣaṃ samanuprāpto vapuḥ paramaśobhanam

या कहीं यह अश्वों के कुल और तत्त्व के ज्ञाता शालिहोत्र तो नहीं, जो परम सुन्दर मानव-शरीर धारण करके आए हैं?

बृहदश्व उवाच

श्लोक 31 (3.69.31)

उताहोस्विद्भवेद्राजा नलः परपुरंजयः । सोयं नृपतिरायात इत्येवं समचिन्तयत् ॥

utāhosvidbhavedrājā nalaḥ parapuraṃjayaḥ | soyaṃ nṛpatirāyāta ityevaṃ samacintayat

अथवा कहीं यह शत्रुओं के नगर जीतने वाले राजा नल तो नहीं — क्या वही राजा यहाँ आ गए हैं?" इस प्रकार वह सोचने लगा।

वार्ष्णेय उवाच

श्लोक 32 (3.69.32)

अथवाऽयंनलात्प्राप्तो विद्यां तामेव बाहुकः । तुल्यं हि लक्षये ज्ञानं बाहुकस्य नलस्य च ॥

athavā'yaṃnalātprāpto vidyāṃ tāmeva bāhukaḥ | tulyaṃ hi lakṣaye jñānaṃ bāhukasya nalasya ca

"या फिर बाहुक ने नल से वही विद्या पाई है, क्योंकि बाहुक और नल में मुझे एक-सा ज्ञान दिखाई देता है।

श्लोक 33 (3.69.33)

अपिचेदं वयस्तुल्यं बाहुकस्य नलस्य च । नायं नलो महावीर्यस्तद्विद्यश्च भविष्यति ॥

apicedaṃ vayastulyaṃ bāhukasya nalasya ca | nāyaṃ nalo mahāvīryastadvidyaśca bhaviṣyati

बाहुक और नल की आयु भी एक-सी है। यदि यह महापराक्रमी नल नहीं है, तो नल की विद्या जानने वाला कोई अवश्य होगा।

श्लोक 34 (3.69.34)

प्रच्छन्ना हि महात्मानश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् । दैवेन विधिना युक्ताः शास्त्रोक्तैश्च निरूपणैः ॥

pracchannā hi mahātmānaścaranti pṛthivīmimām | daivena vidhinā yuktāḥ śāstroktaiśca nirūpaṇaiḥ

क्योंकि महात्मा लोग दैव और विधि के अधीन होकर, शास्त्रों में बताए गए वेशों में छिपकर इस पृथ्वी पर विचरते हैं।

श्लोक 35 (3.69.35)

भवेन्न मतिभेदो मे गात्रवैरूप्यतां प्रति । प्रमाणात्परिहीनस्तु भवेदिति मतिर्मम ॥

bhavenna matibhedo me gātravairūpyatāṃ prati | pramāṇātparihīnastu bhavediti matirmama

शरीर की कुरूपता से मेरा मत नहीं बदलना चाहिए; मेरा विचार यही है कि वह अपने स्वाभाविक रूप से गिर गया है।

श्लोक 36 (3.69.36)

वयःप्रमाणं तत्तुल्यं रूपेण तु विपर्ययः । नलं सर्वगुणैर्युक्तं मन्ये बाहुकमन्ततः ॥

vayaḥpramāṇaṃ tattulyaṃ rūpeṇa tu viparyayaḥ | nalaṃ sarvaguṇairyuktaṃ manye bāhukamantataḥ

आयु और डील-डौल में वह वैसा ही है, केवल रूप में उलटा। अन्ततः मैं बाहुक को सर्वगुणसम्पन्न नल ही मानता हूँ।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 37 (3.69.37)

एवं विचार्य बहुशो वार्ष्णेयः पर्यचिन्तयत् । हृदयेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ॥

evaṃ vicārya bahuśo vārṣṇeyaḥ paryacintayat | hṛdayena mahārāja puṇyaślokasya sārathiḥ

हे महाराज, इस प्रकार बहुत विचार करके पुण्यश्लोक नल का सारथि वार्ष्णेय मन ही मन इस पर सोचता रहा।

श्लोक 38 (3.69.38)

ऋतुपर्णश्च राजेन्द्रो बाहुकस्य हयज्ञताम् । चिन्तयन्मुमुदे राजा सहवार्ष्णेयसारथिः ॥

ṛtuparṇaśca rājendro bāhukasya hayajñatām | cintayanmumude rājā sahavārṣṇeyasārathiḥ

और राजाधिराज ऋतुपर्ण भी बाहुक के अश्वज्ञान का विचार करते हुए अपने सारथि वार्ष्णेय सहित आनन्दित हुए।

श्लोक 39 (3.69.39)

ऐकाग्र्यं च तथोत्साहं हयसंग्रहणं च तत् । कौशलं चापि संप्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह ॥

aikāgryaṃ ca tathotsāhaṃ hayasaṃgrahaṇaṃ ca tat | kauśalaṃ cāpi saṃprekṣya parāṃ mudamavāpa ha

उसकी एकाग्रता, उत्साह, घोड़ों पर नियन्त्रण और कुशलता देखकर राजा को परम आनन्द हुआ।

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