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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 70

कलि का नल को छोड़ना

विदर्भ की ओर उड़ते रथ में ऋतुपर्ण का उत्तरीय गिर जाता है, और अपनी विद्या दिखाने के लिए वे एक बहेड़े के वृक्ष के पत्तों और फलों की संख्या बता देते हैं। बाहुक वृक्ष गिराकर गिनता है, राजा की बात सही पाता है, और दोनों अपनी विद्याओं का आदान-प्रदान करते हैं — अक्षहृदय के बदले अश्वहृदय। अक्षविद्या पाते ही कलि कर्कोटक का विष उगलता हुआ नल के शरीर से निकलता है; वह नल से शाप न देने की विनती करता है, वचन देता है कि नल की कथा कहने वालों को उससे कोई भय नहीं होगा, और बहेड़े के वृक्ष में शरण लेता है। मुक्त होकर नल विदर्भ की ओर बढ़ते हैं; अब उनमें केवल अपना रूप लौटना शेष है।

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

बृहदश्व उवाच

श्लोक 1 (3.70.1)

स नदीः पर्वतांश्चैव वनानि च सरांसि च । अचिरेणातिचक्राम खेचरः खे चरन्निव ॥

sa nadīḥ parvatāṃścaiva vanāni ca sarāṃsi ca | acireṇāticakrāma khecaraḥ khe caranniva

आकाश में विचरते पक्षी की भाँति वह नदियों, पर्वतों, वनों और सरोवरों को क्षण भर में पार कर गया।

श्लोक 2 (3.70.2)

तथा प्रयाते तु रथे तदा भागस्वरिर्नृपः । उत्तरीयमधोपश्यद्भ्रष्टं परपुरंजयः ॥

tathā prayāte tu rathe tadā bhāgasvarirnṛpaḥ | uttarīyamadhopaśyadbhraṣṭaṃ parapuraṃjayaḥ

रथ के इस प्रकार दौड़ते समय शत्रुनगरविजयी राजा भाङ्गस्वरि ने देखा कि उनका उत्तरीय नीचे गिर गया है।

श्लोक 3 (3.70.3)

ततः स त्वरमाणस्तु पटे निपतिते तदा । ग्रहीष्यामीति तं राजा नलमाह महामनाः ॥

tataḥ sa tvaramāṇastu paṭe nipatite tadā | grahīṣyāmīti taṃ rājā nalamāha mahāmanāḥ

वस्त्र गिर जाने पर महामना राजा ने उतावली में नल से कहा — "मैं उसे उठा लूँगा।

ऋतुपर्ण उवाच

श्लोक 4 (3.70.4)

निगृह्णीष्व महाबुद्धे हयानेतान्महाजवान् । वार्ष्णेयो यावदेनं मे पटमानयतामिह ॥

nigṛhṇīṣva mahābuddhe hayānetānmahājavān | vārṣṇeyo yāvadenaṃ me paṭamānayatāmiha

हे महाबुद्धिमान्, इन महावेगशाली घोड़ों को रोक लो, जब तक वार्ष्णेय मेरा वस्त्र यहाँ ले आए।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 5 (3.70.5)

नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्टः पटस्तव । योजनं समतिक्रान्तो नाहर्तुं शक्यते पुनः ॥

nalastaṃ pratyuvācātha dūre bhraṣṭaḥ paṭastava | yojanaṃ samatikrānto nāhartuṃ śakyate punaḥ

नल ने उत्तर दिया — "आपका वस्त्र बहुत पीछे गिरा है। हम उससे एक योजन आगे निकल आए हैं; अब वह लाया नहीं जा सकता।"

श्लोक 6 (3.70.6)

एवमुक्ते नलेनाथ नातिप्रीतमना नृपः । आससाद वने राजन्फलवन्तं बिभीतकम् ॥

evamukte nalenātha nātiprītamanā nṛpaḥ | āsasāda vane rājanphalavantaṃ bibhītakam

हे राजन्, नल के ऐसा कहने पर कुछ अप्रसन्न मन वाले राजा को वन में फलों से लदा एक बहेड़े का वृक्ष मिला।

श्लोक 7 (3.70.7)

तं दृष्ट्वा बाहुकं राजा त्वरमाणोऽभ्यभाषत । ममापि सूत पश्य त्वं संख्याने परमं बलम् ॥

taṃ dṛṣṭvā bāhukaṃ rājā tvaramāṇo'bhyabhāṣata | mamāpi sūta paśya tvaṃ saṃkhyāne paramaṃ balam

उसे देखकर राजा ने जल्दी से बाहुक से कहा — "सारथि, गणना में मेरी भी परम शक्ति देखो।

ऋतुपर्ण उवाच

श्लोक 8 (3.70.8)

सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन । नैकत्र परिनिष्ठाऽस्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ॥

sarvaḥ sarvaṃ na jānāti sarvajño nāsti kaścana | naikatra pariniṣṭhā'sti jñānasya puruṣe kvacit

सब कोई सब कुछ नहीं जानता; सर्वज्ञ कोई नहीं है। किसी एक पुरुष में ज्ञान की पूर्णता कहीं नहीं होती।

श्लोक 9 (3.70.9)

वृक्षेऽस्मिन्यानि पर्णानि फलान्यपि च बाहुक । पतितान्यपि यान्यत्रतत्रैकमधिकं कृतम् ॥

vṛkṣe'sminyāni parṇāni phalānyapi ca bāhuka | patitānyapi yānyatratatraikamadhikaṃ kṛtam

बाहुक, इस वृक्ष पर जितने पत्ते और फल हैं, और यहाँ जितने गिरे पड़े हैं — गिरे हुए उनसे एक अधिक हैं।

श्लोक 10 (3.70.10)

एकपत्राधिकं चात्र फलमेकं च बाहुक । फलकोट्यपि पत्राणां द्वयोरपि च शाखयोः । प्रवक्ष्यामि फलान्यत्र यानि संख्यास्यते भवान् ॥

ekapatrādhikaṃ cātra phalamekaṃ ca bāhuka | phalakoṭyapi patrāṇāṃ dvayorapi ca śākhayoḥ | pravakṣyāmi phalānyatra yāni saṃkhyāsyate bhavān

बाहुक, यहाँ पत्ते एक पत्ते से अधिक हैं और फल एक फल से; और इन दोनों शाखाओं पर फल और पत्ते करोड़ों में हैं। यहाँ के फलों की संख्या मैं बताता हूँ, आप स्वयं उन्हें गिन लीजिए।

श्लोक 11 (3.70.11)

प्रचिनुह्यस्य शाखे द्वे याश्चाप्यन्याः प्रशाखिकाः । आभ्यां फलसहस्रे द्वे पञ्चोनं शतमेव च ॥

pracinuhyasya śākhe dve yāścāpyanyāḥ praśākhikāḥ | ābhyāṃ phalasahasre dve pañconaṃ śatameva ca

इसकी इन दो शाखाओं और उन पर की दूसरी छोटी टहनियों को झाड़ लो — इन दोनों पर दो हज़ार फल हैं, और ऊपर से पाँच कम सौ।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 12 (3.70.12)

ततो रथादवप्लुत्य राजानं बाहुकोऽब्रवीत् । परोक्षमिव मे राजन्कत्थसे शत्रुकर्शन ॥

tato rathādavaplutya rājānaṃ bāhuko'bravīt | parokṣamiva me rājankatthase śatrukarśana

तब बाहुक रथ से कूदकर उतरा और राजा से बोला — "हे शत्रुसंहारक राजन्, आप मेरे सामने ऐसी बात की डींग मार रहे हैं जो आँखों से परे है।

बाहुक उवाच

श्लोक 13 (3.70.13)

प्रत्यक्षमेतत्कर्ताऽस्मि शातयित्वा विभीतकम् । अथ ते गणिते राजन्विजानाम्यपरोक्षताम् ॥

pratyakṣametatkartā'smi śātayitvā vibhītakam | atha te gaṇite rājanvijānāmyaparokṣatām

मैं बहेड़े को गिराकर इसे प्रत्यक्ष कर दूँगा। हे राजन्, गिनती हो जाने पर मैं इसे अपनी आँखों से जान लूँगा।

श्लोक 14 (3.70.14)

प्रत्यक्षं ते महाराज गणयिष्ये विभीतकम् । अहं हि नाभिजानामि भवेदेव नवेति वा ॥

pratyakṣaṃ te mahārāja gaṇayiṣye vibhītakam | ahaṃ hi nābhijānāmi bhavedeva naveti vā

महाराज, आपकी आँखों के सामने मैं बहेड़े को गिनूँगा। मैं नहीं जानता कि बात ऐसी है या नहीं।

श्लोक 15 (3.70.15)

संख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप । मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन्यच्छतु वाजिनाम् ॥

saṃkhyāsyāmi phalānyasya paśyataste janādhipa | muhūrtamapi vārṣṇeyo raśmīnyacchatu vājinām

हे जनाधिप, आपके देखते-देखते मैं इसके फल गिनूँगा। थोड़ी देर के लिए वार्ष्णेय घोड़ों की लगाम थामे रहे।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 16 (3.70.16)

तमब्रवीन्नृपः सूतं नायं कालो विलम्बितुम् । बाहुकस्त्वब्रवीदेनं परं यत्नं समास्थितः ॥

tamabravīnnṛpaḥ sūtaṃ nāyaṃ kālo vilambitum | bāhukastvabravīdenaṃ paraṃ yatnaṃ samāsthitaḥ

राजा ने सारथि से कहा — "यह देर करने का समय नहीं है।" पर बाहुक ने पूरे यत्न में लगकर उनसे कहा —

बाहुक उवाच

श्लोक 17 (3.70.17)

प्रतीक्षस्व मुहूर्तं त्वमथवा त्वरते भवान् । एष याति शिवः पन्था याहि वार्ष्णेयसारथिः ॥

pratīkṣasva muhūrtaṃ tvamathavā tvarate bhavān | eṣa yāti śivaḥ panthā yāhi vārṣṇeyasārathiḥ

"थोड़ी देर ठहरिए; या यदि आपको जल्दी है, तो यह मार्ग सुगम और कल्याणकारी है — वार्ष्णेय को सारथि बनाकर चले जाइए।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 18 (3.70.18)

अब्रवीदृतुपर्णस्तं सान्त्वयन्कुरुनन्दन । त्वमेव यन्ता नान्योस्ति पृथिव्यामपि बाहुक ॥

abravīdṛtuparṇastaṃ sāntvayankurunandana | tvameva yantā nānyosti pṛthivyāmapi bāhuka

हे कुरुनन्दन, तब ऋतुपर्ण ने उसे मनाते हुए कहा — "बाहुक, पृथ्वी पर तुम्हारे जैसा सारथि दूसरा नहीं है।

ऋतुपर्ण उवाच

श्लोक 19 (3.70.19)

त्वत्कृतेयातुमिच्छामि विदर्भान्हयकोविद । शरणं त्वांप्रपन्नोस्मि न विघ्नं कर्तुमर्हसि ॥

tvatkṛteyātumicchāmi vidarbhānhayakovida | śaraṇaṃ tvāṃprapannosmi na vighnaṃ kartumarhasi

हे अश्वविशारद, तुम्हारे ही भरोसे मैं विदर्भ जाना चाहता हूँ। मैं तुम्हारी शरण में हूँ; मेरे काम में विघ्न मत डालो।

श्लोक 20 (3.70.20)

कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि बाहुक । विदर्भान्यदि यात्वाऽद्य सूर्यं दर्शयितासि मे ॥

kāmaṃ ca te kariṣyāmi yanmāṃ vakṣyasi bāhuka | vidarbhānyadi yātvā'dya sūryaṃ darśayitāsi me

बाहुक, यदि आज ही विदर्भ पहुँचाकर तुम मुझे वहाँ सूर्य के दर्शन करा दो, तो तुम जो कहोगे, वही मैं तुम्हारे लिए करूँगा।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 21 (3.70.21)

अथाब्रवीद्बाहुकस्तं संख्यायच बिभीतकम् । ततो विदर्भान्यास्यामि कुरुष्वैवं वचो मम ॥

athābravīdbāhukastaṃ saṃkhyāyaca bibhītakam | tato vidarbhānyāsyāmi kuruṣvaivaṃ vaco mama

तब बाहुक ने उनसे कहा — "बहेड़े को गिन लेने के बाद ही मैं विदर्भ चलूँगा। मेरी यह बात मान लीजिए।"

श्लोक 22 (3.70.22)

अकाम इव तं राजा गणयस्वेत्युवाच ह । एकदेशं च शाखायाः समादिष्टं मयाऽनघ ॥

akāma iva taṃ rājā gaṇayasvetyuvāca ha | ekadeśaṃ ca śākhāyāḥ samādiṣṭaṃ mayā'nagha

मानो अनमने भाव से राजा ने उससे कहा — "अच्छा, गिनो। हे निष्पाप, मैंने शाखा का एक भाग बताया है;

श्लोक 23 (3.70.23)

गणयस्वाश्वतत्वज्ञ ततस्त्वंप्रीतिमावह । सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं शातयामास तं द्रुमम् ॥

gaṇayasvāśvatatvajña tatastvaṃprītimāvaha | so'vatīrya rathāttūrṇaṃ śātayāmāsa taṃ drumam

हे अश्वतत्त्वज्ञ, उसे गिनो और अपना मन सन्तुष्ट कर लो।" बाहुक ने तुरन्त रथ से उतरकर उस वृक्ष को गिरा दिया।

श्लोक 24 (3.70.24)

ततः स विस्मयाविष्टो राजानमिदमब्रवीत् । गणयित्वायथोक्तानि तावन्त्येव फलानि तु ॥

tataḥ sa vismayāviṣṭo rājānamidamabravīt | gaṇayitvāyathoktāni tāvantyeva phalāni tu

फिर गिनने पर जितने फल बताए गए थे उतने ही पाकर, विस्मय से भरे बाहुक ने राजा से कहा —

बाहुक उवाच

श्लोक 25 (3.70.25)

अत्यद्भुतमिदं राजन्दृष्टवानस्मि ते बलम् । श्रोतुमिच्छामि तां विद्यां ययैतज्ज्ञायते नृप ॥

atyadbhutamidaṃ rājandṛṣṭavānasmi te balam | śrotumicchāmi tāṃ vidyāṃ yayaitajjñāyate nṛpa

"हे राजन्, मैंने आपकी यह अत्यन्त अद्भुत शक्ति देख ली। हे नृप, जिस विद्या से यह जाना जाता है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 26 (3.70.26)

तमुवाच ततो राजा त्वरितो गमने नृप । विद्ध्यक्षहृदयज्ञं मां संख्याने च विशारदम् ॥

tamuvāca tato rājā tvarito gamane nṛpa | viddhyakṣahṛdayajñaṃ māṃ saṃkhyāne ca viśāradam

आगे बढ़ने को उतावले राजा ने उससे कहा — "जान लो कि मैं अक्षहृदय (पासों का रहस्य) जानता हूँ और गणना में निपुण हूँ।"

श्लोक 27 (3.70.27)

बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्याद्वयं च मे । मत्तोऽपि चाश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभ ॥

bāhukastamuvācātha dehi vidyādvayaṃ ca me | matto'pi cāśvahṛdayaṃ gṛhāṇa puruṣarṣabha

तब बाहुक ने उनसे कहा — "ये दोनों विद्याएँ मुझे दीजिए, और हे पुरुषश्रेष्ठ, बदले में मुझसे अश्वहृदय ले लीजिए।"

श्लोक 28 (3.70.28)

ऋतुपर्णस्ततो राजा बाहुकं कार्यगौरवात् । हयज्ञानस्य लोभाच्च तं तथेत्यब्रवीद्वचः ॥

ṛtuparṇastato rājā bāhukaṃ kāryagauravāt | hayajñānasya lobhācca taṃ tathetyabravīdvacaḥ

राजा ऋतुपर्ण ने कार्य की गुरुता के कारण और अश्वविद्या के लोभ से बाहुक से कहा — "ठीक है।"

श्लोक 29 (3.70.29)

यथोक्तं त्वं गृहाणेदमक्षाणां हृदयं परम् । निक्षेपो मेऽश्वहृदयं त्वयि तिष्ठतु बाहुक । एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णो नलाय वै ॥

yathoktaṃ tvaṃ gṛhāṇedamakṣāṇāṃ hṛdayaṃ param | nikṣepo me'śvahṛdayaṃ tvayi tiṣṭhatu bāhuka | evamuktvā dadau vidyāmṛtuparṇo nalāya vai

"जैसा तय हुआ, यह उत्तम अक्षहृदय ग्रहण करो। बाहुक, अश्वहृदय मेरी धरोहर के रूप में तुम्हारे पास रहे।" यह कहकर ऋतुपर्ण ने नल को वह विद्या दे दी।

श्लोक 30 (3.70.30)

तस्याक्षहृदयज्ञस्य शरीरान्निःसृतः कलिः । कर्कोटकविषं तीक्ष्णं मुखात्सततमुद्वमन् । कलेस्तस्य तदार्तस्य शापाग्निः स विनिःसृतः ॥

tasyākṣahṛdayajñasya śarīrānniḥsṛtaḥ kaliḥ | karkoṭakaviṣaṃ tīkṣṇaṃ mukhātsatatamudvaman | kalestasya tadārtasya śāpāgniḥ sa viniḥsṛtaḥ

अक्षहृदय जानते ही नल के शरीर से कलि बाहर निकला, जो अपने मुख से कर्कोटक का तीखा विष लगातार उगल रहा था; और उस पीड़ित कलि के साथ शाप की वह अग्नि भी निकल गई।

श्लोक 31 (3.70.31)

स तेन कर्शितो राजादीर्घकालमनात्मवान् ॥

sa tena karśito rājādīrghakālamanātmavān

उसी ने राजा को इतने लम्बे समय तक क्षीण और आत्मवशहीन कर रखा था।

श्लोक 32 (3.70.32)

तं भ्रान्तरूपं निःशोभं संक्लिष्टमकरोत्कलिः । ततो विषविमुक्तात्मा स्वंरूपमकरोत्कलिः । तं शप्तुमैच्छत्कुपितो निषधाधिपतिर्नलः ॥

taṃ bhrāntarūpaṃ niḥśobhaṃ saṃkliṣṭamakarotkaliḥ | tato viṣavimuktātmā svaṃrūpamakarotkaliḥ | taṃ śaptumaicchatkupito niṣadhādhipatirnalaḥ

कलि ने उन्हें भ्रान्त रूप वाला, कान्तिहीन और क्लेश से भरा बना दिया था। तब विष से मुक्त होकर कलि ने अपना रूप धारण किया, और कुपित निषधराज नल ने उसे शाप देना चाहा।

श्लोक 33 (3.70.33)

ततो विषविमुक्तात्मा स्वंरूपमकरोत्कलिः । तं शप्तुमैच्छत्कुपितो निषधाधिपतिर्नलः ॥

tato viṣavimuktātmā svaṃrūpamakarotkaliḥ | taṃ śaptumaicchatkupito niṣadhādhipatirnalaḥ

तब विष से मुक्त होकर कलि ने अपना रूप धारण किया, और कुपित निषधराज नल ने उसे शाप देना चाहा।

श्लोक 34 (3.70.34)

तमुवाच कलिर्भीतो वेपमानः कृताञ्जलिः । कोपं संयच्छ नृपते कीर्तिं दास्यामि ते पराम् ॥

tamuvāca kalirbhīto vepamānaḥ kṛtāñjaliḥ | kopaṃ saṃyaccha nṛpate kīrtiṃ dāsyāmi te parām

भय से काँपते हुए, हाथ जोड़कर कलि ने उनसे कहा — "हे नरेश, अपना क्रोध रोकिए; मैं आपको परम कीर्ति दूँगा।

कलिरुवाच

श्लोक 35 (3.70.35)

इन्द्रसेनस्य जननी कुपिता माऽशपत्पुरा । यदा त्वया परित्यक्ता ततोऽहं भृशपीडितः ॥

indrasenasya jananī kupitā mā'śapatpurā | yadā tvayā parityaktā tato'haṃ bhṛśapīḍitaḥ

जब आपने इन्द्रसेन की माता को त्याग दिया था, तब उन्होंने क्रुद्ध होकर मुझे शाप दिया था। तभी से मैं अत्यन्त पीड़ित रहा।

श्लोक 36 (3.70.36)

अवसं त्वयि राजेन्द्र सुदुःखमपराजित । विषेण नागराजस्य दह्यमानो दिवानिशम् ॥

avasaṃ tvayi rājendra suduḥkhamaparājita | viṣeṇa nāgarājasya dahyamāno divāniśam

हे अपराजित राजेन्द्र, नागराज के विष से दिन-रात जलता हुआ मैं बड़े दुःख से आपके भीतर रहा।

श्लोक 37 (3.70.37)

शरणं त्वां प्रपन्नोस्मि शृणु चेदं वचो मम । ये च त्वां मनुजा लोके कीर्तयिष्यन्त्यतन्द्रिताः । मत्प्रसूतं भयं तेषां न कदाचिद्भविष्यति ॥

śaraṇaṃ tvāṃ prapannosmi śṛṇu cedaṃ vaco mama | ye ca tvāṃ manujā loke kīrtayiṣyantyatandritāḥ | matprasūtaṃ bhayaṃ teṣāṃ na kadācidbhaviṣyati

मैं आपकी शरण में आया हूँ; मेरी यह बात सुनिए। संसार में जो मनुष्य निरालस होकर आपका कीर्तन करेंगे, उन्हें मुझसे उत्पन्न भय कभी नहीं होगा।

श्लोक 38 (3.70.38)

न तेषां मानसं किंचिच्छारीरं वाचिकं तथा । भविष्यति महाराज कीर्तयिष्यन्ति ये नलम् । भयार्तं शरणं यातं यदि मां त्वं न शप्स्यसे ॥

na teṣāṃ mānasaṃ kiṃcicchārīraṃ vācikaṃ tathā | bhaviṣyati mahārāja kīrtayiṣyanti ye nalam | bhayārtaṃ śaraṇaṃ yātaṃ yadi māṃ tvaṃ na śapsyase

महाराज, जो नल का कीर्तन करेंगे, उन्हें कोई मानसिक, शारीरिक या वाचिक कष्ट नहीं होगा — यदि आप भय से व्याकुल होकर शरण में आए मुझको शाप न दें।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 39 (3.70.39)

एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत्कोपमात्मनः । ततो भीतः कलिः क्षिप्रं प्रविवेश विभीतकम् । कलिस्त्वन्येन नो दृष्टः कथयन्नैषधेन वै ॥

evamukto nalo rājā nyayacchatkopamātmanaḥ | tato bhītaḥ kaliḥ kṣipraṃ praviveśa vibhītakam | kalistvanyena no dṛṣṭaḥ kathayannaiṣadhena vai

ऐसा कहे जाने पर राजा नल ने अपना क्रोध रोक लिया। तब भयभीत कलि तुरन्त बहेड़े के वृक्ष में प्रवेश कर गया; नैषध से बातें करते समय वह किसी और को दिखाई नहीं दिया।

श्लोक 40 (3.70.40)

ततो गतत्वरो राजा नैषधः परवीरहा । संप्रनष्टे कलौ राजा संख्यायास्य फलान्युत ॥

tato gatatvaro rājā naiṣadhaḥ paravīrahā | saṃpranaṣṭe kalau rājā saṃkhyāyāsya phalānyuta

तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले निषधराज, जिनकी व्यग्रता मिट चुकी थी — कलि के लुप्त हो जाने पर उसके फलों को गिनकर,

श्लोक 41 (3.70.41)

मुदा परमया युक्तस्तेजसाऽथ परेण वै । रथमारुह्य तेजस्वी प्रययौ जवनैर्हयैः ॥

mudā paramayā yuktastejasā'tha pareṇa vai | rathamāruhya tejasvī prayayau javanairhayaiḥ

परम आनन्द और उत्कृष्ट तेज से भरकर, वह तेजस्वी रथ पर चढ़े और वेगवान् घोड़ों के साथ चल पड़े।

श्लोक 42 (3.70.42)

बिभीतकश्चाप्रशस्तः संवृत्तः कलिसंश्रयात् । ततः प्रभृतिराजेन्द्र लोकेऽस्मिन्पाण्डुनन्दन ॥

bibhītakaścāpraśastaḥ saṃvṛttaḥ kalisaṃśrayāt | tataḥ prabhṛtirājendra loke'sminpāṇḍunandana

हे राजेन्द्र पाण्डुनन्दन, कलि के आश्रय लेने के कारण तभी से इस संसार में बहेड़ा अशुभ वृक्ष माना जाने लगा।

श्लोक 43 (3.70.43)

हयोत्तमानुत्पततो द्विजानिव पुनः पुनः । नलः संचोदयामास प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥

hayottamānutpatato dvijāniva punaḥ punaḥ | nalaḥ saṃcodayāmāsa prahṛṣṭenāntarātmanā

अन्तरात्मा में हर्षित होकर नल पक्षियों की भाँति बार-बार उड़ान भरते उन उत्तम घोड़ों को हाँकने लगे।

श्लोक 44 (3.70.44)

विदर्भाभिमुखो राजा प्रययौ स महायशाः । नले तु समतिक्रान्ते कलिरप्यगमद्गृहम् ॥

vidarbhābhimukho rājā prayayau sa mahāyaśāḥ | nale tu samatikrānte kalirapyagamadgṛham

वह महायशस्वी राजा विदर्भ की ओर बढ़ चले; और नल के आगे निकल जाने पर कलि भी अपने घर चला गया।

श्लोक 45 (3.70.45)

ततो गतज्वरो राजा नलोऽभूत्पृथिवीपतिः । विमुक्तः कलिना राजन्रूपमात्रवियोजितः ॥

tato gatajvaro rājā nalo'bhūtpṛthivīpatiḥ | vimuktaḥ kalinā rājanrūpamātraviyojitaḥ

हे राजन्, तब पृथ्वीपति राजा नल का सन्ताप मिट गया; कलि से मुक्त होकर अब वे केवल अपने रूप से वंचित रह गए थे।

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71