आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 71
दमयन्ती का रथ-घोष सुनना
ऋतुपर्ण सन्ध्या के समय कुण्डिनपुर पहुँचते हैं, और उनके रथ की गड़गड़ाहट से नल के घोड़े, मोर और हाथी उत्तेजित हो उठते हैं। दमयन्ती उस ध्वनि को नल की पहचानकर प्रण करती है कि आज उन्हें न देखा तो वह प्राण दे देगी; महल की छत से उसे केवल ऋतुपर्ण, वार्ष्णेय और कुरूप बाहुक दिखाई देते हैं। स्वयंवर से अनजान भीम ऋतुपर्ण का आदर से स्वागत करते हैं, यह सुनकर कि वे केवल अभिवादन करने आए हैं, उन्हें विश्राम के लिए भेज देते हैं। रथ-ध्वनि से उलझन में पड़ी दमयन्ती यह जानने के लिए दूती भेजती है कि उसका सारथि कौन है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.71.1)
ततो विदर्भान्संप्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम् । ऋतुपर्णं जना राज्ञे भीमाय प्रत्यवेदयन् ॥
tato vidarbhānsaṃprāptaṃ sāyāhne satyavikramam | ṛtuparṇaṃ janā rājñe bhīmāya pratyavedayan
तब सायंकाल लोगों ने राजा भीम को सूचना दी कि सत्यपराक्रमी ऋतुपर्ण विदर्भ आ पहुँचे हैं।
श्लोक 2 (3.71.2)
स भीमवचनाद्राजा कुण्डिनं प्राविशत्पुरम् । नादयन्रथघोषेण सर्वाः स विदिशो दिशः ॥
sa bhīmavacanādrājā kuṇḍinaṃ prāviśatpuram | nādayanrathaghoṣeṇa sarvāḥ sa vidiśo diśaḥ
भीम की आज्ञा से राजा ऋतुपर्ण ने अपने रथ की गड़गड़ाहट से सभी दिशाओं और विदिशाओं को गुँजाते हुए कुण्डिनपुर में प्रवेश किया।
श्लोक 3 (3.71.3)
ततस्तं रथनिर्घोषं नलाश्वास्तत्र शुश्रुवुः । श्रुत्वा तु समहृष्यन्त पुरेव नलसन्निधौ ॥
tatastaṃ rathanirghoṣaṃ nalāśvāstatra śuśruvuḥ | śrutvā tu samahṛṣyanta pureva nalasannidhau
वहाँ नल के घोड़ों ने उस रथ की घरघराहट सुनी, और सुनकर वे वैसे ही हर्षित हुए जैसे पहले नल के निकट होने पर होते थे।
श्लोक 4 (3.71.4)
दमयन्ती तु शुश्राव रथघोषं नलस्य तम् । यथा मेघस्य नदतो गम्भीरं जलदागमे ॥
damayantī tu śuśrāva rathaghoṣaṃ nalasya tam | yathā meghasya nadato gambhīraṃ jaladāgame
दमयन्ती ने भी नल के रथ की वह गड़गड़ाहट सुनी, जो वर्षा के आगमन पर गरजते बादल की भाँति गम्भीर थी।
श्लोक 5 (3.71.5)
परं विस्मयमापन्ना श्रुत्वा नादं महास्वनम् । नलेन संगृहीतेषु पुरेव नलवाजिषु । सदृशं रथनिर्घोषं मेने भैमी तथा हयाः ॥
paraṃ vismayamāpannā śrutvā nādaṃ mahāsvanam | nalena saṃgṛhīteṣu pureva nalavājiṣu | sadṛśaṃ rathanirghoṣaṃ mene bhaimī tathā hayāḥ
वह प्रचण्ड नाद सुनकर दमयन्ती अत्यन्त विस्मित हुई; भीमकुमारी को और घोड़ों को भी वह रथ-घोष वैसा ही लगा जैसा पहले होता था, जब नल स्वयं अपने घोड़ों की लगाम थामते थे।
श्लोक 6 (3.71.6)
प्रासादस्थाश्च शिखिनः शालास्थाश्चैव वारणाः । हयाश्च शुश्रुवुस्तस्य रथघोषं महीपतेः ॥
prāsādasthāśca śikhinaḥ śālāsthāścaiva vāraṇāḥ | hayāśca śuśruvustasya rathaghoṣaṃ mahīpateḥ
महलों पर बैठे मोरों, शालाओं में बँधे हाथियों और घोड़ों ने उस राजा के रथ की ध्वनि सुनी।
श्लोक 7 (3.71.7)
तच्छ्रुत्वा रथनिर्घोषं वारणाः शिखिनस्तथा । प्रणेदुरुन्मुखा राजन्दृष्ट्वेव जलदोदयम् ॥
tacchrutvā rathanirghoṣaṃ vāraṇāḥ śikhinastathā | praṇedurunmukhā rājandṛṣṭveva jaladodayam
हे राजन्, रथ की वह ध्वनि सुनकर हाथी और मोर ऊपर मुख उठाकर ऐसे बोल उठे, मानो उन्होंने उमड़ते बादल देख लिए हों।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 8 (3.71.8)
यथाऽसौ रथनिर्घोषः पूरयन्निव मेदिनीम् । ममाह्लादयते चेतो नल एव महीपतिः ॥
yathā'sau rathanirghoṣaḥ pūrayanniva medinīm | mamāhlādayate ceto nala eva mahīpatiḥ
"जिस प्रकार यह रथ-ध्वनि मानो सारी पृथ्वी को भरती हुई मेरे चित्त को आनन्दित कर रही है, उससे लगता है कि ये राजा नल ही हैं।
श्लोक 9 (3.71.9)
अद्य चन्द्राभवक्त्रं तं न पश्यामि नलं यदि । असंख्येयगुणं वीरं विनङ्क्ष्यामि न संशयः ॥
adya candrābhavaktraṃ taṃ na paśyāmi nalaṃ yadi | asaṃkhyeyaguṇaṃ vīraṃ vinaṅkṣyāmi na saṃśayaḥ
यदि आज मैं चन्द्रमा जैसे मुख वाले, असंख्य गुणों से युक्त उस वीर नल को न देख पाई, तो निःसन्देह मर जाऊँगी।
श्लोक 10 (3.71.10)
यदि वै तस्य वीरस्य बाह्वोर्नाद्याहमन्तरम् । प्रविशामि सुखस्पर्शं नभविष्याम्यसंशयम् ॥
yadi vai tasya vīrasya bāhvornādyāhamantaram | praviśāmi sukhasparśaṃ nabhaviṣyāmyasaṃśayam
यदि आज मैं उस वीर की सुखद भुजाओं के आलिंगन में न समा सकी, तो निःसन्देह मेरा अस्तित्व मिट जाएगा।
श्लोक 11 (3.71.11)
यदि मां मेघनिर्घोषो नोपगच्छति नैषधः । अद्य चामीकरप्रख्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥
yadi māṃ meghanirghoṣo nopagacchati naiṣadhaḥ | adya cāmīkaraprakhyaṃ pravekṣyāmi hutāśanam
यदि मेघ के समान गम्भीर स्वर वाले नैषध मेरे पास न आए, तो आज मैं सोने-सी दमकती अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी।
श्लोक 12 (3.71.12)
यदि मां सिंहविक्रान्तो मत्तवारणविक्रमः । नाभिगच्छतिराजेन्द्रो विनङ्क्ष्यामि न संशयः ॥
yadi māṃ siṃhavikrānto mattavāraṇavikramaḥ | nābhigacchatirājendro vinaṅkṣyāmi na saṃśayaḥ
यदि सिंह-सा पराक्रमी और मतवाले हाथी-सी चाल वाला वह राजेन्द्र मेरे पास न आया, तो निःसन्देह मैं मर जाऊँगी।
श्लोक 13 (3.71.13)
न स्मराम्यनृतं किंचिन्न स्मराम्यपकारताम् । न च पर्युषितं वाक्यं स्वैरेष्वपि महात्मनः ॥
na smarāmyanṛtaṃ kiṃcinna smarāmyapakāratām | na ca paryuṣitaṃ vākyaṃ svaireṣvapi mahātmanaḥ
मुझे उस महात्मा की न कोई असत्य बात याद है, न कोई अपकार, और न ही कभी कोई ऐसा वचन जो उन्होंने निभाया न हो — हँसी-खेल में भी नहीं।
श्लोक 14 (3.71.14)
प्रभुः क्षमावान्वीरश्च दाता चाप्यधिको नृपैः । अहो नीचानुवर्ती च क्लीबवन्मम नैषध ॥
prabhuḥ kṣamāvānvīraśca dātā cāpyadhiko nṛpaiḥ | aho nīcānuvartī ca klībavanmama naiṣadha
वह समर्थ, क्षमाशील, वीर, दानी और अन्य राजाओं से बढ़कर हैं; और हाय, मेरे साथ वह कितने विनम्र और कोमल रहते थे — मेरे नैषध!
श्लोक 15 (3.71.15)
गुणांस्तस्य स्मरन्त्या मे तत्पराया दिवानिशम् । हृदयं दीर्यत इदं शोकात्प्रियविनाकृतम् ॥
guṇāṃstasya smarantyā me tatparāyā divāniśam | hṛdayaṃ dīryata idaṃ śokātpriyavinākṛtam
दिन-रात उन्हीं में लीन रहकर जब मैं उनके गुणों का स्मरण करती हूँ, तो प्रियतम से बिछुड़ा मेरा यह हृदय शोक से फटने लगता है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 16 (3.71.16)
एवं विलपमाना सा नष्टसंज्ञेव भारत । आरुरोह महद्वेश्म पुण्यश्लोकदिदृक्षया ॥
evaṃ vilapamānā sā naṣṭasaṃjñeva bhārata | āruroha mahadveśma puṇyaślokadidṛkṣayā
हे भारत, इस प्रकार विलाप करती हुई, मानो सुध-बुध खोकर, वह पुण्यश्लोक नल को देखने की इच्छा से विशाल महल के ऊपर चढ़ गई।
श्लोक 17 (3.71.17)
ततो मध्यमकक्षायां ददर्श रथमास्थितम् । ऋतुपर्णं महीपालं सहवार्ष्णेयबाहुकम् ॥
tato madhyamakakṣāyāṃ dadarśa rathamāsthitam | ṛtuparṇaṃ mahīpālaṃ sahavārṣṇeyabāhukam
तब उसने बीच के आँगन में रथ पर खड़े पृथ्वीपालक राजा ऋतुपर्ण को वार्ष्णेय और बाहुक के साथ देखा।
श्लोक 18 (3.71.18)
ततोऽवतीर्य वार्ष्णेयो बाहुकश्च रथोत्तमात् । हयांस्तानवमुच्याथ स्थापयामासतू रथम् ॥
tato'vatīrya vārṣṇeyo bāhukaśca rathottamāt | hayāṃstānavamucyātha sthāpayāmāsatū ratham
तब वार्ष्णेय और बाहुक उस उत्तम रथ से उतरे, घोड़ों को खोला और रथ को उसके स्थान पर खड़ा कर दिया।
श्लोक 19 (3.71.19)
सोऽवतीर्य रथोपस्थादृतुपर्णो नराधिपः । उपतस्थे महाराजं भीमं भीमपराक्रमम् ॥
so'vatīrya rathopasthādṛtuparṇo narādhipaḥ | upatasthe mahārājaṃ bhīmaṃ bhīmaparākramam
नरेश ऋतुपर्ण रथ के आसन से उतरकर भयंकर पराक्रम वाले महाराज भीम के पास गए।
श्लोक 20 (3.71.20)
तं भीमः प्रतिजग्राह पूजया परया मुदा । स तेन पूजितो राज्ञा ऋतुपर्णो नराधिपः ॥
taṃ bhīmaḥ pratijagrāha pūjayā parayā mudā | sa tena pūjito rājñā ṛtuparṇo narādhipaḥ
भीम ने बड़े हर्ष से परम सत्कार के साथ उनका स्वागत किया; इस प्रकार नरेश ऋतुपर्ण उस राजा द्वारा सम्मानित हुए।
श्लोक 21 (3.71.21)
स तत्र कुण्डिने रम्ये वसमानो महीपतिः । न च किंचित्तदाऽपश्यत्प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः । स तु राज्ञा समागम्य विदर्भपतिना तदा ॥
sa tatra kuṇḍine ramye vasamāno mahīpatiḥ | na ca kiṃcittadā'paśyatprekṣamāṇo muhurmuhuḥ | sa tu rājñā samāgamya vidarbhapatinā tadā
रमणीय कुण्डिनपुर में ठहरे उस राजा ने बार-बार चारों ओर देखा, पर उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। फिर जब वह विदर्भराज से मिला,
श्लोक 22 (3.71.22)
किं कार्यं स्वागतं तेऽस्तु राज्ञा पृष्टः स भारत । नाभिजज्ञे स नृपतिर्दुहित्रर्थे समागतम् ॥
kiṃ kāryaṃ svāgataṃ te'stu rājñā pṛṣṭaḥ sa bhārata | nābhijajñe sa nṛpatirduhitrarthe samāgatam
तो हे भारत, राजा ने उससे पूछा — "आपका स्वागत है; किस काम से आना हुआ?" राजा भीम नहीं जानते थे कि वह उनकी पुत्री के लिए आया है।
श्लोक 23 (3.71.23)
ऋतुपर्णोपि राजा स धीमान्सत्यपराक्रमः । राजानं राजपुत्रं वा न स्म पश्यति कंचन ॥
ṛtuparṇopi rājā sa dhīmānsatyaparākramaḥ | rājānaṃ rājaputraṃ vā na sma paśyati kaṃcana
और बुद्धिमान, सत्यपराक्रमी राजा ऋतुपर्ण को वहाँ न कोई राजा दिखा, न कोई राजकुमार;
श्लोक 24 (3.71.24)
नैव स्वयंवरकथां न च विप्रसमागमम् । न चान्यं कंचिदारम्भं स्वयंवरविधिं प्रति ॥
naiva svayaṃvarakathāṃ na ca viprasamāgamam | na cānyaṃ kaṃcidārambhaṃ svayaṃvaravidhiṃ prati
न स्वयंवर की कोई चर्चा थी, न ब्राह्मणों का कोई जमावड़ा, और न स्वयंवर की विधि के लिए कोई दूसरी तैयारी।
श्लोक 25 (3.71.25)
ततो विगणयन्राजा मनसा कोसलाधिपः । आगतोस्मीत्युवाचैनं भवन्तमभिवादकः ॥
tato vigaṇayanrājā manasā kosalādhipaḥ | āgatosmītyuvācainaṃ bhavantamabhivādakaḥ
तब कोसलनरेश ने मन ही मन हिसाब लगाकर उनसे कहा — "मैं आपको प्रणाम करने आया हूँ।"
श्लोक 26 (3.71.26)
राजापि च स्मयन्भीमो मनसा समचिन्तयत् । अधिकं योजनशतं तस्यागमनकारणम् । ग्रामान्बहूनतिक्रम्य नाध्यगच्छद्यथातथम् ॥
rājāpi ca smayanbhīmo manasā samacintayat | adhikaṃ yojanaśataṃ tasyāgamanakāraṇam | grāmānbahūnatikramya nādhyagacchadyathātatham
राजा भीम भी मुस्कराते हुए मन में सोचने लगे — उसके आने के पीछे सौ योजन से अधिक की यात्रा है; बहुत-से गाँव लाँघकर वह आया है — फिर भी वे असली बात न जान सके।
भीम उवाच
श्लोक 27 (3.71.27)
अल्पकार्यं विनिर्दिष्टं तस्यागमनकारणम् । पश्चादुदर्के ज्ञास्यामि कारणं यद्भविष्यति ॥
alpakāryaṃ vinirdiṣṭaṃ tasyāgamanakāraṇam | paścādudarke jñāsyāmi kāraṇaṃ yadbhaviṣyati
"आने का जो कारण उसने बताया है, वह तो बहुत छोटा है। असली कारण जो भी हो, वह आगे चलकर परिणाम में मैं जान लूँगा।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 28 (3.71.28)
नैतदेवं स नृपतिस्तं सत्कृत्य व्यसर्जयत् । विश्राम्यतामित्युवाच क्लान्तोसीति पुनःपुनः ॥
naitadevaṃ sa nṛpatistaṃ satkṛtya vyasarjayat | viśrāmyatāmityuvāca klāntosīti punaḥpunaḥ
"बात ऐसी नहीं है" — यह सोचकर राजा ने उनका सत्कार करके उन्हें विदा किया और बार-बार कहा — "विश्राम कीजिए, आप थके हुए हैं।"
श्लोक 29 (3.71.29)
स सत्कृतः प्रहृष्टात्मा प्रीतः प्रीतेन पार्थिवः । राजप्रेष्यैरनुगतो दिष्टं वेश्म समाविशत् ॥
sa satkṛtaḥ prahṛṣṭātmā prītaḥ prītena pārthivaḥ | rājapreṣyairanugato diṣṭaṃ veśma samāviśat
सत्कार पाकर प्रसन्नचित्त, प्रसन्न राजा से प्रसन्न हुए ऋतुपर्ण राजसेवकों के साथ अपने लिए निश्चित भवन में चले गए।
श्लोक 30 (3.71.30)
ऋतुपर्णे गते राजन्वार्ष्णेयसहिते नृपे । बाहुको रथमादाय रथशालामुपागमत् ॥
ṛtuparṇe gate rājanvārṣṇeyasahite nṛpe | bāhuko rathamādāya rathaśālāmupāgamat
हे राजन्, वार्ष्णेय सहित राजा ऋतुपर्ण के चले जाने पर बाहुक रथ लेकर रथशाला में गया।
श्लोक 31 (3.71.31)
स मोचयित्वा तानश्वानुपचर्य च शास्त्रतः । स्वयं चैतान्समाश्वास्य रथोपस्थ उपाविशत् ॥
sa mocayitvā tānaśvānupacarya ca śāstrataḥ | svayaṃ caitānsamāśvāsya rathopastha upāviśat
उसने घोड़ों को खोला, शास्त्र के अनुसार उनकी सेवा की, स्वयं उन्हें पुचकारकर शान्त किया और रथ के आसन पर बैठ गया।
श्लोक 32 (3.71.32)
दमयन्त्यपि शोकार्ता दृष्ट्वा भागस्वरिं नृपम् । सूतपुत्रं च वार्ष्णेयं बाहुकं च तथाविधम् ॥
damayantyapi śokārtā dṛṣṭvā bhāgasvariṃ nṛpam | sūtaputraṃ ca vārṣṇeyaṃ bāhukaṃ ca tathāvidham
शोक से व्याकुल दमयन्ती ने भी राजा भाङ्गस्वरि, सूतपुत्र वार्ष्णेय और वैसे वेश वाले बाहुक को देखकर
श्लोक 33 (3.71.33)
चिन्तयामास वैदर्भी कस्यैष रथनिःस्वनः । नलस्येव महानासीन्न च पश्यामि नैषधम् ॥
cintayāmāsa vaidarbhī kasyaiṣa rathaniḥsvanaḥ | nalasyeva mahānāsīnna ca paśyāmi naiṣadham
विदर्भकुमारी सोचने लगी — "यह रथ-ध्वनि किसकी है? यह नल की ध्वनि जैसी ही प्रचण्ड थी, पर नैषध मुझे दिखाई नहीं देते।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 34 (3.71.34)
वार्ष्णेयेन भवेन्नूनं विद्या सैवोपशिक्षिता । तेनाद्य रथनिर्घोषो नलस्येव महानभूत् ॥
vārṣṇeyena bhavennūnaṃ vidyā saivopaśikṣitā | tenādya rathanirghoṣo nalasyeva mahānabhūt
निश्चय ही वार्ष्णेय ने वही विद्या सीख ली होगी; इसीलिए आज रथ की ध्वनि नल के रथ जैसी प्रचण्ड हुई।
श्लोक 35 (3.71.35)
आहोस्विदृतुपर्णोऽपि यथा राजा नलस्तथा । यथाऽयंरथनिर्घोषो नैषधस्येव लक्ष्यते ॥
āhosvidṛtuparṇo'pi yathā rājā nalastathā | yathā'yaṃrathanirghoṣo naiṣadhasyeva lakṣyate
या कहीं ऋतुपर्ण भी राजा नल के समान ही तो नहीं, जिससे यह रथ-ध्वनि नैषध की ध्वनि जैसी जान पड़ती है?"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 36 (3.71.36)
एवं सा तर्कयित्वा तु दमयन्ती विशांपते । दूतीं प्रस्थापयामास नैषधान्वेषणे शुभा ॥
evaṃ sā tarkayitvā tu damayantī viśāṃpate | dūtīṃ prasthāpayāmāsa naiṣadhānveṣaṇe śubhā
हे प्रजानाथ, इस प्रकार तर्क-वितर्क करके कल्याणी दमयन्ती ने नैषध की खोज के लिए एक दूती भेजी।