आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 72
केशिनी का बाहुक से संवाद
कुरूप सारथि बाहुक के नल होने की शंका से दमयन्ती अपनी दासी केशिनी को उससे पूछताछ करने भेजती है। बाहुक बताता है कि ऋतुपर्ण दूसरे स्वयंवर के लिए आए हैं और नल का पुराना सारथि वार्ष्णेय नहीं जानता कि नल कहाँ हैं। जब केशिनी पर्णाद द्वारा लाए वचन दोहराकर फिर से उत्तर माँगती है, तो बाहुक कहता है कि कुलीन स्त्रियाँ विपत्ति से उजड़े पति पर क्रोध नहीं करतीं, और फिर रो पड़ता है; केशिनी सब कुछ दमयन्ती को जा बताती है।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 1 (3.72.1)
गच्छ केशिनि जानीहि क एष रथवाहकः । उपविष्टो रथोपस्थे विकृतो ह्रस्वबाहुकः ॥
gaccha keśini jānīhi ka eṣa rathavāhakaḥ | upaviṣṭo rathopasthe vikṛto hrasvabāhukaḥ
"केशिनी, जाओ और पता लगाओ कि यह रथ हाँकने वाला कौन है, जो रथ के आसन पर बैठा है, कुरूप और छोटी भुजाओं वाला।"
श्लोक 2 (3.72.2)
अभ्येत्य कुशलं भद्रे मृदुपूर्वं समाहिता । पृच्छेथाः पुरुषं ह्येनं यथातत्त्वमनिन्दिते ॥
abhyetya kuśalaṃ bhadre mṛdupūrvaṃ samāhitā | pṛcchethāḥ puruṣaṃ hyenaṃ yathātattvamanindite
"भद्रे, शान्त मन से उसके पास जाकर पहले कोमल वचनों में उसका कुशल पूछना, और हे अनिन्दिते, इस पुरुष के बारे में ठीक-ठीक सच्चाई जानना।"
श्लोक 3 (3.72.3)
अत्र मे महती शङ्का भवेदेष नलो नृपः । यथा च मनसस्तुष्टिर्हृदयस्य च निर्वृतिः ॥
atra me mahatī śaṅkā bhavedeṣa nalo nṛpaḥ | yathā ca manasastuṣṭirhṛdayasya ca nirvṛtiḥ
"मेरे मन में बड़ी शंका है कि यह राजा नल हो सकते हैं। ऐसा करो कि मेरे मन को संतोष और हृदय को शान्ति मिले।"
श्लोक 4 (3.72.4)
ब्रूयाश्चैनं कथान्ते त्वं पर्णादवचनं यथा । प्रतिवाक्यं च सुश्रोणि बुध्येथास्त्वमनिन्दिते ॥
brūyāścainaṃ kathānte tvaṃ parṇādavacanaṃ yathā | prativākyaṃ ca suśroṇi budhyethāstvamanindite
"बातचीत के अन्त में तुम उससे वे वचन कहना जो पर्णाद ने कहे थे, और हे सुन्दरी, हे अनिन्दिते, उसका उत्तर ध्यान से समझ लेना।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 5 (3.72.5)
एवं समाहिता गत्वा दूती बाहुकमब्रवीत् । दमयन्त्यपि कल्याणी प्रासादस्थाऽन्ववैक्षत ॥
evaṃ samāhitā gatvā dūtī bāhukamabravīt | damayantyapi kalyāṇī prāsādasthā'nvavaikṣata
इस प्रकार समझाई जाकर वह दूती सावधान मन से गई और बाहुक से बोली; उधर कल्याणी दमयन्ती महल से देखती रही।
केशिन्युवाच
श्लोक 6 (3.72.6)
स्वागतं ते मनुष्येन्द्र कुशलं ते ब्रवीम्यहम् । दमयन्त्या वचः साधु निबोध पुरुषर्षभ ॥
svāgataṃ te manuṣyendra kuśalaṃ te bravīmyaham | damayantyā vacaḥ sādhu nibodha puruṣarṣabha
"हे नरेन्द्र, आपका स्वागत है; मैं आपका कुशल-मंगल पूछती हूँ। हे पुरुषश्रेष्ठ, दमयन्ती की बात ध्यान से सुनिए।"
श्लोक 7 (3.72.7)
कदा वै प्रस्थिता यूयं किमर्थमिह चागताः । तत्त्वं ब्रूहि यथान्यायं वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ॥
kadā vai prasthitā yūyaṃ kimarthamiha cāgatāḥ | tattvaṃ brūhi yathānyāyaṃ vaidarbhī śrotumicchati
"आप लोग कब चले थे और किस प्रयोजन से यहाँ आए हैं? ठीक-ठीक सच बताइए, विदर्भ-कुमारी यह सुनना चाहती हैं।"
बाहुक उवाच
श्लोक 8 (3.72.8)
श्रुतः स्वयंवरो राज्ञा कोसलेन महात्मना । द्वितीयो दमयन्त्या वै भविता श्व इति द्विजात् ॥
śrutaḥ svayaṃvaro rājñā kosalena mahātmanā | dvitīyo damayantyā vai bhavitā śva iti dvijāt
"कोसल के महात्मा राजा ने एक ब्राह्मण से सुना कि दमयन्ती का दूसरा स्वयंवर कल होगा।"
श्लोक 9 (3.72.9)
श्रुत्वैतत्प्रस्थितो राजा शतयोजनयायिभिः । हयैर्वातजवैर्मुख्यैरहमस्य च सारथिः ॥
śrutvaitatprasthito rājā śatayojanayāyibhiḥ | hayairvātajavairmukhyairahamasya ca sārathiḥ
"यह सुनकर राजा सौ योजन दौड़ सकने वाले, वायु के समान वेगवान उत्तम घोड़ों को लेकर चल पड़े, और मैं उनका सारथि हूँ।"
केशिन्युवाच
श्लोक 10 (3.72.10)
अथ योऽसौ तृतीयो वः स कुतः कस्य वा पुनः । त्वं च कस्य कथं चेदं त्वयि कर्म समाहितम् ॥
atha yo'sau tṛtīyo vaḥ sa kutaḥ kasya vā punaḥ | tvaṃ ca kasya kathaṃ cedaṃ tvayi karma samāhitam
"तो जो तुम लोगों में तीसरा है, वह कहाँ से है और किसका है? और तुम किसके हो, और यह काम तुम्हें कैसे सौंपा गया?"
बाहुक उवाच
श्लोक 11 (3.72.11)
पुण्यश्लोकस्य वै सूतो वार्ष्णेय इति विश्रुतः । स नले विद्रुते भद्रे भाङ्गस्वरिमुपस्थितः ॥
puṇyaślokasya vai sūto vārṣṇeya iti viśrutaḥ | sa nale vidrute bhadre bhāṅgasvarimupasthitaḥ
"वह पुण्यश्लोक नल का सारथि है, वार्ष्णेय नाम से प्रसिद्ध। भद्रे, नल के चले जाने पर वह भाङ्गस्वरि (ऋतुपर्ण) के पास आ गया।"
श्लोक 12 (3.72.12)
अहमप्यश्वकुशलः सूतत्वे च प्रतिष्ठितः । ऋतुपर्णेन सारथ्ये भोजने च वृतः स्वयम् ॥
ahamapyaśvakuśalaḥ sūtatve ca pratiṣṭhitaḥ | ṛtuparṇena sārathye bhojane ca vṛtaḥ svayam
"मैं भी घोड़ों में कुशल हूँ और सारथि के काम में प्रतिष्ठित हूँ। ऋतुपर्ण ने स्वयं मुझे सारथि और रसोइये के काम के लिए रखा है।"
केशिन्युवाच
श्लोक 13 (3.72.13)
अथ जानाति वार्ष्णेयः क्व नु राजा नलो गतः । कथं च त्वयि वा तेन कथितं स्यात्तु बाहुक ॥
atha jānāti vārṣṇeyaḥ kva nu rājā nalo gataḥ | kathaṃ ca tvayi vā tena kathitaṃ syāttu bāhuka
"तो क्या वार्ष्णेय जानता है कि राजा नल कहाँ गए? या बाहुक, क्या उसने तुमसे इस बारे में कुछ कहा होगा?"
बाहुक उवाच
श्लोक 14 (3.72.14)
इहैव पुत्रौ निक्षिप्य नलस्य प्रियदर्शनौ । गतस्ततो यथाकामं नैष जानाति नैषधम् ॥
ihaiva putrau nikṣipya nalasya priyadarśanau | gatastato yathākāmaṃ naiṣa jānāti naiṣadham
"वह नल के दोनों सुन्दर बच्चों को यहीं छोड़कर फिर जहाँ चाहा चला गया। वह नहीं जानता कि निषधराज कहाँ हैं।"
श्लोक 15 (3.72.15)
न चान्यः पुरुषः कश्चिन्नलं वेत्ति यशस्विनि । गूढश्चरति लोकेऽस्मिन्नष्टरूपो महीपतिः ॥
na cānyaḥ puruṣaḥ kaścinnalaṃ vetti yaśasvini | gūḍhaścarati loke'sminnaṣṭarūpo mahīpatiḥ
"हे यशस्विनी, और कोई भी पुरुष नल को नहीं जानता। वह राजा अपना रूप खोकर इस संसार में छिपकर विचरते हैं।"
श्लोक 16 (3.72.16)
आत्मैव तु नलं वेद या चास्य तदनन्तरा । न हि वै स्वानि लिङ्गानि नलं शंसन्ति कर्हिचित् ॥
ātmaiva tu nalaṃ veda yā cāsya tadanantarā | na hi vai svāni liṅgāni nalaṃ śaṃsanti karhicit
"नल को केवल उनकी अपनी आत्मा जानती है, और वह जो उनके सबसे निकट है; क्योंकि उनके अपने चिह्न कहीं भी नहीं बताते कि वे नल हैं।"
केशिन्युवाच
श्लोक 17 (3.72.17)
योऽसावयोध्यां प्रथमं गतोऽसौ ब्राह्मणस्तदा । इमानि नारीवाक्यानि कथयानः पुनः पुनः ॥
yo'sāvayodhyāṃ prathamaṃ gato'sau brāhmaṇastadā | imāni nārīvākyāni kathayānaḥ punaḥ punaḥ
"वह ब्राह्मण जो पहले अयोध्या गया था, एक स्त्री के ये वचन बार-बार दोहराता था:"
श्लोक 18 (3.72.18)
क्व नु त्वं कितव च्छित्त्वा वस्त्रार्धं प्रस्थितो मम । उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥
kva nu tvaṃ kitava cchittvā vastrārdhaṃ prasthito mama | utsṛjya vipine suptāmanuraktāṃ priyāṃ priya
"'हे जुआरी प्रियतम, मेरा आधा वस्त्र काटकर, वन में सोती हुई अपनी अनुरागिणी प्रिया को छोड़कर तुम कहाँ चले गए?'"
श्लोक 19 (3.72.19)
सा वै यथा समादिष्टा तथाऽऽस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी । दह्यमाना दिवारात्रौ वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ॥
sā vai yathā samādiṣṭā tathā''ste tvatpratīkṣiṇī | dahyamānā divārātrau vastrārdhenābhisaṃvṛtā
"'जैसा तुमने कहा था, वह वैसे ही तुम्हारी प्रतीक्षा करती है, दिन-रात दुःख में जलती हुई, आधे वस्त्र में लिपटी हुई।'"
श्लोक 20 (3.72.20)
तस्या रुदन्त्याः सततं तेन दुःखेन पार्थिव । प्रसादं कुरु मे वीर प्रतिवाक्यं वदस्व च ॥
tasyā rudantyāḥ satataṃ tena duḥkhena pārthiva | prasādaṃ kuru me vīra prativākyaṃ vadasva ca
"हे राजन्, वह उस दुःख से निरन्तर रोती रहती है। हे वीर, मुझ पर कृपा करो और उत्तर दो।"
श्लोक 21 (3.72.21)
तस्यास्तत्प्रियमाख्यानं प्रवदस्व महामते । तदेव वाक्यं वैदर्भी श्रोतुमिच्छन्त्यनिन्दिता ॥
tasyāstatpriyamākhyānaṃ pravadasva mahāmate | tadeva vākyaṃ vaidarbhī śrotumicchantyaninditā
"हे महामते, वह बात कहो जो उसे प्रिय लगे; अनिन्दिता वैदर्भी वही वचन सुनना चाहती है।"
श्लोक 22 (3.72.22)
एतच्छ्रुत्वा प्रतिवचस्तस्य दत्तं त्वया किल । यत्पुरा तत्पुनस्त्वत्तो वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ॥
etacchrutvā prativacastasya dattaṃ tvayā kila | yatpurā tatpunastvatto vaidarbhī śrotumicchati
"कहते हैं कि यह सुनकर तुमने उस ब्राह्मण को उत्तर दिया था। जो तुमने तब कहा था, वही वैदर्भी तुमसे फिर सुनना चाहती है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 23 (3.72.23)
एवमुक्तस्य केशिन्या नलस्य कुरुनन्दन । हृदयं व्यथितं चासीदश्रुपूर्णे च लोचने ॥
evamuktasya keśinyā nalasya kurunandana | hṛdayaṃ vyathitaṃ cāsīdaśrupūrṇe ca locane
हे कुरुनन्दन, केशिनी के ऐसा कहने पर नल का हृदय व्यथित हो गया और उनकी आँखें आँसुओं से भर आईं।
श्लोक 24 (3.72.24)
स निगृह्यात्मनो दुःखं दह्यमानो महीपतिः । बाष्पसंदिग्धया वाचा पुनरेवेदमब्रवीत् ॥
sa nigṛhyātmano duḥkhaṃ dahyamāno mahīpatiḥ | bāṣpasaṃdigdhayā vācā punarevedamabravīt
भीतर से जलते हुए राजा ने अपना दुःख रोककर आँसुओं से रुँधी वाणी में फिर यह कहा:
बाहुक उवाच
श्लोक 25 (3.72.25)
वैषम्यमपि संप्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥
vaiṣamyamapi saṃprāptā gopāyanti kulastriyaḥ | ātmānamātmanā satyo jitaḥ svargo na saṃśayaḥ
"कुलीन स्त्रियाँ विपत्ति में पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। ऐसी सच्ची स्त्रियाँ निःसन्देह स्वर्ग जीत लेती हैं।"
श्लोक 26 (3.72.26)
रहिता भर्तृभिश्चापि न क्रुध्यन्ति कदाचन । प्राणांश्चारित्रकवचान्धारयन्ति वरस्त्रियः ॥
rahitā bhartṛbhiścāpi na krudhyanti kadācana | prāṇāṃścāritrakavacāndhārayanti varastriyaḥ
"पतियों के छोड़ देने पर भी वे कभी क्रोध नहीं करतीं। श्रेष्ठ स्त्रियाँ सदाचार का कवच पहनकर अपने प्राणों को धारण किए रहती हैं।"
श्लोक 27 (3.72.27)
विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च । यत्सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ॥
viṣamasthena mūḍhena paribhraṣṭasukhena ca | yatsā tena parityaktā tatra na kroddhumarhati
"विपत्ति में पड़े, मोहग्रस्त और सब सुखों से वंचित उस पुरुष ने यदि उसे छोड़ दिया, तो इस पर उसे क्रोध नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 28 (3.72.28)
प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः । आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ॥
prāṇayātrāṃ pariprepsoḥ śakunairhṛtavāsasaḥ | ādhibhirdahyamānasya śyāmā na kroddhumarhati
"जो केवल प्राण बचाने का उपाय खोज रहा था, जिसका वस्त्र पक्षी उड़ा ले गए थे और जो मानसिक पीड़ा से जल रहा था, उस पर श्यामा को क्रोध नहीं करना चाहिए,"
श्लोक 29 (3.72.29)
सत्कृताऽसत्कृता वाऽपि पतिं दृष्ट्वा तथाविधम् । राज्यभ्रष्टं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ॥
satkṛtā'satkṛtā vā'pi patiṃ dṛṣṭvā tathāvidham | rājyabhraṣṭaṃ śriyā hīnaṃ kṣudhitaṃ vyasanāplutam
"चाहे उसका सम्मान हुआ हो या अपमान, जब वह अपने पति को ऐसी दशा में देखे: राज्य से निकाला हुआ, श्रीहीन, भूखा और विपत्ति में डूबा हुआ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 30 (3.72.30)
एवं ब्रुवाणस्तद्वाक्यं नलः परमदुर्मनाः । न बाष्पमशकत्सोढुं प्ररुरोद च भारत ॥
evaṃ bruvāṇastadvākyaṃ nalaḥ paramadurmanāḥ | na bāṣpamaśakatsoḍhuṃ praruroda ca bhārata
हे भारत, ये वचन कहते हुए अत्यन्त खिन्न नल अपने आँसू न रोक सके और फूट-फूटकर रो पड़े।
श्लोक 31 (3.72.31)
ततः सा केशिनी गत्वा दमयन्त्यै न्यवेदयत् । तत्सर्वं कथितं चैव विकारं तस्य चैव तम् ॥
tataḥ sā keśinī gatvā damayantyai nyavedayat | tatsarvaṃ kathitaṃ caiva vikāraṃ tasya caiva tam
तब केशिनी ने जाकर दमयन्ती को वह सब कह सुनाया जो कहा गया था, और उनकी वह विह्वलता भी बताई।