आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 73
बाहुक के अद्भुत कर्म
दमयन्ती केशिनी को फिर भेजती है कि वह चुपचाप बाहुक के आचरण को देखे। केशिनी अद्भुत बातें बताती है: नीचे द्वार उसके लिए ऊँचे हो जाते हैं, उसकी दृष्टि पड़ते ही घड़े भर जाते हैं, मुट्ठी भर घास से आग जल उठती है, अग्नि उसे नहीं जलाती और मसले हुए फूल उसके हाथों में और ताज़े हो जाते हैं। उसके पकाए मांस को चखकर दमयन्ती नल के हाथ का स्वाद पहचान लेती है और दोनों बच्चों को उसके पास भेजती है; बाहुक उन्हें गले लगाकर रोता है, फिर केशिनी से कहता है कि ये उसके अपने बच्चों जैसे हैं, और लोकनिन्दा के भय से उसे लौटा देता है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.73.1)
केशिन्यास्तद्वचः श्रुत्वा दमयन्ती विशांपते । शङ्कमाना नलं तं वै केशिनीमिदमब्रवीत् ॥
keśinyāstadvacaḥ śrutvā damayantī viśāṃpate | śaṅkamānā nalaṃ taṃ vai keśinīmidamabravīt
हे प्रजानाथ, केशिनी की बात सुनकर, उसके नल होने की शंका करती हुई दमयन्ती ने केशिनी से यह कहा:
दमयन्त्युवाच
श्लोक 2 (3.73.2)
गच्छ केशिनि भूयस्त्वं परीक्षां कुरु बाहुके । अब्रुवाणा समीपस्था चरितान्यस्य लक्षय ॥
gaccha keśini bhūyastvaṃ parīkṣāṃ kuru bāhuke | abruvāṇā samīpasthā caritānyasya lakṣaya
"केशिनी, फिर जाओ और बाहुक की परीक्षा लो। बिना कुछ बोले उसके पास रहकर उसके आचरण पर ध्यान दो।"
श्लोक 3 (3.73.3)
यदा च किंचित्कुर्यात्स कारणं तत्र भामिनि । तत्र संचेष्टमानस्य संलक्षेथा विचेष्टितम् ॥
yadā ca kiṃcitkuryātsa kāraṇaṃ tatra bhāmini | tatra saṃceṣṭamānasya saṃlakṣethā viceṣṭitam
"और भामिनी, जब भी वह किसी प्रयोजन से कुछ करे, तो ध्यान से देखना कि वह उसे कैसे करता है।"
श्लोक 4 (3.73.4)
न चास्य प्रतिबन्धेन देयोऽग्निरपि केशिनि । याचते न जलं देयं सकृच्चात्वरमाणया । एतत्सर्वं समीक्ष्य त्वं चरितं मे निवेदय ॥
na cāsya pratibandhena deyo'gnirapi keśini | yācate na jalaṃ deyaṃ sakṛccātvaramāṇayā | etatsarvaṃ samīkṣya tvaṃ caritaṃ me nivedaya
"केशिनी, उसके काम में बाधा डालने के लिए उसे आग मत देना, और माँगने पर भी पानी मत देना, और जल्दी भी मत करना। यह सब देखकर मुझे उसका आचरण बताना।"
श्लोक 5 (3.73.5)
निमित्तं यत्त्वया दृष्टं बाहुके दैवमानुषम् । यच्चान्यदपि पश्येथास्तच्चाख्येयं त्वया मम ॥
nimittaṃ yattvayā dṛṣṭaṃ bāhuke daivamānuṣam | yaccānyadapi paśyethāstaccākhyeyaṃ tvayā mama
"बाहुक में तुम्हें जो भी दैवी या मानवीय लक्षण दिखे, और जो कुछ और भी देखो, वह सब मुझे बताना।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 6 (3.73.6)
दमयन्त्यैवमुक्ता सा जगामाथ च केशिनी । निशाम्याथ हयज्ञस्य लिङ्गानि पुनरागमत् ॥
damayantyaivamuktā sā jagāmātha ca keśinī | niśāmyātha hayajñasya liṅgāni punarāgamat
दमयन्ती के ऐसा कहने पर केशिनी गई, और अश्वविद्या के उस ज्ञाता के लक्षणों को देखकर लौट आई।
श्लोक 7 (3.73.7)
सा तत्सर्वं यथावृत्तं दमयन्त्यै न्यवेदयत् । निमित्तं यत्तया दृष्टं बाहुके दिव्यमानुषम् ॥
sā tatsarvaṃ yathāvṛttaṃ damayantyai nyavedayat | nimittaṃ yattayā dṛṣṭaṃ bāhuke divyamānuṣam
उसने जो कुछ जैसे हुआ था, सब दमयन्ती को बता दिया, बाहुक में उसने जो भी दैवी और मानवीय लक्षण देखे थे।
केशिन्युवाच
श्लोक 8 (3.73.8)
दृढं शुच्यपदानोऽसौ न मया मानुषः क्वचित् । दृष्टपूर्वः श्रुतो वाऽपि दमयन्ति तथाविधः ॥
dṛḍhaṃ śucyapadāno'sau na mayā mānuṣaḥ kvacit | dṛṣṭapūrvaḥ śruto vā'pi damayanti tathāvidhaḥ
"दमयन्ती, सचमुच यह पुरुष अपने हर कर्म में पवित्र है। ऐसा मनुष्य मैंने पहले न कभी देखा, न सुना।"
श्लोक 9 (3.73.9)
ह्रस्वमासाद्य तु द्वारं नासौ विनमते क्वचित् । तं तु दृष्ट्वा यथासङ्गमुत्सर्पति यथासुखम् । संकटेऽप्यस्य सुमहद्विवरं जायतेऽधिकम् ॥
hrasvamāsādya tu dvāraṃ nāsau vinamate kvacit | taṃ tu dṛṣṭvā yathāsaṅgamutsarpati yathāsukham | saṃkaṭe'pyasya sumahadvivaraṃ jāyate'dhikam
"नीचे द्वार पर पहुँचकर भी वह कभी झुकता नहीं; उसे देखते ही द्वार आवश्यकता के अनुसार ऊँचा हो जाता है और वह आराम से निकल जाता है। तंग जगह में भी उसके लिए बड़ा रास्ता बन जाता है।"
श्लोक 10 (3.73.10)
ऋतुपर्णस्य चार्थाय भोजनीयमनेकशः । प्रेषितं तत्र राज्ञा तु मांसं बहु च पाशवम् ॥
ṛtuparṇasya cārthāya bhojanīyamanekaśaḥ | preṣitaṃ tatra rājñā tu māṃsaṃ bahu ca pāśavam
"राजा ने वहाँ ऋतुपर्ण के लिए अनेक प्रकार का भोजन और बहुत-सा पशु-मांस भेजा था।"
श्लोक 11 (3.73.11)
तस्य प्रक्षालनार्थाय कुम्भास्तत्रोपकल्पिताः । ते तेनावेक्षिताः कुम्भाः पूर्णा एवाभवंस्ततः ॥
tasya prakṣālanārthāya kumbhāstatropakalpitāḥ | te tenāvekṣitāḥ kumbhāḥ pūrṇā evābhavaṃstataḥ
"उसे धोने के लिए वहाँ घड़े रखे गए थे; उसने उनकी ओर देखा तो वे घड़े अपने-आप भर गए।"
श्लोक 12 (3.73.12)
ततः प्रक्षालनं कृत्वा समधिश्रित्य बाहुकः । तृणमुष्टिं समादाय सवितुस्तं समादधत् ॥
tataḥ prakṣālanaṃ kṛtvā samadhiśritya bāhukaḥ | tṛṇamuṣṭiṃ samādāya savitustaṃ samādadhat
"फिर धोकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर बाहुक ने मुट्ठी भर घास ली और उसे सूर्य की ओर रखा,"
श्लोक 13 (3.73.13)
अथ प्रज्वलितस्तत्र सहसा हव्यवाहनः । तदद्भुततमं दृष्ट्वा विस्मिताहमिहागता ॥
atha prajvalitastatra sahasā havyavāhanaḥ | tadadbhutatamaṃ dṛṣṭvā vismitāhamihāgatā
"और वहाँ अचानक अग्नि जल उठी। वह परम अद्भुत दृश्य देखकर मैं चकित होकर यहाँ आई हूँ।"
श्लोक 14 (3.73.14)
अन्यच्च तस्मिन्सुमहदाश्चर्यं लक्षितं मया । यदग्निमपि संस्पृश्य नैवासौ दह्यते शुभे ॥
anyacca tasminsumahadāścaryaṃ lakṣitaṃ mayā | yadagnimapi saṃspṛśya naivāsau dahyate śubhe
"हे शुभे, मैंने उसमें एक और बड़ा आश्चर्य देखा: आग को छूने पर भी वह नहीं जलता।"
श्लोक 15 (3.73.15)
छन्देन चोदकं तस्य वहत्यावर्जितं द्रुतम् । अतीव चान्यत्सुमहदाश्चर्यं दृष्टवत्यहम् ॥
chandena codakaṃ tasya vahatyāvarjitaṃ drutam | atīva cānyatsumahadāścaryaṃ dṛṣṭavatyaham
"उसकी इच्छा से जल तुरन्त उँडेला हुआ बहने लगता है। और मैंने एक और बहुत बड़ा आश्चर्य देखा:"
श्लोक 16 (3.73.16)
यत्स पुष्पाण्युपादाय हस्ताभ्यां ममृदे शनैः । मृद्यमानानि पाणिभ्यां तेन पुष्पाणि नान्यथा । भूय एव सुगन्धीनि हृषितानि भवन्ति हि ॥
yatsa puṣpāṇyupādāya hastābhyāṃ mamṛde śanaiḥ | mṛdyamānāni pāṇibhyāṃ tena puṣpāṇi nānyathā | bhūya eva sugandhīni hṛṣitāni bhavanti hi
"उसने कुछ फूल लेकर धीरे-धीरे हाथों से मसले, और उसके हाथों से मसले गए फूल मुरझाए नहीं, बल्कि और भी सुगन्धित और खिले हुए हो गए।"
श्लोक 17 (3.73.17)
एतान्यद्भुतकल्पानि दृष्ट्वाऽहं भृशविस्मिता । चेष्टितानि विशालाक्षि बाहुकस्य समीपतः ॥
etānyadbhutakalpāni dṛṣṭvā'haṃ bhṛśavismitā | ceṣṭitāni viśālākṣi bāhukasya samīpataḥ
"हे विशालाक्षी, बाहुक के ये अद्भुत कर्म निकट से देखकर मैं अत्यन्त विस्मित हूँ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 18 (3.73.18)
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा पुण्यश्लोकस्य चेष्टितम् । अमन्यत नलं प्राप्तं कर्मचेष्टाभिसूचितम् ॥
damayantī tu tacchrutvā puṇyaślokasya ceṣṭitam | amanyata nalaṃ prāptaṃ karmaceṣṭābhisūcitam
पुण्यश्लोक के ये कर्म सुनकर दमयन्ती ने मान लिया कि नल आ गए हैं, क्योंकि उनके कर्म और आचरण यही सूचित कर रहे थे।
श्लोक 19 (3.73.19)
सा शङ्कमाना भर्तारं नलं बाहुकरूपिणम् । केशिनीं श्लक्ष्णया वाचा रुदन्ती पुनरब्रवीत् ॥
sā śaṅkamānā bhartāraṃ nalaṃ bāhukarūpiṇam | keśinīṃ ślakṣṇayā vācā rudantī punarabravīt
यह शंका करती हुई कि बाहुक के रूप में उसके पति नल ही हैं, वह रोती हुई केशिनी से फिर कोमल वाणी में बोली:
दमयन्त्युवाच
श्लोक 20 (3.73.20)
पुनर्गच्छ प्रमत्तस्य बाहुकस्योपसंस्कृतम् । महानसाच्छ्रितं मांसमानयस्वेह भामिनि ॥
punargaccha pramattasya bāhukasyopasaṃskṛtam | mahānasācchritaṃ māṃsamānayasveha bhāmini
"भामिनी, फिर जाओ, और जब बाहुक का ध्यान न हो, तब रसोई से उसका पकाया हुआ मांस यहाँ ले आओ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 21 (3.73.21)
सा दृष्ट्वा बाहुके व्यग्रे तन्मांसमपकृष्य च । अत्युष्णमेव त्वरिता तत्क्षणात्प्रियकारिणी । दमयन्त्यै ततः प्रादात्केशिनी कुरुनन्दन ॥
sā dṛṣṭvā bāhuke vyagre tanmāṃsamapakṛṣya ca | atyuṣṇameva tvaritā tatkṣaṇātpriyakāriṇī | damayantyai tataḥ prādātkeśinī kurunandana
हे कुरुनन्दन, प्रिय करने वाली केशिनी ने बाहुक को काम में लगा देखकर उस मांस में से कुछ ले लिया, और तुरन्त जल्दी से उसे बहुत गरम ही दमयन्ती को ला दिया।
श्लोक 22 (3.73.22)
साऽशिता नलसिद्धस्य मांसस्य बहुशः पुरा । प्राश्य मत्वा नलं सूतं प्राक्रोशद्भृशदुःखिता ॥
sā'śitā nalasiddhasya māṃsasya bahuśaḥ purā | prāśya matvā nalaṃ sūtaṃ prākrośadbhṛśaduḥkhitā
उसने पहले बहुत बार नल का पकाया मांस खाया था। उसे चखकर उसने जान लिया कि वह सारथि नल ही है, और अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी।
श्लोक 23 (3.73.23)
वैक्लव्यं परमं गत्वा प्रक्षाल्य च मुखं ततः । मिथुनं प्रेषयामास केशिन्या सह भारत ॥
vaiklavyaṃ paramaṃ gatvā prakṣālya ca mukhaṃ tataḥ | mithunaṃ preṣayāmāsa keśinyā saha bhārata
हे भारत, अत्यन्त व्याकुल होकर उसने मुँह धोया और फिर अपने दोनों बच्चों को केशिनी के साथ भेजा।
श्लोक 24 (3.73.24)
इन्द्रसेनां सह भ्रात्रा समभिज्ञाय बाहुकः । अभिद्रुत्य तदा राजा परिष्वज्याङ्कमानयत् ॥
indrasenāṃ saha bhrātrā samabhijñāya bāhukaḥ | abhidrutya tadā rājā pariṣvajyāṅkamānayat
बाहुक ने इन्द्रसेना और उसके भाई को पहचान लिया; राजा दौड़कर उनके पास गए, उन्हें गले लगाया और गोद में ले लिया।
श्लोक 25 (3.73.25)
बाहुकस्तु समासाद्य सुतौ सुरसुतोपमौ । भृशं दुःखपरीतात्मा सुस्वरं प्ररुरोद ह ॥
bāhukastu samāsādya sutau surasutopamau | bhṛśaṃ duḥkhaparītātmā susvaraṃ praruroda ha
देवपुत्रों के समान अपने बच्चों को पाकर बाहुक का मन दुःख से भर गया और वह ऊँचे स्वर में रो पड़ा।
श्लोक 26 (3.73.26)
नैषधो दर्शयित्वा तु विकारमसकृत्तदा । उत्सृज्य सहसा पुत्रौ केशिनीमिदमब्रवीत् ॥
naiṣadho darśayitvā tu vikāramasakṛttadā | utsṛjya sahasā putrau keśinīmidamabravīt
बार-बार अपनी व्याकुलता प्रकट करने के बाद निषधराज ने सहसा बच्चों को छोड़ दिया और केशिनी से यह कहा:
बाहुक उवाच
श्लोक 27 (3.73.27)
इदं च सदृशं भद्रे मिथुनं मम पुत्रयोः । अतो दृष्ट्वैव सहसा बाष्पमुत्सृष्टवानहम् ॥
idaṃ ca sadṛśaṃ bhadre mithunaṃ mama putrayoḥ | ato dṛṣṭvaiva sahasā bāṣpamutsṛṣṭavānaham
"भद्रे, ये दोनों मेरे अपने दोनों बच्चों जैसे हैं; इसीलिए इन्हें अचानक देखकर मेरे आँसू निकल आए।"
श्लोक 28 (3.73.28)
बहुशः संपतन्तीं त्वां जनः शङ्केत दोषतः । वयं च देशातिथयो गच्छ भद्रे यथासुखम् ॥
bahuśaḥ saṃpatantīṃ tvāṃ janaḥ śaṅketa doṣataḥ | vayaṃ ca deśātithayo gaccha bhadre yathāsukham
"तुम बार-बार यहाँ आओगी तो लोग कोई दोष होने की शंका करेंगे। हम इस देश में परदेसी अतिथि हैं। भद्रे, सुखपूर्वक जाओ।"