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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 74

नल और दमयन्ती का पुनर्मिलन

माता-पिता की अनुमति से दमयन्ती बाहुक को अपने कक्ष में बुलवाती है और उस पुरुष को उलाहना देती है जिसने सोती हुई पत्नी को वन में छोड़ दिया था। नल अपना परिचय देते हैं, अपने कर्मों का दोष कलि पर डालते हैं और पूछते हैं कि वह दूसरा पति कैसे चुन सकती थी; दमयन्ती बताती है कि स्वयंवर तो उन्हें लौटा लाने का उपाय भर था, और वायु, सूर्य और चन्द्रमा की शपथ लेकर कहती है कि उसने कोई पाप नहीं किया। आकाश से वायुदेव उसकी निर्दोषता की पुष्टि करते हैं, पुष्पवृष्टि होती है, और नल नागराज का दिया वस्त्र पहनकर अपना रूप पा लेते हैं तथा पत्नी और बच्चों को गले लगाते हैं। दोनों रात भर अपने कष्टों की कथा कहते हैं, और दमयन्ती चन्द्रोदय वाली रात्रि के समान शोभित होती है।

अध्याय 73अध्याय-सूचीअध्याय 75

बृहदश्व उवाच

श्लोक 1 (3.74.1)

सर्वं विकारं दृष्ट्वा तु पुण्यश्लोकस्य धीमतः । आगत्य केशिनी क्षिप्रं दमयन्त्यै न्यवेदयत् ॥

sarvaṃ vikāraṃ dṛṣṭvā tu puṇyaślokasya dhīmataḥ | āgatya keśinī kṣipraṃ damayantyai nyavedayat

बुद्धिमान पुण्यश्लोक नल के सारे विकार देखकर केशिनी शीघ्र लौट आई और उसने दमयन्ती को सब बता दिया।

श्लोक 2 (3.74.2)

दमयन्ती ततो भूयः प्रेषयामास केशिनीम् । मातुः सकाशं दुःखार्ता नलशङ्कासमुत्सुका ॥

damayantī tato bhūyaḥ preṣayāmāsa keśinīm | mātuḥ sakāśaṃ duḥkhārtā nalaśaṅkāsamutsukā

तब दुःख से पीड़ित और नल होने की शंका से उत्सुक दमयन्ती ने केशिनी को फिर भेजा, इस बार अपनी माता के पास:

दमयन्त्युवाच

श्लोक 3 (3.74.3)

परीक्षितो मे बहुशो बाहुको नलशङ्कया । रूपे मे संशयस्त्वेकः स्वयमिच्छामि वेदितुम् ॥

parīkṣito me bahuśo bāhuko nalaśaṅkayā | rūpe me saṃśayastvekaḥ svayamicchāmi veditum

"नल होने की शंका से मैंने बाहुक की कई बार परीक्षा ली है। केवल उसके रूप को लेकर एक संशय बाकी है, और उसे मैं स्वयं जानना चाहती हूँ।"

श्लोक 4 (3.74.4)

स वा प्रवेश्यतां मातर्मां वाऽनुज्ञातुमर्हसि । विदितं वाऽथवाऽज्ञातं पितुर्मे संविधीयताम् ॥

sa vā praveśyatāṃ mātarmāṃ vā'nujñātumarhasi | viditaṃ vā'thavā'jñātaṃ piturme saṃvidhīyatām

"माँ, या तो उसे भीतर बुलवाया जाए, या मुझे उसके पास जाने की अनुमति दो। पिताजी को बताकर या बिना बताए, इसका प्रबन्ध कर दो।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 5 (3.74.5)

एवमुक्ता तु वैदर्भ्या सा देवी भीममब्रवीत् । दुहितुस्तमभिप्रायमन्वजानात्स पार्थिवः ॥

evamuktā tu vaidarbhyā sā devī bhīmamabravīt | duhitustamabhiprāyamanvajānātsa pārthivaḥ

वैदर्भी के ऐसा कहने पर रानी ने भीम से बात की, और राजा ने अपनी पुत्री की इच्छा स्वीकार कर ली।

श्लोक 6 (3.74.6)

सा वै पित्राऽभ्यनुज्ञाता मात्रा च भरतर्षभ । तयोर्नियोगात्कौरव्य केशिनीमिदमब्रवीत् ॥

sā vai pitrā'bhyanujñātā mātrā ca bharatarṣabha | tayorniyogātkauravya keśinīmidamabravīt

हे भरतश्रेष्ठ, पिता और माता की अनुमति पाकर, हे कौरव्य, उनकी आज्ञा से उसने केशिनी से यह कहा:

दमयन्त्युवाच

श्लोक 7 (3.74.7)

गच्छ केशिनि शीघ्रं त्वं बाहुकं पितृशासनात् । आनयस्व यथा माता त्वं तथा कुरु मे प्रियम् ॥

gaccha keśini śīghraṃ tvaṃ bāhukaṃ pitṛśāsanāt | ānayasva yathā mātā tvaṃ tathā kuru me priyam

"केशिनी, शीघ्र जाओ और पिताजी की आज्ञा से बाहुक को यहाँ ले आओ। जैसे माँ करती है, वैसे ही तुम मेरा यह प्रिय काम करो।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 8 (3.74.8)

गत्वा तु केशिनी शीघ्रं बाहुकं वाक्यमब्रवीत् । भीमस्य शासनात्सूतागताहं विद्धि बाहुक ॥

gatvā tu keśinī śīghraṃ bāhukaṃ vākyamabravīt | bhīmasya śāsanātsūtāgatāhaṃ viddhi bāhuka

केशिनी ने शीघ्र जाकर बाहुक से कहा: "हे सूत बाहुक, जान लो कि मैं राजा भीम की आज्ञा से आई हूँ।

श्लोक 9 (3.74.9)

प्रविश्यतां राजवेश्म इत्युक्तो भरतर्षभ । बाहुकस्तु चिरं ध्यात्वा केशिन्या सह भारत । प्रविवेश महाबाहुर्दमयन्तीनिवेशनम् ॥

praviśyatāṃ rājaveśma ityukto bharatarṣabha | bāhukastu ciraṃ dhyātvā keśinyā saha bhārata | praviveśa mahābāhurdamayantīniveśanam

राजभवन में प्रवेश कीजिए।" हे भरतश्रेष्ठ, ऐसा कहे जाने पर बाहुक देर तक सोचता रहा, और फिर, हे भारत, वह महाबाहु केशिनी के साथ दमयन्ती के भवन में गया।

श्लोक 10 (3.74.10)

नलं प्रवेशयामास यत्र तस्याः प्रतिश्रयः ॥

nalaṃ praveśayāmāsa yatra tasyāḥ pratiśrayaḥ

उसने नल को वहाँ बुलवा लिया जहाँ उसका निवास था।

श्लोक 11 (3.74.11)

तां स्म दृष्ट्वैव सहसा दमयन्तीं नलो नृपः । आविष्टः शोकदुःखाभ्यां बभूवाश्रुपरिप्लुतः ॥

tāṃ sma dṛṣṭvaiva sahasā damayantīṃ nalo nṛpaḥ | āviṣṭaḥ śokaduḥkhābhyāṃ babhūvāśrupariplutaḥ

दमयन्ती को देखते ही राजा नल शोक और दुःख से भर गए और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

श्लोक 12 (3.74.12)

तं तु दृष्ट्वा तथायुक्तं दमयन्ती नलं तदा । तीव्रशोकसमाविष्टा बभूव वरवर्णिनी ॥

taṃ tu dṛṣṭvā tathāyuktaṃ damayantī nalaṃ tadā | tīvraśokasamāviṣṭā babhūva varavarṇinī

नल को उस दशा में देखकर सुन्दरी दमयन्ती भी तीव्र शोक में डूब गई।

श्लोक 13 (3.74.13)

ततः काषायवसना जटिला मलपङ्किनी । दमयन्ती महाराज बाहुकं वाक्यमब्रवीत् ॥

tataḥ kāṣāyavasanā jaṭilā malapaṅkinī | damayantī mahārāja bāhukaṃ vākyamabravīt

हे महाराज, तब गेरुए वस्त्र पहने, जटाधारी और मैल से सनी दमयन्ती ने बाहुक से कहा:

दमयन्त्युवाच

श्लोक 14 (3.74.14)

पूर्वं दृष्टस्त्वया कश्चिद्धर्मज्ञो नाम बाहुक । सुप्तामुत्सृज्य विपिने गतो यः पुरुषः स्त्रियम् ॥

pūrvaṃ dṛṣṭastvayā kaściddharmajño nāma bāhuka | suptāmutsṛjya vipine gato yaḥ puruṣaḥ striyam

"बाहुक, क्या तुमने पहले कभी कोई ऐसा धर्मज्ञ पुरुष देखा है जो वन में सोती हुई अपनी पत्नी को छोड़कर चला गया हो?"

श्लोक 15 (3.74.15)

अनागसं प्रियां भार्यां विजने श्रममोहिताम् । अपहाय तु को गच्छेत्पुण्यश्लोकमृते नलम् ॥

anāgasaṃ priyāṃ bhāryāṃ vijane śramamohitām | apahāya tu ko gacchetpuṇyaślokamṛte nalam

"पुण्यश्लोक नल के सिवा और कौन अपनी निर्दोष, प्यारी पत्नी को, जो थकान से बेसुध थी, सुनसान जगह में छोड़कर जा सकता है?"

श्लोक 16 (3.74.16)

किमु तस्य मया बाल्यादपराद्धं महीपतेः । यो मामुत्सृज्य विपिने गतवान्निद्रयाऽर्दिताम् ॥

kimu tasya mayā bālyādaparāddhaṃ mahīpateḥ | yo māmutsṛjya vipine gatavānnidrayā'rditām

"मैंने अपने भोलेपन में उस राजा का कौन-सा अपराध किया था कि वह मुझे नींद में डूबी हुई वन में छोड़कर चला गया?"

श्लोक 17 (3.74.17)

साक्षाद्देवानपाहाय वृतो यः स पुरा मया । अनुव्रतामभिमतां पुत्रिणीं त्यक्तवान्कथम् ॥

sākṣāddevānapāhāya vṛto yaḥ sa purā mayā | anuvratāmabhimatāṃ putriṇīṃ tyaktavānkatham

"जिसे मैंने कभी साक्षात् देवताओं को छोड़कर वरा था, वह अपनी अनुरागिणी, प्रिय और संतानवती पत्नी को कैसे त्याग सका?"

श्लोक 18 (3.74.18)

अग्नौ पाणिगृहीतां च हंसानां वचने स्थिताम् । भरिष्यामीति सत्यं तु प्रतिश्रुत्य क्व तद्गतम् ॥

agnau pāṇigṛhītāṃ ca haṃsānāṃ vacane sthitām | bhariṣyāmīti satyaṃ tu pratiśrutya kva tadgatam

"अग्नि के सामने उन्होंने मेरा हाथ थामा था, मैंने हंसों के वचन पर भरोसा किया था, और उन्होंने सच्चा वचन दिया था कि 'मैं तुम्हारा भरण-पोषण करूँगा'। वह वचन कहाँ गया?"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 19 (3.74.19)

दमयन्त्या ब्रुवन्त्यास्तु सर्वमेतदरिंदम । शोकजं वारिनेत्राभ्यामसुखं प्रास्रवद्बहु ॥

damayantyā bruvantyāstu sarvametadariṃdama | śokajaṃ vārinetrābhyāmasukhaṃ prāsravadbahu

हे शत्रुदमन, दमयन्ती के यह सब कहते-कहते उसकी आँखों से शोक के आँसू बहुत बहने लगे।

श्लोक 20 (3.74.20)

अतीव कृष्णताराभ्यां रक्तान्ताभ्यां जलं तु तत् । परिस्रवन्नलो राजा शोकार्त इदमब्रवीत् ॥

atīva kṛṣṇatārābhyāṃ raktāntābhyāṃ jalaṃ tu tat | parisravannalo rājā śokārta idamabravīt

उसकी लाल कोरों वाली, अत्यन्त काली पुतलियों वाली आँखों से वह जल बहता देखकर राजा नल भी आँसू बहाते हुए, शोक से पीड़ित होकर बोले:

नल उवाच

श्लोक 21 (3.74.21)

नलोऽहं विपुलश्रोणि त्वामुत्सृज्य यतो गतः । आविष्टः कलिना भद्रे तेन मोहवशं गतः ॥

nalo'haṃ vipulaśroṇi tvāmutsṛjya yato gataḥ | āviṣṭaḥ kalinā bhadre tena mohavaśaṃ gataḥ

"हे सुन्दरी, मैं ही नल हूँ। भद्रे, यदि मैं तुम्हें छोड़कर चला गया, तो इसलिए कि कलि मुझमें प्रवेश कर गया था, और उसके कारण मैं मोह के वश हो गया था।"

श्लोक 22 (3.74.22)

मम राज्यं प्रनष्टं यन्नाहं तत्कृतवान्स्वयम् । कलिना तत्कृतं भीरु यच्च त्वामहमत्यजम् ॥

mama rājyaṃ pranaṣṭaṃ yannāhaṃ tatkṛtavānsvayam | kalinā tatkṛtaṃ bhīru yacca tvāmahamatyajam

"मेरा राज्य जो नष्ट हुआ, वह मैंने स्वयं नहीं किया। हे भीरु, वह कलि ने किया, और तुम्हें छोड़ना भी उसी का काम था।"

श्लोक 23 (3.74.23)

यत्त्वया धर्मकृच्छ्रे तु शापेनाभिहतः पुरा । वनस्थया दुःखितया शोचन्त्या मां दिवानिशम् ॥

yattvayā dharmakṛcchre tu śāpenābhihataḥ purā | vanasthayā duḥkhitayā śocantyā māṃ divāniśam

"धर्म के उस संकट में, बहुत पहले, जब तुम वन में दुःखी होकर दिन-रात मेरे लिए शोक कर रही थीं, तब वह तुम्हारे शाप से आहत हुआ था।"

श्लोक 24 (3.74.24)

स मच्छरीरे त्वच्छापाद्दह्यमानोऽवसत्कलिः । त्वच्छापदग्धः सततं सोऽग्नावग्निरिवाहितः ॥

sa maccharīre tvacchāpāddahyamāno'vasatkaliḥ | tvacchāpadagdhaḥ satataṃ so'gnāvagnirivāhitaḥ

"तुम्हारे शाप से जलता हुआ कलि मेरे शरीर में रहता रहा; तुम्हारे शाप से निरन्तर दग्ध होकर वह अग्नि में रखी अग्नि के समान था।"

श्लोक 25 (3.74.25)

मम च व्यवसायेन तपसा चैव निर्जितः । दुःखस्यान्तेन चानेन भवितव्यं हि नौ शुभे ॥

mama ca vyavasāyena tapasā caiva nirjitaḥ | duḥkhasyāntena cānena bhavitavyaṃ hi nau śubhe

"मेरे दृढ़ निश्चय और तप से वह पराजित हो गया है। हे शुभे, अब हमारे दुःख का अन्त होना ही चाहिए।"

श्लोक 26 (3.74.26)

विमुच्य मां गतः पापस्ततोऽहमिह चागतः । त्वदर्थं विपुलश्रोणि न हि मेऽन्यत्प्रयोजनम् ॥

vimucya māṃ gataḥ pāpastato'hamiha cāgataḥ | tvadarthaṃ vipulaśroṇi na hi me'nyatprayojanam

"वह पापी मुझे छोड़कर चला गया है, और इसलिए, हे सुन्दरी, मैं तुम्हारे लिए यहाँ आया हूँ; मेरा और कोई प्रयोजन नहीं है।"

श्लोक 27 (3.74.27)

कथं नु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम् । उत्सृज्य वरयेदन्यं यथा त्वं भीरु कर्हिचित् ॥

kathaṃ nu nārī bhartāramanuraktamanuvratam | utsṛjya varayedanyaṃ yathā tvaṃ bhīru karhicit

"पर कोई स्त्री अपने अनुरागी और अनुव्रत पति को छोड़कर दूसरे को कैसे वर सकती है, जैसा हे भीरु, तुम करने जा रही थीं?"

श्लोक 28 (3.74.28)

दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नृपतिशासनात् । भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीयं वरयिष्यति ॥

dūtāścaranti pṛthivīṃ kṛtsnāṃ nṛpatiśāsanāt | bhaimī kila sma bhartāraṃ dvitīyaṃ varayiṣyati

"राजा की आज्ञा से दूत सारी पृथ्वी पर घूम रहे हैं कि भीम की पुत्री दूसरा पति चुनेगी,"

श्लोक 29 (3.74.29)

स्वैरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवात्मनः । श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भाङ्गस्वरिरुपस्थितः ॥

svairavṛttā yathākāmamanurūpamivātmanaḥ | śrutvaiva caivaṃ tvarito bhāṅgasvarirupasthitaḥ

"स्वेच्छा से, जैसा चाहे, अपने योग्य किसी को। यह सुनते ही भाङ्गस्वरि (ऋतुपर्ण) जल्दी से यहाँ आ पहुँचे।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 30 (3.74.30)

दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा नलस्य परिदेवितम् । प्राञ्जलिर्वेपमाना च भीता वचनमब्रवीत् ॥

damayantī tu tacchrutvā nalasya paridevitam | prāñjalirvepamānā ca bhītā vacanamabravīt

नल का यह विलाप सुनकर दमयन्ती ने हाथ जोड़ लिए और काँपती हुई, डरी हुई बोली:

दमयन्त्युवाच

श्लोक 31 (3.74.31)

न मामर्हसि कल्याण पापेन परिशङ्कितुम् । मया हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ॥

na māmarhasi kalyāṇa pāpena pariśaṅkitum | mayā hi devānutsṛjya vṛtastvaṃ niṣadhādhipa

"हे कल्याणमय, आपको मुझ पर किसी पाप की शंका नहीं करनी चाहिए। हे निषधनाथ, मैंने तो देवताओं को छोड़कर आपको वरा था।"

श्लोक 32 (3.74.32)

तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः । वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥

tavābhigamanārthaṃ tu sarvato brāhmaṇā gatāḥ | vākyāni mama gāthābhirgāyamānā diśo daśa

"आपको खोजने के लिए ब्राह्मण सब ओर, दसों दिशाओं में, मेरे वचनों को गाथाओं में गाते हुए गए।"

श्लोक 33 (3.74.33)

ततस्त्वां ब्राह्मणो विद्वान्पर्णादो नाम पार्थिव । अभ्यगच्छत्कोसलायामृतुपर्णनिवेशने ॥

tatastvāṃ brāhmaṇo vidvānparṇādo nāma pārthiva | abhyagacchatkosalāyāmṛtuparṇaniveśane

"हे राजन्, तब पर्णाद नाम के एक विद्वान ब्राह्मण ने कोसल में ऋतुपर्ण के भवन में आपको पाया।"

श्लोक 34 (3.74.34)

तेन वाक्ये कृते सम्यक्प्रतिवाक्ये तथा हृते । उपायोऽयं मया दृष्टो नैषधानयने तव ॥

tena vākye kṛte samyakprativākye tathā hṛte | upāyo'yaṃ mayā dṛṣṭo naiṣadhānayane tava

"जब उसने मेरे वचन ठीक से कह दिए और आपका उत्तर ले आया, तब हे निषधराज, आपको यहाँ लाने का यह उपाय मुझे सूझा।"

श्लोक 35 (3.74.35)

त्वामृते नहि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते । समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ॥

tvāmṛte nahi loke'nya ekāhnā pṛthivīpate | samartho yojanaśataṃ gantumaśvairnarādhipa

"क्योंकि हे पृथ्वीपति, हे नरेश, संसार में आपके सिवा और कोई नहीं जो घोड़ों से एक ही दिन में सौ योजन जा सके।"

श्लोक 36 (3.74.36)

तथापि मां महीपाल भजेतां चरणौ तव । स्पृशेयं तेन सत्येन पादावेतौ महीपते । यथा नासत्कृतं किंचिन्मनसाऽपि चराम्यहम् ॥

tathāpi māṃ mahīpāla bhajetāṃ caraṇau tava | spṛśeyaṃ tena satyena pādāvetau mahīpate | yathā nāsatkṛtaṃ kiṃcinmanasā'pi carāmyaham

"फिर भी, हे महीपाल, आपके चरण मुझे शरण दें। हे राजन्, इसी सत्य की शपथ लेकर मैं आपके इन चरणों को छूती हूँ कि मैंने मन से भी कभी कोई अनुचित कार्य नहीं किया।"

श्लोक 37 (3.74.37)

अयं चरति लोकेऽस्मिन्भूतसाक्षी सदागतिः । एष मे मुञ्चतु प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥

ayaṃ carati loke'sminbhūtasākṣī sadāgatiḥ | eṣa me muñcatu prāṇānyadi pāpaṃ carāmyaham

"यह सदा चलने वाला वायु, सब प्राणियों का साक्षी, इस संसार में विचरता है; यदि मैंने पाप किया हो तो यह मेरे प्राण हर ले।"

श्लोक 38 (3.74.38)

यथा चरति तिग्मांशुः परितो भुवनं सदा । स मुञ्चतु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥

yathā carati tigmāṃśuḥ parito bhuvanaṃ sadā | sa muñcatu mama prāṇānyadi pāpaṃ carāmyaham

"तीक्ष्ण किरणों वाला सूर्य जो सदा संसार के चारों ओर घूमता है, यदि मैंने पाप किया हो तो वह मेरे प्राण हर ले।"

श्लोक 39 (3.74.39)

चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् । स मुञ्चतु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥

candramāḥ sarvabhūtānāmantaścarati sākṣivat | sa muñcatu mama prāṇānyadi pāpaṃ carāmyaham

"चन्द्रमा सब प्राणियों के भीतर साक्षी की भाँति विचरता है; यदि मैंने पाप किया हो तो वह मेरे प्राण हर ले।"

श्लोक 40 (3.74.40)

एते देवास्त्रयः कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारयन्ति वै । विब्रुवन्तु यथा सत्यमेतद्देवास्त्यजन्तु माम् ॥

ete devāstrayaḥ kṛtsnaṃ trailokyaṃ dhārayanti vai | vibruvantu yathā satyametaddevāstyajantu mām

"ये तीनों देवता समस्त त्रिलोकी को धारण करते हैं। वे इसका सत्य प्रकट करें, अन्यथा देवता मुझे त्याग दें।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 41 (3.74.41)

एवमुक्ते ततो वायुरन्तरिक्षादभाषत । नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ॥

evamukte tato vāyurantarikṣādabhāṣata | naiṣā kṛtavatī pāpaṃ nala satyaṃ bravīmi te

उसके ऐसा कहने पर वायु ने आकाश से कहा: "नल, इसने कोई पाप नहीं किया है। मैं तुमसे सच कहता हूँ।

वायुरुवाच

श्लोक 42 (3.74.42)

राजञ्शीलनिधिः स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षितः । साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वयं त्रीन्परिवत्सरान् ॥

rājañśīlanidhiḥ sphīto damayantyā surakṣitaḥ | sākṣiṇo rakṣiṇaścāsyā vayaṃ trīnparivatsarān

"हे राजन्, दमयन्ती ने अपने शील के समृद्ध भण्डार की भली-भाँति रक्षा की है। तीन वर्ष से हम उसके साक्षी और रक्षक रहे हैं।

श्लोक 43 (3.74.43)

उपायो विहितश्चायं त्वदर्थमतुलोऽनया । न ह्येकाह्ना शतं गन्ता त्वामृतेऽन्यः पुमानिह ॥

upāyo vihitaścāyaṃ tvadarthamatulo'nayā | na hyekāhnā śataṃ gantā tvāmṛte'nyaḥ pumāniha

"और यह अनुपम उपाय उसने तुम्हारे लिए ही रचा था; क्योंकि तुम्हारे सिवा यहाँ कोई पुरुष एक दिन में सौ योजन नहीं जा सकता।

श्लोक 44 (3.74.44)

उपपन्ना त्वया भैमी त्वं च भैम्या महीपते । नात्र शङ्का त्वया कार्या संगच्छ सह भार्यया ॥

upapannā tvayā bhaimī tvaṃ ca bhaimyā mahīpate | nātra śaṅkā tvayā kāryā saṃgaccha saha bhāryayā

"हे महीपति, भीमकुमारी तुम्हारे योग्य है और तुम उसके। इस विषय में कोई शंका मत करो; अपनी पत्नी से मिलो।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 45 (3.74.45)

तथा ब्रुवति वायौ तु पुष्पवृष्टिः पपात ह । देवदुन्दुभयो नेदुर्ववौ च पवनः शिवः ॥

tathā bruvati vāyau tu puṣpavṛṣṭiḥ papāta ha | devadundubhayo nedurvavau ca pavanaḥ śivaḥ

वायु के ऐसा कहते ही फूलों की वर्षा होने लगी, देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और मंगलमय मन्द पवन बहने लगा।

श्लोक 46 (3.74.46)

तदद्भुतमयं दृष्ट्वा नलो राजाऽथ भारत । दमयन्त्यां विशङ्कां तामुपाकर्षदरिंदमः ॥

tadadbhutamayaṃ dṛṣṭvā nalo rājā'tha bhārata | damayantyāṃ viśaṅkāṃ tāmupākarṣadariṃdamaḥ

हे भारत, वह अद्भुत दृश्य देखकर शत्रुदमन राजा नल ने दमयन्ती के प्रति अपनी शंका त्याग दी।

श्लोक 47 (3.74.47)

ततस्तद्वस्त्रमरजः प्रावृणोद्वसुधाधिपः । संस्मृत्य नागराजं तं ततो लेभे स्वकं वपुः ॥

tatastadvastramarajaḥ prāvṛṇodvasudhādhipaḥ | saṃsmṛtya nāgarājaṃ taṃ tato lebhe svakaṃ vapuḥ

तब उस पृथ्वीपति ने वह निर्मल वस्त्र ओढ़ा और नागराज का स्मरण करके अपना रूप फिर पा लिया।

श्लोक 48 (3.74.48)

स्वरूपिणं तु भर्तारं दृष्ट्वा भीमसुता तदा । प्राक्रोशदुच्चैरालिङ्ग्य पुण्यश्लोकमनिन्दिता ॥

svarūpiṇaṃ tu bhartāraṃ dṛṣṭvā bhīmasutā tadā | prākrośaduccairāliṅgya puṇyaślokamaninditā

अपने पति को उनके असली रूप में देखकर अनिन्दिता भीमकुमारी ने पुण्यश्लोक नल को गले लगा लिया और ऊँचे स्वर में रो पड़ी।

श्लोक 49 (3.74.49)

भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा । सस्वजे स्वसुतौ चापि यथावत्प्रत्यनन्दत ॥

bhaimīmapi nalo rājā bhrājamāno yathā purā | sasvaje svasutau cāpi yathāvatpratyanandata

पहले की भाँति तेजस्वी राजा नल ने भी भीमकुमारी को गले लगाया, और अपने बच्चों का भी यथोचित स्नेह से अभिनन्दन किया।

श्लोक 50 (3.74.50)

ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्त्रं तस्य शुभानना । परीता तेन दुःखेन निशश्वासायतेक्षणा ॥

tataḥ svorasi vinyasya vaktraṃ tasya śubhānanā | parītā tena duḥkhena niśaśvāsāyatekṣaṇā

तब सुमुखी दमयन्ती ने उनका मुख अपनी छाती पर रख लिया, और उस दुःख से घिरी वह विशाललोचना लम्बी साँसें लेने लगी।

श्लोक 51 (3.74.51)

तथैव मलदिग्धाङ्गीं परिष्वज्य शुचिस्मिताम् । सुचिरं पुरुषव्याघ्रस्तस्थौ शोकपरिप्लुतः ॥

tathaiva maladigdhāṅgīṃ pariṣvajya śucismitām | suciraṃ puruṣavyāghrastasthau śokapariplutaḥ

उसी प्रकार पुरुषसिंह नल मैल से सने अंगों वाली, मधुर मुस्कान वाली दमयन्ती को आलिंगन में लिए देर तक शोक में डूबे खड़े रहे।

श्लोक 52 (3.74.52)

ततः सर्वं यथावृत्तं दमयन्त्या नलस्य च । भीमायाकथयत्प्रीत्या वैदर्भ्या जननी नृप ॥

tataḥ sarvaṃ yathāvṛttaṃ damayantyā nalasya ca | bhīmāyākathayatprītyā vaidarbhyā jananī nṛpa

हे राजन्, तब वैदर्भी की माता ने दमयन्ती और नल के बीच जो कुछ हुआ था, वह सब प्रसन्न होकर भीम को बता दिया।

श्लोक 53 (3.74.53)

ततोऽब्रवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् । दमयन्त्या सहोपेतं कल्ये द्रष्टा सुखोषितम् ॥

tato'bravīnmahārājaḥ kṛtaśaucamahaṃ nalam | damayantyā sahopetaṃ kalye draṣṭā sukhoṣitam

तब महाराज ने कहा: "प्रातःकाल स्नान करके और सुख से विश्राम करके दमयन्ती के साथ आए नल को मैं देखूँगा।"

श्लोक 54 (3.74.54)

ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथयन्तौ पुरातनम् । वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदितौ नृप ॥

tatastau sahitau rātriṃ kathayantau purātanam | vane vicaritaṃ sarvamūṣaturmuditau nṛpa

हे राजन्, फिर उन दोनों ने वह रात साथ बिताई, और वन में जो कुछ बीता था वह सब एक-दूसरे को आनन्द से सुनाते रहे।

श्लोक 55 (3.74.55)

गृहे भीमस्य नृपतेः परस्परसुखैषिणौ । वसेतां हृष्टसंकल्पौ वैदर्भी च नलश्च ह ॥

gṛhe bhīmasya nṛpateḥ parasparasukhaiṣiṇau | vasetāṃ hṛṣṭasaṃkalpau vaidarbhī ca nalaśca ha

राजा भीम के भवन में वैदर्भी और नल प्रसन्न मन से, एक-दूसरे के सुख की कामना करते हुए रहने लगे।

श्लोक 56 (3.74.56)

स चतुर्थे ततो वर्षे संगम्य सह भार्यया । सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लब्धवान्परमां मुदम् ॥

sa caturthe tato varṣe saṃgamya saha bhāryayā | sarvakāmaiḥ susiddhārtho labdhavānparamāṃ mudam

चौथे वर्ष अपनी पत्नी से मिलकर, सब कामनाएँ पूरी होने पर, उन्हें परम आनन्द मिला।

श्लोक 57 (3.74.57)

दमयन्त्यपि भर्तारमासाद्याप्यायिता भृशम् । अर्धसंजातसस्येव तोयं प्राप्य वसुंधरा ॥

damayantyapi bhartāramāsādyāpyāyitā bhṛśam | ardhasaṃjātasasyeva toyaṃ prāpya vasuṃdharā

दमयन्ती भी पति को पाकर बहुत तृप्त हुई, जैसे अधउगी फसल वाली धरती जल पाकर हरी-भरी हो उठती है।

श्लोक 58 (3.74.58)

सैवं समेत्य व्यपनीय तन्द्रां । शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा । रराज भैमी समवाप्तकामा । शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥

saivaṃ sametya vyapanīya tandrāṃ | śāntajvarā harṣavivṛddhasattvā | rarāja bhaimī samavāptakāmā | śītāṃśunā rātririvoditena

इस प्रकार पति से मिलकर, थकान दूर करके, ताप शान्त होने पर, हर्ष से बढ़े हुए उत्साह वाली, पूर्णकामा भीमकुमारी ऐसी शोभित हुई जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर रात्रि।

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