आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 76
नल का राज्य पुनः जीतना
बृहदश्व कथा को आगे बढ़ाते हैं। नल थोड़ी-सी सेना के साथ निषध लौटते हैं और पुष्कर को फिर से जुआ खेलने की चुनौती देते हैं — दमयन्ती और अपना सब कुछ एक ओर, राज्य दूसरी ओर; या फिर द्वन्द्व-युद्ध। पुष्कर दमयन्ती को जीत लेने की डींग मारता है, पर एक ही दाँव में सब हार जाता है। नल अपने पराभव का दोष पुष्कर पर नहीं, कलि पर मानते हैं; वे उसे प्राणदान देकर उसका भाग लौटा देते हैं और सम्मान के साथ उसके नगर भेज देते हैं। नगर की प्रजा हर्ष से अपने राजा का फिर स्वागत करती है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.76.1)
स मासमुष्य कौन्तेय भीममामन्त्र्य नैषधः । पुरादल्पपरीवारो जगाम निषधान्प्रति ॥
sa māsamuṣya kaunteya bhīmamāmantrya naiṣadhaḥ | purādalpaparīvāro jagāma niṣadhānprati
हे कुन्तीनन्दन, वहाँ एक मास रहकर निषधराज नल ने भीम से विदा ली और थोड़े-से अनुचरों के साथ उस नगर से निषध देश की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (3.76.2)
रथेनैकेन शुभ्रेण दन्तिभिः परिषोडशैः । पञ्चाशद्भिर्हयैश्चैव षट्शतैश्च पदातिभिः ॥
rathenaikena śubhreṇa dantibhiḥ pariṣoḍaśaiḥ | pañcāśadbhirhayaiścaiva ṣaṭśataiśca padātibhiḥ
उनके साथ एक उज्ज्वल रथ, सोलह हाथी, पचास घोड़े और छह सौ पैदल सैनिक थे।
श्लोक 3 (3.76.3)
स कम्पयन्निव महीं त्वरमाणो महापुरीम् । प्रविवेशाथ संरब्धस्तरसैव महामनाः ॥
sa kampayanniva mahīṃ tvaramāṇo mahāpurīm | praviveśātha saṃrabdhastarasaiva mahāmanāḥ
मानो पृथ्वी को कँपाते हुए, वे महामना राजा शीघ्रता से आगे बढ़े और दृढ़ संकल्प के साथ वेगपूर्वक उस महान नगरी में प्रवेश कर गए।
श्लोक 4 (3.76.4)
ततः पुष्करमासाद्य वीरसेनसुतो नलः । उवाच दीव्याव पुनर्बहुवित्तं मयाऽर्जितम् ॥
tataḥ puṣkaramāsādya vīrasenasuto nalaḥ | uvāca dīvyāva punarbahuvittaṃ mayā'rjitam
तब वीरसेन के पुत्र नल ने पुष्कर के पास जाकर कहा — "आओ, फिर से जुआ खेलें। मैंने बहुत धन अर्जित किया है।
नल उवाच
श्लोक 5 (3.76.5)
दमयन्ती च यच्चान्यन्मम किंचन विद्यते । एष वै मम संन्यासस्तव राज्यं तु पुष्कर ॥
damayantī ca yaccānyanmama kiṃcana vidyate | eṣa vai mama saṃnyāsastava rājyaṃ tu puṣkara
दमयन्ती और मेरे पास जो कुछ भी है, वह मेरा दाँव है, पुष्कर; और तुम्हारा दाँव यह राज्य है।
श्लोक 6 (3.76.6)
पुनः प्रवर्ततां द्यूतमिति मे निश्चिता मतिः । एकपाणेन भद्रं ते प्राणयोश्च पणावहे ॥
punaḥ pravartatāṃ dyūtamiti me niścitā matiḥ | ekapāṇena bhadraṃ te prāṇayośca paṇāvahe
फिर से द्यूत आरम्भ हो — यह मेरा पक्का निश्चय है। तुम्हारा कल्याण हो! हम एक ही दाँव पर खेलें और अपने प्राणों की भी बाज़ी लगाएँ।
श्लोक 7 (3.76.7)
जित्वा परस्वमाहृत्य राज्यं वा यदि वा वसु । प्रतिपाणः प्रदातव्यः प्राणो हि पणमुच्यते ॥
jitvā parasvamāhṛtya rājyaṃ vā yadi vā vasu | pratipāṇaḥ pradātavyaḥ prāṇo hi paṇamucyate
जो दूसरे का धन — राज्य हो या सम्पत्ति — जीतकर ले गया हो, उसे बदले में दाँव देना ही चाहिए; और प्राण भी दाँव कहलाते हैं।
श्लोक 8 (3.76.8)
न चेद्वाञ्छसि तद्द्यूतं युद्धद्यूतं प्रवर्तताम् । द्वैरथेनास्तु वै शान्तिस्तव वा मम वा नृप ॥
na cedvāñchasi taddyūtaṃ yuddhadyūtaṃ pravartatām | dvairathenāstu vai śāntistava vā mama vā nṛpa
यदि तुम वह जुआ नहीं चाहते, तो युद्ध का खेल आरम्भ हो। हे राजन्, रथ पर आमने-सामने के युद्ध से ही तुम्हारा या मेरा निपटारा हो जाए।
श्लोक 9 (3.76.9)
वंशभोज्यमिदं राज्यमर्थितव्यं यथा तथा । येनकेनाप्युपायेन वृद्धानामिति शासनम् ॥
vaṃśabhojyamidaṃ rājyamarthitavyaṃ yathā tathā | yenakenāpyupāyena vṛddhānāmiti śāsanam
यह राज्य हमारे वंश के भोगने के लिए है; इसे किसी भी उपाय से, जैसे भी हो, पाने का प्रयत्न करना चाहिए — ऐसा वृद्धजनों का उपदेश है।
श्लोक 10 (3.76.10)
द्वयोरेकतरे बुद्धिः क्रियतामद्य पुष्कर । कैतवेनाक्षवत्यां वा युद्धे वा नाम्यतां धनुः ॥
dvayorekatare buddhiḥ kriyatāmadya puṣkara | kaitavenākṣavatyāṃ vā yuddhe vā nāmyatāṃ dhanuḥ
पुष्कर, आज इन दोनों में से एक को चुन लो — या तो पासों की बिसात पर छल का खेल, या फिर युद्ध में धनुष तना जाए।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 11 (3.76.11)
नैषधेनैवमुक्तस्तु पुष्करः प्रहसन्निव । ध्रुवमात्मजयं मत्वा प्रत्याह निषधाधिपम् ॥
naiṣadhenaivamuktastu puṣkaraḥ prahasanniva | dhruvamātmajayaṃ matvā pratyāha niṣadhādhipam
नैषध के ऐसा कहने पर पुष्कर मानो हँसता हुआ, अपनी विजय को निश्चित मानकर, निषधराज से बोला —
पुष्कर उवाच
श्लोक 12 (3.76.12)
दिष्ट्या त्वयाऽर्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध । दिष्ट्या च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्याः क्षयं गतम् ॥
diṣṭyā tvayā'rjitaṃ vittaṃ pratipāṇāya naiṣadha | diṣṭyā ca duṣkṛtaṃ karma damayantyāḥ kṣayaṃ gatam
"सौभाग्य की बात है, नैषध, कि तुमने फिर से दाँव लगाने के लिए धन कमा लिया! सौभाग्य है कि दमयन्ती के दुष्कर्मों का फल समाप्त हो गया!
श्लोक 13 (3.76.13)
दिष्ट्या वै ध्रियसे राजन्मम लाभाय नैषध । पुनर्द्यूते च ते बुद्धिर्दिष्ट्या पुरुषसत्तम ॥
diṣṭyā vai dhriyase rājanmama lābhāya naiṣadha | punardyūte ca te buddhirdiṣṭyā puruṣasattama
हे राजन्, सौभाग्य है कि तुम अब भी जीवित हो — मेरे लाभ के लिए, नैषध! और हे पुरुषश्रेष्ठ, सौभाग्य है कि तुम्हारा मन फिर से जुआ खेलने का है!
श्लोक 14 (3.76.14)
धनेनानेन वै भैमी जितेन समलंकृता । मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सराः ॥
dhanenānena vai bhaimī jitena samalaṃkṛtā | māmupasthāsyati vyaktaṃ divi śakramivāpsarāḥ
इस धन के साथ जीती हुई, सुन्दर आभूषणों से सजी भीमकुमारी निश्चय ही मेरी सेवा में आएगी, जैसे स्वर्ग में अप्सराएँ इन्द्र की सेवा करती हैं।
श्लोक 15 (3.76.15)
नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैषध । देवने च मम प्रीतिर्भवत्येवासुहृद्गणैः ॥
nityaśo hi smarāmi tvāṃ pratīkṣe'pi ca naiṣadha | devane ca mama prītirbhavatyevāsuhṛdgaṇaiḥ
नैषध, मैं सदा तुम्हें याद करता रहा और तुम्हारी प्रतीक्षा भी करता रहा; और जुए में मुझे आनन्द तो शत्रुओं के साथ खेलकर ही आता है।
श्लोक 16 (3.76.16)
जित्वा त्वद्य वरारोहां दमयन्तीमनिन्दिताम् । कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हृदि ॥
jitvā tvadya varārohāṃ damayantīmaninditām | kṛtakṛtyo bhaviṣyāmi sā hi me nityaśo hṛdi
आज सुन्दर नितम्बों वाली, निर्दोष दमयन्ती को जीतकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा, क्योंकि वह सदा मेरे हृदय में बसी है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 17 (3.76.17)
श्रुत्वा तु तस्य ता वाचो बह्वबद्धप्रलापिनः । इयेष स शिरश्छेत्तुं खड्गेन कुपितो नलः ॥
śrutvā tu tasya tā vāco bahvabaddhapralāpinaḥ | iyeṣa sa śiraśchettuṃ khaḍgena kupito nalaḥ
उस अनर्गल बकवास करने वाले की ये बातें सुनकर नल कुपित हो उठे और तलवार से उसका सिर काट डालना चाहा।
श्लोक 18 (3.76.18)
स्मयंस्तु रोषताम्राक्षस्तमुवाच नलो नृपः । पणावः किं व्याहरसे जितो न व्याहरिष्यसि ॥
smayaṃstu roṣatāmrākṣastamuvāca nalo nṛpaḥ | paṇāvaḥ kiṃ vyāharase jito na vyāhariṣyasi
परन्तु क्रोध से लाल आँखों वाले राजा नल ने मुस्कराते हुए उससे कहा — "दाँव लगाओ। क्यों बकवास करते हो? हार जाने पर फिर नहीं बोलोगे।"
श्लोक 19 (3.76.19)
ततः प्रावर्तत द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च । एकपाणेन भद्रं ते नलेन स पराजितः ॥
tataḥ prāvartata dyūtaṃ puṣkarasya nalasya ca | ekapāṇena bhadraṃ te nalena sa parājitaḥ
तब पुष्कर और नल के बीच द्यूत आरम्भ हुआ। हे राजन्, तुम्हारा कल्याण हो — एक ही दाँव में नल ने पुष्कर को हरा दिया,
श्लोक 20 (3.76.20)
स रत्नकोशनिचयैः प्राणेन पणितोऽपि च । जित्वा च पुष्करं राजा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥
sa ratnakośanicayaiḥ prāṇena paṇito'pi ca | jitvā ca puṣkaraṃ rājā prahasannidamabravīt
यद्यपि उसने रत्नों और कोष के ढेरों के साथ अपने प्राण भी दाँव पर लगा दिए थे। पुष्कर को जीतकर राजा नल हँसते हुए यह बोले —
नल उवाच
श्लोक 21 (3.76.21)
मम सर्वमिदं राज्यमव्यग्रं हतकण्टकम् । वैदर्भी न त्वया शक्या राजापसद वीक्षितुम् । तस्यास्त्वं सपरीवारो मूढ दासत्वमागतः ॥
mama sarvamidaṃ rājyamavyagraṃ hatakaṇṭakam | vaidarbhī na tvayā śakyā rājāpasada vīkṣitum | tasyāstvaṃ saparīvāro mūḍha dāsatvamāgataḥ
"यह सारा राज्य अब मेरा है — निश्चिन्त और निष्कण्टक। अरे नीच राजा, तुम विदर्भकुमारी की ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते; मूर्ख, तुम अपने परिवार सहित उसके दास बन चुके हो।
श्लोक 22 (3.76.22)
न त्वया तत्कृतं कर्म येनाहं विजितः पुरा । कलिना तत्कृतं कर्म त्वं च मूढ न बुध्यसे ॥
na tvayā tatkṛtaṃ karma yenāhaṃ vijitaḥ purā | kalinā tatkṛtaṃ karma tvaṃ ca mūḍha na budhyase
जिस कर्म से मैं पहले हारा था, वह तुमने नहीं किया था; वह कर्म कलि ने किया था, और मूर्ख, तुम यह समझते नहीं।
श्लोक 23 (3.76.23)
नाहं परकृतं दोषं त्वय्याधास्ये कथंचन । यथासुखं वै जीव त्वं प्राणानवसृजामि ते ॥
nāhaṃ parakṛtaṃ doṣaṃ tvayyādhāsye kathaṃcana | yathāsukhaṃ vai jīva tvaṃ prāṇānavasṛjāmi te
दूसरे के किए दोष को मैं किसी भी प्रकार तुम पर नहीं डालूँगा। जैसे सुख से रहना चाहो, जियो; मैं तुम्हें प्राणदान देता हूँ।
श्लोक 24 (3.76.24)
तथैव सर्वसंभारं स्वमंशं वितरामि ते । तथैव च मम प्रीतिस्त्वयि वीर न संशयः ॥
tathaiva sarvasaṃbhāraṃ svamaṃśaṃ vitarāmi te | tathaiva ca mama prītistvayi vīra na saṃśayaḥ
इसी प्रकार मैं तुम्हारी सारी सामग्री और तुम्हारा अपना भाग भी तुम्हें लौटाता हूँ; और हे वीर, तुम पर मेरा स्नेह पहले जैसा ही है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 25 (3.76.25)
सौहार्दं चापि मे त्वत्तो न कदाचित्प्रहास्यति । पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरदः शतम् ॥
sauhārdaṃ cāpi me tvatto na kadācitprahāsyati | puṣkara tvaṃ hi me bhrātā saṃjīva śaradaḥ śatam
तुम्हारे प्रति मेरा सौहार्द भी कभी नहीं छूटेगा। पुष्कर, तुम मेरे भाई हो — सौ शरद् ऋतुओं तक जियो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 26 (3.76.26)
एवं नलः सान्त्वयित्वा भ्रातरं सत्यविक्रमः । वचनैस्तोषयामास परिष्वज्य पुनः पुनः ॥
evaṃ nalaḥ sāntvayitvā bhrātaraṃ satyavikramaḥ | vacanaistoṣayāmāsa pariṣvajya punaḥ punaḥ
इस प्रकार सत्यपराक्रमी नल ने अपने भाई को सान्त्वना दी और बार-बार उसे गले लगाकर अपनी बातों से प्रसन्न किया।
श्लोक 27 (3.76.27)
सान्त्वितो नैषधेनैवं पुष्करः प्रत्युवाच तम् । पुण्यश्लोकं तदा राजन्नभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥
sāntvito naiṣadhenaivaṃ puṣkaraḥ pratyuvāca tam | puṇyaślokaṃ tadā rājannabhivādya kṛtāñjaliḥ
हे राजन्, नैषध के इस प्रकार सान्त्वना देने पर पुष्कर ने हाथ जोड़कर पुण्यश्लोक नल को प्रणाम किया और उनसे कहा —
पुष्कर उवाच
श्लोक 28 (3.76.28)
कीर्तिरस्तु तवाक्षय्या जीव वर्षायुतं सुखी । यो मे वितरसि प्राणानधिष्ठानं च पार्थिव ॥
kīrtirastu tavākṣayyā jīva varṣāyutaṃ sukhī | yo me vitarasi prāṇānadhiṣṭhānaṃ ca pārthiva
"आपकी कीर्ति अक्षय हो! हे पृथ्वीपति, आप दस हज़ार वर्ष सुखपूर्वक जियें, जो आप मुझे प्राण और रहने का ठिकाना दे रहे हैं।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 29 (3.76.29)
स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृपः । प्रययौ पुष्करो हृष्टः स्वपुरं स्वजनावृतः ॥
sa tathā satkṛto rājñā māsamuṣya tadā nṛpaḥ | prayayau puṣkaro hṛṣṭaḥ svapuraṃ svajanāvṛtaḥ
राजा नल से इस प्रकार सत्कार पाकर राजा पुष्कर एक मास वहाँ रहा और फिर अपने स्वजनों से घिरा हुआ प्रसन्नता से अपने नगर को चला गया,
श्लोक 30 (3.76.30)
महत्या सेनया सार्धं विनीतैः परिचारकैः । भ्राजमान इवादित्यो वपुषा पुरुषर्षभ ॥
mahatyā senayā sārdhaṃ vinītaiḥ paricārakaiḥ | bhrājamāna ivādityo vapuṣā puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, विशाल सेना और विनीत सेवकों के साथ, वह शरीर से सूर्य के समान दमक रहा था।
श्लोक 31 (3.76.31)
प्रस्थाप्य पुष्करं राजा वित्तवन्तमनामयम् । प्रविवेश पुरं श्रीमानत्यर्थमुपशोभितम् ॥
prasthāpya puṣkaraṃ rājā vittavantamanāmayam | praviveśa puraṃ śrīmānatyarthamupaśobhitam
धनवान और सकुशल पुष्कर को विदा करके श्रीमान राजा नल ने अपने नगर में प्रवेश किया, जो अत्यन्त सुन्दर ढंग से सजाया गया था।
श्लोक 32 (3.76.32)
प्रविश्य सान्त्वयामास पौरांश्च निषधाधिपः । हितेषु चैषां सततं पितेवावहितोऽभवत् ॥
praviśya sāntvayāmāsa paurāṃśca niṣadhādhipaḥ | hiteṣu caiṣāṃ satataṃ pitevāvahito'bhavat
नगर में प्रवेश करके निषधराज ने पुरवासियों को सान्त्वना दी, और वे पिता की भाँति सदा उनके हित में सावधान रहने लगे।
श्लोक 33 (3.76.33)
पौरा जानपदाश्चापि संप्रहृष्टतनूरुहाः । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सामात्यप्रमुखा जनाः ॥
paurā jānapadāścāpi saṃprahṛṣṭatanūruhāḥ | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve sāmātyapramukhā janāḥ
हर्ष से रोमांचित पुरवासी और जनपदवासी, तथा मन्त्रियों के नेतृत्व में सारी प्रजा, हाथ जोड़कर बोली —
पौरा ऊचुः
श्लोक 34 (3.76.34)
अद्य स्म निर्वृता राजन्पुरे जनपदेऽपि च । उपासितुं पुनः प्राप्ता देवा इव शतक्रतुम् ॥
adya sma nirvṛtā rājanpure janapade'pi ca | upāsituṃ punaḥ prāptā devā iva śatakratum
"हे राजन्, आज हम नगर में भी और जनपद में भी निश्चिन्त हो गए हैं। हम फिर से आपकी सेवा के लिए आ पहुँचे हैं, जैसे देवता शतक्रतु इन्द्र की उपासना करते हैं।"