आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 77
नल का पुनरुत्थान; युधिष्ठिर को अक्षहृदय की प्राप्ति
दमयन्ती निषध लाई जाती हैं और नल फिर से वैभव के साथ राज्य करते हैं। बृहदश्व युधिष्ठिर को सान्त्वना देते हैं — नल ने अकेले दुःख भोगा और फिर उन्नति पाई, जबकि युधिष्ठिर के साथ उनके भाई, द्रौपदी और ब्राह्मण हैं; नल की कथा कलि का नाश करती है और कहने-सुनने वालों को समृद्धि देती है। फिर वे युधिष्ठिर को अक्षहृदय (पासों का रहस्य) प्रदान करते हैं और इस पाठ-परम्परा में संक्षेप से बताते हैं कि विश्वामित्र और वसिष्ठ की होड़ के कारण राजा हरिश्चन्द्र कैसे राज्य से गिराए गए; फिर वे विदा हो जाते हैं। अर्जुन की उग्र तपस्या का समाचार सुनकर युधिष्ठिर दुःखी होते हैं और उन्हें अक्षहृदय बताने के लिए उत्सुक रहते हैं।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.77.1)
प्रशान्ते तु पुरे हृष्टे संप्रवृत्ते महोत्सवे । महत्या सेनया राजा दमयन्तीमुपानयत् ॥
praśānte tu pure hṛṣṭe saṃpravṛtte mahotsave | mahatyā senayā rājā damayantīmupānayat
जब नगर शान्त और हर्षित हो गया और बड़ा उत्सव आरम्भ हुआ, तब राजा नल विशाल सेना के साथ दमयन्ती को ले आए।
श्लोक 2 (3.77.2)
पुण्यश्लोकं तु राज्यस्थं श्रुत्वा भीमो महीपतिः । मुदा परमया युक्तो बभूव भरतर्षभ ॥
puṇyaślokaṃ tu rājyasthaṃ śrutvā bhīmo mahīpatiḥ | mudā paramayā yukto babhūva bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, पुण्यश्लोक नल को राज्य पर प्रतिष्ठित सुनकर राजा भीम परम आनन्द से भर गए।
श्लोक 3 (3.77.3)
अथ हृष्टमना राजा महत्या सेनया सह । सुतां प्रस्थापयामास पुण्यश्लोकाय धीमते ॥
atha hṛṣṭamanā rājā mahatyā senayā saha | sutāṃ prasthāpayāmāsa puṇyaślokāya dhīmate
तब प्रसन्नचित्त राजा ने विशाल सेना के साथ अपनी पुत्री को बुद्धिमान पुण्यश्लोक के पास भेज दिया।
श्लोक 4 (3.77.4)
दमयन्तीमपि पिता सत्कृत्य परवीरहा । प्रास्थापयदमेयात्मा भीमो भीमपराक्रमः ॥
damayantīmapi pitā satkṛtya paravīrahā | prāsthāpayadameyātmā bhīmo bhīmaparākramaḥ
शत्रुवीरों का संहार करने वाले, अपरिमित आत्मबल और भयंकर पराक्रम वाले पिता भीम ने दमयन्ती का सत्कार करके उन्हें विदा किया।
श्लोक 5 (3.77.5)
आगतायां तु वैदर्भ्यां सपुत्रायां नलो नृपः । वर्तयामास मुदितो देवराडिव नन्दने ॥
āgatāyāṃ tu vaidarbhyāṃ saputrāyāṃ nalo nṛpaḥ | vartayāmāsa mudito devarāḍiva nandane
विदर्भकुमारी के अपनी सन्तानों के साथ आ जाने पर राजा नल ऐसे आनन्द से रहने लगे, जैसे देवराज इन्द्र नन्दन वन में रहते हैं।
श्लोक 6 (3.77.6)
तथा प्रकाशतां यातो जम्बूद्वीपे स राजसु । पुनः स्वे चावसद्राज्ये प्रत्याहृत्य महायशाः ॥
tathā prakāśatāṃ yāto jambūdvīpe sa rājasu | punaḥ sve cāvasadrājye pratyāhṛtya mahāyaśāḥ
इस प्रकार वे महायशस्वी राजा अपना राज्य वापस लेकर जम्बूद्वीप के राजाओं में प्रसिद्ध हुए और फिर से अपने राज्य में रहने लगे।
श्लोक 7 (3.77.7)
ईजे च विविधैर्यज्ञैर्विधिवच्चाप्तदक्षिणैः । तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुहृद्वक्ष्यसेऽचिरात् ॥
īje ca vividhairyajñairvidhivaccāptadakṣiṇaiḥ | tathā tvamapi rājendra sasuhṛdvakṣyase'cirāt
उन्होंने विधिपूर्वक उचित दक्षिणाओं वाले अनेक प्रकार के यज्ञ किए। हे राजेन्द्र, आप भी शीघ्र ही अपने सुहृदों के साथ फिर से शोभा पाएँगे।
श्लोक 8 (3.77.8)
दुःखमेतादृशं प्राप्तो नलः परपुरंजयः । देवनेन नरश्रेष्ठ सभार्यो भरतर्षभ ॥
duḥkhametādṛśaṃ prāpto nalaḥ parapuraṃjayaḥ | devanena naraśreṣṭha sabhāryo bharatarṣabha
हे नरश्रेष्ठ, हे भरतर्षभ, शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले नल ने पत्नी सहित जुए के कारण ऐसा दुःख पाया था।
श्लोक 9 (3.77.9)
एकाकिनैव सुमहन्नलेन पृथिवीपते । दुःखमासादितं घोरं प्राप्तश्चाभ्युदयः पुनः ॥
ekākinaiva sumahannalena pṛthivīpate | duḥkhamāsāditaṃ ghoraṃ prāptaścābhyudayaḥ punaḥ
हे पृथ्वीपति, नल ने वह महान और भयंकर दुःख अकेले ही भोगा, और फिर भी उन्हें पुनः अभ्युदय प्राप्त हुआ।
श्लोक 10 (3.77.10)
त्वं पुनर्भ्रातृसहितः कृष्णया चैव पाण्डव । कथाश्चापि समाकर्ण्य धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥
tvaṃ punarbhrātṛsahitaḥ kṛṣṇayā caiva pāṇḍava | kathāścāpi samākarṇya dharmamevānucintayan
परन्तु हे पाण्डुनन्दन, आप तो भाइयों और कृष्णा (द्रौपदी) के साथ हैं; आप कथाएँ सुनते हैं और धर्म का ही चिन्तन करते हैं।
श्लोक 11 (3.77.11)
ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः । नित्यमन्वास्यसे राजंस्तत्र का परिदेवना ॥
brāhmaṇaiśca mahābhāgairvedavedāṅgapāragaiḥ | nityamanvāsyase rājaṃstatra kā paridevanā
हे राजन्, वेद और वेदांगों में पारंगत महाभाग ब्राह्मण सदा आपके साथ रहते हैं; फिर विलाप का क्या कारण है?
श्लोक 12 (3.77.12)
कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च । ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम् ॥
karkoṭakasya nāgasya damayantyā nalasya ca | ṛtuparṇasya rājarṣeḥ kīrtanaṃ kalināśanam
नाग कर्कोटक, दमयन्ती, नल और राजर्षि ऋतुपर्ण का कीर्तन कलि का नाश करने वाला है।
श्लोक 13 (3.77.13)
इतिहासमिमं चापि कलिनाशनमच्युत । शक्यमाश्वसितुं श्रुत्वा त्वद्विधेन विशांपते ॥
itihāsamimaṃ cāpi kalināśanamacyuta | śakyamāśvasituṃ śrutvā tvadvidhena viśāṃpate
हे अच्युत, यह इतिहास भी कलि का नाश करने वाला है; हे प्रजापालक, इसे सुनकर आप जैसा व्यक्ति धीरज पा सकता है।
श्लोक 14 (3.77.14)
अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा । तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि ॥
asthiratvaṃ ca saṃcintya puruṣārthasya nityadā | tasyodaye vyaye cāpi na cintayitumarhasi
मनुष्य के पुरुषार्थ (सुख-सम्पत्ति) को सदा अस्थिर समझकर आपको उसके उदय और व्यय की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 15 (3.77.15)
श्रुत्वेतिहासं नृपते समाश्वसिहि मा शुचः । व्यसने त्वं महाराज न विषीदितुमर्हसि ॥
śrutvetihāsaṃ nṛpate samāśvasihi mā śucaḥ | vyasane tvaṃ mahārāja na viṣīditumarhasi
हे राजन्, यह इतिहास सुनकर धीरज रखिए, शोक मत कीजिए। हे महाराज, संकट में आपको विषाद नहीं करना चाहिए।
श्लोक 16 (3.77.16)
विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते । विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वापाश्रयिणो नराः ॥
viṣamāvasthite daive pauruṣe'phalatāṃ gate | viṣādayanti nātmānaṃ sattvāpāśrayiṇo narāḥ
जब दैव प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाए, तब भी सत्त्व (धैर्य) का आश्रय लेने वाले मनुष्य अपने को विषाद में नहीं डुबोते।
श्लोक 17 (3.77.17)
ये चेदं कथयिष्यन्ति नलस्य चरितं महत् । श्रोष्यन्ति चाप्यभीक्ष्णं वै नालक्ष्मीस्तान्भजिष्यति ॥
ye cedaṃ kathayiṣyanti nalasya caritaṃ mahat | śroṣyanti cāpyabhīkṣṇaṃ vai nālakṣmīstānbhajiṣyati
जो लोग नल के इस महान चरित्र को कहेंगे और जो इसे बार-बार सुनेंगे, उनके पास दरिद्रता (अलक्ष्मी) नहीं आएगी।
श्लोक 18 (3.77.18)
अर्थास्तस्योपपत्स्यन्ते धन्यतां च गमिष्यति । इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्वदुत्तमम् ॥
arthāstasyopapatsyante dhanyatāṃ ca gamiṣyati | itihāsamimaṃ śrutvā purāṇaṃ śaśvaduttamam
इस प्राचीन और सदा उत्तम इतिहास को सुनकर मनुष्य को धन प्राप्त होगा और वह धन्य हो जाएगा।
श्लोक 19 (3.77.19)
पुत्रान्पौत्रान्पशूंश्चापि लभते नृषु चाग्र्यताम् । आरोग्यप्रीतिमांश्चैव भविष्यति न संशयः ॥
putrānpautrānpaśūṃścāpi labhate nṛṣu cāgryatām | ārogyaprītimāṃścaiva bhaviṣyati na saṃśayaḥ
वह पुत्र, पौत्र और पशु पाता है तथा मनुष्यों में श्रेष्ठता प्राप्त करता है; वह निःसंदेह आरोग्य और प्रसन्नता से युक्त होगा।
श्लोक 20 (3.77.20)
भयात्त्रस्यसि यच्च त्वमाह्वयिष्यति मां पुनः । अक्षज्ञ इति तत्तेऽहं नाशयिष्यामि पार्थिव ॥
bhayāttrasyasi yacca tvamāhvayiṣyati māṃ punaḥ | akṣajña iti tatte'haṃ nāśayiṣyāmi pārthiva
और हे पृथ्वीपति, आप जिस भय से काँपते हैं कि कोई पासों का जानकार आपको फिर से जुए के लिए बुलाएगा, उस भय को मैं नष्ट कर दूँगा।
श्लोक 21 (3.77.21)
वेदाक्षहृदयं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रम । उपपद्यस्व कौन्तेय प्रसन्नोऽहं ब्रवीमि ते ॥
vedākṣahṛdayaṃ kṛtsnamahaṃ satyaparākrama | upapadyasva kaunteya prasanno'haṃ bravīmi te
हे सत्यपराक्रमी, मैं पासों का सम्पूर्ण रहस्य (अक्षहृदय) जानता हूँ। हे कुन्तीनन्दन, इसे ग्रहण कीजिए; मैं प्रसन्न होकर आपको बता रहा हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (3.77.22)
ततो हृष्टमना राजा बृहदश्वमुवाच ह । भगवन्नक्षहृदयं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
tato hṛṣṭamanā rājā bṛhadaśvamuvāca ha | bhagavannakṣahṛdayaṃ jñātumicchāmi tattvataḥ
तब प्रसन्नचित्त राजा युधिष्ठिर ने बृहदश्व से कहा — "भगवन्, मैं अक्षहृदय को ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ।"
श्लोक 23 (3.77.23)
कौन्तेयेनैवमुक्तस्तु बृहदश्वो महामुनिः । ततोऽक्षहृदयं प्रादात्पाण्डवाय महात्मने । लब्ध्वा च पाण्डवो राजा विशोकः समपद्यत ॥
kaunteyenaivamuktastu bṛhadaśvo mahāmuniḥ | tato'kṣahṛdayaṃ prādātpāṇḍavāya mahātmane | labdhvā ca pāṇḍavo rājā viśokaḥ samapadyata
कुन्तीपुत्र के ऐसा कहने पर महामुनि बृहदश्व ने महात्मा पाण्डुपुत्र को अक्षहृदय प्रदान किया; और उसे पाकर राजा युधिष्ठिर शोकरहित हो गए।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 24 (3.77.24)
पुनरेव तु वक्ष्यामि यस्त्वत्तो दुःखितो नृपः । तं शृणुष्व महाराज सर्वदुःखापनुत्तये ॥
punareva tu vakṣyāmi yastvatto duḥkhito nṛpaḥ | taṃ śṛṇuṣva mahārāja sarvaduḥkhāpanuttaye
मैं फिर एक ऐसे राजा की कथा कहूँगा जो आपसे भी अधिक दुःखी हुआ था। हे महाराज, सब दुःखों को दूर करने के लिए उसे सुनिए।
श्लोक 25 (3.77.25)
इक्ष्वाकूणां कुले जातो महात्मा पृथिवीपतिः । त्रिशङ्कुरिति विख्यातो राजराजो महाद्युतिः ॥
ikṣvākūṇāṃ kule jāto mahātmā pṛthivīpatiḥ | triśaṅkuriti vikhyāto rājarājo mahādyutiḥ
इक्ष्वाकुओं के कुल में त्रिशंकु नाम से विख्यात एक महात्मा, महातेजस्वी, राजाओं के राजा पृथ्वीपति उत्पन्न हुए।
श्लोक 26 (3.77.26)
हरिश्चन्द्रस्ततो जज्ञे गुणरत्नाकरो नृपात् । ततो विशेषैर्विविधैर्यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः ॥
hariścandrastato jajñe guṇaratnākaro nṛpāt | tato viśeṣairvividhairyajñairvipuladakṣiṇaiḥ
उन राजा से हरिश्चन्द्र उत्पन्न हुए, जो गुणरूपी रत्नों के सागर थे। फिर अनेक प्रकार के विशिष्ट, प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों के द्वारा
श्लोक 27 (3.77.27)
स तु लोके वरः पुंसां पुण्यश्लोको महायशाः । सत्यवादी मधुरवाक्सत्येन बहुभाषिता ॥
sa tu loke varaḥ puṃsāṃ puṇyaśloko mahāyaśāḥ | satyavādī madhuravāksatyena bahubhāṣitā
वे संसार में पुरुषों में श्रेष्ठ, पुण्यश्लोक और महायशस्वी हुए; वे सत्यवादी और मधुरभाषी थे, और जो भी बहुत कुछ कहते, सत्य के साथ ही कहते थे।
श्लोक 28 (3.77.28)
तस्य भार्याऽभवद्भूमौ सौशील्यसमलंकृता । उशीनरस्य राजर्षेर्दुहिता पुण्यलक्षणा ॥
tasya bhāryā'bhavadbhūmau sauśīlyasamalaṃkṛtā | uśīnarasya rājarṣerduhitā puṇyalakṣaṇā
पृथ्वी पर उनकी पत्नी राजर्षि उशीनर की पुत्री थीं, जो सुशीलता से अलंकृत और शुभ लक्षणों वाली थीं।
श्लोक 29 (3.77.29)
स्वयंवरे महाभागं वरयामास भामिनी । हरिश्चन्द्रं समेतानां राज्ञां मध्ये पतिं विभुम् ॥
svayaṃvare mahābhāgaṃ varayāmāsa bhāminī | hariścandraṃ sametānāṃ rājñāṃ madhye patiṃ vibhum
उस सुन्दरी ने स्वयंवर में एकत्र राजाओं के बीच महाभाग, सामर्थ्यवान हरिश्चन्द्र को पति के रूप में चुना।
श्लोक 30 (3.77.30)
तया सह महीपालः सत्यवत्या मनोज्ञया । रेमे च सुचिरं कालं राजा राज्यमवाप्य च ॥
tayā saha mahīpālaḥ satyavatyā manojñayā | reme ca suciraṃ kālaṃ rājā rājyamavāpya ca
उस मनोहर सत्यवती के साथ वे भूपाल राज्य पाकर बहुत समय तक आनन्द से रहे।
श्लोक 31 (3.77.31)
तस्यां देव्यां हरिश्चन्द्राज्जज्ञे राजीवलोचनः । पुत्रः पुण्यवतां श्रेष्ठो लोहिताश्व इति श्रुतः ॥
tasyāṃ devyāṃ hariścandrājjajñe rājīvalocanaḥ | putraḥ puṇyavatāṃ śreṣṭho lohitāśva iti śrutaḥ
उस रानी से हरिश्चन्द्र को कमलनयन पुत्र हुआ, जो पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ था और लोहिताश्व नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 32 (3.77.32)
देव्या पुत्रेण सहितः पुण्यश्लोको महायशाः । वसिष्ठयाज्यो नृपतिरीजे पुण्यैर्महाध्वरैः ॥
devyā putreṇa sahitaḥ puṇyaśloko mahāyaśāḥ | vasiṣṭhayājyo nṛpatirīje puṇyairmahādhvaraiḥ
रानी और पुत्र के साथ उन पुण्यश्लोक, महायशस्वी राजा ने, जिनके यज्ञ वसिष्ठ कराते थे, पवित्र महायज्ञ किए।
श्लोक 33 (3.77.33)
एतस्मिन्नेव काले तु विश्वामित्रो दिवं गतः । पुरुहूतपुरीं रम्यामाजगामेन्द्रसेवया ॥
etasminneva kāle tu viśvāmitro divaṃ gataḥ | puruhūtapurīṃ ramyāmājagāmendrasevayā
उसी समय विश्वामित्र स्वर्ग गए और इन्द्र की सेवा के लिए उनकी रमणीय पुरी में पहुँचे।
श्लोक 34 (3.77.34)
उपस्थाने च संवृत्ते देवेन्द्रस्य महात्मनः । आजगाम वसिष्ठोऽपि वामदेवसहायवान् ॥
upasthāne ca saṃvṛtte devendrasya mahātmanaḥ | ājagāma vasiṣṭho'pi vāmadevasahāyavān
जब महात्मा देवराज की सभा जुटी, तब वामदेव के साथ वसिष्ठ भी वहाँ आए।
श्लोक 35 (3.77.35)
उपस्थाने च संवृत्ते सुखासीने पुरंदरे । वर्ण्यमानेषु च तदा सत्यवादिषु राजसु ॥
upasthāne ca saṃvṛtte sukhāsīne puraṃdare | varṇyamāneṣu ca tadā satyavādiṣu rājasu
सभा जुटने पर, जब इन्द्र सुख से विराजमान थे और सत्यवादी राजाओं का गुणगान हो रहा था,
श्लोक 36 (3.77.36)
तस्यां संसदि सर्वस्माद्धरिश्चन्द्रोऽपि पप्रथे । यज्ञदानतपःशीलसत्यवाक्यदृढव्रतैः ॥
tasyāṃ saṃsadi sarvasmāddhariścandro'pi paprathe | yajñadānatapaḥśīlasatyavākyadṛḍhavrataiḥ
उस सभा में यज्ञ, दान, तप, शील, सत्य वचन और दृढ़ व्रतों के कारण हरिश्चन्द्र की ख्याति सबसे बढ़कर हुई।
श्लोक 37 (3.77.37)
वसिष्ठः परमप्रीतः स्वयाज्यपरिकीर्तनात् । तथापि विश्वामित्रस्तं न सेहे सत्यभूषितम् ॥
vasiṣṭhaḥ paramaprītaḥ svayājyaparikīrtanāt | tathāpi viśvāmitrastaṃ na sehe satyabhūṣitam
अपने यजमान का गुणगान सुनकर वसिष्ठ अत्यन्त प्रसन्न हुए; परन्तु विश्वामित्र सत्य से विभूषित उस राजा को सहन न कर सके।
श्लोक 38 (3.77.38)
हरिश्चन्द्रं प्रति तदा विश्वामित्रवसिष्ठयोः । पणः कृतस्तदा पश्चाद्विश्वामित्रेण पार्थिवः ॥
hariścandraṃ prati tadā viśvāmitravasiṣṭhayoḥ | paṇaḥ kṛtastadā paścādviśvāmitreṇa pārthivaḥ
तब हरिश्चन्द्र को लेकर विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच होड़ लगी; और उसके बाद विश्वामित्र के द्वारा वह राजा
श्लोक 39 (3.77.39)
राज्याच्चापि सुखाच्चापि सहसा चावरोपितः । अवाप परमं दुःखं मरणादमनोहरम् ॥
rājyāccāpi sukhāccāpi sahasā cāvaropitaḥ | avāpa paramaṃ duḥkhaṃ maraṇādamanoharam
सहसा राज्य से और सुख से भी गिरा दिए गए, और उन्होंने मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक परम दुःख पाया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (3.77.40)
तच्छ्रुत्वा परमप्रीतो धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिर्ब्राह्मणैश्चैव द्रौपद्या च समन्वितः । विस्मयं परमं गत्वा साधुसाध्वित्यभाषत ॥
tacchrutvā paramaprīto dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṛbhirbrāhmaṇaiścaiva draupadyā ca samanvitaḥ | vismayaṃ paramaṃ gatvā sādhusādhvityabhāṣata
यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, ब्राह्मणों और द्रौपदी के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुए और परम विस्मय में भरकर बोले — "साधु, साधु!"
श्लोक 41 (3.77.41)
ततो हरिश्चन्द्रकथां च सर्वे । श्रुत्वा तु राजा मनुजेन्द्रकेतुः । विहाय शोकं विजहार भूयः । स्मरन्हरिश्चन्द्रमनन्तकीर्तिम् ॥
tato hariścandrakathāṃ ca sarve | śrutvā tu rājā manujendraketuḥ | vihāya śokaṃ vijahāra bhūyaḥ | smaranhariścandramanantakīrtim
तब सबके साथ हरिश्चन्द्र की कथा सुनकर, नरेन्द्रों में ध्वजा के समान राजा युधिष्ठिर ने शोक त्याग दिया और अनन्त कीर्ति वाले हरिश्चन्द्र का स्मरण करते हुए फिर से आनन्दपूर्वक विचरने लगे।
श्लोक 42 (3.77.42)
कथामेवं तथा कृत्वा हरिश्चन्द्रनलाश्रयाम् । आमन्त्र्य पाण्डवान्सर्वान्बृहदश्वो जगाम ह । उक्त्वा चाशु सरोऽगच्छदुपस्प्रष्टुं महातपाः ॥
kathāmevaṃ tathā kṛtvā hariścandranalāśrayām | āmantrya pāṇḍavānsarvānbṛhadaśvo jagāma ha | uktvā cāśu saro'gacchadupaspraṣṭuṃ mahātapāḥ
इस प्रकार हरिश्चन्द्र और नल की कथा सुनाकर बृहदश्व सब पाण्डवों से विदा लेकर चले गए; बात पूरी करके वे महातपस्वी स्नान-आचमन के लिए शीघ्र सरोवर की ओर चले गए।
श्लोक 43 (3.77.43)
बृहदश्वे गते पार्थमश्रौषीत्सव्यसाचिनम् । वर्तमानं तपस्युग्रे वायुभक्षं मनीषिणम् ॥
bṛhadaśve gate pārthamaśrauṣītsavyasācinam | vartamānaṃ tapasyugre vāyubhakṣaṃ manīṣiṇam
बृहदश्व के चले जाने पर युधिष्ठिर ने सुना कि बुद्धिमान सव्यसाची पार्थ उग्र तपस्या में लगे हैं और केवल वायु पर रह रहे हैं।
श्लोक 44 (3.77.44)
ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यः संपतद्भ्यस्ततस्ततः । तीर्थशैलवनेभ्यश्च समेतेभ्यो दृढव्रतः ॥
brāhmaṇebhyastapasvibhyaḥ saṃpatadbhyastatastataḥ | tīrthaśailavanebhyaśca sametebhyo dṛḍhavrataḥ
दृढव्रती राजा ने यह बात उन ब्राह्मणों और तपस्वियों से सुनी जो तीर्थों, पर्वतों और वनों से इधर-उधर से आकर वहाँ एकत्र हुए थे —
श्लोक 45 (3.77.45)
इति पार्थो महाबाहुर्दुरापं तप आस्थितः । न तथा दृष्टपूर्वोऽन्यः कश्चिदुग्रतपा इति ॥
iti pārtho mahābāhurdurāpaṃ tapa āsthitaḥ | na tathā dṛṣṭapūrvo'nyaḥ kaścidugratapā iti
"इस प्रकार महाबाहु पार्थ दुष्कर तप में लगे हैं। ऐसा उग्र तपस्वी पहले कभी कोई नहीं देखा गया
श्लोक 46 (3.77.46)
यथा धनंजयः पार्थस्तपस्वी नियतव्रतः । मुनिरेकचरः श्रीमान्धर्मो विग्रहवानिव ॥
yathā dhanaṃjayaḥ pārthastapasvī niyatavrataḥ | munirekacaraḥ śrīmāndharmo vigrahavāniva
जैसे पार्थ धनंजय हैं — नियमपूर्वक व्रत पालने वाले तपस्वी, अकेले विचरने वाले श्रीमान मुनि, मानो देहधारी धर्म।"
श्लोक 47 (3.77.47)
तं श्रुत्वा पाण्डवो राजंस्तप्यमानं महावने । अन्वशोचत कौन्तेयः प्रियं वै भ्रातरं जयम् ॥
taṃ śrutvā pāṇḍavo rājaṃstapyamānaṃ mahāvane | anvaśocata kaunteyaḥ priyaṃ vai bhrātaraṃ jayam
हे राजन्, उन्हें महावन में तप करते सुनकर कुन्तीपुत्र पाण्डव युधिष्ठिर अपने प्रिय भाई जय (अर्जुन) के लिए शोक करने लगे।
श्लोक 48 (3.77.48)
दह्यमानेन तु हृदा शरणार्थी महावने । ब्राह्मणान्विविधज्ञानान्पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ॥
dahyamānena tu hṛdā śaraṇārthī mahāvane | brāhmaṇānvividhajñānānparyapṛcchadyudhiṣṭhiraḥ
जलते हुए हृदय से, उस महावन में सहारा ढूँढते हुए युधिष्ठिर ने विविध ज्ञान वाले ब्राह्मणों से प्रश्न किए।
श्लोक 49 (3.77.49)
प्रतिगृह्याक्षहृदयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । आसीद्धृष्टमना राजन्भीमसेनादिभिर्युतः ॥
pratigṛhyākṣahṛdayaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | āsīddhṛṣṭamanā rājanbhīmasenādibhiryutaḥ
हे राजन्, अक्षहृदय ग्रहण करके कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर भीमसेन आदि के साथ प्रसन्नचित्त थे।
श्लोक 50 (3.77.50)
स्वभ्रातॄन्सहितान्पश्यन्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अपश्यन्नर्जुनं तत्र बभूवाश्रुपरिप्लुतः ॥
svabhrātṝnsahitānpaśyankuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | apaśyannarjunaṃ tatra babhūvāśrupariplutaḥ
पर अपने भाइयों को एक साथ देखकर और वहाँ अर्जुन को न देखकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर की आँखें आँसुओं से भर आईं।
श्लोक 51 (3.77.51)
संतप्यमानः कौन्तेयो भीमसेनमुवाच ह । कदा द्रक्ष्यामि वै भीम पार्थमत्र तवानुजम् ॥
saṃtapyamānaḥ kaunteyo bhīmasenamuvāca ha | kadā drakṣyāmi vai bhīma pārthamatra tavānujam
संतप्त होकर कुन्तीपुत्र ने भीमसेन से कहा — "भीम, मैं तुम्हारे छोटे भाई पार्थ को यहाँ फिर कब देखूँगा?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 52 (3.77.52)
मत्कृते हि कुरुश्रेष्ठ तप्यते परमं तपः । तस्याक्षहृदयज्ञानमाख्यास्यामि कदा न्वहम् ॥
matkṛte hi kuruśreṣṭha tapyate paramaṃ tapaḥ | tasyākṣahṛdayajñānamākhyāsyāmi kadā nvaham
हे कुरुश्रेष्ठ, मेरे ही लिए तो वह परम तप कर रहा है। मैं उसे अक्षहृदय का ज्ञान कब बताऊँगा?
श्लोक 53 (3.77.53)
स हि श्रुत्वाऽक्षहृदयं समुपात्तं मया विभो । प्रहृष्टः पुरुषव्याघ्रो भविष्यति न संशयः ॥
sa hi śrutvā'kṣahṛdayaṃ samupāttaṃ mayā vibho | prahṛṣṭaḥ puruṣavyāghro bhaviṣyati na saṃśayaḥ
हे विभो, जब वह सुनेगा कि मैंने अक्षहृदय प्राप्त कर लिया है, तब वह पुरुषसिंह निःसंदेह अत्यन्त प्रसन्न होगा।"