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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 78

काम्यक वन में अर्जुन के बिना पाण्डवों की व्याकुलता

जनमेजय पूछते हैं कि अर्जुन के चले जाने पर काम्यक वन में पाण्डवों ने क्या किया। वैशम्पायन बताते हैं कि वे बिना आनन्द के वहाँ रहते रहे, शिकार करते और ब्राह्मणों के लिए वन का आहार जुटाते रहे। द्रौपदी विलाप करती हैं कि अर्जुन के बिना वन की शोभा चली गई है; फिर भीम, नकुल और सहदेव भी बारी-बारी से उनकी विशाल भुजाओं और उनके पराक्रम — उत्तर-दिग्विजय और राजसूय से लेकर सुभद्रा-हरण और द्रोण की गुरुदक्षिणा तक — को याद करते हैं, और कहते हैं कि उनके बिना यह वन उन्हें तनिक भी नहीं भाता।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.78.1)

भगवन्काम्यकात्पार्थे गते मे प्रपितामहे । पाण्डवाः किमकुर्वंस्ते तमृते सव्यसाचिनम् ॥

bhagavankāmyakātpārthe gate me prapitāmahe | pāṇḍavāḥ kimakurvaṃste tamṛte savyasācinam

भगवन्, जब मेरे प्रपितामह पार्थ काम्यक वन से चले गए, तब सव्यसाची के बिना पाण्डवों ने क्या किया?

श्लोक 2 (3.78.2)

स हि तेषां महेष्वासो गतिरासीदनीकजित् । आदित्यानां यथा विष्णुस्तथैव प्रतिभाति मे ॥

sa hi teṣāṃ maheṣvāso gatirāsīdanīkajit | ādityānāṃ yathā viṣṇustathaiva pratibhāti me

वे महाधनुर्धर, सेनाओं को जीतने वाले, उनके आश्रय थे; मुझे लगता है कि वे उनके बीच वैसे ही थे जैसे आदित्यों में विष्णु।

श्लोक 3 (3.78.3)

तेनेन्द्रसमवीर्येण संग्रामेष्वनिवर्तिना । विनाभूता वने वीराः कथमासन्पितामहाः ॥

tenendrasamavīryeṇa saṃgrāmeṣvanivartinā | vinābhūtā vane vīrāḥ kathamāsanpitāmahāḥ

इन्द्र के समान पराक्रमी, युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले उस वीर से बिछुड़कर मेरे वीर पितामह वन में कैसे रहे?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (3.78.4)

गते तु पाण्डवे तात काम्यकात्सव्यसाचिनि । बभूवुः कौरवेयास्ते दुःखशोकपरायणाः ॥

gate tu pāṇḍave tāta kāmyakātsavyasācini | babhūvuḥ kauraveyāste duḥkhaśokaparāyaṇāḥ

तात, जब पाण्डुपुत्र सव्यसाची काम्यक वन से चले गए, तब वे कुरुवंशी दुःख और शोक में डूब गए।

श्लोक 5 (3.78.5)

आक्षिप्तसूत्रा मणयश्छिन्नपक्षा इवाण्डजाः । अप्रीतमनसः सर्वे बभूवुरथ पाण्डवाः ॥

ākṣiptasūtrā maṇayaśchinnapakṣā ivāṇḍajāḥ | aprītamanasaḥ sarve babhūvuratha pāṇḍavāḥ

जैसे धागा टूट जाने पर मणियाँ बिखर जाती हैं और पंख कट जाने पर पक्षी असहाय हो जाते हैं, वैसे ही सब पाण्डव तब उदास मन वाले हो गए।

श्लोक 6 (3.78.6)

वनं तु तदभूत्तेन हीनमक्लिष्टकर्मणा । कुबेरेण यथाहीनं वनं चैत्ररथं तथा ॥

vanaṃ tu tadabhūttena hīnamakliṣṭakarmaṇā | kubereṇa yathāhīnaṃ vanaṃ caitrarathaṃ tathā

अथक कर्म करने वाले उन अर्जुन के बिना वह वन वैसा ही हो गया, जैसे कुबेर के बिना चैत्ररथ वन।

श्लोक 7 (3.78.7)

तमृते ते नरव्याघ्राः पाण्डवा जनमेजय । मुदमप्राप्नुवन्तो वै काम्यके न्यवसंस्तदा ॥

tamṛte te naravyāghrāḥ pāṇḍavā janamejaya | mudamaprāpnuvanto vai kāmyake nyavasaṃstadā

हे जनमेजय, उनके बिना वे नरश्रेष्ठ पाण्डव आनन्द न पाते हुए भी तब काम्यक वन में रहते रहे।

श्लोक 8 (3.78.8)

ब्राह्मणार्थे पराक्रान्ताः शुद्धैर्वाणैर्महारथाः । निघ्नन्तो भरतश्रेष्ठ मेध्यान्बहुविधान्मृगान् ॥

brāhmaṇārthe parākrāntāḥ śuddhairvāṇairmahārathāḥ | nighnanto bharataśreṣṭha medhyānbahuvidhānmṛgān

हे भरतश्रेष्ठ, वे महारथी ब्राह्मणों के लिए पराक्रम करते हुए शुद्ध बाणों से अनेक प्रकार के यज्ञ-योग्य मृगों का शिकार करते थे।

श्लोक 9 (3.78.9)

नित्यं हि पुरुषव्याघ्रा वन्याहारमरिंदमाः । प्रविसृत्य समाहृत्य ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् ॥

nityaṃ hi puruṣavyāghrā vanyāhāramariṃdamāḥ | pravisṛtya samāhṛtya brāhmaṇebhyo nyavedayan

वे शत्रुदमन नरश्रेष्ठ प्रतिदिन चारों ओर जाकर वन का आहार इकट्ठा करते और ब्राह्मणों को अर्पित करते थे।

श्लोक 10 (3.78.10)

एवं ते न्यवसंस्तत्र सोत्कण्ठाः पुरुषर्षभाः । अहृष्टमनसः सर्वे गते राजन्धनंजये ॥

evaṃ te nyavasaṃstatra sotkaṇṭhāḥ puruṣarṣabhāḥ | ahṛṣṭamanasaḥ sarve gate rājandhanaṃjaye

हे राजन्, धनंजय के चले जाने पर वे सब पुरुषश्रेष्ठ इस प्रकार उत्कण्ठित और उदास मन से वहाँ रहने लगे।

श्लोक 11 (3.78.11)

अथ विप्रोषितं राजन्पाञ्चाली मध्यमं पतिम् । स्मरन्ती पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् ॥

atha viproṣitaṃ rājanpāñcālī madhyamaṃ patim | smarantī pāṇḍavaśreṣṭhamidaṃ vacanamabravīt

हे राजन्, तब पाञ्चाली ने परदेश गए अपने मँझले पति, पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन को याद करते हुए यह बात कही —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 12 (3.78.12)

योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना । तमृते पाण्डवश्रेष्ठं वनं न प्रतिभाति मे ॥

yo'rjunenārjunastulyo dvibāhurbahubāhunā | tamṛte pāṇḍavaśreṣṭhaṃ vanaṃ na pratibhāti me

जो दो भुजाओं वाले होकर भी सहस्रबाहु अर्जुन (कार्तवीर्य) के समान हैं, उन पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन के बिना यह वन मुझे अच्छा नहीं लगता।

श्लोक 13 (3.78.13)

शून्यामिव प्रपश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम् । बह्वाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम् ॥

śūnyāmiva prapaśyāmi tatra tatra mahīmimām | bahvāścaryamidaṃ cāpi vanaṃ kusumitadrumam

जहाँ-जहाँ देखती हूँ, यह पृथ्वी मुझे सूनी-सी दिखती है; और यह अनेक आश्चर्यों से भरा, फूलों से लदे वृक्षों वाला वन भी

श्लोक 14 (3.78.14)

न तथा रमणीयं वै तमृते सव्यसाचिनम् । नीलाम्बुदसमप्रख्यं मत्तमातङ्गगामिनम् ॥

na tathā ramaṇīyaṃ vai tamṛte savyasācinam | nīlāmbudasamaprakhyaṃ mattamātaṅgagāminam

सव्यसाची के बिना वैसा रमणीय नहीं लगता। नीले मेघ के समान कान्ति वाले, मतवाले हाथी की-सी चाल वाले,

श्लोक 15 (3.78.15)

तमृते पुण्डरीकाक्षं काम्यकं नातिभाति मे । यस्य वा धनुषो घोषः श्रूयते चाशनिस्वनः । न लभे शर्म वै राजन्स्मरन्ती सव्यसाचिनम् ॥

tamṛte puṇḍarīkākṣaṃ kāmyakaṃ nātibhāti me | yasya vā dhanuṣo ghoṣaḥ śrūyate cāśanisvanaḥ | na labhe śarma vai rājansmarantī savyasācinam

उन कमलनयन के बिना काम्यक वन मुझे नहीं सुहाता। हे राजन्, जिनके धनुष की टंकार वज्र की गर्जना-सी सुनाई देती है, उन सव्यसाची को याद करते हुए मुझे चैन नहीं मिलता।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.78.16)

तथा लालप्यमानां तां निशाम्य परवीरहा । भीमसेनो महाराज द्रौपदीमिदमब्रवीत् ॥

tathā lālapyamānāṃ tāṃ niśāmya paravīrahā | bhīmaseno mahārāja draupadīmidamabravīt

हे महाराज, उसे इस प्रकार विलाप करते सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले भीमसेन ने द्रौपदी से यह कहा —

भीम उवाच

श्लोक 17 (3.78.17)

मनःप्रीतिकरं भद्रे यद्ब्रवीषि सुमध्यमे । तन्मे प्रीणाति हृदयममृतप्राशनोपमम् ॥

manaḥprītikaraṃ bhadre yadbravīṣi sumadhyame | tanme prīṇāti hṛdayamamṛtaprāśanopamam

भद्रे, सुन्दर कटि वाली, तुम जो कह रही हो वह मन को प्रसन्न करने वाला है; वह अमृत पीने के समान मेरे हृदय को तृप्त करता है।

श्लोक 18 (3.78.18)

यस्य दीर्घौ समौ पीनौ भुजौ परिघसन्निभौ । मौर्वीकृतकिणौ वृत्तौ खड्गायुधधनुर्धरौ ॥

yasya dīrghau samau pīnau bhujau parighasannibhau | maurvīkṛtakiṇau vṛttau khaḍgāyudhadhanurdharau

जिनकी दोनों भुजाएँ लम्बी, बराबर, पुष्ट, परिघ के समान, गोल, प्रत्यंचा की रगड़ से घट्टेदार, और तलवार, अस्त्र तथा धनुष धारण करने वाली हैं,

श्लोक 19 (3.78.19)

निष्काङ्गदकृतापीडौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ । तमृते पुरुषव्याघ्रं नष्टसूर्यमिवाम्बरम् ॥

niṣkāṅgadakṛtāpīḍau pañcaśīrṣāvivoragau | tamṛte puruṣavyāghraṃ naṣṭasūryamivāmbaram

जो स्वर्ण के बाजूबंदों से सजी हुई पाँच फन वाले सर्पों के समान हैं — उन पुरुषसिंह के बिना आकाश मानो सूर्यहीन हो गया है।

श्लोक 20 (3.78.20)

यमाश्रित्य महाबाहुं पाञ्चालाः कुरवस्तथा । सुराणामपि यत्तानां पृतनासु न बिभ्यति ॥

yamāśritya mahābāhuṃ pāñcālāḥ kuravastathā | surāṇāmapi yattānāṃ pṛtanāsu na bibhyati

जिन महाबाहु का आश्रय लेकर पाञ्चाल और कुरु युद्ध में तत्पर देवताओं की सेनाओं से भी नहीं डरते,

श्लोक 21 (3.78.21)

यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः । मन्यामहे जितानाजौ परान्प्राप्तां च मेदिनीम् ॥

yasya bāhū samāśritya vayaṃ sarve mahātmanaḥ | manyāmahe jitānājau parānprāptāṃ ca medinīm

जिन महात्मा की भुजाओं के भरोसे हम सब शत्रुओं को युद्ध में जीता हुआ और पृथ्वी को प्राप्त हुई मानते हैं,

श्लोक 22 (3.78.22)

तमृते फल्गुनं वीरं न लभे काम्यके धृतिम् । पश्यामि च दिशः सर्वास्तिमिरेणावृता इव ॥

tamṛte phalgunaṃ vīraṃ na labhe kāmyake dhṛtim | paśyāmi ca diśaḥ sarvāstimireṇāvṛtā iva

उन वीर फाल्गुन के बिना मुझे काम्यक वन में धीरज नहीं मिलता, और सारी दिशाएँ मुझे अन्धकार से ढकी-सी दिखती हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (3.78.23)

ततोऽब्रवीत्साश्रुकण्ठो नकुलः पाण्डुनन्दनः । यस्मिन्दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति रणाजिरे । देवा अपि युधां श्रेष्ठं तमृते का रतिर्वने ॥

tato'bravītsāśrukaṇṭho nakulaḥ pāṇḍunandanaḥ | yasmindivyāni karmāṇi kathayanti raṇājire | devā api yudhāṃ śreṣṭhaṃ tamṛte kā ratirvane

तब पाण्डुनन्दन नकुल ने आँसुओं से रुँधे कण्ठ से कहा — "जिनके युद्धभूमि में किए दिव्य कर्मों का वर्णन देवता भी करते हैं, उन योद्धाओं में श्रेष्ठ के बिना वन में क्या आनन्द है?

नकुल उवाच

श्लोक 24 (3.78.24)

उदीचीं यो दिशं गत्वा जित्वा युधि महाबलान् । गन्धर्वमुख्याञ्शतशो हयाँल्लेभे महाद्युतिः ॥

udīcīṃ yo diśaṃ gatvā jitvā yudhi mahābalān | gandharvamukhyāñśataśo hayām̐llebhe mahādyutiḥ

जिन्होंने उत्तर दिशा में जाकर युद्ध में सैकड़ों महाबली गन्धर्व-प्रमुखों को जीता और उन महातेजस्वी ने घोड़े प्राप्त किए,

श्लोक 25 (3.78.25)

राज्ञे तित्तिरिकल्माषाञ्श्रीमतोऽनिलरंहसः । प्रादाद्भ्रात्रे प्रियः प्रेम्णा राजसूये महाक्रतौ ॥

rājñe tittirikalmāṣāñśrīmato'nilaraṃhasaḥ | prādādbhrātre priyaḥ premṇā rājasūye mahākratau

और प्रेमवश, प्रिय भाई होकर, महान राजसूय यज्ञ में अपने भाई राजा को तीतर जैसे चितकबरे, वायु के समान वेगवान, सुन्दर घोड़े भेंट किए —

श्लोक 26 (3.78.26)

तमृते भीमधन्वानं भीमादवरजं वने । कामये काम्यके वासं नेदानीममरोपमम् ॥

tamṛte bhīmadhanvānaṃ bhīmādavarajaṃ vane | kāmaye kāmyake vāsaṃ nedānīmamaropamam

उन भयंकर धनुष वाले, भीम से छोटे, देवतुल्य भाई के बिना अब मैं काम्यक वन में रहना नहीं चाहता।"

सहदेव उवाच

श्लोक 27 (3.78.27)

यो धनानि च कन्याश्च युधि जित्वा महाबलान् । शतशो घातयित्वाऽरीन्पृतनामध्यगस्तदा । आजहार पुरा राज्ञे राजसूये महाक्रतौ ॥

yo dhanāni ca kanyāśca yudhi jitvā mahābalān | śataśo ghātayitvā'rīnpṛtanāmadhyagastadā | ājahāra purā rājñe rājasūye mahākratau

जिन्होंने पहले युद्ध में महाबलियों को जीतकर, और सेनाओं के बीच घुसकर सैकड़ों शत्रुओं को मारकर, महान राजसूय यज्ञ में राजा के लिए धन और कन्याएँ ला दीं;

श्लोक 28 (3.78.28)

यः समेतान्मृधे जित्वा यादवानमितद्युतिः । सुभद्रामाजहारैको वासुदेवस्य संमते ॥

yaḥ sametānmṛdhe jitvā yādavānamitadyutiḥ | subhadrāmājahāraiko vāsudevasya saṃmate

जिन अमित तेजस्वी ने अकेले ही युद्ध में एकत्र यादवों को जीतकर वासुदेव की सहमति से सुभद्रा का हरण किया;

श्लोक 29 (3.78.29)

येनार्धराज्यमाच्छिद्य द्रुपदस्य महात्मनः । आचार्यदक्षिणा दत्ता रणे द्रोणस्य भारत ॥

yenārdharājyamācchidya drupadasya mahātmanaḥ | ācāryadakṣiṇā dattā raṇe droṇasya bhārata

हे भारत, जिन्होंने युद्ध में महात्मा द्रुपद का आधा राज्य छीनकर द्रोण को आचार्य-दक्षिणा के रूप में दे दिया —

श्लोक 30 (3.78.30)

तस्य जिष्णोर्बृसीं दृष्ट्वा शून्यामुपनिवेशने । हृदयं मे महाराज न शाम्यति कदाचन ॥

tasya jiṣṇorbṛsīṃ dṛṣṭvā śūnyāmupaniveśane | hṛdayaṃ me mahārāja na śāmyati kadācana

हे महाराज, निवास-स्थान में जिष्णु (अर्जुन) का आसन सूना देखकर मेरा हृदय कभी शान्त नहीं होता।

श्लोक 31 (3.78.31)

वनादस्माद्विवासं तु रोचयेऽहमरिंदम । न हि नस्तमृते वीरं रमणीयमिदं वनम् ॥

vanādasmādvivāsaṃ tu rocaye'hamariṃdama | na hi nastamṛte vīraṃ ramaṇīyamidaṃ vanam

हे शत्रुदमन, मैं चाहता हूँ कि हम इस वन से कहीं और चलकर रहें; क्योंकि उन वीर के बिना यह वन हमें रमणीय नहीं लगता।

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