आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 79
नारद का पाण्डवों के पास आगमन; भीष्म और पुलस्त्य की भेंट
पाण्डव और द्रौपदी अर्जुन की प्रतीक्षा में उत्सुक होकर वन में रह रहे थे, तभी देवर्षि नारद वहाँ आए और उनका आदर-सत्कार हुआ। युधिष्ठिर ने उनसे पूछा कि तीर्थों में तत्पर होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले को क्या फल मिलता है। उत्तर में नारद वह प्रसंग सुनाने लगे जो भीष्म ने कभी महर्षि पुलस्त्य से सुना था: गंगाद्वार में पितरों का व्रत करते भीष्म के सामने पुलस्त्य प्रकट हुए, भीष्म ने उनकी पूजा करके अपना नाम बताया, और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मुनि बोलने लगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.79.1)
धनञ्जयोत्सुकास्ते तु वने तस्मिन्महारथाः । न्यवसन्त महाभागा द्रौपद्या सह कृष्णया ॥
dhanañjayotsukāste tu vane tasminmahārathāḥ | nyavasanta mahābhāgā draupadyā saha kṛṣṇayā
धनंजय (अर्जुन) के लिए उत्कंठित वे महाभाग महारथी कृष्णा द्रौपदी के साथ उस वन में रहते रहे।
श्लोक 2 (3.79.2)
धनंजयोत्सुकानां तु भ्रातॄणां कृष्णया सह । श्रुत्वा वाक्यानि विमना धर्मराजोऽप्यजायत ॥
dhanaṃjayotsukānāṃ tu bhrātṝṇāṃ kṛṣṇayā saha | śrutvā vākyāni vimanā dharmarājo'pyajāyata
धनंजय के लिए उत्कंठित भाइयों और कृष्णा की बातें सुनकर धर्मराज भी उदास हो गए।
श्लोक 3 (3.79.3)
अथापश्यन्महात्मानं देवर्षिं तत्र नारदम् । दीप्यमानं श्रिया ब्राह्म्या दीप्ताग्निसमतेजसम् ॥
athāpaśyanmahātmānaṃ devarṣiṃ tatra nāradam | dīpyamānaṃ śriyā brāhmyā dīptāgnisamatejasam
तभी उन्होंने वहाँ महात्मा देवर्षि नारद को देखा, जो ब्रह्मतेज की शोभा से दमक रहे थे और प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी थे।
श्लोक 4 (3.79.4)
तमागतमभिप्रेक्ष्य भ्रातृभिः सह धर्मराट् । प्रत्युत्थाय यथान्यायं पूजां चक्रे महात्मने ॥
tamāgatamabhiprekṣya bhrātṛbhiḥ saha dharmarāṭ | pratyutthāya yathānyāyaṃ pūjāṃ cakre mahātmane
उन्हें आया देखकर धर्मराज भाइयों सहित उठ खड़े हुए और विधिपूर्वक उन महात्मा की पूजा की।
श्लोक 5 (3.79.5)
स तैः परिवृतः श्रीमान्भ्रातृभिः कुरुसत्तमः । विबभावतिदीप्तौजा देवैरिव शतक्रतुः ॥
sa taiḥ parivṛtaḥ śrīmānbhrātṛbhiḥ kurusattamaḥ | vibabhāvatidīptaujā devairiva śatakratuḥ
भाइयों से घिरे वे श्रीमान कुरुश्रेष्ठ अत्यन्त प्रखर तेज से ऐसे शोभित हुए, जैसे देवताओं से घिरे शतक्रतु इन्द्र।
श्लोक 6 (3.79.6)
यथा च वेदान्सावित्री याज्ञसेनी तथा पतीन् । न जहौ धर्मतः पार्थान्मेरुमर्कप्रभा यथा ॥
yathā ca vedānsāvitrī yājñasenī tathā patīn | na jahau dharmataḥ pārthānmerumarkaprabhā yathā
जैसे सावित्री वेदों को नहीं छोड़ती और जैसे सूर्य की प्रभा मेरु पर्वत को नहीं छोड़ती, वैसे ही याज्ञसेनी ने धर्म के अनुसार अपने पति पार्थों का साथ नहीं छोड़ा।
श्लोक 7 (3.79.7)
अर्घ्यं पाद्यमथानीय त्वभ्यवादयदच्युतः । नारदस्तु महातेजाः स्वस्त्यस्त्वित्यभ्यभाषत ॥
arghyaṃ pādyamathānīya tvabhyavādayadacyutaḥ | nāradastu mahātejāḥ svastyastvityabhyabhāṣata
अर्घ्य और पाद्य लाकर अडिग धर्मात्मा राजा ने उन्हें प्रणाम किया, और महातेजस्वी नारद ने कहा — "तुम्हारा कल्याण हो।"
श्लोक 8 (3.79.8)
ततो युधिष्ठिरो राजा दृष्ट्वा देवर्षिसत्तमम् । यथार्हं पूजयामास विधिवत्कुरुनन्दनः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā dṛṣṭvā devarṣisattamam | yathārhaṃ pūjayāmāsa vidhivatkurunandanaḥ
तब कुरुनन्दन राजा युधिष्ठिर ने देवर्षिश्रेष्ठ को देखकर यथायोग्य और विधिपूर्वक उनकी पूजा की।
श्लोक 9 (3.79.9)
प्रतिगृह्य च तां पूजां नारदो भगवानृषिः । आश्वासयद्धर्मसुतं युक्तरूपमिवानघ ॥
pratigṛhya ca tāṃ pūjāṃ nārado bhagavānṛṣiḥ | āśvāsayaddharmasutaṃ yuktarūpamivānagha
हे निष्पाप, उस पूजा को स्वीकार करके भगवान नारद ऋषि ने धर्मपुत्र को उचित वचनों से ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 10 (3.79.10)
उवाच च महात्मानं धर्मराजं युधिष्ठिरम् । ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ केनार्थः किं ददानि ते ॥
uvāca ca mahātmānaṃ dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | brūhi dharmabhṛtāṃ śreṣṭha kenārthaḥ kiṃ dadāni te
और उन्होंने महात्मा धर्मराज युधिष्ठिर से कहा — "हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, बताओ, तुम्हें किस वस्तु की आवश्यकता है? मैं तुम्हें क्या दूँ?"
श्लोक 11 (3.79.11)
अथ धर्मसुतो राजा प्रणम्य भ्रातृभिः सह । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा नारदं देवसंमितम् ॥
atha dharmasuto rājā praṇamya bhrātṛbhiḥ saha | uvāca prāñjalirbhūtvā nāradaṃ devasaṃmitam
तब धर्मपुत्र राजा ने भाइयों सहित प्रणाम किया और हाथ जोड़कर देवतुल्य नारद से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (3.79.12)
त्वयि तुष्टे महाभाग सर्वलोकाभिपूजिते । कृतमित्येव मन्येऽहं प्रसादात्तव सुव्रत ॥
tvayi tuṣṭe mahābhāga sarvalokābhipūjite | kṛtamityeva manye'haṃ prasādāttava suvrata
"हे महाभाग, समस्त लोकों से पूजित! आपके प्रसन्न होने पर, हे सुव्रत, आपकी कृपा से मैं सब कुछ पूरा हुआ ही मानता हूँ।
श्लोक 13 (3.79.13)
यदि त्वहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ । संदेहं मे मुनिश्रेष्ठ तत्त्वतश्छेत्तुमर्हसि ॥
yadi tvahamanugrāhyo bhrātṛbhiḥ sahito'nagha | saṃdehaṃ me muniśreṣṭha tattvataśchettumarhasi
किन्तु हे निष्पाप, यदि भाइयों सहित मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो हे मुनिश्रेष्ठ, मेरे एक संदेह का यथार्थ रूप से निवारण कीजिए।
श्लोक 14 (3.79.14)
प्रदक्षिणां यः कुरुते पृथिवीं तीर्थतत्परः । किं फलं तस्य कार्त्स्न्येन तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
pradakṣiṇāṃ yaḥ kurute pṛthivīṃ tīrthatatparaḥ | kiṃ phalaṃ tasya kārtsnyena tadbhavānvaktumarhati
जो तीर्थों में तत्पर होकर पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता है, उसे पूर्ण रूप से क्या फल मिलता है? कृपया यह बताइए।"
नारद उवाच
श्लोक 15 (3.79.15)
शृणु राजन्नवहितो यथा भीष्मेण धीमता । पुलस्त्यस्य सकाशाद्वै सर्वमेतदुपश्रुतम् ॥
śṛṇu rājannavahito yathā bhīṣmeṇa dhīmatā | pulastyasya sakāśādvai sarvametadupaśrutam
हे राजन्, ध्यान देकर सुनो कि बुद्धिमान भीष्म ने पुलस्त्य से यह सब किस प्रकार सुना था।
श्लोक 16 (3.79.16)
पुरा भागीरथीतीरे भीष्मो धर्मभृतां वरः । पित्र्यं व्रतं समास्थाय न्यवसन्मुनिभिः सह ॥
purā bhāgīrathītīre bhīṣmo dharmabhṛtāṃ varaḥ | pitryaṃ vrataṃ samāsthāya nyavasanmunibhiḥ saha
प्राचीन काल में धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भीष्म पितरों का व्रत धारण करके मुनियों के साथ भागीरथी के तट पर रहते थे।
श्लोक 17 (3.79.17)
शुभे देशे तथा राजन्पुण्ये देवर्षिसेविते । गङ्गाद्वारे महाभाग देवगन्धर्वसेविते ॥
śubhe deśe tathā rājanpuṇye devarṣisevite | gaṅgādvāre mahābhāga devagandharvasevite
हे महाभाग राजन्, वह स्थान गंगाद्वार था — एक सुन्दर, पवित्र प्रदेश, जहाँ देवर्षि, देवता और गन्धर्व आया-जाया करते थे।
श्लोक 18 (3.79.18)
स पितॄंस्तर्पयामास देवांश्च परमद्युतिः । ऋषींश्च तर्पयामास विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
sa pitṝṃstarpayāmāsa devāṃśca paramadyutiḥ | ṛṣīṃśca tarpayāmāsa vidhidṛṣṭena karmaṇā
वहाँ उन परम तेजस्वी भीष्म ने शास्त्रोक्त विधि से पितरों और देवताओं का तर्पण किया और ऋषियों को भी तृप्त किया।
श्लोक 19 (3.79.19)
कस्य चित्त्वथ कालस्य जपन्नेव महायशाः । ददर्शाद्भुतसंकाशं पुलस्त्यमृषिसत्तमम् ॥
kasya cittvatha kālasya japanneva mahāyaśāḥ | dadarśādbhutasaṃkāśaṃ pulastyamṛṣisattamam
कुछ समय बाद, जब वे महायशस्वी भीष्म जप कर रहे थे, उन्होंने अद्भुत रूप वाले ऋषिश्रेष्ठ पुलस्त्य को देखा।
श्लोक 20 (3.79.20)
स तं दृष्ट्वोग्रतपसं दीप्यमानमिव श्रिया । प्रहर्षमतुलं लेभे विस्मयं परमं ययौ ॥
sa taṃ dṛṣṭvogratapasaṃ dīpyamānamiva śriyā | praharṣamatulaṃ lebhe vismayaṃ paramaṃ yayau
उन उग्र तपस्वी को, जो मानो अपनी शोभा से दमक रहे थे, देखकर भीष्म को अपार हर्ष हुआ और वे अत्यन्त विस्मित हो गए।
श्लोक 21 (3.79.21)
उपस्थितं महाभागं पूजयामास भारत । भीष्मो धर्मभृतां श्रेष्ठो विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
upasthitaṃ mahābhāgaṃ pūjayāmāsa bhārata | bhīṣmo dharmabhṛtāṃ śreṣṭho vidhidṛṣṭena karmaṇā
हे भारत, धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भीष्म ने अपने पास आए उन महाभाग मुनि की शास्त्रोक्त विधि से पूजा की।
श्लोक 22 (3.79.22)
शिरसा चार्घमादाय शुचिः प्रयतमानसः । नाम संकीर्तयामास तस्मिन्ब्रह्मर्षिसत्तमे ॥
śirasā cārghamādāya śuciḥ prayatamānasaḥ | nāma saṃkīrtayāmāsa tasminbrahmarṣisattame
पवित्र और संयत मन से उन्होंने अर्घ्य को सिर पर धारण किया और उन ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ के सामने अपना नाम बताया —
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (3.79.23)
भीष्मोऽहमस्मि भद्रं ते दासोऽस्मि तव सुव्रत । तव संदर्शनादेव मुक्तोऽहं सर्वकिल्बिषैः ॥
bhīṣmo'hamasmi bhadraṃ te dāso'smi tava suvrata | tava saṃdarśanādeva mukto'haṃ sarvakilbiṣaiḥ
"मैं भीष्म हूँ। आपका कल्याण हो! हे सुव्रत, मैं आपका दास हूँ। आपके दर्शन मात्र से मैं सब पापों से मुक्त हो गया हूँ।"
नारद उवाच
श्लोक 24 (3.79.24)
एवमुक्त्वा महाराज भीष्मो धर्मभृतां वरः । वाग्यतः प्राञ्जलिर्भूत्वा तूष्णीमासीद्युधिष्ठिर ॥
evamuktvā mahārāja bhīṣmo dharmabhṛtāṃ varaḥ | vāgyataḥ prāñjalirbhūtvā tūṣṇīmāsīdyudhiṣṭhira
हे महाराज युधिष्ठिर, यह कहकर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भीष्म वाणी को संयत करके हाथ जोड़े चुपचाप खड़े रहे।
श्लोक 25 (3.79.25)
तं दृष्ट्वा नियमेनाथ स्वाध्यायाम्नायकर्शितम् । भीष्मं कुरुकुलश्रेष्ठं मुनिः प्रीतमनाऽभवत् ॥
taṃ dṛṣṭvā niyamenātha svādhyāyāmnāyakarśitam | bhīṣmaṃ kurukulaśreṣṭhaṃ muniḥ prītamanā'bhavat
कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्म को नियम-पालन तथा स्वाध्याय और वेदपाठ से कृश हुआ देखकर मुनि का मन प्रसन्न हो गया।
श्लोक 26 (3.79.26)
ततः स मधुरेणाथ स्वरेण सुमहातपाः । उवाच वाक्यं धर्मज्ञः पुलस्त्यः प्रीतमानसः ॥
tataḥ sa madhureṇātha svareṇa sumahātapāḥ | uvāca vākyaṃ dharmajñaḥ pulastyaḥ prītamānasaḥ
तब धर्म के ज्ञाता महातपस्वी पुलस्त्य ने प्रसन्न मन से मधुर स्वर में ये वचन कहे।