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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 81

कुरुक्षेत्र के तीर्थ

पुलस्त्य भीष्म को तीर्थों का वर्णन आगे सुनाते हुए कुरुक्षेत्र की महिमा बताते हैं, जिसकी धूल तक पापियों को मुक्त कर देती है, और सरस्वती तथा दृषद्वती के बीच तीर्थयात्री को एक-एक तीर्थ तक ले जाते हुए हर तीर्थ का फल बताते हैं — द्वारपाल यक्ष, परशुराम के क्षत्रियों के रक्त से भरे पाँच सरोवर जहाँ उनके पितर उन्हें वर देते हैं, व्यास से जुड़े स्थान और अनेक अन्य तीर्थ। वे मङ्कणक मुनि की कथा सुनाते हैं, जो हाथ के घाव से शाक-रस बहता देखकर हर्ष से नाचने लगे थे, तब शिव ने अपने अँगूठे से हिम-सी श्वेत भस्म निकालकर उनका गर्व दूर किया और सप्तसारस्वत तीर्थ को वरदान दिया। फिर वर्णन पृथूदक तक जाता है, जिसे सबसे पवित्र तीर्थ कहा गया है, और सन्निहती तक, जहाँ अमावस्या को सभी जल आ मिलते हैं; अन्त में कुरुक्षेत्र, अर्थात् समन्तपञ्चक, को ब्रह्मा की उत्तर वेदी बताया गया है।

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82

पुलस्त्य उवाच

श्लोक 1 (3.81.1)

ततो गच्छेत राजेन्द्र कुरुक्षेत्रमभिष्टुतम् । पापेभ्यो विप्रमुच्यन्ते तद्गताः सर्वजन्तवः ॥

tato gaccheta rājendra kurukṣetramabhiṣṭutam | pāpebhyo vipramucyante tadgatāḥ sarvajantavaḥ

हे राजेन्द्र! इसके बाद सबके द्वारा प्रशंसित कुरुक्षेत्र को जाना चाहिए। वहाँ पहुँचे हुए सभी प्राणी पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 2 (3.81.2)

कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् । य एवं सततं ब्रूयात्सोऽपि पापैः प्रमुच्यते ॥

kurukṣetraṃ gamiṣyāmi kurukṣetre vasāmyaham | ya evaṃ satataṃ brūyātso'pi pāpaiḥ pramucyate

जो मनुष्य बार-बार यह कहता है कि "मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, मैं कुरुक्षेत्र में रहता हूँ", वह भी पापों से छूट जाता है।

श्लोक 3 (3.81.3)

पांसवोऽपि कुरुक्षेत्रे वायुना समुदीरिताः । अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ॥

pāṃsavo'pi kurukṣetre vāyunā samudīritāḥ | api duṣkṛtakarmāṇaṃ nayanti paramāṃ gatim

कुरुक्षेत्र की धूल भी, जब वायु उसे उड़ाकर ले जाती है, तो पापकर्म करने वाले मनुष्य को भी परम गति तक पहुँचा देती है।

श्लोक 4 (3.81.4)

दक्षिणेन सरस्वत्या दृषद्वत्युत्तरेण च । ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे ॥

dakṣiṇena sarasvatyā dṛṣadvatyuttareṇa ca | ye vasanti kurukṣetre te vasanti triviṣṭape

सरस्वती के दक्षिण और दृषद्वती के उत्तर में बसे कुरुक्षेत्र में जो लोग रहते हैं, वे मानो स्वर्ग में ही रहते हैं।

श्लोक 5 (3.81.5)

तत्र मासं वसेद्धीरः सरस्वत्यां युधांवर । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः ॥

tatra māsaṃ vaseddhīraḥ sarasvatyāṃ yudhāṃvara | yatra brahmādayo devā ṛṣayaḥ siddhacāraṇāḥ

हे योद्धाओं में श्रेष्ठ! धीर पुरुष को वहाँ सरस्वती के तट पर एक मास तक निवास करना चाहिए, जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि, सिद्ध और चारण,

श्लोक 6 (3.81.6)

गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः पन्नगाश्च महीपते । ब्रह्मक्षेत्रं महापुण्यमभिगच्छन्ति भारत ॥

gandharvāpsaraso yakṣāḥ pannagāśca mahīpate | brahmakṣetraṃ mahāpuṇyamabhigacchanti bhārata

गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष और नाग भी, हे पृथ्वीपति, हे भारत, उस परम पवित्र ब्रह्मक्षेत्र में आते हैं।

श्लोक 7 (3.81.7)

मनसाऽप्यभिकामस्य कुरुक्षेत्रं युधांवर । पापानि विप्रणश्यन्ति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥

manasā'pyabhikāmasya kurukṣetraṃ yudhāṃvara | pāpāni vipraṇaśyanti brahmalokaṃ ca gacchati

हे योद्धाओं में श्रेष्ठ! जो मन से भी कुरुक्षेत्र की कामना करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और वह ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 8 (3.81.8)

गत्वा हि श्रद्धया युक्तः कुरुक्षेत्रं कुरूद्वह । राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलमाप्नोति मानवः ॥

gatvā hi śraddhayā yuktaḥ kurukṣetraṃ kurūdvaha | rājasūyāśvamedhābhyāṃ phalamāpnoti mānavaḥ

हे कुरुश्रेष्ठ! श्रद्धा के साथ कुरुक्षेत्र जाने वाला मनुष्य राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल पाता है।

श्लोक 9 (3.81.9)

ततश्च मन्तुकं राजन्द्वारपालं महाबलम् । यक्षं समभिवाद्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ॥

tataśca mantukaṃ rājandvārapālaṃ mahābalam | yakṣaṃ samabhivādyaiva gosahasraphalaṃ labhet

हे राजन्! फिर महाबली द्वारपाल यक्ष मन्तुक को प्रणाम करने मात्र से सहस्र गोदान का फल मिलता है।

श्लोक 10 (3.81.10)

ततो गच्छेत धर्मज्ञ विष्णोः स्थानमनुत्तमम् । सततं नाम राजेन्द्र यत्र सन्निहितो हरिः ॥

tato gaccheta dharmajña viṣṇoḥ sthānamanuttamam | satataṃ nāma rājendra yatra sannihito hariḥ

हे धर्मज्ञ! इसके बाद विष्णु के सतत नामक सर्वश्रेष्ठ स्थान को जाना चाहिए, हे राजेन्द्र, जहाँ श्रीहरि सदा विराजमान रहते हैं।

श्लोक 11 (3.81.11)

तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च त्रिलोकप्रभवं हरिम् । अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥

tatra snātvā'rcayitvā ca trilokaprabhavaṃ harim | aśvamedhamavāpnoti viṣṇulokaṃ ca gacchati

वहाँ स्नान करके और तीनों लोकों के उद्गम श्रीहरि की पूजा करके मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 12 (3.81.12)

ततः परिप्लवं गच्छेत्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति भारत ॥

tataḥ pariplavaṃ gacchettīrthaṃ trailokyaviśrutam | agniṣṭomātirātrābhyāṃ phalaṃ prāpnoti bhārata

फिर तीनों लोकों में विख्यात परिप्लव तीर्थ को जाना चाहिए; हे भारत, वहाँ अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञों का फल मिलता है।

श्लोक 13 (3.81.13)

पृथिवीतीर्थमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् । ततः शालूकिनीं गत्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥

pṛthivītīrthamāsādya gosahasraphalaṃ labhet | tataḥ śālūkinīṃ gatvā tīrthasevī narādhipa

पृथ्वीतीर्थ पहुँचकर सहस्र गोदान का फल मिलता है। फिर हे नराधिप, जो तीर्थयात्री शालूकिनी जाकर

श्लोक 14 (3.81.14)

दशाश्वमेधे स्नात्वा च तदेव फलमाप्नुयात् । सर्पदर्वीं समासाद्य नागानां तीर्थमुत्तमम् ॥

daśāśvamedhe snātvā ca tadeva phalamāpnuyāt | sarpadarvīṃ samāsādya nāgānāṃ tīrthamuttamam

दशाश्वमेध में स्नान करता है, वह वही फल पाता है। नागों के उत्तम तीर्थ सर्पदर्वी में पहुँचकर

श्लोक 15 (3.81.15)

अग्निष्टोममवाप्नोति नागलोकं च विन्दति । ततो गच्छेत धर्मज्ञ द्वारपालमरुन्तुकम् ॥

agniṣṭomamavāpnoti nāgalokaṃ ca vindati | tato gaccheta dharmajña dvārapālamaruntukam

मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है और नागलोक को प्राप्त होता है। फिर हे धर्मज्ञ, द्वारपाल अरुन्तुक के पास जाना चाहिए;

श्लोक 16 (3.81.16)

तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् । ततः पञ्चनदं गत्वा नियतो नियताशनः ॥

tatroṣya rajanīmekāṃ gosahasraphalaṃ labhet | tataḥ pañcanadaṃ gatvā niyato niyatāśanaḥ

वहाँ एक रात ठहरने से सहस्र गोदान का फल मिलता है। फिर संयमी और नियमित आहार वाला होकर पञ्चनद जाए,

श्लोक 17 (3.81.17)

कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् । अश्विनोस्तीर्थमासाद्य रूपवानभिजायते ॥

koṭitīrthamupaspṛśya hayamedhaphalaṃ labhet | aśvinostīrthamāsādya rūpavānabhijāyate

और कोटितीर्थ के जल का स्पर्श करे, तो अश्वमेध का फल पाता है। अश्विनीकुमारों के तीर्थ में पहुँचकर मनुष्य रूपवान होकर जन्म लेता है।

श्लोक 18 (3.81.18)

ततो गच्छेत धर्मज्ञ वाराहं तीर्थमुत्तमम् । विष्णुर्वाराहरूपेण पूर्वं यत्र स्थितो विभुः ॥

tato gaccheta dharmajña vārāhaṃ tīrthamuttamam | viṣṇurvārāharūpeṇa pūrvaṃ yatra sthito vibhuḥ

फिर हे धर्मज्ञ, उत्तम वराह तीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ सर्वव्यापी विष्णु पूर्वकाल में वराह रूप में स्थित हुए थे।

श्लोक 19 (3.81.19)

तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ अग्निष्टोमफलं लभेत् । ततो जयन्त्यां राजेन्द्र सोमतीर्थं समाविशेत् ॥

tatra snātvā naraśreṣṭha agniṣṭomaphalaṃ labhet | tato jayantyāṃ rājendra somatīrthaṃ samāviśet

हे नरश्रेष्ठ, वहाँ स्नान करने से अग्निष्टोम का फल मिलता है। फिर हे राजेन्द्र, जयन्ती में सोमतीर्थ में प्रवेश करे;

श्लोक 20 (3.81.20)

स्नात्वा फलमवाप्नोति राजसूयस्य मानवः । एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥

snātvā phalamavāpnoti rājasūyasya mānavaḥ | ekahaṃse naraḥ snātvā gosahasraphalaṃ labhet

वहाँ स्नान करके मनुष्य राजसूय का फल पाता है। एकहंस में स्नान करने वाला सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 21 (3.81.21)

शतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप । पौण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेच्च सः ॥

śataśaucaṃ samāsādya tīrthasevī narādhipa | pauṇḍarīkamavāpnoti kṛtaśauco bhavecca saḥ

हे नराधिप, शतशौच तीर्थ पहुँचकर तीर्थयात्री पौण्डरीक यज्ञ का फल पाता है और पवित्र हो जाता है।

श्लोक 22 (3.81.22)

ततो मुञ्जवटं नाम स्थाणोः स्थानं महात्मनः । उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥

tato muñjavaṭaṃ nāma sthāṇoḥ sthānaṃ mahātmanaḥ | upoṣya rajanīmekāṃ gāṇapatyamavāpnuyāt

इसके बाद मुञ्जवट है, जो महात्मा स्थाणु (शिव) का स्थान है; वहाँ एक रात उपवास करने से शिवगणों का अधिपत्य प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (3.81.23)

तत्रैव च महाराज यक्षिणी लोकविश्रुता । तां चाभिगम्य राजेन्द्र सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥

tatraiva ca mahārāja yakṣiṇī lokaviśrutā | tāṃ cābhigamya rājendra sarvānkāmānavāpnuyāt

हे महाराज, वहीं लोकविख्यात यक्षिणी भी है; हे राजेन्द्र, उसके पास जाकर मनुष्य सारी कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 24 (3.81.24)

कुरुक्षेत्रस्य तद्द्वारं विश्रुतं भरतर्षभ । प्रदक्षिणमुपावृत्य तीर्थसेवी समाहितः ॥

kurukṣetrasya taddvāraṃ viśrutaṃ bharatarṣabha | pradakṣiṇamupāvṛtya tīrthasevī samāhitaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, वही कुरुक्षेत्र का प्रसिद्ध द्वार है। तीर्थयात्री एकाग्रचित्त होकर उसकी प्रदक्षिणा करे,

श्लोक 25 (3.81.25)

संमिते पुष्कराणां च स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः । जामदग्न्येन रामेण कृतं तत्सुमहात्मना ॥

saṃmite puṣkarāṇāṃ ca snātvā'rcya pitṛdevatāḥ | jāmadagnyena rāmeṇa kṛtaṃ tatsumahātmanā

और पुष्करों के सम्मित तीर्थ में स्नान करके पितरों और देवताओं की पूजा करे। यह तीर्थ जमदग्नि के पुत्र महात्मा परशुराम ने बनाया था।

श्लोक 26 (3.81.26)

कृतकृत्यो भवेद्राजन्नश्वमेधं च विन्दति । ततो रामह्रदानार्च्छेत्तीर्थसेवी समाहितः ॥

kṛtakṛtyo bhavedrājannaśvamedhaṃ ca vindati | tato rāmahradānārcchettīrthasevī samāhitaḥ

ऐसा करके, हे राजन्, मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और अश्वमेध का फल पाता है। फिर तीर्थयात्री एकाग्र होकर रामह्रदों को जाए।

श्लोक 27 (3.81.27)

तत्र रामेण राजेन्द्र तरसा दीप्ततेजसा । क्षत्रमुत्साद्य वीरेण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः ॥

tatra rāmeṇa rājendra tarasā dīptatejasā | kṣatramutsādya vīreṇa hradāḥ pañca niveśitāḥ

हे राजेन्द्र, वहाँ प्रचण्ड तेजस्वी वीर परशुराम ने वेग से क्षत्रियों का संहार करके पाँच सरोवर बनाए,

श्लोक 28 (3.81.28)

पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति नः श्रुतम् । पितरस्तर्पिताः सर्वे तथैव प्रपितामहाः ॥

pūrayitvā naravyāghra rudhireṇeti naḥ śrutam | pitarastarpitāḥ sarve tathaiva prapitāmahāḥ

और हे नरव्याघ्र, हमने सुना है कि उन्हें रक्त से भरकर उन्होंने अपने सब पितरों और प्रपितामहों का तर्पण किया।

श्लोक 29 (3.81.29)

ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुर्नराधिप । राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥

tataste pitaraḥ prītā rāmamūcurnarādhipa | rāma rāma mahābhāga prītāḥ sma tava bhārgava

तब हे नराधिप, प्रसन्न होकर पितरों ने राम से कहा — "हे राम, हे महाभाग राम! हे भार्गव, हम तुमसे प्रसन्न हैं।

श्लोक 30 (3.81.30)

अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो । वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महाद्युते ॥

anayā pitṛbhaktyā ca vikrameṇa ca te vibho | varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te kimicchasi mahādyute

हे प्रभु, तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रम के कारण कोई वर माँग लो; तुम्हारा कल्याण हो। हे महातेजस्वी, तुम क्या चाहते हो?"

श्लोक 31 (3.81.31)

एवमुक्तः स राजेन्द्र रामः प्रहरतांवरः । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यं पितॄन्स गगने स्थितान् ॥

evamuktaḥ sa rājendra rāmaḥ praharatāṃvaraḥ | abravītprāñjalirvākyaṃ pitṝnsa gagane sthitān

हे राजेन्द्र, ऐसा कहे जाने पर योद्धाओं में श्रेष्ठ परशुराम ने हाथ जोड़कर आकाश में स्थित अपने पितरों से कहा —

श्लोक 32 (3.81.32)

भवन्तो यदि मे प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि । पितृप्रसादादिच्छेयं तपःस्वाध्ययनं पुनः ॥

bhavanto yadi me prītā yadyanugrāhyatā mayi | pitṛprasādādiccheyaṃ tapaḥsvādhyayanaṃ punaḥ

"यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे अनुग्रह के योग्य समझते हैं, तो पितरों की कृपा से मैं फिर से तप और स्वाध्याय करना चाहता हूँ।

श्लोक 33 (3.81.33)

यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया । ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसाऽप्यहम् ॥

yacca roṣābhibhūtena kṣatramutsāditaṃ mayā | tataśca pāpānmucyeyaṃ yuṣmākaṃ tejasā'pyaham

क्रोध के वशीभूत होकर मैंने जो क्षत्रियों का संहार किया है, उस पाप से भी आपके तेज से मैं मुक्त हो जाऊँ।

श्लोक 34 (3.81.34)

ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुताः । एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं रामस्य पितरस्तदा ॥

hradāśca tīrthabhūtā me bhaveyurbhuvi viśrutāḥ | etacchrutvā śubhaṃ vākyaṃ rāmasya pitarastadā

और मेरे ये सरोवर पृथ्वी पर विख्यात तीर्थ बन जाएँ।" राम के ये शुभ वचन सुनकर तब उनके पितरों ने

श्लोक 35 (3.81.35)

प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्षसमन्विताः । तपस्ते वर्धतां भूयः पितृभक्त्या विशेषतः ॥

pratyūcuḥ paramaprītā rāmaṃ harṣasamanvitāḥ | tapaste vardhatāṃ bhūyaḥ pitṛbhaktyā viśeṣataḥ

अत्यन्त प्रसन्न और हर्षित होकर राम को उत्तर दिया — "पितृभक्ति के कारण तुम्हारा तप और भी अधिक बढ़े।

श्लोक 36 (3.81.36)

यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं त्वया । ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पातितास्ते स्वकर्मभिः ॥

yacca roṣābhibhūtena kṣatramutsāditaṃ tvayā | tataśca pāpānmuktastvaṃ pātitāste svakarmabhiḥ

क्रोध के वश में होकर तुमने जो क्षत्रियों का संहार किया, उस पाप से तुम मुक्त हो; वे अपने ही कर्मों से मारे गए।

श्लोक 37 (3.81.37)

ह्रदाश्च तव तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशयः । ह्रदेषु तेषु यः स्नात्वा पितॄन्संतर्पयिष्यति ॥

hradāśca tava tīrthatvaṃ gamiṣyanti na saṃśayaḥ | hradeṣu teṣu yaḥ snātvā pitṝnsaṃtarpayiṣyati

तुम्हारे सरोवर निःसन्देह तीर्थ बन जाएँगे। जो इन सरोवरों में स्नान करके पितरों का तर्पण करेगा,

श्लोक 38 (3.81.38)

पितरस्तस्य वै प्रीता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् । ईप्सितं च मनःकामं स्वर्गलोकं च शाश्वतम् ॥

pitarastasya vai prītā dāsyanti bhuvi durlabham | īpsitaṃ ca manaḥkāmaṃ svargalokaṃ ca śāśvatam

उसके पितर प्रसन्न होकर उसे वह देंगे जो पृथ्वी पर दुर्लभ है — मन की इच्छित कामना और शाश्वत स्वर्गलोक।"

श्लोक 39 (3.81.39)

एवं दत्त्वा वरान्राजन्रामस्य पितरस्तदा । आमन्त्र्य भार्गवं प्रीत्या तत्रैवान्तर्हितास्ततः ॥

evaṃ dattvā varānrājanrāmasya pitarastadā | āmantrya bhārgavaṃ prītyā tatraivāntarhitāstataḥ

हे राजन्, इस प्रकार राम को वर देकर उनके पितर प्रेमपूर्वक भार्गव से विदा लेकर वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 40 (3.81.40)

एवं रामह्रदाः पुण्या भार्गवस्य महात्मनः । स्नात्वा ह्रदेषु रामस्य ब्रह्मचारी शुचिव्रतः ॥

evaṃ rāmahradāḥ puṇyā bhārgavasya mahātmanaḥ | snātvā hradeṣu rāmasya brahmacārī śucivrataḥ

ऐसे हैं महात्मा भार्गव राम के पवित्र सरोवर। राम के इन सरोवरों में स्नान करके ब्रह्मचारी और शुद्ध व्रत वाला मनुष्य

श्लोक 41 (3.81.41)

राममभ्यर्च्य राजेन्द्र लभेद्बहु सुवर्णकम् । वंशमूलकमासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह ॥

rāmamabhyarcya rājendra labhedbahu suvarṇakam | vaṃśamūlakamāsādya tīrthasevī kurūdvaha

हे राजेन्द्र, राम की पूजा करे तो बहुत-सा सोना पाता है। हे कुरुश्रेष्ठ, वंशमूलक पहुँचकर जो तीर्थयात्री

श्लोक 42 (3.81.42)

स्ववंशमुद्धरेद्राजन्स्नात्वा वै वंशमूलके । कायशोधनमासाद्य तीर्थं भरतसत्तम ॥

svavaṃśamuddharedrājansnātvā vai vaṃśamūlake | kāyaśodhanamāsādya tīrthaṃ bharatasattama

हे राजन्, वंशमूलक में स्नान करता है, वह अपने वंश का उद्धार करता है। हे भरतश्रेष्ठ, कायशोधन तीर्थ पहुँचकर

श्लोक 43 (3.81.43)

शरीरशुद्धिः स्नातस्य तस्मिंस्तीर्थे न संशयः । शुद्धदेहश्च संयाति शुभाँल्लोकाननुत्तमान् ॥

śarīraśuddhiḥ snātasya tasmiṃstīrthe na saṃśayaḥ | śuddhadehaśca saṃyāti śubhām̐llokānanuttamān

उस तीर्थ में स्नान करने वाले का शरीर निःसन्देह शुद्ध हो जाता है, और शुद्ध देह वाला वह सर्वोत्तम शुभ लोकों को जाता है।

श्लोक 44 (3.81.44)

ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । लोका यत्रोद्धृताः पूर्वं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥

tato gaccheta dharmajña tīrthaṃ trailokyaviśrutam | lokā yatroddhṛtāḥ pūrvaṃ viṣṇunā prabhaviṣṇunā

फिर हे धर्मज्ञ, तीनों लोकों में विख्यात उस तीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ पूर्वकाल में प्रभावशाली विष्णु ने लोकों का उद्धार किया था।

श्लोक 45 (3.81.45)

लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् । स्नात्वा तीर्थवरे राजँल्लोकानुद्धरते स्वकान् ॥

lokoddhāraṃ samāsādya tīrthaṃ trailokyapūjitam | snātvā tīrthavare rājam̐llokānuddharate svakān

तीनों लोकों में पूजित लोकोद्धार तीर्थ पहुँचकर, हे राजन्, उस श्रेष्ठ तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य अपने स्वजनों का उद्धार करता है।

श्लोक 46 (3.81.46)

श्रीतीर्थं च समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः । अर्चयित्वा पितॄन्देवान्विन्दते श्रियमुत्तमाम् ॥

śrītīrthaṃ ca samāsādya snātvā niyatamānasaḥ | arcayitvā pitṝndevānvindate śriyamuttamām

श्रीतीर्थ पहुँचकर संयत मन से स्नान करे और पितरों तथा देवताओं की पूजा करे, तो उत्तम श्री (समृद्धि) प्राप्त होती है।

श्लोक 47 (3.81.47)

कपिलातीर्थमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितॄन्स्वान्दैवतान्यपि ॥

kapilātīrthamāsādya brahmacārī samāhitaḥ | tatra snātvā'rcayitvā ca pitṝnsvāndaivatānyapi

कपिलातीर्थ पहुँचकर ब्रह्मचारी और एकाग्र होकर वहाँ स्नान करे तथा अपने पितरों और देवताओं की पूजा करे,

श्लोक 48 (3.81.48)

कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः । सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः ॥

kapilānāṃ sahasrasya phalaṃ vindati mānavaḥ | sūryatīrthaṃ samāsādya snātvā niyatamānasaḥ

तो मनुष्य सहस्र कपिला गौओं के दान का फल पाता है। सूर्यतीर्थ पहुँचकर संयत मन से स्नान करे,

श्लोक 49 (3.81.49)

अर्चयित्वा पितॄन्देवानुपवासपरायणः । अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥

arcayitvā pitṝndevānupavāsaparāyaṇaḥ | agniṣṭomamavāpnoti sūryalokaṃ ca gacchati

और उपवास रखते हुए पितरों तथा देवताओं की पूजा करे, तो अग्निष्टोम का फल पाता है और सूर्यलोक को जाता है।

श्लोक 50 (3.81.50)

गवां भवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम् । तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्रफलं लभेत् ॥

gavāṃ bhavanamāsādya tīrthasevī yathākramam | tatrābhiṣekaṃ kurvāṇo gosahasraphalaṃ labhet

क्रम से गवां भवन (गौओं का निवास) तीर्थ पहुँचकर वहाँ स्नान करने वाला तीर्थयात्री सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 51 (3.81.51)

शङ्खिनीतीर्थमासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह । देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम् ॥

śaṅkhinītīrthamāsādya tīrthasevī kurūdvaha | devyāstīrthe naraḥ snātvā labhate rūpamuttamam

हे कुरुश्रेष्ठ, शंखिनी तीर्थ पहुँचकर देवी के तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य उत्तम रूप पाता है।

श्लोक 52 (3.81.52)

ततो गच्छेत राजेन्द्र द्वारपालमरुन्तुकम् । तच्च तीर्थं सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः ॥

tato gaccheta rājendra dvārapālamaruntukam | tacca tīrthaṃ sarasvatyāṃ yakṣendrasya mahātmanaḥ

फिर हे राजेन्द्र, द्वारपाल अरुन्तुक के पास जाना चाहिए। उस महात्मा यक्षराज का वह तीर्थ सरस्वती में है।

श्लोक 53 (3.81.53)

तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् । ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मावर्तं नरोत्तमः ॥

tatra snātvā naro rājannagniṣṭomaphalaṃ labhet | tato gaccheta rājendra brahmāvartaṃ narottamaḥ

हे राजन्, वहाँ स्नान करके मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है। फिर हे राजेन्द्र, श्रेष्ठ पुरुष ब्रह्मावर्त को जाए।

श्लोक 54 (3.81.54)

ब्रह्मावर्ते नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । ततो गच्छेत राजेन्द्र सुतीर्थकमनुत्तमम् ॥

brahmāvarte naraḥ snātvā brahmalokamavāpnuyāt | tato gaccheta rājendra sutīrthakamanuttamam

ब्रह्मावर्त में स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोक पाता है। फिर हे राजेन्द्र, अनुपम सुतीर्थक को जाना चाहिए,

श्लोक 55 (3.81.55)

तत्र सन्निहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह । तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥

tatra sannihitā nityaṃ pitaro daivataiḥ saha | tatrābhiṣekaṃ kurvīta pitṛdevārcane rataḥ

जहाँ पितर देवताओं के साथ सदा उपस्थित रहते हैं। वहाँ पितरों और देवताओं की पूजा में लगे रहकर स्नान करे,

श्लोक 56 (3.81.56)

अश्वमेधमवाप्नोति पितृलोकं च गच्छति । ततोऽम्बुमत्यां धर्मज्ञ सुतीर्थकमनुत्तमम् ॥

aśvamedhamavāpnoti pitṛlokaṃ ca gacchati | tato'mbumatyāṃ dharmajña sutīrthakamanuttamam

तो अश्वमेध का फल पाता है और पितृलोक को जाता है। फिर हे धर्मज्ञ, अम्बुमती में उस अनुपम सुतीर्थ पर

श्लोक 57 (3.81.57)

कोशेश्वरस्य तीर्थेषु स्नात्वा भरतसत्तम । सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥

kośeśvarasya tīrtheṣu snātvā bharatasattama | sarvavyādhivinirmukto brahmaloke mahīyate

हे भरतश्रेष्ठ, कोशेश्वर के तीर्थों में स्नान करके मनुष्य सब रोगों से मुक्त हो जाता है और ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा पाता है।

श्लोक 58 (3.81.58)

मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भारत । प्रजा विवर्धते राजन्न तन्वीं श्रियमश्नुते ॥

mātṛtīrthaṃ ca tatraiva yatra snātasya bhārata | prajā vivardhate rājanna tanvīṃ śriyamaśnute

वहीं मातृतीर्थ भी है, हे भारत; हे राजन्, वहाँ स्नान करने वाले की सन्तान बढ़ती है और वह विपुल समृद्धि का भोग करता है।

श्लोक 59 (3.81.59)

ततः शीतवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः । तीर्थं तत्र महाराज महदन्यत्र दुर्लभम् ॥

tataḥ śītavanaṃ gacchenniyato niyatāśanaḥ | tīrthaṃ tatra mahārāja mahadanyatra durlabham

फिर संयमी और नियमित आहार वाला होकर शीतवन जाए। हे महाराज, वहाँ एक महान तीर्थ है, जैसा अन्यत्र दुर्लभ है।

श्लोक 60 (3.81.60)

पुनाति गमनादेव कुलमेकं नराधिप । केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन्पूतो भवति भारत ॥

punāti gamanādeva kulamekaṃ narādhipa | keśānabhyukṣya vai tasminpūto bhavati bhārata

हे नराधिप, वहाँ जाने मात्र से वह तीर्थ कुल को पवित्र कर देता है; हे भारत, उसके जल से अपने केशों को सींचने पर मनुष्य पवित्र हो जाता है।

श्लोक 61 (3.81.61)

तीर्थं तत्र महाराज श्वानलोमापहं स्मृतम् । यत्र विप्रा नरव्याघ्र विद्वांसस्तीर्थतत्पराः ॥

tīrthaṃ tatra mahārāja śvānalomāpahaṃ smṛtam | yatra viprā naravyāghra vidvāṃsastīrthatatparāḥ

हे महाराज, वहाँ श्वानलोमापह नामक तीर्थ है, जहाँ हे नरव्याघ्र, तीर्थसेवा में तत्पर विद्वान ब्राह्मण

श्लोक 62 (3.81.62)

गतिं गच्छन्ति परमां स्नात्वा भरतसत्तम । श्वानलोमापनयने तीर्थे भरतसत्तम ॥

gatiṃ gacchanti paramāṃ snātvā bharatasattama | śvānalomāpanayane tīrthe bharatasattama

वहाँ स्नान करके परम गति को प्राप्त होते हैं, हे भरतश्रेष्ठ। हे भरतश्रेष्ठ, श्वानलोमापनयन तीर्थ में

श्लोक 63 (3.81.63)

प्राणायामैर्निर्हरन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः । पूतात्मानश्च राजेन्द्र प्रयान्ति परमां गतिम् ॥

prāṇāyāmairnirharanti svalomāni dvijottamāḥ | pūtātmānaśca rājendra prayānti paramāṃ gatim

श्रेष्ठ द्विज प्राणायाम के द्वारा अपने रोम दूर करते हैं और, हे राजेन्द्र, शुद्ध अन्तःकरण वाले होकर परम गति को जाते हैं।

श्लोक 64 (3.81.64)

दशाश्वमेधिकं चैव तस्मिंस्तीर्थे महीपते । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र गच्छेत परमां गतिम् ॥

daśāśvamedhikaṃ caiva tasmiṃstīrthe mahīpate | tatra snātvā naravyāghra gaccheta paramāṃ gatim

हे पृथ्वीपति, उसी तीर्थ में दशाश्वमेधिक भी है; हे नरव्याघ्र, वहाँ स्नान करके मनुष्य परम गति पाता है।

श्लोक 65 (3.81.65)

ततो गच्छेत राजेन्द्र मानुषं लोकविश्रुतम् । यत्र कृष्णमृगा राजन्व्याधेन परिपीडिताः ॥

tato gaccheta rājendra mānuṣaṃ lokaviśrutam | yatra kṛṣṇamṛgā rājanvyādhena paripīḍitāḥ

फिर हे राजेन्द्र, लोकविख्यात मानुष तीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ हे राजन्, व्याध से पीड़ित काले मृग

श्लोक 66 (3.81.66)

विगाह्य तस्मिन्सरसि मानुषत्वमुपागताः । तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥

vigāhya tasminsarasi mānuṣatvamupāgatāḥ | tasmiṃstīrthe naraḥ snātvā brahmacārī samāhitaḥ

उस सरोवर में डुबकी लगाकर मनुष्य बन गए थे। उस तीर्थ में ब्रह्मचारी और एकाग्र होकर स्नान करने वाला मनुष्य

श्लोक 67 (3.81.67)

सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते । मानुषस्य तु पूर्वेण क्रोशमात्रे महीपते ॥

sarvapāpaviśuddhātmā svargaloke mahīyate | mānuṣasya tu pūrveṇa krośamātre mahīpate

सब पापों से शुद्ध होकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा पाता है। हे पृथ्वीपति, मानुष तीर्थ से एक कोस पूर्व में

श्लोक 68 (3.81.68)

आपगा नाम विख्याता नदी सिद्धनिषेविता । श्यामाकभोजनं तत्र यः प्रयच्छति मानवः ॥

āpagā nāma vikhyātā nadī siddhaniṣevitā | śyāmākabhojanaṃ tatra yaḥ prayacchati mānavaḥ

आपगा नाम की प्रसिद्ध नदी है, जिसके तट पर सिद्धगण रहते हैं। जो मनुष्य वहाँ श्यामाक (साँवाँ) का भोजन

श्लोक 69 (3.81.69)

देवान्पितॄन्समुद्दिश्य तस्य धर्मफलं महत् । एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता ॥

devānpitṝnsamuddiśya tasya dharmaphalaṃ mahat | ekasminbhojite vipre koṭirbhavati bhojitā

देवताओं और पितरों के उद्देश्य से देता है, उसे धर्म का महान फल मिलता है; वहाँ एक ब्राह्मण को भोजन कराना एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है।

श्लोक 70 (3.81.70)

तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितॄन्वै दैवतानि च । उषित्वा रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत् ॥

tatra snātvā'rcayitvā ca pitṝnvai daivatāni ca | uṣitvā rajanīmekāmagniṣṭomaphalaṃ labhet

वहाँ स्नान करके, पितरों और देवताओं की पूजा करके और एक रात निवास करके मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है।

श्लोक 71 (3.81.71)

ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । ब्रह्मोदुम्बरमित्येव प्रकाशं भुवि भारत ॥

tato gaccheta rājendra brahmaṇaḥ sthānamuttamam | brahmodumbaramityeva prakāśaṃ bhuvi bhārata

फिर हे राजेन्द्र, ब्रह्मा के उत्तम स्थान को जाना चाहिए, जो हे भारत, पृथ्वी पर ब्रह्मोदुम्बर नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 72 (3.81.72)

तत्र सप्तर्षिकुण्डेषु स्नातस्य नरपुङ्गव । केदारे चैव राजेन्द्र कपिञ्जलमहामुनेः ॥

tatra saptarṣikuṇḍeṣu snātasya narapuṅgava | kedāre caiva rājendra kapiñjalamahāmuneḥ

हे नरश्रेष्ठ, जो वहाँ सप्तर्षियों के कुण्डों में और हे राजेन्द्र, महामुनि कपिञ्जल के केदार में स्नान करता है,

श्लोक 73 (3.81.73)

ब्रह्माणमधिगत्वा च शुचिः प्रयतमानसः । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥

brahmāṇamadhigatvā ca śuciḥ prayatamānasaḥ | sarvapāpaviśuddhātmā brahmalokaṃ prapadyate

और पवित्र तथा संयत मन से ब्रह्मा के समीप जाता है, वह सब पापों से शुद्ध होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 74 (3.81.74)

कपिञ्जलस्य केदारं समासाद्य सुदुर्लभम् । अन्तर्धानमवाप्नोति तपसा दग्धकिल्विषः ॥

kapiñjalasya kedāraṃ samāsādya sudurlabham | antardhānamavāpnoti tapasā dagdhakilviṣaḥ

अत्यन्त दुर्लभ कपिञ्जल के केदार में पहुँचकर, तप से जिसके पाप जल गए हैं, वह मनुष्य अन्तर्धान होने की शक्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 75 (3.81.75)

ततो गच्छेत राजेन्द्र शङ्करं लोकविश्रुतम् । कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामभिगम्य वृषध्वजम् ॥

tato gaccheta rājendra śaṅkaraṃ lokaviśrutam | kṛṣṇapakṣe caturdaśyāmabhigamya vṛṣadhvajam

फिर हे राजेन्द्र, लोकविख्यात शंकर तीर्थ को जाना चाहिए। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को वहाँ वृषभध्वज (शिव) के पास जाकर

श्लोक 76 (3.81.76)

लभेत सर्वकामान्हि स्वर्गलोकं च गच्छति । तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां शङ्करे कुरुनन्दन ॥

labheta sarvakāmānhi svargalokaṃ ca gacchati | tisraḥ koṭyastu tīrthānāṃ śaṅkare kurunandana

मनुष्य सारी कामनाएँ पाता है और स्वर्गलोक को जाता है। हे कुरुनन्दन, शंकर में तीन करोड़ तीर्थ हैं —

श्लोक 77 (3.81.77)

रुद्रकोट्यां तथा कूपे ह्रदेषु च महीपते । शुद्धास्पदं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम ॥

rudrakoṭyāṃ tathā kūpe hradeṣu ca mahīpate | śuddhāspadaṃ ca tatraiva tīrthaṃ bharatasattama

रुद्रकोटि में, कूप में और सरोवरों में, हे पृथ्वीपति। हे भरतश्रेष्ठ, वहीं शुद्धास्पद नामक तीर्थ भी है।

श्लोक 78 (3.81.78)

तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च दैवतानि पितॄनथ । न दुर्गतिमवाप्नोति वाजपेयं च विन्दति ॥

tatra snātvā'rcayitvā ca daivatāni pitṝnatha | na durgatimavāpnoti vājapeyaṃ ca vindati

वहाँ स्नान करके देवताओं और पितरों की पूजा करने वाला मनुष्य दुर्गति को नहीं पाता और वाजपेय यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 79 (3.81.79)

किंदाने च नरः स्नात्वा किंजप्ये च महीपते । अप्रमेयमवाप्नोति दानं जप्यं च भारत ॥

kiṃdāne ca naraḥ snātvā kiṃjapye ca mahīpate | aprameyamavāpnoti dānaṃ japyaṃ ca bhārata

हे पृथ्वीपति, किंदान और किंजप्य में स्नान करने वाला मनुष्य, हे भारत, दान और जप का अपार फल पाता है।

श्लोक 80 (3.81.80)

कलश्यां वार्युपस्पृश्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥

kalaśyāṃ vāryupaspṛśya śraddadhāno jitendriyaḥ | agniṣṭomasya yajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ

श्रद्धालु और जितेन्द्रिय मनुष्य कलशी में जल का स्पर्श करके अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 81 (3.81.81)

शंकरस्य तु पूर्वेण नारदस्य महात्मनः । तीर्थं कुरुकुलश्रेष्ठ अजानन्तेति विश्रुतम् ॥

śaṃkarasya tu pūrveṇa nāradasya mahātmanaḥ | tīrthaṃ kurukulaśreṣṭha ajānanteti viśrutam

हे कुरुकुलश्रेष्ठ, शंकर के पूर्व में महात्मा नारद का तीर्थ है, जो अजानन्त नाम से विख्यात है।

श्लोक 82 (3.81.82)

तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा प्राणानुत्सृज्य भारत । नारदेनाभ्यनुज्ञातो लोकान्प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥

tatra tīrthe naraḥ snātvā prāṇānutsṛjya bhārata | nāradenābhyanujñāto lokānprāpnotyanuttamān

हे भारत, उस तीर्थ में स्नान करके वहाँ प्राण त्यागने वाला मनुष्य नारद की अनुमति से सर्वोत्तम लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक 83 (3.81.83)

शुक्लपक्षे दशम्यां च पुण्डरीकं समाविशेत् । तत्र स्नात्वा नरो राजन्पौण्डरीकफलं लभेत् ॥

śuklapakṣe daśamyāṃ ca puṇḍarīkaṃ samāviśet | tatra snātvā naro rājanpauṇḍarīkaphalaṃ labhet

शुक्लपक्ष की दशमी को पुण्डरीक तीर्थ में प्रवेश करे; हे राजन्, वहाँ स्नान करके मनुष्य पौण्डरीक यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 84 (3.81.84)

ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रणाशिनी ॥

tatastriviṣṭapaṃ gacchettriṣu lokeṣu viśrutam | tatra vaitaraṇī puṇyā nadī pāpapraṇāśinī

फिर तीनों लोकों में विख्यात त्रिविष्टप को जाना चाहिए। वहाँ पापों का नाश करने वाली पवित्र नदी वैतरणी है।

श्लोक 85 (3.81.85)

तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् । सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥

tatra snātvā'rcayitvā ca śūlapāṇiṃ vṛṣadhvajam | sarvapāpaviśuddhātmā gaccheta paramāṃ gatim

वहाँ स्नान करके त्रिशूलधारी वृषभध्वज शिव की पूजा करने से मनुष्य सब पापों से शुद्ध होकर परम गति को जाता है।

श्लोक 86 (3.81.86)

ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम् । तत्र देवाः सदा राजन्फलकीवनमाश्रिताः ॥

tato gaccheta rājendra phalakīvanamuttamam | tatra devāḥ sadā rājanphalakīvanamāśritāḥ

फिर हे राजेन्द्र, उत्तम फलकीवन को जाना चाहिए। हे राजन्, वहाँ फलकीवन में देवता सदा निवास करते हैं

श्लोक 87 (3.81.87)

तपश्चरन्ति विपुलं बहुवर्षसहस्रकम् । दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥

tapaścaranti vipulaṃ bahuvarṣasahasrakam | dṛṣadvatyāṃ naraḥ snātvā tarpayitvā ca devatāḥ

और अनेक सहस्र वर्षों तक महान तप करते हैं। दृषद्वती में स्नान करके देवताओं का तर्पण करने वाला मनुष्य

श्लोक 88 (3.81.88)

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत । तीर्थे च सर्वदेवानां स्नात्वा भरतसत्तम ॥

agniṣṭomātirātrābhyāṃ phalaṃ vindati bhārata | tīrthe ca sarvadevānāṃ snātvā bharatasattama

हे भारत, अग्निष्टोम और अतिरात्र का फल पाता है। हे भरतश्रेष्ठ, सर्वदेवों के तीर्थ में स्नान करके

श्लोक 89 (3.81.89)

गोसहस्रस्य राजेन्द्र फलं विन्दति मानवः । पाणिखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥

gosahasrasya rājendra phalaṃ vindati mānavaḥ | pāṇikhāte naraḥ snātvā tarpayitvā ca devatāḥ

हे राजेन्द्र, मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है। पाणिखात में स्नान करके देवताओं का तर्पण करने वाला मनुष्य

श्लोक 90 (3.81.90)

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत । राजसूयमवाप्नोति ऋषिलोकं च विन्दति ॥

agniṣṭomātirātrābhyāṃ phalaṃ vindati bhārata | rājasūyamavāpnoti ṛṣilokaṃ ca vindati

हे भारत, अग्निष्टोम और अतिरात्र का फल पाता है; वह राजसूय का फल भी पाता है और ऋषिलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 91 (3.81.91)

ततो गच्छेत राजेन्द्र मिश्रकं तीर्थमुत्तमम् । तत्र तीर्थानि राजेन्द्र मिश्रितानि महात्मना ॥

tato gaccheta rājendra miśrakaṃ tīrthamuttamam | tatra tīrthāni rājendra miśritāni mahātmanā

फिर हे राजेन्द्र, उत्तम मिश्रक तीर्थ को जाना चाहिए। हे राजेन्द्र, वहाँ महात्मा

श्लोक 92 (3.81.92)

व्यासेन नृपशार्दूल द्विजार्थमिति नः श्रुतम् । सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ॥

vyāsena nṛpaśārdūla dvijārthamiti naḥ śrutam | sarvatīrtheṣu sa snāti miśrake snāti yo naraḥ

व्यास ने, हे नृपश्रेष्ठ, ब्राह्मणों के हित के लिए सब तीर्थों को मिला दिया था — ऐसा हमने सुना है। जो मनुष्य मिश्रक में स्नान करता है, वह मानो सब तीर्थों में स्नान कर लेता है।

श्लोक 93 (3.81.93)

ततो व्यासवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः । मनोजवे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥

tato vyāsavanaṃ gacchenniyato niyatāśanaḥ | manojave naraḥ snātvā gosahasraphalaṃ labhet

फिर संयमी और नियमित आहार वाला होकर व्यासवन जाए। मनोजव में स्नान करने वाला मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 94 (3.81.94)

गत्वा मधुवटीं चैव देव्याः स्थानं नरः शुचिः । तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितॄन्देवांश्च पूरुषः ॥

gatvā madhuvaṭīṃ caiva devyāḥ sthānaṃ naraḥ śuciḥ | tatra snātvā'rcayitvā ca pitṝndevāṃśca pūruṣaḥ

देवी के स्थान मधुवटी जाकर पवित्र मनुष्य वहाँ स्नान करे और पितरों तथा देवताओं की पूजा करे,

श्लोक 95 (3.81.95)

स देव्या समनुज्ञातो गोसहस्रफलं लभेत् । कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्याश्च भारत ॥

sa devyā samanujñāto gosahasraphalaṃ labhet | kauśikyāḥ saṃgame yastu dṛṣadvatyāśca bhārata

तो देवी की अनुमति पाकर सहस्र गोदान का फल पाता है। हे भारत, जो कौशिकी और दृषद्वती के संगम पर

श्लोक 96 (3.81.96)

स्नाति वै नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते । ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता ॥

snāti vai niyatāhāraḥ sarvapāpaiḥ pramucyate | tato vyāsasthalī nāma yatra vyāsena dhīmatā

नियमित आहार रखते हुए स्नान करता है, वह सब पापों से छूट जाता है। फिर व्यासस्थली नामक स्थान है, जहाँ बुद्धिमान व्यास ने

श्लोक 97 (3.81.97)

पुत्रशोकाभितप्तेन देहत्यागे कृता मतिः । ततो देवैस्तु राजेन्द्र पुनरुत्थापितस्तदा ॥

putraśokābhitaptena dehatyāge kṛtā matiḥ | tato devaistu rājendra punarutthāpitastadā

पुत्रशोक से सन्तप्त होकर देहत्याग का निश्चय किया था; तब हे राजेन्द्र, देवताओं ने उन्हें फिर से उठाया था।

श्लोक 98 (3.81.98)

अभिगत्वा स्थलीं तस्य गोसहस्रफलं लभेत् । किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च ॥

abhigatvā sthalīṃ tasya gosahasraphalaṃ labhet | kiṃdattaṃ kūpamāsādya tilaprasthaṃ pradāya ca

उनकी उस स्थली पर जाने से सहस्र गोदान का फल मिलता है। किंदत्त नामक कूप पर पहुँचकर एक प्रस्थ तिल का दान करने से

श्लोक 99 (3.81.99)

गच्छेत परमां सिद्धिमृणैर्मुक्तः कुरूद्वह । वेदीतीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥

gaccheta paramāṃ siddhimṛṇairmuktaḥ kurūdvaha | vedītīrthe naraḥ snātvā gosahasraphalaṃ labhet

हे कुरुश्रेष्ठ, मनुष्य ऋणों से मुक्त होकर परम सिद्धि को जाता है। वेदीतीर्थ में स्नान करने वाला सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 100 (3.81.100)

अहश्च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते । तयोः स्नात्वा नरव्याघ्र सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥

ahaśca sudinaṃ caiva dve tīrthe lokaviśrute | tayoḥ snātvā naravyāghra sūryalokamavāpnuyāt

अहन् और सुदिन — ये दो लोकविख्यात तीर्थ हैं; हे नरव्याघ्र, इनमें स्नान करके मनुष्य सूर्यलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 101 (3.81.101)

मृगधूमं ततो गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां नृपसत्तम ॥

mṛgadhūmaṃ tato gacchettriṣu lokeṣu viśrutam | tatrābhiṣekaṃ kurvīta gaṅgāyāṃ nṛpasattama

फिर तीनों लोकों में विख्यात मृगधूम को जाना चाहिए, और हे नृपश्रेष्ठ, वहाँ गंगा में स्नान करे;

श्लोक 102 (3.81.102)

अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् । देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥

arcayitvā mahādevamaśvamedhaphalaṃ labhet | devyāstīrthe naraḥ snātvā gosahasraphalaṃ labhet

महादेव की पूजा करने से अश्वमेध का फल मिलता है। देवी के तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 103 (3.81.103)

ततो वामनकं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम् ॥

tato vāmanakaṃ gacchettriṣu lokeṣu viśrutam | tatra viṣṇupade snātvā arcayitvā ca vāmanam

फिर तीनों लोकों में विख्यात वामनक को जाना चाहिए। वहाँ विष्णुपद में स्नान करके और वामन की पूजा करके

श्लोक 104 (3.81.104)

सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति । कुलंपुने नरः स्नात्वा पुनाति स्वकुलं ततः ॥

sarvapāpaviśuddhātmā viṣṇulokaṃ sa gacchati | kulaṃpune naraḥ snātvā punāti svakulaṃ tataḥ

वह सब पापों से शुद्ध होकर विष्णुलोक को जाता है। कुलम्पुन तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य अपने कुल को पवित्र कर देता है।

श्लोक 105 (3.81.105)

पवनस्य ह्रदे स्नात्वा मरुतां तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विष्णुलोके महीयते ॥

pavanasya hrade snātvā marutāṃ tīrthamuttamam | tatra snātvā naravyāghra viṣṇuloke mahīyate

पवन (वायु) के सरोवर में, जो मरुद्गणों का उत्तम तीर्थ है, स्नान करके — हे नरव्याघ्र, वहाँ स्नान करने वाला विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 106 (3.81.106)

अमराणां ह्रदे स्नात्वा समभ्यर्च्यामराधिपम् । अमराणां प्रभावेन स्वर्गलोके महीयते ॥

amarāṇāṃ hrade snātvā samabhyarcyāmarādhipam | amarāṇāṃ prabhāvena svargaloke mahīyate

अमरों के सरोवर में स्नान करके और अमरों के स्वामी इन्द्र की पूजा करके मनुष्य देवताओं के प्रभाव से स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 107 (3.81.107)

शालिहोत्रस्य तीर्थे च शालिशूर्पे यथाविधि । स्नात्वा नरवरश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् ॥

śālihotrasya tīrthe ca śāliśūrpe yathāvidhi | snātvā naravaraśreṣṭha gosahasraphalaṃ labhet

शालिहोत्र के तीर्थ शालिशूर्प में विधिपूर्वक स्नान करके, हे नरश्रेष्ठ, मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 108 (3.81.108)

श्रीकुञ्जं च सरस्वत्यास्तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥

śrīkuñjaṃ ca sarasvatyāstīrthaṃ bharatasattama | tatra snātvā naraśreṣṭha agniṣṭomaphalaṃ labhet

हे भरतश्रेष्ठ, श्रीकुंज भी सरस्वती का एक तीर्थ है; हे नरश्रेष्ठ, वहाँ स्नान करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

श्लोक 109 (3.81.109)

ततो नैमिषकुञ्जं च समासाद्य कुरूद्वह । ऋषयः किल राजेन्द्र नैमिषेयास्तपस्विनः ॥

tato naimiṣakuñjaṃ ca samāsādya kurūdvaha | ṛṣayaḥ kila rājendra naimiṣeyāstapasvinaḥ

हे कुरुनन्दन, फिर नैमिषकुंज पहुँचना चाहिए। हे राजेन्द्र, कहते हैं कि नैमिषारण्य के तपस्वी ऋषि

श्लोक 110 (3.81.110)

तीर्थयात्रां पुरस्कृत्य कुरुक्षेत्रं गताः पुरा । तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् । ततः कुञ्जः सरस्वत्याः कृतो भरतसत्तम ॥

tīrthayātrāṃ puraskṛtya kurukṣetraṃ gatāḥ purā | tatra tīrthe naraḥ snātvā vājimedhaphalaṃ labhet | tataḥ kuñjaḥ sarasvatyāḥ kṛto bharatasattama

प्राचीन काल में तीर्थयात्रा का संकल्प लेकर कुरुक्षेत्र आए थे। उस तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है। हे भरतश्रेष्ठ, तब सरस्वती के तट पर एक कुंज बनाया गया,

श्लोक 111 (3.81.111)

ऋषीणामवकाशः स्याद्यथा तुष्टिकरो महान् । कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥

ṛṣīṇāmavakāśaḥ syādyathā tuṣṭikaro mahān | kanyātīrthe naraḥ snātvā gosahasraphalaṃ labhet

जिससे ऋषियों को ठहरने का स्थान मिले और उन्हें बड़ा संतोष हो। कन्यातीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 112 (3.81.112)

ततो गच्छेत धर्मज्ञ कन्यातीर्थमनुत्तमम् । कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥

tato gaccheta dharmajña kanyātīrthamanuttamam | kanyātīrthe naraḥ snātvā agniṣṭomaphalaṃ labhet

हे धर्मज्ञ, फिर अनुपम कन्यातीर्थ को जाना चाहिए। कन्यातीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है।

श्लोक 113 (3.81.113)

ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणस्तीर्थमुत्तमम् । तत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः ॥

tato gaccheta rājendra brahmaṇastīrthamuttamam | tatra varṇāvaraḥ snātvā brāhmaṇyaṃ labhate naraḥ

हे राजेन्द्र, फिर ब्रह्मा के उत्तम तीर्थ को जाना चाहिए। वहाँ स्नान करके निम्न वर्ण का मनुष्य ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है,

श्लोक 114 (3.81.114)

ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् । ततो गच्छेन्नरश्रेष्ठ सोमतीर्थमनुत्तमम् ॥

brāhmaṇaśca viśuddhātmā gaccheta paramāṃ gatim | tato gacchennaraśreṣṭha somatīrthamanuttamam

और ब्राह्मण शुद्धात्मा होकर परम गति को प्राप्त होता है। हे नरश्रेष्ठ, फिर अनुपम सोमतीर्थ को जाना चाहिए।

श्लोक 115 (3.81.115)

तत्र स्नात्वा नरो राजन्सोमलोकमवाप्नुयात् । सप्तसारस्वतं तीर्थं ततो गच्छेन्नराधिप ॥

tatra snātvā naro rājansomalokamavāpnuyāt | saptasārasvataṃ tīrthaṃ tato gacchennarādhipa

हे राजन्, वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य सोमलोक प्राप्त करता है। हे नरेश, फिर सप्तसारस्वत तीर्थ को जाना चाहिए,

श्लोक 116 (3.81.116)

यत्र मङ्कणकः सिद्धो महर्षिर्लोकविश्रुतः । पुरा मङ्कणको राजन्कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् ॥

yatra maṅkaṇakaḥ siddho maharṣirlokaviśrutaḥ | purā maṅkaṇako rājankuśāgreṇeti naḥ śrutam

जहाँ लोकविख्यात महर्षि मंकणक सिद्ध हुए थे। हे राजन्, हमने सुना है कि प्राचीन काल में मंकणक का

श्लोक 117 (3.81.117)

क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् । स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ॥

kṣataḥ kila kare rājaṃstasya śākaraso'sravat | sa vai śākarasaṃ dṛṣṭvā harṣāviṣṭaḥ pranṛttavān

हे राजन्, कहते हैं कि कुश की नोक से हाथ कट गया और उससे शाक का रस बहने लगा। उस शाक-रस को देखकर वे हर्ष से भर गए और नाचने लगे।

श्लोक 118 (3.81.118)

ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते तु स्थावरं जङ्गमं च यत् । प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ॥

tatastasminpranṛtte tu sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca yat | pranṛttamubhayaṃ vīra tejasā tasya mohitam

हे वीर, उनके नाचने पर जो कुछ स्थावर और जंगम है, वह सब भी उनके तेज से मोहित होकर नाचने लगा।

श्लोक 119 (3.81.119)

ब्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः । विज्ञप्तो वै महादेव ऋषेरर्थे नराधिप ॥

brahmādibhiḥ surai rājannṛṣibhiśca tapodhanaiḥ | vijñapto vai mahādeva ṛṣerarthe narādhipa

हे राजन्, तब ब्रह्मा आदि देवताओं और तपोधन ऋषियों ने उस ऋषि के विषय में महादेव से निवेदन किया, हे नरेश —

श्लोक 120 (3.81.120)

नायं नृत्येद्यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि । तं प्रनृत्तं समासाद्य हर्षाविष्टेन चेतसा । सुराणां हितकामार्थमृषिं देवोऽभ्यभाषत ॥

nāyaṃ nṛtyedyathā deva tathā tvaṃ kartumarhasi | taṃ pranṛttaṃ samāsādya harṣāviṣṭena cetasā | surāṇāṃ hitakāmārthamṛṣiṃ devo'bhyabhāṣata

"हे देव, आप ऐसा करें जिससे ये नाचना बंद कर दें।" तब हर्ष से भरे चित्त वाले उस नाचते हुए ऋषि के पास जाकर देवताओं के हित के लिए महादेव ने उनसे कहा —

श्लोक 121 (3.81.121)

भोभो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् । हर्षस्थानं किमर्थं वा तवाद्य मुनिपुङ्गव ॥

bhobho maharṣe dharmajña kimarthaṃ nṛtyate bhavān | harṣasthānaṃ kimarthaṃ vā tavādya munipuṅgava

"अरे महर्षे, धर्मज्ञ! आप किसलिए नाच रहे हैं? हे मुनिश्रेष्ठ, आज आपके हर्ष का कारण क्या है?"

ऋषिरुवाच

श्लोक 122 (3.81.122)

तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम । किं न पश्यसि मे ब्रह्मन्कराच्छाकरसं स्रुतम् ॥

tapasvino dharmapathe sthitasya dvijasattama | kiṃ na paśyasi me brahmankarācchākarasaṃ srutam

"हे द्विजश्रेष्ठ, मैं धर्म के मार्ग पर स्थित तपस्वी हूँ। हे ब्रह्मन्, क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथ से शाक का रस बहा है,

श्लोक 123 (3.81.123)

यं दृष्ट्वाऽहं प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महताऽन्वितः ॥

yaṃ dṛṣṭvā'haṃ pranṛtto'haṃ harṣeṇa mahatā'nvitaḥ

जिसे देखकर मैं महान हर्ष से भरकर नाच रहा हूँ?"

पुलस्त्य उवाच

श्लोक 124 (3.81.124)

तं प्रहस्याब्रवीद्देव ऋषिं रागेण मोहितम् ॥

taṃ prahasyābravīddeva ṛṣiṃ rāgeṇa mohitam

तब महादेव ने हँसकर राग से मोहित उस ऋषि से कहा —

श्लोक 125 (3.81.125)

अहं तु विस्मयं विप्र न गच्छामीति पश्य माम् । एवमुक्त्वा नरश्रेष्ठ महादेवेन धीमता ॥

ahaṃ tu vismayaṃ vipra na gacchāmīti paśya mām | evamuktvā naraśreṣṭha mahādevena dhīmatā

"हे विप्र, मुझे तो इस पर कोई विस्मय नहीं होता — मुझे देखो!" हे नरश्रेष्ठ, ऐसा कहकर बुद्धिमान महादेव ने

श्लोक 126 (3.81.126)

अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वाङ्गुष्ठस्ताडितोऽनघ । ततो भस्म क्षताद्राजन्निर्गतं हिमसन्निभम् ॥

aṅgulyagreṇa rājendra svāṅguṣṭhastāḍito'nagha | tato bhasma kṣatādrājannirgataṃ himasannibham

हे निष्पाप राजेन्द्र, अपनी उँगली के अग्रभाग से अपने अँगूठे पर आघात किया। हे राजन्, तब उस घाव से हिम के समान श्वेत भस्म निकली।

श्लोक 127 (3.81.127)

तद्दृष्ट्वा व्रीडितो राजन्स मुनिः पादयोर्गतः । नान्यद्देवात्परं मेने रुद्रात्परतरं महत् ॥

taddṛṣṭvā vrīḍito rājansa muniḥ pādayorgataḥ | nānyaddevātparaṃ mene rudrātparataraṃ mahat

हे राजन्, उसे देखकर वे मुनि लज्जित होकर उनके चरणों में गिर पड़े। उन्होंने रुद्र से बढ़कर और कोई महान देवता नहीं माना।

श्लोक 128 (3.81.128)

सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृत् । त्वया सर्वमिदं सृष्टं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥

surāsurasya jagato gatistvamasi śūladhṛt | tvayā sarvamidaṃ sṛṣṭaṃ trailokyaṃ sacarācaram

"हे त्रिशूलधारी, देवताओं और असुरों सहित समस्त जगत के आश्रय आप ही हैं। आपने ही चर-अचर सहित यह सम्पूर्ण त्रिलोकी रची है।

श्लोक 129 (3.81.129)

त्वमेव सर्वान्ग्रससि पुनरेव युगक्षये । देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ॥

tvameva sarvāngrasasi punareva yugakṣaye | devairapi na śakyastvaṃ parijñātuṃ kuto mayā

"युग के अन्त में आप ही फिर सबको ग्रस लेते हैं। देवता भी आपको पूरी तरह नहीं जान सकते, तो मैं कैसे जान सकता हूँ?

श्लोक 130 (3.81.130)

त्वयि सर्वे प्रदृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ । सर्वस्त्वमसि लोकानां कर्ता कारयिता च ह ॥

tvayi sarve pradṛśyante surā brahmādayo'nagha | sarvastvamasi lokānāṃ kartā kārayitā ca ha

"हे निष्पाप, ब्रह्मा आदि सभी देवता आपमें ही दिखाई देते हैं। आप ही सब कुछ हैं; आप ही लोकों के कर्ता और कराने वाले हैं।

श्लोक 131 (3.81.131)

त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे निवसन्त्यकुतोभयाः । एवं स्तुत्वा महादेवमृषिर्वचनमब्रवीत् ॥

tvatprasādātsurāḥ sarve nivasantyakutobhayāḥ | evaṃ stutvā mahādevamṛṣirvacanamabravīt

"आपकी कृपा से ही सब देवता निर्भय होकर निवास करते हैं।" इस प्रकार महादेव की स्तुति करके ऋषि ने यह वचन कहा —

श्लोक 132 (3.81.132)

त्वत्प्रसादान्महादेव तपो मे न क्षरेत वै । ततो देवः प्रहृष्टात्मा ब्रह्मर्षिमिदमब्रवीत् ॥

tvatprasādānmahādeva tapo me na kṣareta vai | tato devaḥ prahṛṣṭātmā brahmarṣimidamabravīt

"हे महादेव, आपकी कृपा से मेरा तप कभी क्षीण न हो।" तब प्रसन्नचित्त महादेव ने उस ब्रह्मर्षि से यह कहा —

श्लोक 133 (3.81.133)

तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात्सहस्रशः । आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सह महामुने ॥

tapaste vardhatāṃ vipra matprasādātsahasraśaḥ | āśrame ceha vatsyāmi tvayā saha mahāmune

"हे विप्र, मेरी कृपा से तुम्हारा तप हजार गुना बढ़े। हे महामुने, मैं भी यहाँ इस आश्रम में तुम्हारे साथ निवास करूँगा।

श्लोक 134 (3.81.134)

सप्तसारस्वते स्नात्वा अर्चयिष्यन्ति ये तु माम् । न तेषां दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च ॥

saptasārasvate snātvā arcayiṣyanti ye tu mām | na teṣāṃ durlabhaṃ kiṃcidiha loke paratra ca

"जो लोग सप्तसारस्वत में स्नान करके मेरी पूजा करेंगे, उनके लिए इस लोक में या परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा,

श्लोक 135 (3.81.135)

सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः । एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥

sārasvataṃ ca te lokaṃ gamiṣyanti na saṃśayaḥ | evamuktvā mahādevastatraivāntaradhīyata

और वे निःसन्देह सारस्वत लोक को जाएँगे।" ऐसा कहकर महादेव वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 136 (3.81.136)

ततस्त्वौशनसं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥

tatastvauśanasaṃ gacchettriṣu lokeṣu viśrutam | yatra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ

फिर तीनों लोकों में विख्यात औशनस तीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि

श्लोक 137 (3.81.137)

कार्तिकेयश्च भगवांस्त्रिसंध्यं किल भारत । सान्निध्यमकरोन्नित्यं भार्गवप्रियकाम्यया ॥

kārtikeyaśca bhagavāṃstrisaṃdhyaṃ kila bhārata | sānnidhyamakaronnityaṃ bhārgavapriyakāmyayā

और भगवान कार्तिकेय, हे भारत, कहते हैं कि भार्गव (शुक्राचार्य) को प्रसन्न करने की इच्छा से तीनों संध्याओं में सदा उपस्थित रहते थे।

श्लोक 138 (3.81.138)

कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

kapālamocanaṃ tīrthaṃ sarvapāpapramocanam | tatra snātvā naravyāghra sarvapāpaiḥ pramucyate

कपालमोचन तीर्थ सब पापों से छुड़ाने वाला है; हे नरव्याघ्र, वहाँ स्नान करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 139 (3.81.139)

अग्नितीर्थं ततो गच्छेत्तत्र स्नात्वा नरर्षभ । अग्निलोकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥

agnitīrthaṃ tato gacchettatra snātvā nararṣabha | agnilokamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet

फिर अग्नितीर्थ को जाना चाहिए; हे नरश्रेष्ठ, वहाँ स्नान करके मनुष्य अग्निलोक पाता है और अपने कुल का भी उद्धार करता है।

श्लोक 140 (3.81.140)

विश्वामित्रस्य तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ ब्राह्मण्यमधिगच्छति ॥

viśvāmitrasya tatraiva tīrthaṃ bharatasattama | tatra snātvā naraśreṣṭha brāhmaṇyamadhigacchati

हे भरतश्रेष्ठ, वहीं विश्वामित्र का तीर्थ है; हे नरश्रेष्ठ, वहाँ स्नान करने से ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है।

श्लोक 141 (3.81.141)

ब्रह्मयोनिं समासाद्य शुचिः प्रयतमानसः । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥

brahmayoniṃ samāsādya śuciḥ prayatamānasaḥ | tatra snātvā naravyāghra brahmalokaṃ prapadyate

शुद्ध और संयत मन से ब्रह्मयोनि पहुँचकर वहाँ स्नान करने वाला, हे नरव्याघ्र, ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है

श्लोक 142 (3.81.142)

पुनात्यासप्तमं चैव कुलं नास्त्यत्र संशयः । ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥

punātyāsaptamaṃ caiva kulaṃ nāstyatra saṃśayaḥ | tato gaccheta rājendra tīrthaṃ trailokyaviśrutam

और सात पीढ़ियों तक अपने कुल को पवित्र कर देता है, इसमें संशय नहीं। हे राजेन्द्र, फिर त्रिलोकी में विख्यात उस तीर्थ को जाना चाहिए

श्लोक 143 (3.81.143)

पृथूदकमिति ख्यातं कार्तिकेयस्य वै नृप । तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥

pṛthūdakamiti khyātaṃ kārtikeyasya vai nṛpa | tatrābhiṣekaṃ kurvīta pitṛdevārcane rataḥ

जो पृथूदक नाम से प्रसिद्ध है और हे नृप, कार्तिकेय का तीर्थ है। वहाँ पितरों और देवताओं के पूजन में तत्पर होकर स्नान करना चाहिए।

श्लोक 144 (3.81.144)

अज्ञानाज्ज्ञानतो वाऽपि स्त्रिया वा पुरुषेण वा । यत्किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना ॥

ajñānājjñānato vā'pi striyā vā puruṣeṇa vā | yatkiṃcidaśubhaṃ karma kṛtaṃ mānuṣabuddhinā

अनजाने में या जानबूझकर, स्त्री ने या पुरुष ने, मानव-बुद्धि से जो कुछ भी अशुभ कर्म किया हो,

श्लोक 145 (3.81.145)

तत्सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत । अश्वमेधफलं चास्य स्वर्गलोकं च गच्छति ॥

tatsarvaṃ naśyate tatra snātamātrasya bhārata | aśvamedhaphalaṃ cāsya svargalokaṃ ca gacchati

हे भारत, वहाँ स्नान करते ही वह सब नष्ट हो जाता है; उसे अश्वमेध का फल मिलता है और वह स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 146 (3.81.146)

पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात्सरस्वती । सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ॥

puṇyamāhuḥ kurukṣetraṃ kurukṣetrātsarasvatī | sarasvatyāśca tīrthāni tīrthebhyaśca pṛthūdakam

कहते हैं कि कुरुक्षेत्र पवित्र है; कुरुक्षेत्र से अधिक पवित्र सरस्वती है; सरस्वती से अधिक उसके तीर्थ, और उन तीर्थों से अधिक पृथूदक।

श्लोक 147 (3.81.147)

उत्तमे सर्वतीर्थानां यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् । पृथूदके जप्यपरो नैव श्वो मरणं तपेत् ॥

uttame sarvatīrthānāṃ yastyajedātmanastanum | pṛthūdake japyaparo naiva śvo maraṇaṃ tapet

जो जप में लगा हुआ मनुष्य सब तीर्थों में उत्तम पृथूदक में अपना शरीर त्यागता है, उसे फिर कभी मृत्यु का कष्ट नहीं सताता।

श्लोक 148 (3.81.148)

गीतं सनत्कुमारेण व्यासेन च महात्मना । वेदे च नियतं राजन्नभिगच्छेत्पृथूदकम् ॥

gītaṃ sanatkumāreṇa vyāsena ca mahātmanā | vede ca niyataṃ rājannabhigacchetpṛthūdakam

हे राजन्, यह सनत्कुमार और महात्मा व्यास ने कहा है, और वेद में भी नियत है कि पृथूदक की यात्रा करनी चाहिए।

श्लोक 149 (3.81.149)

पृथूदकात्तीर्थतमं नान्यत्तीर्थं कुरूद्वह । तन्मेध्यं तत्पवित्रं च पावनं च न संशयः ॥

pṛthūdakāttīrthatamaṃ nānyattīrthaṃ kurūdvaha | tanmedhyaṃ tatpavitraṃ ca pāvanaṃ ca na saṃśayaḥ

हे कुरुनन्दन, पृथूदक से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है; वह मेध्य है, पवित्र है और पावन करने वाला है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 150 (3.81.150)

तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति येऽपि पापकृतो नराः । पृथूदके नरश्रेष्ठ एवमाहुर्मनीषिणः ॥

tatra snātvā divaṃ yānti ye'pi pāpakṛto narāḥ | pṛthūdake naraśreṣṭha evamāhurmanīṣiṇaḥ

वहाँ स्नान करके पाप करने वाले मनुष्य भी स्वर्ग जाते हैं। हे नरश्रेष्ठ, मनीषी पृथूदक के विषय में ऐसा ही कहते हैं।

श्लोक 151 (3.81.151)

मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ॥

madhusravaṃ ca tatraiva tīrthaṃ bharatasattama | tatra snātvā naro rājangosahasraphalaṃ labhet

हे भरतश्रेष्ठ, वहीं मधुस्रव नामक तीर्थ है; हे राजन्, वहाँ स्नान करने वाला सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 152 (3.81.152)

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं देव्या यथाक्रमम् । सरस्वत्यारुणायाश्च संगमे लोकविश्रुते ॥

tato gaccheta rājendra tīrthaṃ devyā yathākramam | sarasvatyāruṇāyāśca saṃgame lokaviśrute

हे राजेन्द्र, फिर क्रम से देवी के तीर्थ को जाना चाहिए, जो सरस्वती और अरुणा के लोकविख्यात संगम पर है।

श्लोक 153 (3.81.153)

त्रिरात्रोपोषितः स्नात्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः ॥

trirātropoṣitaḥ snātvā mucyate brahmahatyayā | agniṣṭomātirātrābhyāṃ phalaṃ vindati mānavaḥ

तीन रात उपवास करके वहाँ स्नान करने से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है और अग्निष्टोम तथा अतिरात्र यज्ञों का फल पाता है,

श्लोक 154 (3.81.154)

आसप्तमं कुलं चैव पुनाति भरतर्षभ । अवतीर्णं च तत्रैव तीर्थं कुरुकुलोद्वह ॥

āsaptamaṃ kulaṃ caiva punāti bharatarṣabha | avatīrṇaṃ ca tatraiva tīrthaṃ kurukulodvaha

और हे भरतश्रेष्ठ, सात पीढ़ियों तक कुल को पवित्र करता है। हे कुरुकुलश्रेष्ठ, वहीं अवतीर्ण नामक तीर्थ है,

श्लोक 155 (3.81.155)

विप्राणामनुकम्पार्थं शार्ङ्गिणा निर्मितं पुरा । व्रतोपनयनाभ्यां चाप्युपवासेन वाऽप्युत ॥

viprāṇāmanukampārthaṃ śārṅgiṇā nirmitaṃ purā | vratopanayanābhyāṃ cāpyupavāsena vā'pyuta

जिसे प्राचीन काल में शार्ङ्गधारी विष्णु ने ब्राह्मणों पर कृपा करने के लिए बनाया था। व्रत और उपनयन से, अथवा उपवास से,

श्लोक 156 (3.81.156)

क्रियामन्त्रैश्च संयुक्तो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्रियामन्त्रविहीनोऽपि तत्र स्नात्वा नरर्षभ । चीर्णव्रतो भवेद्विद्वान्दृष्टमेतत्पुरातनैः ॥

kriyāmantraiśca saṃyukto brāhmaṇaḥ syānna saṃśayaḥ | kriyāmantravihīno'pi tatra snātvā nararṣabha | cīrṇavrato bhavedvidvāndṛṣṭametatpurātanaiḥ

मनुष्य क्रियाओं और मन्त्रों से युक्त ब्राह्मण हो जाता है, इसमें संशय नहीं। हे नरश्रेष्ठ, क्रिया और मन्त्र से रहित व्यक्ति भी वहाँ स्नान करके व्रत पूर्ण किया हुआ विद्वान हो जाता है; यह प्राचीन लोगों ने देखा है।

श्लोक 157 (3.81.157)

समुद्राश्चापि चत्वारः समानीताश्च दर्भिणा । तेषु स्नातो नरश्रेष्ठ न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥

samudrāścāpi catvāraḥ samānītāśca darbhiṇā | teṣu snāto naraśreṣṭha na durgatimavāpnuyāt

दर्भी मुनि चारों समुद्रों को भी वहाँ ले आए थे; हे नरश्रेष्ठ, उनमें स्नान करने वाला मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता,

श्लोक 158 (3.81.158)

फलानि गोसहस्राणां चतुर्णां विन्दते च सः । ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं शतसहस्रकम् ॥

phalāni gosahasrāṇāṃ caturṇāṃ vindate ca saḥ | tato gaccheta dharmajña tīrthaṃ śatasahasrakam

और वह चार हजार गोदान का फल पाता है। हे धर्मज्ञ, फिर शतसहस्रक तीर्थ को जाना चाहिए

श्लोक 159 (3.81.159)

साहस्रकं च तत्रैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते । उभयोर्हि नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥

sāhasrakaṃ ca tatraiva dve tīrthe lokaviśrute | ubhayorhi naraḥ snātvā gosahasraphalaṃ labhet

और वहीं साहस्रक तीर्थ भी है — ये दोनों तीर्थ लोकविख्यात हैं। दोनों में स्नान करने वाला मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 160 (3.81.160)

दानं वाऽप्युपवासो वा सहस्रगुणितं भवेत् । ततो गच्छेत राजेन्द्र रेणुकातीर्थमुत्तमम् ॥

dānaṃ vā'pyupavāso vā sahasraguṇitaṃ bhavet | tato gaccheta rājendra reṇukātīrthamuttamam

वहाँ किया गया दान या उपवास हजार गुना हो जाता है। हे राजेन्द्र, फिर उत्तम रेणुकातीर्थ को जाना चाहिए।

श्लोक 161 (3.81.161)

तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः । सर्वपापविशुद्धात्मा अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥

tatrābhiṣekaṃ kurvīta pitṛdevārcane rataḥ | sarvapāpaviśuddhātmā agniṣṭomaphalaṃ labhet

वहाँ पितरों और देवताओं के पूजन में तत्पर होकर स्नान करना चाहिए; सब पापों से शुद्ध होकर मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है।

श्लोक 162 (3.81.162)

विमोचनमुपस्पृश्य जितमन्युर्जितेन्द्रियः । प्रतिग्रहकृतैर्दोषैः सर्वैः स परिमुच्यते ॥

vimocanamupaspṛśya jitamanyurjitendriyaḥ | pratigrahakṛtairdoṣaiḥ sarvaiḥ sa parimucyate

क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर विमोचन तीर्थ के जल का स्पर्श करने वाला मनुष्य दान ग्रहण करने से लगे सभी दोषों से छूट जाता है।

श्लोक 163 (3.81.163)

ततः पञ्चवटीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । पुण्येन महता युक्तः सतां लोके महीयते ॥

tataḥ pañcavaṭīṃ gatvā brahmacārī jitendriyaḥ | puṇyena mahatā yuktaḥ satāṃ loke mahīyate

फिर ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय होकर पंचवटी जाने वाला महान पुण्य से युक्त होकर सत्पुरुषों के लोक में प्रतिष्ठित होता है,

श्लोक 164 (3.81.164)

यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वयमेव वृषध्वजः । तमर्चयित्वा देवेशं गमनादेव सिद्ध्यति ॥

yatra yogeśvaraḥ sthāṇuḥ svayameva vṛṣadhvajaḥ | tamarcayitvā deveśaṃ gamanādeva siddhyati

क्योंकि वहाँ योगेश्वर, वृषभध्वज स्थाणु (शिव) स्वयं विराजते हैं। उन देवेश्वर की पूजा करके मनुष्य वहाँ जाने मात्र से सिद्धि पा लेता है।

श्लोक 165 (3.81.165)

तैजसं वारुणं तीर्थं दीप्यमानं स्वतेजसा । यत्र ब्रह्मादिभिर्देवैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः ॥

taijasaṃ vāruṇaṃ tīrthaṃ dīpyamānaṃ svatejasā | yatra brahmādibhirdevairṛṣibhiśca tapodhanaiḥ

वरुण का तैजस तीर्थ अपने तेज से देदीप्यमान है। वहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं और तपोधन ऋषियों ने

श्लोक 166 (3.81.166)

सैनापत्येन देवानामभिषिक्तो गुहस्तदा । तैजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह ॥

saināpatyena devānāmabhiṣikto guhastadā | taijasasya tu pūrveṇa kurutīrthaṃ kurūdvaha

गुह (स्कन्द) को देवताओं के सेनापति पद पर अभिषिक्त किया था। हे कुरुनन्दन, तैजस के पूर्व में कुरुतीर्थ है।

श्लोक 167 (3.81.167)

कुरुतीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥

kurutīrthe naraḥ snātvā brahmacārī jitendriyaḥ | sarvapāpaviśuddhātmā brahmalokaṃ prapadyate

ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय होकर कुरुतीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य सब पापों से शुद्ध होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 168 (3.81.168)

स्वर्गद्वारं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः । स्वर्गलोकमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥

svargadvāraṃ tato gacchenniyato niyatāśanaḥ | svargalokamavāpnoti brahmalokaṃ ca gacchati

फिर संयमी और नियताहारी होकर स्वर्गद्वार जाना चाहिए; वहाँ जाने वाला स्वर्गलोक पाता है और ब्रह्मलोक को भी जाता है।

श्लोक 169 (3.81.169)

ततो गच्छेदनरकं तीर्थसेवी नराधिप । तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥

tato gacchedanarakaṃ tīrthasevī narādhipa | tatra snātvā naro rājanna durgatimavāpnuyāt

हे नरेश, फिर तीर्थसेवी को अनरक तीर्थ जाना चाहिए; हे राजन्, वहाँ स्नान करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 170 (3.81.170)

तत्र ब्रह्मा स्वयं नित्यं देवैः सह महीपते । अन्वास्यते नरश्रेष्ठ नारायणपुरोगमैः ॥

tatra brahmā svayaṃ nityaṃ devaiḥ saha mahīpate | anvāsyate naraśreṣṭha nārāyaṇapurogamaiḥ

हे पृथ्वीपति, वहाँ ब्रह्मा स्वयं देवताओं के साथ नित्य विराजमान रहते हैं; हे नरश्रेष्ठ, नारायण आदि देवता उनकी उपासना करते हैं।

श्लोक 171 (3.81.171)

सान्निध्यं तत्र राजेन्द्र रुद्रपत्न्याः कुरूद्वह । अभिगम्य च तां देवीं न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥

sānnidhyaṃ tatra rājendra rudrapatnyāḥ kurūdvaha | abhigamya ca tāṃ devīṃ na durgatimavāpnuyāt

हे राजेन्द्र, हे कुरुनन्दन, वहाँ रुद्र की पत्नी (पार्वती) का भी सान्निध्य है; उस देवी के समीप जाने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 172 (3.81.172)

तत्रैव च महाराज विश्वेश्वरमुमापतिम् । अभिगम्य महादेवं मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥

tatraiva ca mahārāja viśveśvaramumāpatim | abhigamya mahādevaṃ mucyate sarvakilviṣaiḥ

हे महाराज, वहीं विश्वेश्वर उमापति महादेव के समीप जाकर मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 173 (3.81.173)

नारायणं चाभिगम्य पद्मनाभमरिंदम । राजमानो महाराज विष्णुलोकं च गच्छति ॥

nārāyaṇaṃ cābhigamya padmanābhamariṃdama | rājamāno mahārāja viṣṇulokaṃ ca gacchati

हे शत्रुदमन, पद्मनाभ नारायण के समीप जाकर, हे महाराज, मनुष्य शोभायमान होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 174 (3.81.174)

तीर्थेषु सर्वदेवानां स्नातः स पुरुषर्षभ । सर्वदुःखैः परित्यक्तो द्योतते शशिवन्नरः ॥

tīrtheṣu sarvadevānāṃ snātaḥ sa puruṣarṣabha | sarvaduḥkhaiḥ parityakto dyotate śaśivannaraḥ

हे पुरुषश्रेष्ठ, सब देवताओं के तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य सब दुःखों से छूटकर चन्द्रमा के समान प्रकाशित होता है।

श्लोक 175 (3.81.175)

ततः स्वस्तिपुरं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप । प्रदक्षिणमुपावृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥

tataḥ svastipuraṃ gacchettīrthasevī narādhipa | pradakṣiṇamupāvṛtya gosahasraphalaṃ labhet

हे नरेश, फिर तीर्थसेवी को स्वस्तिपुर जाना चाहिए; उसकी प्रदक्षिणा करके वह सहस्र गोदान का फल पाता है।

श्लोक 176 (3.81.176)

पावनं तीर्थमासाद्य तर्पयेत्पितृदेवताः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥

pāvanaṃ tīrthamāsādya tarpayetpitṛdevatāḥ | agniṣṭomasya yajñasya phalaṃ prāpnoti bhārata

पावन तीर्थ पहुँचकर पितरों और देवताओं का तर्पण करना चाहिए; हे भारत, इससे अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

श्लोक 177 (3.81.177)

गङ्गाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ । तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन्कूपे महीपते ॥

gaṅgāhradaśca tatraiva kūpaśca bharatarṣabha | tisraḥ koṭyastu tīrthānāṃ tasminkūpe mahīpate

हे भरतश्रेष्ठ, वहीं गंगाह्रद और एक कूप है; हे पृथ्वीपति, उस कूप में तीन करोड़ तीर्थ हैं।

श्लोक 178 (3.81.178)

तत्र स्नात्वा नरो राजन्स्वर्गलोकं प्रपद्यते । आपगायां नरः स्नात्वा अर्चयित्वा महेश्वरम् ॥

tatra snātvā naro rājansvargalokaṃ prapadyate | āpagāyāṃ naraḥ snātvā arcayitvā maheśvaram

हे राजन्, वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। आपगा नदी में स्नान करके महेश्वर की पूजा करने वाला मनुष्य

श्लोक 179 (3.81.179)

गाणपत्यमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । ततः स्थाणुवटं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥

gāṇapatyamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet | tataḥ sthāṇuvaṭaṃ gacchettriṣu lokeṣu viśrutam

शिव के गणों का आधिपत्य (गाणपत्य) प्राप्त करता है और अपने कुल का भी उद्धार करता है। फिर तीनों लोकों में विख्यात स्थाणुवट को जाना चाहिए।

श्लोक 180 (3.81.180)

तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुयात् । बदरीकाननं गच्छेद्वसिष्ठस्याश्रमं गतः ॥

tatra snātvā sthito rātriṃ rudralokamavāpnuyāt | badarīkānanaṃ gacchedvasiṣṭhasyāśramaṃ gataḥ

वहाँ स्नान करके रात भर ठहरने से रुद्रलोक प्राप्त होता है। फिर बदरीवन जाकर वसिष्ठ के आश्रम पहुँचना चाहिए।

श्लोक 181 (3.81.181)

बदरीं भक्षयेत्तत्र त्रिरात्रोपोषितो नरः । सम्यग्द्वादशवर्षाणि बदरीं भक्षयेत्तु यः ॥

badarīṃ bhakṣayettatra trirātropoṣito naraḥ | samyagdvādaśavarṣāṇi badarīṃ bhakṣayettu yaḥ

वहाँ तीन रात उपवास करके बेर का फल खाना चाहिए। जो मनुष्य बारह वर्ष तक विधिपूर्वक बेर खाकर रहता है,

श्लोक 182 (3.81.182)

त्रिरात्रोपोषितस्तेन भवेत्तुल्यो नराधिप । इन्द्रमार्गं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप ॥

trirātropoṣitastena bhavettulyo narādhipa | indramārgaṃ samāsādya tīrthasevī narādhipa

हे नरेश, वह वहाँ तीन रात उपवास करने वाले के बराबर ही होता है। हे नरेश, इन्द्रमार्ग पहुँचकर तीर्थसेवी

श्लोक 183 (3.81.183)

अहोरात्रोपवासेन शक्रलोके महीयते । एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोषितो नरः ॥

ahorātropavāsena śakraloke mahīyate | ekarātraṃ samāsādya ekarātroṣito naraḥ

एक दिन-रात के उपवास से इन्द्रलोक में प्रतिष्ठित होता है। एकरात्र तीर्थ पहुँचकर वहाँ एक रात रहने वाला मनुष्य,

श्लोक 184 (3.81.184)

नियतः सत्यवादी च ब्रह्मलोके महीयते । ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥

niyataḥ satyavādī ca brahmaloke mahīyate | tato gaccheta rājendra tīrthaṃ trailokyaviśrutam

संयमी और सत्यवादी होकर, ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। हे राजेन्द्र, फिर त्रिलोकी में विख्यात उस तीर्थ को जाना चाहिए

श्लोक 185 (3.81.185)

आदित्यस्याश्रमो यत्र तेजोराशेर्महात्मनः । तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयित्वा विभावसुम् ॥

ādityasyāśramo yatra tejorāśermahātmanaḥ | tasmiṃstīrthe naraḥ snātvā pūjayitvā vibhāvasum

जहाँ तेज के पुंज महात्मा आदित्य (सूर्य) का आश्रम है। उस तीर्थ में स्नान करके विभावसु सूर्य की पूजा करने वाला मनुष्य

श्लोक 186 (3.81.186)

आदित्यलोकं व्रजति कुलं चैव समुद्धरेत् । सोमतीर्थे नरः स्नात्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥

ādityalokaṃ vrajati kulaṃ caiva samuddharet | somatīrthe naraḥ snātvā tīrthasevī narādhipa

आदित्यलोक को जाता है और अपने कुल का भी उद्धार करता है। हे नरेश, सोमतीर्थ में स्नान करने वाला तीर्थसेवी

श्लोक 187 (3.81.187)

सोमलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः । ततो गच्छेत धर्मज्ञ दधीचस्य महात्मनः ॥

somalokamavāpnoti naro nāstyatra saṃśayaḥ | tato gaccheta dharmajña dadhīcasya mahātmanaḥ

सोमलोक प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं। हे धर्मज्ञ, फिर महात्मा दधीच के तीर्थ को जाना चाहिए,

श्लोक 188 (3.81.188)

तीर्थं पुण्यतमं राजन्पावनं लोकविश्रुतम् । यत्र सारस्वतो यातः सोऽङ्गिरास्तपसो निधिः ॥

tīrthaṃ puṇyatamaṃ rājanpāvanaṃ lokaviśrutam | yatra sārasvato yātaḥ so'ṅgirāstapaso nidhiḥ

जो परम पवित्र, पावन और लोकविख्यात है, हे राजन्; जहाँ अंगिरा-वंशी, तप के भण्डार सारस्वत मुनि प्रकट हुए थे।

श्लोक 189 (3.81.189)

तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् । सारस्वतीं गतिं चैव लभते नात्र संशयः ॥

tasmiṃstīrthe naraḥ snātvā vājimedhaphalaṃ labhet | sārasvatīṃ gatiṃ caiva labhate nātra saṃśayaḥ

उस तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और निःसन्देह सारस्वती गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 190 (3.81.190)

ततः कन्याश्रमं गच्छेन्नियतो ब्रह्मचर्यवान् । त्रिरात्रोपोषितो राजन्नियतो नियताशनः ॥

tataḥ kanyāśramaṃ gacchenniyato brahmacaryavān | trirātropoṣito rājanniyato niyatāśanaḥ

फिर संयमी और ब्रह्मचारी होकर कन्याश्रम जाना चाहिए; हे राजन्, वहाँ संयमी और नियताहारी होकर तीन रात उपवास करने वाला

श्लोक 191 (3.81.191)

लभेत्कन्याशतं दिव्यं स्वर्गलोकं च गच्छति । ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं सन्निहतीमपि ॥

labhetkanyāśataṃ divyaṃ svargalokaṃ ca gacchati | tato gaccheta dharmajña tīrthaṃ sannihatīmapi

सौ दिव्य कन्याएँ पाता है और स्वर्गलोक को जाता है। हे धर्मज्ञ, फिर सन्निहती तीर्थ को भी जाना चाहिए,

श्लोक 192 (3.81.192)

तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । मासि मासि समायान्ति पुण्येन महताऽन्विताः ॥

tatra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | māsi māsi samāyānti puṇyena mahatā'nvitāḥ

जहाँ ब्रह्मा आदि देवता और तपोधन ऋषि महान पुण्य से युक्त होकर हर महीने आते हैं।

श्लोक 193 (3.81.193)

सन्निहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे । अश्वमेधशतं तेन तत्रेष्टं शाश्वतं भवेत् ॥

sannihatyāmupaspṛśya rāhugraste divākare | aśvamedhaśataṃ tena tatreṣṭaṃ śāśvataṃ bhavet

सूर्य के राहु से ग्रस्त होने पर, अर्थात् सूर्यग्रहण में, जो सन्निहती के जल का स्पर्श करता है, उसने मानो वहाँ सौ अश्वमेध यज्ञ कर लिए, जिनका फल अक्षय होता है।

श्लोक 194 (3.81.194)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च । नद्यो ह्रदास्तडागाश्च सर्वप्रस्रवणानि च ॥

pṛthivyāṃ yāni tīrthāni antarikṣacarāṇi ca | nadyo hradāstaḍāgāśca sarvaprasravaṇāni ca

पृथ्वी पर जितने तीर्थ हैं और जो अन्तरिक्ष में विचरते हैं, नदियाँ, सरोवर, तालाब और सभी झरने,

श्लोक 195 (3.81.195)

उदपानानि वाप्यश्च तीर्थान्यायतनानि च । निःसंशयममावास्यां समेष्यन्ति नराधिप ॥

udapānāni vāpyaśca tīrthānyāyatanāni ca | niḥsaṃśayamamāvāsyāṃ sameṣyanti narādhipa

कुएँ, बावड़ियाँ, तीर्थ और देवस्थान — हे नरेश, ये सब निःसन्देह अमावस्या के दिन वहाँ एकत्र होते हैं,

श्लोक 196 (3.81.196)

मासि मासि नरव्याघ्र सन्निहत्यां न संशयः । तीर्थसन्निहनादेव सन्निहत्येति विश्रुता ॥

māsi māsi naravyāghra sannihatyāṃ na saṃśayaḥ | tīrthasannihanādeva sannihatyeti viśrutā

हे नरव्याघ्र, हर महीने सन्निहती में, इसमें संशय नहीं। तीर्थों के वहाँ एकत्र होने के कारण ही वह सन्निहती नाम से विख्यात है।

श्लोक 197 (3.81.197)

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च स्वर्गलोके महीयते । अमावास्यां तु तत्रैव राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥

tatra snātvā ca pītvā ca svargaloke mahīyate | amāvāsyāṃ tu tatraiva rāhugraste divākare

वहाँ स्नान करके और उसका जल पीकर मनुष्य स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। अमावस्या के दिन, जब सूर्य राहु से ग्रस्त हो, वहीं

श्लोक 198 (3.81.198)

यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु । अश्वमेधसहस्रस्य सम्यगिष्टस्य यत्फलम् ॥

yaḥ śrāddhaṃ kurute martyastasya puṇyaphalaṃ śṛṇu | aśvamedhasahasrasya samyagiṣṭasya yatphalam

जो मनुष्य श्राद्ध करता है, उसके पुण्य का फल सुनो — विधिपूर्वक किए गए हजार अश्वमेध यज्ञों का जो फल है,

श्लोक 199 (3.81.199)

स्नात एव समाप्नोति कृत्वा श्राद्धं च मानवः । यत्किंचिद्दुष्कृतं कर्म स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥

snāta eva samāpnoti kṛtvā śrāddhaṃ ca mānavaḥ | yatkiṃcidduṣkṛtaṃ karma striyā vā puruṣeṇa vā

वह फल मनुष्य वहाँ केवल स्नान करके और श्राद्ध करके पा लेता है। स्त्री या पुरुष ने जो कुछ भी दुष्कर्म किया हो,

श्लोक 200 (3.81.200)

स्नातमात्रस्य तत्सर्वं नश्यते नात्र संशयः । पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥

snātamātrasya tatsarvaṃ naśyate nātra saṃśayaḥ | padmavarṇena yānena brahmalokaṃ prapadyate

वहाँ स्नान करते ही वह सब नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं। वह कमल के वर्ण वाले विमान से ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 201 (3.81.201)

अभिवाद्य ततो यक्षं द्वारपालं मचक्रुकम् । कोटितीर्थमुपस्पृश्य लभेद्बहुसुवर्णकम् ॥

abhivādya tato yakṣaṃ dvārapālaṃ macakrukam | koṭitīrthamupaspṛśya labhedbahusuvarṇakam

फिर द्वारपाल यक्ष मचक्रुक को प्रणाम करके और कोटितीर्थ के जल का स्पर्श करके मनुष्य बहुत-सा सुवर्ण पाता है।

श्लोक 202 (3.81.202)

गङ्गाह्रदश्च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नायीत धर्मज्ञ ब्रह्मचारी समाहितः ॥

gaṅgāhradaśca tatraiva tīrthaṃ bharatasattama | tatra snāyīta dharmajña brahmacārī samāhitaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, वहीं गंगाह्रद तीर्थ है। हे धर्मज्ञ, ब्रह्मचारी और एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करना चाहिए;

श्लोक 203 (3.81.203)

राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः । पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम् ॥

rājasūyāśvamedhābhyāṃ phalaṃ vindati mānavaḥ | pṛthivyāṃ naimiṣaṃ tīrthamantarikṣe ca puṣkaram

इससे मनुष्य राजसूय और अश्वमेध का फल पाता है। पृथ्वी पर नैमिष तीर्थ श्रेष्ठ है और अन्तरिक्ष में पुष्कर;

श्लोक 204 (3.81.204)

त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद्वायुना समुदीरिताः ॥

trayāṇāmapi lokānāṃ kurukṣetraṃ viśiṣyate | pāṃsavo'pi kurukṣetrādvāyunā samudīritāḥ

किन्तु तीनों लोकों में कुरुक्षेत्र सबसे बढ़कर है। कुरुक्षेत्र से वायु द्वारा उड़ाई गई धूल भी

श्लोक 205 (3.81.205)

अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् । दक्षिणेन सरस्वत्या उत्तरेण दृषद्वतीम् ॥

api duṣkṛtakarmāṇaṃ nayanti paramāṃ gatim | dakṣiṇena sarasvatyā uttareṇa dṛṣadvatīm

दुष्कर्म करने वाले को भी परम गति तक ले जाती है। सरस्वती के दक्षिण और दृषद्वती के उत्तर में

श्लोक 206 (3.81.206)

ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे । कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् । अप्येकां वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

ye vasanti kurukṣetre te vasanti triviṣṭape | kurukṣetraṃ gamiṣyāmi kurukṣetre vasāmyaham | apyekāṃ vācamutsṛjya sarvapāpaiḥ pramucyate

जो लोग कुरुक्षेत्र में निवास करते हैं, वे मानो स्वर्ग में निवास करते हैं। 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, मैं कुरुक्षेत्र में रहूँगा' — केवल इतना वचन कहने से भी मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 207 (3.81.207)

ब्रह्मवेदी कुरुक्षेत्रं पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् । तस्मिन्वसन्ति ये मर्त्या न ते शोच्याः कथंचन ॥

brahmavedī kurukṣetraṃ puṇyaṃ brahmarṣisevitam | tasminvasanti ye martyā na te śocyāḥ kathaṃcana

कुरुक्षेत्र ब्रह्मा की वेदी है, पवित्र है और ब्रह्मर्षियों द्वारा सेवित है; जो मनुष्य वहाँ बसते हैं, वे कभी शोक के योग्य नहीं होते।

श्लोक 208 (3.81.208)

तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं । रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च । एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं । पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥

tarantukārantukayoryadantaraṃ | rāmahradānāṃ ca macakrukasya ca | etatkurukṣetrasamantapañcakaṃ | pitāmahasyottaravedirucyate

तरन्तुक और अरन्तुक के बीच का, तथा रामह्रदों और मचक्रुक के बीच का जो प्रदेश है — वही कुरुक्षेत्र है, समन्तपंचक है; उसे पितामह ब्रह्मा की उत्तरवेदी कहा जाता है।

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