आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 82
पुलस्त्य द्वारा तीर्थों का वर्णन: गंगाद्वार, नैमिष, वाराणसी और गया
पुलस्त्य भीष्म को तीर्थों का वर्णन आगे सुनाते हैं और हर तीर्थ से मिलने वाला पुण्य बताते हैं। वे धर्मतीर्थ और शाकम्भरी देवी के स्थान से, जिन्होंने आए हुए ऋषियों का शाक से आतिथ्य किया था, गंगाद्वार, कनखल तथा यमुना और सिन्धु के उद्गमों तक जाते हैं, और नैमिष की, जहाँ पृथ्वी के सब तीर्थ विद्यमान हैं, सरयू पर गोप्रतार की, जहाँ से राम स्वर्ग गए, तथा वाराणसी और अविमुक्त की महिमा गाते हैं। फिर वे अक्षयवट वाले गया, धेनुक में गौ के पदचिह्नों और उद्यन्त पर्वत का वर्णन करते हुए राजगृह, गौतम के वन, गण्डकी, शालग्राम, कौशिकी और अनेक अन्य तीर्थों तक सूची को पूर्व की ओर ले जाते हैं।
पुलस्त्य उवाच
श्लोक 1 (3.82.1)
ततो गच्छेन्महाराज धर्मतीर्थमनुत्तमम् । यत्र धर्मो महाभागस्तप्तवानुत्तमं तपः । तेन तीर्थं कृतं पुण्यं स्वेन नाम्ना च विश्रुतम् ॥
tato gacchenmahārāja dharmatīrthamanuttamam | yatra dharmo mahābhāgastaptavānuttamaṃ tapaḥ | tena tīrthaṃ kṛtaṃ puṇyaṃ svena nāmnā ca viśrutam
हे महाराज, इसके बाद अनुपम धर्मतीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ महाभाग धर्म ने उत्तम तप किया था। उन्होंने ही उस पवित्र तीर्थ की स्थापना की, और वह उन्हीं के नाम से विख्यात है।
श्लोक 2 (3.82.2)
तत्र स्नात्वा नरो राजन्धर्मशीलः समाहितः । आसप्तमं कुलं चैव पुनीते नात्र संशयः ॥
tatra snātvā naro rājandharmaśīlaḥ samāhitaḥ | āsaptamaṃ kulaṃ caiva punīte nātra saṃśayaḥ
हे राजन्, जो धर्मशील मनुष्य एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करता है, वह अपने कुल को सातवीं पीढ़ी तक पवित्र कर देता है; इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 3 (3.82.3)
ततो गच्छेत राजेन्द्र ज्ञानपावनमुत्तमम् । अग्निष्टोममवाप्नोति मुनिलोकं च गच्छति ॥
tato gaccheta rājendra jñānapāvanamuttamam | agniṣṭomamavāpnoti munilokaṃ ca gacchati
हे राजेन्द्र, फिर उत्तम ज्ञानपावन तीर्थ को जाना चाहिए। वहाँ मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है और मुनियों के लोक को जाता है।
श्लोक 4 (3.82.4)
सौगन्धिकवनं राजंस्ततो गच्छेत मानवः । तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥
saugandhikavanaṃ rājaṃstato gaccheta mānavaḥ | tatra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ
हे राजन्, इसके बाद मनुष्य को सौगन्धिक वन जाना चाहिए। वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपस्वी ऋषि,
श्लोक 5 (3.82.5)
सिद्धचारणगन्धर्वाः किन्नराश्च महोरगाः । तद्वनं प्रविशन्नेव सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
siddhacāraṇagandharvāḥ kinnarāśca mahoragāḥ | tadvanaṃ praviśanneva sarvapāpaiḥ pramucyate
सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर और महानाग निवास करते हैं। उस वन में प्रवेश करते ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 6 (3.82.6)
ततश्चापि सरिच्छ्रेष्ठा नदीनामुत्तमा नदी । प्लक्षा देवी स्मृता राजन्पुण्या देवी सरस्वती ॥
tataścāpi saricchreṣṭhā nadīnāmuttamā nadī | plakṣā devī smṛtā rājanpuṇyā devī sarasvatī
वहीं सरिताओं में श्रेष्ठ, नदियों में उत्तम नदी पुण्यमयी देवी सरस्वती हैं, हे राजन्, जिनका स्मरण प्लक्षा देवी के नाम से किया जाता है।
श्लोक 7 (3.82.7)
तत्राभिषेकं कुर्वीत वल्मीकान्निःसृते जले । अर्चयित्वा पितॄन्देवानश्वमेधफलं लभेत् ॥
tatrābhiṣekaṃ kurvīta valmīkānniḥsṛte jale | arcayitvā pitṝndevānaśvamedhaphalaṃ labhet
वहाँ बाँबी से निकलने वाले जल में स्नान करना चाहिए; पितरों और देवताओं का पूजन करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 8 (3.82.8)
कवेराध्युषितं नाम तत्र तीर्थं सुदुर्लभम् । षट्सु शम्यानिपातेषु वल्मीकादिति निश्चयः ॥
kaverādhyuṣitaṃ nāma tatra tīrthaṃ sudurlabham | ṣaṭsu śamyānipāteṣu valmīkāditi niścayaḥ
वहाँ कवेराध्युषित नामक अत्यन्त दुर्लभ तीर्थ है; निश्चय ही वह बाँबी से छह शम्या-प्रक्षेप की दूरी पर है।
श्लोक 9 (3.82.9)
कपिलानां सहस्रं च वाजिमेधं च विन्दति । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र दृष्टमेतत्पुरातने ॥
kapilānāṃ sahasraṃ ca vājimedhaṃ ca vindati | tatra snātvā naravyāghra dṛṣṭametatpurātane
हे नरव्याघ्र, वहाँ स्नान करके मनुष्य एक हज़ार कपिला गौओं के दान और अश्वमेध का फल पाता है; यह प्राचीन ग्रन्थों में देखा गया है।
श्लोक 10 (3.82.10)
सुगन्धां शतकुम्भां च पञ्चयक्षां च भारत । अभिगम्य नरश्रेष्ठ स्वर्गलोके महीयते ॥
sugandhāṃ śatakumbhāṃ ca pañcayakṣāṃ ca bhārata | abhigamya naraśreṣṭha svargaloke mahīyate
हे भारत, हे नरश्रेष्ठ, सुगन्धा, शतकुम्भा और पञ्चयक्षा तीर्थों में जाकर मनुष्य स्वर्गलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 11 (3.82.11)
त्रिशूलखातं तत्रैव तीर्थमासाद्य भारत । तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः । गाणपत्यं च लभते देहं त्यक्त्वा न संशयः ॥
triśūlakhātaṃ tatraiva tīrthamāsādya bhārata | tatrābhiṣekaṃ kurvīta pitṛdevārcane rataḥ | gāṇapatyaṃ ca labhate dehaṃ tyaktvā na saṃśayaḥ
हे भारत, वहीं त्रिशूलखात तीर्थ पर पहुँचकर पितरों और देवताओं की पूजा में तत्पर रहते हुए स्नान करना चाहिए; ऐसा मनुष्य देह त्यागने पर निःसंदेह शिव के गणों का आधिपत्य पाता है।
श्लोक 12 (3.82.12)
ततो गच्छेत राजेन्द्र देव्याः स्थानं सुदुर्लभम् । शाकम्भरीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥
tato gaccheta rājendra devyāḥ sthānaṃ sudurlabham | śākambharīti vikhyātā triṣu lokeṣu viśrutā
हे राजेन्द्र, फिर देवी के अत्यन्त दुर्लभ स्थान को जाना चाहिए, जो शाकम्भरी नाम से विख्यात और तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
श्लोक 13 (3.82.13)
दिव्यं वर्षसहस्रं हि शाकेन किल सुव्रता । आहारं सा कृतवती मासिमासि नराधिप ॥
divyaṃ varṣasahasraṃ hi śākena kila suvratā | āhāraṃ sā kṛtavatī māsimāsi narādhipa
हे नराधिप, कहते हैं कि उत्तम व्रत वाली उस देवी ने एक हज़ार दिव्य वर्षों तक प्रत्येक मास में एक बार केवल शाक का आहार किया।
श्लोक 14 (3.82.14)
ऋषयोऽभ्यागतास्तत्र देव्या भक्त्या तपोधनाः । आतिथ्यं च कृतं तेषां शाकेन किल भारत । ततः शाकम्भरीत्येव नाम तस्याः प्रतिष्ठितम् ॥
ṛṣayo'bhyāgatāstatra devyā bhaktyā tapodhanāḥ | ātithyaṃ ca kṛtaṃ teṣāṃ śākena kila bhārata | tataḥ śākambharītyeva nāma tasyāḥ pratiṣṭhitam
देवी के प्रति भक्ति से प्रेरित होकर तपस्वी ऋषि वहाँ आए, और हे भारत, कहते हैं कि उसने शाक से ही उनका आतिथ्य किया। तभी से उसका नाम शाकम्भरी प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 15 (3.82.15)
शाकम्भरीं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । त्रिरात्रमुषितः शाकं भक्षयित्वा नरः शुचिः ॥
śākambharīṃ samāsādya brahmacārī samāhitaḥ | trirātramuṣitaḥ śākaṃ bhakṣayitvā naraḥ śuciḥ
जो मनुष्य ब्रह्मचारी और एकाग्रचित्त होकर शाकम्भरी पहुँचता है और पवित्र रहकर तीन रात वहाँ केवल शाक खाकर रहता है,
श्लोक 16 (3.82.16)
शाकाहारस्य यत्किंचिद्वर्षैर्द्वादशभिः कृतम् । तत्फलं तस्य भवति देव्याश्छन्देन भारत ॥
śākāhārasya yatkiṃcidvarṣairdvādaśabhiḥ kṛtam | tatphalaṃ tasya bhavati devyāśchandena bhārata
हे भारत, उसे देवी की इच्छा से वह फल मिलता है जो बारह वर्षों तक शाकाहार करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 17 (3.82.17)
ततो गच्छेत्सुवर्णाख्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्र विष्णुः प्रसादार्थं रुद्रमाराधयत्पुरा ॥
tato gacchetsuvarṇākhyaṃ triṣu lokeṣu viśrutam | tatra viṣṇuḥ prasādārthaṃ rudramārādhayatpurā
फिर तीनों लोकों में प्रसिद्ध सुवर्ण नामक तीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ प्राचीन काल में विष्णु ने कृपा पाने के लिए रुद्र की आराधना की थी।
श्लोक 18 (3.82.18)
वरांश्च सुबहूँल्लेभे दैवतेषु सुदुर्लभान् । उक्तश्च त्रिपुरघ्नेन परितुष्टेन भारत ॥
varāṃśca subahūm̐llebhe daivateṣu sudurlabhān | uktaśca tripuraghnena parituṣṭena bhārata
उन्होंने देवताओं में भी दुर्लभ बहुत-से वर प्राप्त किए, और हे भारत, त्रिपुर का नाश करने वाले शिव ने प्रसन्न होकर उनसे कहा —
श्लोक 19 (3.82.19)
अपि च त्वं प्रियतरो लोके कृष्ण भविष्यसि । त्वन्मुखं च जगत्सर्वं भविष्यति न संशयः ॥
api ca tvaṃ priyataro loke kṛṣṇa bhaviṣyasi | tvanmukhaṃ ca jagatsarvaṃ bhaviṣyati na saṃśayaḥ
'हे कृष्ण, इसके अतिरिक्त तुम संसार में सबसे अधिक प्रिय होगे, और निःसंदेह सारा जगत् तुम्हें ही प्रधान मानेगा।'
श्लोक 20 (3.82.20)
तत्राभिगम्य राजेन्द्र पूजयित्वा वृषध्वजम् । अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति ॥
tatrābhigamya rājendra pūjayitvā vṛṣadhvajam | aśvamedhamavāpnoti gāṇapatyaṃ ca vindati
हे राजेन्द्र, वहाँ जाकर वृषध्वज शिव का पूजन करने से मनुष्य अश्वमेध का फल और गणों का आधिपत्य पाता है।
श्लोक 21 (3.82.21)
धूमावतीं ततो गच्छेत्त्रिरात्रोपोषितो नरः । मनसा प्रार्थितान्कामाँल्लभते नात्र संशयः ॥
dhūmāvatīṃ tato gacchettrirātropoṣito naraḥ | manasā prārthitānkāmām̐llabhate nātra saṃśayaḥ
फिर धूमावती को जाना चाहिए; वहाँ तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य मन में चाही हुई कामनाएँ पा लेता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 22 (3.82.22)
देव्यास्तु दक्षिणार्धेन रथावर्तो नराधिप । तत्रारोहेत धर्मज्ञ श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । महादेवप्रसादाद्धि गच्छेत परमां गतिम् ॥
devyāstu dakṣiṇārdhena rathāvarto narādhipa | tatrāroheta dharmajña śraddadhāno jitendriyaḥ | mahādevaprasādāddhi gaccheta paramāṃ gatim
हे नराधिप, देवी-स्थान के दक्षिणी भाग में रथावर्त है। हे धर्मज्ञ, श्रद्धावान और जितेन्द्रिय होकर उस पर चढ़ना चाहिए; महादेव की कृपा से मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 23 (3.82.23)
प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ । धारां नाम महाप्राज्ञ सर्वपापप्रमोचनीम् ॥
pradakṣiṇamupāvṛtya gaccheta bharatarṣabha | dhārāṃ nāma mahāprājña sarvapāpapramocanīm
हे भरतश्रेष्ठ, हे महाप्राज्ञ, उसकी प्रदक्षिणा करके सब पापों से छुड़ाने वाली धारा नामक तीर्थ को जाना चाहिए।
श्लोक 24 (3.82.24)
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र न शोचति नराधिप । ततो गच्छेत धर्मज्ञ नमस्कृत्य महागिरिम् ॥
tatra snātvā naravyāghra na śocati narādhipa | tato gaccheta dharmajña namaskṛtya mahāgirim
हे नरव्याघ्र, हे नराधिप, वहाँ स्नान करने वाला शोक नहीं करता। हे धर्मज्ञ, फिर महान् पर्वत को नमस्कार करके आगे जाना चाहिए।
श्लोक 25 (3.82.25)
अशीतियोजनशतं पुष्करं स्वर्गमुच्यते । अशीतिं धर्मपृष्ठात्तु प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
aśītiyojanaśataṃ puṣkaraṃ svargamucyate | aśītiṃ dharmapṛṣṭhāttu pravadanti manīṣiṇaḥ
कहा जाता है कि पुष्कर से स्वर्ग एक सौ अस्सी योजन दूर है; मनीषी कहते हैं कि धर्मपृष्ठ से वह अस्सी योजन है,
श्लोक 26 (3.82.26)
षष्टिं प्रयागाद्राजेन्द्र कुरुक्षेत्रात्तु द्वादश । संयुक्तमेव राजेन्द्र गङ्गाद्वारं त्रिविष्टपम् ॥
ṣaṣṭiṃ prayāgādrājendra kurukṣetrāttu dvādaśa | saṃyuktameva rājendra gaṅgādvāraṃ triviṣṭapam
हे राजेन्द्र, प्रयाग से साठ और कुरुक्षेत्र से बारह योजन; किन्तु गंगाद्वार तो स्वर्ग से जुड़ा ही हुआ है।
श्लोक 27 (3.82.27)
स्वर्गद्वारेण यत्तुल्यं गङ्गाद्वारं न संशयः । तत्राभिषेकं कुर्वीत कोटितीर्थे समाहितः ॥
svargadvāreṇa yattulyaṃ gaṅgādvāraṃ na saṃśayaḥ | tatrābhiṣekaṃ kurvīta koṭitīrthe samāhitaḥ
निःसंदेह गंगाद्वार स्वर्ग के द्वार के समान है। वहाँ एकाग्रचित्त होकर कोटितीर्थ में स्नान करना चाहिए।
श्लोक 28 (3.82.28)
पौण्डरीकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । उष्यैकां रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥
pauṇḍarīkamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet | uṣyaikāṃ rajanīṃ tatra gosahasraphalaṃ labhet
इससे मनुष्य पौण्डरीक यज्ञ का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है; वहाँ एक रात रहने से एक हज़ार गौओं के दान का फल मिलता है।
श्लोक 29 (3.82.29)
सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च शक्रावर्ते च तर्पयन् । देवान्पितॄंश्च विधिवत्पुण्ये लोके महीयते ॥
saptagaṅge trigaṅge ca śakrāvarte ca tarpayan | devānpitṝṃśca vidhivatpuṇye loke mahīyate
सप्तगंगा, त्रिगंगा और शक्रावर्त में विधिपूर्वक देवताओं और पितरों का तर्पण करने वाला पुण्यलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 30 (3.82.30)
ततः कनखले स्नात्वा त्रिरात्रोपोषितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
tataḥ kanakhale snātvā trirātropoṣito naraḥ | aśvamedhamavāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
फिर कनखल में स्नान करके तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 31 (3.82.31)
कपिलावटं ततो गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप । उपोष्य रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥
kapilāvaṭaṃ tato gacchettīrthasevī narādhipa | upoṣya rajanīṃ tatra gosahasraphalaṃ labhet
हे नराधिप, फिर तीर्थयात्री को कपिलावट जाना चाहिए; वहाँ एक रात उपवास करने से एक हज़ार गौओं के दान का फल मिलता है।
श्लोक 32 (3.82.32)
नागराजस्य राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः । तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥
nāgarājasya rājendra kapilasya mahātmanaḥ | tīrthaṃ kuruvaraśreṣṭha sarvalokeṣu viśrutam
हे राजेन्द्र, हे कुरुश्रेष्ठ, वहाँ नागराज महात्मा कपिल का तीर्थ है, जो सब लोकों में प्रसिद्ध है।
श्लोक 33 (3.82.33)
तत्राभिषेकं कुर्वीत नागतीर्थे नराधिप । कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ॥
tatrābhiṣekaṃ kurvīta nāgatīrthe narādhipa | kapilānāṃ sahasrasya phalaṃ vindati mānavaḥ
हे नराधिप, वहाँ नागतीर्थ में स्नान करना चाहिए; इससे मनुष्य एक हज़ार कपिला गौओं के दान का फल पाता है।
श्लोक 34 (3.82.34)
ततो ललितकं गच्छेच्छन्तनोस्तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥
tato lalitakaṃ gacchecchantanostīrthamuttamam | tatra snātvā naro rājanna durgatimavāpnuyāt
फिर शान्तनु के उत्तम तीर्थ ललितक को जाना चाहिए; हे राजन्, वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 35 (3.82.35)
गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नाति यः संगमे नरः । दशाश्वमेधानाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
gaṅgāyamunayormadhye snāti yaḥ saṃgame naraḥ | daśāśvamedhānāpnoti kulaṃ caiva samuddharet
जो मनुष्य गंगा और यमुना के बीच संगम पर स्नान करता है, वह दस अश्वमेधों का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 36 (3.82.36)
ततो गच्छेत राजेन्द्र सुगन्धं लोकविश्रुतम् । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोके महीयते ॥
tato gaccheta rājendra sugandhaṃ lokaviśrutam | sarvapāpaviśuddhātmā brahmaloke mahīyate
हे राजेन्द्र, फिर लोकविख्यात सुगन्ध तीर्थ को जाना चाहिए; सब पापों से शुद्ध होकर मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 37 (3.82.37)
रुद्रावर्तं ततो गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप । तत्र स्नात्वा नरो राजन्स्वर्गलोके च गच्छति ॥
rudrāvartaṃ tato gacchettīrthasevī narādhipa | tatra snātvā naro rājansvargaloke ca gacchati
हे नराधिप, फिर तीर्थयात्री को रुद्रावर्त जाना चाहिए; हे राजन्, वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 38 (3.82.38)
गङ्गायाश्च नरश्रेष्ठ सरस्वत्याश्च संगमे । स्नात्वाऽश्वमेधं प्राप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
gaṅgāyāśca naraśreṣṭha sarasvatyāśca saṃgame | snātvā'śvamedhaṃ prāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
हे नरश्रेष्ठ, गंगा और सरस्वती के संगम में स्नान करके मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 39 (3.82.39)
भद्रकर्णेश्वरं गत्वा देवमर्च्य यथाविधि । न दुर्गतिमवाप्नोति नाकपृष्ठे च पूज्यते ॥
bhadrakarṇeśvaraṃ gatvā devamarcya yathāvidhi | na durgatimavāpnoti nākapṛṣṭhe ca pūjyate
भद्रकर्णेश्वर जाकर विधिपूर्वक देव का पूजन करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता और स्वर्ग के शिखर पर पूजित होता है।
श्लोक 40 (3.82.40)
ततः कुब्जावतीं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप । गोसहस्रमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
tataḥ kubjāvatīṃ gacchettīrthasevī narādhipa | gosahasramavāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
हे नराधिप, फिर तीर्थयात्री को कुब्जावती जाना चाहिए; वह एक हज़ार गौओं का फल पाता है और स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 41 (3.82.41)
अरुन्धतीवटं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप । सामुद्रकमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी समाहितः ॥
arundhatīvaṭaṃ gacchettīrthasevī narādhipa | sāmudrakamupaspṛśya brahmacārī samāhitaḥ
हे नराधिप, तीर्थयात्री को अरुन्धतीवट जाना चाहिए; वहाँ ब्रह्मचारी और एकाग्रचित्त होकर सामुद्रक तीर्थ के जल का स्पर्श करके
श्लोक 42 (3.82.42)
अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः । गोसहस्रफलं विद्यात्कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
aśvamedhamavāpnoti trirātropoṣito naraḥ | gosahasraphalaṃ vidyātkulaṃ caiva samuddharet
और तीन रात उपवास करके मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है; उसे एक हज़ार गौओं के दान का फल मिलता है, और वह अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 43 (3.82.43)
ब्रह्मावर्तं ततो गच्छेद्ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥
brahmāvartaṃ tato gacchedbrahmacārī samāhitaḥ | aśvamedhamavāpnoti somalokaṃ ca gacchati
फिर ब्रह्मचारी और एकाग्रचित्त होकर ब्रह्मावर्त जाना चाहिए; इससे मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और सोमलोक को जाता है।
श्लोक 44 (3.82.44)
यमुनाप्रभवं गत्वा समुपस्पृश्य यामुनम् । अश्वमेधफलं लब्ध्वा स्वर्गलोके महीयते ॥
yamunāprabhavaṃ gatvā samupaspṛśya yāmunam | aśvamedhaphalaṃ labdhvā svargaloke mahīyate
यमुनाप्रभव (यमुना के उद्गम) पर जाकर यमुना के जल का स्पर्श करने वाला अश्वमेध का फल पाकर स्वर्गलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 45 (3.82.45)
दर्वीसंक्रमणं प्राप्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
darvīsaṃkramaṇaṃ prāpya tīrthaṃ trailokyapūjitam | aśvamedhamavāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
तीनों लोकों में पूजित दर्वीसंक्रमण तीर्थ पर पहुँचकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 46 (3.82.46)
सिन्धोश्च प्रभवं गत्वा सिद्धगन्धर्वसेवितम् । तत्रोष्य रजनीः पञ्च विन्देद्बहु सुवर्णकम् ॥
sindhośca prabhavaṃ gatvā siddhagandharvasevitam | tatroṣya rajanīḥ pañca vindedbahu suvarṇakam
सिद्धों और गन्धर्वों से सेवित सिन्धु के उद्गम पर जाकर वहाँ पाँच रात रहने से मनुष्य बहुत-सा सुवर्ण पाता है।
श्लोक 47 (3.82.47)
अथ वेदीं समासाद्य नरः परमदुर्गमाम् । अश्वमेधमवाप्नोति गच्छेदौशनसीं गतिम् ॥
atha vedīṃ samāsādya naraḥ paramadurgamām | aśvamedhamavāpnoti gacchedauśanasīṃ gatim
फिर अत्यन्त दुर्गम वेदी तीर्थ पर पहुँचकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और उशना (शुक्राचार्य) की गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 48 (3.82.48)
ऋषिकुल्यां समासाद्य वासिष्ठं चैव भारत । वासिष्ठीं समतिक्रम्य सर्वे वर्णा द्विजातयः ॥
ṛṣikulyāṃ samāsādya vāsiṣṭhaṃ caiva bhārata | vāsiṣṭhīṃ samatikramya sarve varṇā dvijātayaḥ
हे भारत, ऋषिकुल्या और वासिष्ठ तीर्थ पर पहुँचकर — वासिष्ठी को पार करने से सभी वर्णों के लोग द्विज हो जाते हैं।
श्लोक 49 (3.82.49)
ऋषिकुल्यां समासाद्य नरः स्नात्वा विकल्मषः । देवान्पितॄंश्चार्चयित्वा ऋषिलोकं प्रपद्यते ॥
ṛṣikulyāṃ samāsādya naraḥ snātvā vikalmaṣaḥ | devānpitṝṃścārcayitvā ṛṣilokaṃ prapadyate
ऋषिकुल्या पहुँचकर स्नान करने वाला मनुष्य निष्पाप हो जाता है; देवताओं और पितरों का पूजन करके वह ऋषिलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 50 (3.82.50)
यदि तत्र वसेन्मासं शाकाहारो नराधिप । द्वादशाहस्य यज्ञस्य फलं स लभते नरः ॥
yadi tatra vasenmāsaṃ śākāhāro narādhipa | dvādaśāhasya yajñasya phalaṃ sa labhate naraḥ
हे नराधिप, यदि मनुष्य वहाँ एक मास तक शाकाहार करते हुए रहे, तो वह द्वादशाह यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 51 (3.82.51)
भृगुतुङ्गं समासाद्य वाजिमेधफलं लभेत् । गत्वा वीरप्रमोक्षं च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
bhṛgutuṅgaṃ samāsādya vājimedhaphalaṃ labhet | gatvā vīrapramokṣaṃ ca sarvapāpaiḥ pramucyate
भृगुतुंग पहुँचकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है, और वीरप्रमोक्ष जाकर सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 52 (3.82.52)
कृत्तिकामघयोश्चैव तीर्थमासाद्य भारत । अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलमाप्नोति मानवः ॥
kṛttikāmaghayoścaiva tīrthamāsādya bhārata | agniṣṭomātirātrābhyāṃ phalamāpnoti mānavaḥ
हे भारत, कृत्तिका और मघा के तीर्थ पर पहुँचकर मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञों का फल पाता है।
श्लोक 53 (3.82.53)
तत्र संध्यां समासाद्य विद्यातीर्थमनुत्तमम् । उपस्पृश्य च वै विद्यां यत्र तत्रोपपद्यते ॥
tatra saṃdhyāṃ samāsādya vidyātīrthamanuttamam | upaspṛśya ca vai vidyāṃ yatra tatropapadyate
वहाँ संध्या नामक अनुपम विद्यातीर्थ पर पहुँचकर उसके जल का स्पर्श करने से मनुष्य जहाँ कहीं भी हो, उसे विद्या प्राप्त होती है।
श्लोक 54 (3.82.54)
महाश्रमे वसेद्रात्रिं सर्वपापप्रमोचने । एककालं निराहारो लोकानावसते शुभान् ॥
mahāśrame vasedrātriṃ sarvapāpapramocane | ekakālaṃ nirāhāro lokānāvasate śubhān
सब पापों से छुड़ाने वाले महाश्रम में एक रात रहना चाहिए; वहाँ एक समय निराहार रहने वाला शुभ लोकों में निवास करता है।
श्लोक 55 (3.82.55)
षष्ठकालोपवासेन मासमुष्य महालये । सर्वपापविशुद्धात्मा विन्देद्बहु सुवर्णकम् । दशापरान्दशपूर्वान्नरानुद्धरते कुलम् ॥
ṣaṣṭhakālopavāsena māsamuṣya mahālaye | sarvapāpaviśuddhātmā vindedbahu suvarṇakam | daśāparāndaśapūrvānnarānuddharate kulam
महालय में एक मास रहकर हर छठे भोजन-काल पर ही आहार लेने वाला सब पापों से शुद्ध होकर बहुत-सा सुवर्ण पाता है, और अपने कुल की दस अगली और दस पिछली पीढ़ियों का उद्धार करता है।
श्लोक 56 (3.82.56)
अथ वेतसिकां गत्वा पितामहनिषेविताम् । अश्वमेधमवाप्नोति गच्छेदौशनसीं गतिम् ॥
atha vetasikāṃ gatvā pitāmahaniṣevitām | aśvamedhamavāpnoti gacchedauśanasīṃ gatim
फिर पितामह ब्रह्मा द्वारा सेवित वेतसिका जाकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और उशना की गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 57 (3.82.57)
अथ सुन्दरिकातीर्थं प्राप्य सिद्धनिषेवितम् । रूपस्य भागी भवति दृष्टमेतत्पुरातनैः ॥
atha sundarikātīrthaṃ prāpya siddhaniṣevitam | rūpasya bhāgī bhavati dṛṣṭametatpurātanaiḥ
फिर सिद्धों से सेवित सुन्दरिकातीर्थ पहुँचकर मनुष्य रूप-सौन्दर्य का भागी होता है; यह प्राचीन जनों ने देखा है।
श्लोक 58 (3.82.58)
ततो वै ब्राह्मणं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥
tato vai brāhmaṇaṃ gatvā brahmacārī jitendriyaḥ | padmavarṇena yānena brahmalokaṃ prapadyate
फिर ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय होकर ब्राह्मण तीर्थ जाने वाला कमल के रंग वाले विमान से ब्रह्मलोक को जाता है।
श्लोक 59 (3.82.59)
ततस्तु नैमिषं गच्छेत्पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । तत्र नित्यं निवसति ब्रह्मा देवगणैः सह ॥
tatastu naimiṣaṃ gacchetpuṇyaṃ siddhaniṣevitam | tatra nityaṃ nivasati brahmā devagaṇaiḥ saha
फिर सिद्धों से सेवित पवित्र नैमिष को जाना चाहिए, जहाँ ब्रह्मा देवगणों के साथ सदा निवास करते हैं।
श्लोक 60 (3.82.60)
नैमिषं मृगयाणस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति । प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
naimiṣaṃ mṛgayāṇasya pāpasyārdhaṃ praṇaśyati | praviṣṭamātrastu naraḥ sarvapāpaiḥ pramucyate
नैमिष की खोज में निकलने वाले के ही आधे पाप नष्ट हो जाते हैं, और उसमें प्रवेश करते ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 61 (3.82.61)
तत्र मासं वसेद्धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि नैमिषे ॥
tatra māsaṃ vaseddhīro naimiṣe tīrthatatparaḥ | pṛthivyāṃ yāni tīrthāni tāni tīrthāni naimiṣe
धीर और तीर्थसेवा में तत्पर मनुष्य को नैमिष में एक मास रहना चाहिए; पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, वे सब नैमिष में विद्यमान हैं।
श्लोक 62 (3.82.62)
कृताभिषेकस्तत्रैव नियतो नियताशनः । गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत । पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम ॥
kṛtābhiṣekastatraiva niyato niyatāśanaḥ | gavāṃ medhasya yajñasya phalaṃ prāpnoti bhārata | punātyāsaptamaṃ caiva kulaṃ bharatasattama
हे भारत, वहीं स्नान करके संयमी और नियमित आहार वाला मनुष्य गोमेध यज्ञ का फल पाता है, और हे भरतसत्तम, अपने कुल को सातवीं पीढ़ी तक पवित्र करता है।
श्लोक 63 (3.82.63)
यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायणः । स मोदेत्सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिणः ॥
yastyajennaimiṣe prāṇānupavāsaparāyaṇaḥ | sa modetsarvalokeṣu evamāhurmanīṣiṇaḥ
जो उपवास में तत्पर रहकर नैमिष में प्राण त्यागता है, वह सब लोकों में आनन्द पाता है; ऐसा मनीषी कहते हैं।
श्लोक 64 (3.82.64)
नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम ॥
nityaṃ medhyaṃ ca puṇyaṃ ca naimiṣaṃ nṛpasattama
हे नृपश्रेष्ठ, नैमिष सदा पवित्र और पुण्यमय है।
श्लोक 65 (3.82.65)
गङ्गोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत्सदा ॥
gaṅgodbhedaṃ samāsādya trirātropoṣito naraḥ | vājapeyamavāpnoti brahmabhūto bhavetsadā
गंगोद्भेद पहुँचकर तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल पाता है और सदा के लिए ब्रह्मभूत हो जाता है।
श्लोक 66 (3.82.66)
सरस्वतीं समासाद्य तर्पयेत्पितृदेवताः । सारस्वतेषु लोकेषु मोदते नात्र संशयः ॥
sarasvatīṃ samāsādya tarpayetpitṛdevatāḥ | sārasvateṣu lokeṣu modate nātra saṃśayaḥ
सरस्वती पहुँचकर पितरों और देवताओं का तर्पण करना चाहिए; ऐसा करने वाला सारस्वत लोकों में आनन्द करता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 67 (3.82.67)
ततश्च बाहुदां गच्छेद्ब्रह्मचारी समाहितः । तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते । देवसत्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति कौरव ॥
tataśca bāhudāṃ gacchedbrahmacārī samāhitaḥ | tatroṣya rajanīmekāṃ svargaloke mahīyate | devasatrasya yajñasya phalaṃ prāpnoti kaurava
फिर ब्रह्मचारी और एकाग्रचित्त होकर बाहुदा नदी को जाना चाहिए; वहाँ एक रात रहकर मनुष्य स्वर्गलोक में सम्मानित होता है, और हे कौरव, देवसत्र यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 68 (3.82.68)
ततः क्षीरवतीं गच्छेत्पुण्यां पुण्यतरैर्वृताम् । पितृदेवार्चनपरो वाजपेयमवाप्नुयात् ॥
tataḥ kṣīravatīṃ gacchetpuṇyāṃ puṇyatarairvṛtām | pitṛdevārcanaparo vājapeyamavāpnuyāt
फिर पुण्यात्माओं से घिरी पवित्र क्षीरवती को जाना चाहिए; पितरों और देवताओं की पूजा में तत्पर मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 69 (3.82.69)
विमलाशोकमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते ॥
vimalāśokamāsādya brahmacārī samāhitaḥ | tatroṣya rajanīmekāṃ svargaloke mahīyate
ब्रह्मचारी और एकाग्रचित्त होकर विमलाशोक पहुँचकर वहाँ एक रात रहने वाला स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 70 (3.82.70)
गोप्रतारं ततो गच्छेत्सरय्वास्तीर्थमुत्तमम् । यत्र रामो गतः स्वर्गं सभृत्यबलवाहनः । देहं त्यक्त्वा महाराज तस्य तीर्थस्य तेजसा ॥
gopratāraṃ tato gacchetsarayvāstīrthamuttamam | yatra rāmo gataḥ svargaṃ sabhṛtyabalavāhanaḥ | dehaṃ tyaktvā mahārāja tasya tīrthasya tejasā
फिर सरयू के उत्तम तीर्थ गोप्रतार को जाना चाहिए, जहाँ हे महाराज, राम अपने सेवकों, सेना और वाहनों के साथ उस तीर्थ के तेज से देह त्यागकर स्वर्ग गए थे,
श्लोक 71 (3.82.71)
रामस्य च प्रसादेन व्यवसायाच्च भारत । तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गोप्रतारे नराधिप । सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते ॥
rāmasya ca prasādena vyavasāyācca bhārata | tasmiṃstīrthe naraḥ snātvā gopratāre narādhipa | sarvapāpaviśuddhātmā svargaloke mahīyate
राम की कृपा और (उनके साथियों के) दृढ़ निश्चय से, हे भारत। हे नराधिप, उस गोप्रतार तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य सब पापों से शुद्ध होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 72 (3.82.72)
रामतीर्थे नरः स्नात्वा गोमत्यां कुरुनन्दन । अश्वमेधमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः ॥
rāmatīrthe naraḥ snātvā gomatyāṃ kurunandana | aśvamedhamavāpnoti punāti ca kulaṃ naraḥ
हे कुरुनन्दन, गोमती पर स्थित रामतीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और अपने कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 73 (3.82.73)
शतसाहस्रकं तीर्थं तत्रैव भरतर्षभ ॥
śatasāhasrakaṃ tīrthaṃ tatraiva bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, वहीं शतसाहस्रक नामक तीर्थ है।
श्लोक 74 (3.82.74)
तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा नियतो नियताशनः । गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥
tatropasparśanaṃ kṛtvā niyato niyatāśanaḥ | gosahasraphalaṃ puṇyaṃ prāpnoti bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ संयमी और नियमित आहार वाला होकर जल का स्पर्श करने से मनुष्य एक हज़ार गौओं के दान का पुण्य फल पाता है।
श्लोक 75 (3.82.75)
ततो गच्छेत राजेन्द्र भर्तृस्थानमनुत्तमम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥
tato gaccheta rājendra bhartṛsthānamanuttamam | aśvamedhasya yajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ
हे राजेन्द्र, फिर अनुपम भर्तृस्थान को जाना चाहिए; वहाँ मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 76 (3.82.76)
कोटितीर्थे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा गुहं नृप । गोसहस्रफलं विद्यात्तेजस्वी च भवेन्नरः ॥
koṭitīrthe naraḥ snātvā arcayitvā guhaṃ nṛpa | gosahasraphalaṃ vidyāttejasvī ca bhavennaraḥ
हे नृप, कोटितीर्थ में स्नान करके गुह (कार्तिकेय) का पूजन करने वाला मनुष्य एक हज़ार गौओं के दान का फल पाता है और तेजस्वी होता है।
श्लोक 77 (3.82.77)
ततो वाराणसीं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् । कपिलाह्रदे नरः स्नात्वा राजसूयमवाप्नुयात् ॥
tato vārāṇasīṃ gatvā arcayitvā vṛṣadhvajam | kapilāhrade naraḥ snātvā rājasūyamavāpnuyāt
फिर वाराणसी जाकर वृषध्वज शिव का पूजन करके कपिलाह्रद में स्नान करने वाला मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 78 (3.82.78)
अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह । दर्शनाद्देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥
avimuktaṃ samāsādya tīrthasevī kurūdvaha | darśanāddevadevasya mucyate brahmahatyayā
हे कुरुश्रेष्ठ, अविमुक्त पहुँचकर तीर्थयात्री देवाधिदेव के दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 79 (3.82.79)
प्राणानुत्सृज्य तत्रैव मोक्षं प्राप्नोति मानवः । मार्कण्डेयस्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् ॥
prāṇānutsṛjya tatraiva mokṣaṃ prāpnoti mānavaḥ | mārkaṇḍeyasya rājendra tīrthamāsādya durlabham
वहीं प्राण त्यागने वाला मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। हे राजेन्द्र, मार्कण्डेय के दुर्लभ तीर्थ पर पहुँचकर
श्लोक 80 (3.82.80)
गोमतीगङ्गयोश्चैव संगमे लोकविश्रुते । अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
gomatīgaṅgayoścaiva saṃgame lokaviśrute | agniṣṭomamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet
गोमती और गंगा के लोकविख्यात संगम पर मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 81 (3.82.81)
ततो गयां समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
tato gayāṃ samāsādya brahmacārī samāhitaḥ | aśvamedhamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet
फिर ब्रह्मचारी और एकाग्रचित्त होकर गया पहुँचने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 82 (3.82.82)
तत्राक्षयवटो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । तत्र दत्तं पितृभ्यस्तु भवत्यक्षयमुच्यते ॥
tatrākṣayavaṭo nāma triṣu lokeṣu viśrutaḥ | tatra dattaṃ pitṛbhyastu bhavatyakṣayamucyate
वहाँ अक्षयवट नामक वटवृक्ष है, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध है; कहा जाता है कि वहाँ पितरों को अर्पित किया गया दान अक्षय हो जाता है।
श्लोक 83 (3.82.83)
महानद्यामुपस्पृश्य तर्पयेत्पितृदेवताः । अक्षयान्प्राप्नुयाल्लोकान्कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
mahānadyāmupaspṛśya tarpayetpitṛdevatāḥ | akṣayānprāpnuyāllokānkulaṃ caiva samuddharet
महानदी के जल का स्पर्श करके पितरों और देवताओं का तर्पण करने वाला मनुष्य अक्षय लोकों को प्राप्त करता है और अपने कुल का भी उद्धार कर देता है।
श्लोक 84 (3.82.84)
ततो ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् । ब्रह्मलोकमवाप्नोति प्रभातामेव शर्वरीम् ॥
tato brahmasaro gatvā dharmāraṇyopaśobhitam | brahmalokamavāpnoti prabhātāmeva śarvarīm
फिर धर्मारण्य से सुशोभित ब्रह्मसर में जाकर मनुष्य रात बीतकर सवेरा होते ही ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 85 (3.82.85)
ब्रह्मणा तत्र सरसि यूपश्रेष्ठः समुच्छ्रितः । यूपं प्रदक्षिणीकृत्य वाजपेयफलं लभेत् ॥
brahmaṇā tatra sarasi yūpaśreṣṭhaḥ samucchritaḥ | yūpaṃ pradakṣiṇīkṛtya vājapeyaphalaṃ labhet
उस सरोवर में ब्रह्मा ने एक श्रेष्ठ यूप (यज्ञ-स्तम्भ) खड़ा किया था। उस यूप की प्रदक्षिणा करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
श्लोक 86 (3.82.86)
ततो गच्छेत राजेन्द्र धेनुकं लोकविश्रुतम् । एकरात्रोषितो राजन्प्रयच्छेत्तिलधेनुकाम् ॥
tato gaccheta rājendra dhenukaṃ lokaviśrutam | ekarātroṣito rājanprayacchettiladhenukām
हे राजेन्द्र, इसके बाद लोकविख्यात धेनुक तीर्थ में जाना चाहिए। हे राजन्, वहाँ एक रात रहकर तिल की धेनु का दान करना चाहिए।
श्लोक 87 (3.82.87)
सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं व्रजेद्ध्रुवम् । तत्र चिह्नं महद्राजन्नद्यापि सुमहद्भृशम् ॥
sarvapāpaviśuddhātmā somalokaṃ vrajeddhruvam | tatra cihnaṃ mahadrājannadyāpi sumahadbhṛśam
इससे सब पापों से शुद्ध होकर वह निश्चय ही सोमलोक को जाता है। हे राजन्, वहाँ आज भी एक बहुत बड़ा चिह्न विद्यमान है,
श्लोक 88 (3.82.88)
कपिलायाः सवत्सायाश्चरन्त्याः पर्वते कृतम् । सवत्सायाः पदानि स्म दृश्यन्तेऽद्यापि भारत ॥
kapilāyāḥ savatsāyāścarantyāḥ parvate kṛtam | savatsāyāḥ padāni sma dṛśyante'dyāpi bhārata
जो पर्वत पर विचरती हुई बछड़े सहित कपिला गाय का बनाया हुआ है। हे भारत, बछड़े सहित उस गाय के पदचिह्न आज भी वहाँ दिखाई देते हैं।
श्लोक 89 (3.82.89)
तेषूपस्पृश्य राजेन्द्र पदेषु नृपसत्तम । यत्कंचिदशुभं कर्म तत्प्रणश्यति भारत ॥
teṣūpaspṛśya rājendra padeṣu nṛpasattama | yatkaṃcidaśubhaṃ karma tatpraṇaśyati bhārata
हे राजेन्द्र, हे नृपश्रेष्ठ, उन पदचिह्नों में जल का स्पर्श करने से मनुष्य का जो कुछ भी अशुभ कर्म हो, वह नष्ट हो जाता है, हे भारत।
श्लोक 90 (3.82.90)
ततो गृध्रवटं गच्छेत्स्थानं देवस्य धीमतः । स्नायीत भस्मना तत्र अभिगम्य वृषध्वजम् ॥
tato gṛdhravaṭaṃ gacchetsthānaṃ devasya dhīmataḥ | snāyīta bhasmanā tatra abhigamya vṛṣadhvajam
फिर बुद्धिमान देव (शिव) के स्थान गृध्रवट को जाना चाहिए। वहाँ वृषध्वज भगवान के समीप जाकर भस्म से स्नान करना चाहिए।
श्लोक 91 (3.82.91)
ब्राह्मणेन भवेच्चीर्णं व्रतं द्वादशवार्षिकम् । इतरेषां तु वर्णानां सर्वपापं प्रणश्यति ॥
brāhmaṇena bhaveccīrṇaṃ vrataṃ dvādaśavārṣikam | itareṣāṃ tu varṇānāṃ sarvapāpaṃ praṇaśyati
ब्राह्मण के लिए यह बारह वर्ष का व्रत पूरा करने के बराबर होता है; और अन्य वर्णों के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 92 (3.82.92)
उद्यन्तं च ततो गच्छेत्पर्वतं गीतनादितम् । सावित्र्यास्तु पदं तत्र दृश्यते भरतर्षभ ॥
udyantaṃ ca tato gacchetparvataṃ gītanāditam | sāvitryāstu padaṃ tatra dṛśyate bharatarṣabha
फिर गीतों से गूँजते उद्यन्त पर्वत पर जाना चाहिए। हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ सावित्री का पदचिह्न दिखाई देता है।
श्लोक 93 (3.82.93)
तत्र संध्यामुपासीत ब्राह्मणः संशितव्रतः । उपासिता भवेत्संध्या तेन द्वादशवार्षिकी ॥
tatra saṃdhyāmupāsīta brāhmaṇaḥ saṃśitavrataḥ | upāsitā bhavetsaṃdhyā tena dvādaśavārṣikī
कठोर व्रत वाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे; इससे उसकी बारह वर्षों की संध्योपासना पूरी हो जाती है।
श्लोक 94 (3.82.94)
योनिद्वारं च तत्रैव विश्रुतं भरतर्षभ । तत्राभिगम्य मुच्येत पुरुषो योनिसंकरात् ॥
yonidvāraṃ ca tatraiva viśrutaṃ bharatarṣabha | tatrābhigamya mucyeta puruṣo yonisaṃkarāt
हे भरतश्रेष्ठ, वहीं प्रसिद्ध योनिद्वार है। वहाँ जाकर मनुष्य फिर से गर्भ में आने के बंधन से छूट जाता है।
श्लोक 95 (3.82.95)
कृष्णशुक्लावुभौ पक्षौ गयायां यो वसेन्नरः । पुनात्यासप्तमं राजन्कुलं नास्त्यत्र संशयः ॥
kṛṣṇaśuklāvubhau pakṣau gayāyāṃ yo vasennaraḥ | punātyāsaptamaṃ rājankulaṃ nāstyatra saṃśayaḥ
हे राजन्, जो मनुष्य कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों तक गया में निवास करता है, वह सात पीढ़ियों तक अपने कुल को पवित्र कर देता है; इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 96 (3.82.96)
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोपि गयां व्रजेत् । गौरीं वा वरयेत्कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥
eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyekopi gayāṃ vrajet | gaurīṃ vā varayetkanyāṃ nīlaṃ vā vṛṣamutsṛjet
बहुत-से पुत्रों की कामना करनी चाहिए, ताकि उनमें से कोई एक भी गया जाए, या गौरी (आठ वर्ष की) कन्या से विवाह करे, या नील वृषभ का उत्सर्ग करे।
श्लोक 97 (3.82.97)
ततः फल्गुं व्रजेद्राजंस्तीर्थसेवी नराधिप । अश्वमेधमवाप्नोति सिद्धिं च महतीं व्रजेत् ॥
tataḥ phalguṃ vrajedrājaṃstīrthasevī narādhipa | aśvamedhamavāpnoti siddhiṃ ca mahatīṃ vrajet
हे नराधिप राजन्, फिर तीर्थसेवी मनुष्य फल्गु नदी पर जाए; वह अश्वमेध का फल पाता है और महान सिद्धि प्राप्त करता है।
श्लोक 98 (3.82.98)
ततो गच्छेत राजेन्द्र धर्मप्रस्थं समाहितः । तत्र धर्मो महाराज नित्यमास्ते युधिष्ठिर ॥
tato gaccheta rājendra dharmaprasthaṃ samāhitaḥ | tatra dharmo mahārāja nityamāste yudhiṣṭhira
हे राजेन्द्र, फिर एकाग्रचित्त होकर धर्मप्रस्थ जाना चाहिए। हे महाराज युधिष्ठिर, वहाँ धर्म सदा निवास करते हैं।
श्लोक 99 (3.82.99)
तत्र कूपोदकं कृत्वा तेन स्नातः शुचिस्तथा । पितॄन्देवांस्तु संतर्प्य मुक्तपापो दिवं व्रजेत् ॥
tatra kūpodakaṃ kṛtvā tena snātaḥ śucistathā | pitṝndevāṃstu saṃtarpya muktapāpo divaṃ vrajet
वहाँ कुएँ का जल लेकर उससे स्नान करके पवित्र हुआ मनुष्य पितरों और देवताओं को तृप्त करके पापमुक्त हो स्वर्ग जाता है।
श्लोक 100 (3.82.100)
मतङ्गस्याश्रमस्तत्र महर्षेर्भावितात्मनः ॥
mataṅgasyāśramastatra maharṣerbhāvitātmanaḥ
वहीं शुद्धात्मा महर्षि मतंग का आश्रम है।
श्लोक 101 (3.82.101)
तं प्रविश्याश्रमं श्रीमच्छ्रमशोकविनाशनम् । गवामयनयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥
taṃ praviśyāśramaṃ śrīmacchramaśokavināśanam | gavāmayanayajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ
थकान और शोक को मिटाने वाले उस सुंदर आश्रम में प्रवेश करके मनुष्य गवामयन यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 102 (3.82.102)
धर्मं तत्राभिसंस्पृश्य वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥
dharmaṃ tatrābhisaṃspṛśya vājimedhamavāpnuyāt
वहाँ धर्म का स्पर्श करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 103 (3.82.103)
ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मस्थानमनुत्तमम् । तत्राभिगम्य राजेन्द्र ब्रह्माणं पुरुषर्षभ । राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः ॥
tato gaccheta rājendra brahmasthānamanuttamam | tatrābhigamya rājendra brahmāṇaṃ puruṣarṣabha | rājasūyāśvamedhābhyāṃ phalaṃ vindati mānavaḥ
हे राजेन्द्र, फिर अनुपम ब्रह्मस्थान में जाना चाहिए। हे राजेन्द्र, हे पुरुषश्रेष्ठ, वहाँ ब्रह्मा के समीप जाकर मनुष्य राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल पाता है।
श्लोक 104 (3.82.104)
ततो राजगृहं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप । उपस्पृश्य ततस्तत्र कक्षीवानिव मोदते ॥
tato rājagṛhaṃ gacchettīrthasevī narādhipa | upaspṛśya tatastatra kakṣīvāniva modate
हे नराधिप, फिर तीर्थसेवी मनुष्य राजगृह जाए। वहाँ जल का स्पर्श करके वह कक्षीवान् की भाँति आनन्दित होता है।
श्लोक 105 (3.82.105)
यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः । यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥
yakṣiṇyā naityakaṃ tatra prāśnīta puruṣaḥ śuciḥ | yakṣiṇyāstu prasādena mucyate brahmahatyayā
वहाँ पवित्र होकर मनुष्य यक्षिणी का नित्य नैवेद्य ग्रहण करे; यक्षिणी की कृपा से वह ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है।
श्लोक 106 (3.82.106)
मणिनागं ततो गत्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥
maṇināgaṃ tato gatvā gosahasraphalaṃ labhet
फिर मणिनाग जाकर सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्लोक 107 (3.82.107)
तैर्थिकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य भारत । दष्टस्याशीविषेणापि न तस्य क्रमते विषम् ॥
tairthikaṃ bhuñjate yastu maṇināgasya bhārata | daṣṭasyāśīviṣeṇāpi na tasya kramate viṣam
हे भारत, जो मणिनाग का तीर्थ-प्रसाद खाता है, उसे विषैला सर्प डस ले तब भी उस पर विष का असर नहीं होता।
श्लोक 108 (3.82.108)
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् । ततो गच्छेत ब्रह्मर्षेर्गौतमस्य वनं प्रियम् ॥
tatroṣya rajanīmekāṃ gosahasraphalaṃ labhet | tato gaccheta brahmarṣergautamasya vanaṃ priyam
वहाँ एक रात रहने से सहस्र गोदान का फल मिलता है। फिर ब्रह्मर्षि गौतम के सुंदर वन में जाना चाहिए।
श्लोक 109 (3.82.109)
अहल्याया ह्रदे स्नात्वा व्रजेत परमां गतिम् । अभिगम्याश्रमं राजन्विन्दते श्रियमात्मनः ॥
ahalyāyā hrade snātvā vrajeta paramāṃ gatim | abhigamyāśramaṃ rājanvindate śriyamātmanaḥ
अहल्या के कुण्ड में स्नान करके मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है। हे राजन्, आश्रम में जाकर वह अपने लिए श्री प्राप्त करता है।
श्लोक 110 (3.82.110)
तत्रोदपानं धर्मज्ञ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कृत्वा तु वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥
tatrodapānaṃ dharmajña triṣu lokeṣu viśrutam | tatrābhiṣekaṃ kṛtvā tu vājimedhamavāpnuyāt
हे धर्मज्ञ, वहाँ तीनों लोकों में प्रसिद्ध एक कूप है; उसमें स्नान करके मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 111 (3.82.111)
जनकस्य तु राजर्षेः कूपस्त्रिदशपूजितः । तत्राभिषेकं कृत्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥
janakasya tu rājarṣeḥ kūpastridaśapūjitaḥ | tatrābhiṣekaṃ kṛtvā tu viṣṇulokamavāpnuyāt
राजर्षि जनक का कूप देवताओं द्वारा पूजित है; उसमें स्नान करके मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 112 (3.82.112)
ततो विनशनं गच्छेत्सर्वपापप्रमोचनम् । वाजपेयमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥
tato vinaśanaṃ gacchetsarvapāpapramocanam | vājapeyamavāpnoti somalokaṃ ca gacchati
फिर सब पापों से छुड़ाने वाले विनशन तीर्थ को जाना चाहिए। वहाँ वाजपेय का फल मिलता है और मनुष्य सोमलोक को जाता है।
श्लोक 113 (3.82.113)
गण्डकीं तु समासाद्य सर्वतीर्थजलोद्भवाम् । वाजपेयमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥
gaṇḍakīṃ tu samāsādya sarvatīrthajalodbhavām | vājapeyamavāpnoti sūryalokaṃ ca gacchati
सब तीर्थों के जल से उत्पन्न गण्डकी नदी पर पहुँचकर मनुष्य वाजपेय का फल पाता है और सूर्यलोक को जाता है।
श्लोक 114 (3.82.114)
ततो विशल्यामासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् । अग्निष्टोममवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
tato viśalyāmāsādya nadīṃ trailokyaviśrutām | agniṣṭomamavāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
फिर तीनों लोकों में विख्यात विशल्या नदी पर पहुँचकर अग्निष्टोम का फल मिलता है और मनुष्य स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 115 (3.82.115)
ततोऽधिवङ्गं धर्मज्ञ समाविश्य ततो वनम् । गुह्यकेषु महाराज मोदते नात्र संशयः ॥
tato'dhivaṅgaṃ dharmajña samāviśya tato vanam | guhyakeṣu mahārāja modate nātra saṃśayaḥ
हे धर्मज्ञ, फिर अधिवंग में और उसके बाद वन में प्रवेश करके मनुष्य, हे महाराज, गुह्यकों के बीच आनन्द करता है; इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 116 (3.82.116)
कम्पनां तु समासाद्य नदीं सिद्धनिषेविताम् । पुण्डरीकमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
kampanāṃ tu samāsādya nadīṃ siddhaniṣevitām | puṇḍarīkamavāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
सिद्धों द्वारा सेवित कम्पना नदी पर पहुँचकर पुण्डरीक यज्ञ का फल मिलता है और मनुष्य स्वर्गलोक जाता है।
श्लोक 117 (3.82.117)
अथ माहेश्वरीं धारां समासाद्य धराधिप । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
atha māheśvarīṃ dhārāṃ samāsādya dharādhipa | aśvamedhamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet
हे पृथ्वीपति, फिर माहेश्वरी धारा पर पहुँचकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 118 (3.82.118)
दिवौकसां पुष्करिणीं समासाद्य नराधिप । न दुर्गतिमवाप्नोति वाजिमेधं च विन्दति ॥
divaukasāṃ puṣkariṇīṃ samāsādya narādhipa | na durgatimavāpnoti vājimedhaṃ ca vindati
हे नराधिप, देवताओं की पुष्करिणी पर पहुँचकर मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता और अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 119 (3.82.119)
अथ सोमपदं गच्छेद्ब्रह्मचारी समाहितः । माहेश्वरपदे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ॥
atha somapadaṃ gacchedbrahmacārī samāhitaḥ | māheśvarapade snātvā vājimedhaphalaṃ labhet
फिर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एकाग्रचित्त होकर सोमपद जाना चाहिए; माहेश्वरपद में स्नान करके अश्वमेध का फल मिलता है।
श्लोक 120 (3.82.120)
तत्र कोटी तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ । कूर्मरूपेण राजेन्द्र ह्यसुरेण दुरात्मना ॥
tatra koṭī tu tīrthānāṃ viśrutā bharatarṣabha | kūrmarūpeṇa rājendra hyasureṇa durātmanā
हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ प्रसिद्ध तीर्थकोटि (करोड़ों तीर्थों का समूह) है। हे राजेन्द्र, कछुए का रूप धरे एक दुष्टात्मा असुर
श्लोक 121 (3.82.121)
ह्रियमाणा हृता राजन्विष्णुना प्रभविष्णुना । तत्राभिषेकं कुर्वीत तीर्थकोट्यां युधिष्ठिर ॥
hriyamāṇā hṛtā rājanviṣṇunā prabhaviṣṇunā | tatrābhiṣekaṃ kurvīta tīrthakoṭyāṃ yudhiṣṭhira
उन्हें हरकर ले जा रहा था, तब हे राजन्, प्रभावशाली विष्णु ने उन्हें फिर छीन लिया। हे युधिष्ठिर, उस तीर्थकोटि में स्नान करना चाहिए।
श्लोक 122 (3.82.122)
पुण्डरीकमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । ततो गच्छेत राजेन्द्र स्थानं नारायणस्य च ॥
puṇḍarīkamavāpnoti viṣṇulokaṃ ca gacchati | tato gaccheta rājendra sthānaṃ nārāyaṇasya ca
इससे पुण्डरीक यज्ञ का फल मिलता है और मनुष्य विष्णुलोक को जाता है। हे राजेन्द्र, फिर नारायण के स्थान को जाना चाहिए,
श्लोक 123 (3.82.123)
सदा सन्निहितो यत्र विष्णुर्वसति भारत । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥
sadā sannihito yatra viṣṇurvasati bhārata | yatra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ
जहाँ, हे भारत, विष्णु सदा सन्निहित रहकर निवास करते हैं; जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि,
श्लोक 124 (3.82.124)
आदित्या वसवो रुद्रा जनार्दनमुपासते । शालग्राम इति ख्यातो विष्णुरद्भुतकर्मकः ॥
ādityā vasavo rudrā janārdanamupāsate | śālagrāma iti khyāto viṣṇuradbhutakarmakaḥ
आदित्य, वसु और रुद्र जनार्दन की उपासना करते हैं। वहाँ अद्भुत कर्म करने वाले विष्णु शालग्राम नाम से विख्यात हैं।
श्लोक 125 (3.82.125)
अभिगम्य त्रिलोकेशं वरदं विष्णुमव्ययम् । अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥
abhigamya trilokeśaṃ varadaṃ viṣṇumavyayam | aśvamedhamavāpnoti viṣṇulokaṃ ca gacchati
त्रिलोकी के स्वामी, वरदायक, अविनाशी विष्णु के समीप जाकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 126 (3.82.126)
तत्रोदपानं धर्मज्ञ सर्वपापप्रमोचनम् । समुद्रास्तत्र चत्वारः कूपे संनिहिताः सदा । तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥
tatrodapānaṃ dharmajña sarvapāpapramocanam | samudrāstatra catvāraḥ kūpe saṃnihitāḥ sadā | tatropaspṛśya rājendra na durgatimavāpnuyāt
हे धर्मज्ञ, वहाँ सब पापों से छुड़ाने वाला एक कूप है; उस कूप में चारों समुद्र सदा विद्यमान रहते हैं। हे राजेन्द्र, उसके जल का स्पर्श करने से मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 127 (3.82.127)
अभिगम्य त्रिलोकेशं वरदं विष्णुमव्ययम् । विराजति यथा सोमो मेघैर्मुक्तो नराधिप ॥
abhigamya trilokeśaṃ varadaṃ viṣṇumavyayam | virājati yathā somo meghairmukto narādhipa
हे नराधिप, त्रिलोकी के स्वामी, वरदायक, अविनाशी विष्णु के समीप जाकर मनुष्य बादलों से मुक्त चन्द्रमा की भाँति शोभित होता है।
श्लोक 128 (3.82.128)
जातिस्मरमुपस्पृश्य शुचिः प्रयतमानसः । जातिस्मरत्वमाप्नोति स्नात्वा तत्र न संशयः ॥
jātismaramupaspṛśya śuciḥ prayatamānasaḥ | jātismaratvamāpnoti snātvā tatra na saṃśayaḥ
जातिस्मर तीर्थ में पवित्र और संयतचित्त होकर जल का स्पर्श और स्नान करने से मनुष्य को पूर्वजन्मों का स्मरण प्राप्त होता है; इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 129 (3.82.129)
वटेश्वरपुरं गत्वा अर्चयित्वा तु केशवम् । ईप्सिताँल्लभते कामानुपवासान्न संशयः ॥
vaṭeśvarapuraṃ gatvā arcayitvā tu keśavam | īpsitām̐llabhate kāmānupavāsānna saṃśayaḥ
वटेश्वरपुर जाकर केशव की पूजा करने और उपवास करने से मनुष्य मनचाही कामनाएँ प्राप्त करता है; इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 130 (3.82.130)
ततस्तु वामनं गत्वा सर्वपापप्रमोचनम् । अभिगम्य हरिं देवं न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥
tatastu vāmanaṃ gatvā sarvapāpapramocanam | abhigamya hariṃ devaṃ na durgatimavāpnuyāt
फिर सब पापों से छुड़ाने वाले वामन तीर्थ में जाकर भगवान हरि के समीप पहुँचने वाला मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 131 (3.82.131)
भरतस्याश्रमं गच्छेत्सर्वपापप्रमोचनम् ॥
bharatasyāśramaṃ gacchetsarvapāpapramocanam
सब पापों से छुड़ाने वाले भरत के आश्रम को जाना चाहिए।
श्लोक 132 (3.82.132)
कौशिकीं तत्र गच्छेत महापापप्रणाशिनीम् । राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥
kauśikīṃ tatra gaccheta mahāpāpapraṇāśinīm | rājasūyasya yajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ
वहाँ महापापों का नाश करने वाली कौशिकी नदी पर जाना चाहिए; इससे मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 133 (3.82.133)
ततो गच्छेत राजेन्द्र चम्पकारण्यमुत्तमम् । तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥
tato gaccheta rājendra campakāraṇyamuttamam | tatroṣya rajanīmekāṃ gosahasraphalaṃ labhet
हे राजेन्द्र, फिर उत्तम चम्पकारण्य में जाना चाहिए; वहाँ एक रात रहने से सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्लोक 134 (3.82.134)
अथ ज्येष्ठिलमासाद्य तीर्थं परमदुर्लभम् । तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥
atha jyeṣṭhilamāsādya tīrthaṃ paramadurlabham | tatroṣya rajanīmekāṃ gosahasraphalaṃ labhet
फिर परम दुर्लभ ज्येष्ठिल तीर्थ में पहुँचकर वहाँ एक रात रहने से सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्लोक 135 (3.82.135)
तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा देव्या सह महाद्युतिम् । मित्रावरुणयोर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ । त्रिरात्रोपोषितस्तत्र अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥
tatra viśveśvaraṃ dṛṣṭvā devyā saha mahādyutim | mitrāvaruṇayorlokānāpnoti puruṣarṣabha | trirātropoṣitastatra agniṣṭomaphalaṃ labhet
हे पुरुषश्रेष्ठ, वहाँ देवी के साथ महातेजस्वी विश्वेश्वर का दर्शन करके मनुष्य मित्र और वरुण के लोकों को प्राप्त करता है; वहाँ तीन रात उपवास करने से अग्निष्टोम का फल मिलता है।
श्लोक 136 (3.82.136)
कन्यासंवेद्यमासाद्य नियतो नियताशनः । मनोः प्रजापतेर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ ॥
kanyāsaṃvedyamāsādya niyato niyatāśanaḥ | manoḥ prajāpaterlokānāpnoti puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, कन्यासंवेद्य तीर्थ में पहुँचकर संयमी और नियमित आहार करने वाला मनुष्य प्रजापति मनु के लोकों को प्राप्त करता है।
श्लोक 137 (3.82.137)
कन्यायां ये प्रयच्छन्ति दानमण्वपि भारत । तदक्षय्यमिति प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः ॥
kanyāyāṃ ye prayacchanti dānamaṇvapi bhārata | tadakṣayyamiti prāhurṛṣayaḥ saṃśitavratāḥ
हे भारत, कठोर व्रत वाले ऋषि कहते हैं कि कन्या तीर्थ में जो लोग अणुमात्र भी दान देते हैं, उनका वह दान अक्षय होता है।
श्लोक 138 (3.82.138)
ततो निर्वीरमासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥
tato nirvīramāsādya triṣu lokeṣu viśrutam | aśvamedhamavāpnoti viṣṇulokaṃ ca gacchati
फिर तीनों लोकों में विख्यात निर्वीर तीर्थ पर पहुँचकर अश्वमेध का फल मिलता है और मनुष्य विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 139 (3.82.139)
ये त्विन्धनं प्रयच्छन्ति निर्वीरासंगमे नराः । ते यान्ति नरशार्दूल शक्रलोकमनामयम् ॥
ye tvindhanaṃ prayacchanti nirvīrāsaṃgame narāḥ | te yānti naraśārdūla śakralokamanāmayam
हे नरश्रेष्ठ, जो लोग निर्वीरा के संगम पर ईंधन का दान करते हैं, वे दुःखरहित इन्द्रलोक को जाते हैं।
श्लोक 140 (3.82.140)
तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । तत्राभिषेकं कुर्वाणो वाजपेयमवाप्नुयात् ॥
tatrāśramo vasiṣṭhasya triṣu lokeṣu viśrutaḥ | tatrābhiṣekaṃ kurvāṇo vājapeyamavāpnuyāt
वहाँ तीनों लोकों में विख्यात वसिष्ठ का आश्रम है; वहाँ स्नान करने से वाजपेय का फल मिलता है।
श्लोक 141 (3.82.141)
देवकूटं समासाद्य ब्रह्मर्षिगणसेवितम् । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
devakūṭaṃ samāsādya brahmarṣigaṇasevitam | aśvamedhamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet
ब्रह्मर्षियों के समूहों से सेवित देवकूट पर पहुँचकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 142 (3.82.142)
ततो गच्छेत राजेन्द्र कौशिकस्य मुनेर्ह्रदम् । यत्र सिद्धिं परां प्राप्तो विश्वामित्रोथ कौशिकः ॥
tato gaccheta rājendra kauśikasya munerhradam | yatra siddhiṃ parāṃ prāpto viśvāmitrotha kauśikaḥ
हे राजेन्द्र, फिर मुनि कौशिक के सरोवर पर जाना चाहिए, जहाँ कौशिक विश्वामित्र ने परम सिद्धि प्राप्त की थी।
श्लोक 143 (3.82.143)
तत्र मासं वसेद्वीर कौशिक्यां भरतर्षभ । अश्वमेधस्य यत्पुण्यं तन्मासेनाधिगच्छति ॥
tatra māsaṃ vasedvīra kauśikyāṃ bharatarṣabha | aśvamedhasya yatpuṇyaṃ tanmāsenādhigacchati
हे वीर, हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ कौशिकी के तट पर एक मास निवास करना चाहिए; अश्वमेध का जो पुण्य है, वह एक मास में ही प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 144 (3.82.144)
सर्वतीर्थवरे चैव यो वसेत महाह्रदे । न दुर्गतिमवाप्नोति विन्द्याद्बहु सुवर्णकम् ॥
sarvatīrthavare caiva yo vaseta mahāhrade | na durgatimavāpnoti vindyādbahu suvarṇakam
जो सब तीर्थों में श्रेष्ठ महाह्रद में निवास करता है, वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता और बहुत-सा सुवर्ण पाता है।
श्लोक 145 (3.82.145)
कुमारमभिगम्याथ वीराश्रमनिवासिनम् । अश्वमेधमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः ॥
kumāramabhigamyātha vīrāśramanivāsinam | aśvamedhamavāpnoti naro nāstyatra saṃśayaḥ
वीराश्रम में निवास करने वाले कुमार (स्कन्द) के समीप जाकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है; इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 146 (3.82.146)
अग्निधारां समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् । तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् ॥
agnidhārāṃ samāsādya triṣu lokeṣu viśrutām | tatrābhiṣekaṃ kurvāṇo hyagniṣṭomamavāpnuyāt
तीनों लोकों में विख्यात अग्निधारा पर पहुँचकर वहाँ स्नान करने से अग्निष्टोम का फल मिलता है।
श्लोक 147 (3.82.147)
अभिगम्य महादेवं वरदं विष्णुमव्ययम् । पितामहसरो गत्वा शैलराजसमीपतः । तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् ॥
abhigamya mahādevaṃ varadaṃ viṣṇumavyayam | pitāmahasaro gatvā śailarājasamīpataḥ | tatrābhiṣekaṃ kurvāṇo hyagniṣṭomamavāpnuyāt
महादेव, वरदायक, अविनाशी विष्णु के समीप जाकर और पर्वतराज के निकट पितामहसर पर जाकर वहाँ स्नान करने से अग्निष्टोम का फल मिलता है।
श्लोक 148 (3.82.148)
पितामहस्य सरसः प्रस्रुता लोकपावनी । कुमारधारा तत्रैव त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥
pitāmahasya sarasaḥ prasrutā lokapāvanī | kumāradhārā tatraiva triṣu lokeṣu viśrutā
पितामह के उस सरोवर से लोकों को पवित्र करने वाली कुमारधारा निकली है, जो तीनों लोकों में विख्यात है।
श्लोक 149 (3.82.149)
यत्र स्नात्वा कृतार्थोस्मीत्यात्मानमवगच्छति । षष्ठकालोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥
yatra snātvā kṛtārthosmītyātmānamavagacchati | ṣaṣṭhakālopavāsena mucyate brahmahatyayā
वहाँ स्नान करके मनुष्य अपने को कृतार्थ समझता है; छठे समय भोजन करने का उपवास-व्रत करने से वह ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है।
श्लोक 150 (3.82.150)
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थसेवनतत्परः । शिखरं वै महादेव्या गौर्यास्त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥
tato gaccheta dharmajña tīrthasevanatatparaḥ | śikharaṃ vai mahādevyā gauryāstrailokyaviśrutam
हे धर्मज्ञ, फिर तीर्थसेवन में तत्पर होकर तीनों लोकों में विख्यात महादेवी गौरी के शिखर पर जाना चाहिए।
श्लोक 151 (3.82.151)
समारुह्य नरश्रेष्ठ स्तनकुण्डेषु संविशेत् । स्तनकुण्डमुपस्पृश्य वाजपेयफलं लभेत् ॥
samāruhya naraśreṣṭha stanakuṇḍeṣu saṃviśet | stanakuṇḍamupaspṛśya vājapeyaphalaṃ labhet
हे नरश्रेष्ठ, उस पर चढ़कर स्तनकुण्डों में प्रवेश करना चाहिए; स्तनकुण्ड के जल का स्पर्श करने से वाजपेय का फल मिलता है।
श्लोक 152 (3.82.152)
तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः । हयमेधमवाप्नोति शक्रलोकं च गच्छति ॥
tatrābhiṣekaṃ kurvāṇaḥ pitṛdevārcane rataḥ | hayamedhamavāpnoti śakralokaṃ ca gacchati
वहाँ स्नान करके पितरों और देवताओं की पूजा में लगा मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और इन्द्रलोक को जाता है।
श्लोक 153 (3.82.153)
ताम्रारुणं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥
tāmrāruṇaṃ samāsādya brahmacārī samāhitaḥ | aśvamedhamavāpnoti brahmalokaṃ ca gacchati
ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एकाग्रचित्त होकर ताम्रारुण तीर्थ पर पहुँचने से अश्वमेध का फल मिलता है और मनुष्य ब्रह्मलोक जाता है।
श्लोक 154 (3.82.154)
नन्दिन्यां च समासाद्य कूपं देवनिषेवितम् । नरमेधस्य यत्पुण्यं तदाप्नोति नराधिप ॥
nandinyāṃ ca samāsādya kūpaṃ devaniṣevitam | naramedhasya yatpuṇyaṃ tadāpnoti narādhipa
हे नराधिप, नन्दिनी तीर्थ में देवताओं से सेवित कूप पर पहुँचकर मनुष्य नरमेध यज्ञ का पुण्य प्राप्त करता है।
श्लोक 155 (3.82.155)
कालिकासंगमे स्नात्वा कौशिक्यरुणयोर्गतः । त्रिरात्रोपोषितो राजन्सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
kālikāsaṃgame snātvā kauśikyaruṇayorgataḥ | trirātropoṣito rājansarvapāpaiḥ pramucyate
हे राजन्, कौशिकी और अरुणा के पास जाकर कालिकासंगम में स्नान करके तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 156 (3.82.156)
उर्वशीतीर्थमासाद्य ततः सोमाश्रमं बुधः । कुम्भकर्णाश्रमं गत्वा पूज्यते भुवि मानवः ॥
urvaśītīrthamāsādya tataḥ somāśramaṃ budhaḥ | kumbhakarṇāśramaṃ gatvā pūjyate bhuvi mānavaḥ
उर्वशी तीर्थ में पहुँचकर, फिर सोमाश्रम और कुम्भकर्णाश्रम में जाकर बुद्धिमान मनुष्य पृथ्वी पर पूजित होता है।
श्लोक 157 (3.82.157)
कोकामुखमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी यतव्रतः । जातिस्मरत्वमाप्नोति दृष्टमेतत्पुरातनैः ॥
kokāmukhamupaspṛśya brahmacārī yatavrataḥ | jātismaratvamāpnoti dṛṣṭametatpurātanaiḥ
ब्रह्मचर्य और व्रत का पालन करते हुए कोकामुख तीर्थ के जल का स्पर्श करने से मनुष्य को पूर्वजन्मों का स्मरण प्राप्त होता है; यह पुराने लोगों ने देखा है।
श्लोक 158 (3.82.158)
प्राङ्गदीं च समासाद्य कृतात्मा भवति द्विजः । सर्वपापविशुद्धात्मा शक्रलोकं च गच्छति ॥
prāṅgadīṃ ca samāsādya kṛtātmā bhavati dvijaḥ | sarvapāpaviśuddhātmā śakralokaṃ ca gacchati
प्राङ्गदी तीर्थ पर पहुँचकर द्विज कृतात्मा (शुद्ध अन्तःकरण वाला) हो जाता है; सब पापों से शुद्ध होकर वह इन्द्रलोक को जाता है।
श्लोक 159 (3.82.159)
ऋषभद्वीपमासाद्य मेध्यं क्रौञ्चनिषूदनम् । सरस्वत्यामुपस्पृश्य विमानस्थो विराजते ॥
ṛṣabhadvīpamāsādya medhyaṃ krauñcaniṣūdanam | sarasvatyāmupaspṛśya vimānastho virājate
ऋषभद्वीप और पवित्र क्रौंचनिषूदन तीर्थ पर पहुँचकर सरस्वती के जल का स्पर्श करने से मनुष्य विमान में बैठकर शोभा पाता है।
श्लोक 160 (3.82.160)
औद्दालकं महाराज तीर्थं मुनिनिषेवितम् । तत्राभिषेकं कृत्वा वै सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
auddālakaṃ mahārāja tīrthaṃ muniniṣevitam | tatrābhiṣekaṃ kṛtvā vai sarvapāpaiḥ pramucyate
हे महाराज, औद्दालक मुनियों द्वारा सेवित तीर्थ है; वहाँ स्नान करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 161 (3.82.161)
धर्मतीर्थं समासाद्य पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् । वाजपेयमवाप्नोति विमानस्थश्च पूज्यते ॥
dharmatīrthaṃ samāsādya puṇyaṃ brahmarṣisevitam | vājapeyamavāpnoti vimānasthaśca pūjyate
ब्रह्मर्षियों द्वारा सेवित पवित्र धर्मतीर्थ पर पहुँचकर मनुष्य वाजपेय का फल पाता है और विमान में बैठकर पूजित होता है।
श्लोक 162 (3.82.162)
अथ पम्पां समासाद्य भागीरथ्यां कृतोदकः । दण्डार्कमभिगत्वा तु गोसहस्रफलं लभेत् ॥
atha pampāṃ samāsādya bhāgīrathyāṃ kṛtodakaḥ | daṇḍārkamabhigatvā tu gosahasraphalaṃ labhet
फिर पम्पा पहुँचकर भागीरथी में जल-तर्पण करके और दण्डार्क के समीप जाकर मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।
श्लोक 163 (3.82.163)
ततो लेवलिकां गच्छेत्पुण्यां पुण्योपसेविताम् । वाजपेयमवाप्नोति विमानस्थश्च पूज्यते ॥
tato levalikāṃ gacchetpuṇyāṃ puṇyopasevitām | vājapeyamavāpnoti vimānasthaśca pūjyate
फिर पुण्यात्माओं द्वारा सेवित पवित्र लेवलिका तीर्थ को जाना चाहिए; वहाँ वाजपेय का फल मिलता है और मनुष्य विमान में बैठकर पूजित होता है।