आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 83
दक्षिण के तीर्थ, प्रयाग की महिमा और पुलस्त्य के उपदेश की समाप्ति
पुलस्त्य भीष्म के लिए तीर्थों का वर्णन पूरा करते हैं—पूर्व के संध्या, लौहित्य, करतोया और गंगासागर से लेकर दक्षिण के महेन्द्र, श्रीपर्वत, कावेरी, कन्यातीर्थ, गोकर्ण, गोदावरी, दण्डकारण्य, शूर्पारक और उस तुंगक वन तक जहाँ लुप्त वेद फिर प्राप्त हुए, और फिर उत्तर में कालंजर, चित्रकूट और शृंगबेरपुर होते हुए प्रयाग तक, जिसे वे सब तीर्थों में श्रेष्ठ बताते हैं। वे गंगा की और इस कथा के श्रवण की महिमा गाकर भीष्म को आशीर्वाद देते हैं और अन्तर्धान हो जाते हैं। तब नारद युधिष्ठिर से कहते हैं कि प्रतीक्षा करते ऋषियों को साथ लेकर, लोमश के मार्गदर्शन में यह तीर्थयात्रा करने से उन्हें आठ गुना पुण्य मिलेगा, और विदा हो जाते हैं; युधिष्ठिर यह बात ऋषियों को बताते हैं।
पुलस्त्य उवाच
श्लोक 1 (3.83.1)
अथ सन्ध्यां समासाद्य संवेद्ये तीर्थ उत्तमे । उपस्पृश्य नरो विद्यां लभते नात्र संशयः ॥
atha sandhyāṃ samāsādya saṃvedye tīrtha uttame | upaspṛśya naro vidyāṃ labhate nātra saṃśayaḥ
इसके बाद संध्या नदी पर जाकर संवेद्य नामक उत्तम तीर्थ में स्नान-आचमन करने से मनुष्य विद्या प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 2 (3.83.2)
रामस्य च प्रसादेन तीर्थं राजन्कृतं पुरा । तल्लौहित्यं समासाद्य विन्द्याद्बहु सुवर्णकम् ॥
rāmasya ca prasādena tīrthaṃ rājankṛtaṃ purā | tallauhityaṃ samāsādya vindyādbahu suvarṇakam
हे राजन्, प्राचीन काल में राम की कृपा से वहाँ एक तीर्थ बना था। उस लौहित्य तीर्थ में पहुँचकर मनुष्य बहुत-सा सुवर्ण पाता है।
श्लोक 3 (3.83.3)
करतोयां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति प्रजापतिकृतो विधिः ॥
karatoyāṃ samāsādya trirātropoṣito naraḥ | aśvamedhamavāpnoti prajāpatikṛto vidhiḥ
करतोया नदी पर पहुँचकर तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है; यह प्रजापति का बनाया हुआ विधान है।
श्लोक 4 (3.83.4)
गङ्गायास्तत्र राजेन्द्र सागरस्य च सङ्गमे । अश्वमेधं दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
gaṅgāyāstatra rājendra sāgarasya ca saṅgame | aśvamedhaṃ daśaguṇaṃ pravadanti manīṣiṇaḥ
हे राजेन्द्र, वहाँ गंगा और सागर के संगम पर (स्नान का) फल मनीषी लोग अश्वमेध से दस गुना बताते हैं।
श्लोक 5 (3.83.5)
गङ्गायास्त्वपरं पारं प्राप्य यः स्नाति मानवः । त्रिरात्रमुषितो राजन्सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥
gaṅgāyāstvaparaṃ pāraṃ prāpya yaḥ snāti mānavaḥ | trirātramuṣito rājansarvānkāmānavāpnuyāt
हे राजन्, जो मनुष्य गंगा के उस पार पहुँचकर स्नान करता है और तीन रात वहाँ रहता है, वह सब कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 6 (3.83.6)
ततो वैतरणीं गत्वा सर्वपापप्रमोचनीम् । विरजातीर्थमासाद्य विराजति यथा शशी ॥
tato vaitaraṇīṃ gatvā sarvapāpapramocanīm | virajātīrthamāsādya virājati yathā śaśī
फिर सब पापों से छुड़ाने वाली वैतरणी पर जाकर और विरजा तीर्थ में पहुँचकर मनुष्य चन्द्रमा के समान शोभा पाता है।
श्लोक 7 (3.83.7)
प्रभवेच्च कुले पुण्ये सर्वपापं व्यपोहति । गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नरः ॥
prabhavecca kule puṇye sarvapāpaṃ vyapohati | gosahasraphalaṃ labdhvā punāti svakulaṃ naraḥ
वह पुण्यवान कुल में जन्म लेता है और सारे पाप दूर कर देता है; सहस्र गोदान का फल पाकर वह अपने कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 8 (3.83.8)
शोणस्य ज्योतिरथ्यायाः संगमे नियतः शुचिः । तर्पयित्वा पितॄन्देवानग्निष्टोमफलं लभेत् ॥
śoṇasya jyotirathyāyāḥ saṃgame niyataḥ śuciḥ | tarpayitvā pitṝndevānagniṣṭomaphalaṃ labhet
शोण और ज्योतिरथ्या के संगम पर संयमी और पवित्र रहकर पितरों और देवताओं का तर्पण करने वाला अग्निष्टोम का फल पाता है।
श्लोक 9 (3.83.9)
शोणस्य नर्मदायाश्च प्रभेदे कुरुनन्दन । वंशगुल्म उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् ॥
śoṇasya narmadāyāśca prabhede kurunandana | vaṃśagulma upaspṛśya vājimedhaphalaṃ labhet
हे कुरुनन्दन, जहाँ शोण और नर्मदा अलग होती हैं, वहाँ वंशगुल्म में स्नान करने से अश्वमेध का फल मिलता है।
श्लोक 10 (3.83.10)
ऋषभं तीर्थमासाद्य कोशलायां नराधिप । वाजपेयमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः । गोसहस्रफलं विन्द्यात्कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
ṛṣabhaṃ tīrthamāsādya kośalāyāṃ narādhipa | vājapeyamavāpnoti trirātropoṣito naraḥ | gosahasraphalaṃ vindyātkulaṃ caiva samuddharet
हे नराधिप, कोसल में ऋषभ तीर्थ पर पहुँचकर तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य वाजपेय का फल पाता है; उसे सहस्र गोदान का फल मिलता है और वह अपने कुल का उद्धार भी करता है।
श्लोक 11 (3.83.11)
कोसलां तु समासाद्य कालतीर्थमुपस्पृशेत् । वृषभैकादशफलं लभते नात्र संशयः ॥
kosalāṃ tu samāsādya kālatīrthamupaspṛśet | vṛṣabhaikādaśaphalaṃ labhate nātra saṃśayaḥ
कोसला में पहुँचकर कालतीर्थ में स्नान करे; वह ग्यारह बैलों के दान का फल पाता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 12 (3.83.12)
पुष्पवत्यामुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नृप ॥
puṣpavatyāmupaspṛśya trirātropoṣito naraḥ | gosahasraphalaṃ labdhvā punāti svakulaṃ nṛpa
हे नृप, पुष्पवती में स्नान करके तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाकर अपने कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 13 (3.83.13)
ततो बदरिकातीर्थे स्नात्वा भरतसत्तम । दीर्घमायुरवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
tato badarikātīrthe snātvā bharatasattama | dīrghamāyuravāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
हे भरतश्रेष्ठ, फिर बदरिका तीर्थ में स्नान करने से दीर्घ आयु मिलती है और मनुष्य स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 14 (3.83.14)
तथा चम्पां समासाद्य भागीरथ्यां कृतोदकः । दण्डाख्यमभिगम्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ॥
tathā campāṃ samāsādya bhāgīrathyāṃ kṛtodakaḥ | daṇḍākhyamabhigamyaiva gosahasraphalaṃ labhet
इसी प्रकार चम्पा पहुँचकर भागीरथी में जल-तर्पण करे और दण्ड नामक तीर्थ में जाए, तो सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्लोक 15 (3.83.15)
लपेटिकां ततो गच्छेत्पुण्यां पुण्योपशोभिताम् । वाजपेयमवाप्नोति देवैः सर्वैश्च पूज्यते ॥
lapeṭikāṃ tato gacchetpuṇyāṃ puṇyopaśobhitām | vājapeyamavāpnoti devaiḥ sarvaiśca pūjyate
फिर पुण्य से सुशोभित पवित्र लपेटिका तीर्थ में जाए; उसे वाजपेय का फल मिलता है और सब देवता उसका सम्मान करते हैं।
श्लोक 16 (3.83.16)
ततो महेन्द्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् । रामतीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ॥
tato mahendramāsādya jāmadagnyaniṣevitam | rāmatīrthe naraḥ snātvā vājimedhaphalaṃ labhet
फिर जमदग्नि-पुत्र (परशुराम) से सेवित महेन्द्र पर्वत पर पहुँचकर रामतीर्थ में स्नान करने वाला अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 17 (3.83.17)
मतङ्गस्य तु केदारस्तत्रैव कुरुनन्दन । तत्र स्नात्वा कुरुश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् ॥
mataṅgasya tu kedārastatraiva kurunandana | tatra snātvā kuruśreṣṭha gosahasraphalaṃ labhet
हे कुरुनन्दन, वहीं मतंग का केदार है; हे कुरुश्रेष्ठ, वहाँ स्नान करने से सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्लोक 18 (3.83.18)
श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत् । अश्वमेधमवाप्नोति पूजयित्वा वृषध्वजम् ॥
śrīparvataṃ samāsādya nadītīramupaspṛśet | aśvamedhamavāpnoti pūjayitvā vṛṣadhvajam
श्रीपर्वत पर पहुँचकर नदी-तट पर स्नान करे; वृषभध्वज शिव की पूजा करके वह अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 19 (3.83.19)
श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः । न्यवसत्परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह ॥
śrīparvate mahādevo devyā saha mahādyutiḥ | nyavasatparamaprīto brahmā ca tridaśaiḥ saha
श्रीपर्वत पर महातेजस्वी महादेव देवी के साथ परम प्रसन्न होकर रहते थे, और देवताओं के साथ ब्रह्मा भी।
श्लोक 20 (3.83.20)
तत्र देवह्रदे स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
tatra devahrade snātvā śuciḥ prayatamānasaḥ | aśvamedhamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet
वहाँ देवह्रद में पवित्र और संयत मन से स्नान करने वाला अश्वमेध का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 21 (3.83.21)
ऋषभं पर्वतं गत्वा पाण्ड्येषु नृपपूजितम् । वाजपेयमवाप्नोति नाकपृष्ठे च मोदते ॥
ṛṣabhaṃ parvataṃ gatvā pāṇḍyeṣu nṛpapūjitam | vājapeyamavāpnoti nākapṛṣṭhe ca modate
पाण्ड्य देश में राजाओं से पूजित ऋषभ पर्वत पर जाकर मनुष्य वाजपेय का फल पाता है और स्वर्ग में आनन्द करता है।
श्लोक 22 (3.83.22)
ततो गच्छेत कावेरीं वृतामप्सरसां गणैः । तत्रस्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ॥
tato gaccheta kāverīṃ vṛtāmapsarasāṃ gaṇaiḥ | tatrasnātvā naro rājangosahasraphalaṃ labhet
फिर अप्सराओं के समूहों से घिरी कावेरी पर जाए; हे राजन्, वहाँ स्नान करने से मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।
श्लोक 23 (3.83.23)
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत् । तत्तोयं स्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
tatastīre samudrasya kanyātīrthamupaspṛśet | tattoyaṃ spṛśya rājendra sarvapāpaiḥ pramucyate
फिर समुद्र के तट पर कन्यातीर्थ में स्नान करे; हे राजेन्द्र, उसके जल का स्पर्श करके मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 24 (3.83.24)
अथ गोकर्णमासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । समुद्रमध्ये राजेन्द्र सर्वलोकनमस्कृतम् ॥
atha gokarṇamāsādya triṣu lokeṣu viśrutam | samudramadhye rājendra sarvalokanamaskṛtam
फिर, हे राजेन्द्र, तीनों लोकों में प्रसिद्ध, समुद्र के बीच स्थित और सब लोकों से वन्दित गोकर्ण में पहुँचे,
श्लोक 25 (3.83.25)
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । भूतयक्षपिशाचाश्च किन्नराः समहोरगाः ॥
yatra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | bhūtayakṣapiśācāśca kinnarāḥ samahoragāḥ
जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि, भूत, यक्ष, पिशाच, किन्नर और बड़े-बड़े नाग,
श्लोक 26 (3.83.26)
सिद्धचारणगन्धर्वमानुषाः पन्नगास्तथा । सरितः सागराः शैला उपासन्त उमापतिम् ॥
siddhacāraṇagandharvamānuṣāḥ pannagāstathā | saritaḥ sāgarāḥ śailā upāsanta umāpatim
सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मनुष्य, पन्नग, नदियाँ, समुद्र और पर्वत उमापति शिव की उपासना करते हैं।
श्लोक 27 (3.83.27)
तत्रेशानं समभ्यर्च्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति ॥
tatreśānaṃ samabhyarcya trirātropoṣito naraḥ | aśvamedhamavāpnoti gāṇapatyaṃ ca vindati
वहाँ ईशान (शिव) की पूजा करके तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल और गणपति का पद पाता है।
श्लोक 28 (3.83.28)
उष्य द्वादशरात्रं तु पूतात्मा च भवेन्नरः ॥
uṣya dvādaśarātraṃ tu pūtātmā ca bhavennaraḥ
बारह रात वहाँ रहने से मनुष्य का अन्तःकरण पवित्र हो जाता है।
श्लोक 29 (3.83.29)
तत एव च गायत्र्याः स्थानं त्रैलोक्यपूजितम् । त्रिरात्रमुषितस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् । निदर्शनं च प्रत्यक्षं ब्राह्मणानां नराधिप ॥
tata eva ca gāyatryāḥ sthānaṃ trailokyapūjitam | trirātramuṣitastatra gosahasraphalaṃ labhet | nidarśanaṃ ca pratyakṣaṃ brāhmaṇānāṃ narādhipa
वहीं से त्रिलोक-पूजित गायत्री के स्थान पर जाए; वहाँ तीन रात रहने से सहस्र गोदान का फल मिलता है। हे नराधिप, वहाँ ब्राह्मणों के लिए इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी है—
श्लोक 30 (3.83.30)
गायत्रीं पठते यस्तु योनिसंकरजस्तथा । गाथा च गाथिका चापि तस्य संपद्यते नृप ॥
gāyatrīṃ paṭhate yastu yonisaṃkarajastathā | gāthā ca gāthikā cāpi tasya saṃpadyate nṛpa
हे नृप, यदि वर्णसंकर से उत्पन्न कोई व्यक्ति वहाँ गायत्री का पाठ करे, तो वह उसके मुख में साधारण गाथा या गीत बन जाती है।
श्लोक 31 (3.83.31)
अब्राह्मणस्य सावित्रीं पठतस्तु प्रणश्यति ॥
abrāhmaṇasya sāvitrīṃ paṭhatastu praṇaśyati
जो ब्राह्मण नहीं है, उसकी पढ़ी हुई सावित्री वहाँ नष्ट हो जाती है।
श्लोक 32 (3.83.32)
संवर्तस्य तु विप्रर्षेर्वापीमासाद्य दुर्लभाम् । रूपस्य भागी भवति सुभगश्च प्रजायते ॥
saṃvartasya tu viprarṣervāpīmāsādya durlabhām | rūpasya bhāgī bhavati subhagaśca prajāyate
ब्रह्मर्षि संवर्त की दुर्लभ बावड़ी पर पहुँचकर मनुष्य रूपवान होता है और सौभाग्यशाली होकर जन्म लेता है।
श्लोक 33 (3.83.33)
ततो वेणां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । मयूरहंससंयुक्तं विमानं लभते नरः ॥
tato veṇāṃ samāsādya trirātropoṣito naraḥ | mayūrahaṃsasaṃyuktaṃ vimānaṃ labhate naraḥ
फिर वेणा नदी पर पहुँचकर तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य मोरों और हंसों से जुता विमान प्राप्त करता है।
श्लोक 34 (3.83.34)
ततो गोदावरीं प्राप्य नित्यं सिद्धनिषेविताम् । गवां मेधमवाप्नोति वासुकेर्लोकमुत्तमम् ॥
tato godāvarīṃ prāpya nityaṃ siddhaniṣevitām | gavāṃ medhamavāpnoti vāsukerlokamuttamam
फिर सिद्धों से सदा सेवित गोदावरी पर पहुँचकर मनुष्य गोमेध का फल और वासुकि का उत्तम लोक पाता है।
श्लोक 35 (3.83.35)
वेणायाः संगमे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् । वरदासंगमे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥
veṇāyāḥ saṃgame snātvā vājimedhaphalaṃ labhet | varadāsaṃgame snātvā gosahasraphalaṃ labhet
वेणा के संगम में स्नान करने से अश्वमेध का फल मिलता है; वरदा के संगम में स्नान करने से सहस्र गोदान का फल।
श्लोक 36 (3.83.36)
ब्रह्मस्थानं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । गोसहस्रफलं विन्द्यात्स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
brahmasthānaṃ samāsādya trirātropoṣito naraḥ | gosahasraphalaṃ vindyātsvargalokaṃ ca gacchati
ब्रह्मस्थान में पहुँचकर तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है और स्वर्गलोक को जाता है।
श्लोक 37 (3.83.37)
कुशप्लवनमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । त्रिरात्रमुषितः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् ॥
kuśaplavanamāsādya brahmacārī samāhitaḥ | trirātramuṣitaḥ snātvā aśvamedhaphalaṃ labhet
कुशप्लवन में पहुँचकर ब्रह्मचारी और एकाग्र रहते हुए तीन रात निवास कर स्नान करने से अश्वमेध का फल मिलता है।
श्लोक 38 (3.83.38)
ततो देवह्रदेऽरण्ये कृष्णवेणाजलोद्भवे । जातिस्मरह्रदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः । यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः ॥
tato devahrade'raṇye kṛṣṇaveṇājalodbhave | jātismarahrade snātvā bhavejjātismaro naraḥ | yatra kratuśatairiṣṭvā devarājo divaṃ gataḥ
फिर कृष्णवेणा के जल से उत्पन्न वन में स्थित देवह्रद पर, जातिस्मर सरोवर में स्नान करने से मनुष्य को पूर्वजन्मों का स्मरण हो जाता है। वहीं सौ यज्ञ करके देवराज इन्द्र स्वर्ग गए थे।
श्लोक 39 (3.83.39)
अग्निष्टोमफलं विन्द्याद्गमनादेव भारत । ततः सर्वह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥
agniṣṭomaphalaṃ vindyādgamanādeva bhārata | tataḥ sarvahrade snātvā gosahasraphalaṃ labhet
हे भारत, वहाँ जाने मात्र से अग्निष्टोम का फल मिलता है। फिर सर्वह्रद में स्नान करने से सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्लोक 40 (3.83.40)
ततो वापीं महापुण्यां पयोष्णीं सरितां वराम् । पितृदेवार्चनरतो गोसहस्रफलं लभेत् ॥
tato vāpīṃ mahāpuṇyāṃ payoṣṇīṃ saritāṃ varām | pitṛdevārcanarato gosahasraphalaṃ labhet
फिर नदियों में श्रेष्ठ, अत्यन्त पवित्र पयोष्णी के जलाशय पर पितरों और देवताओं की पूजा में लगा मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।
श्लोक 41 (3.83.41)
दण्डकारण्यमासाद्य पुण्यं राजन्नुपस्पृशेत् । गोसहस्रफलं तस्य स्नातमात्रस्य भारत ॥
daṇḍakāraṇyamāsādya puṇyaṃ rājannupaspṛśet | gosahasraphalaṃ tasya snātamātrasya bhārata
हे राजन्, पवित्र दण्डकारण्य में पहुँचकर स्नान करे; हे भारत, वहाँ स्नान करते ही उसे सहस्र गोदान का फल मिल जाता है।
श्लोक 42 (3.83.42)
शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः । न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः ॥
śarabhaṅgāśramaṃ gatvā śukasya ca mahātmanaḥ | na durgatimavāpnoti punāti ca kulaṃ naraḥ
शरभंग और महात्मा शुक के आश्रम में जाकर मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता और अपने कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 43 (3.83.43)
ततः शूर्पारकं गच्छेज्जामदग्न्यनिषेवितम् । रामतीर्थे नरः स्नात्वा विन्द्याद्बहु सुवर्णकम् ॥
tataḥ śūrpārakaṃ gacchejjāmadagnyaniṣevitam | rāmatīrthe naraḥ snātvā vindyādbahu suvarṇakam
फिर जमदग्नि-पुत्र से सेवित शूर्पारक में जाए; वहाँ रामतीर्थ में स्नान करके मनुष्य बहुत-सा सुवर्ण पाता है।
श्लोक 44 (3.83.44)
सप्तगोदावरे स्नात्वा नियतो नियताशनः । महत्पुण्यमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥
saptagodāvare snātvā niyato niyatāśanaḥ | mahatpuṇyamavāpnoti devalokaṃ ca gacchati
सप्तगोदावर में संयमी और मिताहारी होकर स्नान करने से महान पुण्य मिलता है और मनुष्य देवलोक को जाता है।
श्लोक 45 (3.83.45)
ततो देवपथं गत्वा नियतो नियताशनः । देवसत्रस्य यत्पुण्यं तदेवाप्नोति मानवः ॥
tato devapathaṃ gatvā niyato niyatāśanaḥ | devasatrasya yatpuṇyaṃ tadevāpnoti mānavaḥ
फिर संयमी और मिताहारी होकर देवपथ में जाने वाला मनुष्य देवताओं के सत्र-यज्ञ का पुण्य पाता है।
श्लोक 46 (3.83.46)
तुङ्गकारण्यमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । वेदानध्यापयत्तत्र ऋषिः सारस्वतः पुरा ॥
tuṅgakāraṇyamāsādya brahmacārī jitendriyaḥ | vedānadhyāpayattatra ṛṣiḥ sārasvataḥ purā
ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय होकर तुंगक वन में पहुँचे। वहाँ प्राचीन काल में सारस्वत ऋषि ने वेदों का अध्यापन किया था।
श्लोक 47 (3.83.47)
तत्र वेदेषु नष्टेषु मुनेरङ्गिरसः सुतः । ऋषीणामुत्तरीयेषु सूपविष्टो यथासुखम् ॥
tatra vedeṣu naṣṭeṣu muneraṅgirasaḥ sutaḥ | ṛṣīṇāmuttarīyeṣu sūpaviṣṭo yathāsukham
वहाँ जब वेद लुप्त हो गए थे, तब मुनि अंगिरा के पुत्र ऋषियों के उत्तरीय वस्त्रों पर सुखपूर्वक बैठकर,
श्लोक 48 (3.83.48)
ओंकारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह । येन यत्पूर्वमभ्यस्तं तत्सर्वं समुपस्थितम् ॥
oṃkāreṇa yathānyāyaṃ samyaguccāritena ha | yena yatpūrvamabhyastaṃ tatsarvaṃ samupasthitam
विधिपूर्वक भली-भाँति ओंकार का उच्चारण करने लगे; उससे जिसने जो कुछ पहले पढ़ा था, वह सब उसे फिर उपस्थित हो गया।
श्लोक 49 (3.83.49)
ऋषयस्तत्र देवाश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः । हरिर्नारायणस्तत्र महादेवस्तथैव च ॥
ṛṣayastatra devāśca varuṇo'gniḥ prajāpatiḥ | harirnārāyaṇastatra mahādevastathaiva ca
वहाँ ऋषि और देवता, वरुण, अग्नि, प्रजापति, हरि नारायण और महादेव भी उपस्थित थे।
श्लोक 50 (3.83.50)
पितामहश्च भगवान्देवैः सह महाद्युतिः । भृगुं नियोजयामास याजनार्थे महाद्युतिम् ॥
pitāmahaśca bhagavāndevaiḥ saha mahādyutiḥ | bhṛguṃ niyojayāmāsa yājanārthe mahādyutim
और तेजस्वी भगवान पितामह ब्रह्मा ने देवताओं के साथ महातेजस्वी भृगु को यज्ञ कराने के लिए नियुक्त किया।
श्लोक 51 (3.83.51)
ततः स चक्रे भगवानृषीणां विधिवत्तदा । सर्वेषां पुनराधानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
tataḥ sa cakre bhagavānṛṣīṇāṃ vidhivattadā | sarveṣāṃ punarādhānaṃ vidhidṛṣṭena karmaṇā
तब भगवान भृगु ने शास्त्र-विहित कर्म से सब ऋषियों के लिए विधिपूर्वक अग्नियों का पुनः आधान किया।
श्लोक 52 (3.83.52)
आज्यभागेन तत्राग्नीं तर्पयित्वा यथाविधि । देवाः स्वभवनं याता ऋषयश्च यथाक्रमम् ॥
ājyabhāgena tatrāgnīṃ tarpayitvā yathāvidhi | devāḥ svabhavanaṃ yātā ṛṣayaśca yathākramam
वहाँ विधिपूर्वक घी की आहुति से अग्नियों को तृप्त करके देवता अपने-अपने लोकों को चले गए, और ऋषि भी क्रम से चले गए।
श्लोक 53 (3.83.53)
तदरण्यं प्रविष्टस्य तुङ्गकं राजसत्तम । पापं प्रणश्यत्यखिलं स्त्रिया वा पुरुषस्य वा ॥
tadaraṇyaṃ praviṣṭasya tuṅgakaṃ rājasattama | pāpaṃ praṇaśyatyakhilaṃ striyā vā puruṣasya vā
हे राजसत्तम, उस तुंगक वन में प्रवेश करने वाले का सारा पाप नष्ट हो जाता है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।
श्लोक 54 (3.83.54)
तत्रमासं वसेद्धीरो नियतो नियताशनः । ब्रह्मलोकं व्रजेद्राजन्कुलं चैव समुद्धरेत् ॥
tatramāsaṃ vaseddhīro niyato niyatāśanaḥ | brahmalokaṃ vrajedrājankulaṃ caiva samuddharet
धीर पुरुष संयमी और मिताहारी होकर वहाँ एक मास रहे; हे राजन्, वह ब्रह्मलोक को जाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 55 (3.83.55)
मेधाविकं समासाद्य पितॄन्देवांश्च तर्पयेत् । अग्निष्टोममवाप्नोति स्मृतिं मेधां च विन्दति ॥
medhāvikaṃ samāsādya pitṝndevāṃśca tarpayet | agniṣṭomamavāpnoti smṛtiṃ medhāṃ ca vindati
मेधाविक तीर्थ में पहुँचकर पितरों और देवताओं का तर्पण करे; वह अग्निष्टोम का फल और स्मृति तथा मेधा प्राप्त करता है।
श्लोक 56 (3.83.56)
अत्र कालञ्जरं गत्वा पर्वतं लोकविश्रुतम् । तत्र देवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥
atra kālañjaraṃ gatvā parvataṃ lokaviśrutam | tatra devahrade snātvā gosahasraphalaṃ labhet
यहाँ लोकप्रसिद्ध कालंजर पर्वत पर जाकर वहाँ के देवह्रद में स्नान करने से सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्लोक 57 (3.83.57)
आत्मानं स्नापयेत्तत्रगिरौ कालञ्जरे नृप । स्वर्गलोके महीयेत नरो नास्त्यत्र संशयः ॥
ātmānaṃ snāpayettatragirau kālañjare nṛpa | svargaloke mahīyeta naro nāstyatra saṃśayaḥ
हे नृप, कालंजर पर्वत पर वहाँ स्नान करे; ऐसा मनुष्य स्वर्गलोक में सम्मानित होता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 58 (3.83.58)
ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूटे विशांपते । मन्दाकिनीं समासाद्य सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥
tato girivaraśreṣṭhe citrakūṭe viśāṃpate | mandākinīṃ samāsādya sarvapāpapraṇāśinīm
हे प्रजानाथ, फिर पर्वतों में श्रेष्ठ चित्रकूट पर सब पापों का नाश करने वाली मन्दाकिनी के पास पहुँचकर,
श्लोक 59 (3.83.59)
तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः । अश्वमेधमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् ॥
tatrābhiṣekaṃ kurvāṇaḥ pitṛdevārcane rataḥ | aśvamedhamavāpnoti gatiṃ ca paramāṃ vrajet
वहाँ स्नान करके पितरों और देवताओं की पूजा में लगा मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 60 (3.83.60)
ततो गच्छेत धर्मज्ञ भर्तृस्थानमनुत्तमम् । यत्र नित्यं महासेनो गुहः सन्निहितो नृप ॥
tato gaccheta dharmajña bhartṛsthānamanuttamam | yatra nityaṃ mahāseno guhaḥ sannihito nṛpa
हे धर्मज्ञ, फिर अनुपम भर्तृस्थान में जाए, हे नृप, जहाँ महासेन गुह (स्कन्द) सदा विराजमान रहते हैं।
श्लोक 61 (3.83.61)
तत्र गत्वा नृपश्रेष्ठ गमनादेव सिध्यति । कोटितीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥
tatra gatvā nṛpaśreṣṭha gamanādeva sidhyati | koṭitīrthe naraḥ snātvā gosahasraphalaṃ labhet
हे नृपश्रेष्ठ, वहाँ जाने मात्र से सिद्धि मिल जाती है। कोटितीर्थ में स्नान करने से मनुष्य सहस्र गोदान का फल पाता है।
श्लोक 62 (3.83.62)
प्रदक्षिणमुपावृत्य ज्येष्ठस्थानं व्रजेन्नरः । अभिगम्य महादेवं विराजति यथा शशी ॥
pradakṣiṇamupāvṛtya jyeṣṭhasthānaṃ vrajennaraḥ | abhigamya mahādevaṃ virājati yathā śaśī
उसकी प्रदक्षिणा करके मनुष्य ज्येष्ठस्थान को जाए; वहाँ महादेव के दर्शन करके वह चन्द्रमा के समान शोभा पाता है।
श्लोक 63 (3.83.63)
तत्र कूपे महाराज विश्रुता भरतर्षभ । समुद्रास्तत्र चत्वारो निवसन्ति युधिष्ठिर ॥
tatra kūpe mahārāja viśrutā bharatarṣabha | samudrāstatra catvāro nivasanti yudhiṣṭhira
हे महाराज, हे भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर, वहाँ एक कूप में चारों प्रसिद्ध समुद्र निवास करते हैं।
श्लोक 64 (3.83.64)
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र पितृदेवार्चने रतः । नियतात्मा नरः पूतो गच्छेत परमां गतिम् ॥
tatropaspṛśya rājendra pitṛdevārcane rataḥ | niyatātmā naraḥ pūto gaccheta paramāṃ gatim
हे राजेन्द्र, वहाँ स्नान करके पितरों और देवताओं की पूजा में लगा संयतात्मा मनुष्य पवित्र होकर परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 65 (3.83.65)
ततो गच्छेत राजेन्द्र शृङ्गबेरपुरं महत् । यत्रतीर्णो महाराज रामो दाशरथिः पुरा ॥
tato gaccheta rājendra śṛṅgaberapuraṃ mahat | yatratīrṇo mahārāja rāmo dāśarathiḥ purā
हे राजेन्द्र, फिर महान नगर शृंगबेरपुर को जाए, हे महाराज, जहाँ प्राचीन काल में दशरथनन्दन राम ने (गंगा) पार की थी।
श्लोक 66 (3.83.66)
तस्मिंस्तीर्थे महाबाहो स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते । गङ्गायां तु नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥
tasmiṃstīrthe mahābāho snātvā pāpaiḥ pramucyate | gaṅgāyāṃ tu naraḥ snātvā brahmacārī samāhitaḥ
हे महाबाहो, उस तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य पापों से छूट जाता है। जो मनुष्य ब्रह्मचारी और एकाग्र होकर गंगा में स्नान करता है,
श्लोक 67 (3.83.67)
विधूतपाप्मा भवति वाजपेयं च विन्दति । ततो मुञ्जवटं गच्छेत्स्थानं देवस्य धीमतः ॥
vidhūtapāpmā bhavati vājapeyaṃ ca vindati | tato muñjavaṭaṃ gacchetsthānaṃ devasya dhīmataḥ
वह निष्पाप हो जाता है और वाजपेय का फल पाता है। फिर बुद्धिमान देव (शिव) के स्थान मुंजवट को जाए।
श्लोक 68 (3.83.68)
अभिगम्य महादेवमभिवाद्य च भारत । प्रदक्षिणमुपावृत्य गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥
abhigamya mahādevamabhivādya ca bhārata | pradakṣiṇamupāvṛtya gāṇapatyamavāpnuyāt
हे भारत, महादेव के पास जाकर उन्हें प्रणाम करे और प्रदक्षिणा करे, तो गणपति का पद प्राप्त होता है।
श्लोक 69 (3.83.69)
तस्मिंस्तीर्थे तु जाह्नव्यां स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते । ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागमृषिसंस्तुतम् ॥
tasmiṃstīrthe tu jāhnavyāṃ snātvā pāpaiḥ pramucyate | tato gaccheta rājendra prayāgamṛṣisaṃstutam
उस तीर्थ में जाह्नवी में स्नान करने से मनुष्य पापों से छूट जाता है। हे राजेन्द्र, फिर ऋषियों से प्रशंसित प्रयाग को जाए,
श्लोक 70 (3.83.70)
यत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः । लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसंमताः ॥
yatra brahmādayo devā diśaśca sadigīśvarāḥ | lokapālāśca sādhyāśca pitaro lokasaṃmatāḥ
जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिशाएँ और दिक्पाल, लोकपाल, साध्यगण और लोकों से सम्मानित पितर,
श्लोक 71 (3.83.71)
सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः । अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥
sanatkumārapramukhāstathaiva paramarṣayaḥ | aṅgiraḥpramukhāścaiva tathā brahmarṣayo'malāḥ
सनत्कुमार आदि परमर्षि, तथा अंगिरा आदि निर्मल ब्रह्मर्षि,
श्लोक 72 (3.83.72)
तथा नागाः सुपर्णश्च सिद्धाश्चक्रचरास्तथा । सरितः सागराश्चैव गन्धर्वाप्सरसोऽपि च ॥
tathā nāgāḥ suparṇaśca siddhāścakracarāstathā | saritaḥ sāgarāścaiva gandharvāpsaraso'pi ca
नाग, सुपर्ण (गरुड), सिद्ध, चक्रचर (सूर्य आदि), नदियाँ, समुद्र, गन्धर्व और अप्सराएँ,
श्लोक 73 (3.83.73)
हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः । तत्र त्रीण्यग्निकुण्डानि येषां मध्येन जाह्नवी ॥
hariśca bhagavānāste prajāpatipuraskṛtaḥ | tatra trīṇyagnikuṇḍāni yeṣāṃ madhyena jāhnavī
और प्रजापति को आगे रखकर भगवान हरि निवास करते हैं। वहाँ तीन अग्निकुण्ड हैं, जिनके बीच से जाह्नवी बहती है,
श्लोक 74 (3.83.74)
प्रयागादभिनिष्क्रान्ता सर्वतीर्थपुरस्कृता । तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥
prayāgādabhiniṣkrāntā sarvatīrthapuraskṛtā | tapanasya sutā devī triṣu lokeṣu viśrutā
जो सब तीर्थों से सम्मानित होकर प्रयाग से निकलती है। और सूर्य की पुत्री, तीनों लोकों में प्रसिद्ध देवी,
श्लोक 75 (3.83.75)
यमुना गङ्गया सार्धं संगता लोकपावनी । गङ्गायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् ॥
yamunā gaṅgayā sārdhaṃ saṃgatā lokapāvanī | gaṅgāyamunayormadhyaṃ pṛthivyā jaghanaṃ smṛtam
लोकों को पवित्र करने वाली यमुना वहाँ गंगा से मिलती है। गंगा और यमुना के बीच का भाग पृथ्वी का जघन (कटि-प्रदेश) कहा गया है,
श्लोक 76 (3.83.76)
प्रयागं जघनस्थानमुपस्थमृषयो विदुः । प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरौ तथा ॥
prayāgaṃ jaghanasthānamupasthamṛṣayo viduḥ | prayāgaṃ sapratiṣṭhānaṃ kambalāśvatarau tathā
और ऋषि प्रयाग को उस जघन-स्थान का उपस्थ (गोद) मानते हैं। प्रतिष्ठान सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर,
श्लोक 77 (3.83.77)
तीर्थं भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापतेः । तत्रवेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर ॥
tīrthaṃ bhogavatī caiva vedireṣā prajāpateḥ | tatravedāśca yajñāśca mūrtimanto yudhiṣṭhira
तथा भोगवती तीर्थ—यह प्रजापति की वेदी है। हे युधिष्ठिर, वहाँ वेद और यज्ञ मूर्तिमान होकर
श्लोक 78 (3.83.78)
प्रजापतिमुपासन्ते ऋषयश्च तपोधनाः । यजन्ते क्रतुभिर्देवास्तथा चक्रधरा नृपाः ॥
prajāpatimupāsante ṛṣayaśca tapodhanāḥ | yajante kratubhirdevāstathā cakradharā nṛpāḥ
तथा तपोधन ऋषि प्रजापति की उपासना करते हैं; वहाँ देवता और चक्रवर्ती राजा यज्ञों द्वारा यजन करते हैं।
श्लोक 79 (3.83.79)
ततः पुण्यतमं नाम त्रिषु लोकेषु भारत । प्रयागं सर्वतीर्थेभ्यः प्रवदन्त्यधिकं विभो ॥
tataḥ puṇyatamaṃ nāma triṣu lokeṣu bhārata | prayāgaṃ sarvatīrthebhyaḥ pravadantyadhikaṃ vibho
इसलिए, हे भारत, हे प्रभो, प्रयाग को तीनों लोकों में सबसे पवित्र और सब तीर्थों से बढ़कर बताया जाता है।
श्लोक 80 (3.83.80)
श्रवणात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि । मृत्युकालभयाच्चापि नरः पापात्प्रमुच्यते ॥
śravaṇāttasya tīrthasya nāmasaṃkīrtanādapi | mṛtyukālabhayāccāpi naraḥ pāpātpramucyate
उस तीर्थ का श्रवण करने से, उसके नाम का कीर्तन करने से, और मृत्यु के समय भय में भी उसका स्मरण करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 81 (3.83.81)
तत्राभिषेकं यः कुर्यात्संगमे लोकविश्रुते । पुण्यं स फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥
tatrābhiṣekaṃ yaḥ kuryātsaṃgame lokaviśrute | puṇyaṃ sa phalamāpnoti rājasūyāśvamedhayoḥ
जो वहाँ लोकप्रसिद्ध संगम में स्नान करता है, वह राजसूय और अश्वमेध का पवित्र फल पाता है।
श्लोक 82 (3.83.82)
एषा यजनभूमिर्हि देवानामभिसंस्कृता । तत्र दत्तं सूक्ष्ममपि महद्भवति भारत ॥
eṣā yajanabhūmirhi devānāmabhisaṃskṛtā | tatra dattaṃ sūkṣmamapi mahadbhavati bhārata
यह देवताओं की संस्कारित यज्ञभूमि है; हे भारत, वहाँ थोड़ा-सा दान भी महान हो जाता है।
श्लोक 83 (3.83.83)
न वेदवचनात्तात न लोकवचनादपि । मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमरणं प्रति ॥
na vedavacanāttāta na lokavacanādapi | matirutkramaṇīyā te prayāgamaraṇaṃ prati
हे तात, न वेद के वचन से और न लोगों के कहने से तुम्हारी बुद्धि प्रयाग में मरने के संकल्प से हटनी चाहिए।
श्लोक 84 (3.83.84)
दशतीर्थसहस्राणि षष्टिः कोट्यस्तथाऽपराः । येषां सान्निध्यमत्रैव कीर्तितं कुरुनन्दन ॥
daśatīrthasahasrāṇi ṣaṣṭiḥ koṭyastathā'parāḥ | yeṣāṃ sānnidhyamatraiva kīrtitaṃ kurunandana
हे कुरुनन्दन, दस हजार तीर्थ और साठ करोड़ अन्य तीर्थ यहीं उपस्थित बताए गए हैं।
श्लोक 85 (3.83.85)
चतुर्विद्ये च यत्पुण्यं सत्यवादिषु चैव यत् । स्नात एव तदाप्नोति गङ्गायमुनसंगमे ॥
caturvidye ca yatpuṇyaṃ satyavādiṣu caiva yat | snāta eva tadāpnoti gaṅgāyamunasaṃgame
चारों वेदों के ज्ञाता में जो पुण्य है और सत्यवादियों में जो पुण्य है, वह गंगा-यमुना के संगम में स्नान करते ही मिल जाता है।
श्लोक 86 (3.83.86)
तत्र भोगवती नाम वासुकेस्तीर्थमुत्तमम् । तत्राभिषेकं यः कुर्यात्सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
tatra bhogavatī nāma vāsukestīrthamuttamam | tatrābhiṣekaṃ yaḥ kuryātso'śvamedhaphalaṃ labhet
वहाँ वासुकि का भोगवती नामक उत्तम तीर्थ है; जो वहाँ स्नान करता है, वह अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 87 (3.83.87)
तत्र हंसप्रपतनं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । दशाश्वमेधिकं चैव गङ्गायां कुरुनन्दन ॥
tatra haṃsaprapatanaṃ tīrthaṃ trailokyaviśrutam | daśāśvamedhikaṃ caiva gaṅgāyāṃ kurunandana
हे कुरुनन्दन, वहीं गंगा में त्रिलोक-प्रसिद्ध हंसप्रपतन तीर्थ और दशाश्वमेधिक तीर्थ भी हैं।
श्लोक 88 (3.83.88)
कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्रतत्रावगाहिता । विशेषो वै कनखले प्रयागे परमं महत् ॥
kurukṣetrasamā gaṅgā yatratatrāvagāhitā | viśeṣo vai kanakhale prayāge paramaṃ mahat
गंगा में जहाँ कहीं भी स्नान किया जाए, वह कुरुक्षेत्र के समान है; पर कनखल में उसकी विशेषता है और प्रयाग में वह परम महान है।
श्लोक 89 (3.83.89)
यद्यकार्यशतं कृत्वा कृतंगङ्गावसेचनम् । सर्वं तत्तस्य गङ्गापो दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥
yadyakāryaśataṃ kṛtvā kṛtaṃgaṅgāvasecanam | sarvaṃ tattasya gaṅgāpo dahatyagnirivendhanam
सौ बुरे कर्म करके भी यदि किसी ने गंगा में स्नान कर लिया, तो गंगा का जल उसके सब पापों को वैसे ही जला देता है जैसे अग्नि ईंधन को।
श्लोक 90 (3.83.90)
सर्वं कृतयुगे पुण्यंत्रेतायां पुष्करं स्मृतम् । द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गङ्गा कलियुगे स्मृता ॥
sarvaṃ kṛtayuge puṇyaṃtretāyāṃ puṣkaraṃ smṛtam | dvāpare'pi kurukṣetraṃ gaṅgā kaliyuge smṛtā
सत्ययुग में सब स्थान पवित्र होते हैं, त्रेता में पुष्कर, द्वापर में कुरुक्षेत्र और कलियुग में गंगा को पवित्र माना गया है।
श्लोक 91 (3.83.91)
पुष्करे तु तपस्तप्येद्दानं दद्यान्महालये । मलये त्वग्निमारोहेद्भृगुतुङ्गे त्वनाशनम् ॥
puṣkare tu tapastapyeddānaṃ dadyānmahālaye | malaye tvagnimārohedbhṛgutuṅge tvanāśanam
पुष्कर में तप करे, महालय में दान दे, मलय पर्वत पर अग्नि में प्रवेश करे और भृगुतुंग में अनशन करे।
श्लोक 92 (3.83.92)
पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गङ्गायां मगधेषु च । स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्तसप्तावरांस्तथा ॥
puṣkare tu kurukṣetre gaṅgāyāṃ magadheṣu ca | snātvā tārayate jantuḥ saptasaptāvarāṃstathā
पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा और मगध में स्नान करके प्राणी अपनी सात पहले की और सात बाद की पीढ़ियों को तार देता है।
श्लोक 93 (3.83.93)
पुनाति कीर्तिता पापं दृष्टा भद्रं प्रयच्छति । अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥
punāti kīrtitā pāpaṃ dṛṣṭā bhadraṃ prayacchati | avagāḍhā ca pītā ca punātyāsaptamaṃ kulam
नाम लेने पर गंगा पाप धो देती है, दर्शन करने पर कल्याण देती है, और स्नान तथा पान करने पर सात पीढ़ियों तक के कुल को पवित्र करती है।
श्लोक 94 (3.83.94)
यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गायाः स्पृशते जलम् । तावत्स पुरुषो राजन्स्वर्गलोके महीयते ॥
yāvadasthi manuṣyasya gaṅgāyāḥ spṛśate jalam | tāvatsa puruṣo rājansvargaloke mahīyate
हे राजन्, जब तक मनुष्य की अस्थि गंगा के जल का स्पर्श करती है, तब तक वह पुरुष स्वर्गलोक में सम्मानित रहता है।
श्लोक 95 (3.83.95)
यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवत्यमरलोकभाक् ॥
yathā puṇyāni tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca | upāsya puṇyaṃ labdhvā ca bhavatyamaralokabhāk
पवित्र तीर्थों और पवित्र देवस्थानों की विधिपूर्वक उपासना करके और पुण्य पाकर मनुष्य अमरलोक का भागी होता है।
श्लोक 96 (3.83.96)
न गङ्गासदृशं तीर्थं न देवः केशवात्परः । ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः ॥
na gaṅgāsadṛśaṃ tīrthaṃ na devaḥ keśavātparaḥ | brāhmaṇebhyaḥ paraṃ nāsti evamāha pitāmahaḥ
गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव से बढ़कर कोई देवता नहीं, और ब्राह्मणों से बढ़कर कुछ नहीं—ऐसा पितामह ब्रह्मा ने कहा है।
श्लोक 97 (3.83.97)
यत्र गङ्गा महाराज स देशस्तत्तपोवनम् । सिद्धिक्षेत्रं च तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ॥
yatra gaṅgā mahārāja sa deśastattapovanam | siddhikṣetraṃ ca tajjñeyaṃ gaṅgātīrasamāśritam
हे महाराज, जहाँ गंगा है, वह देश तपोवन है; गंगा-तट पर बसे प्रदेश को सिद्धिक्षेत्र जानना चाहिए।
श्लोक 98 (3.83.98)
इदं सत्यंद्विजातीनां साधूनामात्मनोपि च । सुहृदां च जपेत्कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ॥
idaṃ satyaṃdvijātīnāṃ sādhūnāmātmanopi ca | suhṛdāṃ ca japetkarṇe śiṣyasyānugatasya ca
यह सत्य द्विजों, सज्जनों, अपने आप को, मित्रों और अनुगत शिष्य को कान में सुनाना चाहिए।
श्लोक 99 (3.83.99)
इदं धन्यमिदं मेध्यमिदं स्वर्ग्यमिदं सुखम् । इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् ॥
idaṃ dhanyamidaṃ medhyamidaṃ svargyamidaṃ sukham | idaṃ puṇyamidaṃ ramyaṃ pāvanaṃ dharmyamuttamam
यह धन्य है, यह पवित्र है, यह स्वर्ग देने वाला है, यह सुखदायक है; यह पुण्यमय, रमणीय, पावन, धर्मयुक्त और उत्तम है।
श्लोक 100 (3.83.100)
महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् । अधीत्यद्विजमध्ये च निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥
maharṣīṇāmidaṃ guhyaṃ sarvapāpapramocanam | adhītyadvijamadhye ca nirmalaḥ svargamāpnuyāt
यह महर्षियों का रहस्य है, जो सब पापों से छुड़ाता है; द्विजों के बीच इसका पाठ करके मनुष्य निर्मल होकर स्वर्ग पाता है।
श्लोक 101 (3.83.101)
श्रीमत्स्वर्ग्यं तथा पुण्यं सपत्नशमनं शिवम् । मेधाजननमग्र्यं वै तीर्थवंशानुकीर्तनम् ॥
śrīmatsvargyaṃ tathā puṇyaṃ sapatnaśamanaṃ śivam | medhājananamagryaṃ vai tīrthavaṃśānukīrtanam
तीर्थों की यह क्रमबद्ध कीर्तन-कथा शोभायुक्त, स्वर्गदायक और पवित्र है; यह शत्रुओं का शमन करने वाली, कल्याणकारी और बुद्धि बढ़ाने में श्रेष्ठ है।
श्लोक 102 (3.83.102)
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात् । शूद्रो यथेप्सितान्कामान्ब्राह्मणः पारगः पठन् । महीं विजयते राजा वैश्यो धनमवाप्नुयात् ॥
aputro labhate putramadhano dhanamāpnuyāt | śūdro yathepsitānkāmānbrāhmaṇaḥ pāragaḥ paṭhan | mahīṃ vijayate rājā vaiśyo dhanamavāpnuyāt
इसके पाठ से पुत्रहीन को पुत्र और निर्धन को धन मिलता है; शूद्र को मनचाही वस्तुएँ मिलती हैं, ब्राह्मण विद्या में पारंगत होता है, राजा पृथ्वी को जीतता है और वैश्य धन पाता है।
श्लोक 103 (3.83.103)
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थपुण्यं नरः शुचिः । जातीः स स्मरते बह्वीर्नाकपृष्ठे च मोदते ॥
yaścedaṃ śṛṇuyānnityaṃ tīrthapuṇyaṃ naraḥ śuciḥ | jātīḥ sa smarate bahvīrnākapṛṣṭhe ca modate
जो पवित्र मनुष्य तीर्थों के पुण्य की यह कथा नित्य सुनता है, उसे अनेक जन्मों का स्मरण होता है और वह स्वर्ग में आनन्द करता है।
श्लोक 104 (3.83.104)
गम्यान्यपि च तीर्थानि कीर्तितान्यगमानि च । मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षया ॥
gamyānyapi ca tīrthāni kīrtitānyagamāni ca | manasā tāni gaccheta sarvatīrthasamīkṣayā
यहाँ जिन तीर्थों का वर्णन हुआ है, उनमें से जो जाने योग्य हैं और जो दुर्गम हैं, उन सबकी दर्शन-इच्छा से मन के द्वारा यात्रा करे।
श्लोक 105 (3.83.105)
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः । ऋषिभिर्देवकल्पैश्च स्नातानि सुकृतैषिभिः ॥
etāni vasubhiḥ sādhyairādityairmarudaśvibhiḥ | ṛṣibhirdevakalpaiśca snātāni sukṛtaiṣibhiḥ
इन तीर्थों में वसुओं, साध्यों, आदित्यों, मरुद्गणों, अश्विनीकुमारों और पुण्य चाहने वाले देवतुल्य ऋषियों ने स्नान किया है।
श्लोक 106 (3.83.106)
एवं त्वमपि कौरव्य विधिनाऽनेन सुव्रत । व्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्धयन् ॥
evaṃ tvamapi kauravya vidhinā'nena suvrata | vraja tīrthāni niyataḥ puṇyaṃ puṇyena vardhayan
हे उत्तम व्रत वाले कौरव्य, इसी प्रकार तुम भी इस विधि से संयमपूर्वक तीर्थों की यात्रा करो और पुण्य से पुण्य बढ़ाओ।
श्लोक 107 (3.83.107)
भावितैः करणैः पूर्वमास्तिक्याच्छ्रुतिदर्शनात् । प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शास्त्रार्थदर्शिभिः । सद्भिः शास्त्रार्थतत्वज्ञैर्ब्राह्मणैः सह गम्यताम् ॥
bhāvitaiḥ karaṇaiḥ pūrvamāstikyācchrutidarśanāt | prāpyante tāni tīrthāni sadbhiḥ śāstrārthadarśibhiḥ | sadbhiḥ śāstrārthatatvajñairbrāhmaṇaiḥ saha gamyatām
पहले से संयमित इन्द्रियों के साथ, आस्तिक बुद्धि और श्रुति-ज्ञान के द्वारा शास्त्रों का अर्थ जानने वाले सत्पुरुष इन तीर्थों तक पहुँचते हैं। शास्त्रों के तत्त्व को जानने वाले सज्जन ब्राह्मणों के साथ इनकी यात्रा करनी चाहिए।
श्लोक 108 (3.83.108)
नाव्रती नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः । स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः ॥
nāvratī nākṛtātmā ca nāśucirna ca taskaraḥ | snāti tīrtheṣu kauravya na ca vakramatirnaraḥ
हे कौरव्य, जो व्रतहीन है, जिसका मन वश में नहीं, जो अपवित्र है, जो चोर है और जिसकी बुद्धि कुटिल है, वह तीर्थों में (वास्तव में) स्नान नहीं करता।
श्लोक 109 (3.83.109)
त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना । पितरस्तात सर्वे च तारिताः प्रपितामहाः ॥
tvayā tu samyagvṛttena nityaṃ dharmārthadarśinā | pitarastāta sarve ca tāritāḥ prapitāmahāḥ
परन्तु हे तात, तुम्हारे सदाचार और धर्म-अर्थ पर सदा दृष्टि रखने के कारण तुम्हारे पितर और सब प्रपितामह तर गए हैं,
श्लोक 110 (3.83.110)
पिता पितामहश्चैव सर्वे च प्रपितामहाः । पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणा नृप । तव धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः ॥
pitā pitāmahaścaiva sarve ca prapitāmahāḥ | pitāmahapurogāśca devāḥ sarṣigaṇā nṛpa | tava dharmeṇa dharmajña nityamevābhitoṣitāḥ
तुम्हारे पिता, पितामह और सब प्रपितामह; और हे धर्मज्ञ नरेश, पितामह ब्रह्मा आदि देवता ऋषिगणों सहित तुम्हारे धर्म से सदा प्रसन्न रहे हैं।
श्लोक 111 (3.83.111)
अवाप्स्यसि त्वं लोकान्वै वसूनां वासवोपम । कीर्तिं च महतीं भीष्म प्राप्स्यसे भुविशाश्वतीम् ॥
avāpsyasi tvaṃ lokānvai vasūnāṃ vāsavopama | kīrtiṃ ca mahatīṃ bhīṣma prāpsyase bhuviśāśvatīm
हे इन्द्र के समान भीष्म, तुम वसुओं के लोक प्राप्त करोगे और पृथ्वी पर महान, अक्षय कीर्ति पाओगे।
नारद उवाच
श्लोक 112 (3.83.112)
एवमुक्त्वाऽभ्यनुज्ञाय पुलस्त्यो भगवानृषिः । प्रीतः प्रीतेन मनसा तत्रैवान्तरधीयत ॥
evamuktvā'bhyanujñāya pulastyo bhagavānṛṣiḥ | prītaḥ prītena manasā tatraivāntaradhīyata
ऐसा कहकर और विदा लेकर भगवान पुलस्त्य ऋषि प्रसन्न मन से वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 113 (3.83.113)
भीष्मश्च कुरुशार्दूल शास्त्रतत्त्वार्थदर्शिवान् । पुलस्त्यवचनाच्चैव पृथिवीं परिचक्रमे ॥
bhīṣmaśca kuruśārdūla śāstratattvārthadarśivān | pulastyavacanāccaiva pṛthivīṃ paricakrame
हे कुरुश्रेष्ठ, शास्त्रों के तत्त्व और अर्थ को जानने वाले भीष्म ने भी पुलस्त्य के कहने पर पृथ्वी की परिक्रमा की।
श्लोक 114 (3.83.114)
एवमेषा महाभागा प्रतिष्ठाने प्रतिष्ठिता । तीर्थयात्रा महापुण्या सर्वपापप्रमोचनी ॥
evameṣā mahābhāgā pratiṣṭhāne pratiṣṭhitā | tīrthayātrā mahāpuṇyā sarvapāpapramocanī
इस प्रकार यह महाभाग्यशाली, अत्यन्त पुण्यमयी और सब पापों से छुड़ाने वाली तीर्थयात्रा प्रतिष्ठान (प्रयाग) में पूर्ण होती है।
श्लोक 115 (3.83.115)
अनेन विधिना यस्तु पृथिवीं संचरिष्यति । अश्वमेधशतं साग्रं फलं प्रेत्य स भोक्ष्यति ॥
anena vidhinā yastu pṛthivīṃ saṃcariṣyati | aśvamedhaśataṃ sāgraṃ phalaṃ pretya sa bhokṣyati
जो इस विधि से पृथ्वी पर तीर्थयात्रा करेगा, वह मरने के बाद सौ से भी अधिक अश्वमेधों का फल भोगेगा।
श्लोक 116 (3.83.116)
ततश्चाष्टगुणं पार्थ प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् । भीष्मः कुरूणां प्रवरो यथा पूर्वमवाप्तवान् ॥
tataścāṣṭaguṇaṃ pārtha prāpsyase dharmamuttamam | bhīṣmaḥ kurūṇāṃ pravaro yathā pūrvamavāptavān
और हे पार्थ, तुम उस उत्तम धर्मफल को आठ गुना पाओगे, जैसे पहले कुरुश्रेष्ठ भीष्म ने पाया था,
श्लोक 117 (3.83.117)
नेता च त्वमृषीन्यस्मात्तेन तेऽष्टगुणं फलम् । रक्षोगणविकीर्णानि तीर्थान्येतानि भारत । अगम्यानि मनुष्येन्द्रैस्त्वामृते कुरुनन्दन ॥
netā ca tvamṛṣīnyasmāttena te'ṣṭaguṇaṃ phalam | rakṣogaṇavikīrṇāni tīrthānyetāni bhārata | agamyāni manuṣyendraistvāmṛte kurunandana
क्योंकि तुम ऋषियों को साथ लेकर चलोगे; इसीलिए तुम्हें आठ गुना फल मिलेगा। हे भारत, ये तीर्थ राक्षसों के समूहों से भरे हैं; हे कुरुनन्दन, तुम्हारे सिवा दूसरे राजा वहाँ नहीं पहुँच सकते।
श्लोक 118 (3.83.118)
इदं देवर्षिचरितं सर्वतीर्थाभिसंवृतम् । यः पठेच्छृणुयाद्वाऽपिसर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
idaṃ devarṣicaritaṃ sarvatīrthābhisaṃvṛtam | yaḥ paṭhecchṛṇuyādvā'pisarvapāpaiḥ pramucyate
देवर्षि के इस वृत्तान्त को, जिसमें सब तीर्थों का वर्णन है, जो पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 119 (3.83.119)
ऋषिमुख्याः सदा यत्रवाल्मीकिस्त्वथ कश्यपः । आत्रेयः कुण्डजठरो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥
ṛṣimukhyāḥ sadā yatravālmīkistvatha kaśyapaḥ | ātreyaḥ kuṇḍajaṭharo viśvāmitro'tha gautamaḥ
वहाँ प्रमुख ऋषि सदा रहते हैं—वाल्मीकि, कश्यप, आत्रेय, कुण्डजठर, विश्वामित्र और गौतम,
श्लोक 120 (3.83.120)
असितो देवलश्चैव मार्कण्डेयोऽथ गालवः । भरद्वाजो वसिष्ठश्च मुनिरुद्दालकस्तथा ॥
asito devalaścaiva mārkaṇḍeyo'tha gālavaḥ | bharadvājo vasiṣṭhaśca muniruddālakastathā
असित, देवल, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, वसिष्ठ और मुनि उद्दालक,
श्लोक 121 (3.83.121)
शौनकः सह पुत्रेण व्यासश्च तपतांवरः । दुर्वासाश्च मुनिश्रेष्ठो जाबालिश्च महातपाः ॥
śaunakaḥ saha putreṇa vyāsaśca tapatāṃvaraḥ | durvāsāśca muniśreṣṭho jābāliśca mahātapāḥ
पुत्र सहित शौनक, तपस्वियों में श्रेष्ठ व्यास, मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा और महातपस्वी जाबालि।
श्लोक 122 (3.83.122)
एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्षास्तपोधनाः । एभिः सह महाराज तीर्थान्येतान्यनुव्रज ॥
ete ṛṣivarāḥ sarve tvatpratīkṣāstapodhanāḥ | ebhiḥ saha mahārāja tīrthānyetānyanuvraja
ये सब तपोधन श्रेष्ठ ऋषि तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं; हे महाराज, इनके साथ इन तीर्थों की यात्रा करो।
श्लोक 123 (3.83.123)
एष ते लोमशो नाम महर्षिरमितद्युतिः । समेष्यति महाराज तेन सार्धमनुव्रज ॥
eṣa te lomaśo nāma maharṣiramitadyutiḥ | sameṣyati mahārāja tena sārdhamanuvraja
हे महाराज, अपार तेज वाले ये लोमश नामक महर्षि तुमसे आ मिलेंगे; उनके साथ यात्रा करो।
श्लोक 124 (3.83.124)
मयाऽपिसह धर्मज्ञ तीर्थान्येतान्यनुक्रमात् । प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं यथा राजा महाभिषक् ॥
mayā'pisaha dharmajña tīrthānyetānyanukramāt | prāpsyase mahatīṃ kīrtiṃ yathā rājā mahābhiṣak
हे धर्मज्ञ, मेरे साथ भी इन तीर्थों की क्रम से यात्रा करके तुम राजा महाभिष के समान महान कीर्ति पाओगे।
श्लोक 125 (3.83.125)
यथा ययातिर्धर्मात्मा यथा राजा पुरूरवाः । तथा त्वं कुरुशार्दूल स्वेन धर्मेण शोभसे ॥
yathā yayātirdharmātmā yathā rājā purūravāḥ | tathā tvaṃ kuruśārdūla svena dharmeṇa śobhase
हे कुरुश्रेष्ठ, जैसे धर्मात्मा ययाति और जैसे राजा पुरूरवा, वैसे ही तुम अपने धर्म से शोभा पाते हो।
श्लोक 126 (3.83.126)
यथा भगीरथो राजा यथा रामश्च विश्रुतः । तथा त्वं सर्वराजभ्यो भ्राजसे रश्मिवानिव ॥
yathā bhagīratho rājā yathā rāmaśca viśrutaḥ | tathā tvaṃ sarvarājabhyo bhrājase raśmivāniva
जैसे राजा भगीरथ और जैसे विख्यात राम, वैसे ही तुम सूर्य के समान सब राजाओं से बढ़कर प्रकाशित होते हो।
श्लोक 127 (3.83.127)
यथा मनुर्यथेक्ष्वाकुर्यथा पूरुर्महायशाः । यथा वैन्यो महाराज तथा त्वमपि विश्रुतः ॥
yathā manuryathekṣvākuryathā pūrurmahāyaśāḥ | yathā vainyo mahārāja tathā tvamapi viśrutaḥ
हे महाराज, जैसे मनु, जैसे इक्ष्वाकु, जैसे महायशस्वी पूरु और जैसे वेनपुत्र पृथु, वैसे ही तुम भी विख्यात हो।
श्लोक 128 (3.83.128)
यथा च वृत्रहा सर्वान्सपत्नान्निर्दहन्पुरा । त्रैलोक्यं पालयामास देवराड्विगतज्वरः ॥
yathā ca vṛtrahā sarvānsapatnānnirdahanpurā | trailokyaṃ pālayāmāsa devarāḍvigatajvaraḥ
और जैसे वृत्रासुर का वध करने वाले देवराज इन्द्र ने पूर्वकाल में सब शत्रुओं को भस्म करके निश्चिन्त होकर तीनों लोकों का पालन किया,
श्लोक 129 (3.83.129)
तथा शत्रुक्षयं कृत्वा त्वं प्रजाः पालयिष्यसि । स्वधर्मविजितामुर्वीं प्राप्य राजीवलोचन । ख्यातिं यास्यसि धर्मेण कार्तवीर्यार्जुनो यथा ॥
tathā śatrukṣayaṃ kṛtvā tvaṃ prajāḥ pālayiṣyasi | svadharmavijitāmurvīṃ prāpya rājīvalocana | khyātiṃ yāsyasi dharmeṇa kārtavīryārjuno yathā
वैसे ही तुम शत्रुओं का नाश करके प्रजा का पालन करोगे; हे कमलनयन, अपने धर्म से जीती हुई पृथ्वी पाकर तुम कार्तवीर्य अर्जुन की भाँति धर्म के द्वारा ख्याति पाओगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 130 (3.83.130)
एवमाश्वास्य राजानं नारदो भगवानृषिः । अनुज्ञाप्य महाराज तत्रैवान्तरधीयत ॥
evamāśvāsya rājānaṃ nārado bhagavānṛṣiḥ | anujñāpya mahārāja tatraivāntaradhīyata
हे महाराज, इस प्रकार राजा को आश्वासन देकर भगवान नारद ऋषि विदा लेकर वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 131 (3.83.131)
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा तमेवार्थं विचिन्तयन् । तीर्थयात्राश्रितं पुण्यमृषीणां प्रत्यवेदयत् ॥
yudhiṣṭhiro'pi dharmātmā tamevārthaṃ vicintayan | tīrthayātrāśritaṃ puṇyamṛṣīṇāṃ pratyavedayat
धर्मात्मा युधिष्ठिर ने भी उसी विषय पर विचार करते हुए ऋषियों को तीर्थयात्रा से मिलने वाले पुण्य के बारे में बताया।