आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 85
धौम्य द्वारा पूर्व दिशा के तीर्थों का वर्णन
पाण्डवों को उदास देखकर धौम्य उन्हें आश्वासन देते हैं कि तीर्थों का वर्णन सुनने से उनका शोक दूर होगा और उनकी यात्रा करने से सौ गुना पुण्य मिलेगा। वे पूर्व दिशा से आरम्भ करते हैं: नैमिष और गोमती, ब्रह्मसर, अक्षयवट और फल्गु सहित गया, कौशिकी जहाँ विश्वामित्र ब्राह्मण बने, भगीरथ की गंगा, उत्पलावत और कान्यकुब्ज, प्रयाग का संगम, अगस्त्य का आश्रम, कालंजर पर हिरण्यबिन्दु, महेन्द्र पर्वत, ब्रह्मशाला, मतंग का केदार, कुण्डोद पर्वत, देववन, तथा बाहुदा और नन्दा नदियाँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.85.1)
तान्सर्वानुत्सुकान्दृष्ट्वा पाण्डवान्दीनचेतसः । आश्वासयंस्तथा धौम्यो बृहस्पतिसमोऽब्रवीत् ॥
tānsarvānutsukāndṛṣṭvā pāṇḍavāndīnacetasaḥ | āśvāsayaṃstathā dhaumyo bṛhaspatisamo'bravīt
सभी पाण्डवों को उत्कण्ठित और उदास देखकर बृहस्पति के समान धौम्य ने उन्हें ढाढ़स बँधाते हुए कहा।
धौम्य उवाच
श्लोक 2 (3.85.2)
ब्राह्मणानुमतान्पुण्यानाश्रमान्भरतर्षभ । दिशस्तीर्थानि शैलांश्च शृणु मे वदतोऽनघ ॥
brāhmaṇānumatānpuṇyānāśramānbharatarṣabha | diśastīrthāni śailāṃśca śṛṇu me vadato'nagha
हे भरतश्रेष्ठ, हे निष्पाप, ब्राह्मणों द्वारा मान्य पवित्र आश्रमों, दिशाओं, तीर्थों और पर्वतों का वर्णन मुझसे सुनो।
श्लोक 3 (3.85.3)
याञ्श्रुत्वा गदतो राजन्विशोको भवितासि ह । द्रौपद्या चानया सार्धं भ्रातृभिश्च नरेश्वर ॥
yāñśrutvā gadato rājanviśoko bhavitāsi ha | draupadyā cānayā sārdhaṃ bhrātṛbhiśca nareśvara
हे राजन्, हे नरेश्वर, मेरे मुख से उनका वर्णन सुनकर तुम इस द्रौपदी और अपने भाइयों के साथ शोक से मुक्त हो जाओगे।
श्लोक 4 (3.85.4)
श्रवणाच्चैव तेषां त्वं पुण्यमाप्स्यसि पाण्डव । गत्वा शतगुणं चैव तेभ्य एव नरोत्तम ॥
śravaṇāccaiva teṣāṃ tvaṃ puṇyamāpsyasi pāṇḍava | gatvā śataguṇaṃ caiva tebhya eva narottama
हे पाण्डव, उनके विषय में सुनने मात्र से तुम्हें पुण्य मिलेगा, और हे नरोत्तम, वहाँ जाने से उससे सौ गुना पुण्य मिलेगा।
श्लोक 5 (3.85.5)
शृणु पूर्वां दिशं राजन्देवर्षिगणसेविताम् । रम्यां ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथास्मृति ॥
śṛṇu pūrvāṃ diśaṃ rājandevarṣigaṇasevitām | ramyāṃ te kathayiṣyāmi yudhiṣṭhira yathāsmṛti
हे राजन् युधिष्ठिर, पहले देवर्षियों के समूहों से सेवित पूर्व दिशा के विषय में सुनो; मैं अपनी स्मृति के अनुसार उस रमणीय दिशा का वर्णन करूँगा।
श्लोक 6 (3.85.6)
तस्यां देवर्षिजुष्टायां नैमिषं नाम भारत । यत्र तीर्थानि देवानां पुण्यानि च पृथक् पृथक् ॥
tasyāṃ devarṣijuṣṭāyāṃ naimiṣaṃ nāma bhārata | yatra tīrthāni devānāṃ puṇyāni ca pṛthak pṛthak
हे भारत, देवर्षियों से सेवित उस दिशा में नैमिष है, जहाँ देवताओं के पृथक्-पृथक् पवित्र तीर्थ हैं।
श्लोक 7 (3.85.7)
यत्र सा गोमती पुण्या रम्या देवर्षिसेविता । यज्ञभूमिश्च देवानां शामित्रं च विवस्वतः ॥
yatra sā gomatī puṇyā ramyā devarṣisevitā | yajñabhūmiśca devānāṃ śāmitraṃ ca vivasvataḥ
वहाँ देवर्षियों से सेवित पवित्र और रमणीय गोमती नदी है, देवताओं की यज्ञभूमि है और विवस्वान् के पुत्र (यम) का शामित्र—यज्ञ-पशु के आलम्भन का स्थान—है।
श्लोक 8 (3.85.8)
तस्यां गिरिवरः पुण्यो गयो राजर्षिसत्कृतः । शिवं ब्रह्मसरो यत्र सेवितं त्रिदशर्षिभिः ॥
tasyāṃ girivaraḥ puṇyo gayo rājarṣisatkṛtaḥ | śivaṃ brahmasaro yatra sevitaṃ tridaśarṣibhiḥ
उसी दिशा में राजर्षियों द्वारा सम्मानित पवित्र गिरिश्रेष्ठ गय है, जहाँ देवताओं और ऋषियों से सेवित कल्याणकारी ब्रह्मसर है।
श्लोक 9 (3.85.9)
यदर्थे पुरुषव्याघ्र कीर्तयन्ति पुरातनाः । एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ॥
yadarthe puruṣavyāghra kīrtayanti purātanāḥ | eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyeko'pi gayāṃ vrajet
हे पुरुषसिंह, उसी के कारण प्राचीन लोग कहते हैं—"बहुत-से पुत्रों की कामना करनी चाहिए, जिससे उनमें से एक भी गया जाए,
श्लोक 10 (3.85.10)
गौरीं वा वरयेत्कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् । उत्तारयति संतत्या दश पूर्वान्दशावरान् ॥
gaurīṃ vā varayetkanyāṃ nīlaṃ vā vṛṣamutsṛjet | uttārayati saṃtatyā daśa pūrvāndaśāvarān
या गौरी (अल्पवयस्क) कन्या से विवाह करे, या नील वृषभ का उत्सर्ग करे; ऐसा पुत्र अपनी सन्तति के द्वारा दस पूर्व और दस आगे की पीढ़ियों का उद्धार करता है।"
श्लोक 11 (3.85.11)
महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप । यत्रासौ कीर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वटः ॥
mahānadī ca tatraiva tathā gayaśiro nṛpa | yatrāsau kīrtyate viprairakṣayyakaraṇo vaṭaḥ
हे नृप, वहीं महानदी है और वैसे ही गयशिर है, जहाँ ब्राह्मण उस वट का वर्णन करते हैं जो दिए हुए दान को अक्षय बना देता है,
श्लोक 12 (3.85.12)
यत्र दत्तं पितृभ्योऽन्नमक्षय्यं भवति प्रभो । सा च पुण्यजला तत्र फल्गुनामा महानदी ॥
yatra dattaṃ pitṛbhyo'nnamakṣayyaṃ bhavati prabho | sā ca puṇyajalā tatra phalgunāmā mahānadī
जहाँ पितरों को दिया गया अन्न अक्षय हो जाता है, हे प्रभो; और वहीं पवित्र जल वाली फल्गु नामक महानदी है।
श्लोक 13 (3.85.13)
बहुमूलफला चापि कौशिकी भरतर्षभ । विश्वामित्रोऽध्यगाद्यत्र ब्राह्मणत्वं तपोधनः ॥
bahumūlaphalā cāpi kauśikī bharatarṣabha | viśvāmitro'dhyagādyatra brāhmaṇatvaṃ tapodhanaḥ
और हे भरतश्रेष्ठ, वहीं कन्द-मूल और फलों से भरपूर कौशिकी नदी है, जहाँ तपोधन विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया।
श्लोक 14 (3.85.14)
गङ्गा यत्र नदी पुण्या यस्यास्तीरे भगीरथः । अयजत्तत्र बहुभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥
gaṅgā yatra nadī puṇyā yasyāstīre bhagīrathaḥ | ayajattatra bahubhiḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ
वहीं पवित्र गंगा नदी है, जिसके तट पर भगीरथ ने प्रचुर दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ किए।
श्लोक 15 (3.85.15)
पाञ्चालेषु च कौरव्य कथयन्त्युत्पलावतम् । विश्वामित्रोऽयजद्यत्र शक्रेण सह कौशिकः ॥
pāñcāleṣu ca kauravya kathayantyutpalāvatam | viśvāmitro'yajadyatra śakreṇa saha kauśikaḥ
हे कौरव्य, पांचाल देश में लोग उत्पलावत का वर्णन करते हैं, जहाँ कौशिक विश्वामित्र ने शक्र के साथ यज्ञ किया था।
श्लोक 16 (3.85.16)
यत्रानुवंशं भगवाञ्जामदग्न्यस्तथा जगौ । विश्वामित्रस्य तां दृष्ट्वा विभूतिमतिमानुषीम् ॥
yatrānuvaṃśaṃ bhagavāñjāmadagnyastathā jagau | viśvāmitrasya tāṃ dṛṣṭvā vibhūtimatimānuṣīm
वहीं भगवान् जामदग्न्य ने विश्वामित्र का वह अलौकिक ऐश्वर्य देखकर उनके वंश की प्रशस्ति गाई।
श्लोक 17 (3.85.17)
कान्यकुब्जेऽपिबत्सोममिन्द्रेण सह कौशिकः । ततः क्षत्रादपाक्रामद्ब्राह्मणोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥
kānyakubje'pibatsomamindreṇa saha kauśikaḥ | tataḥ kṣatrādapākrāmadbrāhmaṇo'smīti cābravīt
कान्यकुब्ज में कौशिक ने इन्द्र के साथ सोमपान किया; तब वे क्षत्रियत्व से ऊपर उठ गए और बोले—"मैं ब्राह्मण हूँ।"
श्लोक 18 (3.85.18)
पवित्रमृषिभिर्जुष्टं पुण्यं पावनमुत्तमम् । गङ्गायमुनयोर्वीर संगमं लोकविश्रुतम् ॥
pavitramṛṣibhirjuṣṭaṃ puṇyaṃ pāvanamuttamam | gaṅgāyamunayorvīra saṃgamaṃ lokaviśrutam
हे वीर, गंगा और यमुना का संगम पवित्र, ऋषियों से सेवित, पुण्यमय, पावन, उत्तम और लोकविख्यात है,
श्लोक 19 (3.85.19)
यत्रायजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामहः । प्रयागमिति विख्यातं तस्माद्भरतसत्तम ॥
yatrāyajata bhūtātmā pūrvameva pitāmahaḥ | prayāgamiti vikhyātaṃ tasmādbharatasattama
जहाँ आदिकाल में सब प्राणियों के आत्मा पितामह ने यज्ञ किया था; हे भरतसत्तम, इसी कारण वह प्रयाग नाम से विख्यात है।
श्लोक 20 (3.85.20)
अगस्त्यस्य तु राजेन्द्र तत्राश्रमवरो नृप । तत्तथा तापसारण्यं तापसैरुपशोभितम् ॥
agastyasya tu rājendra tatrāśramavaro nṛpa | tattathā tāpasāraṇyaṃ tāpasairupaśobhitam
हे राजेन्द्र, हे नृप, वहीं अगस्त्य का श्रेष्ठ आश्रम है, और उसी प्रकार तपस्वियों से सुशोभित तापसारण्य है।
श्लोक 21 (3.85.21)
हिरण्यबिन्दुः कथितो गिरौ कालञ्जरे महान् । आगस्त्यपर्वतो रम्यः पुण्यो गिरिवरः शिवः ॥
hiraṇyabinduḥ kathito girau kālañjare mahān | āgastyaparvato ramyaḥ puṇyo girivaraḥ śivaḥ
कालंजर पर्वत पर महान् हिरण्यबिन्दु तीर्थ बताया गया है; और रमणीय आगस्त्य पर्वत है, जो पवित्र और कल्याणकारी श्रेष्ठ पर्वत है।
श्लोक 22 (3.85.22)
महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मनः । अयजत्तत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामहः ॥
mahendro nāma kauravya bhārgavasya mahātmanaḥ | ayajattatra kaunteya pūrvameva pitāmahaḥ
हे कौरव्य, वहाँ महात्मा भार्गव (परशुराम) का महेन्द्र नामक पर्वत है, जहाँ हे कौन्तेय, पूर्वकाल में पितामह ने यज्ञ किया था;
श्लोक 23 (3.85.23)
यत्र भागीरथी पुण्या सरस्यासीद्युधिष्ठिर । यत्र सा ब्रह्मशालेति पुण्याख्याता विशांपते । धूतपाप्मभिराकीर्णा पुण्यं तस्याश्च दर्शनम् ॥
yatra bhāgīrathī puṇyā sarasyāsīdyudhiṣṭhira | yatra sā brahmaśāleti puṇyākhyātā viśāṃpate | dhūtapāpmabhirākīrṇā puṇyaṃ tasyāśca darśanam
जहाँ हे युधिष्ठिर, पवित्र भागीरथी सरोवर में स्थित थी; और हे प्रजानाथ, जहाँ ब्रह्मशाला नामक पवित्र स्थान विख्यात है, जो निष्पाप जनों से भरा रहता है और जिसका दर्शन भी पुण्यदायक है।
श्लोक 24 (3.85.24)
पवित्रो मङ्गलीयश्च ख्यातो लोके सनातनः । केदारश्च मतङ्गस्य महानाश्रम उत्तमः ॥
pavitro maṅgalīyaśca khyāto loke sanātanaḥ | kedāraśca mataṅgasya mahānāśrama uttamaḥ
वहीं मतंग का केदार नामक महान् और उत्तम आश्रम है, जो पवित्र, मंगलकारी, सनातन और लोक में विख्यात है।
श्लोक 25 (3.85.25)
कुण्डोदः पर्वतो रम्यो बहुमूलफलोदकः । नैषधस्तृषितो यत्र जलं शर्म च लब्धवान् ॥
kuṇḍodaḥ parvato ramyo bahumūlaphalodakaḥ | naiṣadhastṛṣito yatra jalaṃ śarma ca labdhavān
वहीं कन्द-मूल, फल और जल से भरपूर रमणीय कुण्डोद पर्वत है, जहाँ प्यासे नैषध (नल) ने जल और विश्राम पाया था।
श्लोक 26 (3.85.26)
यत्र देववनं पुण्यं तापसैरुपशोभितम् । बाहुदा च नदी यत्र नन्दा च गिरिमूर्धनि ॥
yatra devavanaṃ puṇyaṃ tāpasairupaśobhitam | bāhudā ca nadī yatra nandā ca girimūrdhani
वहीं तपस्वियों से सुशोभित पवित्र देववन है, बाहुदा नदी है और पर्वत के शिखर पर नन्दा नदी है।
श्लोक 27 (3.85.27)
तीर्थानि सरितः शैलाः पुण्यान्यायतनानि च । प्राच्यां दिशि महाराज कीर्तितानि मया तव ॥
tīrthāni saritaḥ śailāḥ puṇyānyāyatanāni ca | prācyāṃ diśi mahārāja kīrtitāni mayā tava
हे महाराज, पूर्व दिशा के ये तीर्थ, नदियाँ, पर्वत और पवित्र स्थान मैंने तुम्हें बता दिए।
श्लोक 28 (3.85.28)
तिसृष्वन्यासु पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु । सरितः पर्वतांश्चैव पुण्यान्यायतनानि च ॥
tisṛṣvanyāsu puṇyāni dikṣu tīrthāni me śṛṇu | saritaḥ parvatāṃścaiva puṇyānyāyatanāni ca
अब शेष तीन दिशाओं के पवित्र तीर्थों, नदियों, पर्वतों और पुण्य स्थानों का वर्णन मुझसे सुनो।