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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 86

दक्षिण दिशा के तीर्थ

धौम्य दक्षिण दिशा की ओर मुड़ते हैं: गोदावरी, वेणा और भीमरथी, और नृग की नदी पयोष्णी, जिसकी महिमा मार्कण्डेय ने गाई और जिसे वह गाथा सब तीर्थों से बढ़कर बताती है। वे माठर का वन, कण्व का आश्रम, शूर्पारक में जमदग्नि की वेदी, अशोक, अगस्त्य और वारुण तीर्थ, कुमारी तीर्थ और ताम्रपर्णी, गोकर्ण, और वैडूर्य पर्वत के पास अगस्त्य का आश्रम गिनाते हैं; फिर सुराष्ट्र में चमसोद्भेदन, प्रभास, पिण्डारक और उज्जयन्त पर्वत। अन्त में वे द्वारका का वर्णन करते हैं और वहाँ निवास करने वाले कृष्ण की सनातन धर्म और देवाधिदेव के रूप में स्तुति करते हैं।

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धौम्य उवाच

श्लोक 1 (3.86.1)

दक्षिणस्यां तु पुण्यानि शृणु तीर्थानि भारत । विस्तरेण यथाबुद्धि कीर्त्यमानानि तानि वै ॥

dakṣiṇasyāṃ tu puṇyāni śṛṇu tīrthāni bhārata | vistareṇa yathābuddhi kīrtyamānāni tāni vai

हे भारत, अब दक्षिण दिशा के पवित्र तीर्थों के विषय में सुनो, जिनका मैं अपनी बुद्धि के अनुसार विस्तार से वर्णन करूँगा।

श्लोक 2 (3.86.2)

यस्यामाख्यायते पुण्या दिशि गोदावरी नदी । बह्वारामा बहुजला तापसाचरिता शिवा ॥

yasyāmākhyāyate puṇyā diśi godāvarī nadī | bahvārāmā bahujalā tāpasācaritā śivā

उस दिशा में पवित्र गोदावरी नदी बताई जाती है, जो कल्याणकारी, जल से भरपूर, अनेक उपवनों वाली और तपस्वियों से सेवित है।

श्लोक 3 (3.86.3)

वेणा भीमरथी चैव नद्यौ पापभयापहे । मृगद्विजसमाकीर्णे तापसालयभूषिते ॥

veṇā bhīmarathī caiva nadyau pāpabhayāpahe | mṛgadvijasamākīrṇe tāpasālayabhūṣite

वहीं वेणा और भीमरथी—ये दो नदियाँ हैं, जो पाप के भय को दूर करती हैं, पशु-पक्षियों से भरी रहती हैं और तपस्वियों के आश्रमों से सुशोभित हैं।

श्लोक 4 (3.86.4)

राजर्षेस्तस्य च सरिन्नृगस्य भरतर्षभ । रम्यतीर्था बहुजला पयोष्णी द्विजसेविता ॥

rājarṣestasya ca sarinnṛgasya bharatarṣabha | ramyatīrthā bahujalā payoṣṇī dvijasevitā

और हे भरतश्रेष्ठ, वहीं उन राजर्षि नृग की नदी पयोष्णी है, जिसके तीर्थ रमणीय हैं, जल भरपूर है और जो ब्राह्मणों से सेवित है।

श्लोक 5 (3.86.5)

अपि चात्र महायोगी मार्कण्डेयो महायशाः । अनुवंश्यां जगौ गाथां नृगस्य धरणीपतेः ॥

api cātra mahāyogī mārkaṇḍeyo mahāyaśāḥ | anuvaṃśyāṃ jagau gāthāṃ nṛgasya dharaṇīpateḥ

यहीं महायोगी, महायशस्वी मार्कण्डेय ने पृथ्वीपति नृग के वंश के अनुरूप एक गाथा गाई थी—

श्लोक 6 (3.86.6)

नृगस्य यजमानस्य प्रत्यक्षमिति नः श्रुतम् । मरुतः परिवेष्टारः सदस्याश्च दिवौकसः ॥

nṛgasya yajamānasya pratyakṣamiti naḥ śrutam | marutaḥ pariveṣṭāraḥ sadasyāśca divaukasaḥ

"हमने सुना है कि जब नृग यज्ञ कर रहे थे, तब यह सबकी आँखों के सामने हुआ—मरुद्गण भोजन परोसने वाले थे और स्वर्गवासी देवता सभासद थे।

श्लोक 7 (3.86.7)

पयोष्ण्यां यजमानस्य वाराहे तीर्थ उत्तमे । उद्धृतं भूतलस्थं वा वायुना समुदीरितम् । पयोष्ण्या हरते तोयं पापमामरणान्तिकम् ॥

payoṣṇyāṃ yajamānasya vārāhe tīrtha uttame | uddhṛtaṃ bhūtalasthaṃ vā vāyunā samudīritam | payoṣṇyā harate toyaṃ pāpamāmaraṇāntikam

पयोष्णी के उत्तम वाराह तीर्थ पर, जहाँ वे यज्ञ कर रहे थे—पयोष्णी का जल, चाहे निकाला गया हो, भूमि पर पड़ा हो या वायु से उड़ाया गया हो, मृत्यु तक के पापों को हर लेता है।

श्लोक 8 (3.86.8)

स्वर्गादुत्तुङ्गममलं विषाणं यत्र शूलिनः । स्वमात्मविहितं दृष्ट्वा मर्त्यः शिवपुरं व्रजेत् ॥

svargāduttuṅgamamalaṃ viṣāṇaṃ yatra śūlinaḥ | svamātmavihitaṃ dṛṣṭvā martyaḥ śivapuraṃ vrajet

जहाँ त्रिशूलधारी शिव का निर्मल शृंग स्वर्ग से भी ऊँचा उठा है, स्वयं उनके द्वारा रचे उस शृंग को देखकर मनुष्य शिवलोक को जाता है।

श्लोक 9 (3.86.9)

एकतः सरितः सर्वा गङ्गाद्याः सलिलोच्चयाः । पयोष्णी चैकतः पुण्या तीर्थेभ्यो हि मता मम ॥

ekataḥ saritaḥ sarvā gaṅgādyāḥ saliloccayāḥ | payoṣṇī caikataḥ puṇyā tīrthebhyo hi matā mama

एक ओर गंगा आदि जलराशि से भरी सारी नदियाँ हैं और दूसरी ओर अकेली पवित्र पयोष्णी; मेरी दृष्टि में वह सब तीर्थों से बढ़कर है।"

श्लोक 10 (3.86.10)

माठरस्य वनं पुण्यं बहुमूलफलं शिवम् । यूपश्च भरतश्रेष्ठ वरुणस्रोतसे गिरौ ॥

māṭharasya vanaṃ puṇyaṃ bahumūlaphalaṃ śivam | yūpaśca bharataśreṣṭha varuṇasrotase girau

वहीं माठर का पवित्र और कल्याणकारी वन है, जो कन्द-मूल और फलों से भरपूर है; और हे भरतश्रेष्ठ, वरुणस्रोत पर्वत पर यूप (यज्ञ-स्तम्भ) है।

श्लोक 11 (3.86.11)

प्रवेण्युत्तरपार्श्वे तु पुण्ये कण्वाश्रमे तथा । तापसानामरण्यानि कीर्तितानि यथाश्रुति ॥

praveṇyuttarapārśve tu puṇye kaṇvāśrame tathā | tāpasānāmaraṇyāni kīrtitāni yathāśruti

प्रवेणी नदी के उत्तरी किनारे पर कण्व के पवित्र आश्रम में तपस्वियों के वन हैं, जैसा परम्परा से सुना गया है।

श्लोक 12 (3.86.12)

वेदी शूर्पारके तात जमदग्नेर्महात्मनः । रम्या पाषाणतीर्था च पुरश्चन्द्रा च भारत ॥

vedī śūrpārake tāta jamadagnermahātmanaḥ | ramyā pāṣāṇatīrthā ca puraścandrā ca bhārata

हे तात, शूर्पारक में महात्मा जमदग्नि की वेदी है, और हे भारत, वहीं रमणीय पाषाणतीर्थ और पुरश्चन्द्र हैं।

श्लोक 13 (3.86.13)

अशोकतीर्थं तत्रैव कौन्तेय बहुलाश्रमम् । अगस्त्यतीर्थं पाण्ड्येषु वारुणं च युधिष्ठिर ॥

aśokatīrthaṃ tatraiva kaunteya bahulāśramam | agastyatīrthaṃ pāṇḍyeṣu vāruṇaṃ ca yudhiṣṭhira

हे कौन्तेय, वहीं अनेक आश्रमों वाला अशोकतीर्थ है; और हे युधिष्ठिर, पाण्ड्य देश में अगस्त्यतीर्थ और वारुणतीर्थ हैं।

श्लोक 14 (3.86.14)

कुमार्यः कथिताः पुण्याः पाण्ड्येष्वेव नरर्षभ । ताम्रपर्णी तु कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तां शृणु ॥

kumāryaḥ kathitāḥ puṇyāḥ pāṇḍyeṣveva nararṣabha | tāmraparṇī tu kaunteya kīrtayiṣyāmi tāṃ śṛṇu

हे नरश्रेष्ठ, पाण्ड्य देश में ही कुमारी नामक पवित्र तीर्थ बताए गए हैं। हे कौन्तेय, अब मैं ताम्रपर्णी का वर्णन करूँगा, उसे सुनो।

श्लोक 15 (3.86.15)

यत्र देवैस्तपस्तप्तं महदिच्छद्भिराश्रमे । गोकर्णमिति विख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत ॥

yatra devaistapastaptaṃ mahadicchadbhirāśrame | gokarṇamiti vikhyātaṃ triṣu lokeṣu bhārata

वहाँ महान् फल की इच्छा से देवताओं ने एक आश्रम में तप किया था; और हे भारत, वहीं तीनों लोकों में गोकर्ण नाम से विख्यात स्थान है।

श्लोक 16 (3.86.16)

शीततोयो बहुजलः पुण्यस्तात शिवश्च सः । ह्रदः परमदुष्प्रापो मानुषैरकृतात्मभिः ॥

śītatoyo bahujalaḥ puṇyastāta śivaśca saḥ | hradaḥ paramaduṣprāpo mānuṣairakṛtātmabhiḥ

हे तात, वहाँ शीतल जल वाला, जल से भरपूर, पवित्र और कल्याणकारी एक सरोवर है, जिस तक अजितात्मा मनुष्यों का पहुँचना अत्यन्त कठिन है।

श्लोक 17 (3.86.17)

तत्र वृक्षतृणाद्यैश्च संपन्नः फलमूलवान् । आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य पुण्यो देवसहे गिरौ ॥

tatra vṛkṣatṛṇādyaiśca saṃpannaḥ phalamūlavān | āśramo'gastyaśiṣyasya puṇyo devasahe girau

वहीं वृक्षों और तृणों से सम्पन्न, फल-मूल से भरपूर, अगस्त्य के शिष्य का पवित्र आश्रम देवसह पर्वत पर है।

श्लोक 18 (3.86.18)

वैडूर्यपर्वतस्तत्र श्रीमान्मणिमयः शिवः । अगस्त्यस्याश्रमश्चैव बहुमूलफलोदकः ॥

vaiḍūryaparvatastatra śrīmānmaṇimayaḥ śivaḥ | agastyasyāśramaścaiva bahumūlaphalodakaḥ

वहीं शोभायुक्त, मणिमय और कल्याणकारी वैडूर्य पर्वत है, और कन्द-मूल, फल तथा जल से भरपूर अगस्त्य का आश्रम है।

श्लोक 19 (3.86.19)

सुराष्ट्रेष्वपि वक्ष्यामि पुण्यान्यायतनानि च । आश्रमान्सरितश्चैव सरांसि च नराधिप ॥

surāṣṭreṣvapi vakṣyāmi puṇyānyāyatanāni ca | āśramānsaritaścaiva sarāṃsi ca narādhipa

हे नराधिप, अब मैं सुराष्ट्र देश के पवित्र स्थानों, आश्रमों, नदियों और सरोवरों का भी वर्णन करूँगा।

श्लोक 20 (3.86.20)

चमसोद्भेदनं विप्रास्तत्रापि कथयन्त्युत । प्रभासं चोदधौ तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥

camasodbhedanaṃ viprāstatrāpi kathayantyuta | prabhāsaṃ codadhau tīrthaṃ triṣu lokeṣu viśrutam

ब्राह्मण वहाँ चमसोद्भेदन तीर्थ का भी वर्णन करते हैं; और समुद्र-तट पर प्रभास तीर्थ है, जो तीनों लोकों में विख्यात है।

श्लोक 21 (3.86.21)

तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शिवम् । उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान् ॥

tatra piṇḍārakaṃ nāma tāpasācaritaṃ śivam | ujjayantaśca śikharī kṣipraṃ siddhikaro mahān

वहीं तपस्वियों से सेवित, कल्याणकारी पिण्डारक नामक तीर्थ है, और शीघ्र सिद्धि देने वाला महान् उज्जयन्त पर्वत है।

श्लोक 22 (3.86.22)

तत्र देवर्षिवीरेण नारदेनानुकीर्तितः । पुराणः श्रूयते श्लोकस्तं निबोध युधिष्ठिर ॥

tatra devarṣivīreṇa nāradenānukīrtitaḥ | purāṇaḥ śrūyate ślokastaṃ nibodha yudhiṣṭhira

उसके विषय में देवर्षियों में वीर नारद द्वारा गाया हुआ एक प्राचीन श्लोक सुना जाता है; हे युधिष्ठिर, उसे सुनो—

श्लोक 23 (3.86.23)

पुण्ये गिरौ सुराष्ट्रेषु मृगपक्षिनिषेविते । उज्जयन्ते स्म तप्ताङ्गो नाकपृष्ठे महीयते ॥

puṇye girau surāṣṭreṣu mṛgapakṣiniṣevite | ujjayante sma taptāṅgo nākapṛṣṭhe mahīyate

"सुराष्ट्र देश में पशु-पक्षियों से सेवित पवित्र उज्जयन्त पर्वत पर जिसने तप किया है, वह स्वर्गलोक में पूजित होता है।"

श्लोक 24 (3.86.24)

एष नारायणः श्रीमान्क्षीरार्णवनिकेतनः । नागपर्यङ्कमुत्सृज्य ह्यागतो मधुरां पुरीम् ॥

eṣa nārāyaṇaḥ śrīmānkṣīrārṇavaniketanaḥ | nāgaparyaṅkamutsṛjya hyāgato madhurāṃ purīm

यही श्रीमान् नारायण हैं, जिनका निवास क्षीरसागर है, और जो शेषनाग की शय्या छोड़कर मधुरा (मथुरा) पुरी में आए।

श्लोक 25 (3.86.25)

पुण्या द्वारवती तत्र यत्रासौ मधुसूदनः । साक्षाद्देवः पुराणोऽसौ स हि धर्मः सनातनः ॥

puṇyā dvāravatī tatra yatrāsau madhusūdanaḥ | sākṣāddevaḥ purāṇo'sau sa hi dharmaḥ sanātanaḥ

वहीं पवित्र द्वारका है, जहाँ वे मधुसूदन रहते हैं, जो साक्षात् पुरातन देव हैं; वे ही सनातन धर्म हैं।

श्लोक 26 (3.86.26)

ये च वेदविदो विप्रा ये चाध्यात्मविदो जनाः । ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम् ॥

ye ca vedavido viprā ye cādhyātmavido janāḥ | te vadanti mahātmānaṃ kṛṣṇaṃ dharmaṃ sanātanam

जो ब्राह्मण वेदों के ज्ञाता हैं और जो अध्यात्म के ज्ञाता हैं, वे महात्मा कृष्ण को सनातन धर्म कहते हैं।

श्लोक 27 (3.86.27)

पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते । पुण्यानामपि पुण्योसौ मङ्गलानां च मङ्गलम् । त्रैलोक्ये पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः ॥

pavitrāṇāṃ hi govindaḥ pavitraṃ paramucyate | puṇyānāmapi puṇyosau maṅgalānāṃ ca maṅgalam | trailokye puṇḍarīkākṣo devadevaḥ sanātanaḥ

गोविन्द पवित्र करने वालों में परम पवित्र कहे जाते हैं; वे पुण्यों में भी पुण्य और मंगलों में भी मंगल हैं। तीनों लोकों में वे कमलनयन ही सनातन देवाधिदेव हैं।

श्लोक 28 (3.86.28)

अव्ययात्मा व्ययात्मा च क्षेत्रज्ञः परमेश्वरः । आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः ॥

avyayātmā vyayātmā ca kṣetrajñaḥ parameśvaraḥ | āste hariracintyātmā tatraiva madhusūdanaḥ

जो अविनाशी आत्मा भी हैं और नश्वर रूप भी, जो क्षेत्रज्ञ और परमेश्वर हैं—वे अचिन्त्यस्वरूप हरि मधुसूदन वहीं निवास करते हैं।

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