आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 10
मरुत्त का यज्ञ और व्यास की युधिष्ठिर को स्वर्ण लाने की प्रेरणा
इन्द्र गन्धर्व धृतराष्ट्र को मरुत्त के पास भेजते हैं कि वह बृहस्पति को चुने, अन्यथा वज्र सहना पड़ेगा, पर मरुत्त नहीं मानता। वज्र की गर्जना सुनाई देने पर संवर्त अपनी स्तम्भन-विद्या से उसे निर्भय करते हैं और मन्त्रों से इन्द्र को यज्ञ में बुलाते हैं। इन्द्र आते हैं, उनका सत्कार होता है और वे स्वयं यज्ञभूमि की व्यवस्था कराते हैं; देवता अपने भाग ग्रहण करते हैं और मरुत्त सोने की विशाल राशियाँ दान में देता है। अन्त में व्यास युधिष्ठिर को वह सोना अपने यज्ञ के लिए लाने की प्रेरणा देते हैं और युधिष्ठिर मन्त्रियों से परामर्श करते हैं।
इन्द्र उवाच
श्लोक 1 (14.10.1)
एवमेतद्ब्रह्मबलं गरीयो । न ब्राह्मणात्किञ्चिदन्यद्गरीयः । आविक्षितस्य तु बलं न मृष्ये । वज्रमस्मै प्रहरिष्यामि घोरम् ॥
evametadbrahmabalaṃ garīyo | na brāhmaṇātkiñcidanyadgarīyaḥ | āvikṣitasya tu balaṃ na mṛṣye | vajramasmai prahariṣyāmi ghoram
ठीक है, ब्राह्मण का बल ही बड़ा है और ब्राह्मण से बढ़कर और कुछ नहीं। फिर भी मैं आविक्षित के पुत्र का बल सहन नहीं कर सकता; उस पर मैं अपना भयंकर वज्र चलाऊँगा।
श्लोक 2 (14.10.2)
धृतराष्ट्र गच्छ प्रहितो मरुत्तं । संवर्तेन सङ्गतं तं वदस्व । बृहस्पतिं त्वमुपशिक्षस्व राज- । न्वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् ॥
dhṛtarāṣṭra gaccha prahito maruttaṃ | saṃvartena saṅgataṃ taṃ vadasva | bṛhaspatiṃ tvamupaśikṣasva rāja- | nvajraṃ vā te prahariṣyāmi ghoram
धृतराष्ट्र, मेरे दूत बनकर संवर्त के साथ बैठे मरुत्त के पास जाओ और उससे कहो: "हे राजन्, बृहस्पति को अपना गुरु बनाओ, नहीं तो मैं तुम पर अपना भयंकर वज्र चलाऊँगा।"
व्यास उवाच
श्लोक 3 (14.10.3)
ततो गत्वा धृतराष्ट्रो नरेन्द्रं । प्रोवाचेदं वचनं वासवस्य ॥
tato gatvā dhṛtarāṣṭro narendraṃ | provācedaṃ vacanaṃ vāsavasya
तब धृतराष्ट्र राजा के पास गया और उसने वासव का यह सन्देश कहा।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 4 (14.10.4)
गन्धर्वं मां धृतराष्ट्रं निबोध । त्वामागतं वक्तुकामं नरेन्द्र । ऐन्द्रं वाक्यं शृणु मे राजसिंह । यत्प्राह लोकाधिपतिर्महात्मा ॥
gandharvaṃ māṃ dhṛtarāṣṭraṃ nibodha | tvāmāgataṃ vaktukāmaṃ narendra | aindraṃ vākyaṃ śṛṇu me rājasiṃha | yatprāha lokādhipatirmahātmā
हे नरेन्द्र, मुझे गन्धर्व धृतराष्ट्र जानो, जो तुमसे कुछ कहने आया है। हे राजसिंह, इन्द्र का सन्देश सुनो, जो महात्मा लोकपति ने कहा है।
श्लोक 5 (14.10.5)
बृहस्पतिं याजकं त्वं वृणीष्व । वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् । वचश्चेदेतन्न करिष्यसे मे । प्राहैतदेतावदचिन्त्यकर्मा ॥
bṛhaspatiṃ yājakaṃ tvaṃ vṛṇīṣva | vajraṃ vā te prahariṣyāmi ghoram | vacaścedetanna kariṣyase me | prāhaitadetāvadacintyakarmā
"बृहस्पति को अपना याजक चुन लो, नहीं तो मैं तुम पर अपना भयंकर वज्र चलाऊँगा; यदि तुम मेरा यह वचन नहीं मानोगे" -- इतना ही उस अचिन्त्यकर्मा ने कहा।
मरुत्त उवाच
श्लोक 6 (14.10.6)
त्वं चैवैतद्वेत्थ पुरन्दरश्च । विश्वेदेवा वसवश्चाश्विनौ च । मित्रद्रोहे निष्कृतिर्नास्ति लोके । महत्पापं ब्रह्महत्यासमं तत् ॥
tvaṃ caivaitadvettha purandaraśca | viśvedevā vasavaścāśvinau ca | mitradrohe niṣkṛtirnāsti loke | mahatpāpaṃ brahmahatyāsamaṃ tat
तुम यह जानते हो, पुरन्दर, विश्वेदेव, वसु और अश्विनीकुमार भी जानते हैं: मित्र से द्रोह करने का संसार में कोई प्रायश्चित्त नहीं है। वह ब्रह्महत्या के समान महान् पाप है।
श्लोक 7 (14.10.7)
बृहस्पतिर्याजयतां महेन्द्रं । देवश्रेष्ठं वज्रभृतां वरिष्ठम् । संवर्तो मां याजयिताऽद्य राज- । न्न ते वाक्यं तस्य वा रोचयामि ॥
bṛhaspatiryājayatāṃ mahendraṃ | devaśreṣṭhaṃ vajrabhṛtāṃ variṣṭham | saṃvarto māṃ yājayitā'dya rāja- | nna te vākyaṃ tasya vā rocayāmi
महेन्द्र का, जो देवताओं में श्रेष्ठ और वज्रधारियों में अग्रगण्य हैं, यज्ञ बृहस्पति कराएँ। हे राजन्, आज तो संवर्त ही मेरा यज्ञ कराएँगे; न मुझे तुम्हारी बात रुचती है, न उसकी।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 8 (14.10.8)
घोरो नादः श्रूयतां वासवस्य । नभस्तले गर्जतो राजसिंह । व्यक्तं वज्रं मोक्ष्यते ते महेन्द्रः । क्षेमं राजंश्चिन्त्यतामेष कालः ॥
ghoro nādaḥ śrūyatāṃ vāsavasya | nabhastale garjato rājasiṃha | vyaktaṃ vajraṃ mokṣyate te mahendraḥ | kṣemaṃ rājaṃścintyatāmeṣa kālaḥ
हे राजसिंह, आकाश में गरजते हुए वासव का भयंकर नाद सुनो। महेन्द्र निश्चय ही तुम पर वज्र छोड़ेंगे; हे राजन्, अपनी कुशल का विचार करो, यही समय है।
व्यास उवाच
श्लोक 9 (14.10.9)
इत्येवमुक्तो धृतराष्ट्रेण राज- । ञ्श्रुत्वा नादं नदतो वासवस्य । तपोनित्यं धर्मविदां वरिष्ठं । संवर्तं तं ज्ञापयामास कार्यम् ॥
ityevamukto dhṛtarāṣṭreṇa rāja- | ñśrutvā nādaṃ nadato vāsavasya | taponityaṃ dharmavidāṃ variṣṭhaṃ | saṃvartaṃ taṃ jñāpayāmāsa kāryam
धृतराष्ट्र के ऐसा कहने पर राजा ने गरजते हुए वासव का नाद सुना और सदा तप में लगे रहने वाले, धर्मज्ञों में श्रेष्ठ संवर्त को यह बात बताई।
मरुत्त उवाच
श्लोक 10 (14.10.10)
पश्यात्मानं प्लवमानं त्वमारा- । दध्वा दूरं तेन न दृश्यतेऽद्य । प्रपद्येऽहं शर्म विप्रेन्द्र त्वत्तः । प्रयच्छ तस्मादभयं विप्रमुख्य ॥
paśyātmānaṃ plavamānaṃ tvamārā- | dadhvā dūraṃ tena na dṛśyate'dya | prapadye'haṃ śarma viprendra tvattaḥ | prayaccha tasmādabhayaṃ vipramukhya
देखिए, आप स्वयं पास ही तैर रहे हैं; मार्ग दूर है, इसीलिए आज वह दिखाई नहीं देता। हे विप्रेन्द्र, मैं आपकी शरण और आश्रय चाहता हूँ; इसलिए हे विप्रमुख्य, मुझे अभय दीजिए।
श्लोक 11 (14.10.11)
अयमायाति वै वज्री दिशो विद्योतयन्दश । अमानुषेण घोरेण सदस्यास्त्रासिता हि नः ॥
ayamāyāti vai vajrī diśo vidyotayandaśa | amānuṣeṇa ghoreṇa sadasyāstrāsitā hi naḥ
वह वज्रधारी दसों दिशाओं को चमकाता आ रहा है; इस भयंकर अमानुषी रूप से सभी सदस्य डर गए हैं।
संवर्त उवाच
श्लोक 12 (14.10.12)
भयं शक्राद्व्येतु ते राजसिंह । प्रणोत्स्येऽहं भयमेतत्सुघोरम् । संस्तम्भिन्या विद्यया क्षिप्रमेव । मा भैस्त्वमस्याभिभवात्प्रतीतः ॥
bhayaṃ śakrādvyetu te rājasiṃha | praṇotsye'haṃ bhayametatsughoram | saṃstambhinyā vidyayā kṣiprameva | mā bhaistvamasyābhibhavātpratītaḥ
हे राजसिंह, शक्र का भय तुम्हारे मन से दूर हो। मैं अपनी स्तम्भन-विद्या से इस अत्यन्त भयंकर भय को शीघ्र ही दूर कर दूँगा। उसके आक्रमण से मत डरो, निश्चिन्त रहो।
श्लोक 13 (14.10.13)
अहं संस्तम्भयिष्यामि मा भैस्त्वं शक्रतो नृप । सर्वेषामेव देवानां क्षयितान्यायुधानि मे ॥
ahaṃ saṃstambhayiṣyāmi mā bhaistvaṃ śakrato nṛpa | sarveṣāmeva devānāṃ kṣayitānyāyudhāni me
मैं उसे स्तब्ध कर दूँगा; हे राजन्, शक्र से मत डरो। मैंने सभी देवताओं के आयुध क्षीण कर दिए हैं।
श्लोक 14 (14.10.14)
दिशो वज्रं व्रजतां वायुरेतु । वर्षं भूत्वा वर्षतां काननेषु । आपः प्लवन्त्वन्तरिक्षे वृथा च । सौदामनी दृश्यते माऽपि भैस्त्वम् ॥
diśo vajraṃ vrajatāṃ vāyuretu | varṣaṃ bhūtvā varṣatāṃ kānaneṣu | āpaḥ plavantvantarikṣe vṛthā ca | saudāmanī dṛśyate mā'pi bhaistvam
वज्र दिशाओं में बिखर जाए और वायु उसे उड़ा ले जाए; वह वर्षा बनकर वनों पर बरस जाए। जल आकाश में तैरता रहे और बिजली व्यर्थ ही चमकती दिखाई दे। तुम मत डरो।
श्लोक 15 (14.10.15)
वह्निर्देवस्त्रातु वा सर्वतस्ते । कामान्सर्वान्वर्षतु वासवो वा । वज्रं तथा स्थापयतां वधाय । महाघोरं प्लवमानं जलौघैः ॥
vahnirdevastrātu vā sarvataste | kāmānsarvānvarṣatu vāsavo vā | vajraṃ tathā sthāpayatāṃ vadhāya | mahāghoraṃ plavamānaṃ jalaughaiḥ
अथवा देव अग्नि सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें; वासव ही तुम्हारी सब कामनाओं की वर्षा करें। जल के प्रवाहों पर तैरता हुआ वह महाभयंकर वज्र रोक लिया जाए, ताकि वह किसी का वध न करे।
मरुत्त उवाच
श्लोक 16 (14.10.16)
घोरः शब्दः श्रूयते वै महास्वनो । वज्रस्यैष सहितो मारुतेन । आत्मा हि मे प्रव्यथते मुहुर्मुहु- । र्न मे स्वास्थ्यं जायते चाद्य विप्र ॥
ghoraḥ śabdaḥ śrūyate vai mahāsvano | vajrasyaiṣa sahito mārutena | ātmā hi me pravyathate muhurmuhu- | rna me svāsthyaṃ jāyate cādya vipra
भयंकर और महान् शब्द सुनाई दे रहा है, वायु के साथ वज्र की गर्जना। मेरा मन बार-बार काँप रहा है और हे विप्र, आज मुझे चैन नहीं मिल रहा।
संवर्त उवाच
श्लोक 17 (14.10.17)
वज्रादुग्राद्व्येतु भयं तवाद्य । वातो भूत्वा व्रजतु नरेन्द्र वज्रम् । भयं त्यक्त्वा वरमन्यं वृणीष्व । कं ते कामं तपसा साधयामि ॥
vajrādugrādvyetu bhayaṃ tavādya | vāto bhūtvā vrajatu narendra vajram | bhayaṃ tyaktvā varamanyaṃ vṛṇīṣva | kaṃ te kāmaṃ tapasā sādhayāmi
उस उग्र वज्र से आज तुम्हारा भय दूर हो। हे नरेन्द्र, वज्र वायु बनकर चला जाए। भय छोड़कर कोई और वर माँगो; मैं अपने तप से तुम्हारी कौन-सी कामना पूरी करूँ?
मरुत्त उवाच
श्लोक 18 (14.10.18)
इन्द्रः साक्षात्सहसाऽभ्येतु विप्र । हविर्यज्ञे प्रतिगृह्णातु चैव । स्वंस्वं हविश्चैव जुषन्तु देवा । हुतं सोमं प्रतिगृह्णन्तु चैव ॥
indraḥ sākṣātsahasā'bhyetu vipra | haviryajñe pratigṛhṇātu caiva | svaṃsvaṃ haviścaiva juṣantu devā | hutaṃ somaṃ pratigṛhṇantu caiva
हे विप्र, इन्द्र स्वयं शीघ्र आएँ और यज्ञ में हविष्य ग्रहण करें। सब देवता अपना-अपना भाग ग्रहण करें और अर्पित सोम स्वीकार करें।
संवर्त उवाच
श्लोक 19 (14.10.19)
अयमिन्द्रो हरिभिरायाति राज- । न्देवैः सर्वैस्त्वरितैः स्तूयमानः । मन्त्राहूतो यज्ञमिमं मयाऽद्य । पश्यस्वैनं मन्त्रविस्रस्तकायम् ॥
ayamindro haribhirāyāti rāja- | ndevaiḥ sarvaistvaritaiḥ stūyamānaḥ | mantrāhūto yajñamimaṃ mayā'dya | paśyasvainaṃ mantravisrastakāyam
हे राजन्, यह इन्द्र अपने हरे घोड़ों के साथ आ रहा है, सब देवता जल्दी-जल्दी उसकी स्तुति करते आ रहे हैं। आज मेरे मन्त्रों से बुलाया गया वह इस यज्ञ में आ रहा है; देखो, मन्त्रों के बल से उसका शरीर शिथिल पड़ गया है।
व्यास उवाच
श्लोक 20 (14.10.20)
ततो देवैः सहितो देवराजो । रथे युङ्क्त्वा तान्हरीन्वाजिमुख्यान् । आयाद्यज्ञमथ राज्ञः पिपासु- । राविक्षितस्याप्रमेयस्य सोमम् ॥
tato devaiḥ sahito devarājo | rathe yuṅktvā tānharīnvājimukhyān | āyādyajñamatha rājñaḥ pipāsu- | rāvikṣitasyāprameyasya somam
तब देवराज देवताओं के साथ रथ में उन श्रेष्ठ घोड़ों को जोतकर आविक्षित के अपरिमित पुत्र के यज्ञ में उसका सोम पीने की इच्छा से आए।
श्लोक 21 (14.10.21)
तमायान्तं सहितं देवसङ्घैः । प्रत्युद्ययौ सपुरोधा मरुत्तः । चक्रे पूजां देवराजाय चाग्र्यां । यथाशास्त्रं विधिवत्प्रीयमाणः ॥
tamāyāntaṃ sahitaṃ devasaṅghaiḥ | pratyudyayau sapurodhā maruttaḥ | cakre pūjāṃ devarājāya cāgryāṃ | yathāśāstraṃ vidhivatprīyamāṇaḥ
देवगणों के साथ आते हुए उनकी अगवानी के लिए मरुत्त अपने पुरोहित के साथ गया और प्रसन्न होकर शास्त्र और विधि के अनुसार देवराज की श्रेष्ठ पूजा की।
संवर्त उवाच
श्लोक 22 (14.10.22)
सुस्वागतं ते पुरुहूतेह विद्व- । न्यज्ञोऽप्ययं सन्निहिते त्वयीन्द्र । शोशुभ्यते बलवृत्रघ्न भूयः । पिबस्व सोमं सुतमुद्यतं मया ॥
susvāgataṃ te puruhūteha vidva- | nyajño'pyayaṃ sannihite tvayīndra | śośubhyate balavṛtraghna bhūyaḥ | pibasva somaṃ sutamudyataṃ mayā
हे विद्वान् पुरुहूत, आपका स्वागत है। हे इन्द्र, आपके उपस्थित होने से यह यज्ञ और भी शोभित हो रहा है, हे बल और वृत्र के संहारक। मेरे द्वारा निचोड़कर प्रस्तुत किया हुआ सोम पीजिए।
मरुत्त उवाच
श्लोक 23 (14.10.23)
शिवेन मां पश्य नमश्च तेऽस्तु । प्राप्तो यज्ञः सफलं जीवितं मे । अयं यज्ञं कुरुते मे सुरेन्द्र । बृहस्पतेरवरो जन्मना च ॥
śivena māṃ paśya namaśca te'stu | prāpto yajñaḥ saphalaṃ jīvitaṃ me | ayaṃ yajñaṃ kurute me surendra | bṛhaspateravaro janmanā ca
कृपा-दृष्टि से मुझे देखिए, आपको नमस्कार है। यज्ञ सम्पन्न हो गया और मेरा जीवन सफल हो गया। हे सुरेन्द्र, ये जो मेरा यज्ञ करा रहे हैं, ये जन्म से बृहस्पति के छोटे हैं।
इन्द्र उवाच
श्लोक 24 (14.10.24)
जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं । बृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम् । यस्याह्वानादागतोऽहं नरेन्द्र । प्रीतिर्मेऽद्य त्वयि मन्युः प्रनष्टः ॥
jānāmi te gurumenaṃ tapodhanaṃ | bṛhaspateranujaṃ tigmatejasam | yasyāhvānādāgato'haṃ narendra | prītirme'dya tvayi manyuḥ pranaṣṭaḥ
मैं जानता हूँ कि ये तुम्हारे गुरु हैं, तपोधन, तीक्ष्ण तेज वाले, बृहस्पति के छोटे भाई। हे नरेन्द्र, इन्हीं के आह्वान से मैं आया हूँ। आज मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, मेरा क्रोध नष्ट हो गया है।
संवर्त उवाच
श्लोक 25 (14.10.25)
यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज । तस्मात्स्वयं शाधि यज्ञे विधानम् । स्वयं सर्वान्कुरु भागान्सुरेन्द्र । जानात्वयं सर्वलोकश्च देव ॥
yadi prītastvamasi vai devarāja | tasmātsvayaṃ śādhi yajñe vidhānam | svayaṃ sarvānkuru bhāgānsurendra | jānātvayaṃ sarvalokaśca deva
हे देवराज, यदि आप प्रसन्न हैं तो यज्ञ का विधान स्वयं निर्देशित कीजिए। हे सुरेन्द्र, सब भाग स्वयं निर्धारित कीजिए, और हे देव, यह सारा संसार जान ले।
व्यास उवाच
श्लोक 26 (14.10.26)
एवमुक्तस्त्वाङ्गिरसेन शक्रः । समादिदेश स्वयमेव देवान् । सभाः क्रियन्तामावसथाश्च मुख्याः । सहस्रशश्चित्रभूताः समृद्धाः ॥
evamuktastvāṅgirasena śakraḥ | samādideśa svayameva devān | sabhāḥ kriyantāmāvasathāśca mukhyāḥ | sahasraśaścitrabhūtāḥ samṛddhāḥ
आङ्गिरस के ऐसा कहने पर शक्र ने स्वयं देवताओं को आदेश दिया: "सभाएँ बनाई जाएँ और मुख्य आवास, हज़ारों की संख्या में, समृद्ध और विचित्र।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 27 (14.10.27)
क्लृप्ताः स्थूणाः कुरुतारोहणानि । गन्धर्वाणामप्सरसां च शीघ्रम् । यत्र नृत्येरन्नप्सरसः समस्ताः । स्वर्गोपमः क्रियतां यज्ञवाटः ॥
klṛptāḥ sthūṇāḥ kurutārohaṇāni | gandharvāṇāmapsarasāṃ ca śīghram | yatra nṛtyerannapsarasaḥ samastāḥ | svargopamaḥ kriyatāṃ yajñavāṭaḥ
"खम्भे गाड़े जाएँ और गन्धर्वों तथा अप्सराओं के लिए शीघ्र सीढ़ियाँ बनाई जाएँ, जहाँ सब अप्सराएँ नृत्य करें। यज्ञभूमि को स्वर्ग के समान बना दिया जाए।"
व्यास उवाच
श्लोक 28 (14.10.28)
इत्युक्तास्ते चक्रुराशु प्रतीता । दिवौकसः शक्रवाक्यान्नरेन्द्र । ततो वाक्यं प्राह राजानमिन्द्रः । प्रीतो राजन्पूज्यमानो मरुत्तम् ॥
ityuktāste cakrurāśu pratītā | divaukasaḥ śakravākyānnarendra | tato vākyaṃ prāha rājānamindraḥ | prīto rājanpūjyamāno maruttam
ऐसा कहे जाने पर स्वर्गवासी देवताओं ने शक्र के वचन से प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र ही वैसा कर दिया, हे राजन्। तब सम्मानित और प्रसन्न इन्द्र ने राजा मरुत्त से कहा।
इन्द्र उवाच
श्लोक 29 (14.10.29)
एष त्वयाऽहमिह राजन्समेत्य । ये चाप्यन्ये तव पूर्वे नरेन्द्र । सर्वाश्चान्या देवताः प्रीयमाणा । हविस्तुभ्यं प्रतिगृह्णन्तु राजन् ॥
eṣa tvayā'hamiha rājansametya | ye cāpyanye tava pūrve narendra | sarvāścānyā devatāḥ prīyamāṇā | havistubhyaṃ pratigṛhṇantu rājan
हे राजन्, यहाँ तुमसे मिलकर मैं और वे दूसरे, तुम्हारे पूर्वज नरेन्द्र, तथा अन्य सब देवता भी प्रसन्न होकर हे राजन्, तुम्हारी आहुति ग्रहण करें।
श्लोक 30 (14.10.30)
आग्नेयं वै लोहितमालभन्तां । वैश्वदेवं बहुरूपं हि राजन् । नीलं चोक्षाणं मेध्यमप्यालभन्तां । चलच्छिश्नं सम्प्रदिष्टं द्विजाग्र्याः ॥
āgneyaṃ vai lohitamālabhantāṃ | vaiśvadevaṃ bahurūpaṃ hi rājan | nīlaṃ cokṣāṇaṃ medhyamapyālabhantāṃ | calacchiśnaṃ sampradiṣṭaṃ dvijāgryāḥ
अग्नि के लिए लाल पशु की बलि दी जाए, विश्वेदेवों के लिए अनेक रंगों वाला पशु, हे राजन्; और मेरे निर्देश के अनुसार यज्ञ के योग्य, बलवान् नील वर्ण का बैल भी। हे द्विजश्रेष्ठो, ऐसा ही किया जाए।
व्यास उवाच
श्लोक 31 (14.10.31)
ततो यज्ञो ववृधे तस्य राज- । न्यत्र देवाः स्वयमन्नानि जह्रुः । यस्मिञ्शक्रो ब्राह्मणैः पूज्यमानः । सदस्योऽभूद्धरिमान्देवराजः ॥
tato yajño vavṛdhe tasya rāja- | nyatra devāḥ svayamannāni jahruḥ | yasmiñśakro brāhmaṇaiḥ pūjyamānaḥ | sadasyo'bhūddharimāndevarājaḥ
तब उस राजा का यज्ञ खूब बढ़ा, जहाँ देवताओं ने स्वयं अन्न ग्रहण किया। उसी में ब्राह्मणों से पूजित होकर हरे घोड़ों वाले देवराज शक्र सदस्य बने।
श्लोक 32 (14.10.32)
ततः संवर्तश्चैत्यगतो महात्मा । यथा वह्निः प्रज्वलितो द्वितीयः । हवींष्युच्चैराह्वयन्देवसङ्घा- । ञ्जुहावाग्नौ मन्त्रवत्सुप्रतीतः ॥
tataḥ saṃvartaścaityagato mahātmā | yathā vahniḥ prajvalito dvitīyaḥ | havīṃṣyuccairāhvayandevasaṅghā- | ñjuhāvāgnau mantravatsupratītaḥ
तब महात्मा संवर्त वेदी पर स्थित होकर, दूसरी प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, देवगणों को उच्च स्वर से बुलाते हुए प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रों के साथ अग्नि में हवि डालते गए।
श्लोक 33 (14.10.33)
ततः पीत्वा बलभित्सोममग्र्यं । ये चाप्यन्ये सोमपा देवसङ्घाः । सर्वेऽनुज्ञाताः प्रययुः पार्थिवेन । यथाजोषं तर्पिताः प्रीतिमन्तः ॥
tataḥ pītvā balabhitsomamagryaṃ | ye cāpyanye somapā devasaṅghāḥ | sarve'nujñātāḥ prayayuḥ pārthivena | yathājoṣaṃ tarpitāḥ prītimantaḥ
तब श्रेष्ठ सोम पीकर इन्द्र तथा अन्य सब सोमपायी देवगण राजा की अनुमति पाकर अपनी इच्छा के अनुसार तृप्त और प्रसन्न होकर चले गए।
श्लोक 34 (14.10.34)
ततो राजा जातरूपस्य राशी- । न्पदेपदे कारयामास हृष्टः । द्विजातिभ्यो विसृजन्भूरि वित्तं । रराज वित्तेश इवारिहन्ता ॥
tato rājā jātarūpasya rāśī- | npadepade kārayāmāsa hṛṣṭaḥ | dvijātibhyo visṛjanbhūri vittaṃ | rarāja vitteśa ivārihantā
तब हर्षित राजा ने कदम-कदम पर सोने की राशियाँ लगवाईं और द्विजों को प्रचुर धन देते हुए धनपति कुबेर के समान, शत्रुओं का संहार करने वाले के रूप में शोभित हुआ।
श्लोक 35 (14.10.35)
ततो वित्तं विविधं सन्निधाय । यथोत्साहं कारयित्वा च कोशम् । अनुज्ञातो गुरुणां संनिवृत्त्य । शशास गामखिलां सागरान्ताम् ॥
tato vittaṃ vividhaṃ sannidhāya | yathotsāhaṃ kārayitvā ca kośam | anujñāto guruṇāṃ saṃnivṛttya | śaśāsa gāmakhilāṃ sāgarāntām
फिर अनेक प्रकार का धन एकत्र करके और अपनी इच्छा के अनुसार कोश भरवाकर, गुरुजनों की अनुमति लेकर लौटकर उसने समुद्र तक फैली सारी पृथ्वी पर शासन किया।
श्लोक 36 (14.10.36)
एवंगुणः सम्बभूवेह राजा । यस्य क्रतौ तत्सुवर्णं प्रभूतम् । तत्त्वं समादाय नरेन्द्र वित्तं । यजस्व देवांस्तपनीयैर्विधानैः ॥
evaṃguṇaḥ sambabhūveha rājā | yasya kratau tatsuvarṇaṃ prabhūtam | tattvaṃ samādāya narendra vittaṃ | yajasva devāṃstapanīyairvidhānaiḥ
ऐसा गुणवान् राजा यहाँ हुआ था, जिसके यज्ञ में वह प्रचुर सोना रह गया। हे नरेन्द्र, उस धन को लेकर स्वर्णमय विधानों से देवताओं का यज्ञ करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (14.10.37)
ततो राजा पाण्डवो हृष्टरूपः । श्रुत्वा वाक्यं सत्यवत्याः सुतस्य । मनश्चक्रे तेन वित्तेन यष्टुं । ततोऽमात्यैर्मन्त्रयामास भूयः ॥
tato rājā pāṇḍavo hṛṣṭarūpaḥ | śrutvā vākyaṃ satyavatyāḥ sutasya | manaścakre tena vittena yaṣṭuṃ | tato'mātyairmantrayāmāsa bhūyaḥ
तब पाण्डव राजा सत्यवती-पुत्र के वचन सुनकर प्रसन्न हुए और उसी धन से यज्ञ करने का निश्चय किया, और फिर मन्त्रियों से परामर्श किया।