आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 11
कृष्ण द्वारा इन्द्र और वृत्र की कथा
व्यास के बोल चुकने पर कृष्ण निराश युधिष्ठिर से कहते हैं कि उनका असली कार्य अभी पूरा नहीं हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने ही शरीर में रहने वाले शत्रु को नहीं पहचाना। वे इन्द्र और वृत्र के प्राचीन युद्ध की कथा सुनाते हैं: वृत्र ने क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को व्याप्त करके उनके विषय छीने और हर बार इन्द्र के वज्र से आहत हुआ, अन्त में वह स्वयं इन्द्र में प्रविष्ट हो गया। मोहग्रस्त इन्द्र को वसिष्ठ ने रथन्तर साम से जगाया और तब इन्द्र ने शरीर में बैठे वृत्र को मार डाला।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (14.11.1)
इत्युक्ते नृपतौ तस्मिन्व्यासेनाद्भुतकर्मणा । वासुदेवो महातेजास्ततो वचनमाददे ॥
ityukte nṛpatau tasminvyāsenādbhutakarmaṇā | vāsudevo mahātejāstato vacanamādade
अद्भुत कर्म वाले व्यास के राजा से इस प्रकार कहने पर महातेजस्वी वासुदेव ने तब वचन आरम्भ किया।
श्लोक 2 (14.11.2)
तं नृपं दीनमनसं निहतज्ञातिबान्धवम् । उपप्लुतमिवादित्यं सधूममिव पावकम् ॥
taṃ nṛpaṃ dīnamanasaṃ nihatajñātibāndhavam | upaplutamivādityaṃ sadhūmamiva pāvakam
उन्होंने देखा कि राजा का मन दुःख में डूबा है और उनके जाति-बन्धु मारे जा चुके हैं; वे ग्रहण-ग्रस्त सूर्य या धुएँ से घिरी अग्नि के समान लग रहे थे।
श्लोक 3 (14.11.3)
निर्विण्णमनसं पार्थं ज्ञात्वा वृष्णिकुलोद्वहः । आश्वासयन्धर्मसुतं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥
nirviṇṇamanasaṃ pārthaṃ jñātvā vṛṣṇikulodvahaḥ | āśvāsayandharmasutaṃ pravaktumupacakrame
पृथापुत्र को निराश मन वाला जानकर वृष्णिकुल के धुरन्धर कृष्ण धर्मपुत्र को सान्त्वना देते हुए बोलने लगे।
वासुदेव उवाच
श्लोक 4 (14.11.4)
सर्वं जिह्मं मृत्युपदमजिह्मं ब्रह्मणः पदम् । एतावान्ज्ञानविषयः किं प्रलापः करिष्यति ॥
sarvaṃ jihmaṃ mṛtyupadamajihmaṃ brahmaṇaḥ padam | etāvānjñānaviṣayaḥ kiṃ pralāpaḥ kariṣyati
जो कुछ कुटिल है वह मृत्यु का मार्ग है, जो सरल है वह ब्रह्म का मार्ग है। ज्ञान का विषय बस इतना ही है; व्यर्थ की बातें क्या कर पाएँगी?
श्लोक 5 (14.11.5)
नैव तेऽनुष्ठितं कर्म नैव ते शत्रवो जिताः । कथं शत्रुं शरीरस्थमात्मनो नावबुध्यसे ॥
naiva te'nuṣṭhitaṃ karma naiva te śatravo jitāḥ | kathaṃ śatruṃ śarīrasthamātmano nāvabudhyase
तुम्हारा कार्य पूरा नहीं हुआ है और तुम्हारे शत्रु भी जीते नहीं गए हैं। तुम अपने ही शरीर में रहने वाले शत्रु को क्यों नहीं पहचानते?
श्लोक 6 (14.11.6)
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथाधर्मं यथाश्रुतम् । इन्द्रस्य सह वृत्रेण यथा युद्धमवर्तत ॥
atra te vartayiṣyāmi yathādharmaṃ yathāśrutam | indrasya saha vṛtreṇa yathā yuddhamavartata
इस विषय में मैं तुम्हें धर्म के अनुसार और जैसा मैंने सुना है वैसा बताऊँगा, कि इन्द्र और वृत्र का युद्ध कैसे हुआ था।
श्लोक 7 (14.11.7)
वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता पुरा किल नराधिप । दृष्ट्वा स पृथिवीं व्याप्तां गन्धस्य विषये हृते । धराहरणदुर्गन्धो विषयः समपद्यत ॥
vṛtreṇa pṛthivī vyāptā purā kila narādhipa | dṛṣṭvā sa pṛthivīṃ vyāptāṃ gandhasya viṣaye hṛte | dharāharaṇadurgandho viṣayaḥ samapadyata
हे नराधिप, पूर्वकाल में वृत्र ने पृथ्वी को व्याप्त कर लिया था। पृथ्वी को व्याप्त हुआ देखकर, उसका गन्ध-विषय छिन जाने पर, पृथ्वी के हर लिए जाने से वह विषय दुर्गन्धमय हो गया।
श्लोक 8 (14.11.8)
शतक्रतुश्चुकोपाथ गन्धस्य विषये हृते । वृत्रस्य स ततः क्रुद्धो घोरं वज्रमवासृजत् ॥
śatakratuścukopātha gandhasya viṣaye hṛte | vṛtrasya sa tataḥ kruddho ghoraṃ vajramavāsṛjat
तब गन्ध-विषय के छिन जाने पर शतक्रतु क्रोधित हुए और रोष में उन्होंने वृत्र पर अपना भयंकर वज्र छोड़ा।
श्लोक 9 (14.11.9)
स वध्यमानो वज्रेण सुभृशं भूरितेजसा । विवेश सहसा तोयं जग्राह विषयं ततः ॥
sa vadhyamāno vajreṇa subhṛśaṃ bhūritejasā | viveśa sahasā toyaṃ jagrāha viṣayaṃ tataḥ
महातेजस्वी वज्र के भारी प्रहार से आहत होकर वृत्र सहसा जल में घुस गया और उसके विषय को पकड़ लिया।
श्लोक 10 (14.11.10)
अप्सु वृत्रगृहीतासु रसे च विषये हृते । शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ॥
apsu vṛtragṛhītāsu rase ca viṣaye hṛte | śatakraturatikruddhastatra vajramavāsṛjat
जब वृत्र ने जल को पकड़ लिया और रस का विषय छिन गया, तब अत्यन्त क्रुद्ध शतक्रतु ने वहाँ उस पर वज्र छोड़ा।
श्लोक 11 (14.11.11)
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा । विवेश सहसा ज्योतिर्जग्राह विषयं ततः ॥
sa vadhyamāno vajreṇa tasminnamitatejasā | viveśa sahasā jyotirjagrāha viṣayaṃ tataḥ
असीम तेज वाले उस वज्र से आहत होकर वह सहसा अग्नि में घुस गया और उसके विषय को पकड़ लिया।
श्लोक 12 (14.11.12)
व्याप्ते ज्योतिषि वृत्रेण रूपेऽथ विषये हृते । शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ॥
vyāpte jyotiṣi vṛtreṇa rūpe'tha viṣaye hṛte | śatakraturatikruddhastatra vajramavāsṛjat
जब अग्नि को वृत्र ने व्याप्त कर लिया और रूप का विषय छिन गया, तब अत्यन्त क्रुद्ध शतक्रतु ने वहाँ वज्र छोड़ा।
श्लोक 13 (14.11.13)
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा । विवेश सहसा वायुं जग्राह विषयं ततः ॥
sa vadhyamāno vajreṇa tasminnamitatejasā | viveśa sahasā vāyuṃ jagrāha viṣayaṃ tataḥ
असीम तेज वाले उस वज्र से आहत होकर वह सहसा वायु में घुस गया और उसके विषय को पकड़ लिया।
श्लोक 14 (14.11.14)
व्याप्ते वायौ तु वृत्रेण स्पर्शेऽथ विषये हृते । शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ॥
vyāpte vāyau tu vṛtreṇa sparśe'tha viṣaye hṛte | śatakraturatikruddhastatra vajramavāsṛjat
जब वायु को वृत्र ने व्याप्त कर लिया और स्पर्श का विषय छिन गया, तब अत्यन्त क्रुद्ध शतक्रतु ने वहाँ वज्र छोड़ा।
श्लोक 15 (14.11.15)
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा । आकाशमभिदुद्राव जग्राह विषयं ततः ॥
sa vadhyamāno vajreṇa tasminnamitatejasā | ākāśamabhidudrāva jagrāha viṣayaṃ tataḥ
असीम तेज वाले उस वज्र से आहत होकर वह आकाश की ओर भागा और उसके विषय को पकड़ लिया।
श्लोक 16 (14.11.16)
आकाशे वृत्रभूतेऽथ शब्दे च विषये हृते । शतक्रतुरभिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ॥
ākāśe vṛtrabhūte'tha śabde ca viṣaye hṛte | śatakraturabhikruddhastatra vajramavāsṛjat
जब आकाश वृत्र का रूप हो गया और शब्द का विषय छिन गया, तब अत्यन्त कुपित शतक्रतु ने वहाँ वज्र छोड़ा।
श्लोक 17 (14.11.17)
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा । विवेश सहसा शक्रं जग्राह विषयं ततः ॥
sa vadhyamāno vajreṇa tasminnamitatejasā | viveśa sahasā śakraṃ jagrāha viṣayaṃ tataḥ
असीम तेज वाले उस वज्र से आहत होकर वह सहसा स्वयं शक्र में घुस गया और उसके विषय को पकड़ लिया।
श्लोक 18 (14.11.18)
तस्य वृत्रगृहीतस्य मोहः समभवन्महान् । रथन्तरेण तं साम्ना वसिष्ठः प्रत्यबोधयत् ॥
tasya vṛtragṛhītasya mohaḥ samabhavanmahān | rathantareṇa taṃ sāmnā vasiṣṭhaḥ pratyabodhayat
वृत्र से ग्रस्त होने पर इन्द्र को भारी मोह हो गया; वसिष्ठ ने रथन्तर साम से उन्हें जगाया।
श्लोक 19 (14.11.19)
ततो वृत्रं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ । शतक्रतुरदृश्येन वज्रेणेतीह नः श्रुतम् ॥
tato vṛtraṃ śarīrasthaṃ jaghāna bharatarṣabha | śatakraturadṛśyena vajreṇetīha naḥ śrutam
तब हे भरतश्रेष्ठ, शतक्रतु ने शरीर में बैठे वृत्र को अदृश्य वज्र से मार डाला: ऐसा हमने यहाँ सुना है।
श्लोक 20 (14.11.20)
इदं धर्म्यं रहस्यं वै शक्रेणोक्तं महर्षिषु । ऋषिभिश्च मम प्रोक्तं तन्निबोध जनाधिप ॥
idaṃ dharmyaṃ rahasyaṃ vai śakreṇoktaṃ maharṣiṣu | ṛṣibhiśca mama proktaṃ tannibodha janādhipa
यह धर्म का रहस्य है, जो शक्र ने महर्षियों के बीच कहा था और ऋषियों ने मुझे बताया। हे जनाधिप, इसे सुनो।