आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 12
कृष्ण: दो प्रकार के रोग और भीतर का युद्ध
कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि रोग दो प्रकार का होता है, शारीरिक और मानसिक, जो एक-दूसरे को जन्म देते हैं, और स्वास्थ्य शरीर के गुणों तथा आत्मा के तीन गुणों की समता में है। वे बताते हैं कि युधिष्ठिर इस समय पीड़ा में न होते हुए भी शोक को याद करते हैं, पर अपने साथ हुए अन्यायों को याद नहीं करना चाहते। अब उनके सामने जो युद्ध है वह केवल मन से लड़ा जाने वाला है, और प्राणियों के आने-जाने को समझकर उन्हें अपने पूर्वजों की भाँति राज्य करना चाहिए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (14.12.1)
द्विविधो जायते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा । परस्परं तयोर्जन्म निर्द्वन्द्वं नोपपद्यते ॥
dvividho jāyate vyādhiḥ śārīro mānasastathā | parasparaṃ tayorjanma nirdvandvaṃ nopapadyate
रोग दो प्रकार का उत्पन्न होता है, शारीरिक और मानसिक। इन दोनों का जन्म एक-दूसरे से होता है; दोनों अलग-अलग नहीं होते।
श्लोक 2 (14.12.2)
शरीरे जायते व्याधिः शारीरः स निगद्यते । मानसे जायते व्याधिर्मानसस्तु निगद्यते ॥
śarīre jāyate vyādhiḥ śārīraḥ sa nigadyate | mānase jāyate vyādhirmānasastu nigadyate
जो रोग शरीर में उत्पन्न होता है वह शारीरिक कहलाता है और जो मन में उत्पन्न होता है वह मानसिक कहलाता है।
श्लोक 3 (14.12.3)
शीतोष्णे चैव वायुश्च गुणा राजञ्शरीरजाः । तेषां गुणानां साम्यं चेत्तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ॥
śītoṣṇe caiva vāyuśca guṇā rājañśarīrajāḥ | teṣāṃ guṇānāṃ sāmyaṃ cettadāhuḥ svasthalakṣaṇam
हे राजन्, शीत, उष्ण और वायु ये शरीर से उत्पन्न होने वाले गुण हैं। यदि इन गुणों में समता हो, तो उसे स्वस्थ होने का लक्षण कहते हैं।
श्लोक 4 (14.12.4)
उष्णेन बाध्यते शीतं शीतेनोष्णं च बाध्यते । उभाभ्यां बध्यते वायुर्विधानमिदमुच्यते ॥
uṣṇena bādhyate śītaṃ śītenoṣṇaṃ ca bādhyate | ubhābhyāṃ badhyate vāyurvidhānamidamucyate
उष्णता से शीत दब जाता है और शीत से उष्णता दब जाती है; दोनों से वायु रुक जाता है। यही उपाय बताया जाता है।
श्लोक 5 (14.12.5)
सत्वं रजस्तमश्चेति त्रय आत्मगुणाः स्मृताः । तेषां गुणानां साम्यं चेत्तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ॥
satvaṃ rajastamaśceti traya ātmaguṇāḥ smṛtāḥ | teṣāṃ guṇānāṃ sāmyaṃ cettadāhuḥ svasthalakṣaṇam
सत्त्व, रजस् और तमस् ये आत्मा के तीन गुण कहे गए हैं। यदि इन गुणों में समता हो, तो उसे स्वस्थ होने का लक्षण कहते हैं।
श्लोक 6 (14.12.6)
तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिश्यते । हर्षेण बाध्यते शोको हर्षः शोकेन बाध्यते ॥
teṣāmanyatamotseke vidhānamupadiśyate | harṣeṇa bādhyate śoko harṣaḥ śokena bādhyate
जब इनमें से कोई एक बढ़ जाता है, तब उसका उपाय बताया जाता है। हर्ष से शोक दब जाता है और शोक से हर्ष दब जाता है।
श्लोक 7 (14.12.7)
कश्चिद्दुःखे वर्तमानः सुखस्य स्मर्तुमिच्छति । कश्चित्सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति ॥
kaścidduḥkhe vartamānaḥ sukhasya smartumicchati | kaścitsukhe vartamāno duḥkhasya smartumicchati
कोई दुःख में पड़ा हुआ सुख को याद करना चाहता है और कोई सुख में रहता हुआ दुःख को याद करना चाहता है।
श्लोक 8 (14.12.8)
स त्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी सुसुखस्य वा । स्मर्तुमिच्छसि कौन्तेय दैवं हि बलवत्तरम् । अथवा ते स्वभावोऽयं येन पार्थावकृष्यसे ॥
sa tvaṃ na duḥkhī duḥkhasya na sukhī susukhasya vā | smartumicchasi kaunteya daivaṃ hi balavattaram | athavā te svabhāvo'yaṃ yena pārthāvakṛṣyase
हे कुन्तीपुत्र, तुम इस समय दुःखी न होते हुए भी दुःख को याद करना चाहते हो और बहुत सुखी न होते हुए भी सुख को; क्योंकि दैव बलवान् है। अथवा हे पार्थ, यही तुम्हारा स्वभाव है, जिससे तुम खिंचे चले जाते हो।
श्लोक 9 (14.12.9)
दृष्ट्वा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम् । मिषतां पाण्डवेयानां न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥
dṛṣṭvā sabhāgatāṃ kṛṣṇāmekavastrāṃ rajasvalām | miṣatāṃ pāṇḍaveyānāṃ na tasya smartumicchasi
उसे तुम याद करना नहीं चाहते: जब रजस्वला कृष्णा एक वस्त्र में सभा में लाई गई थी और पाण्डव देखते रहे।
श्लोक 10 (14.12.10)
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च विवासनम् । महारण्यनिवासश्च न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥
pravrājanaṃ ca nagarādajinaiśca vivāsanam | mahāraṇyanivāsaśca na tasya smartumicchasi
नगर से तुम्हारा निकाला जाना, मृगचर्म पहनाकर निर्वासित किया जाना और महावन में निवास: इन्हें तुम याद करना नहीं चाहते।
श्लोक 11 (14.12.11)
जटासुरात्परिक्लेशश्चित्रसेनेन चाहवः । सैन्धवाच्च परिक्लेशो न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥
jaṭāsurātparikleśaścitrasenena cāhavaḥ | saindhavācca parikleśo na tasya smartumicchasi
जटासुर से मिला क्लेश, चित्रसेन के साथ युद्ध और सैन्धव से मिला क्लेश: इन्हें तुम याद करना नहीं चाहते।
श्लोक 12 (14.12.12)
पुनरज्ञातचर्यायां कीचकेन पदा वधः । याज्ञसेन्यास्तथा पार्थ न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥
punarajñātacaryāyāṃ kīcakena padā vadhaḥ | yājñasenyāstathā pārtha na tasya smartumicchasi
और फिर अज्ञातवास में कीचक के पाँव से द्रौपदी पर प्रहार, हे पार्थ: इसे तुम याद करना नहीं चाहते।
श्लोक 13 (14.12.13)
यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम । मनसैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ॥
yacca te droṇabhīṣmābhyāṃ yuddhamāsīdariṃdama | manasaikena yoddhavyaṃ tatte yuddhamupasthitam
हे शत्रुदमन, द्रोण और भीष्म के साथ जो युद्ध तुमने लड़ा था, उसके बाद अब वह युद्ध उपस्थित है जो केवल मन से लड़ा जाना है।
श्लोक 14 (14.12.14)
तस्मादभ्युपगन्तव्यं युद्धाय भरतर्षभ । परमव्यक्तरूपस्य पारं युक्त्या स्वकर्मभिः ॥
tasmādabhyupagantavyaṃ yuddhāya bharatarṣabha | paramavyaktarūpasya pāraṃ yuktyā svakarmabhiḥ
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हें उस युद्ध को स्वीकार करना चाहिए, ताकि उचित उपाय और अपने कर्मों से परम अव्यक्त स्वरूप के पार पहुँच सको।
श्लोक 15 (14.12.15)
यत्र नैव शरैः कार्यं न भृत्यैर्न च बन्धुभिः । आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ॥
yatra naiva śaraiḥ kāryaṃ na bhṛtyairna ca bandhubhiḥ | ātmanaikena yoddhavyaṃ tatte yuddhamupasthitam
उस युद्ध में न बाणों का, न सेवकों का और न बन्धुओं का काम है; उसे अकेले अपने ही द्वारा लड़ना होता है। वही युद्ध अब तुम्हारे सामने उपस्थित है।
श्लोक 16 (14.12.16)
तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे कामवस्थां गमिष्यसि । एतज्ज्ञात्वा तु कौन्तेय कृतकृत्यो भविष्यसि ॥
tasminnanirjite yuddhe kāmavasthāṃ gamiṣyasi | etajjñātvā tu kaunteya kṛtakṛtyo bhaviṣyasi
यदि वह युद्ध जीता न गया तो तुम किस अवस्था को पहुँचोगे? और हे कौन्तेय, यह जान लेने पर तुम कृतकृत्य हो जाओगे।
श्लोक 17 (14.12.17)
एतां बुद्धिं विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम् । पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम् ॥
etāṃ buddhiṃ viniścitya bhūtānāmāgatiṃ gatim | pitṛpaitāmahe vṛtte śādhi rājyaṃ yathocitam
प्राणियों के आने-जाने के विषय में इस निश्चय पर पहुँचकर, पिता और पितामह के आचरण पर चलते हुए यथोचित रीति से राज्य का शासन करो।