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आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 13

कृष्ण: ममता और काम का गीत

कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि सिद्धि बाहरी वस्तुओं के त्याग से नहीं, 'मेरा' के भाव के त्याग से मिलती है: 'मम' दो अक्षरों की मृत्यु है और 'न मम' शाश्वत ब्रह्म है। वे काम के प्राचीन गीत सुनाते हैं, जिसमें काम कहता है कि उसे किसी उपाय से मारा नहीं जा सकता, क्योंकि वह यज्ञ करने वाले, वेद पढ़ने वाले, धैर्यवान् और तपस्वी में फिर प्रकट हो जाता है, और केवल मोक्ष चाहने वाले पर हँसता है। इसलिए कृष्ण युधिष्ठिर को सलाह देते हैं कि वे बड़े यज्ञों द्वारा काम को धर्म की ओर मोड़ें, मृतकों के लिए शोक छोड़ दें और स्थायी कीर्ति पाएँ।

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वासुदेव उवाच

श्लोक 1 (14.13.1)

न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत । शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ॥

na bāhyaṃ dravyamutsṛjya siddhirbhavati bhārata | śārīraṃ dravyamutsṛjya siddhirbhavati vā na vā

हे भारत, बाहरी वस्तुओं को छोड़ देने से सिद्धि नहीं मिलती; शारीरिक वस्तुओं को छोड़ देने पर सिद्धि मिल भी सकती है और नहीं भी।

श्लोक 2 (14.13.2)

बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृह्यतः । यो धर्मो यत्सुखं चैव द्विषतामस्तु तत्तव ॥

bāhyadravyavimuktasya śārīreṣu ca gṛhyataḥ | yo dharmo yatsukhaṃ caiva dviṣatāmastu tattava

जिसने बाहरी वस्तुएँ छोड़ दी हैं पर शारीरिक वस्तुओं में आसक्त है, उसके लिए जो भी धर्म और जो भी सुख तुम्हारा है, वह तुम्हारे शत्रुओं को मिले।

श्लोक 3 (14.13.3)

द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति द्व्यक्षरो मृत्युर्नममेति च शाश्वतम् ॥

dvyakṣarastu bhavenmṛtyustryakṣaraṃ brahma śāśvatam | mameti dvyakṣaro mṛtyurnamameti ca śāśvatam

मृत्यु दो अक्षरों की है और शाश्वत ब्रह्म तीन अक्षरों का: "मम" (मेरा) दो अक्षरों की मृत्यु है और "न मम" (मेरा नहीं) शाश्वत है।

श्लोक 4 (14.13.4)

ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव व्यवस्थितौ । अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम् ॥

brahmamṛtyū tato rājannātmanyeva vyavasthitau | adṛśyamānau bhūtāni yodhayetāmasaṃśayam

हे राजन्, ब्रह्म और मृत्यु दोनों आत्मा में ही स्थित हैं; वे अदृश्य रहकर प्राणियों को लड़ाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 5 (14.13.5)

अविनाशोऽस्य तत्त्वस्य नियतो यदि भारत । भित्त्वा शरीरं भूतानामहिंसां प्रतिपद्यते ॥

avināśo'sya tattvasya niyato yadi bhārata | bhittvā śarīraṃ bhūtānāmahiṃsāṃ pratipadyate

हे भारत, यदि इस सत्ता की अविनाशिता निश्चित है, तो शरीर का भेदन करके मनुष्य प्राणियों के प्रति अहिंसा को प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (14.13.6)

लब्ध्वा हि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम् । ममत्वं यस्य नैव स्यात्किं तया स करिष्यति ॥

labdhvā hi pṛthivīṃ kṛtsnāṃ sahasthāvarajaṅgamām | mamatvaṃ yasya naiva syātkiṃ tayā sa kariṣyati

चर और अचर सहित सारी पृथ्वी को पा लेने पर भी, यदि उसमें किसी की ममता न हो, तो वह उसका क्या करेगा?

श्लोक 7 (14.13.7)

अथवा वसतः पार्थ वने वन्येन जीवतः । ममता यस्य वित्तेषु मृत्योरास्ये स वर्तते ॥

athavā vasataḥ pārtha vane vanyena jīvataḥ | mamatā yasya vitteṣu mṛtyorāsye sa vartate

अथवा हे पार्थ, जो वन में रहकर वन के कन्द-मूल से जीता है, पर अपनी सम्पत्ति में ममता रखता है, वह मृत्यु के मुख में ही खड़ा है।

श्लोक 8 (14.13.8)

बाह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभावं पश्य भारत । यन्न पश्यति तद्भूतं मुच्यते स महाभयात् ॥

bāhyāntarāṇāṃ śatrūṇāṃ svabhāvaṃ paśya bhārata | yanna paśyati tadbhūtaṃ mucyate sa mahābhayāt

हे भारत, बाहर और भीतर के शत्रुओं का स्वभाव देखो। जो प्राणी उसे नहीं देखता, वह महान् भय से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 9 (14.13.9)

कामात्मानं न प्रशंसन्ति लोके । न चाकामात्का चिदस्ति प्रवृत्तिः । सर्वे कामा मनसोऽङ्गात्प्रसूता । यान्पण्डितः संहरते विचिन्त्य । भूयो भूयो जन्मनोऽभ्यासयोगाद् । योगी योगं सारमार्गं विचिन्त्य ॥

kāmātmānaṃ na praśaṃsanti loke | na cākāmātkā cidasti pravṛttiḥ | sarve kāmā manaso'ṅgātprasūtā | yānpaṇḍitaḥ saṃharate vicintya | bhūyo bhūyo janmano'bhyāsayogād | yogī yogaṃ sāramārgaṃ vicintya

जिसका स्वभाव ही कामना है, उसकी संसार में प्रशंसा नहीं होती; फिर भी बिना कामना के कोई प्रवृत्ति नहीं होती। सब कामनाएँ अपने ही अंग मन से उत्पन्न होती हैं, जिन्हें विचार करके ज्ञानी समेट लेता है। बार-बार के अभ्यास से, जन्म-जन्म में, योगी योग का विचार करके सार-मार्ग को पा लेता है।

श्लोक 10 (14.13.10)

दानं हि वेदाध्ययनं तपश्च । कामेन कर्माणि च वैदिकानि । व्रतं यज्ञान्नियमान्ध्यानयोगान् । कामेन यो नारभते विदित्वा । यद्यद्ध्ययं कामयते स धर्मो । न यो धर्मो नियमस्तस्य मूलम् ॥

dānaṃ hi vedādhyayanaṃ tapaśca | kāmena karmāṇi ca vaidikāni | vrataṃ yajñānniyamāndhyānayogān | kāmena yo nārabhate viditvā | yadyaddhyayaṃ kāmayate sa dharmo | na yo dharmo niyamastasya mūlam

दान, वेद का अध्ययन, तप और वैदिक कर्म सब कामना से ही किए जाते हैं। व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यानयोग को कोई भी यह जानकर बिना कामना के आरम्भ नहीं करता। मनुष्य जिस-जिस की कामना करता है, वही उसके लिए धर्म है; और जो धर्म नहीं है, उसकी जड़ में संयम नहीं होता।

श्लोक 11 (14.13.11)

अत्र गाथाः कामगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । शृणु सङ्कीर्त्यमानास्ता अखिलेन युधिष्ठिर ॥

atra gāthāḥ kāmagītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | śṛṇu saṅkīrtyamānāstā akhilena yudhiṣṭhira

इस विषय में पुरानी बातें जानने वाले काम के गीत गाते हैं। हे युधिष्ठिर, मैं उन्हें पूरा-पूरा सुनाता हूँ, सुनो।

काम उवाच

श्लोक 12 (14.13.12)

नाहं शक्योऽनुपायेन हन्तुं भूतेन केनचित् ॥

nāhaṃ śakyo'nupāyena hantuṃ bhūtena kenacit

कोई भी प्राणी उचित उपाय के बिना मुझे नहीं मार सकता।

श्लोक 13 (14.13.13)

यो मां प्रयतते हन्तुं ज्ञात्वा प्रहरणे बलम् । तस्य तस्मिन्प्रहरणे पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥

yo māṃ prayatate hantuṃ jñātvā praharaṇe balam | tasya tasminpraharaṇe punaḥ prādurbhavāmyaham

जो मुझे मारने का यत्न करता है और प्रहार के बल पर भरोसा रखता है, उसके उसी प्रहार में मैं फिर प्रकट हो जाता हूँ।

श्लोक 14 (14.13.14)

यो मां प्रयतते हन्तुं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः । जङ्गमेष्विव धर्मात्मा पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥

yo māṃ prayatate hantuṃ yajñairvividhadakṣiṇaiḥ | jaṅgameṣviva dharmātmā punaḥ prādurbhavāmyaham

जो अनेक प्रकार की दक्षिणाओं वाले यज्ञों से मुझे मारने का यत्न करता है, उसमें मैं चर प्राणियों के बीच धर्मात्मा की तरह फिर प्रकट हो जाता हूँ।

श्लोक 15 (14.13.15)

यो मां प्रयतते हन्तुं वेदैर्वेदान्तसाधनैः । स्थावरेष्विव भूतात्मा तस्य प्रादुर्भवाम्यहम् ॥

yo māṃ prayatate hantuṃ vedairvedāntasādhanaiḥ | sthāvareṣviva bhūtātmā tasya prādurbhavāmyaham

जो वेदों और वेदान्त के साधनों से मुझे मारने का यत्न करता है, उसमें मैं अचर प्राणियों के बीच भूतात्मा की तरह फिर प्रकट हो जाता हूँ।

श्लोक 16 (14.13.16)

यो मां प्रयतते हन्तुं धृत्या सत्यपराक्रमः । भावो भवामि तस्याहं स च मां नावबुध्यते ॥

yo māṃ prayatate hantuṃ dhṛtyā satyaparākramaḥ | bhāvo bhavāmi tasyāhaṃ sa ca māṃ nāvabudhyate

जो धैर्य से, सत्य पराक्रम वाला होकर मुझे मारने का यत्न करता है, मैं उसका भाव बन जाता हूँ और वह मुझे पहचानता नहीं।

श्लोक 17 (14.13.17)

यो मां प्रयतते हन्तुं तपसा संशितव्रतः । ततस्तपसि तस्याथ पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥

yo māṃ prayatate hantuṃ tapasā saṃśitavrataḥ | tatastapasi tasyātha punaḥ prādurbhavāmyaham

जो कठोर व्रतों वाला होकर तप से मुझे मारने का यत्न करता है, तब उसी के तप में मैं फिर प्रकट हो जाता हूँ।

श्लोक 18 (14.13.18)

यो मां प्रयतते हन्तुं मोक्षमास्थाय पण्डितः । तस्य मोक्षरतिस्थस्य नृत्यामि च हसामि च । अवध्यः सर्वभूतानामहमेकः सनातनः ॥

yo māṃ prayatate hantuṃ mokṣamāsthāya paṇḍitaḥ | tasya mokṣaratisthasya nṛtyāmi ca hasāmi ca | avadhyaḥ sarvabhūtānāmahamekaḥ sanātanaḥ

जो ज्ञानी मोक्ष का आश्रय लेकर मुझे मारने का यत्न करता है, मोक्ष में रमे हुए उस पर मैं नाचता और हँसता हूँ। मैं अकेला सनातन हूँ और किसी भी प्राणी से मारा नहीं जा सकता।

वासुदेव उवाच

श्लोक 19 (14.13.19)

तस्मात्त्वमपि तं कामं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः । धर्मे कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति ॥

tasmāttvamapi taṃ kāmaṃ yajñairvividhadakṣiṇaiḥ | dharme kuru mahārāja tatra te sa bhaviṣyati

इसलिए हे महाराज, तुम भी उस काम को अनेक प्रकार की दक्षिणाओं वाले यज्ञों द्वारा धर्म की ओर मोड़ो; उसमें वह तुम्हारा बन जाएगा।

श्लोक 20 (14.13.20)

मा ते व्यथाऽस्तु निहतान्बन्धून्वीक्ष्य पुनःपुनः । न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं ये हतास्मिन्रणाजिरे ॥

mā te vyathā'stu nihatānbandhūnvīkṣya punaḥpunaḥ | na śakyāste punardraṣṭuṃ ye hatāsminraṇājire

मारे गए बन्धुओं को बार-बार देखकर तुम्हें व्यथा न हो। जो इस रणभूमि में मारे गए, उन्हें फिर देखा नहीं जा सकता।

श्लोक 21 (14.13.21)

स त्वमिष्ट्वा महायज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । कीर्तिं लोके परां प्राप्य गतिमग्र्यां गमिष्यसि ॥

sa tvamiṣṭvā mahāyajñaiḥ samṛddhairāptadakṣiṇaiḥ | kīrtiṃ loke parāṃ prāpya gatimagryāṃ gamiṣyasi

प्रचुर दक्षिणाओं वाले समृद्ध महायज्ञ करके तुम संसार में परम कीर्ति पाकर उत्तम गति को प्राप्त करोगे।

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