भीष्म पर्व · अध्याय 21
जहाँ कृष्ण, वहाँ विजय
भीष्म द्वारा रचे गए विशाल और अभेद्य व्यूह को देखकर युधिष्ठिर का मन बैठ जाता है और वे अर्जुन से पूछते हैं कि वे कैसे जीत सकेंगे। अर्जुन उन्हें आश्वस्त करते हैं कि थोड़े लोग बहुतों को बल से नहीं, बुद्धि और गुणों से जीतते हैं — जैसा ब्रह्मा ने देवताओं को सिखाया था कि लोभ और अहंकार छोड़कर लड़ो, क्योंकि जहाँ धर्म है वहीं विजय है। वे नारद की कही बात भी सुनाते हैं कि विजय दास की भाँति कृष्ण के पीछे चलती है, और जब देवताओं के स्वामी कृष्ण स्वयं उनकी विजय चाहते हैं, तो भय का कोई कारण नहीं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.21.1)
बृहतीं धार्तराष्ट्रस्य सेनां दृष्ट्वा समुद्यताम् । विषादमगमद्राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
bṛhatīṃ dhārtarāṣṭrasya senāṃ dṛṣṭvā samudyatām | viṣādamagamadrājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ
धृतराष्ट्र के पुत्र की विशाल सेना को युद्ध के लिए तैयार देखकर कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर विषाद में डूब गए।
श्लोक 2 (6.21.2)
व्यूहं भीष्मेण चाभेद्यं कल्पितं प्रेक्ष्य पाण्डवः । अभेद्यमिव संप्रेक्ष्य विवर्णोऽर्जुनमब्रवीत् ॥
vyūhaṃ bhīṣmeṇa cābhedyaṃ kalpitaṃ prekṣya pāṇḍavaḥ | abhedyamiva saṃprekṣya vivarṇo'rjunamabravīt
भीष्म द्वारा रचे गए व्यूह को अभेद्य देखकर, और उसे मानो तोड़ा ही न जा सके ऐसा समझकर, उदास और फीके पड़े पाण्डुपुत्र ने अर्जुन से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (6.21.3)
धनञ्जय कथं शक्यमस्माभिर्योद्धुमाहवे । धार्तराष्ट्रैर्महाबाहो येषां योद्धा पितामहः ॥
dhanañjaya kathaṃ śakyamasmābhiryoddhumāhave | dhārtarāṣṭrairmahābāho yeṣāṃ yoddhā pitāmahaḥ
"हे महाबाहु धनंजय, जिनकी ओर से पितामह लड़ रहे हैं, उन धृतराष्ट्र-पुत्रों से हम युद्ध में कैसे लड़ सकते हैं?
श्लोक 4 (6.21.4)
अक्षोभ्योऽयमभेद्यश्च भीष्मेणामित्रकर्षिणा । कल्पितः शास्त्रदृष्टेन विधिना भूरिवर्चसा ॥
akṣobhyo'yamabhedyaśca bhīṣmeṇāmitrakarṣiṇā | kalpitaḥ śāstradṛṣṭena vidhinā bhūrivarcasā
यह अक्षोभ्य और अभेद्य व्यूह शत्रुओं को पीड़ित करने वाले, अत्यन्त तेजस्वी भीष्म ने शास्त्रों में देखी गई विधि से रचा है।
श्लोक 5 (6.21.5)
ते वयं संशयं प्राप्ताः ससैन्याः शत्रुकर्षण । कथमस्मान्महाव्यूहादुत्थानं नो भविष्यति ॥
te vayaṃ saṃśayaṃ prāptāḥ sasainyāḥ śatrukarṣaṇa | kathamasmānmahāvyūhādutthānaṃ no bhaviṣyati
हे शत्रुसंहारक, हम अपनी सेना सहित संकट में पड़ गए हैं। इस महाव्यूह से हम कैसे उबर पाएँगे?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (6.21.6)
अथार्जुनोऽब्रवीत्पार्थं युधिष्ठिरममित्रहा । विषण्णमिव संप्रेक्ष्य तव राजन्ननीकिनीम् ॥
athārjuno'bravītpārthaṃ yudhiṣṭhiramamitrahā | viṣaṇṇamiva saṃprekṣya tava rājannanīkinīm
हे राजन्, तब शत्रुहन्ता अर्जुन ने तुम्हारी सेना को देखकर मानो उदास हुए पार्थ युधिष्ठिर से कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 7 (6.21.7)
प्रज्ञयाभ्यधिकाञ्शूरान्गुणयुक्तान्बहूनपि । जयन्त्यल्पतरा येन तन्निबोध विशांपते ॥
prajñayābhyadhikāñśūrānguṇayuktānbahūnapi | jayantyalpatarā yena tannibodha viśāṃpate
"हे प्रजापालक, सुनो — किस उपाय से थोड़े लोग बुद्धि में बढ़े-चढ़े और गुणों से युक्त बहुत-से शूरवीरों को भी जीत लेते हैं।
श्लोक 8 (6.21.8)
तत्र ते कारणं राजन्प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । नारदस्तमृषिर्वेद भीष्मद्रोणौ च पाण्डव ॥
tatra te kāraṇaṃ rājanpravakṣyāmyanasūyave | nāradastamṛṣirveda bhīṣmadroṇau ca pāṇḍava
हे राजन्, तुम दोषदृष्टि से रहित हो, इसलिए मैं तुम्हें इसका कारण बताता हूँ। हे पाण्डुनन्दन, इसे नारद ऋषि जानते हैं, और भीष्म तथा द्रोण भी।
श्लोक 9 (6.21.9)
एनमेवार्थमाश्रित्य युद्धे देवासुरेऽब्रवीत् । पितामहः किल पुरा महेन्द्रादीन्दिवौकसः ॥
enamevārthamāśritya yuddhe devāsure'bravīt | pitāmahaḥ kila purā mahendrādīndivaukasaḥ
कहते हैं, प्राचीन काल में देवासुर-संग्राम के समय इसी विषय को लेकर पितामह (ब्रह्मा) ने महेन्द्र आदि स्वर्गवासियों से कहा था —
पितामह उवाच
श्लोक 10 (6.21.10)
न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः । यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च ॥
na tathā balavīryābhyāṃ jayanti vijigīṣavaḥ | yathā satyānṛśaṃsyābhyāṃ dharmeṇaivodyamena ca
'विजय चाहने वाले बल और पराक्रम से उतना नहीं जीतते, जितना सत्य और दया से, धर्म से और उद्यम से जीतते हैं।
श्लोक 11 (6.21.11)
त्यक्त्वाऽधर्मं तथा सर्वे धर्मं चोत्तममास्थिताः । युध्यध्वमनहंकारा यतो धर्मस्ततो जयः ॥
tyaktvā'dharmaṃ tathā sarve dharmaṃ cottamamāsthitāḥ | yudhyadhvamanahaṃkārā yato dharmastato jayaḥ
तुम सब अधर्म को त्यागकर और उत्तम धर्म का आश्रय लेकर, अहंकार छोड़कर युद्ध करो; जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।'
अर्जुन उवाच
श्लोक 12 (6.21.12)
एवं राजन्विजानीहि ध्रुवोऽस्माकं रणे जयः । यथा तु नारदः प्राह यतः कृष्णस्ततो जयः ॥
evaṃ rājanvijānīhi dhruvo'smākaṃ raṇe jayaḥ | yathā tu nāradaḥ prāha yataḥ kṛṣṇastato jayaḥ
हे राजन्, ऐसा ही समझो — युद्ध में हमारी विजय निश्चित है। क्योंकि जैसा नारद ने कहा है, जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विजय है।
श्लोक 13 (6.21.13)
गुणभूतो जयः कृष्णे पृष्ठतोऽभ्येति माधवम् । तद्यथा विजयश्चास्य सन्नतिश्चापरो गुणः ॥
guṇabhūto jayaḥ kṛṣṇe pṛṣṭhato'bhyeti mādhavam | tadyathā vijayaścāsya sannatiścāparo guṇaḥ
विजय कृष्ण का सेवक-सा गुण है; वह माधव के पीछे-पीछे चलती है। और जैसे विजय उनकी है, वैसे ही विनम्रता उनका दूसरा गुण है।
श्लोक 14 (6.21.14)
अनन्ततेजा गोविन्दः शत्रुपूगेषु निर्व्यथः । पुरुषः सनातनमयो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥
anantatejā govindaḥ śatrupūgeṣu nirvyathaḥ | puruṣaḥ sanātanamayo yataḥ kṛṣṇastato jayaḥ
अनन्त तेज वाले गोविन्द शत्रुओं के समूहों के बीच भी अविचलित रहते हैं; वे सनातन पुरुष हैं — जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विजय है।
श्लोक 15 (6.21.15)
पुरा ह्येष हरिर्भूत्वा विकुण्ठोऽकुण्ठसायकः । सुरासुरानवस्फूर्जन्नब्रवीत्के जयन्त्विति ॥
purā hyeṣa harirbhūtvā vikuṇṭho'kuṇṭhasāyakaḥ | surāsurānavasphūrjannabravītke jayantviti
प्राचीन काल में इन्हीं अकुण्ठित बाणों वाले विकुण्ठ ने हरि रूप धारण करके देवताओं और असुरों के सामने गर्जना करते हुए पूछा था — 'कौन जीतेगा?'
श्लोक 16 (6.21.16)
अनु कृष्णं जयेमेति यैरुक्तं तत्र तैर्जितम् । तत्प्रसादाद्धि त्रैलोक्यं प्राप्तं शक्रादिभिः सुरैः ॥
anu kṛṣṇaṃ jayemeti yairuktaṃ tatra tairjitam | tatprasādāddhi trailokyaṃ prāptaṃ śakrādibhiḥ suraiḥ
जिन्होंने कहा — 'हम कृष्ण के अनुगामी होकर जीतेंगे,' उन्हीं की वहाँ जीत हुई; और उन्हीं की कृपा से इन्द्र आदि देवताओं ने तीनों लोक प्राप्त किए।
श्लोक 17 (6.21.17)
तस्य ते न व्यथां कांचिदिह पश्यामि भारत । यस्य ते जयमाशास्ते विश्वभुक् त्रिदिवेश्वरः ॥
tasya te na vyathāṃ kāṃcidiha paśyāmi bhārata | yasya te jayamāśāste viśvabhuk tridiveśvaraḥ
इसलिए, हे भारत, मुझे यहाँ तुम्हारे लिए किसी व्यथा का कारण नहीं दिखता, क्योंकि सबके भोक्ता, देवताओं के स्वामी स्वयं तुम्हारी विजय चाहते हैं।"