भीष्म पर्व · अध्याय 22
पाण्डव सेना का युद्ध के लिए प्रस्थान
सञ्जय बताते हैं कि युधिष्ठिर ने भीष्म के व्यूह के सामने पाण्डव सेना को कैसे सजाया — बीच में अर्जुन से रक्षित शिखण्डी की टुकड़ी, आगे भीमसेन से रक्षित धृष्टद्युम्न, और दाहिनी ओर सात्यकि। ब्राह्मणों के आशीर्वाद और दान के बीच युधिष्ठिर ठाठ से निकलते हैं, कृष्ण के हाथ में लगाम लिए अर्जुन का रथ दमकता है, और भीम को देखकर कौरव योद्धा काँप उठते हैं। कृष्ण अर्जुन को भीष्म दिखाकर कहते हैं कि पहले पितामह को घेरे हुई इन सेनाओं को मारो, फिर उनसे युद्ध की इच्छा करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.22.1)
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वां सेनां समचोदयत् । प्रतिव्यूहन्ननीकानि भीष्मस्य भरतर्षभ ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā svāṃ senāṃ samacodayat | prativyūhannanīkāni bhīṣmasya bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, तब राजा युधिष्ठिर ने भीष्म के व्यूह के उत्तर में अपनी सेनाओं को व्यूह में सजाते हुए अपनी सेना को आगे बढ़ाया।
श्लोक 2 (6.22.2)
यथोद्दिष्टान्यनीकानि प्रत्यव्यूहन्त पाण्डवाः । स्वर्गं परममिच्छन्तः सुयुद्धेन कुरूद्वहाः ॥
yathoddiṣṭānyanīkāni pratyavyūhanta pāṇḍavāḥ | svargaṃ paramamicchantaḥ suyuddhena kurūdvahāḥ
कुरुवंश के श्रेष्ठ पाण्डवों ने, धर्मयुद्ध के द्वारा परम स्वर्ग की कामना करते हुए, जैसा निर्दिष्ट था वैसे ही अपनी सेनाओं को व्यूह में खड़ा किया।
श्लोक 3 (6.22.3)
मध्ये शिखण्डिनोऽनीकं रक्षितं सव्यसाचिना । धृष्टद्युम्नश्चरन्नग्रे भीमसेनेन पालितः ॥
madhye śikhaṇḍino'nīkaṃ rakṣitaṃ savyasācinā | dhṛṣṭadyumnaścarannagre bhīmasenena pālitaḥ
बीच में शिखण्डी की सेना थी, जिसकी रक्षा सव्यसाची अर्जुन कर रहे थे; धृष्टद्युम्न आगे-आगे चल रहे थे और भीमसेन उनकी रक्षा कर रहे थे।
श्लोक 4 (6.22.4)
अनीकं दक्षिणं राजन्युयुधानेन पालितम् । श्रीमता सात्वताग्र्येण शक्रेणेव धनुष्मता ॥
anīkaṃ dakṣiṇaṃ rājanyuyudhānena pālitam | śrīmatā sātvatāgryeṇa śakreṇeva dhanuṣmatā
हे राजन्, दाहिनी ओर की सेना की रक्षा सात्वतों में श्रेष्ठ, इन्द्र के समान धनुर्धर, तेजस्वी युयुधान (सात्यकि) कर रहे थे।
श्लोक 5 (6.22.5)
महेन्द्रयानप्रतिमं रथं तु । सोपस्करं हाटकरत्नचित्रम् । युधिष्ठिरः काञ्चनभाण्डयोक्त्रं । समास्थितो नागबलस्य मध्ये ॥
mahendrayānapratimaṃ rathaṃ tu | sopaskaraṃ hāṭakaratnacitram | yudhiṣṭhiraḥ kāñcanabhāṇḍayoktraṃ | samāsthito nāgabalasya madhye
महेन्द्र के विमान के समान, सब उपकरणों से युक्त, सोने और रत्नों से चित्रित, सोने के साज़ और जोतों वाले रथ पर बैठे युधिष्ठिर गजसेना के बीच खड़े थे।
श्लोक 6 (6.22.6)
समुच्छ्रितं दन्तशलाकमस्य । सुपाण्डुरं छत्रमतीव भाति । प्रदक्षिणं चैनमुपाचरन्त । महर्षयः संस्तुतिभिर्महेन्द्रम् ॥
samucchritaṃ dantaśalākamasya | supāṇḍuraṃ chatramatīva bhāti | pradakṣiṇaṃ cainamupācaranta | maharṣayaḥ saṃstutibhirmahendram
उनका हाथीदाँत की तीलियों वाला, ऊँचा और अत्यन्त श्वेत छत्र बहुत शोभा पा रहा था। महर्षि स्तुतियों के साथ उनकी प्रदक्षिणा कर रहे थे, जैसे वे महेन्द्र की करते हैं।
श्लोक 7 (6.22.7)
पुरोहिताः शत्रुवधं वदन्तो । ब्रह्मर्षिसिद्धाः श्रुतवन्त एनम् । जप्यैश्च मन्त्रैश्च महौषधीभिः । समन्ततः स्वस्त्ययनं ब्रुवन्तः ॥
purohitāḥ śatruvadhaṃ vadanto | brahmarṣisiddhāḥ śrutavanta enam | japyaiśca mantraiśca mahauṣadhībhiḥ | samantataḥ svastyayanaṃ bruvantaḥ
पुरोहित तथा वेदज्ञ ब्रह्मर्षि और सिद्ध शत्रुओं के वध की बात कहते हुए जप, मन्त्रों और महौषधियों के साथ चारों ओर से उनके लिए स्वस्तिवाचन कर रहे थे।
श्लोक 8 (6.22.8)
ततः स वस्त्राणि तथैव गाश्च । फलानि पुष्पाणि तथैव निष्कान् । कुरूत्तमो ब्राह्मणसान्महात्मा । कुर्वन्ययौ शक्र इवामरेशः ॥
tataḥ sa vastrāṇi tathaiva gāśca | phalāni puṣpāṇi tathaiva niṣkān | kurūttamo brāhmaṇasānmahātmā | kurvanyayau śakra ivāmareśaḥ
तब कुरुश्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिर ब्राह्मणों को वस्त्र, गौएँ, फल, फूल और स्वर्णमुद्राएँ दान करते हुए देवराज इन्द्र की भाँति आगे बढ़े।
श्लोक 9 (6.22.9)
सहस्रसूर्यः शतकिङ्किणीकः । परार्ध्यजाम्बूनदहेमचित्रः । रथोऽर्जुनस्याग्निरिवार्चिमाली । विभ्राजते श्वेतहयः सुचक्रः ॥
sahasrasūryaḥ śatakiṅkiṇīkaḥ | parārdhyajāmbūnadahemacitraḥ | ratho'rjunasyāgnirivārcimālī | vibhrājate śvetahayaḥ sucakraḥ
सूर्य के समान चमकते सहस्र दर्पणों और सौ घण्टियों से युक्त, श्रेष्ठ जाम्बूनद सोने से चित्रित, श्वेत घोड़ों और सुन्दर पहियों वाला अर्जुन का रथ ज्वालाओं से घिरी अग्नि के समान दमक रहा था।
श्लोक 10 (6.22.10)
तमास्थितः केशवसंगृहीतं । कपिध्वजो गाण्डिवबाणपाणिः । धनुर्धरो यस्य समः पृथिव्यां । न विद्यते नो भविता कदाचित् ॥
tamāsthitaḥ keśavasaṃgṛhītaṃ | kapidhvajo gāṇḍivabāṇapāṇiḥ | dhanurdharo yasya samaḥ pṛthivyāṃ | na vidyate no bhavitā kadācit
केशव जिसकी लगाम थामे थे, उस रथ पर हाथ में गाण्डीव और बाण लिए कपिध्वज अर्जुन विराजमान थे — ऐसे धनुर्धर, जिनके समान पृथ्वी पर न कोई है, न कभी होगा।
श्लोक 11 (6.22.11)
उद्वर्तयिष्यंस्तव पुत्रसेना- । मतीव रौद्रं स बिभर्ति रूपम् । अनायुधो यः सुभुजो भुजाभ्यां । नराश्वनागान्युधि भस्म कुर्यात् ॥
udvartayiṣyaṃstava putrasenā- | matīva raudraṃ sa bibharti rūpam | anāyudho yaḥ subhujo bhujābhyāṃ | narāśvanāgānyudhi bhasma kuryāt
आपके पुत्र की सेना को उलट देने को उद्यत वह अत्यन्त भयंकर रूप धारण किए हुए है — वह सुदृढ़ भुजाओं वाला वीर, जो बिना शस्त्र के भी युद्ध में अपनी दोनों भुजाओं से मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों को भस्म कर सकता है।
श्लोक 12 (6.22.12)
स भीमसेनः सहितो यमाभ्यां । वृकोदरो वीररथस्य गोप्ता । तं तत्र सिंहर्षभमत्तखेलं । लोके महेन्द्रप्रतिमानकल्पम् ॥
sa bhīmasenaḥ sahito yamābhyāṃ | vṛkodaro vīrarathasya goptā | taṃ tatra siṃharṣabhamattakhelaṃ | loke mahendrapratimānakalpam
वही भीमसेन वृकोदर, नकुल-सहदेव के साथ, वीर अर्जुन के रथ के रक्षक हैं। सिंह और मतवाले साँड़ की-सी चाल से विचरते, संसार में महेन्द्र के समान उस वीर को —
श्लोक 13 (6.22.13)
समीक्ष्य सेनाग्रगतं दुरासदं । संविव्यथुः पङ्कगता यथा द्विपाः । वृकोदरं वारणराजदर्पं । योधास्त्वदीया भयविग्नसत्त्वाः ॥
samīkṣya senāgragataṃ durāsadaṃ | saṃvivyathuḥ paṅkagatā yathā dvipāḥ | vṛkodaraṃ vāraṇarājadarpaṃ | yodhāstvadīyā bhayavignasattvāḥ
सेना के अग्रभाग में खड़े, गजराज के समान अभिमानी, दुर्जय वृकोदर को देखकर आपके योद्धा, जिनका साहस भय से डगमगा गया था, कीचड़ में फँसे हाथियों की भाँति व्यथित हो उठे।
श्लोक 14 (6.22.14)
अनीकमध्ये तिष्ठन्तं राजपुत्रं दुरासदम् । अब्रवीद्भरतश्रेष्ठं गुडाकेशं जनार्दनः ॥
anīkamadhye tiṣṭhantaṃ rājaputraṃ durāsadam | abravīdbharataśreṣṭhaṃ guḍākeśaṃ janārdanaḥ
सेना के बीच खड़े, दुर्जय राजकुमार, भरतश्रेष्ठ गुडाकेश (अर्जुन) से जनार्दन ने कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 15 (6.22.15)
य एष रोषात्प्रतपन्बलस्थो । यो नः सेनां सिंह इवेक्षते च । स एष भीष्मः कुरुवंशकेतु- । र्येनाहृतास्त्रिशतं वाजिमेधाः ॥
ya eṣa roṣātpratapanbalastho | yo naḥ senāṃ siṃha ivekṣate ca | sa eṣa bhīṣmaḥ kuruvaṃśaketu- | ryenāhṛtāstriśataṃ vājimedhāḥ
"जो क्रोध से तपता हुआ अपनी सेना के बीच खड़ा है और सिंह की भाँति हमारी सेना को देख रहा है, वही कुरुवंश के ध्वज भीष्म हैं, जिन्होंने तीन सौ अश्वमेध यज्ञ किए हैं।
श्लोक 16 (6.22.16)
एतान्यनीकानि महानुभावं । गूहन्ति मेघा इव रश्मिमन्तम् । एतानि हत्वा पुरुषप्रवीर । काङ्क्षस्व युद्धं भरतर्षभेण ॥
etānyanīkāni mahānubhāvaṃ | gūhanti meghā iva raśmimantam | etāni hatvā puruṣapravīra | kāṅkṣasva yuddhaṃ bharatarṣabheṇa
ये सेनाएँ उस महाप्रतापी को वैसे ही ढके हुए हैं जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं। हे वीरश्रेष्ठ, इन्हें मारकर तब उस भरतश्रेष्ठ से युद्ध की इच्छा करो।"