भीष्म पर्व · अध्याय 23
अर्जुन द्वारा दुर्गा-स्तुति
कौरव सेना को युद्ध के लिए उपस्थित देखकर कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि पवित्र होकर शत्रुओं की पराजय के लिए दुर्गा-स्तोत्र का पाठ करो। अर्जुन रथ से उतरकर अनेक नामों से देवी की स्तुति करते हैं; देवी आकाश में कृष्ण के सामने प्रकट होकर शीघ्र विजय का वर देती हैं, क्योंकि अर्जुन नर हैं और नारायण उनके सहायक हैं। सञ्जय इस स्तोत्र के पाठ का फल बताते हैं और खेद प्रकट करते हैं कि मोहवश धृतराष्ट्र के पुत्रों ने कृष्ण और अर्जुन को नहीं पहचाना — जहाँ धर्म है वहाँ कृष्ण हैं, और जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है। यह स्तोत्र प्रचलित पाठ का अंश है; समीक्षित संस्करण में नहीं है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.23.1)
धार्तराष्ट्रबलं दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् । अर्जुनस्य हितार्थाय कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥
dhārtarāṣṭrabalaṃ dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam | arjunasya hitārthāya kṛṣṇo vacanamabravīt
धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेना को युद्ध के लिए उपस्थित देखकर कृष्ण ने अर्जुन के हित के लिए यह वचन कहा —
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 2 (6.23.2)
शुचिर्भूत्वा महाबाहो संग्रामाभिमुखे स्थितः । पराजयाय शत्रूणां दुर्गास्तोत्रमुदीरय ॥
śucirbhūtvā mahābāho saṃgrāmābhimukhe sthitaḥ | parājayāya śatrūṇāṃ durgāstotramudīraya
"हे महाबाहो, पवित्र होकर, युद्ध के लिए सामने खड़े हुए तुम शत्रुओं की पराजय के लिए दुर्गा-स्तोत्र का पाठ करो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (6.23.3)
एवमुक्तोऽर्जुनः सङ्ख्ये वासुदेवेन धीमता । अवतीर्य रथात्पार्थः स्तोत्रमाह कृताञ्जलिः ॥
evamukto'rjunaḥ saṅkhye vāsudevena dhīmatā | avatīrya rathātpārthaḥ stotramāha kṛtāñjaliḥ
रणभूमि में बुद्धिमान वासुदेव के ऐसा कहने पर पार्थ (अर्जुन) ने रथ से उतरकर हाथ जोड़े हुए यह स्तोत्र कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 4 (6.23.4)
नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि । कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिङ्गले ॥
namaste siddhasenāni ārye mandaravāsini | kumāri kāli kāpāli kapile kṛṣṇapiṅgale
"हे सिद्धों की सेना की नायिका, हे आर्ये, हे मन्दराचल पर वास करने वाली, तुम्हें नमस्कार है। हे कुमारी, हे काली, हे कापाली, हे कपिला, हे कृष्णपिंगला!
श्लोक 5 (6.23.5)
भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालि नमोऽस्तु ते । चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं तारिणि वरवर्णिनि ॥
bhadrakāli namastubhyaṃ mahākāli namo'stu te | caṇḍi caṇḍe namastubhyaṃ tāriṇi varavarṇini
हे भद्रकाली, तुम्हें नमस्कार है; हे महाकाली, तुम्हें प्रणाम है। हे चण्डी, हे चण्डा, तुम्हें नमस्कार है; हे तारिणी, हे वरवर्णिनी!
श्लोक 6 (6.23.6)
कात्यायनि महाभागे करालि विजये जये । शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभरणभूषिते ॥
kātyāyani mahābhāge karāli vijaye jaye | śikhipicchadhvajadhare nānābharaṇabhūṣite
हे कात्यायनी, हे महाभागा, हे कराली, हे विजया, हे जया! हे मोरपंख की ध्वजा धारण करने वाली, नाना आभूषणों से विभूषित देवी!
श्लोक 7 (6.23.7)
अट्टशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिणि । गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे नन्दगोपकुलोद्भवे ॥
aṭṭaśūlapraharaṇe khaḍgakheṭakadhāriṇi | gopendrasyānuje jyeṣṭhe nandagopakulodbhave
हे विशाल शूल को आयुध बनाने वाली, हे खड्ग और ढाल धारण करने वाली! हे गोपराज (कृष्ण) की छोटी बहन, हे ज्येष्ठा, हे नन्दगोप के कुल में जन्मी देवी!
श्लोक 8 (6.23.8)
महिषासृक्प्रिये नित्यं कौशिकि पीतवासिनि । अट्टहासे कोकमुखे नमस्तेऽस्तु रणप्रिये ॥
mahiṣāsṛkpriye nityaṃ kauśiki pītavāsini | aṭṭahāse kokamukhe namaste'stu raṇapriye
हे महिषासुर के रक्त से सदा प्रसन्न होने वाली, हे कौशिकी, हे पीताम्बरधारिणी! हे अट्टहासा, हे कोकमुखा, हे रणप्रिया, तुम्हें नमस्कार है!
श्लोक 9 (6.23.9)
उमे शाकम्भरि श्वेते कृष्णे कैटभनाशिनि । हिरण्याक्षि विरूपाक्षि सुधूम्राक्षि नमोऽस्तु ते ॥
ume śākambhari śvete kṛṣṇe kaiṭabhanāśini | hiraṇyākṣi virūpākṣi sudhūmrākṣi namo'stu te
हे उमा, हे शाकम्भरी, हे श्वेता, हे कृष्णा, हे कैटभ का नाश करने वाली! हे हिरण्याक्षी, हे विरूपाक्षी, हे सुधूम्राक्षी, तुम्हें नमस्कार है!
श्लोक 10 (6.23.10)
वेदश्रुति महापुण्ये ब्रह्मण्ये जातवेदसि । जम्बूकटकचैत्येषु नित्यं सन्निहितालये ॥
vedaśruti mahāpuṇye brahmaṇye jātavedasi | jambūkaṭakacaityeṣu nityaṃ sannihitālaye
हे वेद और श्रुति-स्वरूपा, हे परम पुण्यमयी, हे ब्राह्मणों पर कृपा करने वाली, हे जातवेदसी! हे जम्बूद्वीप की राजधानियों और देवालयों में सदा निवास करने वाली!
श्लोक 11 (6.23.11)
त्वं ब्रह्मविद्या विद्यानां महानिद्रा च देहिनाम् । स्कन्दमातर्भगवति दुर्गे कान्तारवासिनि ॥
tvaṃ brahmavidyā vidyānāṃ mahānidrā ca dehinām | skandamātarbhagavati durge kāntāravāsini
विद्याओं में तुम ब्रह्मविद्या हो और देहधारियों की महानिद्रा हो। हे स्कन्दमाता, हे भगवती, हे दुर्गा, हे वन में वास करने वाली!
श्लोक 12 (6.23.12)
स्वाहाकारः स्वधा चैव कला काष्ठा सरस्वती । सावित्री वेदमाता च तथा वेदान्त उच्यते ॥
svāhākāraḥ svadhā caiva kalā kāṣṭhā sarasvatī | sāvitrī vedamātā ca tathā vedānta ucyate
तुम्हीं स्वाहा और स्वधा हो, कला और काष्ठा हो, सरस्वती हो; तुम्हीं सावित्री, वेदमाता और वेदान्त कहलाती हो।
श्लोक 13 (6.23.13)
स्तुतासि त्वं महादेवि विशुद्धेनान्तरात्मना । जयो भवतु मे नित्यं त्वत्प्रसादाद्रणाजिरे ॥
stutāsi tvaṃ mahādevi viśuddhenāntarātmanā | jayo bhavatu me nityaṃ tvatprasādādraṇājire
हे महादेवी, मैंने शुद्ध अन्तःकरण से तुम्हारी स्तुति की है। तुम्हारी कृपा से रणभूमि में सदा मेरी विजय हो।
श्लोक 14 (6.23.14)
कान्तारभयदुर्गेषु भक्तानां चालयेषु च । नित्यं वससि पाताले युद्धे जयसि दानवान् ॥
kāntārabhayadurgeṣu bhaktānāṃ cālayeṣu ca | nityaṃ vasasi pātāle yuddhe jayasi dānavān
वनों, भय के स्थानों और दुर्गम स्थलों में, भक्तों के घरों में और पाताल में तुम सदा निवास करती हो; युद्ध में तुम दानवों को जीतती हो।
श्लोक 15 (6.23.15)
त्वं जम्भनी मोहिनी च माया ह्रीः श्रीस्तथैव च । संध्या प्रभावती चैव सावित्री जननी तथा ॥
tvaṃ jambhanī mohinī ca māyā hrīḥ śrīstathaiva ca | saṃdhyā prabhāvatī caiva sāvitrī jananī tathā
तुम्हीं जम्भनी (तन्द्रा) और मोहिनी (निद्रा) हो, माया, ह्री (लज्जा) और श्री हो; तुम्हीं सन्ध्या, प्रभावती, सावित्री और जननी हो।
श्लोक 16 (6.23.16)
तुष्टिः पुष्टिर्धृतिर्दीप्तिश्चन्द्रादित्यविवर्धिनी । भूतिर्भूतिमतां सङ्ख्ये वीक्ष्यसे सिद्धचारणैः ॥
tuṣṭiḥ puṣṭirdhṛtirdīptiścandrādityavivardhinī | bhūtirbhūtimatāṃ saṅkhye vīkṣyase siddhacāraṇaiḥ
तुम्हीं तुष्टि, पुष्टि, धृति और दीप्ति हो, चन्द्रमा और सूर्य को बढ़ाने वाली हो; ऐश्वर्यशालियों का ऐश्वर्य हो। युद्ध में सिद्ध और चारण तुम्हारे दर्शन करते हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 17 (6.23.17)
ततः पार्थस्य विज्ञाय भक्तिं मानववत्सला । अन्तरिक्षगतोवाच गोविन्दस्याग्रतः स्थिता ॥
tataḥ pārthasya vijñāya bhaktiṃ mānavavatsalā | antarikṣagatovāca govindasyāgrataḥ sthitā
तब पार्थ की भक्ति को जानकर मनुष्यों पर स्नेह रखने वाली देवी आकाश में गोविन्द के सामने स्थित होकर बोलीं —
देव्युवाच
श्लोक 18 (6.23.18)
स्वल्पेनैव तु कालेन शत्रूञ्जेष्यसि पाण्डव । नरस्त्वमसि दुर्धर्ष नारायणसहायवान् ॥
svalpenaiva tu kālena śatrūñjeṣyasi pāṇḍava | narastvamasi durdharṣa nārāyaṇasahāyavān
"हे पाण्डुनन्दन, थोड़े ही समय में तुम शत्रुओं को जीत लोगे। हे दुर्जय, तुम नर हो और नारायण तुम्हारे सहायक हैं।
श्लोक 19 (6.23.19)
अजेयस्त्वं रणेऽरीणामपि वज्रभृतः स्वयम् । इत्येवमुक्त्वा वरदा क्षणेनान्तरधीयत ॥
ajeyastvaṃ raṇe'rīṇāmapi vajrabhṛtaḥ svayam | ityevamuktvā varadā kṣaṇenāntaradhīyata
युद्ध में शत्रु तुम्हें नहीं जीत सकते, स्वयं वज्रधारी इन्द्र भी नहीं।" ऐसा कहकर वरदायिनी देवी क्षण भर में अन्तर्धान हो गईं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (6.23.20)
लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो मेने विजयमात्मनः । आरुरोह ततः पार्थो रथं परमसंमतम् ॥
labdhvā varaṃ tu kaunteyo mene vijayamātmanaḥ | āruroha tataḥ pārtho rathaṃ paramasaṃmatam
वर पाकर कुन्तीपुत्र ने अपनी विजय निश्चित मान ली, और तब पार्थ अपने उत्तम रथ पर चढ़ गए।
श्लोक 21 (6.23.21)
कृष्णार्जुनावेकरथौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः । य इदं पठते स्तोत्रं कल्य उत्थाय मानवः ॥
kṛṣṇārjunāvekarathau divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ | ya idaṃ paṭhate stotraṃ kalya utthāya mānavaḥ
एक ही रथ पर बैठे कृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य शंख बजाए। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्र का पाठ करता है,
श्लोक 22 (6.23.22)
यक्षरक्षःपिशाचेभ्यो न भयं विद्यते सदा । न चापि रिपवस्तेभ्यः सर्पाद्या ये च दंष्ट्रिणः ॥
yakṣarakṣaḥpiśācebhyo na bhayaṃ vidyate sadā | na cāpi ripavastebhyaḥ sarpādyā ye ca daṃṣṭriṇaḥ
उसे यक्षों, राक्षसों और पिशाचों से कभी भय नहीं होता; न शत्रु उसका कुछ बिगाड़ सकते हैं, न सर्प आदि दाँतों वाले जीव।
श्लोक 23 (6.23.23)
न भयं विद्यते तस्य सदा राजकुलादपि । विवादे जयमाप्नोति बद्धो मुच्यति बन्धनात् ॥
na bhayaṃ vidyate tasya sadā rājakulādapi | vivāde jayamāpnoti baddho mucyati bandhanāt
उसे राजकुल से भी कभी भय नहीं होता। वह विवाद में विजय पाता है और बँधा हुआ हो तो बन्धन से छूट जाता है।
श्लोक 24 (6.23.24)
दुर्गं तरति चावश्यं तथा चोरैर्विमुच्यते । संग्रामे विजयेन्नित्यं लक्ष्मीं प्राप्नोति केवलाम् ॥
durgaṃ tarati cāvaśyaṃ tathā corairvimucyate | saṃgrāme vijayennityaṃ lakṣmīṃ prāpnoti kevalām
वह निश्चय ही संकटों से पार हो जाता है और चोरों से बच जाता है; संग्राम में सदा विजयी होता है और सम्पूर्ण लक्ष्मी पाता है।
श्लोक 25 (6.23.25)
आरोग्यबलसंपन्नो जीवेद्वर्षशतं तथा । एतद्दृष्टं प्रसादात्तु मया व्यासस्य धीमतः ॥
ārogyabalasaṃpanno jīvedvarṣaśataṃ tathā | etaddṛṣṭaṃ prasādāttu mayā vyāsasya dhīmataḥ
आरोग्य और बल से सम्पन्न होकर वह सौ वर्ष जीता है। यह सब मैंने बुद्धिमान व्यास की कृपा से देखा है।
श्लोक 26 (6.23.26)
मोहादेतौ न जानन्ति नरनारायणावृषी । तव पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मन्युवशानुगाः ॥
mohādetau na jānanti naranārāyaṇāvṛṣī | tava putrā durātmānaḥ sarve manyuvaśānugāḥ
आपके दुष्टात्मा पुत्र, जो सब क्रोध के वश में हैं, मोह के कारण इन दोनों को नर और नारायण ऋषि के रूप में नहीं जानते।
श्लोक 27 (6.23.27)
प्राप्तकालमिदं वाक्यं कालपाशेन कुण्ठिताः । द्वैपायनो नारदश्च कण्वो रामस्तथानघः । अवारयंस्तव सुतं न चासौ तद्गृहीतवान् ॥
prāptakālamidaṃ vākyaṃ kālapāśena kuṇṭhitāḥ | dvaipāyano nāradaśca kaṇvo rāmastathānaghaḥ | avārayaṃstava sutaṃ na cāsau tadgṛhītavān
काल के पाश से उनकी बुद्धि कुण्ठित हो गई है, इसलिए उन्होंने यह समयोचित वचन नहीं माना। द्वैपायन, नारद, कण्व और निष्पाप परशुराम ने आपके पुत्र को रोका था, पर उसने उनकी बात ग्रहण नहीं की।
श्लोक 28 (6.23.28)
यत्र धर्मो द्युतिः कान्तिर्यत्र ह्रीः श्रीस्तथा मतिः । यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥
yatra dharmo dyutiḥ kāntiryatra hrīḥ śrīstathā matiḥ | yato dharmastataḥ kṛṣṇo yataḥ kṛṣṇastato jayaḥ
जहाँ धर्म, तेज और कान्ति है, जहाँ लज्जा, श्री और सद्बुद्धि है — जहाँ धर्म है वहाँ कृष्ण हैं, और जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है।