भीष्म पर्व · अध्याय 24
दोनों सेनाओं का हर्ष और आमना-सामना
धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि किसके योद्धा उत्साह से लड़े और किसके उदास थे, पहले किसने प्रहार किया, और किस ओर सुगन्ध तथा अनुकूल वायु के शुभ लक्षण प्रकट हुए। सञ्जय उत्तर देते हैं कि दोनों सेनाओं के योद्धा समान रूप से हर्षित थे, दोनों ओर मालाएँ और सुगन्ध थीं, और जब बाजों, शंखों और नगाड़ों के कोलाहल तथा वीरों की गर्जना के बीच व्यूहबद्ध सेनाएँ आपस में मिलीं, तो भारी संघर्ष छिड़ गया। अगले अध्याय में भगवद्गीता आरम्भ होती है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.24.1)
केषां प्रहृष्टास्तत्राग्रे योधा युध्यन्ति सञ्जय । उदग्रमनसः के वा के वा दीना विचेतसः ॥
keṣāṃ prahṛṣṭāstatrāgre yodhā yudhyanti sañjaya | udagramanasaḥ ke vā ke vā dīnā vicetasaḥ
हे सञ्जय, वहाँ आगे किसके योद्धा प्रसन्न होकर लड़ रहे थे? किनका मन उत्साह से भरा था, और कौन दीन और हतबुद्धि थे?
श्लोक 2 (6.24.2)
के पूर्वं प्राहरंस्तत्र युद्धे हृदयकम्पने । मामकाः पाण्डवेया वा तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
ke pūrvaṃ prāharaṃstatra yuddhe hṛdayakampane | māmakāḥ pāṇḍaveyā vā tanmamācakṣva sañjaya
हृदय को कँपा देने वाले उस युद्ध में पहले किसने प्रहार किया — मेरे पक्ष के लोगों ने या पाण्डवों ने? हे सञ्जय, यह मुझे बताओ।
श्लोक 3 (6.24.3)
कस्य सेनासमुदये गन्धो माल्यसमुद्भवः । वायुः प्रदक्षिणश्चैव योधानामभिगर्जताम् ॥
kasya senāsamudaye gandho mālyasamudbhavaḥ | vāyuḥ pradakṣiṇaścaiva yodhānāmabhigarjatām
किसकी एकत्र सेना में मालाओं की सुगन्ध उठी, और गरजते हुए किन योद्धाओं के लिए वायु दाहिनी ओर से अनुकूल बही?
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (6.24.4)
उभयोः सेनयोस्तत्र योधा जहृषिरे तदा । स्रजः समाः सुगन्धानामुभयत्र समुद्भवः ॥
ubhayoḥ senayostatra yodhā jahṛṣire tadā | srajaḥ samāḥ sugandhānāmubhayatra samudbhavaḥ
वहाँ उस समय दोनों सेनाओं के योद्धा हर्षित थे। दोनों ओर समान मालाएँ थीं और दोनों ओर सुगन्ध उठ रही थी।
श्लोक 5 (6.24.5)
संहतानामनीकानां व्यूढानां भरतर्षभ । संसर्गात्समुदीर्णानां विमर्दः सुमहानभूत् ॥
saṃhatānāmanīkānāṃ vyūḍhānāṃ bharatarṣabha | saṃsargātsamudīrṇānāṃ vimardaḥ sumahānabhūt
हे भरतश्रेष्ठ, जब संगठित, व्यूहबद्ध और उत्तेजित सेनाएँ आपस में भिड़ीं, तो बहुत भारी संघर्ष हुआ।
श्लोक 6 (6.24.6)
वादित्रशब्दस्तुमुलः शङ्खभेरीविमिश्रितः । शूराणां रणशूराणां गर्जतामितरेतरम् ॥
vāditraśabdastumulaḥ śaṅkhabherīvimiśritaḥ | śūrāṇāṃ raṇaśūrāṇāṃ garjatāmitaretaram
शंखों और भेरियों से मिला बाजों का तुमुल नाद गूँज उठा, और रणशूर वीर एक-दूसरे पर गरजने लगे।
श्लोक 7 (6.24.7)
उभयोः सेनयो राजन्महान्व्यतिकरोऽभवत् । अन्योन्यं वीक्षमाणानां योधानां भरतर्षभ । कुञ्जराणां च नदतां सैन्यानां च प्रहृष्यताम् ॥
ubhayoḥ senayo rājanmahānvyatikaro'bhavat | anyonyaṃ vīkṣamāṇānāṃ yodhānāṃ bharatarṣabha | kuñjarāṇāṃ ca nadatāṃ sainyānāṃ ca prahṛṣyatām
हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, एक-दूसरे को देखते योद्धाओं, चिंघाड़ते हाथियों और हर्ष से भरी सेनाओं के कारण दोनों सेनाओं में भारी हलचल मच गई।