भीष्म पर्व · अध्याय 4
धृतराष्ट्र का पृथ्वी के विषय में प्रश्न
व्यास के चले जाने पर धृतराष्ट्र चिन्तन में डूब जाते हैं और फिर संजय से पूछते हैं कि राजा पृथ्वी के लिए प्राण देने को क्यों तत्पर रहते हैं और ये एकत्र वीर किन देशों से आए हैं। संजय प्राणियों के भेदों से आरम्भ करते हैं — अण्डज, स्वेदज और जरायुज चर प्राणी, चौदह ग्राम्य और वन्य पशु, तथा पाँच प्रकार की वनस्पतियाँ, जो पाँच महाभूतों के साथ मिलकर गायत्री के चौबीस तत्त्व बनाती हैं। अन्त में वे कहते हैं कि सब कुछ पृथ्वी पर ही जन्मता और नष्ट होता है, इसीलिए राजा उसे पाने के लिए एक-दूसरे का वध करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (6.4.1)
एवमुक्त्वा ययौ व्यासो धृतराष्ट्राय धीमते । धृतराष्ट्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ध्यानमेवान्वपद्यत ॥
evamuktvā yayau vyāso dhṛtarāṣṭrāya dhīmate | dhṛtarāṣṭro'pi tacchrutvā dhyānamevānvapadyata
बुद्धिमान धृतराष्ट्र से ऐसा कहकर व्यास चले गए; और धृतराष्ट्र भी वह सुनकर चिन्तन में डूब गए।
श्लोक 2 (6.4.2)
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः । संजयं संशितात्मानमपृच्छद्भरतर्षभ ॥
sa muhūrtamiva dhyātvā viniḥśvasya muhurmuhuḥ | saṃjayaṃ saṃśitātmānamapṛcchadbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, क्षण भर विचार करके और बार-बार लम्बी साँसें लेकर उन्होंने संयमी संजय से पूछा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (6.4.3)
संजयेमे महीपालाः शूरा युद्धाभिनन्दिनः । अन्योन्यमभिनिघ्नन्ति शस्त्रैरुच्चावचैरिह ॥
saṃjayeme mahīpālāḥ śūrā yuddhābhinandinaḥ | anyonyamabhinighnanti śastrairuccāvacairiha
संजय, युद्ध से प्रसन्न होने वाले ये शूरवीर राजा यहाँ भाँति-भाँति के शस्त्रों से एक-दूसरे को मार रहे हैं।
श्लोक 4 (6.4.4)
पार्थिवाः पृथिवीहेतोः समभित्यज्य जीवितम् । न वा शाम्यन्ति निघ्नन्तो वर्धयन्ति यमक्षयम् ॥
pārthivāḥ pṛthivīhetoḥ samabhityajya jīvitam | na vā śāmyanti nighnanto vardhayanti yamakṣayam
पृथ्वी के लिए ये राजा अपने प्राण त्याग देते हैं; वे मारकाट से विरत नहीं होते, बल्कि यमलोक को बढ़ाते जा रहे हैं।
श्लोक 5 (6.4.5)
भौममैश्वर्यमिच्छन्तो न मृष्यन्ते परस्परम् । मन्ये बहुगुणा भूमिस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥
bhaumamaiśvaryamicchanto na mṛṣyante parasparam | manye bahuguṇā bhūmistanmamācakṣva saṃjaya
भूमि का ऐश्वर्य चाहते हुए वे एक-दूसरे को सहन नहीं कर पाते। मुझे लगता है कि पृथ्वी में बहुत-से गुण हैं; संजय, वे मुझे बताओ।
श्लोक 6 (6.4.6)
बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । कोट्यश्च लोकवीराणां समेताः कुरुजाङ्गले ॥
bahūni ca sahasrāṇi prayutānyarbudāni ca | koṭyaśca lokavīrāṇāṃ sametāḥ kurujāṅgale
संसार के वीर अनेक सहस्रों, लाखों, करोड़ों और अरबों की संख्या में कुरुजांगल में एकत्र हुए हैं।
श्लोक 7 (6.4.7)
देशानां च परीमाणं नगराणां च संजय । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यत एते समागताः ॥
deśānāṃ ca parīmāṇaṃ nagarāṇāṃ ca saṃjaya | śrotumicchāmi tattvena yata ete samāgatāḥ
संजय, जिन देशों और नगरों से ये आए हैं, उनका विस्तार मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 8 (6.4.8)
दिव्यबुद्धिप्रदीपेन युक्तस्त्वं ज्ञानचक्षुषा । प्रभावात्तस्य विप्रर्षेर्व्यासस्यामिततेजसः ॥
divyabuddhipradīpena yuktastvaṃ jñānacakṣuṣā | prabhāvāttasya viprarṣervyāsasyāmitatejasaḥ
क्योंकि अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि व्यास के प्रभाव से तुम दिव्य बुद्धि के दीपक से प्रकाशित ज्ञान-नेत्र से सम्पन्न हो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (6.4.9)
यथाप्रज्ञं महाप्राज्ञ भौमान्वक्ष्यामि ते गुणान् । शास्त्रचक्षुरवेक्षस्व नमस्ते भरतर्षभ ॥
yathāprajñaṃ mahāprājña bhaumānvakṣyāmi te guṇān | śāstracakṣuravekṣasva namaste bharatarṣabha
हे महाप्राज्ञ, अपनी बुद्धि के अनुसार मैं आपको पृथ्वी के गुण बताऊँगा। आप शास्त्र की दृष्टि से देखें। हे भरतश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है।
श्लोक 10 (6.4.10)
द्विविधानीह भूतानि चराणि स्थावराणि च । त्रसानां त्रिविधा योनिरण्डस्वेदजरायुजाः ॥
dvividhānīha bhūtāni carāṇi sthāvarāṇi ca | trasānāṃ trividhā yoniraṇḍasvedajarāyujāḥ
इस संसार में प्राणी दो प्रकार के हैं — चर और अचर। चर प्राणियों की उत्पत्ति तीन प्रकार की है — अण्डज, स्वेदज और जरायुज।
श्लोक 11 (6.4.11)
त्रसानां खलु सर्वेषां श्रेष्ठा राजञ्जरायुजाः । जरायुजानां प्रवरा मानवाः पशवश्च ये ॥
trasānāṃ khalu sarveṣāṃ śreṣṭhā rājañjarāyujāḥ | jarāyujānāṃ pravarā mānavāḥ paśavaśca ye
हे राजन्, सब चर प्राणियों में जरायुज श्रेष्ठ हैं, और जरायुजों में मनुष्य और पशु प्रधान हैं।
श्लोक 12 (6.4.12)
नानारूपधरा राजंस्तेषां भेदाश्चतुर्दश । वेदोक्ताः पृथिवीपाल येषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥
nānārūpadharā rājaṃsteṣāṃ bhedāścaturdaśa | vedoktāḥ pṛthivīpāla yeṣu yajñāḥ pratiṣṭhitāḥ
हे राजन्, वे अनेक रूप धारण करते हैं और उनके चौदह भेद हैं; हे पृथ्वीपाल, वेदों में उनका वर्णन है और उन्हीं पर यज्ञ प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 13 (6.4.13)
ग्राम्याणां पुरुषाः श्रेष्ठाः सिंहाश्चारण्यवासिनाम् । सर्वेषामेव भूतानामन्योन्येनोपजीवनम् ॥
grāmyāṇāṃ puruṣāḥ śreṣṭhāḥ siṃhāścāraṇyavāsinām | sarveṣāmeva bhūtānāmanyonyenopajīvanam
ग्राम्य प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ है और वनवासियों में सिंह। सब प्राणी एक-दूसरे के सहारे जीते हैं।
श्लोक 14 (6.4.14)
उद्भिज्जाः स्थावराः प्रोक्तास्तेषां पञ्चैव जातयः । वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातयः ॥
udbhijjāḥ sthāvarāḥ proktāsteṣāṃ pañcaiva jātayaḥ | vṛkṣagulmalatāvallyastvaksārāstṛṇajātayaḥ
भूमि फोड़कर उगने वाली उद्भिज्ज वनस्पतियाँ अचर कही गई हैं; उनकी पाँच ही जातियाँ हैं — वृक्ष, झाड़ियाँ, लताएँ, बेलें और (बाँस जैसी) त्वचा में सार वाली तृण-जातियाँ।
श्लोक 15 (6.4.15)
तेषां विंशतिरेकोना महाभूतेषु पञ्चसु । चतुर्विंशतिरुद्दिष्टा गायत्री लोकसंमता ॥
teṣāṃ viṃśatirekonā mahābhūteṣu pañcasu | caturviṃśatiruddiṣṭā gāyatrī lokasaṃmatā
इनके उन्नीस भेद हैं; पाँच महाभूतों के साथ ये चौबीस होते हैं, और इन्हीं को लोकसम्मत गायत्री कहा गया है।
श्लोक 16 (6.4.16)
य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम् । तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ स लोके न प्रणश्यति ॥
ya etāṃ veda gāyatrīṃ puṇyāṃ sarvaguṇānvitām | tattvena bharataśreṣṭha sa loke na praṇaśyati
हे भरतश्रेष्ठ, जो इस पवित्र और सब गुणों से युक्त गायत्री को तत्त्व से जानता है, वह संसार में नष्ट नहीं होता।
श्लोक 17 (6.4.17)
अरण्यवासिनः सप्त सप्तैषां ग्रामवासिनः । सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च महिषा वारणास्तथा ॥
araṇyavāsinaḥ sapta saptaiṣāṃ grāmavāsinaḥ | siṃhā vyāghrā varāhāśca mahiṣā vāraṇāstathā
इनमें सात वनवासी हैं और सात ग्रामवासी। सिंह, बाघ, सूअर, भैंसा और हाथी,
श्लोक 18 (6.4.18)
ऋक्षाश्च वानराश्चैव सप्तारण्याः स्मृता नृप । गौरजाविमनुष्याश्च अश्वाश्वतरगर्दभाः ॥
ṛkṣāśca vānarāścaiva saptāraṇyāḥ smṛtā nṛpa | gaurajāvimanuṣyāśca aśvāśvataragardabhāḥ
भालू और बन्दर — हे नृप, ये सात वन्य पशु माने गए हैं। गाय, बकरी, भेड़, मनुष्य, घोड़ा, खच्चर और गधा —
श्लोक 19 (6.4.19)
एते ग्राम्याः समाख्याताः पशवः सप्त साधुभिः । एते वै पशवो राजन्ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ॥
ete grāmyāḥ samākhyātāḥ paśavaḥ sapta sādhubhiḥ | ete vai paśavo rājangrāmyāraṇyāścaturdaśa
इन सात को सज्जनों ने ग्राम्य पशु कहा है। हे राजन्, ये ही ग्राम्य और वन्य चौदह पशु हैं।
श्लोक 20 (6.4.20)
भूमौ च जायते सर्वं भूमौ सर्वं विनश्यति । भूमिः प्रतिष्ठा भूतानां भूमिरेव सनातनम् ॥
bhūmau ca jāyate sarvaṃ bhūmau sarvaṃ vinaśyati | bhūmiḥ pratiṣṭhā bhūtānāṃ bhūmireva sanātanam
पृथ्वी पर ही सब कुछ जन्म लेता है और पृथ्वी पर ही सब नष्ट होता है। पृथ्वी प्राणियों का आधार है; पृथ्वी ही सनातन है।
श्लोक 21 (6.4.21)
यस्य भूमिस्तस्य सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । तत्रातिगृद्धा राजानो विनिघ्नन्तीतरेतरम् ॥
yasya bhūmistasya sarvaṃ jagatsthāvarajaṅgamam | tatrātigṛddhā rājāno vinighnantītaretaram
जिसकी पृथ्वी है, उसी का यह सारा चराचर जगत है। इसीलिए उसके लोभ में राजा एक-दूसरे का वध करते हैं।