Skip to main content

भीष्म पर्व · अध्याय 6

मेरु पर्वत और जम्बूद्वीप के वर्ष

धृतराष्ट्र संजय से द्वीप का विस्तृत वर्णन करने को कहते हैं। संजय समुद्र से समुद्र तक फैले छह पर्वतों और उनके बीच स्थित वर्षों के नाम बताते हैं, और बीच में स्थित स्वर्णमय मेरु का वर्णन करते हैं, जहाँ देवता, ऋषि और कुबेर आते-जाते हैं, कर्णिकार-वन में शिव विहार करते हैं और जिसके शिखर से गंगा गिरती है। फिर वे केतुमाल और गन्धमादन, भारत से ऐरावत तक वर्षों के क्रम, कैलास, बिन्दुसर, सात दिव्य गंगाओं और प्रत्येक पर्वत पर रहने वाले प्राणियों का वर्णन करते हैं, और अन्त में द्वीप में दिखाई देने वाली शश की आकृति का वर्णन करते हैं।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (6.6.1)

उक्तो द्वीपस्य संक्षेपो विधिवद्बुद्धिमंस्त्वया । तत्त्वज्ञश्चासि सर्वस्य विस्तारं ब्रूहि सञ्जय ॥

ukto dvīpasya saṃkṣepo vidhivadbuddhimaṃstvayā | tattvajñaścāsi sarvasya vistāraṃ brūhi sañjaya

"हे बुद्धिमान संजय, तुमने द्वीप का संक्षिप्त वर्णन विधिपूर्वक कर दिया है, और तुम सब कुछ तत्त्व से जानते हो। अब इसका विस्तार से वर्णन करो।

श्लोक 2 (6.6.2)

यावान्भूम्यवकाशोऽयं दृश्यते शशलक्षणे । तस्य प्रमाणं प्रब्रूहि ततो वक्ष्यसि पिप्पलम् ॥

yāvānbhūmyavakāśo'yaṃ dṛśyate śaśalakṣaṇe | tasya pramāṇaṃ prabrūhi tato vakṣyasi pippalam

शश (खरगोश) के चिह्न में जितना भूभाग दिखाई देता है, उसका परिमाण बताओ; उसके बाद तुम पिप्पल वृक्ष का वर्णन करना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (6.6.3)

एवं राज्ञा स पृष्टस्तु संजयो वाक्यमब्रवीत् ॥

evaṃ rājñā sa pṛṣṭastu saṃjayo vākyamabravīt

राजा के इस प्रकार पूछने पर संजय ने यह वचन कहा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (6.6.4)

प्रागायता महाराज षडेते वर्षपर्वताः । अवगाढा ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ ॥

prāgāyatā mahārāja ṣaḍete varṣaparvatāḥ | avagāḍhā hyubhayataḥ samudrau pūrvapaścimau

हे महाराज, ये छह वर्ष-पर्वत पूर्व से पश्चिम तक फैले हुए हैं और दोनों ओर पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रों में धँसे हुए हैं।

श्लोक 5 (6.6.5)

हिमवान्हेमकूटश्च निषधश्च नगोत्तमः । नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतश्च शशिसन्निभः ॥

himavānhemakūṭaśca niṣadhaśca nagottamaḥ | nīlaśca vaidūryamayaḥ śvetaśca śaśisannibhaḥ

वे हैं हिमवान्, हेमकूट, पर्वतश्रेष्ठ निषध, वैदूर्यमय नील, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल श्वेत,

श्लोक 6 (6.6.6)

सर्वधातुविचित्रश्च शृङ्गवान्नाम पर्वतः । एते वै पर्वता राजन्सिद्धचारणसेविताः ॥

sarvadhātuvicitraśca śṛṅgavānnāma parvataḥ | ete vai parvatā rājansiddhacāraṇasevitāḥ

और सब धातुओं से चित्र-विचित्र शृङ्गवान् नामक पर्वत। हे राजन्, इन पर्वतों पर सिद्ध और चारण विचरते हैं।

श्लोक 7 (6.6.7)

एषामन्तरविष्कम्भा योजनानि सहस्रशः । तत्र पुण्या जनपदास्तानि वर्षाणि भारत ॥

eṣāmantaraviṣkambhā yojanāni sahasraśaḥ | tatra puṇyā janapadāstāni varṣāṇi bhārata

इनके बीच का अन्तर हजारों योजन का है। उनमें पवित्र जनपद हैं; हे भारत, वे ही वर्ष कहलाते हैं।

श्लोक 8 (6.6.8)

वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः । इदं तु भारतं वर्षं ततो हैमवतं परम् ॥

vasanti teṣu sattvāni nānājātīni sarvaśaḥ | idaṃ tu bhārataṃ varṣaṃ tato haimavataṃ param

उनमें सब ओर अनेक जातियों के प्राणी निवास करते हैं। यह भारतवर्ष है; इसके आगे हैमवत वर्ष है।

श्लोक 9 (6.6.9)

ततः किंपुरुषावासं वर्षं हिमवतः परम् । हेमकूटात्परं चैव हरिवर्षं प्रचक्षते ॥

tataḥ kiṃpuruṣāvāsaṃ varṣaṃ himavataḥ param | hemakūṭātparaṃ caiva harivarṣaṃ pracakṣate

फिर हिमवान् के आगे किम्पुरुषों के निवास वाला वर्ष है; और हेमकूट के आगे हरिवर्ष बताया जाता है।

श्लोक 10 (6.6.10)

दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु । प्रागायतो महाभाग माल्यवान्नाम पर्वतः ॥

dakṣiṇena tu nīlasya niṣadhasyottareṇa tu | prāgāyato mahābhāga mālyavānnāma parvataḥ

हे महाभाग, नील के दक्षिण और निषध के उत्तर में पूर्व की ओर फैला हुआ माल्यवान् नामक पर्वत है।

श्लोक 11 (6.6.11)

ततः परं माल्यवतः पर्वतो गन्धमादनः । परिमण्डलस्तयोर्मध्ये मेरुः कनकपर्वतः । तरुणादित्यसंकाशो विधूम इव पावकः ॥

tataḥ paraṃ mālyavataḥ parvato gandhamādanaḥ | parimaṇḍalastayormadhye meruḥ kanakaparvataḥ | taruṇādityasaṃkāśo vidhūma iva pāvakaḥ

माल्यवान् के आगे गन्धमादन पर्वत है। उन दोनों के बीच गोलाकार स्वर्णपर्वत मेरु है, जो उगते सूर्य के समान और धूमरहित अग्नि के समान दीप्त है।

श्लोक 12 (6.6.12)

योजनानां सहस्राणि षोडशाधः किल स्मृतः । ऊर्ध्वं च चतुरशीतिर्द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः । अधस्ताच्चतुरशीतिर्योजनानां महीपते ॥

yojanānāṃ sahasrāṇi ṣoḍaśādhaḥ kila smṛtaḥ | ūrdhvaṃ ca caturaśītirdvātriṃśanmūrdhni vistṛtaḥ | adhastāccaturaśītiryojanānāṃ mahīpate

कहा जाता है कि वह सोलह हजार योजन नीचे तक गया है और चौरासी हजार योजन ऊपर उठा है; शिखर पर उसका विस्तार बत्तीस हजार योजन है; और हे महीपते, नीचे चौरासी हजार योजन।

श्लोक 13 (6.6.13)

ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्च मेरुरावृत्य तिष्ठति । तस्य पार्श्वेष्वमी द्वीपाश्चत्वारः संस्थिता विभो ॥

ūrdhvamadhaśca tiryakca merurāvṛtya tiṣṭhati | tasya pārśveṣvamī dvīpāścatvāraḥ saṃsthitā vibho

मेरु ऊपर, नीचे और तिरछे सब ओर व्याप्त होकर स्थित है। हे विभो, उसके पार्श्वों में ये चार द्वीप स्थित हैं:

श्लोक 14 (6.6.14)

भद्राश्वः केतुमालश्च जम्बूद्वीपश्च भारत । उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ॥

bhadrāśvaḥ ketumālaśca jambūdvīpaśca bhārata | uttarāścaiva kuravaḥ kṛtapuṇyapratiśrayāḥ

भद्राश्व, केतुमाल, जम्बूद्वीप, और हे भारत, उत्तरकुरु, जो पुण्यकर्म करने वालों का आश्रय है।

श्लोक 15 (6.6.15)

विहगः सुमुखो यस्तु सुपर्णस्यात्मजः किल । स वै विचिन्तयामास सौवर्णान्वीक्ष्य वायसान् ॥

vihagaḥ sumukho yastu suparṇasyātmajaḥ kila | sa vai vicintayāmāsa sauvarṇānvīkṣya vāyasān

सुपर्ण का पुत्र कहा जाने वाला सुमुख नामक पक्षी वहाँ कौओं को सुनहरा देखकर सोचने लगा:

श्लोक 16 (6.6.16)

मेरुरुत्तममध्यानामधमानां च पक्षिणाम् । अविशेषकरो यस्मात्तस्मादेनं त्यजाम्यहम् ॥

meruruttamamadhyānāmadhamānāṃ ca pakṣiṇām | aviśeṣakaro yasmāttasmādenaṃ tyajāmyaham

"मेरु उत्तम, मध्यम और अधम पक्षियों में कोई भेद नहीं करता; इसलिए मैं इसे छोड़ता हूँ।"

श्लोक 17 (6.6.17)

तमादित्योऽनुपर्येति सततं ज्योतिषां वरः । चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो वायुश्चैव प्रदक्षिणः ॥

tamādityo'nuparyeti satataṃ jyotiṣāṃ varaḥ | candramāśca sanakṣatro vāyuścaiva pradakṣiṇaḥ

ज्योतियों में श्रेष्ठ सूर्य निरन्तर उसकी प्रदक्षिणा करता है; नक्षत्रों सहित चन्द्रमा और वायु भी उसकी प्रदक्षिणा करते हैं।

श्लोक 18 (6.6.18)

स पर्वतो महाराज दिव्यपुष्पफलान्वितः । भवनैरावृतः सर्वैर्जाम्बूनदपरिष्कृतैः ॥

sa parvato mahārāja divyapuṣpaphalānvitaḥ | bhavanairāvṛtaḥ sarvairjāmbūnadapariṣkṛtaiḥ

हे महाराज, वह पर्वत दिव्य पुष्पों और फलों से सम्पन्न है और जाम्बूनद स्वर्ण से सजे भवनों से सब ओर घिरा है।

श्लोक 19 (6.6.19)

तत्र देवगणा राजन्गन्धर्वासुरराक्षसाः । अप्सरोगणसंयुक्ताः शैले क्रीडन्ति सर्वदा ॥

tatra devagaṇā rājangandharvāsurarākṣasāḥ | apsarogaṇasaṃyuktāḥ śaile krīḍanti sarvadā

हे राजन्, वहाँ देवगण, गन्धर्व, असुर और राक्षस अप्सराओं के समूहों के साथ उस पर्वत पर सदा क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 20 (6.6.20)

तत्र ब्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्चापि सुरेश्वरः । समेत्य विविधैर्यज्ञैर्यजन्तेऽनेकदक्षिणैः ॥

tatra brahmā ca rudraśca śakraścāpi sureśvaraḥ | sametya vividhairyajñairyajante'nekadakṣiṇaiḥ

वहाँ ब्रह्मा, रुद्र और देवराज इन्द्र एकत्र होकर बहुत दक्षिणाओं वाले विविध यज्ञ करते हैं।

श्लोक 21 (6.6.21)

तुम्बुरुर्नारदश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहूः । अभिगम्यामरश्रेष्ठांस्तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ॥

tumbururnāradaścaiva viśvāvasurhahāhuhūḥ | abhigamyāmaraśreṣṭhāṃstuṣṭuvurvividhaiḥ stavaiḥ

तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, हाहा और हूहू श्रेष्ठ देवताओं के पास जाकर विविध स्तोत्रों से उनकी स्तुति करते थे।

श्लोक 22 (6.6.22)

सप्तर्षयो महात्मानः कश्यपश्च प्रजापतिः । तत्र गच्छन्ति भद्रं ते सदा पर्वणि पर्वणि ॥

saptarṣayo mahātmānaḥ kaśyapaśca prajāpatiḥ | tatra gacchanti bhadraṃ te sadā parvaṇi parvaṇi

महात्मा सप्तर्षि और प्रजापति कश्यप प्रत्येक पर्व पर सदा वहाँ जाते हैं; तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 23 (6.6.23)

तस्यैव मूर्धन्युशनाः काव्यो दैत्यैर्महीपते । इमानि तस्य रत्नानि तस्येमे रत्नपर्वताः ॥

tasyaiva mūrdhanyuśanāḥ kāvyo daityairmahīpate | imāni tasya ratnāni tasyeme ratnaparvatāḥ

हे महीपते, उसी के शिखर पर दैत्यों के साथ उशना काव्य (शुक्राचार्य) रहते हैं। ये रत्न उन्हीं के हैं और ये रत्नपर्वत भी उन्हीं के हैं।

श्लोक 24 (6.6.24)

तस्मात्कुबेरो भगवांश्चतुर्थं भागमश्नुते । ततः कलांशं वित्तस्य मनुष्येभ्यः प्रयच्छति ॥

tasmātkubero bhagavāṃścaturthaṃ bhāgamaśnute | tataḥ kalāṃśaṃ vittasya manuṣyebhyaḥ prayacchati

उनसे भगवान् कुबेर चौथा भाग पाते हैं, और फिर उस धन का एक छोटा-सा अंश मनुष्यों को देते हैं।

श्लोक 25 (6.6.25)

पार्श्वे तस्योत्तरे दिव्यं सर्वर्तुकुसुमैश्चितम् । कर्णिकारवनं रम्यं शिलाजालसमुद्गतम् ॥

pārśve tasyottare divyaṃ sarvartukusumaiścitam | karṇikāravanaṃ ramyaṃ śilājālasamudgatam

उसके उत्तरी पार्श्व में कर्णिकार वृक्षों का एक दिव्य, रमणीय वन है, जो सब ऋतुओं के फूलों से भरा है और शिलाओं के समूहों के बीच उगा है।

श्लोक 26 (6.6.26)

तत्र साक्षात्पशुपतिर्दिव्यैर्भूतैः समावृतः । उमासहायो भगवान्रमते भूतभावनः ॥

tatra sākṣātpaśupatirdivyairbhūtaiḥ samāvṛtaḥ | umāsahāyo bhagavānramate bhūtabhāvanaḥ

वहाँ प्राणियों को उत्पन्न करने वाले भगवान् पशुपति स्वयं दिव्य भूतगणों से घिरे हुए उमा के साथ विहार करते हैं;

श्लोक 27 (6.6.27)

कर्णिकारमयीं मालां बिभ्रत्पादावलम्बिनीम् । त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्योतस्त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ॥

karṇikāramayīṃ mālāṃ bibhratpādāvalambinīm | tribhirnetraiḥ kṛtodyotastribhiḥ sūryairivoditaiḥ

वे पैरों तक लटकती कर्णिकार-पुष्पों की माला धारण किए रहते हैं, और उनके तीन नेत्र ऐसे प्रकाशित होते हैं मानो तीन सूर्य उदित हुए हों।

श्लोक 28 (6.6.28)

तमुग्रतपसः सिद्धाः सुव्रताः सत्यवादिनः । पश्यन्ति नहि दुर्वृत्तैः शक्यो द्रष्टुं महेश्वरः ॥

tamugratapasaḥ siddhāḥ suvratāḥ satyavādinaḥ | paśyanti nahi durvṛttaiḥ śakyo draṣṭuṃ maheśvaraḥ

उग्र तपस्या वाले, उत्तम व्रतधारी और सत्यवादी सिद्ध उनका दर्शन करते हैं; दुराचारी लोग महेश्वर को नहीं देख सकते।

श्लोक 29 (6.6.29)

तस्य शैलस्य शिखरात्क्षीरधारा नरेश्वर । विश्वरूपाऽपरिमिता भीमनिर्घातनिःस्वना ॥

tasya śailasya śikharātkṣīradhārā nareśvara | viśvarūpā'parimitā bhīmanirghātaniḥsvanā

हे नरेश्वर, उस पर्वत के शिखर से दूध के समान श्वेत धारा गिरती है, जो विश्वरूपा और अपरिमित है तथा भयंकर वज्रपात के समान गर्जन करती है।

श्लोक 30 (6.6.30)

पुण्या पुण्यतमैर्जुष्टा गङ्गा भागीरथी शुभा । प्लवन्तीव प्रवेगेन ह्रदे चन्द्रमसः शुभे ॥

puṇyā puṇyatamairjuṣṭā gaṅgā bhāgīrathī śubhā | plavantīva pravegena hrade candramasaḥ śubhe

वह पवित्र और शुभ भागीरथी गंगा है, जिसका सेवन परम पुण्यात्मा करते हैं; वह मानो अपने प्रबल वेग पर तैरती हुई चन्द्रमा के सुन्दर सरोवर में गिरती है।

श्लोक 31 (6.6.31)

तया ह्युत्पादितः पुण्यः स ह्रदः सागरोपमः । तां धारयामास तदा दुर्धरां पर्वतैरपि ॥

tayā hyutpāditaḥ puṇyaḥ sa hradaḥ sāgaropamaḥ | tāṃ dhārayāmāsa tadā durdharāṃ parvatairapi

उसी से वह पवित्र, समुद्र के समान विशाल सरोवर बना है। तब जिसे पर्वत भी धारण नहीं कर सकते थे, उसे महेश्वर ने

श्लोक 32 (6.6.32)

शतं वर्षसहस्राणां शिरसैव महेश्वरः । मेरोस्तु पश्चिमे पार्श्वे केतुमालो महीपते ॥

śataṃ varṣasahasrāṇāṃ śirasaiva maheśvaraḥ | merostu paścime pārśve ketumālo mahīpate

एक लाख वर्षों तक अपने सिर पर ही धारण किया। हे महीपते, मेरु के पश्चिमी पार्श्व में केतुमाल है;

श्लोक 33 (6.6.33)

जम्बूखण्डे तु तत्रैव महाजनपदो नृप । आयुर्दशसहस्राणि वर्षाणां तत्र भारत ॥

jambūkhaṇḍe tu tatraiva mahājanapado nṛpa | āyurdaśasahasrāṇi varṣāṇāṃ tatra bhārata

और हे नृप, वहीं जम्बूखण्ड में एक विशाल जनपद है। हे भारत, वहाँ आयु दस हजार वर्ष की होती है।

श्लोक 34 (6.6.34)

सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः । अनामया वीतशोका नित्यं मुदितमानसाः ॥

suvarṇavarṇāśca narāḥ striyaścāpsarasopamāḥ | anāmayā vītaśokā nityaṃ muditamānasāḥ

वहाँ के पुरुष स्वर्ण के रंग के और स्त्रियाँ अप्सराओं के समान होती हैं। वे रोग और शोक से रहित और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं;

श्लोक 35 (6.6.35)

जायन्ते मानवास्तत्र निष्टप्तकनकप्रभाः । गन्धमादनशृङ्गेषु कुबेरः सह राक्षसैः ॥

jāyante mānavāstatra niṣṭaptakanakaprabhāḥ | gandhamādanaśṛṅgeṣu kuberaḥ saha rākṣasaiḥ

वहाँ जन्म लेने वाले मनुष्य तपाए हुए सोने के समान कान्तिमान होते हैं। गन्धमादन के शिखरों पर गुह्यकों के स्वामी कुबेर राक्षसों के साथ,

श्लोक 36 (6.6.36)

संवृतोऽप्सरसां सङ्घैर्मोदते गुह्यकाधिपः । गन्धमादनपार्श्वे तु परे त्वपरगण्डिकाः ॥

saṃvṛto'psarasāṃ saṅghairmodate guhyakādhipaḥ | gandhamādanapārśve tu pare tvaparagaṇḍikāḥ

अप्सराओं के समूहों से घिरे हुए आनन्द करते हैं। गन्धमादन के पार्श्व में दूसरी छोटी पहाड़ियाँ हैं, जिन्हें अपरगण्डिका कहते हैं;

श्लोक 37 (6.6.37)

एकादशसहस्राणि वर्षाणां परमायुषः । तत्र कृष्णा नरा राजंस्तेजोयुक्ता महाबलाः । स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभाः सर्वाः सुप्रियदर्शनाः ॥

ekādaśasahasrāṇi varṣāṇāṃ paramāyuṣaḥ | tatra kṛṣṇā narā rājaṃstejoyuktā mahābalāḥ | striyaścotpalavarṇābhāḥ sarvāḥ supriyadarśanāḥ

वहाँ परम आयु ग्यारह हजार वर्ष की है। हे राजन्, वहाँ के पुरुष श्यामवर्ण, तेजस्वी और महाबली होते हैं, और सब स्त्रियाँ नीलकमल के समान वर्ण वाली और देखने में अत्यन्त प्रिय होती हैं।

श्लोक 38 (6.6.38)

नीलात्परतरं श्वेतं श्वेताद्धैरण्यकं परम् । वर्षमैरावतं राजन्नानाजनपदावृतम् ॥

nīlātparataraṃ śvetaṃ śvetāddhairaṇyakaṃ param | varṣamairāvataṃ rājannānājanapadāvṛtam

नील के आगे श्वेत वर्ष है, श्वेत के आगे हैरण्यक, और हे राजन्, फिर अनेक जनपदों से भरा ऐरावत वर्ष है।

श्लोक 39 (6.6.39)

धनुःसंस्थे महाराज द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे । इलावृतं मध्यमं तु पञ्च दीर्घाणि चैव हि ॥

dhanuḥsaṃsthe mahārāja dve varṣe dakṣiṇottare | ilāvṛtaṃ madhyamaṃ tu pañca dīrghāṇi caiva hi

हे महाराज, दक्षिण और उत्तर के दो वर्ष धनुष के आकार के हैं; बीच में इलावृत है; और पाँच वर्ष लम्बे हैं।

श्लोक 40 (6.6.40)

उत्तरोत्तरमेतेभ्यो वर्षमुद्रिच्यते गुणैः । आयुःप्रमाणमारोग्यं धर्मतः कामतोऽर्थतः ॥

uttarottarametebhyo varṣamudricyate guṇaiḥ | āyuḥpramāṇamārogyaṃ dharmataḥ kāmato'rthataḥ

इन वर्षों में उत्तर की ओर प्रत्येक वर्ष पिछले से गुणों में बढ़कर है: आयु के परिमाण में, आरोग्य में, और धर्म, काम तथा अर्थ में।

श्लोक 41 (6.6.41)

समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भारत । एवमेषा महाराज पर्वतैः पृथिवी चिता ॥

samanvitāni bhūtāni teṣu varṣeṣu bhārata | evameṣā mahārāja parvataiḥ pṛthivī citā

हे भारत, उन वर्षों के प्राणी इन गुणों से युक्त हैं। हे महाराज, इस प्रकार यह पृथ्वी पर्वतों से व्याप्त है।

श्लोक 42 (6.6.42)

हेमकूटस्तु सुमहान्कैलासो नाम पर्वतः । यत्र वैश्रवणो राजन्गुह्यकैः सह मोदते ॥

hemakūṭastu sumahānkailāso nāma parvataḥ | yatra vaiśravaṇo rājanguhyakaiḥ saha modate

विशाल हेमकूट ही कैलास नामक पर्वत है, हे राजन्, जहाँ वैश्रवण (कुबेर) गुह्यकों के साथ आनन्द करते हैं।

श्लोक 43 (6.6.43)

तत्र देवो महादेवो नित्यमास्ते सहोमया । शीते शिलातले रम्ये देवर्षिगणपूजितः ॥

tatra devo mahādevo nityamāste sahomayā | śīte śilātale ramye devarṣigaṇapūjitaḥ

वहाँ देव महादेव उमा के साथ एक शीतल और रमणीय शिलातल पर सदा विराजते हैं, और देवर्षिगण उनकी पूजा करते हैं।

श्लोक 44 (6.6.44)

अस्त्युत्तरेण कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति । हिरण्यशृङ्गः सुमहान्दिव्यो मणिमयो गिरिः ॥

astyuttareṇa kailāsaṃ mainākaṃ parvataṃ prati | hiraṇyaśṛṅgaḥ sumahāndivyo maṇimayo giriḥ

कैलास के उत्तर में मैनाक पर्वत की ओर हिरण्यशृङ्ग नामक एक विशाल, दिव्य, मणिमय पर्वत है।

श्लोक 45 (6.6.45)

तस्य पार्श्वे महद्दिव्यं शुभ्रं काञ्चनवालुकम् । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः ॥

tasya pārśve mahaddivyaṃ śubhraṃ kāñcanavālukam | ramyaṃ bindusaro nāma yatra rājā bhagīrathaḥ

उसके पास स्वर्णमयी बालू वाला एक विशाल, दिव्य और उज्ज्वल सरोवर है, जिसका नाम बिन्दुसर है; वहाँ राजा भगीरथ ने

श्लोक 46 (6.6.46)

दृष्ट्वा भागीरथीं गङ्गामुवास बहुलाः समाः । यूपा मणिमयास्तत्र चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥

dṛṣṭvā bhāgīrathīṃ gaṅgāmuvāsa bahulāḥ samāḥ | yūpā maṇimayāstatra caityāścāpi hiraṇmayāḥ

भागीरथी गंगा का दर्शन करके बहुत वर्षों तक निवास किया। वहाँ मणियों के यज्ञस्तम्भ और सोने की वेदियाँ हैं।

श्लोक 47 (6.6.47)

तत्रेष्ट्वा तु गतः सिद्धिं सहस्राक्षो महायशाः । स्रष्टा भूतपतिर्यत्र सर्वलोकान्सनातनान् ॥

tatreṣṭvā tu gataḥ siddhiṃ sahasrākṣo mahāyaśāḥ | sraṣṭā bhūtapatiryatra sarvalokānsanātanān

वहाँ महायशस्वी सहस्राक्ष इन्द्र ने यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त की। वहाँ सब सनातन लोकों के स्रष्टा भूतपति,

श्लोक 48 (6.6.48)

उपास्यते तिग्मतेजा यत्र भूतैः समन्ततः । नरनारायणौ ब्रह्मा मनुः स्थाणुश्च पञ्चमः ॥

upāsyate tigmatejā yatra bhūtaiḥ samantataḥ | naranārāyaṇau brahmā manuḥ sthāṇuśca pañcamaḥ

जिनका तेज प्रचण्ड है, चारों ओर से प्राणियों द्वारा उपासित होते हैं; और वहाँ नर और नारायण, ब्रह्मा, मनु और पाँचवें स्थाणु रहते हैं।

श्लोक 49 (6.6.49)

तत्र दिव्या त्रिपथगा प्रथमं तु प्रतिष्ठिता । ब्रह्मलोकादपक्रान्ता सप्तधा प्रतिपद्यते ॥

tatra divyā tripathagā prathamaṃ tu pratiṣṭhitā | brahmalokādapakrāntā saptadhā pratipadyate

वहाँ तीन मार्गों वाली दिव्य गंगा पहले स्थित हुई; ब्रह्मलोक से उतरकर वह सात धाराओं में बँट जाती है:

श्लोक 50 (6.6.50)

वस्वौकसारा नलिनी पावनी च सरस्वती । जम्बूनदी च सीता च गङ्गा सिंधुश्च सप्तमी ॥

vasvaukasārā nalinī pāvanī ca sarasvatī | jambūnadī ca sītā ca gaṅgā siṃdhuśca saptamī

वस्वौकसारा, नलिनी, पावन करने वाली सरस्वती, जम्बूनदी, सीता, गंगा और सातवीं सिन्धु।

श्लोक 51 (6.6.51)

अचिन्त्या दिव्यसंकाशा प्रभोरेषैव संविधिः । उपासते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥

acintyā divyasaṃkāśā prabhoreṣaiva saṃvidhiḥ | upāsate yatra satraṃ sahasrayugaparyaye

यह प्रभु का ही अचिन्त्य और दिव्य प्रभा वाला विधान है। वहाँ एक हजार युगों के अन्त में सत्र-यज्ञ किया जाता है।

श्लोक 52 (6.6.52)

दृश्याऽदृश्या च भवति तत्र तत्र सरस्वती । एता दिव्याः सप्त गङ्गास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥

dṛśyā'dṛśyā ca bhavati tatra tatra sarasvatī | etā divyāḥ sapta gaṅgāstriṣu lokeṣu viśrutāḥ

सरस्वती कहीं दिखाई देती है और कहीं अदृश्य हो जाती है। ये सात दिव्य गंगाएँ तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 53 (6.6.53)

रक्षांसि वै हिमवति हेमकूटे तु गुह्यकाः । सर्पा नागाश्च निषधे गोकर्णं च तपोवनम् ॥

rakṣāṃsi vai himavati hemakūṭe tu guhyakāḥ | sarpā nāgāśca niṣadhe gokarṇaṃ ca tapovanam

हिमवान् पर राक्षस, हेमकूट पर गुह्यक, और निषध पर सर्प और नाग रहते हैं; और गोकर्ण तपोवन है।

श्लोक 54 (6.6.54)

देवासुराणां सर्वेषां श्वेतपर्वत उच्यते । गन्धर्वा निषधे नित्यं नीले ब्रह्मर्षयस्तथा । शृङ्गवांस्तु महाराज देवानां प्रतिसंचरः ॥

devāsurāṇāṃ sarveṣāṃ śvetaparvata ucyate | gandharvā niṣadhe nityaṃ nīle brahmarṣayastathā | śṛṅgavāṃstu mahārāja devānāṃ pratisaṃcaraḥ

श्वेत पर्वत सब देवताओं और असुरों का स्थान कहा जाता है। गन्धर्व सदा निषध पर रहते हैं और ब्रह्मर्षि नील पर; और हे महाराज, शृङ्गवान् देवताओं का विचरण-स्थान है।

श्लोक 55 (6.6.55)

इत्येतानि महाराज सप्त वर्षाणि भागशः । भूतान्युपनिविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ॥

ityetāni mahārāja sapta varṣāṇi bhāgaśaḥ | bhūtānyupaniviṣṭāni gatimanti dhruvāṇi ca

हे महाराज, ये विभाग के अनुसार सात वर्ष हैं। इनमें चर और अचर सब प्राणी बसे हुए हैं।

श्लोक 56 (6.6.56)

तेषामृद्धिर्बहुविधा दृश्यते दैवमानुषी । अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धेया तु बुभूषता ॥

teṣāmṛddhirbahuvidhā dṛśyate daivamānuṣī | aśakyā parisaṃkhyātuṃ śraddheyā tu bubhūṣatā

उनकी दैवी और मानवी समृद्धि अनेक प्रकार की दिखाई देती है। उसकी गणना नहीं की जा सकती, पर कल्याण चाहने वाले को उस पर श्रद्धा रखनी चाहिए।

श्लोक 57 (6.6.57)

यां तु पृच्छसि मां राजन्दिव्यामेतां शशाकृतिम् । पार्श्वे शशस्य द्वे वर्षे उक्ते ये दक्षिणोत्तरे । कर्णौ तु शाकद्वीपश्च काश्यपद्वीप एव च ॥

yāṃ tu pṛcchasi māṃ rājandivyāmetāṃ śaśākṛtim | pārśve śaśasya dve varṣe ukte ye dakṣiṇottare | karṇau tu śākadvīpaśca kāśyapadvīpa eva ca

हे राजन्, तुम मुझसे जिस दिव्य शशाकृति के विषय में पूछते हो, उसके पार्श्वों में वे दो वर्ष हैं जो दक्षिण और उत्तर के बताए गए हैं; और उसके दोनों कान शाकद्वीप और काश्यपद्वीप हैं।

श्लोक 58 (6.6.58)

ताम्रपर्णीशिरो राजञ्छ्रीमान्मलयपर्वतः । एतद्द्वितीयं द्वीपस्य दृश्यते शशसंस्थितम् ॥

tāmraparṇīśiro rājañchrīmānmalayaparvataḥ | etaddvitīyaṃ dvīpasya dṛśyate śaśasaṃsthitam

हे राजन्, उसका सिर ताम्रपर्णी और श्रीमान् मलय पर्वत है। द्वीप का यह दूसरा भाग शश के आकार में दिखाई देता है।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7