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भीष्म पर्व · अध्याय 7

उत्तरकुरु और भद्राश्व

धृतराष्ट्र मेरु के उत्तरी और पूर्वी पार्श्व तथा माल्यवान् पर्वत के विषय में पूछते हैं। संजय उत्तरकुरु का वर्णन करते हैं, जहाँ कामनाएँ पूरी करने वाले और दूध देने वाले वृक्ष हैं, मणिमयी भूमि है, और लोग जोड़ों में जन्म लेकर दीर्घ आयु तक साथ रहते हैं; फिर वे भद्राश्व, उसके महान् कालाम्र वृक्ष और चन्द्रमा-से उज्ज्वल लोगों का वर्णन करते हैं। वे सुदर्शन नामक जामुन वृक्ष के बारे में बताते हैं, जिससे जम्बूद्वीप का नाम पड़ा और जिसके रस से नदी बनती है, तथा माल्यवान् पर संवर्तक अग्नि और वहाँ जन्मे उन लोगों का वर्णन करते हैं जो सूर्य में और फिर चन्द्रमण्डल में प्रवेश करते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (6.7.1)

मेरोरथोत्तरं पार्श्वं पूर्वं चाचक्ष्व संजय । निखिलेन महाबुद्धे माल्यवन्तं च पर्वतम् ॥

merorathottaraṃ pārśvaṃ pūrvaṃ cācakṣva saṃjaya | nikhilena mahābuddhe mālyavantaṃ ca parvatam

"हे महाबुद्धिमान संजय, अब मुझे मेरु के उत्तरी और पूर्वी पार्श्व का तथा माल्यवान् पर्वत का पूरा वर्णन सुनाओ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (6.7.2)

दक्षिणेन तु नीलस्य मेरोः पार्श्वे तथोत्तरे । उत्तराः कुरवो राजन्पुण्याः सिद्धनिषेविताः ॥

dakṣiṇena tu nīlasya meroḥ pārśve tathottare | uttarāḥ kuravo rājanpuṇyāḥ siddhaniṣevitāḥ

हे राजन्, नील के दक्षिण में और मेरु के उत्तरी पार्श्व में पवित्र उत्तरकुरु हैं, जहाँ सिद्ध निवास करते हैं।

श्लोक 3 (6.7.3)

तत्र वृक्षा मधुफला नित्यपुष्पफलोपगाः । पुष्पाणि च सुगन्धीनि रसवन्ति फलानि च ॥

tatra vṛkṣā madhuphalā nityapuṣpaphalopagāḥ | puṣpāṇi ca sugandhīni rasavanti phalāni ca

वहाँ के वृक्ष मीठे फलों वाले हैं और सदा फूलों-फलों से लदे रहते हैं; फूल सुगन्धित और फल रसीले होते हैं।

श्लोक 4 (6.7.4)

सर्वकामफलास्तत्र केचिद्वृक्षा जनाधिप । अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र नराधिप ॥

sarvakāmaphalāstatra kecidvṛkṣā janādhipa | apare kṣīriṇo nāma vṛkṣāstatra narādhipa

हे जनाधिप, वहाँ कुछ वृक्ष सब कामनाएँ पूरी करने वाले फल देते हैं; और हे नराधिप, वहाँ क्षीरी नाम के दूसरे वृक्ष भी हैं,

श्लोक 5 (6.7.5)

ये क्षरन्ति सदा क्षीरं षड्रसं चामृतोपमम् । वस्त्राणि च प्रसूयन्ते फलेष्वाभरणानि च ॥

ye kṣaranti sadā kṣīraṃ ṣaḍrasaṃ cāmṛtopamam | vastrāṇi ca prasūyante phaleṣvābharaṇāni ca

जो सदा छहों रसों से युक्त अमृत के समान दूध बहाते हैं; और उनके फलों से वस्त्र और आभूषण उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 6 (6.7.6)

सर्वा मणिमयी भूमिः सूक्ष्मकाञ्चनवालुका । सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पङ्का च जनाधिप । पुष्करिण्यः शुभास्तत्र सुखस्पर्शा मनोरमाः ॥

sarvā maṇimayī bhūmiḥ sūkṣmakāñcanavālukā | sarvartusukhasaṃsparśā niṣpaṅkā ca janādhipa | puṣkariṇyaḥ śubhāstatra sukhasparśā manoramāḥ

वहाँ की सारी भूमि मणिमयी है और उसकी बालू सूक्ष्म स्वर्णकणों की है; हे जनाधिप, वह सब ऋतुओं में छूने में सुखद और कीचड़ से रहित है। वहाँ सुन्दर पुष्करिणियाँ हैं, जो छूने में सुखद और मनोरम हैं।

श्लोक 7 (6.7.7)

देवलोकच्युताः सर्वे जायन्ते तत्र मानवाः । शुक्लाभिजनसंपन्नाः सर्वे सुप्रियदर्शनाः ॥

devalokacyutāḥ sarve jāyante tatra mānavāḥ | śuklābhijanasaṃpannāḥ sarve supriyadarśanāḥ

वहाँ जन्म लेने वाले सब मनुष्य देवलोक से च्युत होकर आते हैं; वे शुद्ध कुल से सम्पन्न हैं और सब देखने में अत्यन्त प्रिय होते हैं।

श्लोक 8 (6.7.8)

मिथुनानि च जायन्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः । तेषां ते क्षीरिणां क्षीरं पिबन्त्यमृतसन्निभम् ॥

mithunāni ca jāyante striyaścāpsarasopamāḥ | teṣāṃ te kṣīriṇāṃ kṣīraṃ pibantyamṛtasannibham

वहाँ जोड़े जन्म लेते हैं और स्त्रियाँ अप्सराओं के समान होती हैं। वे उन क्षीरी वृक्षों का अमृत-सा दूध पीते हैं।

श्लोक 9 (6.7.9)

मिथुनं जायते काले समं तच्च प्रवर्धते । तुल्यरूपगुणोपेतं समवेषं तथैव च ॥

mithunaṃ jāyate kāle samaṃ tacca pravardhate | tulyarūpaguṇopetaṃ samaveṣaṃ tathaiva ca

प्रत्येक जोड़ा एक ही समय जन्म लेता है और साथ-साथ बढ़ता है; दोनों रूप और गुणों में समान होते हैं और वेश में भी एक-से,

श्लोक 10 (6.7.10)

एवमेवानुरूपं च चक्रवाकसमं विभो । निरामयास्ते लोका नित्यं मुदितमानसाः ॥

evamevānurūpaṃ ca cakravākasamaṃ vibho | nirāmayāste lokā nityaṃ muditamānasāḥ

हे विभो, वे इसी प्रकार चकवा-चकवी की भाँति एक-दूसरे के अनुरूप होते हैं। वे लोग रोगरहित और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं।

श्लोक 11 (6.7.11)

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । जीवन्ति ते महाराज न चान्योन्यं जहत्युत ॥

daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca | jīvanti te mahārāja na cānyonyaṃ jahatyuta

हे महाराज, वे दस हजार और दस सौ वर्ष जीवित रहते हैं और कभी एक-दूसरे को नहीं छोड़ते।

श्लोक 12 (6.7.12)

भारुण्डा नाम शकुनास्तीक्ष्णतुण्डा महाबलाः । तान्निर्हरन्तीह मृतान्दरीषु प्रक्षिपन्ति च ॥

bhāruṇḍā nāma śakunāstīkṣṇatuṇḍā mahābalāḥ | tānnirharantīha mṛtāndarīṣu prakṣipanti ca

भारुण्ड नामक तीखी चोंच वाले महाबली पक्षी वहाँ से मरे हुओं को उठा ले जाते हैं और गुफाओं में डाल देते हैं।

श्लोक 13 (6.7.13)

उत्तराः कुरवो राजन्व्याख्यातास्ते समासतः । मेरोः पार्श्वमहं पूर्वं वक्ष्याम्यथ यथातथम् ॥

uttarāḥ kuravo rājanvyākhyātāste samāsataḥ | meroḥ pārśvamahaṃ pūrvaṃ vakṣyāmyatha yathātatham

हे राजन्, मैंने तुम्हें संक्षेप में उत्तरकुरुओं का वर्णन सुनाया। अब मैं मेरु के पूर्वी पार्श्व का यथार्थ वर्णन करूँगा।

श्लोक 14 (6.7.14)

तस्य मूर्धाभिषेकस्तु भद्राश्वस्य विशांपते । भद्रसालवनं यत्र कालाम्रश्च महाद्रुमः ॥

tasya mūrdhābhiṣekastu bhadrāśvasya viśāṃpate | bhadrasālavanaṃ yatra kālāmraśca mahādrumaḥ

हे विशाम्पते, भद्राश्व का मुकुटमणि भद्रशाल वन है, जहाँ कालाम्र नामक महान् वृक्ष है।

श्लोक 15 (6.7.15)

कालाम्रस्तु महाराज नित्यपुष्पफलः शुभः । द्रुमश्च योजनोत्सेधः सिद्धचारणसेवितः ॥

kālāmrastu mahārāja nityapuṣpaphalaḥ śubhaḥ | drumaśca yojanotsedhaḥ siddhacāraṇasevitaḥ

हे महाराज, वह कालाम्र शुभ है और सदा फूलों-फलों से युक्त रहता है; वह वृक्ष एक योजन ऊँचा है और सिद्ध तथा चारण उसका सेवन करते हैं।

श्लोक 16 (6.7.16)

तत्र ते पुरुषाः श्वेतास्तेजोयुक्ता महाबलाः । स्त्रियः कुमुदवर्णाश्च सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः ॥

tatra te puruṣāḥ śvetāstejoyuktā mahābalāḥ | striyaḥ kumudavarṇāśca sundaryaḥ priyadarśanāḥ

वहाँ के पुरुष गौरवर्ण, तेजस्वी और महाबली होते हैं; स्त्रियाँ कुमुद के समान वर्ण वाली, सुन्दर और देखने में प्रिय होती हैं।

श्लोक 17 (6.7.17)

चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः । चन्द्रशीतलगात्र्यश्च नृत्तगीतविशारदाः ॥

candraprabhāścandravarṇāḥ pūrṇacandranibhānanāḥ | candraśītalagātryaśca nṛttagītaviśāradāḥ

उनकी कान्ति और वर्ण चन्द्रमा जैसे हैं, मुख पूर्णचन्द्र के समान हैं, अंग चन्द्रमा की तरह शीतल हैं, और वे नृत्य-गीत में निपुण होती हैं।

श्लोक 18 (6.7.18)

दशवर्षसहस्राणि तत्रायुर्भरतर्षभ । कालाम्ररसपीतास्ते नित्यं संस्थितयौवनाः ॥

daśavarṣasahasrāṇi tatrāyurbharatarṣabha | kālāmrarasapītāste nityaṃ saṃsthitayauvanāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ आयु दस हजार वर्ष की होती है; कालाम्र का रस पीकर वे सदा युवा बने रहते हैं।

श्लोक 19 (6.7.19)

दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु । सुदर्शनो नाम महाञ्जम्बूवृक्षः सनातनः ॥

dakṣiṇena tu nīlasya niṣadhasyottareṇa tu | sudarśano nāma mahāñjambūvṛkṣaḥ sanātanaḥ

नील के दक्षिण और निषध के उत्तर में सुदर्शन नामक विशाल, सनातन जामुन का वृक्ष है।

श्लोक 20 (6.7.20)

सर्वकामफलः पुण्यः सिद्धचारणसेवितः । तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपः सनातनः ॥

sarvakāmaphalaḥ puṇyaḥ siddhacāraṇasevitaḥ | tasya nāmnā samākhyāto jambūdvīpaḥ sanātanaḥ

वह पवित्र है, उसके फल सब कामनाएँ पूरी करते हैं, और सिद्ध तथा चारण उसका सेवन करते हैं। उसी के नाम से सनातन जम्बूद्वीप प्रसिद्ध है।

श्लोक 21 (6.7.21)

योजनानां सहस्रं च शतं च भरतर्षभ । उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवस्पृङ्मनुजेश्वर ॥

yojanānāṃ sahasraṃ ca śataṃ ca bharatarṣabha | utsedho vṛkṣarājasya divaspṛṅmanujeśvara

हे भरतश्रेष्ठ, उस वृक्षराज की ऊँचाई एक हजार एक सौ योजन है; हे मनुजेश्वर, वह आकाश को छूता है।

श्लोक 22 (6.7.22)

अरत्नीनां सहस्रं च शतानि दश पञ्च च । परिणाहस्तु वृक्षस्य फलानां रसभेदिनाम् ॥

aratnīnāṃ sahasraṃ ca śatāni daśa pañca ca | pariṇāhastu vṛkṣasya phalānāṃ rasabhedinām

रस से फट पड़ने वाले उस वृक्ष के फलों की परिधि एक हजार अरत्नि और पंद्रह सौ अरत्नि है।

श्लोक 23 (6.7.23)

पतमानानि तान्युर्व्यां कुर्वन्ति विपुलं स्वनम् । मुञ्चन्ति च रसं राजंस्तस्मिन्रजतसन्निभम् ॥

patamānāni tānyurvyāṃ kurvanti vipulaṃ svanam | muñcanti ca rasaṃ rājaṃstasminrajatasannibham

वे फल धरती पर गिरते हुए बड़ा शब्द करते हैं, और हे राजन्, वहाँ चाँदी के समान रस छोड़ते हैं।

श्लोक 24 (6.7.24)

तस्या जम्ब्वाः फलरसो नदी भूत्वा जनाधिप । मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा संप्रयात्युत्तरान्कुरून् ॥

tasyā jambvāḥ phalaraso nadī bhūtvā janādhipa | meruṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā saṃprayātyuttarānkurūn

हे जनाधिप, उस जामुन के फलों का रस नदी बनकर मेरु की प्रदक्षिणा करता हुआ उत्तरकुरुओं की ओर जाता है।

श्लोक 25 (6.7.25)

तत्र तेषां मनःशान्तिर्न पिपासा जनाधिप । तस्मिन्फलरसे पीते न जरा बाधते च तान् ॥

tatra teṣāṃ manaḥśāntirna pipāsā janādhipa | tasminphalarase pīte na jarā bādhate ca tān

हे जनाधिप, वहाँ उन्हें मन की शान्ति मिलती है और प्यास नहीं लगती; उस फल-रस को पी लेने पर उन्हें बुढ़ापा नहीं सताता।

श्लोक 26 (6.7.26)

तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम् । इन्द्रगोपकसंकाशं जायते भास्वरं तु तत् ॥

tatra jāmbūnadaṃ nāma kanakaṃ devabhūṣaṇam | indragopakasaṃkāśaṃ jāyate bhāsvaraṃ tu tat

वहाँ जाम्बूनद नामक सोना उत्पन्न होता है, जो देवताओं का आभूषण है; वह इन्द्रगोप कीट के समान लाल और चमकीला होता है।

श्लोक 27 (6.7.27)

तरुणादित्यवर्णाश्च जायन्ते तत्र मानवाः । तथा माल्यवतः शृङ्गे दृश्यते हव्यवाट् सदा ॥

taruṇādityavarṇāśca jāyante tatra mānavāḥ | tathā mālyavataḥ śṛṅge dṛśyate havyavāṭ sadā

वहाँ जन्म लेने वाले मनुष्य उगते सूर्य के वर्ण के होते हैं। और माल्यवान् के शिखर पर हव्यवाहन अग्नि सदा दिखाई देता है,

श्लोक 28 (6.7.28)

नाम्ना संवर्तको नाम कालाग्निर्भरतर्षभ । तथा माल्यवतः शृङ्गे पूर्वपूर्वानुगण्डिका ॥

nāmnā saṃvartako nāma kālāgnirbharatarṣabha | tathā mālyavataḥ śṛṅge pūrvapūrvānugaṇḍikā

हे भरतश्रेष्ठ, वह संवर्तक नामक कालाग्नि है। माल्यवान् के शिखर पर पूर्व की ओर छोटी पहाड़ियों की एक श्रृंखला भी है।

श्लोक 29 (6.7.29)

योजनानां सहस्राणि पञ्चषण्माल्यवानथ । महारजतसंकाशा जायन्ते तत्र मानवाः ॥

yojanānāṃ sahasrāṇi pañcaṣaṇmālyavānatha | mahārajatasaṃkāśā jāyante tatra mānavāḥ

माल्यवान् ग्यारह हजार योजन तक फैला है। वहाँ जन्म लेने वाले मनुष्य उत्तम स्वर्ण के समान होते हैं;

श्लोक 30 (6.7.30)

ब्रह्मलोकच्युताः सर्वे सर्वे सर्वेषु साधवः । तपस्तप्यन्ति ते तीव्रं भवन्ति ह्यूर्ध्वरेतसः । रक्षणार्थं तु भूतानां प्रविशन्ते दिवाकरम् ॥

brahmalokacyutāḥ sarve sarve sarveṣu sādhavaḥ | tapastapyanti te tīvraṃ bhavanti hyūrdhvaretasaḥ | rakṣaṇārthaṃ tu bhūtānāṃ praviśante divākaram

वे सब ब्रह्मलोक से च्युत हुए हैं और सब सबके प्रति साधु हैं। वे कठोर तप करते हैं, ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी होते हैं, और प्राणियों की रक्षा के लिए सूर्य में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 31 (6.7.31)

षष्टिस्तानि सहस्राणि षष्टिरेव शतानि च । अरुणस्याग्रतो यान्ति परिवार्य दिवाकरम् ॥

ṣaṣṭistāni sahasrāṇi ṣaṣṭireva śatāni ca | aruṇasyāgrato yānti parivārya divākaram

उनमें से साठ हजार, और साठ सौ और, सूर्य को घेरकर अरुण के आगे चलते हैं।

श्लोक 32 (6.7.32)

षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिमेव शतानि च । आदित्यतापतप्तास्ते विशन्ति शशिमण्डलम् ॥

ṣaṣṭiṃ varṣasahasrāṇi ṣaṣṭimeva śatāni ca | ādityatāpataptāste viśanti śaśimaṇḍalam

साठ हजार और साठ सौ वर्षों तक सूर्य के ताप से तपकर वे फिर चन्द्रमण्डल में प्रवेश करते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8