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द्रोण पर्व · अध्याय 198

भीम और धृष्टद्युम्न का अर्जुन को उत्तर

अर्जुन की बातें सुनकर योद्धा चुप रहते हैं, तब भीम उन्हें फटकारते हैं: अर्जुन वन के तपस्वी की तरह धर्म की बातें करते हैं, जबकि उनकी सहनशीलता और शक्ति सर्वविदित हैं; भीम अकेले गदा लेकर द्रोणपुत्र का सामना करने को तैयार हैं। इसके बाद धृष्टद्युम्न अर्जुन के आरोप का उत्तर देते हैं: द्रोण ने ब्राह्मण के धर्म को छोड़कर क्षत्रिय का धर्म अपनाया था, इसलिए उनका वध उचित था; छल का उत्तर छल से दिया जा सकता है; और स्वयं अर्जुन ने भी भीष्म और भगदत्त को मारा है।

अध्याय 197अध्याय-सूचीअध्याय 199

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.198.1)

अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः । अप्रियं वा प्रियं वाऽपि महाराज धनञ्जयम् ॥

arjunasya vacaḥ śrutvā nocustatra mahārathāḥ | apriyaṃ vā priyaṃ vā'pi mahārāja dhanañjayam

अर्जुन की बात सुनकर वहाँ के महारथी, हे महाराज, धनञ्जय से न कुछ प्रिय बोले, न अप्रिय।

श्लोक 2 (7.198.2)

ततः क्रुद्धो महाबाहुर्भीमसेनोऽभ्यभाषत । कुत्सयन्निव कौन्तेयमर्जुनं भरतर्षभ ॥

tataḥ kruddho mahābāhurbhīmaseno'bhyabhāṣata | kutsayanniva kaunteyamarjunaṃ bharatarṣabha

तब, हे भरतश्रेष्ठ, क्रोधित महाबाहु भीमसेन ने कुन्तीपुत्र अर्जुन को मानो उपहास करते हुए कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 3 (7.198.3)

मुनिर्यथाऽरण्यगतो भाषते धर्मसंहितम् । न्यस्तदण्डो यथा पार्थ ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥

muniryathā'raṇyagato bhāṣate dharmasaṃhitam | nyastadaṇḍo yathā pārtha brāhmaṇaḥ saṃśitavrataḥ

हे पार्थ, तुम वन में रहने वाले मुनि की तरह, या दण्ड त्याग चुके कठोर व्रती ब्राह्मण की तरह, धर्म से भरी बातें कर रहे हो।

श्लोक 4 (7.198.4)

क्षतत्राता क्षताज्जीवन्क्षन्ता स्त्रीष्वपि साधुषु । क्षत्रियः क्षितिमाप्नोति क्षिप्रं धर्मं यशः श्रियः ॥

kṣatatrātā kṣatājjīvankṣantā strīṣvapi sādhuṣu | kṣatriyaḥ kṣitimāpnoti kṣipraṃ dharmaṃ yaśaḥ śriyaḥ

जो क्षत्रिय घाव से दूसरों की रक्षा करता है, घाव से ही जीविका पाता है और स्त्रियों तथा साधुओं के प्रति क्षमाशील रहता है, वह शीघ्र ही पृथ्वी, धर्म, यश और लक्ष्मी प्राप्त करता है।

श्लोक 5 (7.198.5)

स भवान्क्षत्रियगुणैर्युक्तः सर्वैः कुलोद्वहः । अविपश्चिद्यथा वाचं व्याहरन्नाद्य शोभसे ॥

sa bhavānkṣatriyaguṇairyuktaḥ sarvaiḥ kulodvahaḥ | avipaścidyathā vācaṃ vyāharannādya śobhase

तुम कुल के भार को उठाने वाले और क्षत्रिय के सब गुणों से युक्त हो; फिर भी अनजान की तरह बोलते हुए आज तुम शोभा नहीं देते।

श्लोक 6 (7.198.6)

पराक्रमस्ते कौन्तेय शक्रस्येव शचीपतेः । न चातिवर्तसे धर्मं वेलामिव महोदधिः ॥

parākramaste kaunteya śakrasyeva śacīpateḥ | na cātivartase dharmaṃ velāmiva mahodadhiḥ

हे कुन्तीपुत्र, तुम्हारा पराक्रम शचीपति इन्द्र के समान है, और तुम धर्म का उल्लंघन उसी प्रकार नहीं करते जैसे महासागर अपनी तट-रेखा को नहीं लाँघता।

श्लोक 7 (7.198.7)

न पूजयेत्त्वां कोन्वद्य यत्त्रयोदशवार्षिकम् । अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा धर्ममेवाभिकाङ्क्षसे ॥

na pūjayettvāṃ konvadya yattrayodaśavārṣikam | amarṣaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā dharmamevābhikāṅkṣase

आज कौन तुम्हारा आदर नहीं करेगा, जिसने तेरह वर्ष तक अपने क्रोध को पीछे डाल दिया और केवल धर्म को ही चाहा?

श्लोक 8 (7.198.8)

दिष्ट्या तात मनस्तेऽद्य स्वधर्ममनुवर्तते । आनृशंस्ये च ते दिष्ट्या बुद्धिः सततमच्युत ॥

diṣṭyā tāta manaste'dya svadharmamanuvartate | ānṛśaṃsye ca te diṣṭyā buddhiḥ satatamacyuta

भाग्य की बात है कि आज तुम्हारा मन अपने धर्म का अनुसरण कर रहा है; हे अच्युत, भाग्य की बात है कि तुम्हारी बुद्धि सदा कोमलता में स्थित रहती है।

श्लोक 9 (7.198.9)

यत्तु धर्मप्रवृत्तस्य हृतं राज्यमधर्मतः । द्रौपदी च परामृष्टा सभामानीय शत्रुभिः ॥

yattu dharmapravṛttasya hṛtaṃ rājyamadharmataḥ | draupadī ca parāmṛṣṭā sabhāmānīya śatrubhiḥ

परन्तु धर्म में लगे हुए हमारा राज्य अधर्म से छीन लिया गया, और शत्रुओं ने द्रौपदी को सभा में लाकर उसका स्पर्श-अपमान किया,

श्लोक 10 (7.198.10)

वनं प्रव्राजिताश्चास्म वल्कलाजिनवाससः । अनर्हमाणास्तं भावं त्रयोदश समाः परैः ॥

vanaṃ pravrājitāścāsma valkalājinavāsasaḥ | anarhamāṇāstaṃ bhāvaṃ trayodaśa samāḥ paraiḥ

और शत्रुओं ने हमें तेरह वर्ष तक वल्कल और मृगचर्म पहनाकर वन में भेज दिया, यद्यपि हम ऐसी दशा के योग्य नहीं थे—

श्लोक 11 (7.198.11)

बहूनि क्षाम्य शत्रूणां सत्यधर्मरता वयम् । तथा तन्मर्षयित्वा तु यथा ते उत्पथे स्थिताः ॥

bahūni kṣāmya śatrūṇāṃ satyadharmaratā vayam | tathā tanmarṣayitvā tu yathā te utpathe sthitāḥ

हमने, सत्य और धर्म में लगे रहकर, शत्रुओं के बहुत-से अपराध क्षमा किये; और उसे इस प्रकार सहा कि वे कुमार्ग पर ही डटे रहे।

श्लोक 12 (7.198.12)

एतान्यमर्षस्थानानि मर्षितानि त्वयाऽघन । क्षत्रधर्मप्रसक्तेन सर्वमेतदनुष्ठितम् ॥

etānyamarṣasthānāni marṣitāni tvayā'ghana | kṣatradharmaprasaktena sarvametadanuṣṭhitam

हे निष्पाप, ये सब क्रोध के कारण थे, जिन्हें तुमने क्षत्रिय-धर्म में लगे रहकर सहन किया; यह सब उसी के अनुसार निभाया गया।

श्लोक 13 (7.198.13)

तमधर्ममपाकृष्टं स्मृत्वाऽद्य सहितस्त्वया । सानुबन्धान्हनिष्यामि क्षुद्रान्राज्यहरानहम् ॥

tamadharmamapākṛṣṭaṃ smṛtvā'dya sahitastvayā | sānubandhānhaniṣyāmi kṣudrānrājyaharānaham

उस खींच लाये गये अधर्म को स्मरण करके मैं आज तुम्हारे साथ मिलकर राज्य छीनने वाले उन नीच लोगों को उनके बन्धुओं-सहित मार डालूँगा।

श्लोक 14 (7.198.14)

त्वया हि कथितं पूर्वं युद्धायाभ्यागता वयम् । घटामहे यथाशक्ति त्वं तु नोऽद्य जुगुप्ससे ॥

tvayā hi kathitaṃ pūrvaṃ yuddhāyābhyāgatā vayam | ghaṭāmahe yathāśakti tvaṃ tu no'dya jugupsase

तुमने ही पहले कहा था कि हम युद्ध के लिए आये हैं, और हम यथाशक्ति प्रयत्न कर रहे हैं; फिर भी आज तुम हमारी निन्दा कर रहे हो।

श्लोक 15 (7.198.15)

स्वधर्मं नेच्छसे ज्ञातुं वृथा वचनमेव ते । भयार्दितानामस्माकं वाचा मर्माणि कृन्तसि ॥

svadharmaṃ necchase jñātuṃ vṛthā vacanameva te | bhayārditānāmasmākaṃ vācā marmāṇi kṛntasi

तुम अपना धर्म जानना नहीं चाहते, तुम्हारी बातें व्यर्थ हैं। भय से पीड़ित हम लोगों के मर्मस्थानों को तुम अपनी वाणी से काट रहे हो,

श्लोक 16 (7.198.16)

वपन्व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन । विदीर्यते मे हृदयं त्वया वाक्शल्यपीडितम् ॥

vapanvraṇe kṣāramiva kṣatānāṃ śatrukarśana | vidīryate me hṛdayaṃ tvayā vākśalyapīḍitam

जैसे घायलों के घावों पर क्षार छिड़का जाए, हे शत्रुओं को सुखाने वाले; तुम्हारे वाग्बाण से बिंधकर मेरा हृदय फटा जा रहा है।

श्लोक 17 (7.198.17)

अधर्ममेनं विपुलं धार्मिकः सन्न बुध्यसे । यत्त्वमात्मानमस्मांश्च प्रशंस्यान्न प्रशंससि ॥

adharmamenaṃ vipulaṃ dhārmikaḥ sanna budhyase | yattvamātmānamasmāṃśca praśaṃsyānna praśaṃsasi

धार्मिक होकर भी तुम इस बड़े अधर्म को नहीं समझते कि तुम अपनी और हमारी प्रशंसा नहीं करते, जबकि हम प्रशंसा के योग्य हैं।

श्लोक 18 (7.198.18)

वासुदेवे स्थिते चापि द्रोणपुत्रं प्रशंससि । यः कलां षोडशीं पूर्णां धनञ्जय न तेऽर्हति ॥

vāsudeve sthite cāpi droṇaputraṃ praśaṃsasi | yaḥ kalāṃ ṣoḍaśīṃ pūrṇāṃ dhanañjaya na te'rhati

वासुदेव के उपस्थित रहते हुए भी तुम द्रोणपुत्र की प्रशंसा करते हो, जो हे धनञ्जय, तुम्हारी सोलहवीं पूरी कला के भी योग्य नहीं है।

श्लोक 19 (7.198.19)

स्वयमेवात्मनो दोषान्ब्रुवाणः किं न लज्जसे ॥

svayamevātmano doṣānbruvāṇaḥ kiṃ na lajjase

अपने ही दोषों को स्वयं कहते हुए क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती?

श्लोक 20 (7.198.20)

मम नागायुतं पार्थ बलं बाह्वोर्विधीयते । दारयेयं महीं क्रोधाद्विकिरेयं च पर्वतान् ॥

mama nāgāyutaṃ pārtha balaṃ bāhvorvidhīyate | dārayeyaṃ mahīṃ krodhādvikireyaṃ ca parvatān

हे पार्थ, मेरी भुजाओं में दस हज़ार हाथियों का बल है; क्रोध में मैं पृथ्वी को चीर सकता हूँ और पर्वतों को बिखेर सकता हूँ।

श्लोक 21 (7.198.21)

आविध्यैतां गदां गुर्वी भीमां काञ्चनमालिनीम् । गिरिप्रकाशान्क्षितिजान्भञ्जेयमनिलो यथा ॥

āvidhyaitāṃ gadāṃ gurvī bhīmāṃ kāñcanamālinīm | giriprakāśānkṣitijānbhañjeyamanilo yathā

सोने की मालाओं से सजी इस भारी और भयंकर गदा को घुमाकर मैं पर्वत-जैसे विशाल वृक्षों को वायु की भाँति तोड़ डाल सकता हूँ।

श्लोक 22 (7.198.22)

द्रावयेयं शरैश्चापि सेन्द्रान्देवान्समागतान् । सराक्षसगणान्पार्थ सासुरोरगमानवान् ॥

drāvayeyaṃ śaraiścāpi sendrāndevānsamāgatān | sarākṣasagaṇānpārtha sāsuroragamānavān

मैं अपने बाणों से इन्द्र-सहित एकत्र हुए देवताओं को भी, राक्षसगणों को, हे पार्थ, तथा असुरों, नागों और मनुष्यों को भी भगा सकता हूँ।

श्लोक 23 (7.198.23)

स त्वमेवंविधं जानन्भ्रातरं मां नरर्षभ । द्रोणपुत्राद्भयं कर्तुं नार्हस्यमितविक्रम ॥

sa tvamevaṃvidhaṃ jānanbhrātaraṃ māṃ nararṣabha | droṇaputrādbhayaṃ kartuṃ nārhasyamitavikrama

हे नरश्रेष्ठ, मुझ अपने भाई को ऐसा जानते हुए भी, हे अमित पराक्रमी, तुम्हें द्रोणपुत्र से भय नहीं करना चाहिए।

श्लोक 24 (7.198.24)

अथवा तिष्ठ बीभत्सो सह सर्वैः सहोदरैः । अहमेनं गदापाणिर्जेष्याम्येको महाहवे ॥

athavā tiṣṭha bībhatso saha sarvaiḥ sahodaraiḥ | ahamenaṃ gadāpāṇirjeṣyāmyeko mahāhave

अथवा हे बीभत्सु, तुम अपने सब भाइयों-सहित रुके रहो; मैं अकेला ही गदा हाथ में लेकर इस महायुद्ध में उसे जीत लूँगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 25 (7.198.25)

ततः पाञ्चालराजस्य पुत्रः पार्थमथाब्रवीत् । सङ्क्रुद्धमिव नर्दन्तं हिरण्यकशिपुर्हरिम् ॥

tataḥ pāñcālarājasya putraḥ pārthamathābravīt | saṅkruddhamiva nardantaṃ hiraṇyakaśipurharim

तब पाञ्चाल राजा के पुत्र ने क्रोध से गरजते हुए-से अर्जुन से वैसे ही कहा, जैसे हिरण्यकशिपु ने हरि से कहा था।

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 26 (7.198.26)

बीभत्सो विप्रकर्माणि विहितानि मनीषिभिः । याजनाध्यापने दानं यथा यज्ञप्रतिग्रहौ ॥

bībhatso viprakarmāṇi vihitāni manīṣibhiḥ | yājanādhyāpane dānaṃ yathā yajñapratigrahau

हे बीभत्सु, मनीषियों ने ब्राह्मणों के कर्म बताये हैं: यज्ञ कराना, पढ़ाना, दान देना, तथा यज्ञ करना और दान लेना।

श्लोक 27 (7.198.27)

षष्ठमध्ययनं नाम तेषां कस्मिन्प्रतिष्ठितः । हतो द्रोणो मया ह्येवं किं मां पार्थ विगर्हसे ॥

ṣaṣṭhamadhyayanaṃ nāma teṣāṃ kasminpratiṣṭhitaḥ | hato droṇo mayā hyevaṃ kiṃ māṃ pārtha vigarhase

छठा कर्म अध्ययन है। इनमें से किसमें वे स्थित थे? इस प्रकार मेरे द्वारा द्रोण मारे गये—तो हे पार्थ, तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो?

श्लोक 28 (7.198.28)

अपक्रान्तः स्वधर्माच्च क्षात्रधर्मं व्यपाश्रितः । अधर्मेण हतस्तस्मादस्त्रेण क्षुद्रकर्मकृत् ॥

apakrāntaḥ svadharmācca kṣātradharmaṃ vyapāśritaḥ | adharmeṇa hatastasmādastreṇa kṣudrakarmakṛt

वे अपने धर्म से हट गये और क्षत्रिय-धर्म का आश्रय लिया; इसलिए नीच कर्म करने वाला वह अधर्म से, शस्त्र द्वारा मारा गया।

श्लोक 29 (7.198.29)

तथा मायां प्रयुञ्जानमसह्यं ब्राह्मणब्रुवम् । प्रतिमायी निहन्याद्यो न युक्तं पार्थ तत्र किम् ॥

tathā māyāṃ prayuñjānamasahyaṃ brāhmaṇabruvam | pratimāyī nihanyādyo na yuktaṃ pārtha tatra kim

जो माया का प्रयोग करता है, उस दुर्जेय नाममात्र के ब्राह्मण को यदि कोई मायावी माया से ही मार दे, तो हे पार्थ, उसमें अनुचित क्या है?

श्लोक 30 (7.198.30)

तस्मिंस्तथा मया शस्ते यदि द्रौणायनी रुषा । कुरुते भैरवं नादं तत्र किं मम हीयते ॥

tasmiṃstathā mayā śaste yadi drauṇāyanī ruṣā | kurute bhairavaṃ nādaṃ tatra kiṃ mama hīyate

यदि इस प्रकार मेरे द्वारा उनके मारे जाने पर द्रोणपुत्र रोष से भयंकर गर्जना करता है, तो उसमें मेरी क्या हानि होती है?

श्लोक 31 (7.198.31)

न चाद्भुतमिदं मन्ये यद्द्रौणिश्चात्र गर्जति । घातयिष्यति कौरव्यान्परित्रातुमशक्नुवन् ॥

na cādbhutamidaṃ manye yaddrauṇiścātra garjati | ghātayiṣyati kauravyānparitrātumaśaknuvan

और मैं इसे आश्चर्य नहीं मानता कि द्रोणपुत्र यहाँ गरज रहा है; कौरवों की रक्षा करने में असमर्थ होकर वह उन्हें मरवा ही डालेगा।

श्लोक 32 (7.198.32)

यच्च मां धार्मिको भूत्वा ब्रवीषि गुरुघातिनम् । तदर्थमहमुत्पन्नः पाञ्चाल्यस्य सुतोऽनलात् ॥

yacca māṃ dhārmiko bhūtvā bravīṣi gurughātinam | tadarthamahamutpannaḥ pāñcālyasya suto'nalāt

और तुम जो धार्मिक होकर मुझे गुरुघाती कहते हो—उसी प्रयोजन से मैं पाञ्चाल (द्रुपद) का पुत्र बनकर अग्नि से उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 33 (7.198.33)

यस्य कार्यमकार्यं वा युध्यतः स्यात्समं रणे । तं कथं ब्राह्मणं ब्रूयाः क्षत्रियं वा धनञ्जय ॥

yasya kāryamakāryaṃ vā yudhyataḥ syātsamaṃ raṇe | taṃ kathaṃ brāhmaṇaṃ brūyāḥ kṣatriyaṃ vā dhanañjaya

हे धनञ्जय, जिसके लिए युद्ध करते समय करने योग्य और न करने योग्य कर्म बराबर हों, उसे तुम ब्राह्मण या क्षत्रिय कैसे कह सकते हो?

श्लोक 34 (7.198.34)

यो ह्यनस्त्रविदो हन्याद्ब्रह्मास्त्रैः क्रोधमूर्च्छितः । सर्वोपायैर्न स कथं वध्यः पुरुषसत्तम ॥

yo hyanastravido hanyādbrahmāstraiḥ krodhamūrcchitaḥ | sarvopāyairna sa kathaṃ vadhyaḥ puruṣasattama

जो क्रोध से मूर्च्छित होकर अस्त्र न जानने वालों को ब्रह्मास्त्रों से मारे, हे पुरुषश्रेष्ठ, उसे सब उपायों से क्यों न मारा जाए?

श्लोक 35 (7.198.35)

विशेषात्पितृहन्ता मे न स वध्यः कथं मया । योऽयं पापः सुदुर्मेधा बान्धवान्युधि जघ्निवान् । तस्य विप्रब्रुववधे कथं पापं भवेन्मम ॥

viśeṣātpitṛhantā me na sa vadhyaḥ kathaṃ mayā | yo'yaṃ pāpaḥ sudurmedhā bāndhavānyudhi jaghnivān | tasya viprabruvavadhe kathaṃ pāpaṃ bhavenmama

विशेष रूप से वह मेरे पिता का हत्यारा है; मैं उसे क्यों न मारूँ? इस पापी दुर्बुद्धि ने युद्ध में मेरे बन्धुओं को मारा है; इस नाममात्र के ब्राह्मण को मारने में मुझे कौन-सा पाप लगेगा?

श्लोक 36 (7.198.36)

विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् । जानन्धर्मार्थतत्त्वज्ञ किं मामर्जुन गर्हसे ॥

vidharmiṇaṃ dharmavidbhiḥ proktaṃ teṣāṃ viṣopamam | jānandharmārthatattvajña kiṃ māmarjuna garhase

धर्म जानने वालों ने कहा है कि अधर्मी मनुष्य उनके लिए विष के समान है। यह जानते हुए भी, हे धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले अर्जुन, तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो?

श्लोक 37 (7.198.37)

नृशंसः स मयाऽऽक्रम्य रथ एव निपातितः । तन्मामनिन्द्यं बीभत्सो किमर्थं नाभिनन्दसे ॥

nṛśaṃsaḥ sa mayā''kramya ratha eva nipātitaḥ | tanmāmanindyaṃ bībhatso kimarthaṃ nābhinandase

उस क्रूर को मैंने आक्रमण करके रथ पर ही गिरा दिया; तो हे बीभत्सु, मुझ निर्दोष का तुम अभिनन्दन क्यों नहीं करते?

श्लोक 38 (7.198.38)

कालानलसमं पार्थ ज्वलार्कविषोपमम् । भीमं द्रोणशिरश्छिन्नं न प्रशंससि मे कथम् ॥

kālānalasamaṃ pārtha jvalārkaviṣopamam | bhīmaṃ droṇaśiraśchinnaṃ na praśaṃsasi me katham

हे पार्थ, प्रलयाग्नि के समान, दहकते सूर्य और विष के समान भयंकर द्रोण का सिर काटने पर तुम मेरी प्रशंसा क्यों नहीं करते?

श्लोक 39 (7.198.39)

योऽसौ ममैव नान्यस्य बान्धवान्युधि जघ्निवान् । छित्त्वाऽपि तस्य मूर्धानं नैवास्मि विगतज्वरः ॥

yo'sau mamaiva nānyasya bāndhavānyudhi jaghnivān | chittvā'pi tasya mūrdhānaṃ naivāsmi vigatajvaraḥ

उसने युद्ध में मेरे ही बन्धुओं को मारा, किसी और के नहीं; उसका सिर काट देने पर भी मैं सन्ताप से मुक्त नहीं हुआ हूँ।

श्लोक 40 (7.198.40)

तच्च मे कृन्तते मर्म यन्न तस्य शिरो मया । निषादविषये क्षिप्तं जयद्रथशिरो यथा ॥

tacca me kṛntate marma yanna tasya śiro mayā | niṣādaviṣaye kṣiptaṃ jayadrathaśiro yathā

और यही बात मेरे मर्म को काटती है कि उसका सिर मेरे द्वारा निषादों के देश में नहीं फेंका गया, जैसे जयद्रथ का सिर फेंका गया था।

श्लोक 41 (7.198.41)

अथावधश्च शत्रूणामधर्मः श्रूयतेऽर्जुन । क्षत्रियस्य हि धर्मोऽयं हन्याद्धन्येत वा पुनः ॥

athāvadhaśca śatrūṇāmadharmaḥ śrūyate'rjuna | kṣatriyasya hi dharmo'yaṃ hanyāddhanyeta vā punaḥ

इसके अतिरिक्त, हे अर्जुन, सुना जाता है कि शत्रुओं का वध न करना अधर्म है; क्षत्रिय का यही धर्म है कि वह मारे, या फिर स्वयं मारा जाए।

श्लोक 42 (7.198.42)

स शत्रुर्निहतः सङ्ख्ये मया धर्मेण पाण्डव । यथा त्वया हतः शूरो भगदत्तः पितुः सखा ॥

sa śatrurnihataḥ saṅkhye mayā dharmeṇa pāṇḍava | yathā tvayā hataḥ śūro bhagadattaḥ pituḥ sakhā

हे पाण्डव, उस शत्रु को मैंने युद्ध में धर्म के अनुसार मारा, जैसे तुमने अपने पिता के मित्र वीर भगदत्त को मारा था।

श्लोक 43 (7.198.43)

पितामहं रणे हत्वा मन्यसे धर्ममात्मनः । मया शत्रौ हते कस्मात्पापे धर्मं न मन्यसे ॥

pitāmahaṃ raṇe hatvā manyase dharmamātmanaḥ | mayā śatrau hate kasmātpāpe dharmaṃ na manyase

पितामह को युद्ध में मारकर तुम अपने कर्म को धर्म मानते हो; तो मेरे द्वारा शत्रु के मारे जाने पर उसे धर्म क्यों नहीं मानते, पाप क्यों मानते हो?

श्लोक 44 (7.198.44)

सम्बन्धावनतं पार्थ न मां त्वं वक्तुमर्हसि । स्वगात्रकृतसोपानं निषण्णमिव दन्तिनम् ॥

sambandhāvanataṃ pārtha na māṃ tvaṃ vaktumarhasi | svagātrakṛtasopānaṃ niṣaṇṇamiva dantinam

हे पार्थ, सम्बन्ध के कारण झुका हुआ मैं हूँ, इसलिए तुम्हें मुझसे ऐसा नहीं कहना चाहिए—उस हाथी की तरह जो अपने ही शरीर को सीढ़ी बनाकर बैठ गया हो।

श्लोक 45 (7.198.45)

क्षमामि ते सर्वमेव वाग्व्यतिक्रममर्जुन । द्रौपद्या द्रौपदेयानां कृते नान्येन हेतुना ॥

kṣamāmi te sarvameva vāgvyatikramamarjuna | draupadyā draupadeyānāṃ kṛte nānyena hetunā

हे अर्जुन, तुम्हारी वाणी की सारी मर्यादा-भंग मैं क्षमा करता हूँ—द्रौपदी और द्रौपदी के पुत्रों के कारण, किसी और कारण से नहीं।

श्लोक 46 (7.198.46)

कुलक्रमागतं वैरं ममाचार्येण विश्रुतम् । तथा जानात्ययं लोको न यूयं पाण्डुनन्दनाः ॥

kulakramāgataṃ vairaṃ mamācāryeṇa viśrutam | tathā jānātyayaṃ loko na yūyaṃ pāṇḍunandanāḥ

कुल-परम्परा से चला आया मेरा वैर आचार्य के साथ प्रसिद्ध है; इस लोक को यह ऐसा ही ज्ञात है—पर हे पाण्डवो, तुम इसे नहीं जानते।

श्लोक 47 (7.198.47)

नानृती पाण्डवो ज्येष्ठो नाहं वाऽधार्मिकोऽर्जुन । न क्षत्रिय इति प्राहुर्यो न हन्ति रणाजिरे ॥

nānṛtī pāṇḍavo jyeṣṭho nāhaṃ vā'dhārmiko'rjuna | na kṣatriya iti prāhuryo na hanti raṇājire

हे अर्जुन, ज्येष्ठ पाण्डव झूठे नहीं हैं, और मैं भी अधार्मिक नहीं हूँ। जो रणभूमि में प्रहार नहीं करता, उसे लोग क्षत्रिय नहीं कहते—

श्लोक 48 (7.198.48)

पितरं वा गुरुं वाऽपि जिघांसुं पुत्रशिष्ययोः । जिह्मेन वाऽप्यजिह्मेन हन्यादेवाविचारयन् ॥

pitaraṃ vā guruṃ vā'pi jighāṃsuṃ putraśiṣyayoḥ | jihmena vā'pyajihmena hanyādevāvicārayan

पुत्र या शिष्य को मारने पर उतारू पिता अथवा गुरु को, टेढ़े उपाय से हो या सीधे उपाय से, बिना विचार किये मार डालना चाहिए।

श्लोक 49 (7.198.49)

इत्युक्तं ब्रह्मणा पूर्वं क्षत्रियाणां द्विषद्वधे । तस्माच्छिष्येण निहतः शत्रुर्मे ब्राह्मणब्रुवः ॥

ityuktaṃ brahmaṇā pūrvaṃ kṣatriyāṇāṃ dviṣadvadhe | tasmācchiṣyeṇa nihataḥ śatrurme brāhmaṇabruvaḥ

ब्रह्मा ने प्राचीन काल में क्षत्रियों के लिए शत्रु-वध के विषय में ऐसा कहा है; इसलिए मेरे शत्रु, उस नाममात्र के ब्राह्मण को शिष्य ने मारा।

श्लोक 50 (7.198.50)

यः क्षत्रियसुतो हन्यात्पितरं वा गुरुं च वा । अनिष्टं क्षत्रियो हन्यात्स वै क्षत्रिय उच्यते । शिष्यद्रोही हतः पापो युध्यस्व विजयस्तव ॥

yaḥ kṣatriyasuto hanyātpitaraṃ vā guruṃ ca vā | aniṣṭaṃ kṣatriyo hanyātsa vai kṣatriya ucyate | śiṣyadrohī hataḥ pāpo yudhyasva vijayastava

क्षत्रिय का जो पुत्र पिता या गुरु को भी मारे, अनिष्ट करने वाले को मार डालने वाला क्षत्रिय ही सच्चा क्षत्रिय कहलाता है। शिष्य से द्रोह करने वाला वह पापी मारा गया है; अब लड़ो—विजय तुम्हारी है।

अध्याय 197अध्याय-सूचीअध्याय 199