द्रोण पर्व · अध्याय 199
द्रोण-वध पर सात्यकि और धृष्टद्युम्न का कलह
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि मृत द्रोण के प्रति धृष्टद्युम्न के अपशब्द सुनकर पाण्डवों और राजाओं ने क्या कहा। सात्यकि धृष्टद्युम्न को गुरु का हत्यारा कहकर धिक्कारते और गदा से मारने की धमकी देते हैं; धृष्टद्युम्न उत्तर में भूरिश्रवा के वध की और दोनों पक्षों के अधर्म-पूर्ण कर्मों की याद दिलाता है। सात्यकि के उस पर टूट पड़ने पर कृष्ण की प्रेरणा से भीम उन्हें रोक लेते हैं और सहदेव दोनों कुलों की मित्रता की दुहाई देते हैं। फिर कृष्ण और युधिष्ठिर दोनों वीरों को अलग करते हैं और योद्धा शत्रुओं की ओर लौट पड़ते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.199.1)
साङ्गा वेदा यथान्यायं येनाधीता महात्मना । यस्मिन्साक्षाद्धनुर्वेदो ह्रीनिषेवे प्रतिष्ठितः ॥
sāṅgā vedā yathānyāyaṃ yenādhītā mahātmanā | yasminsākṣāddhanurvedo hrīniṣeve pratiṣṭhitaḥ
जिन महात्मा ने अंगों-सहित वेदों का विधिपूर्वक अध्ययन किया, और जिनमें धनुर्वेद स्वयं लज्जा-शील के आचरण के साथ प्रतिष्ठित था,
श्लोक 2 (7.199.2)
यस्य प्रसादात्कुर्वन्ति कर्माणि पुरुषर्षभाः । अमानुषाणि सङ्ग्रामे देवैरसुकराणि च ॥
yasya prasādātkurvanti karmāṇi puruṣarṣabhāḥ | amānuṣāṇi saṅgrāme devairasukarāṇi ca
जिनकी कृपा से श्रेष्ठ पुरुष युद्ध में ऐसे अमानुष कर्म करते हैं जो देवताओं के लिए भी दुष्कर हैं,
श्लोक 3 (7.199.3)
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे समक्षं पापकर्मणा । नीचं कर्म कृतं तेन क्षुद्रेण गुरुघातिना ॥
tasminnākruśyati droṇe samakṣaṃ pāpakarmaṇā | nīcaṃ karma kṛtaṃ tena kṣudreṇa gurughātinā
उन्हीं द्रोण को जब उस पापकर्मी ने सबके सामने कटु वचन कहे, तब उस क्षुद्र गुरुघाती ने नीच कर्म ही किया।
श्लोक 4 (7.199.4)
नामर्षं तत्र कुर्वन्ति धिक्क्षात्रं धिगमर्षिताम् ॥
nāmarṣaṃ tatra kurvanti dhikkṣātraṃ dhigamarṣitām
फिर भी लोग वहाँ क्रोध नहीं करते। क्षत्रिय-धर्म को धिक्कार है, इस अक्रोध को धिक्कार है!
श्लोक 5 (7.199.5)
पार्थाः सर्वे च राजानः पृथिव्यां ये धनुर्धराः । श्रुत्वा किमाहुः पाञ्चाल्यं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
pārthāḥ sarve ca rājānaḥ pṛthivyāṃ ye dhanurdharāḥ | śrutvā kimāhuḥ pāñcālyaṃ tanmamācakṣva sañjaya
सब पाण्डवों और पृथ्वी के जितने धनुर्धारी राजा थे, उन्होंने पांचाल की बातें सुनकर क्या कहा? हे संजय, वह मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (7.199.6)
श्रुत्वा द्रुपदपुत्रस्य ता वाचः क्रूरकर्मणः । तूष्णीं बभूवू राजानः सर्व एव विशाम्पते ॥
śrutvā drupadaputrasya tā vācaḥ krūrakarmaṇaḥ | tūṣṇīṃ babhūvū rājānaḥ sarva eva viśāmpate
हे प्रजानाथ! द्रुपद के क्रूरकर्मा पुत्र की वे बातें सुनकर सभी राजा चुप रह गए।
श्लोक 7 (7.199.7)
अर्जुनस्तु कटाक्षेण जिह्मं विप्रेक्ष्य पार्षतम् । सबाष्पमतिनिःश्वस्य धिग्धिगित्येव चाब्रवीत् ॥
arjunastu kaṭākṣeṇa jihmaṃ viprekṣya pārṣatam | sabāṣpamatiniḥśvasya dhigdhigityeva cābravīt
परन्तु अर्जुन ने धृष्टद्युम्न की ओर तिरछी, टेढ़ी दृष्टि से देखा और आँखों में आँसू भरकर लम्बी साँस लेते हुए केवल इतना कहा, “धिक्कार है! धिक्कार है!”
श्लोक 8 (7.199.8)
युधिष्ठिरश्च भीमश्च यमौ कृष्णस्तथाऽपरे । आसन्सुव्रीडिता राजन्सात्यकिस्त्वब्रवीदिदम् ॥
yudhiṣṭhiraśca bhīmaśca yamau kṛṣṇastathā'pare | āsansuvrīḍitā rājansātyakistvabravīdidam
हे राजन्! युधिष्ठिर, भीम, दोनों माद्रीपुत्र, कृष्ण तथा अन्य लोग भी अत्यन्त लज्जित हुए। तब सात्यकि ने यह कहा:
सात्यकिरुवाच
श्लोक 9 (7.199.9)
नेहास्ति पुरुषः कश्चिद्य इमं पापपूरुषम् । भाषमाणमकल्याणं शीघ्रं हन्यान्नराधमम् ॥
nehāsti puruṣaḥ kaścidya imaṃ pāpapūruṣam | bhāṣamāṇamakalyāṇaṃ śīghraṃ hanyānnarādhamam
“क्या यहाँ कोई ऐसा पुरुष नहीं जो अशुभ बातें बोलते हुए इस पापी नराधम को तुरन्त मार डाले?
श्लोक 10 (7.199.10)
एते त्वां पाण्डवाः सर्वे कुत्सयन्ति विवित्सया । कर्मणा तेन पापेन श्वपाकं ब्राह्मणा इव ॥
ete tvāṃ pāṇḍavāḥ sarve kutsayanti vivitsayā | karmaṇā tena pāpena śvapākaṃ brāhmaṇā iva
ये सब पाण्डव तुम्हारे उस पापकर्म के कारण तुमसे नाता तोड़ने की इच्छा से तुम्हें वैसे ही धिक्कारते हैं, जैसे ब्राह्मण चाण्डाल को।
श्लोक 11 (7.199.11)
एतत्कृत्वा महत्पापं निन्दितः सर्वसाधुभिः । न लज्जसे कथं वक्तुं समितिं प्राप्य शोभनाम् ॥
etatkṛtvā mahatpāpaṃ ninditaḥ sarvasādhubhiḥ | na lajjase kathaṃ vaktuṃ samitiṃ prāpya śobhanām
ऐसा महान् पाप करके और सब सज्जनों से निन्दित होकर भी इस शोभन सभा में आकर बोलते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?
श्लोक 12 (7.199.12)
कथं च शतधा जिह्वा न ते मूर्धा च दीर्यते । गुरुमाक्रोशतः क्षुद्र न चाधर्मेण पात्यसे ॥
kathaṃ ca śatadhā jihvā na te mūrdhā ca dīryate | gurumākrośataḥ kṣudra na cādharmeṇa pātyase
अरे क्षुद्र! गुरु को गाली देते हुए तुम्हारी जीभ के सौ टुकड़े क्यों नहीं हो जाते, तुम्हारा सिर क्यों नहीं फट जाता, और अधर्म के कारण तुम गिराए क्यों नहीं जाते?
श्लोक 13 (7.199.13)
वाच्यस्त्वमसि पार्थैश्च सर्वैश्चान्धकवृष्णिभिः । यत्कर्म कलुषं कृत्वा श्लाघसे जनसंसदि ॥
vācyastvamasi pārthaiśca sarvaiścāndhakavṛṣṇibhiḥ | yatkarma kaluṣaṃ kṛtvā ślāghase janasaṃsadi
जो कलुषित कर्म करके तुम लोगों की सभा में अपनी बड़ाई करते हो, उस कारण तुम सब पाण्डवों और सभी अन्धक-वृष्णियों द्वारा निन्दा के योग्य हो।
श्लोक 14 (7.199.14)
अकार्यं तादृशं कृत्वा पुनरेव गुरुं क्षिपन् । वध्यस्त्वं न त्वयार्थोऽस्ति मुहूर्तमपि जीवता ॥
akāryaṃ tādṛśaṃ kṛtvā punareva guruṃ kṣipan | vadhyastvaṃ na tvayārtho'sti muhūrtamapi jīvatā
वैसा न करने योग्य कर्म करके भी तुम फिर गुरु पर आक्षेप कर रहे हो। तुम वध के योग्य हो; तुम्हारे एक क्षण भी जीवित रहने से कोई प्रयोजन नहीं।
श्लोक 15 (7.199.15)
कस्त्वेतद्व्यवसेत्पापं त्वदन्यः पुरुषाधम । निगृह्य केशेषु वधं गुरोर्धर्मात्मनः सतः ॥
kastvetadvyavasetpāpaṃ tvadanyaḥ puruṣādhama | nigṛhya keśeṣu vadhaṃ gurordharmātmanaḥ sataḥ
हे नराधम! तुम्हारे सिवा और कौन ऐसा पाप करने का साहस करेगा कि धर्मात्मा, सज्जन गुरु को केश पकड़कर मार डाले?
श्लोक 16 (7.199.16)
सप्तावरे तथा पूर्वे बान्धवास्ते निमञ्जिताः । यशसा च परित्यक्तास्त्वां प्राप्य कुलपांसनम् ॥
saptāvare tathā pūrve bāndhavāste nimañjitāḥ | yaśasā ca parityaktāstvāṃ prāpya kulapāṃsanam
तुम जैसे कुलकलंक को पाकर तुम्हारे आगे-पीछे की सात-सात पीढ़ियों के बन्धु डूब गए और यश से वंचित हो गए।
श्लोक 17 (7.199.17)
उक्तवांश्चापि यत्पार्थे भीष्मं प्रति नरर्षभ । तथान्तो विहितस्तेन स्वयमेव महात्मना ॥
uktavāṃścāpi yatpārthe bhīṣmaṃ prati nararṣabha | tathānto vihitastena svayameva mahātmanā
हे पुरुषश्रेष्ठ! भीष्म के विषय में अर्जुन से जो कहा गया था, उसके अनुसार उन महात्मा ने स्वयं ही अपनी मृत्यु का उपाय रच दिया था।
श्लोक 18 (7.199.18)
तस्यापि तव सोदर्यो निहन्ता पापकृत्तमः । नान्यः पाञ्चालपुत्रेभ्यो विद्यते भुवि पापकृत् ॥
tasyāpi tava sodaryo nihantā pāpakṛttamaḥ | nānyaḥ pāñcālaputrebhyo vidyate bhuvi pāpakṛt
उनका भी वध करने वाला तुम्हारा सहोदर था, जो पापियों में सबसे बढ़कर है; पृथ्वी पर पांचाल-पुत्रों से बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं।
श्लोक 19 (7.199.19)
स चापि सृष्टः पित्रा ते भीष्मस्यान्तकरः किल । शिखण्डी रक्षितस्तेन स च मृत्युर्महात्मनः ॥
sa cāpi sṛṣṭaḥ pitrā te bhīṣmasyāntakaraḥ kila | śikhaṇḍī rakṣitastena sa ca mṛtyurmahātmanaḥ
कहते हैं कि वह भी तुम्हारे पिता द्वारा भीष्म का अन्त करने के लिए ही उत्पन्न किया गया था: शिखण्डी, जो उसी के द्वारा सुरक्षित रखा गया और उन महात्मा की मृत्यु बना।
श्लोक 20 (7.199.20)
पाञ्चालाश्चलिता धर्मात्क्षुद्रा मित्रगुरुद्रुहः । त्वां प्राप्य सहसोदर्यं धिक्कृतं सर्वसाधुभिः ॥
pāñcālāścalitā dharmātkṣudrā mitragurudruhaḥ | tvāṃ prāpya sahasodaryaṃ dhikkṛtaṃ sarvasādhubhiḥ
पांचाल धर्म से डिग गए हैं, ये क्षुद्र मित्रों और गुरुओं के द्रोही हैं, क्योंकि उन्हें तुम जैसा, भाई-सहित, सब सज्जनों से धिक्कारा हुआ व्यक्ति मिला है।
श्लोक 21 (7.199.21)
पुनश्चेदीदृशीं वाचं मत्समीपे वदिष्यसि । शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ॥
punaścedīdṛśīṃ vācaṃ matsamīpe vadiṣyasi | śiraste pothayiṣyāmi gadayā vajrakalpayā
यदि तुम फिर मेरे सामने ऐसी बात कहोगे तो मैं वज्र-जैसी अपनी गदा से तुम्हारा सिर चूर-चूर कर दूँगा।
श्लोक 22 (7.199.22)
त्वां च ब्रह्महणं दृष्ट्वा जनः सूर्यमवेक्षते । ब्रह्महत्या हि ते पापं प्रायश्चित्तार्थमात्मनः ॥
tvāṃ ca brahmahaṇaṃ dṛṣṭvā janaḥ sūryamavekṣate | brahmahatyā hi te pāpaṃ prāyaścittārthamātmanaḥ
ब्राह्मण के हत्यारे तुम्हें देखकर लोग सूर्य को देखते हैं। ब्रह्महत्या का पाप तुम पर है, जिसका प्रायश्चित तुम्हें स्वयं करना है।
श्लोक 23 (7.199.23)
पाञ्चालक सुदुर्वृत्त ममैव गुरुमग्रतः । गुरोर्गुरुं च भूयोऽपि क्षिपन्नैव हि लज्जसे ॥
pāñcālaka sudurvṛtta mamaiva gurumagrataḥ | gurorguruṃ ca bhūyo'pi kṣipannaiva hi lajjase
दुष्ट आचरण वाले पांचाल! मेरे ही सामने मेरे गुरु पर और फिर गुरु के भी गुरु पर आक्षेप करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती।
श्लोक 24 (7.199.24)
तिष्ठतिष्ठ सहस्वैकं गदापातमिमं मम । तव चापि सहिष्येऽहं गदापाताननेकशः ॥
tiṣṭhatiṣṭha sahasvaikaṃ gadāpātamimaṃ mama | tava cāpi sahiṣye'haṃ gadāpātānanekaśaḥ
ठहरो, ठहरो! मेरी इस एक गदा-चोट को सह लो; मैं भी तुम्हारी अनेक गदा-चोटें सहूँगा।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 25 (7.199.25)
सात्वतेनैवमाक्षिप्तः पार्षतः परुषाक्षरम् । संरब्धं सात्यकिं प्राह सङ्क्रुद्धः प्रहसन्निव ॥
sātvatenaivamākṣiptaḥ pārṣataḥ paruṣākṣaram | saṃrabdhaṃ sātyakiṃ prāha saṅkruddhaḥ prahasanniva
सात्वत सात्यकि द्वारा इस प्रकार कठोर शब्दों में आक्षेप किए जाने पर पृषत-पुत्र धृष्टद्युम्न ने स्वयं भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर, मानो हँसते हुए, क्रोध से भरे सात्यकि से कहा:
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 26 (7.199.26)
श्रूयतेश्रूयते चेति क्षम्यते चेति माधव । सदाऽनार्योऽशुभः साधुं पुरुषं क्षेप्तुमिच्छति ॥
śrūyateśrūyate ceti kṣamyate ceti mādhava | sadā'nāryo'śubhaḥ sādhuṃ puruṣaṃ kṣeptumicchati
“सुन रहा हूँ, सुन रहा हूँ, और क्षमा करता हूँ, हे माधव! नीच और अशुभ मनुष्य सदा सज्जन पुरुष पर आक्षेप करना चाहता है।
श्लोक 27 (7.199.27)
क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम् । क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽयमिति मन्यते ॥
kṣamā praśasyate loke na tu pāpo'rhati kṣamām | kṣamāvantaṃ hi pāpātmā jito'yamiti manyate
लोक में क्षमा की प्रशंसा होती है, पर पापी क्षमा के योग्य नहीं होता; क्षमा करने वाले को पापात्मा हारा हुआ मान लेता है।
श्लोक 28 (7.199.28)
स त्वं क्षुद्रसमाचारो नीचात्मा पापनिश्चयः । आकेशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्यो वक्तुमिच्छसि ॥
sa tvaṃ kṣudrasamācāro nīcātmā pāpaniścayaḥ | ākeśāgrānnakhāgrācca vaktavyo vaktumicchasi
तुम क्षुद्र आचरण वाले, नीच मन के और पाप का निश्चय करने वाले हो; सिर के बालों की नोक से पैर के नखों के छोर तक निन्दा के योग्य होकर भी दूसरों की निन्दा करना चाहते हो।
श्लोक 29 (7.199.29)
वरं हि ते मृतिः पाप न च ते चित्तमीदृशम् । श्रोतुं वक्तव्यतामूलं नीचाचाराश्च मानवाः । परान्क्षिपन्ति दोषेण स्वेषु दोषेष्वदृष्टयः ॥
varaṃ hi te mṛtiḥ pāpa na ca te cittamīdṛśam | śrotuṃ vaktavyatāmūlaṃ nīcācārāśca mānavāḥ | parānkṣipanti doṣeṇa sveṣu doṣeṣvadṛṣṭayaḥ
अरे पापी! तुम्हारा मर जाना ही भला है, तुम्हारा ऐसा मन भला नहीं, और निन्दा की जड़ को सुनना भी भला नहीं। नीच आचरण वाले मनुष्य अपने दोषों को न देखते हुए दूसरों पर दोष लगाते हैं।
श्लोक 30 (7.199.30)
यः स भूरिश्रवाश्छिन्नभुजः प्रायगतस्त्वया । वार्यमाणेन हि हतस्ततः पापतरं नु किम् ॥
yaḥ sa bhūriśravāśchinnabhujaḥ prāyagatastvayā | vāryamāṇena hi hatastataḥ pāpataraṃ nu kim
भूरिश्रवा की भुजा कट चुकी थी और वह आमरण उपवास पर बैठा था; तुमने रोके जाने पर भी उसे मार दिया। इससे बढ़कर पाप और क्या होगा?
श्लोक 31 (7.199.31)
प्रेषमाणो मया द्रोणो दिव्येनास्त्रेण संयुगे । विसृष्टशस्त्रो निहतः किं तत्र क्रूर दुष्कृतम् ॥
preṣamāṇo mayā droṇo divyenāstreṇa saṃyuge | visṛṣṭaśastro nihataḥ kiṃ tatra krūra duṣkṛtam
युद्ध में मेरे दिव्य अस्त्र से आक्रान्त होकर द्रोण शस्त्र छोड़ चुके थे, तब मारे गए। हे क्रूर! उसमें बुरा कर्म क्या है?
श्लोक 32 (7.199.32)
अयुध्यमानं यस्त्वाजौ तथा प्रायगतं मुनिम् । छिन्नबाहुं परैर्हन्यात्सात्यके स कथं वदेत् ॥
ayudhyamānaṃ yastvājau tathā prāyagataṃ munim | chinnabāhuṃ parairhanyātsātyake sa kathaṃ vadet
हे सात्यकि! जो युद्ध-भूमि में न लड़ते हुए, आमरण उपवास पर बैठे, दूसरों द्वारा भुजा कटे हुए मुनि को मारे, वह भला क्या कह सकता है?
श्लोक 33 (7.199.33)
निहत्य त्वां पदा भूमौ स विकर्षति वीर्यवान् । किं तदा न निहंस्येनं भूत्वा पुरुषसत्तमः ॥
nihatya tvāṃ padā bhūmau sa vikarṣati vīryavān | kiṃ tadā na nihaṃsyenaṃ bhūtvā puruṣasattamaḥ
जब वह बलवान् तुम्हें पैर से भूमि पर गिराकर घसीट रहा था, तब पुरुषोत्तम बनकर तुमने उसे उस समय क्यों नहीं मारा?
श्लोक 34 (7.199.34)
त्वया पुनरनार्येण पूर्वं पार्थेन निर्जितः । यदा तदा हतः शूरः सौमदत्तिः प्रतापवान् ॥
tvayā punaranāryeṇa pūrvaṃ pārthena nirjitaḥ | yadā tadā hataḥ śūraḥ saumadattiḥ pratāpavān
हे अनार्य! और जब सौमदत्ति पहले ही अर्जुन से पराजित हो चुका था, तभी तुमने उस प्रतापी शूर को मारा।
श्लोक 35 (7.199.35)
यत्रयत्र तु पाण्डूनां द्रोणो द्रावयते चमूम् । किरञ्छरसहस्राणि तत्रतत्र प्रयाम्यहम् ॥
yatrayatra tu pāṇḍūnāṃ droṇo drāvayate camūm | kirañcharasahasrāṇi tatratatra prayāmyaham
जहाँ-जहाँ द्रोण पाण्डवों की सेना को भगाते हैं, वहाँ-वहाँ मैं हज़ारों बाण बरसाता हुआ पहुँचता हूँ।
श्लोक 36 (7.199.36)
स त्वमेवंविधं कृत्वा कर्म चण्डालवत्स्वयम् । वक्तुमर्हसि वक्तव्यः कस्मात्त्वं परुषाण्यथ ॥
sa tvamevaṃvidhaṃ kṛtvā karma caṇḍālavatsvayam | vaktumarhasi vaktavyaḥ kasmāttvaṃ paruṣāṇyatha
इस प्रकार स्वयं चाण्डाल के समान कर्म करके, स्वयं निन्दा के योग्य होकर भी तुम मुझे कठोर बातें क्यों कहना चाहते हो?
श्लोक 37 (7.199.37)
कर्ता त्वं कर्मणो ह्यस्य नाहं वृष्णिकुलाधम । पापानां च त्वमावासः कर्मणां मा पुनर्वद ॥
kartā tvaṃ karmaṇo hyasya nāhaṃ vṛṣṇikulādhama | pāpānāṃ ca tvamāvāsaḥ karmaṇāṃ mā punarvada
हे वृष्णि-कुल के अधम! इस कर्म के कर्ता तुम हो, मैं नहीं; तुम पाप-कर्मों के निवास हो; अब मुझसे फिर मत बोलना।
श्लोक 38 (7.199.38)
जोषमास्व न मां भूयो वक्तुमर्हस्यतः परम् । अधरोत्तरमेतद्धि यन्मां त्वं वक्तुमर्हसि ॥
joṣamāsva na māṃ bhūyo vaktumarhasyataḥ param | adharottarametaddhi yanmāṃ tvaṃ vaktumarhasi
चुप बैठो; अब इसके बाद तुम्हें मुझसे फिर कुछ कहना उचित नहीं। तुम जो मुझसे कहना चाहते हो, वह सब उलटा ही है।
श्लोक 39 (7.199.39)
अथ वक्ष्यसि मां मौर्ख्याद्भूयः परुषमीदृशम् । गमयिष्यामि बाणैस्त्वां युधि वैवस्वतक्षयम् ॥
atha vakṣyasi māṃ maurkhyādbhūyaḥ paruṣamīdṛśam | gamayiṣyāmi bāṇaistvāṃ yudhi vaivasvatakṣayam
यदि फिर मूर्खतावश मुझसे ऐसी कठोर बात कहोगे तो मैं युद्ध में बाणों से तुम्हें यमलोक भेज दूँगा।
श्लोक 40 (7.199.40)
न चैव मूर्ख धर्मेण केवलेनैव शक्यते । तेषामपि ह्यधर्मेण चेष्टितं शृणु यादृशम् ॥
na caiva mūrkha dharmeṇa kevalenaiva śakyate | teṣāmapi hyadharmeṇa ceṣṭitaṃ śṛṇu yādṛśam
अरे मूर्ख! केवल धर्म से ही जय नहीं पाई जा सकती। सुनो, उन्होंने भी कैसा अधर्म-पूर्ण आचरण किया है।
श्लोक 41 (7.199.41)
वञ्चितः पाण्डवः पूर्वमधर्मेण युधिष्ठिरः । द्रौपदी च परिक्लिष्टा तथाऽधर्मेण सात्यके ॥
vañcitaḥ pāṇḍavaḥ pūrvamadharmeṇa yudhiṣṭhiraḥ | draupadī ca parikliṣṭā tathā'dharmeṇa sātyake
हे सात्यकि! पाण्डव युधिष्ठिर पहले अधर्म से ठगे गए, और द्रौपदी भी अधर्म से ही सताई गई।
श्लोक 42 (7.199.42)
प्रव्राजिता वनं सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णया । सर्वस्वमपकृष्टं च तथाऽधर्मेण बालिश ॥
pravrājitā vanaṃ sarve pāṇḍavāḥ saha kṛṣṇayā | sarvasvamapakṛṣṭaṃ ca tathā'dharmeṇa bāliśa
अरे नादान! सब पाण्डव द्रौपदी-सहित वन भेजे गए और उनका सब कुछ अधर्म से छीन लिया गया।
श्लोक 43 (7.199.43)
अधर्मेणापकृष्टश्च मद्रराजः परैरितः । अधर्मेण तथा बालः सौभद्रो विनिपातितः ॥
adharmeṇāpakṛṣṭaśca madrarājaḥ parairitaḥ | adharmeṇa tathā bālaḥ saubhadro vinipātitaḥ
अधर्म से ही मद्रराज को शत्रुओं ने अपनी ओर खींच लिया; अधर्म से ही बालक अभिमन्यु मारा गया।
श्लोक 44 (7.199.44)
इतोऽप्यधर्मेण हतो भीष्मः परपुरञ्जयः । भूरिश्रवा ह्यधर्मेण त्वया धर्मविदा हतः ॥
ito'pyadharmeṇa hato bhīṣmaḥ parapurañjayaḥ | bhūriśravā hyadharmeṇa tvayā dharmavidā hataḥ
अधर्म से ही शत्रु-नगरों को जीतने वाले भीष्म मारे गए, और धर्म के ज्ञाता तुमने भी अधर्म से ही भूरिश्रवा को मारा।
श्लोक 45 (7.199.45)
एवं परैराचरितं पाण्डवेयैश्च संयुगे । रक्षमाणैर्जयं वीरैर्धर्मज्ञैरपि सात्वत ॥
evaṃ parairācaritaṃ pāṇḍaveyaiśca saṃyuge | rakṣamāṇairjayaṃ vīrairdharmajñairapi sātvata
हे सात्वत! इस प्रकार युद्ध में शत्रुओं ने भी और पाण्डवों ने भी, धर्म जानने वाले वीर होते हुए भी, अपनी जय की रक्षा करते हुए ऐसा ही आचरण किया है।
श्लोक 46 (7.199.46)
दुर्ज्ञेयः स परो धर्मस्तथाऽधर्मश्च दुर्विदः । युध्यस्व कौरवैः सार्धं मा गाः पितृनिवेशनम् ॥
durjñeyaḥ sa paro dharmastathā'dharmaśca durvidaḥ | yudhyasva kauravaiḥ sārdhaṃ mā gāḥ pitṛniveśanam
वह परम धर्म दुर्जेय है, और अधर्म भी जानना कठिन है। कौरवों के साथ युद्ध करो; पितरों के लोक (मृत्यु-लोक) में मत जाओ।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 47 (7.199.47)
एवमादीनि वाक्यानि क्रूराणि परुषाणि च । श्रावितः सात्यकिः श्रीमानाकम्पित इवाभवत् ॥
evamādīni vākyāni krūrāṇi paruṣāṇi ca | śrāvitaḥ sātyakiḥ śrīmānākampita ivābhavat
इस प्रकार के क्रूर और कठोर वचन सुनाए जाने पर श्रीमान् सात्यकि मानो काँप उठे।
श्लोक 48 (7.199.48)
तच्छ्रुत्वा क्रोधताम्राक्षः सात्यकिस्त्वाददे गदाम् । विनिः श्वस्य यथा सर्पः प्रणिधाय रथे धनुः ॥
tacchrutvā krodhatāmrākṣaḥ sātyakistvādade gadām | viniḥ śvasya yathā sarpaḥ praṇidhāya rathe dhanuḥ
यह सुनकर क्रोध से लाल आँखों वाले सात्यकि ने धनुष को रथ में रखकर, साँप की भाँति फुफकारते हुए गदा उठा ली।
श्लोक 49 (7.199.49)
ततोऽभिपत्य पाञ्चाल्यं संरम्भेणेदमब्रवीत् । न त्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् ॥
tato'bhipatya pāñcālyaṃ saṃrambheṇedamabravīt | na tvāṃ vakṣyāmi paruṣaṃ haniṣye tvāṃ vadhakṣamam
फिर उन्होंने क्रोध से पांचाल पर झपटकर कहा, “मैं तुमसे कठोर वचन नहीं कहूँगा; तुम वध के योग्य हो, मैं तुम्हें मार डालूँगा।”
श्लोक 50 (7.199.50)
तमापतन्तं सहसा महाबलममर्षणम् । पाञ्चाल्यायाभिसङ्क्रुद्धमन्तकायान्तकोपमम् ॥
tamāpatantaṃ sahasā mahābalamamarṣaṇam | pāñcālyāyābhisaṅkruddhamantakāyāntakopamam
वह महाबली, अमर्षी सात्यकि अचानक क्रोध से भरकर धृष्टद्युम्न पर टूट पड़ा, मानो यम के लिए भी यम बनकर आ रहा हो।
श्लोक 51 (7.199.51)
चोदितो वासुदेवेन भीमसेनो महाबलः । अवप्लुत्य रथात्तूर्णं बाहुभ्यां समवारयत् ॥
codito vāsudevena bhīmaseno mahābalaḥ | avaplutya rathāttūrṇaṃ bāhubhyāṃ samavārayat
वासुदेव की प्रेरणा से महाबली भीमसेन रथ से तुरन्त कूद पड़े और दोनों भुजाओं से उसे रोक लिया।
श्लोक 52 (7.199.52)
द्रवमाणं तथा क्रुद्धं सात्यकिं पाण्डवो बली । प्रस्पन्दमानमादाय जगाम बलिनं बलात् ॥
dravamāṇaṃ tathā kruddhaṃ sātyakiṃ pāṇḍavo balī | praspandamānamādāya jagāma balinaṃ balāt
क्रुद्ध होकर दौड़ते और छटपटाते हुए उस बलवान् सात्यकि को बलवान् पाण्डव भीम ने पकड़कर बलपूर्वक खींच लिया।
श्लोक 53 (7.199.53)
स्थित्वा विष्टभ्य चरणौ भीमेन शिनिपुङ्गवः । निगृहीतः पदे षष्ठे बलेन बलिनां वरः ॥
sthitvā viṣṭabhya caraṇau bhīmena śinipuṅgavaḥ | nigṛhītaḥ pade ṣaṣṭhe balena balināṃ varaḥ
भीम ने पैर जमाकर खड़े होकर बलवानों में श्रेष्ठ उस शिनिवंशी वीर को छठे कदम पर रोक लिया।
श्लोक 54 (7.199.54)
अवरुह्य रथात्तूर्णं ध्रियमाणं बलीयसा । उवाच श्लक्ष्णया वाचा सहदेवो विशाम्पते ॥
avaruhya rathāttūrṇaṃ dhriyamāṇaṃ balīyasā | uvāca ślakṣṇayā vācā sahadevo viśāmpate
हे प्रजानाथ! बलवान् भीम द्वारा पकड़े गए सात्यकि से सहदेव ने रथ से उतरकर मधुर वाणी में कहा:
सहदेव उवाच
श्लोक 55 (7.199.55)
अस्माकं पुरुषव्याघ्र मित्रमन्यन्न विद्यते । परमन्धकवृष्णिभ्यः पाञ्चालेभ्यश्च मारिष ॥
asmākaṃ puruṣavyāghra mitramanyanna vidyate | paramandhakavṛṣṇibhyaḥ pāñcālebhyaśca māriṣa
“हे पुरुषव्याघ्र! हे आर्य! अन्धक-वृष्णियों और पांचालों के सिवा हमारा कोई दूसरा मित्र नहीं है।
श्लोक 56 (7.199.56)
तथैवान्धकवृष्णीनां तथैव च विशेषतः । कृष्णस्य च तथाऽस्मत्तो मित्रमन्यन्न विद्यते ॥
tathaivāndhakavṛṣṇīnāṃ tathaiva ca viśeṣataḥ | kṛṣṇasya ca tathā'smatto mitramanyanna vidyate
वैसे ही अन्धक-वृष्णियों का, और विशेषकर कृष्ण का, हमारे सिवा कोई दूसरा मित्र नहीं है।
श्लोक 57 (7.199.57)
पाञ्चालानां च वार्ष्णेय समुद्रान्तां विचिन्वताम् । नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णयः ॥
pāñcālānāṃ ca vārṣṇeya samudrāntāṃ vicinvatām | nānyadasti paraṃ mitraṃ yathā pāṇḍavavṛṣṇayaḥ
हे वार्ष्णेय! समुद्र तक की सारी पृथ्वी खोजने पर भी पांचालों का पाण्डवों और वृष्णियों से बढ़कर कोई मित्र नहीं मिलेगा।
श्लोक 58 (7.199.58)
स भवानीदृशं मित्रं मन्यते च यथा भवान् । भवन्तश्च यथाऽस्माकं भवतां च तथा वयम् ॥
sa bhavānīdṛśaṃ mitraṃ manyate ca yathā bhavān | bhavantaśca yathā'smākaṃ bhavatāṃ ca tathā vayam
और आप भी हमें ऐसा ही मित्र मानते हैं; जैसे आप हमारे हैं, वैसे ही हम आपके हैं।
श्लोक 59 (7.199.59)
स एवं सर्वधर्मज्ञ मित्रधर्ममनुस्मरन् । नियच्छ मन्युं पाञ्चाल्यात्प्रशाम्य शिनिपुङ्गव ॥
sa evaṃ sarvadharmajña mitradharmamanusmaran | niyaccha manyuṃ pāñcālyātpraśāmya śinipuṅgava
इसलिए हे सब धर्मों के ज्ञाता! मित्र-धर्म का स्मरण करके पांचाल पर से अपना क्रोध रोकिए और शान्त हो जाइए, हे शिनिप्रवर।
श्लोक 60 (7.199.60)
पार्षतस्य क्षम त्वं वै क्षमतां पार्षतश्च ते । वयं क्षमयितारश्च किमन्यत्र शमाद्भवेत् ॥
pārṣatasya kṣama tvaṃ vai kṣamatāṃ pārṣataśca te | vayaṃ kṣamayitāraśca kimanyatra śamādbhavet
आप पार्षत को क्षमा कीजिए और पार्षत आपको क्षमा करे; हम क्षमा कराने वाले हैं। शान्ति के सिवा और क्या भला हो सकता है?”
सञ्जय उवाच
श्लोक 61 (7.199.61)
प्रशाम्यमाने शैनेये सहदेवेन मारिष । पाञ्चालराजस्य सुतः प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥
praśāmyamāne śaineye sahadevena māriṣa | pāñcālarājasya sutaḥ prahasannidamabravīt
हे आर्य! सहदेव द्वारा सात्यकि के शान्त किए जाने पर पांचालराज के पुत्र ने हँसते हुए यह कहा:
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 62 (7.199.62)
मुञ्चमुञ्च शिनेः पौत्रं भीम युद्धमदान्वितम् । आसादयतु मामेष धराधरमिवानिलः ॥
muñcamuñca śineḥ pautraṃ bhīma yuddhamadānvitam | āsādayatu māmeṣa dharādharamivānilaḥ
“हे भीम! युद्ध के मद से भरे इस शिनि के पौत्र को छोड़ दो, छोड़ दो; यह मेरे पास आए, जैसे वायु पर्वत से टकराती है,
श्लोक 63 (7.199.63)
यावदस्य शितैर्बाणैः संरम्भं विनयाम्यहम् । युद्धश्रद्धां च कौन्तेय जीवितं चास्य संयुगे ॥
yāvadasya śitairbāṇaiḥ saṃrambhaṃ vinayāmyaham | yuddhaśraddhāṃ ca kaunteya jīvitaṃ cāsya saṃyuge
जब तक कि हे कुन्तीपुत्र! मैं अपने तीखे बाणों से इसका क्रोध, युद्ध की इसकी लालसा और इस युद्ध में इसका जीवन भी शान्त न कर दूँ।
श्लोक 64 (7.199.64)
किं नु शक्यं मया कर्तुं यत्कार्यमिदमुच्यताम् । सुमहत्पाण्डुपुत्राणामायान्त्येते हि कौरवाः ॥
kiṃ nu śakyaṃ mayā kartuṃ yatkāryamidamucyatām | sumahatpāṇḍuputrāṇāmāyāntyete hi kauravāḥ
मैं क्या कर सकता हूँ? बताइए कि क्या करना है। पाण्डवों के लिए यह बहुत बड़ा संकट है, क्योंकि ये कौरव चले आ रहे हैं।
श्लोक 65 (7.199.65)
अथवा फल्गुनः सर्वान्वारयिष्यति संयुगे । अहमप्यस्य मूर्धानं पातयिष्यामि सायकैः ॥
athavā phalgunaḥ sarvānvārayiṣyati saṃyuge | ahamapyasya mūrdhānaṃ pātayiṣyāmi sāyakaiḥ
अथवा अर्जुन युद्ध में उन सबको रोक लेगा; और मैं भी बाणों से इसका सिर गिरा दूँगा।
श्लोक 66 (7.199.66)
मन्यते च्छिन्नबाहुं मां भूरिश्रवसमाहवे । उत्सृजैनमहं चैनमेष वा मां हनिष्यति ॥
manyate cchinnabāhuṃ māṃ bhūriśravasamāhave | utsṛjainamahaṃ cainameṣa vā māṃ haniṣyati
यह मुझे युद्ध में भुजा कटे भूरिश्रवा के समान समझता है। इसे छोड़ दो; या तो मैं इसे मारूँगा, या यह मुझे मारेगा।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 67 (7.199.67)
शृण्वन्पाञ्चालवाक्यानि सात्यकिः सर्पवच्छ्वसन् । भीमबाह्वन्तरे सक्तो विस्फुरत्यनिशं बली ॥
śṛṇvanpāñcālavākyāni sātyakiḥ sarpavacchvasan | bhīmabāhvantare sakto visphuratyaniśaṃ balī
पांचाल की बातें सुनकर सात्यकि साँप की तरह फुफकारते हुए भीम की भुजाओं के बीच बँधे होने पर भी बलवान् होने से निरन्तर छटपटाते रहे।
श्लोक 68 (7.199.68)
तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ बाहुशालिनौ । त्वरया वासुदेवश्च धर्मराजश्च मारिष । यत्नेन महता वीरौ वारयामासतुस्ततः ॥
tau vṛṣāviva nardantau balinau bāhuśālinau | tvarayā vāsudevaśca dharmarājaśca māriṣa | yatnena mahatā vīrau vārayāmāsatustataḥ
वे दोनों बलवान्, भुजाओं से शोभित वीर साँड़ों की तरह गरज रहे थे; हे आर्य! वासुदेव और धर्मराज ने बड़ी शीघ्रता और महान् प्रयत्न से उन दोनों को रोका।
श्लोक 69 (7.199.69)
निवार्य परमेष्वासौ कोपसंरक्तलोचनौ । युयुत्सूनपरान्सङ्ख्ये प्रतीयुः क्षत्रियर्षभाः ॥
nivārya parameṣvāsau kopasaṃraktalocanau | yuyutsūnaparānsaṅkhye pratīyuḥ kṣatriyarṣabhāḥ
क्रोध से लाल आँखों वाले उन दोनों महाधनुर्धरों को रोककर क्षत्रियश्रेष्ठ युद्ध के इच्छुक शत्रुओं का सामना करने के लिए लौट पड़े।