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द्रोण पर्व · अध्याय 200

अश्वत्थामा द्वारा नारायणास्त्र का प्रयोग

अश्वत्थामा पिता के वध का बदला लेने की अपनी प्रतिज्ञा दोहराता है, दोनों सेनाएँ फिर भिड़ती हैं और वह नारायणास्त्र छोड़ता है, जो अपने विरुद्ध चलाए गए हर प्रहार से बढ़ता जाता है और पाण्डव-सेना को जलाने लगता है। भय से घिरे युधिष्ठिर सैनिकों को भाग जाने को कहते और स्वयं अग्नि में प्रवेश करने की बात कहते हैं। कृष्ण सेना को रोककर सबको शस्त्र रखकर वाहनों से उतरने की आज्ञा देते हैं। भीम नहीं मानते और अश्वत्थामा पर चढ़ दौड़ते हैं और बाणों की वर्षा में ढक जाते हैं, जबकि अर्जुन अपने व्रत के कारण उस अस्त्र पर गाण्डीव नहीं उठाते। सेना के शस्त्र डालते ही अस्त्र का पूरा तेज भीम के सिर पर आ गिरता है।

अध्याय 199अध्याय-सूचीअध्याय 201

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.200.1)

ततः स कदनं चक्रे रिपूणां द्रोणनन्दनः । युगान्ते सर्वभूतानां कालसृष्ट इवान्तकः ॥

tataḥ sa kadanaṃ cakre ripūṇāṃ droṇanandanaḥ | yugānte sarvabhūtānāṃ kālasṛṣṭa ivāntakaḥ

तब द्रोणपुत्र ने शत्रुओं का संहार आरम्भ किया, जैसे युग के अन्त में काल का भेजा हुआ यम समस्त प्राणियों का संहार करता है।

श्लोक 2 (7.200.2)

ध्वजद्रुमं शस्त्रशृङ्गं हतनागमहाशिलम् । अश्वकिम्पुरुषाकीर्णं शरासनलतावृतम् ॥

dhvajadrumaṃ śastraśṛṅgaṃ hatanāgamahāśilam | aśvakimpuruṣākīrṇaṃ śarāsanalatāvṛtam

ऐसा देह-पर्वत, जिसमें ध्वज वृक्ष थे, शस्त्र शिखर, और मरे हुए हाथी बड़ी-बड़ी चट्टानें; जो घोड़ों और किम्पुरुषों से भरा था और धनुष-रूपी लताओं से ढका था,

श्लोक 3 (7.200.3)

क्रव्यादपक्षिसङ्घुष्टं भूतयक्षगणाकुलम् । निहत्य शात्रवान्भल्लैः सोऽचिनोद्देहपर्वतम् ॥

kravyādapakṣisaṅghuṣṭaṃ bhūtayakṣagaṇākulam | nihatya śātravānbhallaiḥ so'cinoddehaparvatam

जो मांसभक्षी पक्षियों की चीख़ों से गूँज रहा था और भूतों तथा यक्षों के समूहों से भरा था, ऐसा देहों का पर्वत उसने भल्लों से शत्रुओं को मारकर खड़ा कर दिया।

श्लोक 4 (7.200.4)

ततो वेगेन महता विनद्य स नरर्षभः । प्रतिज्ञां श्रावयामास पुनरेव तवात्मजम् ॥

tato vegena mahatā vinadya sa nararṣabhaḥ | pratijñāṃ śrāvayāmāsa punareva tavātmajam

तब उस नरश्रेष्ठ ने बड़े वेग से गरजकर आपके पुत्र को फिर अपनी प्रतिज्ञा सुनाई:

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 5 (7.200.5)

यदत्र च्छद्मनाऽऽचार्यं धर्मकञ्चुकमास्थितः । मुञ्च शस्त्रमिति प्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

yadatra cchadmanā''cāryaṃ dharmakañcukamāsthitaḥ | muñca śastramiti prāha kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ

“चूँकि यहाँ धर्म का कवच पहने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने छल से आचार्य से कहा था, ‘शस्त्र छोड़ दो,’

श्लोक 6 (7.200.6)

तस्मात्सम्पश्यतस्तस्य द्रावयिष्यामि वाहिनीम् । विद्राव्य सर्वान्हन्ताऽस्मि जाल्मं पाञ्चाल्यमेव तु ॥

tasmātsampaśyatastasya drāvayiṣyāmi vāhinīm | vidrāvya sarvānhantā'smi jālmaṃ pāñcālyameva tu

इसलिए उसकी आँखों के सामने ही मैं उसकी सेना को भगा दूँगा; और सबको भगाकर उस दुष्ट पांचाल को ही मारूँगा।

श्लोक 7 (7.200.7)

सर्वानेतान्हनिष्यामि यदि योत्स्यन्ति मां रणे । सत्यं ते प्रतिजानामि परिवर्तय वाहिनीम् ॥

sarvānetānhaniṣyāmi yadi yotsyanti māṃ raṇe | satyaṃ te pratijānāmi parivartaya vāhinīm

यदि ये सब युद्ध में मुझसे लड़ेंगे तो मैं इन सबको मार डालूँगा। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ; सेना को लौटाओ।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 8 (7.200.8)

तच्छ्रुत्वा तव पुत्रस्तु वाहिनीं पर्यवर्तयत् । सिंहनादेन महता व्यपोह्य सुमहद्भयम् ॥

tacchrutvā tava putrastu vāhinīṃ paryavartayat | siṃhanādena mahatā vyapohya sumahadbhayam

यह सुनकर आपके पुत्र ने भारी सिंहनाद से अपना बड़ा भय दूर करके सेना को लौटा लिया।

श्लोक 9 (7.200.9)

ततः समागमो राजन्कुरुपाण्डवसेनयोः । पुनरेवाभवत्तीव्रः पूर्णसागरयोरिव ॥

tataḥ samāgamo rājankurupāṇḍavasenayoḥ | punarevābhavattīvraḥ pūrṇasāgarayoriva

हे राजन्! तब कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं का भयंकर संग्राम फिर छिड़ गया, जैसे दो भरे हुए समुद्र टकरा रहे हों।

श्लोक 10 (7.200.10)

संरब्धा हि स्थिरीभूता द्रोणपुत्रेण कौरवाः । उदग्राः पाण्डुपाञ्चाला द्रोणस्य निधनेन च ॥

saṃrabdhā hi sthirībhūtā droṇaputreṇa kauravāḥ | udagrāḥ pāṇḍupāñcālā droṇasya nidhanena ca

द्रोणपुत्र के कारण कौरव क्रोध से भरे हुए डटकर खड़े थे, और द्रोण की मृत्यु से पाण्डव तथा पांचाल उत्साह में थे।

श्लोक 11 (7.200.11)

तेषां परमहृष्टानां जयमात्मनि पश्यताम् । संरब्धानां महावेगः प्रादुरासीद्विशाम्पते ॥

teṣāṃ paramahṛṣṭānāṃ jayamātmani paśyatām | saṃrabdhānāṃ mahāvegaḥ prādurāsīdviśāmpate

हे प्रजापालक! अपने भीतर विजय देखते हुए, अत्यन्त हर्षित और क्रोध से भरे उन योद्धाओं में भारी वेग उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 12 (7.200.12)

यथा शिलोच्चये शैलः सागरैः सागरो यथा । प्रतिहन्येत राजेन्द्र तथाऽसन्कुरुपाण्डवाः ॥

yathā śiloccaye śailaḥ sāgaraiḥ sāgaro yathā | pratihanyeta rājendra tathā'sankurupāṇḍavāḥ

हे राजेन्द्र! जैसे पर्वत शिला-समूह से टकराए या समुद्र समुद्रों से, वैसे ही कौरव और पाण्डव एक-दूसरे से टकरा रहे थे।

श्लोक 13 (7.200.13)

चुक्षुभे पृथिवी सर्वा दिशश्च प्रतिसस्वनुः । सम्भ्रान्तान्यपि भूतानि जलजान्यपि मारिष । ते च सर्वे तदा योधाः सम्प्रहृष्टा युयुत्सवः ॥

cukṣubhe pṛthivī sarvā diśaśca pratisasvanuḥ | sambhrāntānyapi bhūtāni jalajānyapi māriṣa | te ca sarve tadā yodhāḥ samprahṛṣṭā yuyutsavaḥ

सारी पृथ्वी काँप उठी, दिशाएँ गूँज उठीं; हे आर्य! प्राणी घबरा गए, जलचर भी। और उस समय वे सब योद्धा लड़ने की इच्छा से अत्यन्त हर्षित थे।

श्लोक 14 (7.200.14)

ततः शङ्खसहस्राणि भेरीणामयुतानि च । अवादयन्त संहृष्टाः कुरुपाण्डवसैनिकाः ॥

tataḥ śaṅkhasahasrāṇi bherīṇāmayutāni ca | avādayanta saṃhṛṣṭāḥ kurupāṇḍavasainikāḥ

तब कौरवों और पाण्डवों के हर्षित सैनिकों ने हज़ारों शंख और दसियों हज़ार भेरियाँ बजाईं।

श्लोक 15 (7.200.15)

यथा निर्मथ्यमानस्य सागरस्य तु निःस्वनः । अभवत्तव सैन्यस्य सुमहानद्भुतोपमः ॥

yathā nirmathyamānasya sāgarasya tu niḥsvanaḥ | abhavattava sainyasya sumahānadbhutopamaḥ

मथे जाते हुए समुद्र के निनाद जैसा आपकी सेना का महान् और अद्भुत शब्द हुआ।

श्लोक 16 (7.200.16)

वर्तमाने तथा शब्दे रौद्रे तस्मिन्भयानके । सम्पतत्सु रथौघेषु तव तेषां च भारत ॥

vartamāne tathā śabde raudre tasminbhayānake | sampatatsu rathaugheṣu tava teṣāṃ ca bhārata

हे भारत! जब वह भयानक, डरावना शोर हो रहा था और आपके और उनके रथों के समूह एक-दूसरे पर टूट पड़ रहे थे,

श्लोक 17 (7.200.17)

प्रादुश्चक्रे ततो द्रौणिरस्त्रं नारायणं तदा । अभिसन्धाय पाण्डूनां पाञ्चालानां च वाहिनीं ॥

prāduścakre tato drauṇirastraṃ nārāyaṇaṃ tadā | abhisandhāya pāṇḍūnāṃ pāñcālānāṃ ca vāhinīṃ

तब द्रोणपुत्र ने पाण्डवों और पांचालों की सेना को लक्ष्य करके नारायण नामक अस्त्र प्रकट किया।

श्लोक 18 (7.200.18)

प्रादुरासंस्ततो बाणा दीप्ताग्राः खे सहस्रशः । पाण्डवान्क्षपयिष्यन्तो दीप्तास्यः पन्नगा इव ॥

prādurāsaṃstato bāṇā dīptāgrāḥ khe sahasraśaḥ | pāṇḍavānkṣapayiṣyanto dīptāsyaḥ pannagā iva

तब आकाश में हज़ारों बाण प्रकट हुए जिनकी नोकें दहक रही थीं; वे अग्निमुख साँपों की तरह पाण्डवों का नाश करने को उद्यत थे।

श्लोक 19 (7.200.19)

ते दिशः खं च सैन्यं च समावृण्वन्महाहवे । मुहूर्ताद्भास्करस्येव लोके राजन्गभस्तयः ॥

te diśaḥ khaṃ ca sainyaṃ ca samāvṛṇvanmahāhave | muhūrtādbhāskarasyeva loke rājangabhastayaḥ

हे राजन्! उन्होंने उस महायुद्ध में दिशाओं, आकाश और सेना को क्षण भर में ऐसे ढक दिया, जैसे सूर्य की किरणें संसार को ढक लेती हैं।

श्लोक 20 (7.200.20)

तथाऽपरे द्योतमाना ज्योतींषीवामलाम्बरे । प्रादुरासन्महाराज कार्ष्णायसमया गुडाः ॥

tathā'pare dyotamānā jyotīṃṣīvāmalāmbare | prādurāsanmahārāja kārṣṇāyasamayā guḍāḥ

हे महाराज! निर्मल आकाश में तारों की तरह चमकते हुए दूसरे पदार्थ, काले लोहे के गोले, भी प्रकट हुए।

श्लोक 21 (7.200.21)

चतुश्चक्रा द्विचक्राश्च शतघ्नो बहुला गदाः । चक्राणि च क्षुरान्तानि मण्डलानीव भास्वतः ॥

catuścakrā dvicakrāśca śataghno bahulā gadāḥ | cakrāṇi ca kṣurāntāni maṇḍalānīva bhāsvataḥ

चार पहियों वाले और दो पहियों वाले अस्त्र, शतघ्नियाँ, अनेक गदाएँ, और सूर्य-मण्डल जैसे उस्तरे की धार वाले चक्र भी प्रकट हुए।

श्लोक 22 (7.200.22)

शस्त्राकृतिभिराकीर्णमतीव पुरुषर्षभ । दृष्ट्वान्तरिक्षमाविग्नाः पाण्डुपाञ्चालसृञ्जयाः ॥

śastrākṛtibhirākīrṇamatīva puruṣarṣabha | dṛṣṭvāntarikṣamāvignāḥ pāṇḍupāñcālasṛñjayāḥ

हे पुरुषश्रेष्ठ! आकाश को शस्त्रों के आकारों से ठसाठस भरा देखकर पाण्डव, पांचाल और सृंजय घबरा गए।

श्लोक 23 (7.200.23)

यथायथा ह्ययुध्यन्त पाण्डवानां महारथाः । तथातथा तदस्त्रं वै व्यवर्धत जनाधिप ॥

yathāyathā hyayudhyanta pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ | tathātathā tadastraṃ vai vyavardhata janādhipa

हे जनाधिप! पाण्डवों के महारथी जितना-जितना लड़ते गए, वह अस्त्र उतना-उतना बढ़ता गया।

श्लोक 24 (7.200.24)

वध्यमानास्तदाऽस्त्रेण तेन नारायणेन वै । दह्यमानाऽनलेनेव सर्वतोऽभ्यर्दिता रणे ॥

vadhyamānāstadā'streṇa tena nārāyaṇena vai | dahyamānā'naleneva sarvato'bhyarditā raṇe

उस नारायण अस्त्र से मारे जाते हुए वे युद्ध में चारों ओर से पीड़ित हुए, मानो आग में जल रहे हों।

श्लोक 25 (7.200.25)

यथा हि शिशिरापाये दहेत्कक्षं हुताशनः । तथा तदस्त्रं पाण्डूनां ददाह ध्वजिनीं प्रभो ॥

yathā hi śiśirāpāye dahetkakṣaṃ hutāśanaḥ | tathā tadastraṃ pāṇḍūnāṃ dadāha dhvajinīṃ prabho

हे प्रभो! जैसे शिशिर बीतने पर आग सूखी घास को जला देती है, वैसे ही उस अस्त्र ने पाण्डवों की सेना को जला डाला।

श्लोक 26 (7.200.26)

आपूर्यमाणेनास्त्रेण सैन्ये क्षीयति च प्रभो । जगाम परमं त्रासं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

āpūryamāṇenāstreṇa sainye kṣīyati ca prabho | jagāma paramaṃ trāsaṃ dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

हे प्रभो! अस्त्र के बढ़ते जाने और सेना के घटते जाने से धर्मपुत्र युधिष्ठिर को भारी भय हुआ।

श्लोक 27 (7.200.27)

द्रवमाणं तु तत्सैन्यं दृष्ट्वा विगतचेतनम् । मध्यस्थतां च पार्थस्य धर्मपुत्रोऽब्रवीदिदम् ॥

dravamāṇaṃ tu tatsainyaṃ dṛṣṭvā vigatacetanam | madhyasthatāṃ ca pārthasya dharmaputro'bravīdidam

उस सेना को भागते और होश खोते देखकर, और अर्जुन को तटस्थ खड़ा देखकर, धर्मपुत्र ने यह कहा:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (7.200.28)

धृष्टद्युम्न पलायस्व सह पाञ्चालसेनया । सात्यके त्वं च गच्छस्व वृष्ण्यन्धकवृतो महान् ॥

dhṛṣṭadyumna palāyasva saha pāñcālasenayā | sātyake tvaṃ ca gacchasva vṛṣṇyandhakavṛto mahān

“हे धृष्टद्युम्न! पांचाल सेना के साथ भाग जाओ। और हे सात्यकि! तुम भी वृष्णियों और अन्धकों से घिरे हुए, हे महावीर, चले जाओ।

श्लोक 29 (7.200.29)

वासुदेवोऽपि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मनः क्षमम् । श्रेयो ह्युपदिशत्येष लोकस्य किमुतात्मनः ॥

vāsudevo'pi dharmātmā kariṣyatyātmanaḥ kṣamam | śreyo hyupadiśatyeṣa lokasya kimutātmanaḥ

धर्मात्मा वासुदेव भी अपने लिए जो उचित होगा करेंगे; वे तो संसार को भी कल्याण का उपदेश देते हैं, फिर अपने लिए क्या कहना!

श्लोक 30 (7.200.30)

सङ्ग्रामस्तु न कर्तव्यः सर्वसैन्यान्ब्रवीमि वः । अहं हि सह सोदर्यैः प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ॥

saṅgrāmastu na kartavyaḥ sarvasainyānbravīmi vaḥ | ahaṃ hi saha sodaryaiḥ pravekṣye havyavāhanam

मैं तुम सब सैनिकों से कहता हूँ: युद्ध मत करो। मैं तो अपने भाइयों के साथ अग्नि में प्रवेश करूँगा।

श्लोक 31 (7.200.31)

भीष्मद्रोणार्णवं तीर्त्वा सङ्ग्रामे भीरुदुस्तरे । विमज्जिष्यामि सलिले सगणो द्रौणिगोष्पदे ॥

bhīṣmadroṇārṇavaṃ tīrtvā saṅgrāme bhīrudustare | vimajjiṣyāmi salile sagaṇo drauṇigoṣpade

कायरों के लिए पार करना कठिन भीष्म-द्रोण रूपी समुद्र को युद्ध में पार करके, मैं अपने साथियों समेत द्रोणपुत्र रूपी गोखुर के जल में डूब जाऊँगा।

श्लोक 32 (7.200.32)

कामः सम्पद्यतामस्य बीभत्सोराशु मां प्रति । कल्याणवृत्तिराचार्यो मया युधि निपातितः ॥

kāmaḥ sampadyatāmasya bībhatsorāśu māṃ prati | kalyāṇavṛttirācāryo mayā yudhi nipātitaḥ

इस बीभत्सु की इच्छा मेरे विषय में शीघ्र पूरी हो जाए, क्योंकि कल्याणमय आचरण वाले आचार्य को मैंने युद्ध में गिराया है,

श्लोक 33 (7.200.33)

येन बालः स सौभद्रो युद्धानामविशारदः । समर्थैर्बहुभिः क्रूरैर्घातितो नाभिपालितः ॥

yena bālaḥ sa saubhadro yuddhānāmaviśāradaḥ | samarthairbahubhiḥ krūrairghātito nābhipālitaḥ

उन्हीं आचार्य ने, जिन्होंने युद्धों में अकुशल बालक सौभद्र को अनेक समर्थ और क्रूर योद्धाओं से मरवा दिया और उसकी रक्षा नहीं की;

श्लोक 34 (7.200.34)

येन विब्रुवती प्रश्नं तथा कृष्णा सभां गता । उपेक्षिता सपुत्रेण दासीभावं नियच्छती ॥

yena vibruvatī praśnaṃ tathā kṛṣṇā sabhāṃ gatā | upekṣitā saputreṇa dāsībhāvaṃ niyacchatī

जिन्होंने अपने पुत्र के साथ, सभा में आई हुई, प्रश्न पूछती हुई और दासीभाव में धकेली जाती हुई कृष्णा की उपेक्षा की;

श्लोक 35 (7.200.35)

रक्षणे च महान्यत्नः सैन्धवस्य कृतो युधि । अर्जुनस्य विघातार्थं प्रतिज्ञा येन रक्षिता ॥

rakṣaṇe ca mahānyatnaḥ saindhavasya kṛto yudhi | arjunasya vighātārthaṃ pratijñā yena rakṣitā

जिन्होंने युद्ध में अर्जुन को रोकने के लिए सैन्धव की रक्षा का महान् प्रयत्न किया और अपनी प्रतिज्ञा निभाई;

श्लोक 36 (7.200.36)

व्यूहद्वारि वयं चैव धृता येन जिगीषवः । वारितं च महत्सैन्यं प्रविशत्तद्यथाबलम् ॥

vyūhadvāri vayaṃ caiva dhṛtā yena jigīṣavaḥ | vāritaṃ ca mahatsainyaṃ praviśattadyathābalam

जिन्होंने विजय चाहने वाले हम लोगों को व्यूह के द्वार पर रोक लिया, और भीतर घुसती हुई विशाल सेना को यथाशक्ति रोके रखा;

श्लोक 37 (7.200.37)

जिघांसुर्धार्तराष्ट्रश्च श्रान्तेष्वन्येषु फल्गुनम् । कवचेन तथा गुप्तो रक्षार्थं सैन्धवस्य च ॥

jighāṃsurdhārtarāṣṭraśca śrānteṣvanyeṣu phalgunam | kavacena tathā gupto rakṣārthaṃ saindhavasya ca

और जब अन्य लोग थक चुके थे, तब अर्जुन को मारना चाहने वाले दुर्योधन को जिन्होंने कवच से सुरक्षित किया, सैन्धव की रक्षा के लिए भी;

श्लोक 38 (7.200.38)

येन ब्रह्मास्त्रविदुषा पाञ्चालाः सत्यजिन्मुखाः । कुर्वाणा मज्जये यत्नं समूला विनिपातिताः ॥

yena brahmāstraviduṣā pāñcālāḥ satyajinmukhāḥ | kurvāṇā majjaye yatnaṃ samūlā vinipātitāḥ

ब्रह्मास्त्र जानने वाले जिन्होंने मेरी विजय के लिए यत्न करते हुए सत्यजित् आदि पांचालों को जड़ से मार डाला;

श्लोक 39 (7.200.39)

ग्रहणे च परो यत्नः कृतस्तेन यथा मम । विदितं सर्वमेवैतद्भवतां सर्वयोधिनाम् ॥

grahaṇe ca paro yatnaḥ kṛtastena yathā mama | viditaṃ sarvamevaitadbhavatāṃ sarvayodhinām

और जिन्होंने मुझे पकड़ने के लिए भी बड़ा यत्न किया; यह सब आप सब योद्धा जानते ही हैं;

श्लोक 40 (7.200.40)

येन प्रव्राज्यमानाश्च राज्याद्वयमधर्मतः । निवार्यमाणेनास्माभिरनुगन्तुं तदेषिताः ॥

yena pravrājyamānāśca rājyādvayamadharmataḥ | nivāryamāṇenāsmābhiranugantuṃ tadeṣitāḥ

और जब हमें अधर्म से राज्य से निकाला जा रहा था, तब हमारे रोकने पर भी जिन्होंने हमारे साथ वन चलने की इच्छा प्रकट की;

श्लोक 41 (7.200.41)

वनवासान्निवृत्तानां समये च तथा कृते । स्नेहश्च दर्शितो नित्यं प्रत्यक्षं वो महारथाः ॥

vanavāsānnivṛttānāṃ samaye ca tathā kṛte | snehaśca darśito nityaṃ pratyakṣaṃ vo mahārathāḥ

वनवास से लौटने पर, समय-सीमा पूरी हो जाने पर भी, हे महारथियो! जिन्होंने आप सबके सामने सदा अपना स्नेह प्रकट किया।

श्लोक 42 (7.200.42)

योऽसावत्यन्तमस्मासु कुर्वाणः सौहृदं परम् । हतस्तदर्थे मरणं गमिष्यामि सबान्धवः ॥

yo'sāvatyantamasmāsu kurvāṇaḥ sauhṛdaṃ param | hatastadarthe maraṇaṃ gamiṣyāmi sabāndhavaḥ

जो हम पर इतना परम स्नेह रखते थे, वे उसी कारण मारे गए; मैं भी अपने बन्धुओं के साथ मृत्यु को प्राप्त होऊँगा।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 43 (7.200.43)

एवं ब्रुवति कौन्तेये दाशार्हस्त्वरितस्ततः । निवार्य सैन्यं बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥

evaṃ bruvati kaunteye dāśārhastvaritastataḥ | nivārya sainyaṃ bāhubhyāmidaṃ vacanamabravīt

जब कुन्तीपुत्र ऐसा कह रहे थे, तब दाशार्ह कृष्ण ने तुरन्त अपनी भुजाओं से सेना को रोककर यह वचन कहा:

वासुदेव उवाच

श्लोक 44 (7.200.44)

शीघ्रं न्यस्यत शस्त्राणि वाहेभ्यश्चावरोहत । एष योगोऽत्र विहितः प्रतिघाते महात्मनः ॥

śīghraṃ nyasyata śastrāṇi vāhebhyaścāvarohata | eṣa yogo'tra vihitaḥ pratighāte mahātmanaḥ

“शीघ्र शस्त्र रख दो और वाहनों से उतर जाओ। उस महात्मा के अस्त्र को रोकने का यही उपाय यहाँ निर्धारित है।

श्लोक 45 (7.200.45)

द्विपाश्वस्यन्दनेभ्यश्च क्षितिं सर्वेऽवरोहत । एवमेतन्न वो हन्यादस्त्रं भूमौ निरायुधान् ॥

dvipāśvasyandanebhyaśca kṣitiṃ sarve'varohata | evametanna vo hanyādastraṃ bhūmau nirāyudhān

हाथियों, घोड़ों और रथों से तुम सब भूमि पर उतर जाओ। इस प्रकार निहत्थे होकर भूमि पर खड़े तुम लोगों को यह अस्त्र नहीं मारेगा।

श्लोक 46 (7.200.46)

यथायथा हि युध्यन्ते योधा ह्यस्त्रमिदं प्रति । तथातथा भवन्त्येते कौरवा बलवत्तराः ॥

yathāyathā hi yudhyante yodhā hyastramidaṃ prati | tathātathā bhavantyete kauravā balavattarāḥ

योद्धा इस अस्त्र के विरुद्ध जैसे-जैसे लड़ते हैं, वैसे-वैसे ये कौरव अधिक बलवान् होते जाते हैं।

श्लोक 47 (7.200.47)

निक्षेप्स्यन्ति च शस्त्राणि वाहनेभ्योऽवरुह्य ये । येऽञ्जलिं कुर्वते वीर नमन्ति च विवाहनाः । तान्नैतदस्त्रं सङ्ग्रामे निहनिष्यति मानवान् ॥

nikṣepsyanti ca śastrāṇi vāhanebhyo'varuhya ye | ye'ñjaliṃ kurvate vīra namanti ca vivāhanāḥ | tānnaitadastraṃ saṅgrāme nihaniṣyati mānavān

जो लोग वाहनों से उतरकर शस्त्र रख देंगे, और हे वीर! जो वाहनों के बिना हाथ जोड़ेंगे और प्रणाम करेंगे, उन मनुष्यों को यह अस्त्र युद्ध में नहीं मारेगा।

श्लोक 48 (7.200.48)

ये त्वेतत्प्रतियोत्स्यन्ति मनसाऽपीह केचन । निहनिष्यति तान्सर्वान्रसातलगतानपि ॥

ye tvetatpratiyotsyanti manasā'pīha kecana | nihaniṣyati tānsarvānrasātalagatānapi

पर जो कोई इसका सामना करेंगे, मन से भी, उन सबको यह मार डालेगा, चाहे वे रसातल में ही क्यों न चले जाएँ।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 49 (7.200.49)

ते वचस्तस्य तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य भारत । ईषुः सर्वे समुत्स्रष्टुं मनोभिः करणेन च ॥

te vacastasya tacchrutvā vāsudevasya bhārata | īṣuḥ sarve samutsraṣṭuṃ manobhiḥ karaṇena ca

हे भारत! वासुदेव की वह बात सुनकर उन सबने मन और कर्म दोनों से शस्त्र छोड़ने की इच्छा की।

श्लोक 50 (7.200.50)

तत उत्स्रष्टुकामांस्तानस्त्राण्यालक्ष्य पाण्डवः । भीमसेनोऽब्रवीद्राजन्निदं संहर्षयन्वचः ॥

tata utsraṣṭukāmāṃstānastrāṇyālakṣya pāṇḍavaḥ | bhīmaseno'bravīdrājannidaṃ saṃharṣayanvacaḥ

तब उन्हें शस्त्र छोड़ने को उद्यत देखकर पाण्डव भीमसेन ने, हे राजन्, उन्हें उत्साहित करते हुए यह कहा:

भीमसेन उवाच

श्लोक 51 (7.200.51)

न कथञ्चन शस्त्राणि मोक्तव्यानीह केनचित् । अहमावारयिष्यामि द्रोणपुत्रास्त्रमाशुगैः ॥

na kathañcana śastrāṇi moktavyānīha kenacit | ahamāvārayiṣyāmi droṇaputrāstramāśugaiḥ

“यहाँ किसी को भी किसी प्रकार शस्त्र नहीं छोड़ने चाहिए। मैं द्रोणपुत्र के अस्त्र को अपने तीव्र बाणों से रोकूँगा।

श्लोक 52 (7.200.52)

गदयाऽप्यनया गुर्व्या हेमविग्रहया रणे । कालवत्प्रहरिष्यामि द्रौणेरस्त्रं विशातयन् ॥

gadayā'pyanayā gurvyā hemavigrahayā raṇe | kālavatprahariṣyāmi drauṇerastraṃ viśātayan

इस भारी, सोने से मढ़ी गदा से भी मैं द्रोणपुत्र के अस्त्र को चूर-चूर करता हुआ युद्ध में काल की तरह प्रहार करूँगा।

श्लोक 53 (7.200.53)

न हि मे विक्रमे तुल्यः कश्चिदस्ति पुमानिह । यथैव सवितुस्तुल्यं ज्योतिरन्यन्न विद्यते ॥

na hi me vikrame tulyaḥ kaścidasti pumāniha | yathaiva savitustulyaṃ jyotiranyanna vidyate

पराक्रम में यहाँ मेरे समान कोई पुरुष नहीं है, जैसे सूर्य के समान दूसरी कोई ज्योति नहीं।

श्लोक 54 (7.200.54)

पश्यतेमौ हि मे बाहू नागराजकरोपमौ । समर्थौ पर्वतस्यापि शैशिरस्य निपातने ॥

paśyatemau hi me bāhū nāgarājakaropamau | samarthau parvatasyāpi śaiśirasya nipātane

मेरी इन दोनों भुजाओं को देखो, जो गजराज की सूँड़ जैसी हैं और हिमालय जैसे पर्वत को भी गिराने में समर्थ हैं।

श्लोक 55 (7.200.55)

नागायुतसमप्राणो ह्यहमेको नरेष्विह । शक्रो यथाऽप्रतिद्वन्द्वो दिवि देवेषु विश्रुतः ॥

nāgāyutasamaprāṇo hyahameko nareṣviha | śakro yathā'pratidvandvo divi deveṣu viśrutaḥ

मनुष्यों में मैं अकेला दस हज़ार हाथियों के बल वाला हूँ, जैसे स्वर्ग में देवताओं के बीच इन्द्र अप्रतिद्वन्द्वी प्रसिद्ध है।

श्लोक 56 (7.200.56)

अद्य पश्यत मे वीर्यं बाह्वोः पीनांसयोर्युधि । ज्वलमानस्य दीप्तस्य द्रौणेरस्त्रस्य वारणे ॥

adya paśyata me vīryaṃ bāhvoḥ pīnāṃsayoryudhi | jvalamānasya dīptasya drauṇerastrasya vāraṇe

आज युद्ध में मेरी भुजाओं और मोटे कन्धों का पराक्रम देखो, जब मैं द्रोणपुत्र के जलते-दहकते अस्त्र को रोकूँगा।

श्लोक 57 (7.200.57)

यदि नारायणास्त्रस्य प्रतियोद्वा न विद्यते । अद्यैतत्प्रतियोत्स्यामि पश्यत्सु कुरुपाण्डुषु ॥

yadi nārāyaṇāstrasya pratiyodvā na vidyate | adyaitatpratiyotsyāmi paśyatsu kurupāṇḍuṣu

यदि नारायणास्त्र का सामना करने वाला कोई नहीं है, तो आज कौरवों और पाण्डवों के देखते-देखते मैं इसका सामना करूँगा।

श्लोक 58 (7.200.58)

अर्जुनार्जुन बीभत्सो न न्यस्यं गाण्डिवं त्वया । शशाङ्कस्येव ते पङ्को नैर्मल्यं पातयिष्यति ॥

arjunārjuna bībhatso na nyasyaṃ gāṇḍivaṃ tvayā | śaśāṅkasyeva te paṅko nairmalyaṃ pātayiṣyati

हे अर्जुन! हे अर्जुन! हे बीभत्सु! तुम्हें गाण्डीव नहीं रखना चाहिए; नहीं तो चन्द्रमा के कलंक की तरह वह तुम्हारी निर्मलता को गिरा देगा।”

अर्जुन उवाच

श्लोक 59 (7.200.59)

भीम नारायणास्त्रे मे गोषु च ब्राह्मणेषु च । एतेषु गाण्डिवं न्यस्यमेतद्धि व्रतमुत्तमम् ॥

bhīma nārāyaṇāstre me goṣu ca brāhmaṇeṣu ca | eteṣu gāṇḍivaṃ nyasyametaddhi vratamuttamam

“हे भीम! मेरे लिए नारायणास्त्र के विषय में, और गायों तथा ब्राह्मणों के विषय में गाण्डीव को रख देना ही चाहिए; यही मेरा उत्तम व्रत है।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 60 (7.200.60)

एवमुक्तस्ततो भीमो द्रोणपुत्रमरिन्दमम् । अभ्ययान्मेघघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ॥

evamuktastato bhīmo droṇaputramarindamam | abhyayānmeghaghoṣeṇa rathenādityavarcasā

ऐसा कहे जाने पर भीम मेघ के समान गर्जन करने वाले, सूर्य के समान तेजस्वी रथ में शत्रुदमन द्रोणपुत्र पर चढ़ दौड़े।

श्लोक 61 (7.200.61)

कम्पयन्मेदिनीं सर्वां त्रासयंश्च चमूं तव । शङ्खशब्दं महत्कृत्वा भुजशब्दं च पाण्डवः ॥

kampayanmedinīṃ sarvāṃ trāsayaṃśca camūṃ tava | śaṅkhaśabdaṃ mahatkṛtvā bhujaśabdaṃ ca pāṇḍavaḥ

पृथ्वी को कँपाते, आपकी सेना को डराते, शंख का भीषण नाद और भुजाओं की ताल का शब्द करते हुए पाण्डव आगे बढ़े।

श्लोक 62 (7.200.62)

तस्य शङ्खस्वनं श्रुत्वा बाहुशब्दं च तावकाः । समन्तात्कोष्ठकीकृत्य शरव्रातैरवाकिरन् ॥

tasya śaṅkhasvanaṃ śrutvā bāhuśabdaṃ ca tāvakāḥ | samantātkoṣṭhakīkṛtya śaravrātairavākiran

उनके शंख की ध्वनि और भुजाओं की ताल सुनकर आपके योद्धाओं ने चारों ओर से उन्हें घेरकर बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 63 (7.200.63)

स एनमिषुजालेन लघुत्वाच्छीघ्रविक्रमः । निमेषमात्रेणासाद्य कुन्तीपुत्रोऽभ्यवाकिरत् ॥

sa enamiṣujālena laghutvācchīghravikramaḥ | nimeṣamātreṇāsādya kuntīputro'bhyavākirat

हाथ की फुर्ती के कारण शीघ्र पराक्रम करने वाले कुन्तीपुत्र ने पलक झपकते ही उसके पास पहुँचकर उसे बाणों के जाल से ढक दिया।

श्लोक 64 (7.200.64)

ततो द्रौणिः प्रहस्यैनं द्रवन्तमभिभाष्य च । अवाकिरत्प्रदीप्ताग्रैः शरैस्तैरभिमन्त्रितैः ॥

tato drauṇiḥ prahasyainaṃ dravantamabhibhāṣya ca | avākiratpradīptāgraiḥ śaraistairabhimantritaiḥ

तब द्रोणपुत्र ने हँसकर, आगे बढ़ते हुए उनसे कुछ कहकर, मन्त्र से अभिमन्त्रित दहकती नोकों वाले उन बाणों से उन्हें ढक दिया।

श्लोक 65 (7.200.65)

पन्नगैरिव दीप्तास्यैर्वमद्भिर्ज्वलनं रणे । अवकीर्णोऽभवत्पार्थः स्फुलिङ्गैरिव काञ्चनैः ॥

pannagairiva dīptāsyairvamadbhirjvalanaṃ raṇe | avakīrṇo'bhavatpārthaḥ sphuliṅgairiva kāñcanaiḥ

अग्निमुख सर्पों जैसे आग उगलते उन बाणों से ढके हुए भीम स्वर्णिम चिनगारियों से भरे-से दिखाई देने लगे।

श्लोक 66 (7.200.66)

तस्य रूपमभूद्राजन्भीमसेनस्य संयुगे । खद्योतैरावृतस्येव पर्वतस्य दिनक्षये ॥

tasya rūpamabhūdrājanbhīmasenasya saṃyuge | khadyotairāvṛtasyeva parvatasya dinakṣaye

हे राजन्! उस युद्ध में भीमसेन का रूप वैसा हो गया जैसे साँझ के समय जुगनुओं से घिरा पर्वत हो।

श्लोक 67 (7.200.67)

तदस्त्रं द्रोणपुत्रस्य तस्मिन्प्रतिसमस्यति । अवर्धत महाराज यथाऽग्निरनिलोद्धतः ॥

tadastraṃ droṇaputrasya tasminpratisamasyati | avardhata mahārāja yathā'gniraniloddhataḥ

उसके विरुद्ध छोड़ा गया द्रोणपुत्र का वह अस्त्र, हे महाराज, वायु से भड़की आग की तरह बढ़ने लगा।

श्लोक 68 (7.200.68)

विवर्धमानमालक्ष्य तदस्त्रं भीमविक्रमम् । पाण्डुसैन्यमृते भीमं सुमहद्भयमाविशत् ॥

vivardhamānamālakṣya tadastraṃ bhīmavikramam | pāṇḍusainyamṛte bhīmaṃ sumahadbhayamāviśat

भीषण पराक्रम वाले उस अस्त्र को बढ़ता देखकर पाण्डव सेना में, भीम को छोड़कर, भारी भय समा गया।

श्लोक 69 (7.200.69)

ततः शस्त्राणि ते सर्वे समुत्सृज्य महीतले । अवारोहन्रथेभ्यश्च हस्त्यश्वेभ्यश्च सर्वशः ॥

tataḥ śastrāṇi te sarve samutsṛjya mahītale | avārohanrathebhyaśca hastyaśvebhyaśca sarvaśaḥ

तब उन सबने पृथ्वी पर शस्त्र डालकर रथों, हाथियों और घोड़ों से चारों ओर उतरना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 70 (7.200.70)

तेषु निक्षिप्तशस्त्रेषु वाहनेभ्यश्च्युतेषु च । तदस्त्रवीर्यं विपुलं भीममूर्धन्यथापतत् ॥

teṣu nikṣiptaśastreṣu vāhanebhyaścyuteṣu ca | tadastravīryaṃ vipulaṃ bhīmamūrdhanyathāpatat

जब उन्होंने शस्त्र रख दिए और वाहनों से उतर गए, तब उस अस्त्र का विशाल तेज भीम के सिर पर आ गिरा।

श्लोक 71 (7.200.71)

हाहाकृतानि भूतानि पाण्डवाश्च विशेषतः । भीमसेनमपश्यन्त तेजसा संवृतं तथा ॥

hāhākṛtāni bhūtāni pāṇḍavāśca viśeṣataḥ | bhīmasenamapaśyanta tejasā saṃvṛtaṃ tathā

प्राणी हाहाकार कर उठे, और पाण्डव विशेषकर, भीमसेन को तेज से घिरा हुआ देखने लगे।

अध्याय 199अध्याय-सूचीअध्याय 201