द्रोण पर्व · अध्याय 201
नारायणास्त्र की शान्ति; द्रोणपुत्र द्वारा पाञ्चालों का पलायन
अर्जुन भीम को वारुण अस्त्र से ढक देते हैं, और कृष्ण तथा अर्जुन भीम को रथ से खींचकर शस्त्र रखवा देते हैं, जिससे नारायण-अस्त्र शान्त हो जाता है। दुर्योधन अश्वत्थामा से उसे फिर चलाने को कहता है, पर वह कहता है कि वह दूसरी बार नहीं चल सकता। फिर अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न और सात्यकि से लड़ता है, पाँच पाण्डव-महारथियों के घेरने पर पौरव, मालव सुदर्शन और चेदि-युवराज को मार डालता है, और भीम से द्वन्द्व करता है, यहाँ तक कि भीम का सारथि मूर्च्छित हो जाता है और घोड़े उन्हें दूर ले जाते हैं। पाञ्चाल और भीम द्रोणपुत्र के आगे भाग जाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.201.1)
भीमसेनं समाकीर्णं दृष्ट्वाऽस्त्रेण धनञ्जयः । तेजसः प्रतिघातार्थं वारुणेन समावृणोत् ॥
bhīmasenaṃ samākīrṇaṃ dṛṣṭvā'streṇa dhanañjayaḥ | tejasaḥ pratighātārthaṃ vāruṇena samāvṛṇot
भीमसेन को अस्त्र से घिरा हुआ देखकर धनञ्जय ने उस तेज को रोकने के लिए उन्हें वारुण अस्त्र से ढक दिया।
श्लोक 2 (7.201.2)
नालक्षयत तत्कश्चिद्वारुणास्त्रेण संवृतम् । अर्जुनस्य लघुत्वाच्च संवृतत्वाच्च तेजसः ॥
nālakṣayata tatkaścidvāruṇāstreṇa saṃvṛtam | arjunasya laghutvācca saṃvṛtatvācca tejasaḥ
वारुण अस्त्र से ढके हुए उन्हें कोई देख न सका, क्योंकि अर्जुन का हाथ बहुत फुर्तीला था और वह तेज भी ढका हुआ था।
श्लोक 3 (7.201.3)
साश्वसूतरथो भीमो द्रोणपुत्रास्त्रसंवृतः । अग्नावग्निरिव न्यस्तो ज्वालामाली सुदुर्दृशः ॥
sāśvasūtaratho bhīmo droṇaputrāstrasaṃvṛtaḥ | agnāvagniriva nyasto jvālāmālī sudurdṛśaḥ
घोड़ों, सारथि और रथ के सहित भीम द्रोणपुत्र के अस्त्र से घिर गए थे; वे अग्नि में रखी हुई अग्नि के समान ज्वालाओं की माला से घिरे हुए और देखने में अत्यन्त कठिन थे।
श्लोक 4 (7.201.4)
यथा रात्रिक्षये राजञ्ज्योतीष्यस्तगिरिं प्रति । समापेतुस्तथा बाणा भीमसेनरथं प्रति ॥
yathā rātrikṣaye rājañjyotīṣyastagiriṃ prati | samāpetustathā bāṇā bhīmasenarathaṃ prati
हे राजन्! जैसे रात बीतने पर तारे अस्ताचल की ओर गिरते हैं, वैसे ही बाण भीमसेन के रथ पर गिर रहे थे।
श्लोक 5 (7.201.5)
स हि भीमो रथश्चास्य हयाः सूतश्च मारिष । संवृता द्रोणपुत्रेण पावकान्तर्गताऽभवन् ॥
sa hi bhīmo rathaścāsya hayāḥ sūtaśca māriṣa | saṃvṛtā droṇaputreṇa pāvakāntargatā'bhavan
हे आर्य! भीम, उनका रथ, घोड़े और सारथि सब द्रोणपुत्र के अस्त्र से घिरकर अग्नि के भीतर पहुँच गए थे।
श्लोक 6 (7.201.6)
यथा जग्ध्वा जगत्कृत्स्नं समये सचराचरम् । गच्छेद्वह्निर्विभोरास्यं तथाऽस्त्रं भीममावृणोत् ॥
yathā jagdhvā jagatkṛtsnaṃ samaye sacarācaram | gacchedvahnirvibhorāsyaṃ tathā'straṃ bhīmamāvṛṇot
जैसे समय आने पर चर-अचर सहित सारे जगत् को भस्म करके अग्नि सर्वव्यापी प्रभु के मुख में चली जाती है, वैसे ही उस अस्त्र ने भीम को घेर लिया।
श्लोक 7 (7.201.7)
सूर्यमग्निः प्रविष्टः स्याद्यथा चाग्निं दिवाकरः । तथा प्रविष्टं तत्तेजो न आज्ञायत पाण्डवः ॥
sūryamagniḥ praviṣṭaḥ syādyathā cāgniṃ divākaraḥ | tathā praviṣṭaṃ tattejo na ājñāyata pāṇḍavaḥ
मानो अग्नि सूर्य में प्रवेश कर गई हो अथवा सूर्य अग्नि में; उसी प्रकार वह तेज उनमें प्रविष्ट हो गया और पाण्डव दिखाई नहीं देते थे।
श्लोक 8 (7.201.8)
तदस्त्रं भीमहुङ्कारादपयाति पुनःपुनः । पुनः पुनस्तमायाति हुंकारात्तं विमुञ्चति । ततो देवाः सगन्धर्वा भीमं दृष्ट्वा सुविस्मिताः ॥
tadastraṃ bhīmahuṅkārādapayāti punaḥpunaḥ | punaḥ punastamāyāti huṃkārāttaṃ vimuñcati | tato devāḥ sagandharvā bhīmaṃ dṛṣṭvā suvismitāḥ
भीम की हुंकार से वह अस्त्र बार-बार पीछे हट जाता था; बार-बार वह उनके पास आता और हुंकार सुनकर उन्हें छोड़ देता था। तब देवता और गन्धर्व भीम को देखकर अत्यन्त विस्मित हुए।
श्लोक 9 (7.201.9)
विकीर्णमस्त्रं तद्दृष्ट्वा तथा भीमरथं प्रति । उदीर्यमाणं द्रौणिं च निष्प्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥
vikīrṇamastraṃ taddṛṣṭvā tathā bhīmarathaṃ prati | udīryamāṇaṃ drauṇiṃ ca niṣpratidvandvamāhave
भीम के रथ की ओर फैले हुए उस अस्त्र को देखकर, और युद्ध में द्रोणपुत्र को प्रतिद्वन्द्वी-रहित और बढ़ता हुआ देखकर,
श्लोक 10 (7.201.10)
सर्वसैन्यं च पाण्डूनां न्यस्तशस्त्रमचेतनम् । युधिष्ठिरपुरोगांश्च विमुखांस्तान्महारथान् ॥
sarvasainyaṃ ca pāṇḍūnāṃ nyastaśastramacetanam | yudhiṣṭhirapurogāṃśca vimukhāṃstānmahārathān
पाण्डवों की सारी सेना शस्त्र डाल चुकी थी और अचेत हो गई थी; युधिष्ठिर आदि वे महारथी भी विमुख हो गए थे।
श्लोक 11 (7.201.11)
अर्जुनो वासुदेवश्च त्वरमाणौ महाद्युती । अवप्लुत्य रथाद्वीरौ भीममाद्रवतां ततः ॥
arjuno vāsudevaśca tvaramāṇau mahādyutī | avaplutya rathādvīrau bhīmamādravatāṃ tataḥ
तब महातेजस्वी अर्जुन और वासुदेव, दोनों वीर, शीघ्रता से रथ से कूदकर भीम की ओर दौड़े।
श्लोक 12 (7.201.12)
ततस्तद्द्रोणपुत्रस्य तेजोऽस्त्रबलसम्भवम् । विगाह्य तौ सुबलिनौ माययाऽविशतां तथा ॥
tatastaddroṇaputrasya tejo'strabalasambhavam | vigāhya tau subalinau māyayā'viśatāṃ tathā
तब उन दोनों महाबलवानों ने द्रोणपुत्र के अस्त्र-बल से उत्पन्न उस तेज में प्रवेश किया और अपनी माया से उसके भीतर घुस गए।
श्लोक 13 (7.201.13)
न्यस्तशस्त्रौ ततस्तौ तु नादहत्सोऽस्त्रजोऽनलः । वारुणास्त्रप्रयोगाच्च वीर्यवत्त्वाच्च कृष्णयोः ॥
nyastaśastrau tatastau tu nādahatso'strajo'nalaḥ | vāruṇāstraprayogācca vīryavattvācca kṛṣṇayoḥ
शस्त्र रख देने के कारण अस्त्र से उत्पन्न वह अग्नि उन दोनों को जला न सकी; इसमें वारुण अस्त्र का प्रयोग और दोनों कृष्णों का बल कारण था।
श्लोक 14 (7.201.14)
ततश्चकृषतुर्भीमं सर्वशस्त्रायुधानि च । नारायणास्त्रशान्त्यर्थं नरनारायणौ बलात् ॥
tataścakṛṣaturbhīmaṃ sarvaśastrāyudhāni ca | nārāyaṇāstraśāntyarthaṃ naranārāyaṇau balāt
तब नारायण-अस्त्र को शान्त करने के लिए नर और नारायण ने भीम को और उनके सब शस्त्रों तथा आयुधों को बलपूर्वक खींच लिया।
श्लोक 15 (7.201.15)
आकृष्यमाणः कौन्तेयो नदत्येव महारवम् । वर्धते चैव तद्घोरं द्रौणेरस्त्रं सुदुर्जयम् ॥
ākṛṣyamāṇaḥ kaunteyo nadatyeva mahāravam | vardhate caiva tadghoraṃ drauṇerastraṃ sudurjayam
खींचे जाते समय कुन्तीपुत्र भीम ज़ोर से गरजते ही रहे, और द्रोणपुत्र का वह घोर तथा अत्यन्त दुर्जय अस्त्र और बढ़ता गया।
श्लोक 16 (7.201.16)
तमब्रवीद्वासुदेवः किमिदं पाण्डुनन्दन । वार्यमाणोऽपि कौन्तेय यद्युद्धान्न निवर्तसे ॥
tamabravīdvāsudevaḥ kimidaṃ pāṇḍunandana | vāryamāṇo'pi kaunteya yadyuddhānna nivartase
वासुदेव ने उनसे कहा, "हे पाण्डुनन्दन! यह क्या कर रहे हो? हे कुन्तीपुत्र! रोके जाने पर भी तुम युद्ध से नहीं लौटते।
वासुदेव उवाच
श्लोक 17 (7.201.17)
यदि युद्धेन जेयाः स्युरिमे कौरवनन्दनाः । वयमप्यत्र युध्येम तथा चेमे नरर्षभाः ॥
yadi yuddhena jeyāḥ syurime kauravanandanāḥ | vayamapyatra yudhyema tathā ceme nararṣabhāḥ
यदि ये कुरुवंशी युद्ध से जीते जा सकते, तो हम भी यहाँ युद्ध करते, और ये नरश्रेष्ठ भी करते।
श्लोक 18 (7.201.18)
रथेभ्यस्त्ववतीर्णाः स्म सर्व एव हि तावकाः । तस्मात्त्वमपि कौन्तेय रथात्तूर्णमपाक्रम ॥
rathebhyastvavatīrṇāḥ sma sarva eva hi tāvakāḥ | tasmāttvamapi kaunteya rathāttūrṇamapākrama
परन्तु तुम्हारे पक्ष के सभी लोग रथों से उतर चुके हैं। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! तुम भी शीघ्र रथ से उतर जाओ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (7.201.19)
एवमुक्त्वा तु तं कृष्णो रथाद्भूमिमवर्तयत् । निःश्वसन्तं यथा नागं क्रोधसंरक्तलोचनम् ॥
evamuktvā tu taṃ kṛṣṇo rathādbhūmimavartayat | niḥśvasantaṃ yathā nāgaṃ krodhasaṃraktalocanam
यह कहकर कृष्ण ने उन्हें रथ से भूमि पर उतार दिया; वे सर्प की तरह फुफकार रहे थे और क्रोध से उनकी आँखें लाल थीं।
श्लोक 20 (7.201.20)
यदाऽपकृष्टः स रथान्न्यासितश्चायुधं भुवि । ततो नारायणास्त्रं तत्प्रशान्तं शत्रुतापनम् ॥
yadā'pakṛṣṭaḥ sa rathānnyāsitaścāyudhaṃ bhuvi | tato nārāyaṇāstraṃ tatpraśāntaṃ śatrutāpanam
जब उन्हें रथ से खींच लिया गया और उनसे धरती पर शस्त्र रखवा दिया गया, तब शत्रुओं को तपानेवाला वह नारायण-अस्त्र शान्त हो गया।
श्लोक 21 (7.201.21)
तस्मिन्प्रशान्ते विधिना तेन तेजसि दुःसहे । बभूवुर्विमलाः सर्वा दिशः प्रदिश एव च ॥
tasminpraśānte vidhinā tena tejasi duḥsahe | babhūvurvimalāḥ sarvā diśaḥ pradiśa eva ca
जब विधिपूर्वक वह असह्य तेज शान्त हो गया, तब सब दिशाएँ और उपदिशाएँ निर्मल हो गईं।
श्लोक 22 (7.201.22)
प्रववुश्च शिवा वाताः प्रशान्ता मृगपक्षिणः । वाहनानि च हृष्टानि प्रशान्तेऽस्त्रे सुदुर्जये ॥
pravavuśca śivā vātāḥ praśāntā mṛgapakṣiṇaḥ | vāhanāni ca hṛṣṭāni praśānte'stre sudurjaye
शुभ वायु बहने लगी, पशु-पक्षी शान्त हो गए, और उस दुर्जय अस्त्र के शान्त होने पर वाहन भी प्रसन्न हो गए।
श्लोक 23 (7.201.23)
व्यपोढे च ततो घोरे तस्मिंस्तेजसि भारत । बभौ भीमो निशापाये धीमान्सूर्य इवोदितः ॥
vyapoḍhe ca tato ghore tasmiṃstejasi bhārata | babhau bhīmo niśāpāye dhīmānsūrya ivoditaḥ
हे भारत! उस भयंकर तेज के हट जाने पर बुद्धिमान् भीम रात बीतने पर उगे हुए सूर्य के समान शोभित हुए।
श्लोक 24 (7.201.24)
हतशेषं बलं तत्तु पाण्डवानामतिष्ठत । अस्त्रव्युपरमाद्वृष्टं तव पुत्रजिघांसया ॥
hataśeṣaṃ balaṃ tattu pāṇḍavānāmatiṣṭhata | astravyuparamādvṛṣṭaṃ tava putrajighāṃsayā
संहार से बची हुई पाण्डवों की वह सेना डटी रही; अस्त्र के शान्त हो जाने से वह प्रसन्न थी और आपके पुत्रों को मारने की इच्छा रखती थी।
श्लोक 25 (7.201.25)
व्यवस्थिते बले तस्मिन्नस्त्रे प्रतिहते तथा । दुर्योधनो महाराज द्रोणपुत्रमथाब्रवीत् ॥
vyavasthite bale tasminnastre pratihate tathā | duryodhano mahārāja droṇaputramathābravīt
हे महाराज! जब सेना स्थिर हो गई और वह अस्त्र निष्फल हो गया, तब दुर्योधन ने द्रोणपुत्र से कहा:
श्लोक 26 (7.201.26)
अश्वत्थामन्पुनः शीघ्रमस्त्रमेतत्प्रयोजय । अवस्थिता हि पाञ्चालाः पुनरेते जयैषिणः ॥
aśvatthāmanpunaḥ śīghramastrametatprayojaya | avasthitā hi pāñcālāḥ punarete jayaiṣiṇaḥ
"अश्वत्थामा! इस अस्त्र को फिर शीघ्र चलाओ; क्योंकि विजय चाहनेवाले ये पाञ्चाल फिर डटकर खड़े हो गए हैं।"
श्लोक 27 (7.201.27)
अश्वत्थामा तथोक्तस्तु तव पुत्रेण मारिष । सुदीनमभिनिःश्वस्य राजानमिदमब्रवीत् ॥
aśvatthāmā tathoktastu tava putreṇa māriṣa | sudīnamabhiniḥśvasya rājānamidamabravīt
हे आर्य! आपके पुत्र के ऐसा कहने पर अश्वत्थामा ने अत्यन्त दीन होकर लम्बी साँस ली और राजा से यह कहा:
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 28 (7.201.28)
नैतदावर्तते राजन्नस्त्रं द्विर्नोपपद्यते । आवृत्तं हि निवर्तेत प्रयोक्तारं न संशयः ॥
naitadāvartate rājannastraṃ dvirnopapadyate | āvṛttaṃ hi nivarteta prayoktāraṃ na saṃśayaḥ
"हे राजन्! यह अस्त्र लौटता नहीं, इसे दूसरी बार प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। यदि इसे लौटाकर फिर चलाया जाए, तो यह निःसन्देह चलानेवाले पर ही लौट आएगा।
श्लोक 29 (7.201.29)
एष चास्त्रप्रतीघातं वासुदेवः प्रयुक्तवान् । अस्य तु ह्येष वै दाता मानुषेषु न विद्यते ॥
eṣa cāstrapratīghātaṃ vāsudevaḥ prayuktavān | asya tu hyeṣa vai dātā mānuṣeṣu na vidyate
और इस अस्त्र के निवारण का उपाय वासुदेव ने ही किया है। वे ही तो इसके देनेवाले हैं; मनुष्यों में ऐसा कोई नहीं है।
श्लोक 30 (7.201.30)
परावरज्ञो लोकानां न तदस्ति न वेत्ति यत् । तदेतदस्त्रं प्रशमं यातं कृष्णस्य मन्त्रितैः ॥
parāvarajño lokānāṃ na tadasti na vetti yat | tadetadastraṃ praśamaṃ yātaṃ kṛṣṇasya mantritaiḥ
वे लोकों के ऊँच-नीच सबको जाननेवाले हैं; ऐसी कोई बात नहीं जो वे न जानते हों। इसीलिए कृष्ण की युक्तियों से यह अस्त्र शान्त हो गया है।
श्लोक 31 (7.201.31)
द्विविधो विहितः सङ्ख्ये वधः शत्रोर्जनाधिप । पराजयो वा मृत्युर्वा श्रेयान्मृत्युर्न निर्जयः ॥
dvividho vihitaḥ saṅkhye vadhaḥ śatrorjanādhipa | parājayo vā mṛtyurvā śreyānmṛtyurna nirjayaḥ
हे राजन्! युद्ध में शत्रु के लिए दो प्रकार का अन्त विहित है, पराजय या मृत्यु; मृत्यु श्रेष्ठ है, पराजय नहीं।
श्लोक 32 (7.201.32)
विजिताश्चारयो ह्योते शस्त्रोत्सर्गान्मृतोपमाः ॥
vijitāścārayo hyote śastrotsargānmṛtopamāḥ
और ये शत्रु तो पहले ही जीते जा चुके हैं; शस्त्र डाल देने से वे मृतक के समान हैं।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 33 (7.201.33)
आचार्यपुत्र यद्येतद्द्विरस्त्रं न प्रयुज्यते । अन्यैर्गुरुघ्ना वध्यन्तामस्त्रैरस्त्रविदां वर ॥
ācāryaputra yadyetaddvirastraṃ na prayujyate | anyairgurughnā vadhyantāmastrairastravidāṃ vara
"हे आचार्यपुत्र! यदि यह अस्त्र दो बार नहीं चलाया जा सकता, तो हे अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ! गुरु का वध करनेवालों को दूसरे अस्त्रों से मारिए।
श्लोक 34 (7.201.34)
त्वयि शस्त्राणि दिव्यानि त्र्यम्बके चामितौजसि । घ्नतैतान्सुमहावीर्य शात्रवान्युद्धकोविदः । इच्छतो न हि ते मुच्येत्सङ्क्रुद्धो हि पुरन्दरः ॥
tvayi śastrāṇi divyāni tryambake cāmitaujasi | ghnataitānsumahāvīrya śātravānyuddhakovidaḥ | icchato na hi te mucyetsaṅkruddho hi purandaraḥ
आपके पास दिव्य अस्त्र हैं, जैसे अमित तेजवाले त्र्यम्बक के पास हैं। हे महावीर्यवान्, युद्ध में कुशल! इन शत्रुओं को मार डालिए। यदि आप चाहें तो क्रुद्ध पुरन्दर भी आपसे छूट नहीं सकता।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 35 (7.201.35)
तस्मिन्नस्त्रे प्रतिहते द्रोणे चोपधिना हते । तथा दुर्योधनेनोक्तो द्रौणिः किमकरोत्पुनः ॥
tasminnastre pratihate droṇe copadhinā hate | tathā duryodhanenokto drauṇiḥ kimakarotpunaḥ
"जब वह अस्त्र निष्फल हो गया और द्रोण छल से मार डाले गए, तब दुर्योधन के इस प्रकार कहने पर द्रोणपुत्र ने आगे क्या किया,
श्लोक 36 (7.201.36)
दृष्ट्वा पार्थांश्च सङ्ग्रामे युद्धाय समुपस्थितान् । नारायणास्त्रनिर्मुक्तांश्चरतः पृतनामुखे ॥
dṛṣṭvā pārthāṃśca saṅgrāme yuddhāya samupasthitān | nārāyaṇāstranirmuktāṃścarataḥ pṛtanāmukhe
जब उसने कुन्ती के पुत्रों को नारायण-अस्त्र से मुक्त होकर युद्ध के लिए डटे हुए और सेना के अग्रभाग में विचरते देखा?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 37 (7.201.37)
जानन्पितुः स निधनं सिंहलाङ्गूलकेतनः । सक्रोधो भयमुत्सृज्य सोऽभिदुद्राव पार्षतम् ॥
jānanpituḥ sa nidhanaṃ siṃhalāṅgūlaketanaḥ | sakrodho bhayamutsṛjya so'bhidudrāva pārṣatam
पिता की मृत्यु को जानकर सिंह की पूँछ के चिह्नवाली ध्वजा से युक्त अश्वत्थामा क्रोध में भय छोड़कर धृष्टद्युम्न पर टूट पड़ा।
श्लोक 38 (7.201.38)
अभिद्रुत्य च विंशत्या क्षुद्रकाणां नरर्षभ । पञ्चभिश्चातिवेगेन विव्याध पुरुषर्षभः ॥
abhidrutya ca viṃśatyā kṣudrakāṇāṃ nararṣabha | pañcabhiścātivegena vivyādha puruṣarṣabhaḥ
हे नरश्रेष्ठ! उस पुरुषश्रेष्ठ ने उस पर टूटकर बीस छोटे बाणों से और अत्यन्त वेग से पाँच बाणों से उसे बेध दिया।
श्लोक 39 (7.201.39)
धृष्टद्युम्नस्ततो राजञ्ज्वलन्तमिव पावकम् । द्रोणपुत्रं त्रिषष्ट्या तु राजन्विव्याध पत्रिणाम् ॥
dhṛṣṭadyumnastato rājañjvalantamiva pāvakam | droṇaputraṃ triṣaṣṭyā tu rājanvivyādha patriṇām
तब हे राजन्! धृष्टद्युम्न ने अग्नि के समान जलते हुए द्रोणपुत्र को तिरसठ बाणों से बेध दिया।
श्लोक 40 (7.201.40)
सारथिं चास्य विंशत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । हयांश्च चतुरोऽविध्यच्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ॥
sārathiṃ cāsya viṃśatyā svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | hayāṃśca caturo'vidhyaccaturbhirniśitaiḥ śaraiḥ
उसने स्वर्ण-पंखवाले, पत्थर पर तेज किए हुए बीस बाणों से उसके सारथि को और चार तीखे बाणों से उसके चारों घोड़ों को बेध दिया।
श्लोक 41 (7.201.41)
विद्ध्वा विद्ध्वाऽनदद्द्रौणिः कम्पयन्निव मेदिनीम् । आददे सर्वलोकस्य प्राणानिव महारणे ॥
viddhvā viddhvā'nadaddrauṇiḥ kampayanniva medinīm | ādade sarvalokasya prāṇāniva mahāraṇe
बार-बार बेधता हुआ द्रोणपुत्र गरजा, मानो पृथ्वी को कँपा रहा हो; उस महायुद्ध में वह मानो सारे संसार के प्राण हर रहा था।
श्लोक 42 (7.201.42)
पार्षतस्तु बली राजन्कृतास्त्रः कृतनिश्चयः । द्रौणिमेवाभिदुद्राव मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
pārṣatastu balī rājankṛtāstraḥ kṛtaniścayaḥ | drauṇimevābhidudrāva mṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
परन्तु बलवान्, अस्त्रविद्या में निपुण और दृढ़ निश्चयी पार्षत मृत्यु को ही लौटने की सीमा बनाकर द्रोणपुत्र की ओर ही दौड़ा।
श्लोक 43 (7.201.43)
ततो बाणमयं वर्षं द्रोणपुत्रस्य मूर्धनि । अवासृजदमेयात्मा पाञ्चाल्यो रथिनांवरः ॥
tato bāṇamayaṃ varṣaṃ droṇaputrasya mūrdhani | avāsṛjadameyātmā pāñcālyo rathināṃvaraḥ
तब अमेय आत्मबलवाले, रथियों में श्रेष्ठ पाञ्चाल ने द्रोणपुत्र के मस्तक पर बाणों की वर्षा की।
श्लोक 44 (7.201.44)
तं द्रौणिः समरे क्रुद्धं छादयामास पत्रिभिः । विव्याध चैनं दशभिः पितुर्वधमनुस्मरन् ॥
taṃ drauṇiḥ samare kruddhaṃ chādayāmāsa patribhiḥ | vivyādha cainaṃ daśabhiḥ piturvadhamanusmaran
क्रुद्ध द्रोणपुत्र ने युद्ध में पिता के वध को स्मरण करते हुए उसे बाणों से ढक दिया और दस बाणों से बेध दिया।
श्लोक 45 (7.201.45)
द्वाभ्यां च सुविसृष्टाभ्यां क्षुराभ्यां ध्वजकार्मुके । छित्त्वा पाञ्चालराजस्य द्रौणिरन्यैः समार्दयत् ॥
dvābhyāṃ ca suvisṛṣṭābhyāṃ kṣurābhyāṃ dhvajakārmuke | chittvā pāñcālarājasya drauṇiranyaiḥ samārdayat
द्रोणपुत्र ने भली-भाँति छोड़े हुए दो छुरे जैसे बाणों से पाञ्चालराज के ध्वज और धनुष को काट डाला, फिर दूसरे बाणों से उसे पीड़ित किया।
श्लोक 46 (7.201.46)
व्यश्वसूतरथं चैनं द्रौणिश्चक्रे महाहवे । तस्य चानुचरान्सर्वान्क्रुद्धः प्राद्रावयच्छरैः ॥
vyaśvasūtarathaṃ cainaṃ drauṇiścakre mahāhave | tasya cānucarānsarvānkruddhaḥ prādrāvayaccharaiḥ
उस महायुद्ध में द्रोणपुत्र ने उसे घोड़ों, सारथि और रथ से रहित कर दिया, और क्रुद्ध होकर उसके सब अनुचरों को बाणों से भगा दिया।
श्लोक 47 (7.201.47)
ततः प्रदुद्रुवे सैन्यं पाञ्चालानां विशाम्पते । सम्भ्रान्तरूपमार्तं च न परस्परमैक्षत ॥
tataḥ pradudruve sainyaṃ pāñcālānāṃ viśāmpate | sambhrāntarūpamārtaṃ ca na parasparamaikṣata
हे प्रजापालक! तब पाञ्चालों की सेना भाग चली; वह घबराई हुई और पीड़ित थी, और योद्धा एक-दूसरे की ओर देखते भी न थे।
श्लोक 48 (7.201.48)
दृष्ट्वा तु विमुखान्योधान्धृष्टद्युम्नं च पीडितम् । शैनेयोऽचोदयत्तूर्णं रथं द्रौणिरथं प्रति ॥
dṛṣṭvā tu vimukhānyodhāndhṛṣṭadyumnaṃ ca pīḍitam | śaineyo'codayattūrṇaṃ rathaṃ drauṇirathaṃ prati
योद्धाओं को विमुख और धृष्टद्युम्न को पीड़ित देखकर शैनेय (सात्यकि) ने शीघ्र ही अपना रथ द्रोणपुत्र के रथ की ओर बढ़ाया।
श्लोक 49 (7.201.49)
अष्टभिर्निशितैर्बाणैरश्वत्थामानमार्दयत् । विंशत्या पुनराहत्य नानारूपैरमर्षणः । विव्याध च तथा सूतं चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥
aṣṭabhirniśitairbāṇairaśvatthāmānamārdayat | viṃśatyā punarāhatya nānārūpairamarṣaṇaḥ | vivyādha ca tathā sūtaṃ caturbhiścaturo hayān
उसने आठ तीखे बाणों से अश्वत्थामा को पीड़ित किया; फिर असहनशील होकर नाना प्रकार के बीस बाणों से उसे मारा, और सारथि को तथा चारों घोड़ों को चार बाणों से बेध दिया।
श्लोक 50 (7.201.50)
धनुर्ध्वजं संयत्तश्चिच्छेद कृतहस्तवत् । स साश्वं व्यधमच्चापि रथं हेमपरिष्कृतम् । हृदि विव्याध समरे त्रिंशता सायकैर्भृशम् ॥
dhanurdhvajaṃ saṃyattaściccheda kṛtahastavat | sa sāśvaṃ vyadhamaccāpi rathaṃ hemapariṣkṛtam | hṛdi vivyādha samare triṃśatā sāyakairbhṛśam
सावधान सात्यकि ने सधे हाथ से उसके धनुष और ध्वज को काट डाला; घोड़ों सहित उसके सोने से सजे रथ को भी तोड़ डाला, और युद्ध में तीस बाणों से उसकी छाती में गहरा घाव किया।
श्लोक 51 (7.201.51)
एवं स पीडितो राजन्नश्वत्थामा महाबालः । शरजालैः परिवृतः कर्तव्यं नान्वपद्यत ॥
evaṃ sa pīḍito rājannaśvatthāmā mahābālaḥ | śarajālaiḥ parivṛtaḥ kartavyaṃ nānvapadyata
हे राजन्! इस प्रकार पीड़ित महाबली अश्वत्थामा बाणों के जालों से घिरकर कर्तव्य नहीं सूझ पाया।
श्लोक 52 (7.201.52)
एवं गते गुरोः पुत्रे तव पुत्रो महारथः । कृपकर्णादिभिः सार्धं शरैः सात्वतमावृणोत् ॥
evaṃ gate guroḥ putre tava putro mahārathaḥ | kṛpakarṇādibhiḥ sārdhaṃ śaraiḥ sātvatamāvṛṇot
गुरुपुत्र की ऐसी दशा हो जाने पर आपके महारथी पुत्र ने कृप, कर्ण आदि के साथ सात्यकि को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 53 (7.201.53)
दुर्योधनस्तु विंशत्या कृपः शारद्वतस्त्रिभिः । कृतवर्माऽथ दशभिः कर्णः पञ्चाशता शरैः ॥
duryodhanastu viṃśatyā kṛpaḥ śāradvatastribhiḥ | kṛtavarmā'tha daśabhiḥ karṇaḥ pañcāśatā śaraiḥ
दुर्योधन ने बीस, शरद्वान् के पुत्र कृप ने तीन, कृतवर्मा ने दस और कर्ण ने पचास बाणों से,
श्लोक 54 (7.201.54)
दुःशासनः शतेनैव वृषसेनश्च सप्तभिः । सात्यकिं विव्यधुस्तूर्णं समन्तान्निशितैः शरैः ॥
duḥśāsanaḥ śatenaiva vṛṣasenaśca saptabhiḥ | sātyakiṃ vivyadhustūrṇaṃ samantānniśitaiḥ śaraiḥ
दुःशासन ने सौ और वृषसेन ने सात बाणों से, सब ओर से तीखे बाणों द्वारा सात्यकि को शीघ्र बेध दिया।
श्लोक 55 (7.201.55)
ततः स सात्यकी राजन्सर्वानेव महारथान् । विरथान्विमुखांश्चैव क्षणेनैवाकरोन्नृप ॥
tataḥ sa sātyakī rājansarvāneva mahārathān | virathānvimukhāṃścaiva kṣaṇenaivākaronnṛpa
तब हे राजन्! सात्यकि ने क्षणभर में उन सभी महारथियों को रथहीन और विमुख कर दिया।
श्लोक 56 (7.201.56)
अश्वत्थामा तु सम्प्राप्य चेतनां भरतर्षभ । चिन्तयामास दुःखार्तो निःश्वसंश्च पुनःपुनः ॥
aśvatthāmā tu samprāpya cetanāṃ bharatarṣabha | cintayāmāsa duḥkhārto niḥśvasaṃśca punaḥpunaḥ
परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! होश में आकर अश्वत्थामा दुःख से पीड़ित हो बार-बार साँस लेता हुआ सोचने लगा।
श्लोक 57 (7.201.57)
अथो रथान्तरं द्रौणिः समारुह्य परन्तपः । सात्यकिं वारयामास किरञ्शरशतान्बहून् ॥
atho rathāntaraṃ drauṇiḥ samāruhya parantapaḥ | sātyakiṃ vārayāmāsa kirañśaraśatānbahūn
फिर शत्रुओं को तपानेवाला द्रोणपुत्र दूसरे रथ पर चढ़कर सैकड़ों बाण बरसाता हुआ सात्यकि को रोकने लगा।
श्लोक 58 (7.201.58)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य भारद्वाजसुतं रणे । विरथं विमुखं चैव पुनश्चक्रे महारथः ॥
tamāpatantaṃ samprekṣya bhāradvājasutaṃ raṇe | virathaṃ vimukhaṃ caiva punaścakre mahārathaḥ
रण में द्रोणपुत्र को अपनी ओर आता देखकर उस महारथी ने उसे फिर रथहीन और विमुख कर दिया।
श्लोक 59 (7.201.59)
ततस्ते पाण्डवा राजन्दृष्ट्वा सात्यकिविक्रमम् । शङ्खशब्दान्भृशं चक्रुः सिंहनादांश्च नेदिरे ॥
tataste pāṇḍavā rājandṛṣṭvā sātyakivikramam | śaṅkhaśabdānbhṛśaṃ cakruḥ siṃhanādāṃśca nedire
तब हे राजन्! सात्यकि का पराक्रम देखकर पाण्डवों ने ज़ोर से शंख बजाए और सिंहनाद किया।
श्लोक 60 (7.201.60)
एवं तं विरथं कृत्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः । जघान वृषसेनस्य त्रिसाहस्रान्महारथान् ॥
evaṃ taṃ virathaṃ kṛtvā sātyakiḥ satyavikramaḥ | jaghāna vṛṣasenasya trisāhasrānmahārathān
इस प्रकार उसे रथहीन करके सत्यपराक्रमी सात्यकि ने वृषसेन के तीन हज़ार महारथियों को मार डाला।
श्लोक 61 (7.201.61)
अयुतं दन्तिनां सार्धं कृपस्य निजघान सः । पञ्चायुतानि चाश्वानां शकुनेर्निजघान ह ॥
ayutaṃ dantināṃ sārdhaṃ kṛpasya nijaghāna saḥ | pañcāyutāni cāśvānāṃ śakunernijaghāna ha
उसने कृप के दस हज़ार हाथियों को एक साथ मार डाला, और शकुनि के पचास हज़ार घोड़ों को मार गिराया।
श्लोक 62 (7.201.62)
ततो द्रौणिर्महाराज रथमारुह्य वीर्यवान् । सात्यकिं प्रति सङ्क्रुद्धः प्रययौ तद्वधेप्सया ॥
tato drauṇirmahārāja rathamāruhya vīryavān | sātyakiṃ prati saṅkruddhaḥ prayayau tadvadhepsayā
तब हे महाराज! पराक्रमी द्रोणपुत्र रथ पर चढ़कर क्रोध से भरा हुआ सात्यकि को मारने की इच्छा से उसकी ओर चला।
श्लोक 63 (7.201.63)
पुनस्तमागतं दृष्ट्वा शैनेयो निशितैः शरैः । अदारयत्क्रूरतरैः पुनःपुनररिन्दम ॥
punastamāgataṃ dṛṣṭvā śaineyo niśitaiḥ śaraiḥ | adārayatkrūrataraiḥ punaḥpunararindama
उसे फिर आता देखकर शैनेय ने, हे शत्रुदमन! तीखे और अत्यन्त क्रूर बाणों से उसे बार-बार छेद डाला।
श्लोक 64 (7.201.64)
सोऽतिविद्धो महेष्वासो नानालिङ्गैरमर्षणः । युयुधानेन वै द्रौणिः प्रहसन्वाक्यमब्रवीत् ॥
so'tividdho maheṣvāso nānāliṅgairamarṣaṇaḥ | yuyudhānena vai drauṇiḥ prahasanvākyamabravīt
युयुधान (सात्यकि) के अनेक प्रकार के बाणों से अत्यन्त बिंधा हुआ वह महाधनुर्धर द्रोणपुत्र अमर्ष से भरा हुआ हँसकर बोला।
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 65 (7.201.65)
शैनेयाभ्युपपत्तिं ते जानाम्याचार्यघातिनि । न चैनं त्रास्यसि मया ग्रस्तमात्मानमेव च ॥
śaineyābhyupapattiṃ te jānāmyācāryaghātini | na cainaṃ trāsyasi mayā grastamātmānameva ca
"हे शैनेय! मैं जानता हूँ कि तुम आचार्य के घातक की सहायता को आए हो; किन्तु मेरे द्वारा पकड़े जाने पर तुम न उसे बचा सकोगे, न अपने को।
श्लोक 66 (7.201.66)
शपेऽत्मनाऽहं शैनेय सत्येन तपसा तथा । अहत्वा सर्वपाञ्चालान्यदि शान्तिमहं लभे ॥
śape'tmanā'haṃ śaineya satyena tapasā tathā | ahatvā sarvapāñcālānyadi śāntimahaṃ labhe
हे शैनेय! मैं अपनी आत्मा, सत्य और तप की शपथ लेता हूँ कि यदि सब पाञ्चालों को मारे बिना मैं शान्ति पाऊँ, तो मुझे दोष लगे।
श्लोक 67 (7.201.67)
यद्बलं पाण्डवेयानां वृष्णीनामपि यद्बलम् । क्रियतां सर्वमेवेह निहनिष्यामि सोमकान् ॥
yadbalaṃ pāṇḍaveyānāṃ vṛṣṇīnāmapi yadbalam | kriyatāṃ sarvameveha nihaniṣyāmi somakān
पाण्डवों के पास जो बल है और वृष्णियों के पास भी जो बल है, वह सब यहाँ लगा दिया जाए; मैं सोमकों को मार डालूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 68 (7.201.68)
एवमुक्त्वाऽर्करम्याभं सुतीक्ष्णं तं शरोत्तमम् । व्यसृजत्सात्वते द्रौणिर्वज्रं वृत्रे यथा हरिः ॥
evamuktvā'rkaramyābhaṃ sutīkṣṇaṃ taṃ śarottamam | vyasṛjatsātvate drauṇirvajraṃ vṛtre yathā hariḥ
यह कहकर द्रोणपुत्र ने सूर्य-किरण के समान चमकीला वह अत्यन्त तीखा उत्तम बाण सात्यकि पर छोड़ा, जैसे हरि (इन्द्र) ने वृत्र पर वज्र छोड़ा था।
श्लोक 69 (7.201.69)
स तं निर्भिद्य तेनास्तः सायकः शरावरम् । विवेश वसुधां भित्त्वा श्वसन्बिलमिवोरगः ॥
sa taṃ nirbhidya tenāstaḥ sāyakaḥ śarāvaram | viveśa vasudhāṃ bhittvā śvasanbilamivoragaḥ
उसके छोड़े हुए उस बाण ने सात्यकि और उसके बाण-रोधक कवच को भेदकर पृथ्वी को चीर दिया और फुफकारते सर्प के बिल में घुसने की तरह भीतर समा गया।
श्लोक 70 (7.201.70)
स भिन्नकवचः शूरस्तोत्रार्दित इव द्विपः । विमुच्य सशरं चापं भूरिव्रणपरिस्रवः ॥
sa bhinnakavacaḥ śūrastotrārdita iva dvipaḥ | vimucya saśaraṃ cāpaṃ bhūrivraṇaparisravaḥ
कवच कट जाने पर वह वीर अंकुश से पीड़ित हाथी के समान हो गया; बाण सहित धनुष छोड़कर, गहरे घावों से रक्त बहाते हुए,
श्लोक 71 (7.201.71)
सीदन्रुधिरसिक्तश्च रथोपस्थ उपाविशत् । सूतेनापहृतस्तूर्णं द्रोणपुत्राद्रथान्तरम् ॥
sīdanrudhirasiktaśca rathopastha upāviśat | sūtenāpahṛtastūrṇaṃ droṇaputrādrathāntaram
वह रक्त से लथपथ होकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया, और उसका सारथि उसे शीघ्र द्रोणपुत्र के सामने से हटाकर दूसरे रथ के पास ले गया।
श्लोक 72 (7.201.72)
अथान्येन सुपुङ्खेन शरेणानतपर्वणा । आजघान भ्रवोर्मध्ये धृष्टद्युम्नं परन्तपः ॥
athānyena supuṅkhena śareṇānataparvaṇā | ājaghāna bhravormadhye dhṛṣṭadyumnaṃ parantapaḥ
तब शत्रुओं को तपानेवाले द्रोणपुत्र ने एक और सुन्दर पंखवाले, झुकी गाँठवाले बाण से धृष्टद्युम्न के भौंहों के बीच प्रहार किया।
श्लोक 73 (7.201.73)
स पूर्वमतिविद्धश्च भृशं पश्चाच्च पीडितः । ससादाथ च पाञ्चाल्यो व्यपाश्रयत च ध्वजम् ॥
sa pūrvamatividdhaśca bhṛśaṃ paścācca pīḍitaḥ | sasādātha ca pāñcālyo vyapāśrayata ca dhvajam
पहले ही बहुत बिंधा हुआ और फिर और पीड़ित हुआ वह पाञ्चाल गिर पड़ा और ध्वजदण्ड का सहारा लेकर टिक गया।
श्लोक 74 (7.201.74)
तं नागमिव सिंहेन दृष्ट्वा राजञ्शरार्दितम् । जवेनाभ्यद्रवञ्छूराः पञ्च पाण्डवतो रथाः ॥
taṃ nāgamiva siṃhena dṛṣṭvā rājañśarārditam | javenābhyadravañchūrāḥ pañca pāṇḍavato rathāḥ
हे राजन्! सिंह से पीड़ित हाथी के समान उसे बाणों से पीड़ित देखकर पाण्डव पक्ष के पाँच शूर महारथी वेग से उसकी ओर दौड़े।
श्लोक 75 (7.201.75)
किरीटी भीमसेनश्च वृद्धक्षत्रश्च पौरवः । युवराजश्च चेदीनां मालवश्च सुदर्शनः ॥
kirīṭī bhīmasenaśca vṛddhakṣatraśca pauravaḥ | yuvarājaśca cedīnāṃ mālavaśca sudarśanaḥ
अर्जुन, भीमसेन, पौरव वृद्धक्षत्र, चेदियों का युवराज और मालव सुदर्शन —
श्लोक 76 (7.201.76)
एते हाहाकृताः सर्वे प्रगृहीतशरासनाः । वीरं द्रौणायनिं वीराः सर्वतः पर्यवारयन् ॥
ete hāhākṛtāḥ sarve pragṛhītaśarāsanāḥ | vīraṃ drauṇāyaniṃ vīrāḥ sarvataḥ paryavārayan
ये सब हाहाकार करते हुए, धनुष उठाए, वीर द्रोणपुत्र को सब ओर से घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 77 (7.201.77)
ते विंशतिपदे यत्ता गुरुपुत्रममर्षणम् । पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैरभ्यघ्नन्सर्वतः समम् ॥
te viṃśatipade yattā guruputramamarṣaṇam | pañcabhiḥ pañcabhirbāṇairabhyaghnansarvataḥ samam
वे सब दृढ़ निश्चय से बीस पग की दूरी पर खड़े होकर, क्रोधित गुरुपुत्र को सब ओर से एक साथ पाँच-पाँच बाणों से मारने लगे।
श्लोक 78 (7.201.78)
आशीविषाभैर्विंशत्या पञ्चभिस्तु शितैः शरैः । चिच्छेद युगपद्द्रौणिः पञ्चविंशतिसायकान् ॥
āśīviṣābhairviṃśatyā pañcabhistu śitaiḥ śaraiḥ | ciccheda yugapaddrauṇiḥ pañcaviṃśatisāyakān
द्रोणपुत्र ने विषैले सर्प के समान बीस बाणों और पाँच तीखे बाणों से एक साथ उन पच्चीस बाणों को काट डाला।
श्लोक 79 (7.201.79)
सप्तभिस्तु शितैर्बाणैः पौरवं द्रौणिरार्दयत् । मालवं त्रिभिरेकेन पार्थं षड्भिर्वृकोदरम् ॥
saptabhistu śitairbāṇaiḥ pauravaṃ drauṇirārdayat | mālavaṃ tribhirekena pārthaṃ ṣaḍbhirvṛkodaram
द्रोणपुत्र ने पौरव को सात तीखे बाणों से, मालव को तीन से, पार्थ को एक से और वृकोदर को छह बाणों से पीड़ित किया।
श्लोक 80 (7.201.80)
ततस्ते विव्यधुः सर्वे द्रौणिं राजन्महारथाः । युगपच्च पृथक्चैव रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥
tataste vivyadhuḥ sarve drauṇiṃ rājanmahārathāḥ | yugapacca pṛthakcaiva rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ
तब हे राजन्! उन सब महारथियों ने सोने के पंखवाले, पत्थर पर तेज किए हुए बाणों से द्रोणपुत्र को एक साथ भी और अलग-अलग भी बेधा।
श्लोक 81 (7.201.81)
युवराजश्च विंशत्या द्रौणिं विव्याध पत्रिभिः । पार्थश्च पुनरष्टाभिस्तथा सर्वे त्रिभिस्त्रिभिः ॥
yuvarājaśca viṃśatyā drauṇiṃ vivyādha patribhiḥ | pārthaśca punaraṣṭābhistathā sarve tribhistribhiḥ
युवराज ने बीस बाणों से द्रोणपुत्र को बेधा, पार्थ ने फिर आठ से, और अन्य सब ने तीन-तीन से।
श्लोक 82 (7.201.82)
ततोऽर्जुनं षड्भिरथाजघान । द्रौणायनिर्दशभिर्वासुदेवम् । भीमं दशार्धैर्युवराजं चतुर्भि- । र्द्वाभ्यां द्वाभ्यां मालवं पौरवं च ॥
tato'rjunaṃ ṣaḍbhirathājaghāna | drauṇāyanirdaśabhirvāsudevam | bhīmaṃ daśārdhairyuvarājaṃ caturbhi- | rdvābhyāṃ dvābhyāṃ mālavaṃ pauravaṃ ca
तब द्रोणपुत्र ने अर्जुन को छह, वासुदेव को दस, भीम को पाँच और युवराज को चार बाणों से मारा, तथा मालव और पौरव को दो-दो बाणों से।
श्लोक 83 (7.201.83)
सूतं विद्ध्वा भीमसेनस्य षड्भि- । र्द्वाभ्यां विद्ध्वा कार्मुकं च ध्वजं च । पुनः पार्थं शरवर्षेण विद्ध्वा । द्रौणिर्घोरं सिंहनादं ननाद ॥
sūtaṃ viddhvā bhīmasenasya ṣaḍbhi- | rdvābhyāṃ viddhvā kārmukaṃ ca dhvajaṃ ca | punaḥ pārthaṃ śaravarṣeṇa viddhvā | drauṇirghoraṃ siṃhanādaṃ nanāda
भीमसेन के सारथि को छह बाणों से बेधकर, और दो-दो बाणों से उसके धनुष और ध्वज को बेधकर, तथा पार्थ को फिर बाणों की वर्षा से बेधकर, द्रोणपुत्र ने भयंकर सिंहनाद किया।
श्लोक 84 (7.201.84)
तस्यास्यतस्तान्निशितान्पीतधारा- । न्द्रौणेः शरान्पृष्ठतश्चाग्रतश्च । धरा वियद्द्यौः प्रदिशो दिशश्च । च्छन्ना बाणैरभवन्घोररूपैः ॥
tasyāsyatastānniśitānpītadhārā- | ndrauṇeḥ śarānpṛṣṭhataścāgrataśca | dharā viyaddyauḥ pradiśo diśaśca | cchannā bāṇairabhavanghorarūpaiḥ
बाण चलाते हुए द्रोणपुत्र के आगे और पीछे उड़ते हुए तीखे, पानी चढ़ाए हुए बाणों से पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग और सब दिशाएँ-उपदिशाएँ भयंकर रूपवाले बाणों से ढक गईं।
श्लोक 85 (7.201.85)
आसन्नस्य स्वरथं तीव्रतेजाः । सुदर्शनस्येन्द्रकेतुप्रकाशौ । भुजौ शिरश्चेन्द्रसमानवीर्य- । स्त्रिभिः शरैर्युगपत्सञ्चकर्त ॥
āsannasya svarathaṃ tīvratejāḥ | sudarśanasyendraketuprakāśau | bhujau śiraścendrasamānavīrya- | stribhiḥ śarairyugapatsañcakarta
इन्द्र के समान पराक्रमी और प्रचण्ड तेजवाले उसने अपने रथ के समीप आए हुए सुदर्शन की इन्द्रध्वज-सी चमकती दोनों भुजाओं और मस्तक को तीन बाणों से एक साथ काट डाला।
श्लोक 86 (7.201.86)
स पौरवं रथशक्त्या निहत्य । च्छित्त्वा रथं तिलशश्चास्य बाणैः । छित्त्वा च बाहू वरचन्दनाक्तौ । भल्लेन कायाच्छिर उच्चकर्त ॥
sa pauravaṃ rathaśaktyā nihatya | cchittvā rathaṃ tilaśaścāsya bāṇaiḥ | chittvā ca bāhū varacandanāktau | bhallena kāyācchira uccakarta
उसने पौरव को रथ-शक्ति से मारकर बाणों से उसके रथ के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, चन्दन से लिपी उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं, और भल्ल से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 87 (7.201.87)
युवानमिन्दीवरदामवर्णं । चेदिप्रभुं युवराजं प्रसह्य । बाणैस्त्वरावाञ्ज्वलिताग्निकल्पै- । र्विद्ध्वा प्रादान्मृत्यवे साश्वसूतम् ॥
yuvānamindīvaradāmavarṇaṃ | cediprabhuṃ yuvarājaṃ prasahya | bāṇaistvarāvāñjvalitāgnikalpai- | rviddhvā prādānmṛtyave sāśvasūtam
इन्दीवर की माला के समान वर्णवाले तरुण चेदिराज युवराज को उसने वेग से बलपूर्वक अग्नि के समान जलते बाणों से बेधकर घोड़ों और सारथि सहित मृत्यु को सौंप दिया।
श्लोक 88 (7.201.88)
मालवं पौरवं चैव युवराजं च चेदिपम् । दृष्ट्वा समक्षं निहतं द्रोणपुत्रेण पाण्डवः । भीमसेनो महाबाहुः क्रोधमाहारयत्परम् ॥
mālavaṃ pauravaṃ caiva yuvarājaṃ ca cedipam | dṛṣṭvā samakṣaṃ nihataṃ droṇaputreṇa pāṇḍavaḥ | bhīmaseno mahābāhuḥ krodhamāhārayatparam
मालव, पौरव और चेदियों के युवराज को द्रोणपुत्र के हाथों आँखों के सामने मरा देखकर महाबाहु पाण्डव भीमसेन को अत्यन्त क्रोध हुआ।
श्लोक 89 (7.201.89)
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैः सङ्क्रुद्धाशीविषोपमैः । छादयामास समरे द्रोणपुत्रं परन्तपः ॥
tataḥ śaraśataistīkṣṇaiḥ saṅkruddhāśīviṣopamaiḥ | chādayāmāsa samare droṇaputraṃ parantapaḥ
तब शत्रुओं को तपानेवाले भीम ने क्रुद्ध विषधर सर्पों के समान सैकड़ों तीखे बाणों से युद्ध में द्रोणपुत्र को ढक दिया।
श्लोक 90 (7.201.90)
ततो द्रौणिर्महातेजाः शरवर्षं निहत्य तम् । विव्याध निशितैर्बाणैर्भीमसेनममर्षणः ॥
tato drauṇirmahātejāḥ śaravarṣaṃ nihatya tam | vivyādha niśitairbāṇairbhīmasenamamarṣaṇaḥ
तब महातेजस्वी द्रोणपुत्र ने अमर्ष में उस बाण-वर्षा को रोककर तीखे बाणों से भीमसेन को बेध दिया।
श्लोक 91 (7.201.91)
ततो भीमो महाबाहुर्द्रौणेर्युधि महाबलः । क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा द्रौणिं विव्याध पत्रिणा ॥
tato bhīmo mahābāhurdrauṇeryudhi mahābalaḥ | kṣurapreṇa dhanuśchittvā drauṇiṃ vivyādha patriṇā
तब महाबाहु महाबली भीम ने युद्ध में छुरे जैसे बाण से द्रोणपुत्र का धनुष काट डाला और उसे एक बाण से बेध दिया।
श्लोक 92 (7.201.92)
तदपास्य धनुश्छिन्नं द्रोणपुत्रो महामनाः । अन्यत्कार्मुकमादाय भीमं विव्याध पत्रिभिः ॥
tadapāsya dhanuśchinnaṃ droṇaputro mahāmanāḥ | anyatkārmukamādāya bhīmaṃ vivyādha patribhiḥ
उस कटे धनुष को फेंककर महामना द्रोणपुत्र ने दूसरा धनुष लेकर भीम को बाणों से बेधा।
श्लोक 93 (7.201.93)
तौ द्रौणिभीमौ समरे पराक्रान्तौ महाबलौ । अवर्षतां शरवर्षं वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥
tau drauṇibhīmau samare parākrāntau mahābalau | avarṣatāṃ śaravarṣaṃ vṛṣṭimantāvivāmbudau
रण में पराक्रम दिखाते हुए वे दोनों महाबली, द्रोणपुत्र और भीम, वर्षा करनेवाले दो मेघों की तरह बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 94 (7.201.94)
भीमनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः । द्रौणिं सञ्छादयामासुर्घनौघा इव भास्करम् ॥
bhīmanāmāṅkitā bāṇāḥ svarṇapuṅkhāḥ śilāśitāḥ | drauṇiṃ sañchādayāmāsurghanaughā iva bhāskaram
भीम के नाम से अंकित, सोने के पंखवाले, पत्थर पर तेज किए हुए बाणों ने द्रोणपुत्र को ऐसे ढक दिया जैसे मेघसमूह सूर्य को ढक लेते हैं।
श्लोक 95 (7.201.95)
तथैव द्रौणिनिर्मुक्तैर्भीमः सन्नतपर्वभिः । अवाकीर्यत स क्षिप्रं शरैः शतसहस्रशः ॥
tathaiva drauṇinirmuktairbhīmaḥ sannataparvabhiḥ | avākīryata sa kṣipraṃ śaraiḥ śatasahasraśaḥ
उसी प्रकार द्रोणपुत्र के छोड़े हुए, झुकी गाँठवाले लाखों बाणों से भीम शीघ्र ही ढक गए।
श्लोक 96 (7.201.96)
स च्छाद्यमानः समरे द्रौणिना रणशालिना । न विव्यथे महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ॥
sa cchādyamānaḥ samare drauṇinā raṇaśālinā | na vivyathe mahārāja tadadbhutamivābhavat
हे महाराज! रणशोभी द्रोणपुत्र के बाणों से ढके जाने पर भी भीम विचलित नहीं हुए; यह मानो एक आश्चर्य था।
श्लोक 97 (7.201.97)
ततो भीमो महाबाहुः कार्तस्वरविभूषितान् । नाराचान्दश सम्प्रैषीद्यमदण्डनिभाञ्छितान् ॥
tato bhīmo mahābāhuḥ kārtasvaravibhūṣitān | nārācāndaśa sampraiṣīdyamadaṇḍanibhāñchitān
तब महाबाहु भीम ने सोने से सजे, यमदण्ड के समान तीखे दस नाराच छोड़े।
श्लोक 98 (7.201.98)
ते जत्रुदेशमासाद्य द्रोणपुत्रस्य मारिष । निर्भिद्य विविशुस्तूर्णं वल्मीकमिव पन्नगाः ॥
te jatrudeśamāsādya droṇaputrasya māriṣa | nirbhidya viviśustūrṇaṃ valmīkamiva pannagāḥ
हे आर्य! वे द्रोणपुत्र के जत्रु-प्रदेश (गले की हँसली) पर पहुँचकर उसे भेदते हुए वल्मीक में सर्पों की तरह शीघ्र भीतर घुस गए।
श्लोक 99 (7.201.99)
सोऽतिविद्धो भृशं द्रौणिः पाण्डवेन महात्मना । ध्वजयष्टिं समासाद्य न्यमीलयत लोचने ॥
so'tividdho bhṛśaṃ drauṇiḥ pāṇḍavena mahātmanā | dhvajayaṣṭiṃ samāsādya nyamīlayata locane
महात्मा पाण्डव से अत्यन्त बिंधा हुआ द्रोणपुत्र ध्वजदण्ड का सहारा लेकर आँखें मूँद बैठा।
श्लोक 100 (7.201.100)
स मुहूर्तात्पुनः संज्ञां लब्ध्वा द्रौणिर्नराधिप । क्रोधं परममातस्थौ समरे रुधिरोक्षितः ॥
sa muhūrtātpunaḥ saṃjñāṃ labdhvā drauṇirnarādhipa | krodhaṃ paramamātasthau samare rudhirokṣitaḥ
हे नरेश्वर! एक क्षण बाद द्रोणपुत्र होश में आया और रक्त से लथपथ होकर युद्ध में अत्यन्त क्रोध से भर गया।
श्लोक 101 (7.201.101)
दृढं सोऽभिहतस्तेन पाण्डवेन महात्मना । वेगं चक्रे महाबाहुर्भीमसेनरथं प्रति ॥
dṛḍhaṃ so'bhihatastena pāṇḍavena mahātmanā | vegaṃ cakre mahābāhurbhīmasenarathaṃ prati
महात्मा पाण्डव के द्वारा गहरी चोट खाकर उस महाबाहु ने भीमसेन के रथ की ओर वेग से धावा किया।
श्लोक 102 (7.201.102)
तत आकर्णपूर्णानां शराणां तिग्मतेजसाम् । शतमाशीविषाभानां प्रेषयामास भारत ॥
tata ākarṇapūrṇānāṃ śarāṇāṃ tigmatejasām | śatamāśīviṣābhānāṃ preṣayāmāsa bhārata
हे भारत! तब उसने कान तक खिंचे हुए, तीखी धारवाले, विषैले साँपों जैसे सौ बाण छोड़े।
श्लोक 103 (7.201.103)
भीमोऽपि समरश्लाघी तस्य वीर्यमचिन्तयत् । तूर्णं प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः ॥
bhīmo'pi samaraślāghī tasya vīryamacintayat | tūrṇaṃ prāsṛjadugrāṇi śaravarṣāṇi pāṇḍavaḥ
रण का प्रेमी पाण्डव भीम भी उसके पराक्रम का विचार करके शीघ्र ही भयंकर बाणों की वर्षा करने लगा।
श्लोक 104 (7.201.104)
ततो द्रौणिर्महाराज च्छित्त्वाऽस्य विशिखैर्धनुः । आजघानोरसि क्रुद्धः पाण्डवं निशितैः शरैः ॥
tato drauṇirmahārāja cchittvā'sya viśikhairdhanuḥ | ājaghānorasi kruddhaḥ pāṇḍavaṃ niśitaiḥ śaraiḥ
तब हे महाराज! द्रोणपुत्र ने बाणों से भीम का धनुष काट दिया और क्रुद्ध होकर तीखे बाणों से उस पाण्डव की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 105 (7.201.105)
ततोऽन्यद्धनुरादाय भीमसेनो ह्यमर्षणः । विव्याध निशितैर्बाणैर्द्रौणिं पञ्चभिराहवे ॥
tato'nyaddhanurādāya bhīmaseno hyamarṣaṇaḥ | vivyādha niśitairbāṇairdrauṇiṃ pañcabhirāhave
तब असहनशील भीमसेन ने दूसरा धनुष लेकर युद्ध में द्रोणपुत्र को पाँच तीखे बाणों से बेधा।
श्लोक 106 (7.201.106)
जीमूताविव घर्मान्ते तौ शरौघप्रवर्षिणौ । अन्योन्यक्रोधताम्राक्षौ छादयामासतुर्युधि ॥
jīmūtāviva gharmānte tau śaraughapravarṣiṇau | anyonyakrodhatāmrākṣau chādayāmāsaturyudhi
ग्रीष्म के अन्त के दो बादलों की तरह बाणों की धारा बरसाते हुए, एक-दूसरे के क्रोध से लाल आँखोंवाले वे दोनों युद्ध में परस्पर को ढकने लगे।
श्लोक 107 (7.201.107)
तलशब्दैस्ततो घोरैस्त्रासयन्तौ परस्परम् । अयुध्येतां सुसंरब्धौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ॥
talaśabdaistato ghoraistrāsayantau parasparam | ayudhyetāṃ susaṃrabdhau kṛtapratikṛtaiṣiṇau
भयंकर ताल ठोंकने के शब्दों से एक-दूसरे को डराते हुए, अत्यन्त क्रुद्ध होकर, प्रत्येक दूसरे के किए का बदला चुकाने की इच्छा से वे लड़ने लगे।
श्लोक 108 (7.201.108)
ततो विष्फार्य सुमहच्चापं रुक्मविभूषितम् । भीमं प्रैक्षत स द्रौणिः शरानस्यन्तमन्तिकात् । शरद्यहर्मध्यगतो दीप्तार्चिरिव भास्करः ॥
tato viṣphārya sumahaccāpaṃ rukmavibhūṣitam | bhīmaṃ praikṣata sa drauṇiḥ śarānasyantamantikāt | śaradyaharmadhyagato dīptārciriva bhāskaraḥ
तब द्रोणपुत्र ने अपना सोने से सजा विशाल धनुष खींचकर भीम की ओर देखा, जो पास से बाण चला रहे थे और शरद् ऋतु के मध्याह्न के प्रज्वलित किरणोंवाले सूर्य के समान लगते थे।
श्लोक 109 (7.201.109)
आददानस्य विशिखान्सन्दधानस्य चाशुगान् । विकर्षतो मुञ्चतश्च नान्तरं ददृशुर्जनाः ॥
ādadānasya viśikhānsandadhānasya cāśugān | vikarṣato muñcataśca nāntaraṃ dadṛśurjanāḥ
जब वह बाण उठाता, तीव्र बाणों को चढ़ाता, खींचता और छोड़ता था, तब लोग इन क्रियाओं के बीच कोई अन्तर नहीं देख पाते थे।
श्लोक 110 (7.201.110)
अलातचक्रप्रतिमं तस्य मण्डलमायुधम् । द्रौणेरासीन्महाराज बाणान्विसृजतस्तदा ॥
alātacakrapratimaṃ tasya maṇḍalamāyudham | drauṇerāsīnmahārāja bāṇānvisṛjatastadā
हे महाराज! बाण छोड़ते समय द्रोणपुत्र का धनुष घुमाए जाते अलातचक्र के समान मण्डलाकार हो गया।
श्लोक 111 (7.201.111)
धनुश्च्युताः शरास्तस्य शतशोऽथ सहस्रशः । आकाशे प्रत्यदृश्यन्त शलभानामिवायतीः ॥
dhanuścyutāḥ śarāstasya śataśo'tha sahasraśaḥ | ākāśe pratyadṛśyanta śalabhānāmivāyatīḥ
उसके धनुष से छूटे सैकड़ों-हज़ारों बाण आकाश में टिड्डी-दलों की तरह दिखाई देते थे।
श्लोक 112 (7.201.112)
ते तु द्रौणिविनिर्मुक्ताः शरा हेमविभूषिताः । अजस्रमन्वकीर्यन्त घोरा भीमरथं प्रति ॥
te tu drauṇivinirmuktāḥ śarā hemavibhūṣitāḥ | ajasramanvakīryanta ghorā bhīmarathaṃ prati
द्रोणपुत्र के छोड़े हुए वे सोने से सजे भयंकर बाण भीम के रथ पर निरन्तर बरसते रहे।
श्लोक 113 (7.201.113)
तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् । बलं वीर्यं प्रभावं च व्यवसायं च भारत ॥
tatrādbhutamapaśyāma bhīmasenasya vikramam | balaṃ vīryaṃ prabhāvaṃ ca vyavasāyaṃ ca bhārata
हे भारत! वहाँ हमने एक आश्चर्य देखा: भीमसेन का पराक्रम, बल, वीर्य, प्रभाव और संकल्प।
श्लोक 114 (7.201.114)
तां स मेघादिवोद्भूतां बाणवृष्टिं समन्ततः । जलवृष्टिं महाघोरां तपान्त इव चिन्तयन् ॥
tāṃ sa meghādivodbhūtāṃ bāṇavṛṣṭiṃ samantataḥ | jalavṛṣṭiṃ mahāghorāṃ tapānta iva cintayan
सब ओर से मेघ के समान उमड़ी हुई उस बाणवर्षा को, ग्रीष्म के अन्त की भयंकर जलवृष्टि के समान, देखते हुए,
श्लोक 115 (7.201.115)
द्रोणपुत्रवधप्रेप्सुर्भीमो भीमपराक्रमः । अमुञ्चच्छरवर्षाणि प्रावृषीव बलाहकः ॥
droṇaputravadhaprepsurbhīmo bhīmaparākramaḥ | amuñcaccharavarṣāṇi prāvṛṣīva balāhakaḥ
द्रोणपुत्र को मारने की इच्छा रखनेवाले भयंकर पराक्रमी भीम ने वर्षा ऋतु के बादल की तरह बाणों की वर्षा की।
श्लोक 116 (7.201.116)
तद्रुक्मपृष्ठं भीमस्य धनुर्घोरं महारणे । विकृष्यमाणं विबभौ शक्रचापमिवापरम् ॥
tadrukmapṛṣṭhaṃ bhīmasya dhanurghoraṃ mahāraṇe | vikṛṣyamāṇaṃ vibabhau śakracāpamivāparam
उस महायुद्ध में भीम का सोने की पीठवाला भयंकर धनुष खींचे जाते समय दूसरे इन्द्रधनुष-सा शोभित हुआ।
श्लोक 117 (7.201.117)
तस्माच्छराः प्रादुरासञ्छतशोऽथ सहस्रशः । सञ्छादयन्तः समरे द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥
tasmāccharāḥ prādurāsañchataśo'tha sahasraśaḥ | sañchādayantaḥ samare drauṇimāhavaśobhinam
उससे सैकड़ों-हज़ारों बाण निकले और युद्ध की शोभा द्रोणपुत्र को रण में ढकने लगे।
श्लोक 118 (7.201.118)
तयोर्विसृजतोरेवं शरजालानि मारिष । वायुरप्यन्तरा राजन्नाशक्नोत्प्रतिसर्पितुम् ॥
tayorvisṛjatorevaṃ śarajālāni māriṣa | vāyurapyantarā rājannāśaknotpratisarpitum
हे आर्य! जब वे दोनों बाणों के जाल छोड़ रहे थे, तब हे राजन्! वायु भी उनके बीच से निकल न सकती थी।
श्लोक 119 (7.201.119)
तथा द्रौणिर्महाराज शरान्हेमविभूषितान् । तैलधौतान्प्रसन्नाग्रान्प्राहिणोद्वधकाङ्क्षया ॥
tathā drauṇirmahārāja śarānhemavibhūṣitān | tailadhautānprasannāgrānprāhiṇodvadhakāṅkṣayā
उसी प्रकार हे महाराज! द्रोणपुत्र ने मारने की इच्छा से सोने से सजे, तेल से चमकाए हुए, चमकती नोकवाले बाण छोड़े।
श्लोक 120 (7.201.120)
तानन्तरिक्षे विशिखैस्त्रिधैकैकमशातयत् । विशेषयन्द्रोणसुतं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
tānantarikṣe viśikhaistridhaikaikamaśātayat | viśeṣayandroṇasutaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
भीम ने आकाश में ही अपने बाणों से उनमें से एक-एक को तीन टुकड़े कर डाला, और द्रोणपुत्र से बढ़कर पराक्रम दिखाते हुए कहा, "ठहर! ठहर!"
श्लोक 121 (7.201.121)
पुनश्च शरवर्षाणि घोराण्युग्राणि पाण्डवः । व्यसृजद्बलवान्क्रुद्धो द्रोणपुत्रवधेप्सया ॥
punaśca śaravarṣāṇi ghorāṇyugrāṇi pāṇḍavaḥ | vyasṛjadbalavānkruddho droṇaputravadhepsayā
फिर बलवान् और क्रुद्ध पाण्डव ने द्रोणपुत्र को मारने की इच्छा से भयंकर, उग्र बाणों की वर्षा की।
श्लोक 122 (7.201.122)
ततोऽस्त्रमायया तूर्णं शरवृष्टिं निवार्य ताम् । धनुश्चिच्छेद भीमस्य द्रोणपुत्रो महास्त्रवित् । शरैश्चैनं सुबहुभिः क्रुद्धः सङ्ख्ये पराभिनत् ॥
tato'stramāyayā tūrṇaṃ śaravṛṣṭiṃ nivārya tām | dhanuściccheda bhīmasya droṇaputro mahāstravit | śaraiścainaṃ subahubhiḥ kruddhaḥ saṅkhye parābhinat
तब महास्त्रवेत्ता द्रोणपुत्र ने अस्त्रमाया से उस बाणवर्षा को शीघ्र रोककर भीम का धनुष काट डाला और क्रुद्ध होकर युद्ध में बहुत-से बाणों से उन्हें बेध दिया।
श्लोक 123 (7.201.123)
स छिन्नधन्वा बलवान्रथशक्तिं सुदारुणाम् । वेगेनाविध्य चिक्षेप द्रोणपुत्ररथं प्रति ॥
sa chinnadhanvā balavānrathaśaktiṃ sudāruṇām | vegenāvidhya cikṣepa droṇaputrarathaṃ prati
धनुष कट जाने पर बलवान् भीम ने एक भयंकर रथ-शक्ति को घुमाकर वेग से द्रोणपुत्र के रथ पर फेंका।
श्लोक 124 (7.201.124)
तामापतन्तीं सहसा महोल्काभां शितैः शरैः । चिच्छेद समरे द्रौणिर्दर्शयन्पाणिलाघवम् ॥
tāmāpatantīṃ sahasā maholkābhāṃ śitaiḥ śaraiḥ | ciccheda samare drauṇirdarśayanpāṇilāghavam
बड़ी उल्का की तरह चमकती हुई उस शक्ति को अचानक आते देखकर द्रोणपुत्र ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए रण में तीखे बाणों से उसे काट डाला।
श्लोक 125 (7.201.125)
एतस्मिन्नन्तरे भीमो दृढमादाय कार्मुकम् । द्रौणिं विव्याध विशिखैः स्मयमानो वृकोदरः ॥
etasminnantare bhīmo dṛḍhamādāya kārmukam | drauṇiṃ vivyādha viśikhaiḥ smayamāno vṛkodaraḥ
इसी बीच वृकोदर भीम ने मुस्कराकर एक दृढ़ धनुष उठाया और द्रोणपुत्र को बाणों से बेध दिया।
श्लोक 126 (7.201.126)
ततो द्रौणिर्महाराज भीमसेनस्य सारथिम् । ललाटे दारयामास शरेणानतपर्वणा ॥
tato drauṇirmahārāja bhīmasenasya sārathim | lalāṭe dārayāmāsa śareṇānataparvaṇā
तब हे महाराज! द्रोणपुत्र ने झुकी गाँठवाले बाण से भीमसेन के सारथि का ललाट चीर दिया।
श्लोक 127 (7.201.127)
सोऽतिविद्धो बलवता द्रोणपुत्रेण सारथिः । व्यामोहमगमद्राजन्रश्मीनुत्सृज्य वाजिनां ॥
so'tividdho balavatā droṇaputreṇa sārathiḥ | vyāmohamagamadrājanraśmīnutsṛjya vājināṃ
बलवान् द्रोणपुत्र से अत्यन्त बिंधा हुआ सारथि घोड़ों की लगामें छोड़कर, हे राजन्! मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 128 (7.201.128)
ततोऽश्वाः प्राद्रवंस्तूर्णं मोहिते रथसारथौ । भीमसेनस्य राजेन्द्र पश्यतां सर्वधन्विनाम् ॥
tato'śvāḥ prādravaṃstūrṇaṃ mohite rathasārathau | bhīmasenasya rājendra paśyatāṃ sarvadhanvinām
तब सारथि के मूर्च्छित हो जाने पर भीमसेन के घोड़े शीघ्र भाग निकले, हे राजेन्द्र! और सब धनुर्धर देखते रह गए।
श्लोक 129 (7.201.129)
तं दृष्ट्वा प्रद्रुतैरश्वैरपकृष्टं रणाजिरात् । दध्मौ प्रमुदितः शङ्खं बृहन्तमपराजितः ॥
taṃ dṛṣṭvā pradrutairaśvairapakṛṣṭaṃ raṇājirāt | dadhmau pramuditaḥ śaṅkhaṃ bṛhantamaparājitaḥ
भागते हुए घोड़ों के द्वारा उन्हें रणभूमि से दूर खिंचा हुआ देखकर अपराजित द्रोणपुत्र ने प्रसन्न होकर अपना विशाल शंख बजाया।
श्लोक 130 (7.201.130)
ततः सर्वे च पाञ्चाला भीमसेनश्च पाण्डवः । धृष्टद्युम्नरथं त्यक्त्वा भीताः सम्प्राद्रवन्दिशः ॥
tataḥ sarve ca pāñcālā bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | dhṛṣṭadyumnarathaṃ tyaktvā bhītāḥ samprādravandiśaḥ
तब सब पाञ्चाल और पाण्डव भीमसेन भी धृष्टद्युम्न का रथ छोड़कर भयभीत होकर चारों ओर भाग गए।
श्लोक 131 (7.201.131)
तान्प्रभग्नांस्ततो द्रौणिः पृष्ठतो विकिरञ्शरान् । अभ्यवर्तत वेगेन कालयन्पाण्डुवाहिनीम् ॥
tānprabhagnāṃstato drauṇiḥ pṛṣṭhato vikirañśarān | abhyavartata vegena kālayanpāṇḍuvāhinīm
तब द्रोणपुत्र भागती हुई उस पाण्डव-सेना को पीछे से बाण बरसाते हुए वेग से खदेड़ता हुआ उनके पीछे गया।
श्लोक 132 (7.201.132)
ते वध्यमानाः समरे द्रोणपुत्रेण पार्थिवाः । द्रोणपुत्रभयाद्राजन्दिशः सर्वाश्च भेजिरे ॥
te vadhyamānāḥ samare droṇaputreṇa pārthivāḥ | droṇaputrabhayādrājandiśaḥ sarvāśca bhejire
हे राजन्! रण में द्रोणपुत्र से मारे जाते हुए वे राजा उसी के भय से सब दिशाओं में भाग गए।