द्रोण पर्व · अध्याय 35
युधिष्ठिर का अभिमन्यु को द्रोण की व्यूह-रचना भेदने के लिए भेजना
पाण्डव और उनके सहयोगी द्रोण की सेना पर टूट पड़ते हैं, पर द्रोण बाणों की बाढ़ से उन्हें रोक लेते हैं और कोई उनके सामने टिक नहीं पाता। अर्जुन की अनुपस्थिति में व्यूह भेदने में कोई और समर्थ नहीं दिखता, इसलिए युधिष्ठिर अभिमन्यु से यह कार्य करने को कहते हैं और वचन देते हैं कि वे तथा अन्य वीर उसके पीछे-पीछे चलेंगे। अभिमन्यु स्वीकार करता है — वह व्यूह में घुसना जानता है, निकलना नहीं — और बड़े पराक्रम की प्रतिज्ञा करता है। युधिष्ठिर उसे आशीर्वाद देते हैं और अभिमन्यु सारथि को द्रोण की सेना की ओर रथ बढ़ाने का आदेश देता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.35.1)
तदनीकमनाधृष्टं भारद्वाजेन रक्षितम् । पार्थाः समभ्यवर्तन्त भीमसेनपुरोगमाः ॥
tadanīkamanādhṛṣṭaṃ bhāradvājena rakṣitam | pārthāḥ samabhyavartanta bhīmasenapurogamāḥ
भारद्वाज (द्रोण) से रक्षित उस दुर्धर्ष सेना पर भीमसेन को आगे करके पाण्डव बढ़ आए।
श्लोक 2 (7.35.2)
सात्यकिश्चेकितानश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । कुन्तिभोजश्च विक्रान्तो द्रुपदश्च महारथः ॥
sātyakiścekitānaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | kuntibhojaśca vikrānto drupadaśca mahārathaḥ
सात्यकि और चेकितान, पृषत के पुत्र धृष्टद्युम्न, पराक्रमी कुन्तिभोज और महारथी द्रुपद,
श्लोक 3 (7.35.3)
आर्जुनिः क्षत्रधर्मा च बृहत्क्षत्रश्च वीर्यवान् । चेदिपो धृष्टकेतुश्च माद्रीपुत्रौ घटोत्कचः ॥
ārjuniḥ kṣatradharmā ca bṛhatkṣatraśca vīryavān | cedipo dhṛṣṭaketuśca mādrīputrau ghaṭotkacaḥ
आर्जुनि, क्षत्रधर्मा और वीर्यवान् बृहत्क्षत्र, चेदिराज धृष्टकेतु, माद्री के दोनों पुत्र और घटोत्कच,
श्लोक 4 (7.35.4)
युधामन्युश्च विक्रान्तः शिखण्डी चापराजितः । उत्तमौजाश्च दुर्धर्षो विराटश्च महारथः ॥
yudhāmanyuśca vikrāntaḥ śikhaṇḍī cāparājitaḥ | uttamaujāśca durdharṣo virāṭaśca mahārathaḥ
पराक्रमी युधामन्यु, अजेय शिखण्डी, दुर्धर्ष उत्तमौजा और महारथी विराट,
श्लोक 5 (7.35.5)
द्रौपदेयाश्च संरब्धाः शैशुपालिश्च वीर्यवान् । केकयाश्च महावीर्याः सृञ्जयाश्च सहस्रशः ॥
draupadeyāśca saṃrabdhāḥ śaiśupāliśca vīryavān | kekayāśca mahāvīryāḥ sṛñjayāśca sahasraśaḥ
क्रोध से भरे द्रौपदी के पुत्र, शिशुपाल का पराक्रमी पुत्र, महापराक्रमी केकय और हज़ारों सृञ्जय —
श्लोक 6 (7.35.6)
एते चान्ये च सगणाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । समभ्यधावन्सहसा भारद्वाजं युयुत्सवः ॥
ete cānye ca sagaṇāḥ kṛtāstrā yuddhadurmadāḥ | samabhyadhāvansahasā bhāradvājaṃ yuyutsavaḥ
ये और दूसरे भी अपनी-अपनी टुकड़ियों के साथ, अस्त्रविद्या में निपुण, युद्ध के मद में उन्मत्त और लड़ने को आतुर होकर अचानक भारद्वाज पर दौड़ पड़े।
श्लोक 7 (7.35.7)
समीपे वर्तमानांस्तान्भारद्वाजोऽतिवीर्यवान् । असम्भ्रान्तः शरौघेण महता समवारयत् ॥
samīpe vartamānāṃstānbhāradvājo'tivīryavān | asambhrāntaḥ śaraugheṇa mahatā samavārayat
उन्हें पास आता देखकर अत्यन्त बलशाली भारद्वाज ने विचलित हुए बिना बाणों की बड़ी बौछार से उन्हें रोक दिया।
श्लोक 8 (7.35.8)
महौघः सलिलस्येव गिरिमासाद्य दुर्भिदम् । द्रोणं ते नाभ्यवर्तन्त वेलामिव जलाशयाः ॥
mahaughaḥ salilasyeva girimāsādya durbhidam | droṇaṃ te nābhyavartanta velāmiva jalāśayāḥ
जैसे जल की बड़ी बाढ़ दुर्भेद्य पर्वत से टकराकर रुक जाती है, और जैसे जलाशय किनारे से रुक जाते हैं, वैसे ही वे द्रोण पर आगे नहीं बढ़ सके।
श्लोक 9 (7.35.9)
पीड्यमानाः शरै राजन्द्रोणचापविनिःसृतैः । न शेकुः प्रमुखे स्थातुं भारद्वाजस्य पाण्डवाः ॥
pīḍyamānāḥ śarai rājandroṇacāpaviniḥsṛtaiḥ | na śekuḥ pramukhe sthātuṃ bhāradvājasya pāṇḍavāḥ
हे राजन्, द्रोण के धनुष से छूटे बाणों से पीड़ित होकर पाण्डव भारद्वाज के सामने खड़े न रह सके।
श्लोक 10 (7.35.10)
तदद्भुतमपश्याम द्रोणस्य भुजयोर्बलम् । यदेनं नाभ्यवर्तन्त पाञ्चालाः सृञ्जयैः सह ॥
tadadbhutamapaśyāma droṇasya bhujayorbalam | yadenaṃ nābhyavartanta pāñcālāḥ sṛñjayaiḥ saha
हमने द्रोण की भुजाओं के बल का वह अद्भुत दृश्य देखा कि पाञ्चाल और सृञ्जय मिलकर भी उन पर आगे न बढ़ सके।
श्लोक 11 (7.35.11)
तमायान्तमभिक्रुद्धं द्रोणं दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । बहुधा चिन्तयामास द्रोणस्य प्रतिवारणम् ॥
tamāyāntamabhikruddhaṃ droṇaṃ dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraḥ | bahudhā cintayāmāsa droṇasya prativāraṇam
क्रोध से भरे द्रोण को आते देखकर युधिष्ठिर उन्हें रोकने के उपाय पर अनेक प्रकार से विचार करने लगे।
श्लोक 12 (7.35.12)
अशक्यं तु तमन्येन द्रोणं मत्त्वा युधिष्ठिरः । अविषह्यं गुरुं भारं सौभद्रे समवासृजत् ॥
aśakyaṃ tu tamanyena droṇaṃ mattvā yudhiṣṭhiraḥ | aviṣahyaṃ guruṃ bhāraṃ saubhadre samavāsṛjat
द्रोण को किसी और के लिए अजेय मानकर युधिष्ठिर ने वह भारी, असह्य भार सुभद्रा के पुत्र पर डाल दिया।
श्लोक 13 (7.35.13)
वासुदेवादनवरं फल्गुनाच्चामितौजसम् । अब्रवीत्परवीरघ्नमभिमन्युमिदं वचः ॥
vāsudevādanavaraṃ phalgunāccāmitaujasam | abravītparavīraghnamabhimanyumidaṃ vacaḥ
वासुदेव से कम नहीं और फल्गुन (अर्जुन) के समान असीम तेज वाले, शत्रु वीरों के संहारक अभिमन्यु से उन्होंने ये वचन कहे —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 14 (7.35.14)
एत्य नो नार्जुनो गर्हेद्यथा तात तथा कुरु । द्रोणानीकस्य न वयं विद्मो भेदं कथञ्चन ॥
etya no nārjuno garhedyathā tāta tathā kuru | droṇānīkasya na vayaṃ vidmo bhedaṃ kathañcana
"तात, ऐसा करो कि लौटकर अर्जुन हमें दोष न दें। द्रोण की व्यूह-रचना को भेदने का उपाय हम किसी प्रकार नहीं जानते।
श्लोक 15 (7.35.15)
त्वं वाऽर्जुनो वा कृष्णो वा भिन्द्यात्प्रद्युम्न एव वा । द्रोणानीकं महाबाहो पञ्चमो नोपपद्यते ॥
tvaṃ vā'rjuno vā kṛṣṇo vā bhindyātpradyumna eva vā | droṇānīkaṃ mahābāho pañcamo nopapadyate
हे महाबाहो, द्रोण की सेना को तुम, या अर्जुन, या कृष्ण, या प्रद्युम्न ही भेद सकते हैं; पाँचवाँ कोई नहीं मिलता।
श्लोक 16 (7.35.16)
अभिमन्यो वरं तात याचे त्वां दातुमर्हसि । पितॄणां मातुलानां च सैन्यानां चैव सर्वशः ॥
abhimanyo varaṃ tāta yāce tvāṃ dātumarhasi | pitṝṇāṃ mātulānāṃ ca sainyānāṃ caiva sarvaśaḥ
अभिमन्यु, तात, मैं तुमसे एक वर माँगता हूँ; तुम्हें उसे देना चाहिए — अपने पिताओं, मामाओं और सारी सेनाओं के हित में।
श्लोक 17 (7.35.17)
धनञ्जयो हि नस्तात गर्हयेदेत्य संयुगात् । क्षिप्रमस्त्रं समादाय द्रोणानीकं विशातय ॥
dhanañjayo hi nastāta garhayedetya saṃyugāt | kṣipramastraṃ samādāya droṇānīkaṃ viśātaya
क्योंकि तात, धनंजय युद्ध से लौटकर हमें दोष देंगे। शीघ्र अस्त्र उठाकर द्रोण की सेना को तितर-बितर कर दो।"
अभिमन्युरुवाच
श्लोक 18 (7.35.18)
द्रोणस्य दृढमत्युग्रमनीकप्रवरं युधि । पितॄणां जयमाकाङ्क्षन्नवगाहेऽविलम्बितम् ॥
droṇasya dṛḍhamatyugramanīkapravaraṃ yudhi | pitṝṇāṃ jayamākāṅkṣannavagāhe'vilambitam
"अपने पिताओं की विजय की इच्छा से मैं द्रोण की उस दृढ़, अत्यन्त भयंकर और सर्वश्रेष्ठ सेना में बिना विलम्ब किए घुस पड़ूँगा।
श्लोक 19 (7.35.19)
उपदिष्टो हि मे पित्रा योगोऽनीकविशातने । नोत्सहे हि विनिर्गन्तुमहं कस्याञ्चिदापदि ॥
upadiṣṭo hi me pitrā yogo'nīkaviśātane | notsahe hi vinirgantumahaṃ kasyāñcidāpadi
मेरे पिता ने मुझे सेना को भेदने की युक्ति सिखाई है, पर यदि कोई संकट आ पड़े तो मैं उससे बाहर निकलने में समर्थ नहीं हूँ।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 20 (7.35.20)
भिन्ध्यनीकं युधां श्रेष्ठ द्वारं सञ्जनयस्व नः । वयं त्वाऽनुगमिष्यामो येन त्वं तात यास्यसि ॥
bhindhyanīkaṃ yudhāṃ śreṣṭha dvāraṃ sañjanayasva naḥ | vayaṃ tvā'nugamiṣyāmo yena tvaṃ tāta yāsyasi
"योद्धाओं में श्रेष्ठ, तुम सेना को भेदो और हमारे लिए द्वार बना दो। तात, तुम जिस मार्ग से जाओगे, उसी से हम तुम्हारे पीछे चलेंगे।
श्लोक 21 (7.35.21)
धनञ्जयसमं युद्धे त्वां वयं तात संयुते । प्रणिधायानुयास्यामो रक्षन्तः सर्वतोमुखाः ॥
dhanañjayasamaṃ yuddhe tvāṃ vayaṃ tāta saṃyute | praṇidhāyānuyāsyāmo rakṣantaḥ sarvatomukhāḥ
तात, संग्राम में घुसकर, तुम्हें युद्ध में धनंजय के समान मानते हुए और चारों ओर से तुम्हारी रक्षा करते हुए हम तुम्हारे पीछे चलेंगे।"
भीम उवाच
श्लोक 22 (7.35.22)
अहं त्वाऽनुगमिष्यामि धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः । पाञ्चालाः केकया मात्स्यास्तथा सर्वे प्रभद्रकाः ॥
ahaṃ tvā'nugamiṣyāmi dhṛṣṭadyumno'tha sātyakiḥ | pāñcālāḥ kekayā mātsyāstathā sarve prabhadrakāḥ
"मैं तुम्हारे पीछे चलूँगा, और धृष्टद्युम्न तथा सात्यकि, पाञ्चाल, केकय, मत्स्य और सभी प्रभद्रक भी।
श्लोक 23 (7.35.23)
सकृद्भिन्नं त्वया व्यूहं तत्र तत्र पुनः पुनः । वयं प्रध्वंसयिष्यामो निघ्नमाना वरान्वरान् ॥
sakṛdbhinnaṃ tvayā vyūhaṃ tatra tatra punaḥ punaḥ | vayaṃ pradhvaṃsayiṣyāmo nighnamānā varānvarān
जहाँ-जहाँ तुम एक बार व्यूह को भेद दोगे, वहाँ-वहाँ हम बार-बार उसे तोड़ डालेंगे और श्रेष्ठ-श्रेष्ठ योद्धाओं को मारते जाएँगे।"
अभिमन्युरुवाच
श्लोक 24 (7.35.24)
अहमेतत्प्रवेक्ष्यामि द्रोणानीकं दुरासदम् । पतङ्ग इव सङ्क्रुद्धो ज्वलितं जातवेदसम् ॥
ahametatpravekṣyāmi droṇānīkaṃ durāsadam | pataṅga iva saṅkruddho jvalitaṃ jātavedasam
"मैं द्रोण की इस दुर्गम सेना में वैसे ही घुसूँगा, जैसे क्रोध में आया पतंगा जलती अग्नि में घुसता है।
श्लोक 25 (7.35.25)
तत्कर्माद्य करिष्यामि हितं यद्वंशयोर्द्वयोः । मातुलस्य च यत्प्रीतिं करिष्यति पितुश्च मे ॥
tatkarmādya kariṣyāmi hitaṃ yadvaṃśayordvayoḥ | mātulasya ca yatprītiṃ kariṣyati pituśca me
आज मैं वह कर्म करूँगा जो दोनों वंशों का हित करेगा और मेरे मामा तथा मेरे पिता को प्रसन्न करेगा।
श्लोक 26 (7.35.26)
शिशुनैकेन सङ्ग्रामे काल्यमानानि सङ्घशः । द्रक्ष्यन्ति सर्वभूतानि द्विषत्सैन्यानि वै मया ॥
śiśunaikena saṅgrāme kālyamānāni saṅghaśaḥ | drakṣyanti sarvabhūtāni dviṣatsainyāni vai mayā
आज सब प्राणी देखेंगे कि युद्ध में अकेले एक बालक द्वारा शत्रु की सेनाएँ झुण्ड-के-झुण्ड खदेड़ी जा रही हैं।
श्लोक 27 (7.35.27)
नाहं पार्थेन जातः स्यां न च जातः सुभद्रया । यदि मे संयुगे कश्चिज्जीवितो नाद्य मुच्यते ॥
nāhaṃ pārthena jātaḥ syāṃ na ca jātaḥ subhadrayā | yadi me saṃyuge kaścijjīvito nādya mucyate
यदि आज युद्ध में मेरे सामने आया कोई भी जीवित बचकर निकल जाए, तो मैं न पार्थ का पुत्र होऊँ, न सुभद्रा से उत्पन्न।
श्लोक 28 (7.35.28)
यदि चैकरथेनाहं समग्रं क्षत्रमण्डलम् । न करोम्यष्टधा युद्धे न भवाम्यर्जुनात्मजः ॥
yadi caikarathenāhaṃ samagraṃ kṣatramaṇḍalam | na karomyaṣṭadhā yuddhe na bhavāmyarjunātmajaḥ
यदि मैं एक ही रथ से सारे क्षत्रिय-मण्डल को युद्ध में आठ टुकड़ों में न बाँट दूँ, तो मैं अर्जुन का पुत्र नहीं।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 29 (7.35.29)
एवं ते भाषमाणस्य बलं सौभद्र वर्धताम् । यत्समुत्सहसे भेत्तुं द्रोणानीकं दुरासदम् ॥
evaṃ te bhāṣamāṇasya balaṃ saubhadra vardhatām | yatsamutsahase bhettuṃ droṇānīkaṃ durāsadam
"सुभद्रा के पुत्र, ऐसा कहते हुए तुम्हारा बल बढ़े — तुम जो द्रोण की इस दुर्गम सेना को भेदने का साहस कर रहे हो,
श्लोक 30 (7.35.30)
रक्षितं पुरुषव्याघ्रैर्महेष्वासैर्महाबलैः । साध्यरुद्रमरुत्तुल्यैर्वस्वग्न्यादित्यविक्रमैः ॥
rakṣitaṃ puruṣavyāghrairmaheṣvāsairmahābalaiḥ | sādhyarudramaruttulyairvasvagnyādityavikramaiḥ
जिसकी रक्षा पुरुषों में बाघ-जैसे, महान् धनुर्धर, महाबली वीर कर रहे हैं, जो साध्यों, रुद्रों और मरुद्गणों के समान हैं और वसुओं, अग्नि तथा आदित्यों के समान पराक्रमी हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 31 (7.35.31)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स यन्तारमचोदयत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā sa yantāramacodayat
उसके वचन सुनकर अभिमन्यु ने सारथि को प्रेरित किया —
अभिमन्युरुवाच
श्लोक 32 (7.35.32)
सुमित्राश्वान्रणे क्षिप्रं द्रोणानीकाय चोदय ॥
sumitrāśvānraṇe kṣipraṃ droṇānīkāya codaya
"सुमित्र, घोड़ों को शीघ्र रण में द्रोण की सेना की ओर हाँको!"