द्रोण पर्व · अध्याय 62
नारद मान्धाता की कथा कहते हैं
नारद युवनाश्व के पुत्र मान्धाता की कथा सुनाते हैं, जिन्हें अश्विनीकुमारों ने पिता के उदर से निकाला और जिन्हें इन्द्र ने अपनी अँगुलियों से दूध पिलाया, जिससे वे बारह दिन में बारह वर्ष के बालक जैसे हो गए। उन्होंने एक ही दिन में पृथ्वी जीत ली, सौ अश्वमेध और सौ राजसूय किए, और ब्राह्मणों को सोने की मछलियाँ तथा अन्न के पर्वत दिए। यदि वे भी मर गए, तो सृञ्जय को अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
नारद उवाच
श्लोक 1 (7.62.1)
मान्धातारम् यौवनाश्वं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यं देवावश्विनौ गर्भे पितुः पार्श्वे चकर्षतुः ॥
māndhātāram yauvanāśvaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yaṃ devāvaśvinau garbhe pituḥ pārśve cakarṣatuḥ
हे सृञ्जय, हमने सुना है कि युवनाश्व के पुत्र मान्धाता भी मृत्यु को प्राप्त हुए — जिन्हें दोनों अश्विनीकुमारों ने पिता के पार्श्व में गर्भ से बाहर खींच लिया था।
श्लोक 2 (7.62.2)
मृगयां विचरन्राजा तृषितः क्लान्तवाहनः । धूमं दृष्ट्वाऽगमत्सत्रं पृषदाज्यमवाप सः ॥
mṛgayāṃ vicaranrājā tṛṣitaḥ klāntavāhanaḥ | dhūmaṃ dṛṣṭvā'gamatsatraṃ pṛṣadājyamavāpa saḥ
शिकार में घूमते हुए प्यासे राजा और थके हुए वाहनों ने धुआँ देखा और वे एक यज्ञ-सत्र में पहुँचे, और वहाँ उन्हें घी मिला हुआ दही मिला।
श्लोक 3 (7.62.3)
तं दृष्ट्वा युवनाश्वस्य जठरे रविसन्निभम् । गर्भं निरूहतुर्देवावश्विनौ भिषजां वरौ ॥
taṃ dṛṣṭvā yuvanāśvasya jaṭhare ravisannibham | garbhaṃ nirūhaturdevāvaśvinau bhiṣajāṃ varau
युवनाश्व के उदर में उस सूर्य जैसे तेजस्वी बालक को देखकर वैद्यों में श्रेष्ठ दोनों देवता अश्विनीकुमारों ने गर्भ को बाहर निकाला।
श्लोक 4 (7.62.4)
तं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देववर्चसम् । अन्योन्यमब्रुवन्देवाः कमयं धास्यतीति वै ॥
taṃ dṛṣṭvā piturutsaṅge śayānaṃ devavarcasam | anyonyamabruvandevāḥ kamayaṃ dhāsyatīti vai
पिता की गोद में लेटे हुए देवों जैसे तेजस्वी उस बालक को देखकर देवताओं ने आपस में कहा, "यह किसका दूध पिएगा?"
श्लोक 5 (7.62.5)
मामेवायं धयत्वङ्ग इति ह स्माह वासवः । ततोऽङ्गुलिभ्यो हीन्द्रस्य प्रादुरासीत्पयोऽमृतम् ॥
māmevāyaṃ dhayatvaṅga iti ha smāha vāsavaḥ | tato'ṅgulibhyo hīndrasya prādurāsītpayo'mṛtam
"यह मुझे ही पिए," इन्द्र ने कहा। तब इन्द्र की अँगुलियों से अमृत जैसा दूध प्रकट हुआ।
श्लोक 6 (7.62.6)
मां धास्यतीति कारुण्याद्यदिन्द्रो ह्यन्वकम्पयत् । तस्मात्तु मान्धातेत्येवं नाम तस्याद्भुतं कृतम् ॥
māṃ dhāsyatīti kāruṇyādyadindro hyanvakampayat | tasmāttu māndhātetyevaṃ nāma tasyādbhutaṃ kṛtam
क्योंकि इन्द्र ने करुणा से कहा था "यह मुझे पिएगा" (मां धास्यति), इसलिए उसका "मान्धाता" यह अद्भुत नाम पड़ा।
श्लोक 7 (7.62.7)
ततस्तु धारां पयसो घृतस्य च महात्मनः । तस्यास्ये यौवनाश्वस्य पाणिरिन्द्रस्य चास्रवत् ॥
tatastu dhārāṃ payaso ghṛtasya ca mahātmanaḥ | tasyāsye yauvanāśvasya pāṇirindrasya cāsravat
तब महात्मा इन्द्र के हाथ से दूध और घी की धारा युवनाश्व के पुत्र के मुख में बह चली।
श्लोक 8 (7.62.8)
अपिबत्पाणिमिन्द्रस्य स चाप्यह्नाऽभ्यवर्धत । सोऽभवद्द्वादशसमो द्वादशाहेन वीर्यवान् ॥
apibatpāṇimindrasya sa cāpyahnā'bhyavardhata | so'bhavaddvādaśasamo dvādaśāhena vīryavān
उसने इन्द्र के हाथ से पिया और एक ही दिन में बढ़ गया; बारह दिन में वह पराक्रमी बालक बारह वर्ष के जैसा हो गया।
श्लोक 9 (7.62.9)
इमां च पृथिवीं कृत्स्नामेकाह्ना स व्यजीजयत् । धर्मात्मा धृतिमान्वीरः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥
imāṃ ca pṛthivīṃ kṛtsnāmekāhnā sa vyajījayat | dharmātmā dhṛtimānvīraḥ satyasandho jitendriyaḥ
उसने एक ही दिन में इस समूची पृथ्वी को जीत लिया — वह धर्मात्मा, धैर्यवान्, वीर, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय था।
श्लोक 10 (7.62.10)
जनमेजयं सुधन्वानं गयं पूरुं बृहद्रथम् । असितं च नृगं चैव मान्धाता मानवोऽजयत् ॥
janamejayaṃ sudhanvānaṃ gayaṃ pūruṃ bṛhadratham | asitaṃ ca nṛgaṃ caiva māndhātā mānavo'jayat
मनु के वंशज मान्धाता ने जनमेजय, सुधन्वा, गय, पुरु, बृहद्रथ, असित और नृग को जीत लिया।
श्लोक 11 (7.62.11)
उदेति च यतः सूर्यो यत्र च प्रतितिष्ठति । तत्सर्वं यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥
udeti ca yataḥ sūryo yatra ca pratitiṣṭhati | tatsarvaṃ yauvanāśvasya māndhātuḥ kṣetramucyate
जहाँ से सूर्य उदय होता है और जहाँ अस्त होता है, वह सब युवनाश्वपुत्र मान्धाता का क्षेत्र कहलाता है।
श्लोक 12 (7.62.12)
सोऽश्वमेधशतैरिष्ट्वा राजसूयशतेन च । अददद्रोहितान्मत्स्यान्ब्राह्मणेभ्यो विशाम्पते ॥
so'śvamedhaśatairiṣṭvā rājasūyaśatena ca | adadadrohitānmatsyānbrāhmaṇebhyo viśāmpate
सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके, हे प्रजापालक, उसने ब्राह्मणों को लाल मछलियाँ दीं,
श्लोक 13 (7.62.13)
हैरण्यान्योजनोत्सेधानायताञ्शतयोजनम् । बहुप्रकारान्सुस्वादून्भक्ष्यभोज्यान्नपर्वतान् ॥
hairaṇyānyojanotsedhānāyatāñśatayojanam | bahuprakārānsusvādūnbhakṣyabhojyānnaparvatān
जो सोने की थीं, एक योजन ऊँची और सौ योजन लम्बी, और अनेक प्रकार के स्वादिष्ट खाद्य-भोज्य अन्न के पर्वत भी दिए।
श्लोक 14 (7.62.14)
अतिरिक्तं ब्राह्मणेभ्यो भुञ्जानो हीयते जनः ॥
atiriktaṃ brāhmaṇebhyo bhuñjāno hīyate janaḥ
ब्राह्मणों को देने के बाद जो शेष बचे, उससे अधिक खाने वाला मनुष्य घाटे में रहता था।
श्लोक 15 (7.62.15)
भक्ष्यान्नपाननिचयाः शुशुभुस्त्वन्नपर्वताः । घृतहदाः सूपपङ्का दधिफेना गुडोदकाः ॥
bhakṣyānnapānanicayāḥ śuśubhustvannaparvatāḥ | ghṛtahadāḥ sūpapaṅkā dadhiphenā guḍodakāḥ
भक्ष्य और पेय अन्न के ढेर वाले अन्न के पर्वत शोभित होते थे, जहाँ घी के सरोवर, सूप का कीचड़, दही का फेन और गुड़ का जल था।
श्लोक 16 (7.62.16)
रुरुधुः पर्वतान्नद्यो मधुक्षीरवहाः शुभाः । देवासुरा नरा यक्षा गन्धर्वोरगपक्षिणः ॥
rurudhuḥ parvatānnadyo madhukṣīravahāḥ śubhāḥ | devāsurā narā yakṣā gandharvoragapakṣiṇaḥ
मधु और दूध बहाने वाली सुन्दर नदियाँ पर्वतों को घेरे थीं; और वहाँ देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व, नाग और पक्षी थे।
श्लोक 17 (7.62.17)
विप्रास्तत्रागताश्चासन्वेदवेदाङ्गपारगाः । ब्राह्मणा ऋषयश्चापि नासंस्तत्राविपश्चितः ॥
viprāstatrāgatāścāsanvedavedāṅgapāragāḥ | brāhmaṇā ṛṣayaścāpi nāsaṃstatrāvipaścitaḥ
वेदों और वेदाङ्गों के पारगामी विप्र वहाँ आए थे, और वहाँ ब्राह्मणों तथा ऋषियों में कोई अविद्वान् नहीं था।
श्लोक 18 (7.62.18)
समुद्रान्तां वसुमतीं वसुपूर्णां तु सर्वतः । स तां ब्राह्मणसात्कृत्वा जगाम स्वान्गृहान्प्रति ॥
samudrāntāṃ vasumatīṃ vasupūrṇāṃ tu sarvataḥ | sa tāṃ brāhmaṇasātkṛtvā jagāma svāngṛhānprati
समुद्र तक फैली और सब ओर धन से भरी हुई पृथ्वी को ब्राह्मणों की बनाकर वे अपने घर लौट गए।
श्लोक 19 (7.62.19)
राजाऽपि विविधैरिष्ट्वा यज्ञैर्विविधदक्षिणैः । गतः पुण्यकृतां लोकान्व्याप्य स्वयशसा दिशः ॥
rājā'pi vividhairiṣṭvā yajñairvividhadakṣiṇaiḥ | gataḥ puṇyakṛtāṃ lokānvyāpya svayaśasā diśaḥ
उन राजा ने भी अनेक प्रकार की दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ करके अपने यश से दिशाओं को भरते हुए पुण्यात्माओं के लोकों को प्राप्त किया।
श्लोक 20 (7.62.20)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyatarastubhyaṃ mā putramanutapyathāḥ | ayajvānamadakṣiṇyamabhi śvaityetyudāharat
यदि वह भी मर गया, हे सृञ्जय — जो तुमसे चार प्रकार से अधिक भाग्यशाली था और तुम्हारे पुत्र से अधिक पुण्यवान् था — तो तुम अपने उस पुत्र के लिए शोक मत करो, जिसने न यज्ञ किया, न दक्षिणा दी। इस प्रकार नारद ने श्वैत्य से कहा।