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कर्ण पर्व · अध्याय 98

कृष्ण द्वारा कर्ण की भर्त्सना; अर्जुन के हाथों कर्णवध

वासुदेव कर्ण को द्रौपदी और पाण्डवों के प्रति किए गए एक-एक अन्याय की याद दिलाकर पूछते हैं कि तब उसका धर्म कहाँ था; कर्ण लज्जित होकर कुछ उत्तर नहीं देता और युद्ध करता रहता है, और दोनों ओर से अस्त्रों का आदान-प्रदान होता है। कर्ण का बाण अर्जुन को घायल करके डगमगा देता है, और कर्ण रथ से कूदकर धँसा हुआ पहिया उठाना चाहता है पर उठा नहीं पाता। कृष्ण के प्रोत्साहन से अर्जुन कर्ण की ध्वजा काट गिराते हैं और अपने तप के सत्य की दुहाई देकर अञ्जलिक बाण छोड़ते हैं, जो कर्ण का मस्तक हर लेता है। शरीर से एक तेज उठकर सूर्य में समा जाता है; पाण्डव शङ्ख बजाते हैं, और शल्य तथा कौरव भाग खड़े होते हैं।

अध्याय 97अध्याय-सूचीअध्याय 99

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.98.1)

अथाब्रवीद्वासुदेवो महात्मा । राधेय दिष्ट्या स्मरसीह धर्मम् । धर्मे हि बद्धाः सततं हि पार्थास् । तेभ्यस्ततो वृद्धिमसौ ददाति ॥

athābravīdvāsudevo mahātmā | rādheya diṣṭyā smarasīha dharmam | dharme hi baddhāḥ satataṃ hi pārthās | tebhyastato vṛddhimasau dadāti

तब महात्मा वासुदेव ने कहा — “हे राधापुत्र! सौभाग्य की बात है कि तुम्हें अब धर्म का स्मरण हो आया। पृथा के पुत्र सदा धर्म से बँधे रहे हैं, इसीलिए धर्म उन्हें वृद्धि प्रदान करता है।”

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (8.98.2)

धर्मादपेताः परिपन्थिनस्ते । तस्माद्गता वै कुरवो विनाशम् । प्रायेण नीचा व्यसनेषु मग्ना । निन्दन्ति दैवं न तु दुष्कृतं स्वम् ॥

dharmādapetāḥ paripanthinaste | tasmādgatā vai kuravo vināśam | prāyeṇa nīcā vyasaneṣu magnā | nindanti daivaṃ na tu duṣkṛtaṃ svam

जो धर्म से च्युत हो गए, वे उसके विरोधी ही हैं; इसीलिए कौरव विनाश को प्राप्त हुए। प्रायः नीच लोग विपत्तियों में डूबने पर अपने दुष्कर्म को नहीं, भाग्य को ही कोसते हैं।

श्लोक 3 (8.98.3)

कृष्णां सभां कर्ण यदेकवस्त्राम् । आनीतवांस्त्वं च सुयोधनश्च । दुःशासनः शकुनिः सौबलश्च । धर्मस्तदा ते रुचितो न कस्मात् ॥

kṛṣṇāṃ sabhāṃ karṇa yadekavastrām | ānītavāṃstvaṃ ca suyodhanaśca | duḥśāsanaḥ śakuniḥ saubalaśca | dharmastadā te rucito na kasmāt

हे कर्ण! जब तुम, सुयोधन, दुःशासन और सुबलपुत्र शकुनि एक ही वस्त्र पहने द्रौपदी को सभा में ले आए थे, तब तुम्हें धर्म क्यों नहीं सूझा?

श्लोक 4 (8.98.4)

यदा सभायां राजानमनक्षज्ञं युधिष्ठिरम् । आनीय जितवन्तो वै क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

yadā sabhāyāṃ rājānamanakṣajñaṃ yudhiṣṭhiram | ānīya jitavanto vai kva te dharmastadā gataḥ

जब तुमने पासों के खेल में अनभिज्ञ राजा युधिष्ठिर को सभा में लाकर हराया था, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 5 (8.98.5)

वनवासे व्यतीते च कर्ण वर्षे त्रयोदशे । न प्रयच्छसि यद्राज्यं क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

vanavāse vyatīte ca karṇa varṣe trayodaśe | na prayacchasi yadrājyaṃ kva te dharmastadā gataḥ

हे कर्ण! जब वनवास पूरा हो गया और तेरहवाँ वर्ष बीत चुका, फिर भी तुमने राज्य नहीं लौटाया, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 6 (8.98.6)

यद्भीमसेनं सर्पैश्च विषयुक्तैश्च भोजनैः । आचरत्त्वन्मते राजा क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

yadbhīmasenaṃ sarpaiśca viṣayuktaiśca bhojanaiḥ | ācarattvanmate rājā kva te dharmastadā gataḥ

जब राजा दुर्योधन ने तुम्हारी सम्मति से भीमसेन के साथ सर्पों और विषमिश्रित भोजन द्वारा व्यवहार किया था, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 7 (8.98.7)

यद्वारणावते पार्थान्सुप्ताञ्जतुगृहे तदा । हन्तुकामास्तदा यूयं क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

yadvāraṇāvate pārthānsuptāñjatugṛhe tadā | hantukāmāstadā yūyaṃ kva te dharmastadā gataḥ

जब वारणावत में लाक्षागृह में सोए हुए पृथा के पुत्रों को तुम सब मार डालना चाहते थे, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 8 (8.98.8)

यदा रजस्वलां कृष्णां दुःशासनवशे स्थिताम् । सभायां प्राहसः कर्ण क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

yadā rajasvalāṃ kṛṣṇāṃ duḥśāsanavaśe sthitām | sabhāyāṃ prāhasaḥ karṇa kva te dharmastadā gataḥ

जब रजस्वला द्रौपदी दुःशासन के वश में खड़ी थी और हे कर्ण! तुम सभा में उस पर हँसे थे, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 9 (8.98.9)

यदनार्यैः पुरा कृष्णां क्लिश्यमानामनागसम् । उपप्रेक्षसि राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

yadanāryaiḥ purā kṛṣṇāṃ kliśyamānāmanāgasam | upaprekṣasi rādheya kva te dharmastadā gataḥ

जब निरपराध द्रौपदी को पहले नीच पुरुष पीड़ित कर रहे थे और हे राधापुत्र! तुम देखते रहे, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 10 (8.98.10)

विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः । पतिमन्यं वृणीष्वेति वदंस्त्वं गजगामिनीम् । उपप्रेक्षसि राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

vinaṣṭāḥ pāṇḍavāḥ kṛṣṇe śāśvataṃ narakaṃ gatāḥ | patimanyaṃ vṛṇīṣveti vadaṃstvaṃ gajagāminīm | upaprekṣasi rādheya kva te dharmastadā gataḥ

“हे द्रौपदी! पाण्डव नष्ट हो गए, वे शाश्वत नरक में चले गए; अब किसी दूसरे को पति बना लो” — गजगामिनी द्रौपदी से तुमने ऐसा कहा और हे राधापुत्र! देखते रहे; तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 11 (8.98.11)

राज्यलुब्धः पुनः कर्ण समाह्वयसि पाण्डवान् । यदा शकुनिमाश्रित्य क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

rājyalubdhaḥ punaḥ karṇa samāhvayasi pāṇḍavān | yadā śakunimāśritya kva te dharmastadā gataḥ

हे कर्ण! राज्य के लोभ में तुमने शकुनि का सहारा लेकर पाण्डवों को फिर से ललकारा था; तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 12 (8.98.12)

यदाऽभिमन्युं बहवो युद्धे जघ्नुर्महारथाः । परिवार्य रणे बालं क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥

yadā'bhimanyuṃ bahavo yuddhe jaghnurmahārathāḥ | parivārya raṇe bālaṃ kva te dharmastadā gataḥ

जब अनेक महारथियों ने युद्ध में बालक अभिमन्यु को घेरकर मार डाला था, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था?

श्लोक 13 (8.98.13)

यद्येष धर्मस्तत्र न विद्यते हि । किं सर्वथा तालुविशोषणेन । अद्येह धर्म्याणि विधत्स्व सूत । तथापि जीवन्न विमोक्ष्यसे हि ॥

yadyeṣa dharmastatra na vidyate hi | kiṃ sarvathā tāluviśoṣaṇena | adyeha dharmyāṇi vidhatsva sūta | tathāpi jīvanna vimokṣyase hi

यदि उन अवसरों पर यह धर्म कहीं था ही नहीं, तो हर प्रकार से तालु सुखाने से क्या लाभ? हे सूत! आज यहीं अपने धर्मसम्मत कर्म कर लो; फिर भी तुम जीवित बचकर नहीं छूटोगे।

श्लोक 14 (8.98.14)

नलो ह्यक्षैर्निर्जितः पुष्करेण । पुनर्यशो राज्यमवाप वीर्यात् । प्राप्तास्तथा पाण्डवा बाहुवीर्यात् । सर्वैः समेताः परिवृत्तलोभाः ॥

nalo hyakṣairnirjitaḥ puṣkareṇa | punaryaśo rājyamavāpa vīryāt | prāptāstathā pāṇḍavā bāhuvīryāt | sarvaiḥ sametāḥ parivṛttalobhāḥ

जैसे पुष्कर से द्यूत में हारे नल ने अपने पराक्रम से यश और राज्य फिर पा लिया, वैसे ही सब पाण्डवों ने एकजुट होकर, लोभ से मुँह मोड़कर, अपने बाहुबल से उसे पा लिया।

श्लोक 15 (8.98.15)

निहत्य शत्रून्समरे प्रवृद्धान् । ससोमका राज्यमवाप्नुयुस्ते । तथा गता धार्तराष्ट्रा विनाशं । धर्माभिगुप्तैः सततं नृसिंहैः ॥

nihatya śatrūnsamare pravṛddhān | sasomakā rājyamavāpnuyuste | tathā gatā dhārtarāṣṭrā vināśaṃ | dharmābhiguptaiḥ satataṃ nṛsiṃhaiḥ

बढ़े हुए शत्रुओं को युद्ध में मारकर वे सोमकों के साथ राज्य पा लेंगे; और सदा धर्म से रक्षित उन नरसिंहों के हाथों धृतराष्ट्र के पुत्र विनाश को प्राप्त होंगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 16 (8.98.16)

एवमुक्तस्तदा कर्णो वासुदेवेन भारत । लज्जयावनतो भूत्वा नोत्तरं किञ्चिदुक्तवान् ॥

evamuktastadā karṇo vāsudevena bhārata | lajjayāvanato bhūtvā nottaraṃ kiñciduktavān

हे भारत! वासुदेव के ऐसा कहने पर कर्ण लज्जा से सिर झुकाकर कुछ भी उत्तर न दे सका।

श्लोक 17 (8.98.17)

क्रोधात्प्रस्फुरमाणौष्ठो धनुरुद्यम्य भारत । योधयामास वै पार्थं महावेगपराक्रमः ॥

krodhātprasphuramāṇauṣṭho dhanurudyamya bhārata | yodhayāmāsa vai pārthaṃ mahāvegaparākramaḥ

हे भारत! क्रोध से होंठ फड़कते हुए उसने धनुष उठाया और महान् वेग तथा पराक्रम के साथ पार्थ से युद्ध करने लगा।

श्लोक 18 (8.98.18)

ततोऽब्रवीद्वासुदेवः फल्गुनं पुरुषर्षभम् । दिव्यास्त्रेणैव निर्भिद्य पातयस्व महाबल ॥

tato'bravīdvāsudevaḥ phalgunaṃ puruṣarṣabham | divyāstreṇaiva nirbhidya pātayasva mahābala

तब वासुदेव ने पुरुषश्रेष्ठ फल्गुन से कहा — “हे महाबाहो! दिव्य अस्त्र से इसे बींधकर गिरा दो।”

श्लोक 19 (8.98.19)

एवमुक्तस्तु देवेन क्रोधमागात्तदाऽर्जुनः । मन्युमभ्याविशद्धोरं स्मृत्वा तत्तु धनञ्जयः ॥

evamuktastu devena krodhamāgāttadā'rjunaḥ | manyumabhyāviśaddhoraṃ smṛtvā tattu dhanañjayaḥ

देव के ऐसा कहने पर अर्जुन क्रोध से भर उठे; वह सब स्मरण करके धनञ्जय पर भयंकर रोष छा गया।

श्लोक 20 (8.98.20)

तस्य क्रुद्धस्य सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः । प्रादुरासंस्तदा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tasya kruddhasya sarvebhyaḥ srotobhyastejaso'rciṣaḥ | prādurāsaṃstadā rājaṃstadadbhutamivābhavat

हे राजन्! क्रुद्ध अर्जुन के शरीर के सभी छिद्रों से तेज की ज्वालाएँ फूट पड़ीं; वह एक अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 21 (8.98.21)

तत्समीक्ष्य ततः कर्णो ब्रह्मास्त्रेण धनञ्जयम् । अभ्यवर्षत्पुनर्यत्नमकरोद्रथसर्जने ॥

tatsamīkṣya tataḥ karṇo brahmāstreṇa dhanañjayam | abhyavarṣatpunaryatnamakarodrathasarjane

यह देखकर कर्ण ने ब्रह्मास्त्र से धनञ्जय पर वर्षा की और रथ को सँभालने में फिर प्रयत्न किया।

श्लोक 22 (8.98.22)

ब्रह्मास्त्रेणैव तं पार्थो ववर्ष शरवृष्टिभिः । तदस्त्रमस्त्रेणावार्य प्रजहार च पाण्डवः ॥

brahmāstreṇaiva taṃ pārtho vavarṣa śaravṛṣṭibhiḥ | tadastramastreṇāvārya prajahāra ca pāṇḍavaḥ

पार्थ ने भी उसी ब्रह्मास्त्र से बाणों की वृष्टि करके उस पर वर्षा की; पाण्डव ने उस अस्त्र को अपने अस्त्र से रोककर प्रहार किया।

श्लोक 23 (8.98.23)

ततोऽन्यदस्त्रं कौन्तेयो दयितं जातवेदसः । मुमोच कर्णमुद्दिश्य तत्प्रजज्वाल तेजसा ॥

tato'nyadastraṃ kaunteyo dayitaṃ jātavedasaḥ | mumoca karṇamuddiśya tatprajajvāla tejasā

तब कुन्तीपुत्र ने अग्नि को प्रिय एक दूसरा अस्त्र कर्ण को लक्ष्य करके छोड़ा, और वह अपने तेज से प्रज्वलित हो उठा।

श्लोक 24 (8.98.24)

वारुणेन ततः कर्णः शमयामास पावकम् । जीमूतैश्च दिशः सर्वाश्चक्रे तिमिरदुर्दिनाः ॥

vāruṇena tataḥ karṇaḥ śamayāmāsa pāvakam | jīmūtaiśca diśaḥ sarvāścakre timiradurdināḥ

तब कर्ण ने वारुणास्त्र से उस अग्नि को शान्त कर दिया और बादलों से सब दिशाओं को अन्धकार से भरे दुर्दिन जैसा बना दिया।

श्लोक 25 (8.98.25)

पाण्डवेयस्त्वसम्भ्रान्तो वायव्यास्त्रेण वीर्यवान् । अपोवाह तदाऽभ्राणि राधेयस्य प्रपश्यतः ॥

pāṇḍaveyastvasambhrānto vāyavyāstreṇa vīryavān | apovāha tadā'bhrāṇi rādheyasya prapaśyataḥ

पर पाण्डव अर्जुन ने विचलित हुए बिना, पराक्रमपूर्वक वायव्यास्त्र से उन बादलों को उड़ा दिया, और राधापुत्र देखता रह गया।

श्लोक 26 (8.98.26)

ततः शरं महाघोरं ज्वलन्तमिव पावकम् । आददे पाण्डुपुत्रस्य सूतपुत्रो जिघांसया ॥

tataḥ śaraṃ mahāghoraṃ jvalantamiva pāvakam | ādade pāṇḍuputrasya sūtaputro jighāṃsayā

तब सूतपुत्र ने पाण्डुपुत्र को मार डालने की इच्छा से अग्नि के समान जलता हुआ एक अत्यन्त भयंकर बाण उठा लिया।

श्लोक 27 (8.98.27)

योज्यमाने ततस्तस्मिन्बाणे धनुषि पूजिते । चचाल पृथिवी राजन्सशैलवनकानना ॥

yojyamāne tatastasminbāṇe dhanuṣi pūjite | cacāla pṛthivī rājansaśailavanakānanā

हे राजन्! जब उस बाण को पूजित धनुष पर चढ़ाया जाने लगा, तब पर्वतों, वनों और उपवनों सहित पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 28 (8.98.28)

ववौ सशर्करो वायुर्दिशश्च रजसा वृताः । हाहाकारश्च सञ्जज्ञे सुराणां दिवि भारत ॥

vavau saśarkaro vāyurdiśaśca rajasā vṛtāḥ | hāhākāraśca sañjajñe surāṇāṃ divi bhārata

कंकड़ों से भरी वायु बहने लगी, दिशाएँ धूल से ढक गईं, और हे भारत! आकाश में देवताओं का हाहाकार उठा।

श्लोक 29 (8.98.29)

तमिषुं सन्धितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मारिष । विषादं परमं जग्मुः पाण्डवा दीनचेतसः ॥

tamiṣuṃ sandhitaṃ dṛṣṭvā sūtaputreṇa māriṣa | viṣādaṃ paramaṃ jagmuḥ pāṇḍavā dīnacetasaḥ

हे मान्यवर! सूतपुत्र द्वारा उस बाण को चढ़ाया हुआ देखकर पाण्डव अत्यन्त विषाद में डूब गए, उनके चित्त दीन हो गए।

श्लोक 30 (8.98.30)

स सायकः कर्णभुजप्रमुक्तः । शक्राशनिप्रख्यरुचिः शिताग्रः । भुजान्तरं प्राप्य धनञ्जयस्य । विवेश वल्मीकमिवोरगोत्तमः ॥

sa sāyakaḥ karṇabhujapramuktaḥ | śakrāśaniprakhyaruciḥ śitāgraḥ | bhujāntaraṃ prāpya dhanañjayasya | viveśa valmīkamivoragottamaḥ

कर्ण की भुजा से छूटा हुआ, इन्द्र के वज्र के समान दीप्तिमान् और तीखी नोक वाला वह बाण धनञ्जय की छाती में जा लगा और ऐसे घुस गया जैसे श्रेष्ठ सर्प बाँबी में घुसता है।

श्लोक 31 (8.98.31)

स गाढविद्धः समरे महात्मा । विधूर्णमानः श्लथहस्तगाण्डिवः । चचाल वीभत्सुरमित्रमर्दनः । क्षितेः प्रकम्पे च यथाऽचलोत्तमः ॥

sa gāḍhaviddhaḥ samare mahātmā | vidhūrṇamānaḥ ślathahastagāṇḍivaḥ | cacāla vībhatsuramitramardanaḥ | kṣiteḥ prakampe ca yathā'calottamaḥ

युद्ध में गहरे बिंधे हुए, शत्रुओं का मर्दन करने वाले महात्मा बीभत्सु चक्कर खाने लगे, गाण्डीव पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई, और वे भूकम्प में काँपते श्रेष्ठ पर्वत की भाँति डगमगा गए।

श्लोक 32 (8.98.32)

तदन्तरं प्राप्य वृषो महारथो । रथाङ्गमुर्वीगतमुज्जिहीर्षुः । रथादवप्लुत्य निगृह्य दोर्भ्यां । शशाक दैवान्न महाबलोऽपि ॥

tadantaraṃ prāpya vṛṣo mahāratho | rathāṅgamurvīgatamujjihīrṣuḥ | rathādavaplutya nigṛhya dorbhyāṃ | śaśāka daivānna mahābalo'pi

उसी अवसर का लाभ उठाकर महारथी वृष (कर्ण) ने पृथ्वी में धँसे रथ के पहिये को उठाने की इच्छा से रथ से कूदकर उसे दोनों भुजाओं से पकड़ा; किन्तु महाबली होते हुए भी भाग्यवश वह उसे उठा न सका।

श्लोक 33 (8.98.33)

ततः किरीटी प्रतिलभ्य संज्ञां । जग्राह बाणं यमदण्डकल्पम् । ततोऽर्जुनः प्राञ्जलिकं महात्मा । ततोऽब्रवीद्वासुदेवोऽपि पार्थम् ॥

tataḥ kirīṭī pratilabhya saṃjñāṃ | jagrāha bāṇaṃ yamadaṇḍakalpam | tato'rjunaḥ prāñjalikaṃ mahātmā | tato'bravīdvāsudevo'pi pārtham

तब किरीटी ने होश में आकर यमदण्ड के समान एक बाण उठाया; महात्मा अर्जुन ने अञ्जलिक नामक बाण लिया; और तब वासुदेव ने पार्थ से कहा।

श्लोक 34 (8.98.34)

छिन्ध्यस्य मूर्धानमरेः शरेण । न यावदारोहति वै रथं वृषः । तथैव सम्पूज्य स तद्वचः प्रभोः । ततः क्षुरं प्रज्वलितं प्रगृह्य । जघान कक्षाममलार्कवर्णाम् । महारथे रथचक्रे विमग्ने ॥

chindhyasya mūrdhānamareḥ śareṇa | na yāvadārohati vai rathaṃ vṛṣaḥ | tathaiva sampūjya sa tadvacaḥ prabhoḥ | tataḥ kṣuraṃ prajvalitaṃ pragṛhya | jaghāna kakṣāmamalārkavarṇām | mahārathe rathacakre vimagne

“वृष के फिर रथ पर चढ़ने से पहले ही बाण से इस शत्रु का सिर काट दो।” अपने स्वामी के इस वचन का उसी प्रकार आदर करके अर्जुन ने एक जलता हुआ क्षुरप्र बाण लेकर निर्मल सूर्य जैसे वर्ण वाली उस हाथी-रस्सी के चिह्न पर प्रहार किया, जबकि महारथी के रथ का पहिया धँसा हुआ था।

श्लोक 35 (8.98.35)

तं हस्तिकक्षाप्रवरं सुकेतुं । सुवर्णमुक्तामणिवज्रजुष्टम् । कलाप्रकृष्टोत्तमशिल्पियत्नैः । कृतं सुरूपं तपनीयचित्रम् ॥

taṃ hastikakṣāpravaraṃ suketuṃ | suvarṇamuktāmaṇivajrajuṣṭam | kalāprakṛṣṭottamaśilpiyatnaiḥ | kṛtaṃ surūpaṃ tapanīyacitram

हाथी की रस्सी के चिह्न वाली वह उत्तम ध्वजा — सोने, मोतियों, मणियों और हीरों से जड़ी, कलाओं में सर्वोत्कृष्ट श्रेष्ठ शिल्पियों के परिश्रम से तपे सोने से सुन्दर और विचित्र रूप में गढ़ी हुई —

श्लोक 36 (8.98.36)

जयास्पदं तव सैन्यस्य नित्यम् । अमित्रवित्रासनमीड्यरूपम् । विख्यातमादित्यसुतस्य लोके । त्विषा समं पावकभानुचन्द्रैः ॥

jayāspadaṃ tava sainyasya nityam | amitravitrāsanamīḍyarūpam | vikhyātamādityasutasya loke | tviṣā samaṃ pāvakabhānucandraiḥ

तुम्हारी सेना की विजय का सदा आधार, शत्रुओं को त्रास देने वाली, स्तुत्य रूप वाली, और संसार में सूर्यपुत्र की ध्वजा के रूप में विख्यात — तेज में अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा के समान —

श्लोक 37 (8.98.37)

ततः क्षुरप्रेण सुसंशितेन । सुवर्णपुङ्खेन हुताग्निवर्चसा । श्रिया ज्वलन्तं ध्वजमुन्ममाथ । महारथस्याधिरथेः किरीटी ॥

tataḥ kṣurapreṇa susaṃśitena | suvarṇapuṅkhena hutāgnivarcasā | śriyā jvalantaṃ dhvajamunmamātha | mahārathasyādhiratheḥ kirīṭī

तब किरीटी ने हवन की अग्नि जैसे तेज वाले, सोने के पंखों वाले तीखे क्षुरप्र से अधिरथपुत्र महारथी की शोभा से जगमगाती उस ध्वजा को उखाड़ फेंका।

श्लोक 38 (8.98.38)

यशश्च दर्पश्च तथा प्रियाणि । सर्वाणि कार्याणि च तेन केतुना । साकं कुरूणां हृदयानि चापतन् । बभूव हाहेति च निःस्वनो महान् ॥

yaśaśca darpaśca tathā priyāṇi | sarvāṇi kāryāṇi ca tena ketunā | sākaṃ kurūṇāṃ hṛdayāni cāpatan | babhūva hāheti ca niḥsvano mahān

उस ध्वजा के साथ यश, अभिमान, सब प्रिय वस्तुएँ और सब कर्तव्य गिर पड़े; कौरवों के हृदय भी उसके साथ गिर गए, और ‘हाय!’ की बड़ी ध्वनि उठी।

श्लोक 39 (8.98.39)

दृष्ट्वा ध्वजं पातितमाशुकारिणा । कुरुप्रवीरेण निकृत्तमाहवे । नाशंसिरे सूतपुत्रस्य सर्वे । जयं तदा भारत ये त्वदीयाः ॥

dṛṣṭvā dhvajaṃ pātitamāśukāriṇā | kurupravīreṇa nikṛttamāhave | nāśaṃsire sūtaputrasya sarve | jayaṃ tadā bhārata ye tvadīyāḥ

हे भारत! फुर्तीले कुरुवीर द्वारा युद्ध में कटी हुई ध्वजा को गिरी देखकर आपके सभी योद्धाओं ने सूतपुत्र की विजय की आशा छोड़ दी।

श्लोक 40 (8.98.40)

अथ त्वरन्कर्णवधाय पार्थो । महेन्द्रवज्रानलदण्डसन्निभम् । आदत्त चाथाञ्जलिकं निषङ्गात् । सहस्ररश्मेरिव रश्मिमुत्तमम् ॥

atha tvarankarṇavadhāya pārtho | mahendravajrānaladaṇḍasannibham | ādatta cāthāñjalikaṃ niṣaṅgāt | sahasraraśmeriva raśmimuttamam

तब कर्ण के वध के लिए उतावले पार्थ ने तरकश से अञ्जलिक बाण निकाला, जो महेन्द्र के वज्र और अग्नि के दण्ड के समान था, मानो सहस्ररश्मि सूर्य की उत्तम किरण हो।

श्लोक 41 (8.98.41)

मर्मच्छिदं शोणितमांसदिग्धं । वैश्वानरार्कप्रतिमं महार्हम् । नराश्वनागासुहरं त्र्यरत्निं । षड्वाजमञ्जोगतिमुग्रवेगम् ॥

marmacchidaṃ śoṇitamāṃsadigdhaṃ | vaiśvānarārkapratimaṃ mahārham | narāśvanāgāsuharaṃ tryaratniṃ | ṣaḍvājamañjogatimugravegam

मर्म को भेदने वाला, रक्त और मांस से सना, अग्नि और सूर्य के समान, महामूल्य, मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के प्राण हर लेने वाला, तीन अरत्नि लम्बा, छह पंखों वाला, सीधी गति से जाने वाला, उग्र वेग वाला —

श्लोक 42 (8.98.42)

सहस्रनेत्राशनितुल्यवीर्यं । कालानलं व्यात्तमिवातिघोरम् । पिनाकनारायणचक्रसन्निभं । भयङ्करं प्राणभृतां विनाशनम् ॥

sahasranetrāśanitulyavīryaṃ | kālānalaṃ vyāttamivātighoram | pinākanārāyaṇacakrasannibhaṃ | bhayaṅkaraṃ prāṇabhṛtāṃ vināśanam

सहस्रनेत्र इन्द्र के वज्र के समान बलशाली, मुँह फैलाए प्रलयाग्नि की भाँति अत्यन्त घोर, पिनाक और नारायण के चक्र के समान, भयंकर और प्राणियों का विनाश करने वाला।

श्लोक 43 (8.98.43)

जग्राह पार्थः स शरं प्रहृष्टो । यो देवसङ्घैरपि दुर्निवार्यः । सम्पूजितो यः सततं महात्मा । देवासुरान्यो विजयेन्महेषुः ॥

jagrāha pārthaḥ sa śaraṃ prahṛṣṭo | yo devasaṅghairapi durnivāryaḥ | sampūjito yaḥ satataṃ mahātmā | devāsurānyo vijayenmaheṣuḥ

पार्थ ने प्रसन्न होकर उस बाण को उठा लिया, जिसे देवगण भी कठिनाई से रोक सकते थे, जो सदा पूजित था, और जो महान् बाण देवों तथा असुरों को जीत सकता था।

श्लोक 44 (8.98.44)

तं वै प्रमृष्टं प्रसमीक्ष्य युद्धे । चचाल सर्वं सचराचरं जगत् । कृत्स्नं जगत्स्वस्त्यृषयोऽभिचक्रुः । तमुद्यतं प्रेक्ष्य महाहवेषुम् ॥

taṃ vai pramṛṣṭaṃ prasamīkṣya yuddhe | cacāla sarvaṃ sacarācaraṃ jagat | kṛtsnaṃ jagatsvastyṛṣayo'bhicakruḥ | tamudyataṃ prekṣya mahāhaveṣum

उस बाण को युद्ध में उठा देखकर चर-अचर सारा जगत् काँप उठा, और उस महान् बाण को उठा देखकर ऋषियों ने सारे संसार के कल्याण की प्रार्थना की।

श्लोक 45 (8.98.45)

ततस्तु तं वै शरमप्रमेयं । गाण्डीवधन्वा धनुषि व्ययोजयत् । युक्त्वा महास्त्रेण परेण चापं । विकृष्य गाण्डीवमुवाच सत्वरम् ॥

tatastu taṃ vai śaramaprameyaṃ | gāṇḍīvadhanvā dhanuṣi vyayojayat | yuktvā mahāstreṇa pareṇa cāpaṃ | vikṛṣya gāṇḍīvamuvāca satvaram

तब गाण्डीवधारी ने उस अप्रमेय बाण को धनुष पर चढ़ाया, उसे श्रेष्ठ महास्त्र से संयुक्त किया और गाण्डीव खींचकर शीघ्रता से बोले।

अर्जुन उवाच

श्लोक 46 (8.98.46)

अयं हास्त्रप्रहितो महाशरः । शरीरहृच्चासुहरश्च दुर्हृदः । तपोऽस्ति तप्तं गुरवश्च तोषिता । मया यदीष्टं सुहुतं यदि श्रुतम् ॥

ayaṃ hāstraprahito mahāśaraḥ | śarīrahṛccāsuharaśca durhṛdaḥ | tapo'sti taptaṃ guravaśca toṣitā | mayā yadīṣṭaṃ suhutaṃ yadi śrutam

अस्त्र की शक्ति से छोड़ा गया यह महान् बाण मेरे दुष्ट शत्रु का शरीर और प्राण हर लेगा। यदि मैंने तप किया है, गुरुजनों को सन्तुष्ट किया है, जो यज्ञ किया वह भली-भाँति सम्पन्न हुआ है, और यदि मैंने उपदेश सुना है —

सञ्जय उवाच

श्लोक 47 (8.98.47)

अनेन सत्येन निहन्त्वयं शरः । सुसंहितः कर्णमरिं ममोर्जितम् । इत्यूचिवांस्तं प्रमुमोच बाणं । धनञ्जयः कर्णवधाय घोरम् ॥

anena satyena nihantvayaṃ śaraḥ | susaṃhitaḥ karṇamariṃ mamorjitam | ityūcivāṃstaṃ pramumoca bāṇaṃ | dhanañjayaḥ karṇavadhāya ghoram

“इस सत्य के बल से यह भली-भाँति चढ़ाया हुआ बाण मेरे बलशाली शत्रु कर्ण का वध करे।” यह कहकर धनञ्जय ने कर्ण के वध के लिए वह भयंकर बाण छोड़ दिया।

श्लोक 48 (8.98.48)

कृत्या ह्यथर्वाङ्गिरसी प्रचोदिता । यथा तथा त्वं जहि शात्रवं मम । ब्रुवन्किरीटी तमतिप्रहृष्टः । असृजद्देवानां जयहेतुं महेषुम् ॥

kṛtyā hyatharvāṅgirasī pracoditā | yathā tathā tvaṃ jahi śātravaṃ mama | bruvankirīṭī tamatiprahṛṣṭaḥ | asṛjaddevānāṃ jayahetuṃ maheṣum

“जैसे अथर्वाङ्गिरस की कृत्या छोड़ी जाने पर अपना लक्ष्य भेदती है, वैसे ही तुम मेरे शत्रु को मार डालो।” यह कहते हुए अत्यन्त हर्षित किरीटी ने देवताओं की विजय का हेतु वह महान् बाण छोड़ दिया।

श्लोक 49 (8.98.49)

जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभावः । कर्णं वशी पाण्डवः क्षिप्रकारी । ततो विमुक्तो बलिना महेषुः । प्रज्वालयामास नभो दिशश्च ॥

jighāṃsurarkendusamaprabhāvaḥ | karṇaṃ vaśī pāṇḍavaḥ kṣiprakārī | tato vimukto balinā maheṣuḥ | prajvālayāmāsa nabho diśaśca

सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रभा वाले, जितेन्द्रिय और फुर्तीले पाण्डव कर्ण को मारने की इच्छा से तत्पर थे; तब उस बलवान् के छोड़े हुए महान् बाण ने आकाश और दिशाओं को प्रज्वलित कर दिया।

श्लोक 50 (8.98.50)

सैन्यान्यनेकानि च विप्रमोह्य । गाण्डीवमुक्तेन ततो महात्मा । तेनार्जुनस्तन्महनीयमस्य । शिरोऽहरत्सूतपुत्रस्य राजन् ॥

sainyānyanekāni ca vipramohya | gāṇḍīvamuktena tato mahātmā | tenārjunastanmahanīyamasya | śiro'haratsūtaputrasya rājan

गाण्डीव से छूटे उस बाण से अनेक सेनाओं को मोहित करके महात्मा अर्जुन ने, हे राजन्, सूतपुत्र का वह माननीय मस्तक हर लिया।

श्लोक 51 (8.98.51)

छिन्नं पपाताञ्जलिकेन तूर्णं । कायश्च पश्चाद्धरणीं जगाम ॥

chinnaṃ papātāñjalikena tūrṇaṃ | kāyaśca paścāddharaṇīṃ jagāma

अञ्जलिक से कटा हुआ वह शीघ्र गिर पड़ा, और उसके पीछे कर्ण का शरीर भी पृथ्वी पर जा गिरा।

श्लोक 52 (8.98.52)

तदुद्यतादित्यसमानतेजसं । शरन्नभोमध्यगभास्करोपमम् । वराङ्गमुर्व्यामपतच्चमूमुखे । दिवाकरोऽस्तादिव रक्तमण्डलः ॥

tadudyatādityasamānatejasaṃ | śarannabhomadhyagabhāskaropamam | varāṅgamurvyāmapataccamūmukhe | divākaro'stādiva raktamaṇḍalaḥ

उदित सूर्य के समान तेज वाला, शरद् ऋतु के आकाश के मध्य में स्थित सूर्य जैसा वह उत्तम मस्तक सेना के अग्रभाग में पृथ्वी पर गिरा, मानो अस्ताचल से सूर्य का लाल मण्डल गिर पड़ा हो।

श्लोक 53 (8.98.53)

ततोऽस्य देहं सततं सुखैधितं । सुरूपमत्यर्थसुखं सुगन्धि च । परेण कृच्छ्रेण शिरः समत्यजत् । गृहं महर्द्धी निवसन्निवेश्वरः ॥

tato'sya dehaṃ satataṃ sukhaidhitaṃ | surūpamatyarthasukhaṃ sugandhi ca | pareṇa kṛcchreṇa śiraḥ samatyajat | gṛhaṃ maharddhī nivasanniveśvaraḥ

तब उस सिर ने बड़े कष्ट से उस शरीर को छोड़ा, जो सदा सुख में पला था — सुन्दर, अत्यन्त सुखद और सुगन्धित था — जैसे महान् ऐश्वर्य वाला स्वामी अपने निवास-घर को छोड़ता है।

श्लोक 54 (8.98.54)

शरैर्विभिन्नं व्यसु तत्सुवर्चसः । पपात कर्णस्य शरीरमुच्छ्रितम् । स्रवद्व्रणं गैरिकतोयविस्रवं । गिरेर्यथा वज्रहतं महाशिरः ॥

śarairvibhinnaṃ vyasu tatsuvarcasaḥ | papāta karṇasya śarīramucchritam | sravadvraṇaṃ gairikatoyavisravaṃ | gireryathā vajrahataṃ mahāśiraḥ

बाणों से छिदा हुआ, प्राणहीन, तेजस्वी कर्ण का ऊँचा शरीर गिर पड़ा; उसके घावों से गेरू के रंग का जल-सा बह रहा था, जैसे वज्र से मारे गए पर्वत का विशाल शिखर हो।

श्लोक 55 (8.98.55)

देहाच्च कर्णस्य निपातितस्य । तेजः सूर्यं खं वितत्याविवेश । तदद्भुतं सर्वमनुष्ययोधाः । संदृष्टवन्तो निहते स्म कर्णे ॥

dehācca karṇasya nipātitasya | tejaḥ sūryaṃ khaṃ vitatyāviveśa | tadadbhutaṃ sarvamanuṣyayodhāḥ | saṃdṛṣṭavanto nihate sma karṇe

गिरे हुए कर्ण के शरीर से एक तेज निकलकर आकाश में फैला और सूर्य में प्रवेश कर गया; कर्ण के मारे जाने पर सब मनुष्य योद्धाओं ने वह अद्भुत दृश्य देखा।

श्लोक 56 (8.98.56)

ततः शङ्खान्पाण्डवा दध्मुरुच्चैः । दृष्ट्वा कर्णं पातितं फल्गुनेन । तथैव कृष्णश्च धनञ्जयश्च । हृष्टौ यमौ दध्मतुर्वारिजातौ ॥

tataḥ śaṅkhānpāṇḍavā dadhmuruccaiḥ | dṛṣṭvā karṇaṃ pātitaṃ phalgunena | tathaiva kṛṣṇaśca dhanañjayaśca | hṛṣṭau yamau dadhmaturvārijātau

तब फल्गुन द्वारा कर्ण को गिराया देखकर पाण्डवों ने उच्च स्वर से शङ्ख बजाए; वैसे ही कृष्ण और धनञ्जय ने भी हर्षित होकर अपने दोनों शङ्ख बजाए।

श्लोक 57 (8.98.57)

तं सोमकाः प्रेक्ष्य हतं शयानं । सैन्यैः सार्धं सिंहनादान्प्रचक्रुः । तूर्याणि सञ्जघ्नुरतीव हृष्टा । वासांसि चैवादुधुवुर्भुजांश्च ॥

taṃ somakāḥ prekṣya hataṃ śayānaṃ | sainyaiḥ sārdhaṃ siṃhanādānpracakruḥ | tūryāṇi sañjaghnuratīva hṛṣṭā | vāsāṃsi caivādudhuvurbhujāṃśca

उसे मरा पड़ा देखकर सोमकों ने अपनी सेनाओं के साथ सिंहनाद किया; अत्यन्त हर्षित होकर उन्होंने वाद्य बजाए और वस्त्र तथा भुजाएँ हिलाईं।

श्लोक 58 (8.98.58)

संवर्धयन्तश्च नरेन्द्र योधाः । पार्थं समाजग्मुरतीव हृष्टाः । बलान्विताश्चापरे ह्यप्यनृत्यन् । अन्योन्यमाश्लिष्य नदन्त ऊचुः ॥

saṃvardhayantaśca narendra yodhāḥ | pārthaṃ samājagmuratīva hṛṣṭāḥ | balānvitāścāpare hyapyanṛtyan | anyonyamāśliṣya nadanta ūcuḥ

हे राजन्! योद्धा बढ़ावा देते हुए अत्यन्त हर्ष से पार्थ के पास आ पहुँचे; दूसरे बलवान् योद्धा नाचने लगे और एक-दूसरे को गले लगाकर गरजते हुए बोले —

श्लोक 59 (8.98.59)

दृष्ट्वा तु कर्णं भुवि वा विपन्नं । कृत्तं रथात्सायकैरर्जुनस्य । महानिलेनाद्रिमिवापविद्धं । यज्ञावसानेऽग्निमिव प्रशान्तम् ॥

dṛṣṭvā tu karṇaṃ bhuvi vā vipannaṃ | kṛttaṃ rathātsāyakairarjunasya | mahānilenādrimivāpaviddhaṃ | yajñāvasāne'gnimiva praśāntam

कर्ण को भूमि पर गिरा देखकर, जो अर्जुन के बाणों से रथ से कटकर गिरा था — प्रचण्ड आँधी से उखाड़े गए पर्वत की तरह, यज्ञ की समाप्ति पर शान्त हुई अग्नि की तरह —

श्लोक 60 (8.98.60)

तदाननं सूर्यसुतस्य राजन् । विभ्राजते पद्ममिवावनालम् । रराज कर्णस्य शिरो निकृत्तम् । अस्तंगतं भास्करस्येव बिम्बम् ॥

tadānanaṃ sūryasutasya rājan | vibhrājate padmamivāvanālam | rarāja karṇasya śiro nikṛttam | astaṃgataṃ bhāskarasyeva bimbam

हे राजन्! सूर्यपुत्र का वह मुख नाल सहित कमल की तरह शोभा पा रहा था; कर्ण का कटा हुआ सिर अस्त हुए सूर्य के बिम्ब की भाँति दमक रहा था।

श्लोक 61 (8.98.61)

शरैराचितसर्वाङ्गः शोणितौघपरिप्लुतः । रराज देहः कर्णस्य स्वरश्मिभिरिवांशुमान् ॥

śarairācitasarvāṅgaḥ śoṇitaughapariplutaḥ | rarāja dehaḥ karṇasya svaraśmibhirivāṃśumān

सारे अंगों में बाण गड़े हुए और रक्त की धाराओं से भीगा हुआ कर्ण का शरीर अपनी किरणों से घिरे सूर्य की भाँति शोभित हो रहा था।

श्लोक 62 (8.98.62)

प्रताप्य सेनामामित्रीं दीप्तैः शरगभस्तिभिः । बलिनार्जुनकालेन नीतोऽस्तं कर्णभास्करः ॥

pratāpya senāmāmitrīṃ dīptaiḥ śaragabhastibhiḥ | balinārjunakālena nīto'staṃ karṇabhāskaraḥ

अपने बाणरूपी प्रज्वलित किरणों से शत्रु-सेना को तपाकर कर्णरूपी सूर्य को बलवान् अर्जुनरूपी काल अस्त की ओर ले गया।

श्लोक 63 (8.98.63)

अस्तं गच्छन्यथाऽदित्यः प्रभामादाय गच्छति । तथा जीवितमादाय कर्णस्येषुर्जगाम सः ॥

astaṃ gacchanyathā'dityaḥ prabhāmādāya gacchati | tathā jīvitamādāya karṇasyeṣurjagāma saḥ

जैसे अस्त होता सूर्य अपनी प्रभा लेकर चला जाता है, वैसे ही वह बाण कर्ण के प्राण लेकर चला गया।

श्लोक 64 (8.98.64)

अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतपुत्रस्य मारिष । छिन्नमञ्जलिकेनाजौ सोत्सेधमपतच्छिरः ॥

aparāhṇe'parāhṇasya sūtaputrasya māriṣa | chinnamañjalikenājau sotsedhamapatacchiraḥ

हे मान्यवर! जिस दिन सूतपुत्र का अन्तिम दिन था, उस दिन के अपराह्न में अञ्जलिक से कटा हुआ उसका ऊँचा सिर युद्ध में गिर पड़ा।

श्लोक 65 (8.98.65)

उपर्युपरि सैन्यानां विनिघ्नन्नितराञ्जनान् । शिरः कर्णस्य सोत्सेधमिषुः सोऽप्यहरद्द्रुतम् ॥

uparyupari sainyānāṃ vinighnannitarāñjanān | śiraḥ karṇasya sotsedhamiṣuḥ so'pyaharaddrutam

सेनाओं के ऊपर-ऊपर से अन्य जनों को मारते हुए जाते उस बाण ने कर्ण का ऊँचा सिर भी शीघ्र हर लिया।

श्लोक 66 (8.98.66)

कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां । शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् । दृष्ट्वा शयानं भुवि मद्रराजः । छिन्नध्वजेनाथ ययौ रथेन ॥

karṇaṃ tu śūraṃ patitaṃ pṛthivyāṃ | śarācitaṃ śoṇitadigdhagātram | dṛṣṭvā śayānaṃ bhuvi madrarājaḥ | chinnadhvajenātha yayau rathena

शूर कर्ण को पृथ्वी पर गिरा, बाणों से छिदा और रक्त से लथपथ अंगों वाला पड़ा देखकर मद्रराज कटी ध्वजा वाले रथ से चल पड़े।

श्लोक 67 (8.98.67)

हते कर्णे कुरवः प्राद्रवन्त । भयार्दिता गाढविद्धाश्च सङ्ख्ये । अवेक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य । ध्वजं महान्तं वपुषा ज्वलन्तम् ॥

hate karṇe kuravaḥ prādravanta | bhayārditā gāḍhaviddhāśca saṅkhye | avekṣamāṇā muhurarjunasya | dhvajaṃ mahāntaṃ vapuṣā jvalantam

कर्ण के मारे जाने पर कौरव भय से पीड़ित और युद्ध में गहरे घायल होकर भाग खड़े हुए, और अर्जुन की उस विशाल ध्वजा को, जो अपने रूप से ही जल रही-सी थी, बार-बार मुड़कर देखते रहे।

श्लोक 68 (8.98.68)

तच्छिरो भरतश्रेष्ठ शोभयामास मेदिनीम् । यदृच्छयेव पतितं मण्डलं चण्डदीधितेः ॥

tacchiro bharataśreṣṭha śobhayāmāsa medinīm | yadṛcchayeva patitaṃ maṇḍalaṃ caṇḍadīdhiteḥ

हे भरतश्रेष्ठ! वह सिर पृथ्वी की शोभा बढ़ा रहा था, मानो प्रचण्ड किरणों वाले सूर्य का मण्डल अपने आप गिर पड़ा हो।

श्लोक 69 (8.98.69)

तं दृष्ट्वा समरविमर्दलब्धनिद्रं । दष्टोष्ठं रुधिरपरीतकातराक्षम् । राधेयं रथवरपृष्ठसन्निषण्णं । हीनांशुर्दिवसकरो मुहूर्तमासीत् ॥

taṃ dṛṣṭvā samaravimardalabdhanidraṃ | daṣṭoṣṭhaṃ rudhiraparītakātarākṣam | rādheyaṃ rathavarapṛṣṭhasanniṣaṇṇaṃ | hīnāṃśurdivasakaro muhūrtamāsīt

युद्ध की उथल-पुथल में नींद पा चुके, होंठ दबाए, रक्त से घिरी कातर आँखों वाले, श्रेष्ठ रथ के पिछले भाग पर निढाल पड़े राधापुत्र को देखकर दिनकर एक क्षण के लिए किरणहीन हो गया।

श्लोक 70 (8.98.70)

निःशब्दतूर्यं हतयोधमुख्यं । प्रशान्तदर्पं धृतराष्ट्रसैन्यम् । न शोभते सूर्यसुतेन हीनं । वृन्दं ग्रहाणामिव चन्द्रहीनम् ॥

niḥśabdatūryaṃ hatayodhamukhyaṃ | praśāntadarpaṃ dhṛtarāṣṭrasainyam | na śobhate sūryasutena hīnaṃ | vṛndaṃ grahāṇāmiva candrahīnam

जिसके वाद्य मौन हो गए, प्रमुख योद्धा मारे गए और अहंकार शान्त हो गया, वह धृतराष्ट्र की सेना सूर्यपुत्र के बिना वैसे ही शोभित नहीं हुई, जैसे चन्द्रमा के बिना ग्रहों का समूह।

श्लोक 71 (8.98.71)

सहस्रनेत्रप्रतिमानकर्मणः । सहस्रपत्रप्रतिमाननं शुभम् । सहस्ररश्मिर्दिवसक्षये यथा । तथाऽपतत्कर्णशिरो वसुन्धराम् ॥

sahasranetrapratimānakarmaṇaḥ | sahasrapatrapratimānanaṃ śubham | sahasraraśmirdivasakṣaye yathā | tathā'patatkarṇaśiro vasundharām

जिसके कर्म सहस्रनेत्र इन्द्र के समान थे और जिसका सुन्दर मुख सहस्रदल कमल जैसा था, उस कर्ण का सिर दिन के अन्त में सहस्ररश्मि सूर्य की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 72 (8.98.72)

व्यूढोरस्कं कमलवदनं तप्तहेमावभासं । कर्णं दृष्ट्वा भुवि निपतितं पार्थबाणाभितप्तम् । पांसुग्रस्तं मलिनमसकृत्पुत्रमन्वीक्षमाणो । मन्दम्मन्दं व्रजति सविता मन्दिरं मन्दरश्मिः ॥

vyūḍhoraskaṃ kamalavadanaṃ taptahemāvabhāsaṃ | karṇaṃ dṛṣṭvā bhuvi nipatitaṃ pārthabāṇābhitaptam | pāṃsugrastaṃ malinamasakṛtputramanvīkṣamāṇo | mandammandaṃ vrajati savitā mandiraṃ mandaraśmiḥ

चौड़ी छाती वाले, कमल-मुख, तपे सोने की आभा वाले कर्ण को पार्थ के बाणों से सन्तप्त होकर भूमि पर गिरा, धूल से ढका और मलिन देखकर, बार-बार अपने पुत्र को निहारता हुआ सूर्य मन्द किरणों से धीरे-धीरे अपने घर की ओर जा रहा है।

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