सभा पर्व · अध्याय 40
शिशुपाल द्वारा कृष्ण की अग्रपूजा का विरोध
शिशुपाल आपत्ति करता है कि कृष्ण न राजा हैं, न वृद्ध, न आचार्य, न ऋत्विज; इसलिए वसुदेव, द्रुपद, द्रोण, व्यास, भीष्म, कर्ण और अन्य अनेक राजाओं के रहते वे अग्रपूजा के अधिकारी नहीं हो सकते। वह युधिष्ठिर पर चाटुकारिता का, भीष्म पर अविवेक का और कृष्ण पर अयोग्य सम्मान स्वीकार करने का आरोप लगाता है, जरासन्ध-वध को अपराध बताता है, और फिर अपने पक्ष के राजाओं के साथ सभा से निकल जाता है।
शिशुपाल उवाच
श्लोक 1 (2.40.1)
नायमर्हति वार्ष्णेयस्तिष्ठत्स्विह महात्मसु । महीपतिषु कौरव्य राजवत्पार्थिवार्हणम् ॥
nāyamarhati vārṣṇeyastiṣṭhatsviha mahātmasu | mahīpatiṣu kauravya rājavatpārthivārhaṇam
"हे कौरव्य, यहाँ महात्मा राजाओं के रहते यह वृष्णिवंशी राजा की तरह राजोचित सम्मान पाने का अधिकारी नहीं है।
श्लोक 2 (2.40.2)
नायं युक्तः समाचारः पाण्डवेषु महात्मसु । यत्कामाद्देवकीपुत्रं पाण्डवार्चितवानसि ॥
nāyaṃ yuktaḥ samācāraḥ pāṇḍaveṣu mahātmasu | yatkāmāddevakīputraṃ pāṇḍavārcitavānasi
महात्मा पाण्डवों के लिए यह आचरण उचित नहीं कि हे पाण्डव, तुमने केवल अपनी रुचि से देवकीपुत्र की पूजा की।
श्लोक 3 (2.40.3)
बाला यूयं न जानीध्वं धर्मः सूक्ष्मो हि पाण्डवाः । अयं तत्राभ्यतिक्रान्तो ह्यापगेयोऽल्पदर्शनः ॥
bālā yūyaṃ na jānīdhvaṃ dharmaḥ sūkṣmo hi pāṇḍavāḥ | ayaṃ tatrābhyatikrānto hyāpageyo'lpadarśanaḥ
हे पाण्डवो, तुम बालक हो, कुछ नहीं समझते, क्योंकि धर्म सूक्ष्म है। और यह अल्पदर्शी गंगापुत्र उसका उल्लंघन कर बैठा है।
श्लोक 4 (2.40.4)
त्वादृशो धर्मयुक्तो हि कुर्वाणः प्रियकाम्यया । भवत्यभ्यधिकं भीष्मो लोकेष्ववमतः सताम् ॥
tvādṛśo dharmayukto hi kurvāṇaḥ priyakāmyayā | bhavatyabhyadhikaṃ bhīṣmo lokeṣvavamataḥ satām
हे भीष्म, तुम्हारे जैसा धर्मनिष्ठ व्यक्ति जब किसी को प्रसन्न करने के लिए ऐसा करता है, तो वह सज्जनों की दृष्टि में और भी अधिक गिर जाता है।
श्लोक 5 (2.40.5)
कथं ह्यराजा दाशार्हो मध्ये सर्वमहीक्षिताम् । अर्हणामर्हति तथा यथा युष्माभिरर्चितः ॥
kathaṃ hyarājā dāśārho madhye sarvamahīkṣitām | arhaṇāmarhati tathā yathā yuṣmābhirarcitaḥ
जो राजा ही नहीं है, वह दाशार्ह समस्त राजाओं के बीच वैसे सम्मान का अधिकारी कैसे हो सकता है, जैसा तुम लोगों ने उसका किया है?
श्लोक 6 (2.40.6)
अथवा मन्यसे कृष्णं स्थविरं कुरुपुङ्गवः । वसुदेवे स्थिते वृद्धे कथमर्हति तत्सुतः ॥
athavā manyase kṛṣṇaṃ sthaviraṃ kurupuṅgavaḥ | vasudeve sthite vṛddhe kathamarhati tatsutaḥ
अथवा, हे कुरुश्रेष्ठ, यदि तुम कृष्ण को वृद्ध मानते हो, तो वृद्ध वसुदेव के रहते उनका पुत्र इसका अधिकारी कैसे हुआ?
श्लोक 7 (2.40.7)
अथवा वासुदेवोऽपि प्रियकामोऽनुवृत्तवान् । द्रुपदे तिष्ठति कथं माधवोऽर्हति पूजनम् ॥
athavā vāsudevo'pi priyakāmo'nuvṛttavān | drupade tiṣṭhati kathaṃ mādhavo'rhati pūjanam
अथवा यदि वासुदेव तुम्हारे हितैषी और अनुगामी हैं, तो द्रुपद के रहते माधव पूजा के अधिकारी कैसे हुए?
श्लोक 8 (2.40.8)
आचार्यं मन्यसे कृष्णमथवा कुरुनन्दन । द्रोणे तिष्ठति वार्ष्णेयं कस्मादर्चितवानसि ॥
ācāryaṃ manyase kṛṣṇamathavā kurunandana | droṇe tiṣṭhati vārṣṇeyaṃ kasmādarcitavānasi
अथवा, हे कुरुनन्दन, यदि तुम कृष्ण को आचार्य मानते हो, तो द्रोण के रहते तुमने वृष्णिवंशी की पूजा क्यों की?
श्लोक 9 (2.40.9)
ऋत्विजं मन्यसे कृष्णमथवा कुरुनन्दन । द्वैपायने स्थिते वृद्धे कथं कृष्णोऽर्चितस्त्वया ॥
ṛtvijaṃ manyase kṛṣṇamathavā kurunandana | dvaipāyane sthite vṛddhe kathaṃ kṛṣṇo'rcitastvayā
अथवा, हे कुरुनन्दन, यदि तुम कृष्ण को ऋत्विज मानते हो, तो वृद्ध द्वैपायन के रहते तुमने कृष्ण की पूजा कैसे की?
श्लोक 10 (2.40.10)
भीष्मे शान्तनवे राजन्स्थिते पुरुषसत्तमे । स्वच्छन्दमृत्युके राजन्कथं कृष्णोऽर्चितस्त्वया ॥
bhīṣme śāntanave rājansthite puruṣasattame | svacchandamṛtyuke rājankathaṃ kṛṣṇo'rcitastvayā
हे राजन्, जब पुरुषों में श्रेष्ठ, इच्छामृत्यु वाले शान्तनुनन्दन भीष्म यहाँ उपस्थित हैं, तब तुमने कृष्ण की पूजा कैसे की?
श्लोक 11 (2.40.11)
अश्वत्थाम्नि स्थिते वीरे सर्वशास्त्रविशारदे । कथं कृष्णस्त्वया राजन्नर्चितः कुरुनन्दन ॥
aśvatthāmni sthite vīre sarvaśāstraviśārade | kathaṃ kṛṣṇastvayā rājannarcitaḥ kurunandana
हे राजन्, हे कुरुनन्दन, जब सब शास्त्रों में निपुण वीर अश्वत्थामा यहाँ उपस्थित है, तब तुमने कृष्ण की पूजा कैसे की?
श्लोक 12 (2.40.12)
दुर्योधने च राजेन्द्रे स्थिते पुरुषसत्तमे । कृपे च भारताचार्ये कथं कृष्णस्त्वयाऽर्चितः ॥
duryodhane ca rājendre sthite puruṣasattame | kṛpe ca bhāratācārye kathaṃ kṛṣṇastvayā'rcitaḥ
जब पुरुषों में श्रेष्ठ राजराजेश्वर दुर्योधन और भरतवंशियों के आचार्य कृप यहाँ उपस्थित हैं, तब तुमने कृष्ण की पूजा कैसे की?
श्लोक 13 (2.40.13)
द्रुमं किम्पुरुषाचार्यमतिक्रम्य तथाऽर्चितः । भीष्मके चैव दुर्धर्षे पाण्डुवत्कृतलक्षणे ॥
drumaṃ kimpuruṣācāryamatikramya tathā'rcitaḥ | bhīṣmake caiva durdharṣe pāṇḍuvatkṛtalakṣaṇe
किम्पुरुषों के आचार्य द्रुम को लाँघकर उसकी पूजा की गई; और जब पाण्डु के समान प्रतिष्ठित, दुर्धर्ष भीष्मक यहाँ हैं,
श्लोक 14 (2.40.14)
नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च । शल्ये मद्राधिपे चैव कथं कृष्णस्त्वयार्चितः ॥
nṛpe ca rukmiṇi śreṣṭhe ekalavye tathaiva ca | śalye madrādhipe caiva kathaṃ kṛṣṇastvayārcitaḥ
और श्रेष्ठ राजा रुक्मी, एकलव्य तथा मद्रराज शल्य भी यहाँ हैं — तब तुमने कृष्ण की पूजा कैसे की?
श्लोक 15 (2.40.15)
अयं च सर्वराज्ञां वै बलश्लाघी महाबलः । जामदग्न्यस्य दयितः शिष्यो विप्रस्य भारत ॥
ayaṃ ca sarvarājñāṃ vai balaślāghī mahābalaḥ | jāmadagnyasya dayitaḥ śiṣyo viprasya bhārata
हे भारत, और यह जो सब राजाओं में अपने बल पर गर्व करने वाला महाबली है, ब्राह्मण जामदग्न्य (परशुराम) का प्रिय शिष्य,
श्लोक 16 (2.40.16)
येनात्मबलमाश्रित्य राजानो युधि निर्जिताः । तं च कर्णमतिक्रम्य कथं कृष्णस्त्वयार्चितः ॥
yenātmabalamāśritya rājāno yudhi nirjitāḥ | taṃ ca karṇamatikramya kathaṃ kṛṣṇastvayārcitaḥ
जिसने अपने ही बल के भरोसे युद्ध में राजाओं को जीता है — उस कर्ण को लाँघकर तुमने कृष्ण की पूजा कैसे की?
श्लोक 17 (2.40.17)
नैवर्त्विङ्नैव चाचार्यो न राजा मधुसूदनः । अर्चितश्च कुरुश्रेष्ठ किमन्यत्प्रियकाम्यया ॥
naivartviṅnaiva cācāryo na rājā madhusūdanaḥ | arcitaśca kuruśreṣṭha kimanyatpriyakāmyayā
मधुसूदन न ऋत्विज हैं, न आचार्य, न राजा; फिर भी, हे कुरुश्रेष्ठ, तुमने उनकी पूजा की। यह केवल उन्हें प्रसन्न करने की इच्छा के अतिरिक्त और क्या है?
श्लोक 18 (2.40.18)
अथवाऽभ्यर्चनीयोऽयं युष्माकं मधुसूदनः । किं राजभिरिहानीतैरवमानाय भारत ॥
athavā'bhyarcanīyo'yaṃ yuṣmākaṃ madhusūdanaḥ | kiṃ rājabhirihānītairavamānāya bhārata
अथवा यदि मधुसूदन ही तुम्हारे लिए पूजनीय हैं, तो हे भारत, राजाओं को यहाँ बुलाकर उनका अपमान क्यों किया?
श्लोक 19 (2.40.19)
वयं तु न भयादस्य कौन्तेयस्य महात्मनः । प्रयच्छामः करान्सर्वे न लोभान्न च सान्त्वनात् ॥
vayaṃ tu na bhayādasya kaunteyasya mahātmanaḥ | prayacchāmaḥ karānsarve na lobhānna ca sāntvanāt
हम सब इस महात्मा कुन्तीपुत्र को कर न तो उसके भय से देते हैं, न लोभ से और न उसकी मीठी बातों के कारण।
श्लोक 20 (2.40.20)
अस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः । करानस्मै प्रयच्छामः सोऽयमस्मान्न मन्यते ॥
asya dharmapravṛttasya pārthivatvaṃ cikīrṣataḥ | karānasmai prayacchāmaḥ so'yamasmānna manyate
हम इसे कर इसलिए देते हैं कि यह धर्म में प्रवृत्त है और सम्राट बनना चाहता है; और अब यही हमें कुछ नहीं समझता।
श्लोक 21 (2.40.21)
किमन्यदवमानाद्धि यदेनं राजसंसदि । अप्राप्तलक्षणं कृष्णमर्घ्येणार्चितवानसि ॥
kimanyadavamānāddhi yadenaṃ rājasaṃsadi | aprāptalakṣaṇaṃ kṛṣṇamarghyeṇārcitavānasi
यह अपमान नहीं तो और क्या है कि राजाओं की इस सभा में तुमने राजचिह्नों से रहित कृष्ण का अर्घ्य से पूजन किया?
श्लोक 22 (2.40.22)
अकस्माद्धर्मपुत्रस्य धर्मात्मेति यशो गतम् । को हि धर्मच्युते पूजामेवं युक्तां नियोजयेत् ॥
akasmāddharmaputrasya dharmātmeti yaśo gatam | ko hi dharmacyute pūjāmevaṃ yuktāṃ niyojayet
धर्मपुत्र को धर्मात्मा होने का यश व्यर्थ ही मिला है। भला कौन धर्म से गिरे हुए व्यक्ति की इस प्रकार पूजा करेगा —
श्लोक 23 (2.40.23)
योऽयं वृष्णिकुले जातो राजानं हतवान्पुरा । जरासन्धं महात्मानमन्यायेन दुरात्मवान् ॥
yo'yaṃ vṛṣṇikule jāto rājānaṃ hatavānpurā | jarāsandhaṃ mahātmānamanyāyena durātmavān
इस व्यक्ति की, जिसने वृष्णिकुल में जन्म लेकर पहले महात्मा राजा जरासन्ध को दुष्टतापूर्वक अन्याय से मार डाला?
श्लोक 24 (2.40.24)
अद्य धर्मात्मता चैव व्यपकृष्टा युधिष्ठिरात् । दर्शितं कृपणत्वं च कृष्णेऽर्घ्यस्य निवेदनात् ॥
adya dharmātmatā caiva vyapakṛṣṭā yudhiṣṭhirāt | darśitaṃ kṛpaṇatvaṃ ca kṛṣṇe'rghyasya nivedanāt
आज युधिष्ठिर से धर्मात्मा होने का गौरव छिन गया, और कृष्ण को अर्घ्य देकर उसने अपनी दीनता प्रकट कर दी।
श्लोक 25 (2.40.25)
यदि भीताश्च कौन्तेयाः कृपणाश्च तपस्विनः । ननु त्वयाऽपि बोद्धव्यं यां पूजां माधवार्हसि ॥
yadi bhītāśca kaunteyāḥ kṛpaṇāśca tapasvinaḥ | nanu tvayā'pi boddhavyaṃ yāṃ pūjāṃ mādhavārhasi
यदि कुन्तीपुत्र डरपोक, दीन और बेचारे हैं, तो हे माधव, तुम्हें तो स्वयं समझना चाहिए था कि तुम किस पूजा के योग्य हो।
श्लोक 26 (2.40.26)
अथवा कृपणैरेतामुपनीतां जनार्दन । पूजामनर्हः कस्मात्त्वमभ्यनुज्ञातवानसि ॥
athavā kṛpaṇairetāmupanītāṃ janārdana | pūjāmanarhaḥ kasmāttvamabhyanujñātavānasi
अथवा, हे जनार्दन, अयोग्य होते हुए भी तुमने इन दीनों द्वारा दी गई इस पूजा को स्वीकार क्यों किया?
श्लोक 27 (2.40.27)
अयुक्तामात्मनः पूजां त्वं पुनर्बहुमन्यसे । हविषः प्राप्य निष्यन्दं प्राशिता श्वेव निर्जने ॥
ayuktāmātmanaḥ pūjāṃ tvaṃ punarbahumanyase | haviṣaḥ prāpya niṣyandaṃ prāśitā śveva nirjane
जो पूजा तुम्हारे योग्य नहीं, उसे तुम बहुत बड़ी बात मान रहे हो, जैसे कोई कुत्ता हवि की कुछ बूँदें पाकर एकान्त में उन्हें चाट जाता है।
श्लोक 28 (2.40.28)
न त्वयं पार्थिवेन्द्राणामपमानः प्रयुज्यते । त्वामेव कुरवो व्यक्तं प्रलम्भन्ते जनार्दन ॥
na tvayaṃ pārthivendrāṇāmapamānaḥ prayujyate | tvāmeva kuravo vyaktaṃ pralambhante janārdana
इससे राजाओं का कोई अपमान नहीं होता; हे जनार्दन, स्पष्ट है कि कुरुवंशी तुम्हें ही मूर्ख बना रहे हैं।
श्लोक 29 (2.40.29)
क्लीबे दारक्रिया यादृगन्धे वा रूपदर्शनम् । अराज्ञो राजवत्पूजा तथा ते मधुसूदन ॥
klībe dārakriyā yādṛgandhe vā rūpadarśanam | arājño rājavatpūjā tathā te madhusūdana
हे मधुसूदन, जैसे नपुंसक का विवाह या अन्धे को रूप दिखाना, वैसे ही राजा न होते हुए तुम्हारी यह राजोचित पूजा है।
श्लोक 30 (2.40.30)
दृष्टो युधिष्ठिरो राजा दृष्टो भीष्मश्च यादृशः । वासुदेवोऽप्ययं दृष्टः सर्वमेतद्यथातथम् ॥
dṛṣṭo yudhiṣṭhiro rājā dṛṣṭo bhīṣmaśca yādṛśaḥ | vāsudevo'pyayaṃ dṛṣṭaḥ sarvametadyathātatham
हमने राजा युधिष्ठिर को देख लिया, भीष्म कैसे हैं यह भी देख लिया, और इस वासुदेव को भी देख लिया — सब कुछ जैसा है वैसा ही।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (2.40.31)
इत्युक्त्वा शिशुपालस्तानुत्थाय परमासनात् । निर्ययौ सदसस्तस्मात्सहितो राजभिस्तदा ॥
ityuktvā śiśupālastānutthāya paramāsanāt | niryayau sadasastasmātsahito rājabhistadā
उनसे ऐसा कहकर शिशुपाल अपने उत्तम आसन से उठा और राजाओं के साथ उस सभा से बाहर निकल गया।