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सभा पर्व · अध्याय 41

भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन

युधिष्ठिर शिशुपाल को मनाने का प्रयत्न करते हैं और कहते हैं कि भीष्म कृष्ण को उससे कहीं अधिक जानते हैं। भीष्म उसे मनाने से इनकार करते हैं और बताते हैं कि कृष्ण की अग्रपूजा क्यों हुई: उन्होंने उपस्थित राजाओं को जीता है, वे ज्ञान और बल दोनों में श्रेष्ठ हैं और सब गुणों से सम्पन्न हैं। फिर भीष्म कृष्ण को लोकों की उत्पत्ति और प्रलय, समस्त तत्त्वों का आधार घोषित करते हैं, और शिशुपाल को चुनौती देते हैं कि यदि वह इस पूजा को अनुचित मानता है तो जो चाहे करे।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.41.1)

ततो युधिष्ठिरो राजा शिशुपालमुपाद्रवत् । उवाच चैनं मधुरं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā śiśupālamupādravat | uvāca cainaṃ madhuraṃ sāntvapūrvamidaṃ vacaḥ

तब राजा युधिष्ठिर दौड़कर शिशुपाल के पास गए और उससे मधुर, सान्त्वनापूर्ण वचन बोले —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (2.41.2)

नेदं युक्तं महीपाल यादृशं वै त्वमुक्तवान् । अधर्मश्च परो राजन्पारुष्यं च निरर्थकम् ॥

nedaṃ yuktaṃ mahīpāla yādṛśaṃ vai tvamuktavān | adharmaśca paro rājanpāruṣyaṃ ca nirarthakam

"हे राजन्, तुमने जो कहा, वह उचित नहीं है। ऐसी कठोरता व्यर्थ है और बड़ा अधर्म है।

श्लोक 3 (2.41.3)

न हि धर्मं परं जातु नावबुध्येत पार्थिवः । भीष्मः शान्तनवस्त्वेनं मावमंस्थास्त्वमन्यथा ॥

na hi dharmaṃ paraṃ jātu nāvabudhyeta pārthivaḥ | bhīṣmaḥ śāntanavastvenaṃ māvamaṃsthāstvamanyathā

शान्तनुनन्दन भीष्म ऐसे राजा हैं जो परम धर्म को न समझें, ऐसा कभी नहीं हो सकता; तुम उनके विषय में अन्यथा मत सोचो।

श्लोक 4 (2.41.4)

पश्य चैतान्महीपालांस्त्वत्तो वृद्धतरान्बहून् । मृष्यन्ते चार्हणां कृष्णे तद्वत्त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥

paśya caitānmahīpālāṃstvatto vṛddhatarānbahūn | mṛṣyante cārhaṇāṃ kṛṣṇe tadvattvaṃ kṣantumarhasi

इन बहुत-से राजाओं को देखो, जो तुमसे कहीं अधिक वृद्ध हैं; वे कृष्ण की पूजा को स्वीकार कर रहे हैं। तुम्हें भी उसी प्रकार इसे सह लेना चाहिए।

श्लोक 5 (2.41.5)

वेद तत्त्वेन कृष्णं हि भीष्मश्चेदिपते भृशम् । न ह्येनं त्वं तथा वेत्थ यथैनं वेद कौरवः ॥

veda tattvena kṛṣṇaṃ hi bhīṣmaścedipate bhṛśam | na hyenaṃ tvaṃ tathā vettha yathainaṃ veda kauravaḥ

हे चेदिराज, भीष्म कृष्ण को तत्त्व से भली-भाँति जानते हैं; तुम उन्हें वैसा नहीं जानते जैसा कुरुवंशी भीष्म जानते हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (2.41.6)

नास्मै देयो ह्यनुनयो नायमर्हति सान्त्वनम् । लोकवृद्धतमे कृष्णे योऽर्हणां नाभिमन्यते ॥

nāsmai deyo hyanunayo nāyamarhati sāntvanam | lokavṛddhatame kṛṣṇe yo'rhaṇāṃ nābhimanyate

"जो लोक में सबसे अधिक पूजनीय कृष्ण की पूजा को स्वीकार नहीं करता, वह न अनुनय के योग्य है, न सान्त्वना के।

श्लोक 7 (2.41.7)

क्षत्रियः क्षत्रियं जित्वा रणे रणकृतां वरः । यो मुञ्चति वशे कृत्वा गुरुर्भवति तस्य सः ॥

kṣatriyaḥ kṣatriyaṃ jitvā raṇe raṇakṛtāṃ varaḥ | yo muñcati vaśe kṛtvā gururbhavati tasya saḥ

जो योद्धाओं में श्रेष्ठ क्षत्रिय किसी दूसरे क्षत्रिय को युद्ध में जीतकर, वश में करके छोड़ देता है, वह उसका गुरु हो जाता है।

श्लोक 8 (2.41.8)

अस्यां हि समितौ राज्ञामेकमप्यजितं युधि । न पश्यामि महीपालं सात्वतीपुत्रतेजसा ॥

asyāṃ hi samitau rājñāmekamapyajitaṃ yudhi | na paśyāmi mahīpālaṃ sātvatīputratejasā

राजाओं की इस सभा में मुझे एक भी ऐसा राजा नहीं दिखता, जिसे सात्वती (देवकी) के पुत्र ने अपने तेज से युद्ध में न जीता हो।

श्लोक 9 (2.41.9)

न हि केवलमस्माकमयमर्च्यतमोऽच्युतः । त्रयाणामपि लोकानामर्चनीयो महाभुजः ॥

na hi kevalamasmākamayamarcyatamo'cyutaḥ | trayāṇāmapi lokānāmarcanīyo mahābhujaḥ

अच्युत केवल हमारे लिए ही परम पूजनीय नहीं हैं; वे महाबाहु तीनों लोकों के लिए पूजनीय हैं।

श्लोक 10 (2.41.10)

कृष्णेन हि जिता युद्धे बहवः क्षत्रियर्षभाः । जगत्सर्वं च वार्ष्णेये निखिलेन प्रतिष्ठितम् ॥

kṛṣṇena hi jitā yuddhe bahavaḥ kṣatriyarṣabhāḥ | jagatsarvaṃ ca vārṣṇeye nikhilena pratiṣṭhitam

कृष्ण ने युद्ध में बहुत-से श्रेष्ठ क्षत्रियों को जीता है, और सारा जगत पूर्ण रूप से उन वृष्णिवंशी में ही प्रतिष्ठित है।

श्लोक 11 (2.41.11)

तस्मात्सत्स्वपि वृद्धेषु कृष्णमर्चाम नेतरान् । एवं वक्तुं न चार्हस्त्वं मा तेऽभूद्बुद्धिरीदृशी ॥

tasmātsatsvapi vṛddheṣu kṛṣṇamarcāma netarān | evaṃ vaktuṃ na cārhastvaṃ mā te'bhūdbuddhirīdṛśī

इसीलिए वृद्धों के रहते हुए भी हम कृष्ण की ही पूजा करते हैं, दूसरों की नहीं। तुम्हें ऐसा कहना शोभा नहीं देता; तुम्हारी बुद्धि ऐसी न हो।

श्लोक 12 (2.41.12)

ज्ञानवृद्धा मया राजन्बहवः पर्युपासिताः । यस्य राजन्प्रभावज्ञाः पुरा सर्वे च रक्षिताः । तेषां कथयतां शौरेरहं गुणवतो गुणान् ॥

jñānavṛddhā mayā rājanbahavaḥ paryupāsitāḥ | yasya rājanprabhāvajñāḥ purā sarve ca rakṣitāḥ | teṣāṃ kathayatāṃ śaurerahaṃ guṇavato guṇān

हे राजन्, मैंने ज्ञान में बढ़े हुए बहुत-से वृद्धों की सेवा की है — जो उनके प्रभाव को जानते थे और जिनकी उन्होंने पहले रक्षा की थी; जब वे गुणवान शौरि के गुणों का वर्णन करते थे,

श्लोक 13 (2.41.13)

समागतानामश्रौषं बहून्बहुमतान्सताम् । कर्माण्यपि च यान्यस्य जन्मप्रभृति धीमतः ॥

samāgatānāmaśrauṣaṃ bahūnbahumatānsatām | karmāṇyapi ca yānyasya janmaprabhṛti dhīmataḥ

जब वे बहुत-से सम्मानित सज्जन एकत्र होते थे, तब मैंने उनसे यह सुना; और जन्म से लेकर अब तक उन बुद्धिमान के जो कर्म हैं,

श्लोक 14 (2.41.14)

बहुशः कथ्यमानानि नरैर्भूयः श्रुतानि मे । न केवलं वयं कामाच्चेदिराज जनार्दनम् ॥

bahuśaḥ kathyamānāni narairbhūyaḥ śrutāni me | na kevalaṃ vayaṃ kāmāccedirāja janārdanam

जिनका लोग बार-बार वर्णन करते हैं, वे मैंने बार-बार सुने हैं। हे चेदिराज, हम जनार्दन की पूजा किसी मनमानी से नहीं करते,

श्लोक 15 (2.41.15)

न सम्बन्धं पुरस्कृत्य कृतार्थं वा कथञ्चन । अर्चामहेऽर्चितं सद्भिर्भुवि भूतसुखावहम् ॥

na sambandhaṃ puraskṛtya kṛtārthaṃ vā kathañcana | arcāmahe'rcitaṃ sadbhirbhuvi bhūtasukhāvaham

न सम्बन्ध को आगे रखकर और न किसी उपकार के बदले। हम उनकी पूजा करते हैं, जिन्हें सज्जन पूजते हैं और जो पृथ्वी पर प्राणियों को सुख देने वाले हैं।

श्लोक 16 (2.41.16)

यशः शौर्यं जयं चास्य विज्ञायार्चां प्रयुञ्ज्महे । न च कश्चिदिहास्माभिः सुबालोऽप्यपरीक्षितः ॥

yaśaḥ śauryaṃ jayaṃ cāsya vijñāyārcāṃ prayuñjmahe | na ca kaścidihāsmābhiḥ subālo'pyaparīkṣitaḥ

उनके यश, शौर्य और विजय को जानकर ही हम उनकी पूजा करते हैं। यहाँ ऐसा कोई नहीं, छोटा बालक भी नहीं, जिसकी हमने परख न की हो।

श्लोक 17 (2.41.17)

गुणैर्वृद्धानतिक्रम्य हरिरर्च्यतमो मतः । ज्ञानवृद्धो द्विजातीनां क्षत्रियाणां बलाधिकः ॥

guṇairvṛddhānatikramya harirarcyatamo mataḥ | jñānavṛddho dvijātīnāṃ kṣatriyāṇāṃ balādhikaḥ

गुणों में बड़े लोगों को भी लाँघकर हरि को सबसे अधिक पूजनीय माना गया है। ब्राह्मणों में ज्ञान से बड़ा पूज्य होता है, क्षत्रियों में बल से बढ़ा हुआ;

श्लोक 18 (2.41.18)

वैश्यानां धान्यधनवाञ्शूद्राणामेव जन्मतः । पूज्यतायां च गोविन्दे हेतू द्वावपि संस्थितौ ॥

vaiśyānāṃ dhānyadhanavāñśūdrāṇāmeva janmataḥ | pūjyatāyāṃ ca govinde hetū dvāvapi saṃsthitau

वैश्यों में धन-धान्य से सम्पन्न, और शूद्रों में केवल जन्म (आयु) से। गोविन्द में पूज्यता के ये दोनों कारण (ज्ञान और बल) विद्यमान हैं।

श्लोक 19 (2.41.19)

वेदवेदाङ्गविज्ञानं बलं चाभ्यधिकं तथा । नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवादृते ॥

vedavedāṅgavijñānaṃ balaṃ cābhyadhikaṃ tathā | nṛṇāṃ loke hi ko'nyo'sti viśiṣṭaḥ keśavādṛte

वेद-वेदांगों का ज्ञान और अतुलनीय बल — मनुष्यों के लोक में केशव के सिवा और कौन इनमें बढ़कर है?

श्लोक 20 (2.41.20)

दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं ह्रीः कीर्तिर्बुद्धिरुत्तमा । संनतिः श्रीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्च नियताऽच्युते ॥

dānaṃ dākṣyaṃ śrutaṃ śauryaṃ hrīḥ kīrtirbuddhiruttamā | saṃnatiḥ śrīrdhṛtistuṣṭiḥ puṣṭiśca niyatā'cyute

दान, दक्षता, शास्त्रज्ञान, शौर्य, लज्जा, कीर्ति, उत्तम बुद्धि, विनय, श्री, धैर्य, सन्तोष और पुष्टि — ये सब अच्युत में सदा स्थित हैं।

श्लोक 21 (2.41.21)

तमिमं लोकसम्पन्नमाचार्यं पितरं गुरुम् । अर्घ्यमर्चितमर्चामः सर्वे सङ्क्षन्तुमर्हथ ॥

tamimaṃ lokasampannamācāryaṃ pitaraṃ gurum | arghyamarcitamarcāmaḥ sarve saṅkṣantumarhatha

वे संसार के सब गुणों से सम्पन्न हैं, हमारे आचार्य, पिता और गुरु हैं, अर्घ्य के योग्य और पहले से पूजित हैं; हम उनकी पूजा करते हैं। आप सबको इसे सहन करना चाहिए।

श्लोक 22 (2.41.22)

ऋत्विग्गुरुर्विवाह्यश्च स्नातको नृपतिः प्रियः । सर्वमेतद्धृषीकेशस्तस्मादभ्यर्चितोऽच्युतः ॥

ṛtviggururvivāhyaśca snātako nṛpatiḥ priyaḥ | sarvametaddhṛṣīkeśastasmādabhyarcito'cyutaḥ

ऋत्विज, गुरु, विवाह-सम्बन्ध के योग्य, स्नातक, राजा और प्रिय मित्र — हृषीकेश ये सब कुछ हैं; इसीलिए अच्युत की पूजा की गई है।

श्लोक 23 (2.41.23)

कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः । कृष्णस्य हि कृते विश्वमिदं भूतं चराचरम् ॥

kṛṣṇa eva hi lokānāmutpattirapi cāpyayaḥ | kṛṣṇasya hi kṛte viśvamidaṃ bhūtaṃ carācaram

कृष्ण ही लोकों की उत्पत्ति और प्रलय हैं; कृष्ण के लिए ही यह सम्पूर्ण चराचर विश्व है।

श्लोक 24 (2.41.24)

एष प्रकृतिरव्यक्ता कर्ता चैव सनातनः । परश्च सर्वभूतेभ्यस्तस्मात्पूज्यतमोऽच्युतः ॥

eṣa prakṛtiravyaktā kartā caiva sanātanaḥ | paraśca sarvabhūtebhyastasmātpūjyatamo'cyutaḥ

वे अव्यक्त प्रकृति हैं, सनातन कर्ता हैं और सब प्राणियों से परे हैं; इसलिए अच्युत सबसे अधिक पूजनीय हैं।

श्लोक 25 (2.41.25)

बुद्धिर्मनो महद्वायुस्तेजोऽम्भः खं मही च या । चतुर्विधं च यद्भूतं सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ॥

buddhirmano mahadvāyustejo'mbhaḥ khaṃ mahī ca yā | caturvidhaṃ ca yadbhūtaṃ sarvaṃ kṛṣṇe pratiṣṭhitam

बुद्धि, मन, महत्तत्त्व, वायु, तेज, जल, आकाश और पृथ्वी, तथा चार प्रकार के जन्म वाले सब प्राणी — सब कुछ कृष्ण में प्रतिष्ठित है।

श्लोक 26 (2.41.26)

आदित्यश्चन्द्रमाश्चैव नक्षत्राणि ग्रहाश्च ये । दिशश्च विदिशश्चैव सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ॥

ādityaścandramāścaiva nakṣatrāṇi grahāśca ye | diśaśca vidiśaścaiva sarvaṃ kṛṣṇe pratiṣṭhitam

सूर्य और चन्द्रमा, नक्षत्र और ग्रह, दिशाएँ और उपदिशाएँ — सब कुछ कृष्ण में प्रतिष्ठित है।

श्लोक 27 (2.41.27)

एष रुद्रश्च सर्वात्मा ब्रह्मा चैव सनातनः । अक्षरं क्षररूपेण मानुषत्वमुपागतः ॥

eṣa rudraśca sarvātmā brahmā caiva sanātanaḥ | akṣaraṃ kṣararūpeṇa mānuṣatvamupāgataḥ

वही सबके आत्मा रुद्र हैं और वही सनातन ब्रह्मा हैं; वे अविनाशी होकर भी नश्वर रूप में मनुष्यत्व को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 28 (2.41.28)

अग्निहोत्रमुखा वेदा गायत्री च्छन्दसां मुखम् । राजा मुखं मनुष्याणां नदीनां सागरो मुखम् ॥

agnihotramukhā vedā gāyatrī cchandasāṃ mukham | rājā mukhaṃ manuṣyāṇāṃ nadīnāṃ sāgaro mukham

वेदों में अग्निहोत्र प्रधान है, छन्दों में गायत्री, मनुष्यों में राजा और नदियों में सागर;

श्लोक 29 (2.41.29)

नक्षत्राणां मुखं चन्द्र आदित्यस्तेजसां मुखम् । पर्वतानां मुखं मेरुर्गरुडः पततां मुखम् ॥

nakṣatrāṇāṃ mukhaṃ candra ādityastejasāṃ mukham | parvatānāṃ mukhaṃ merurgaruḍaḥ patatāṃ mukham

नक्षत्रों में चन्द्रमा प्रधान है, ज्योतियों में सूर्य, पर्वतों में मेरु और पक्षियों में गरुड़;

श्लोक 30 (2.41.30)

ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव यावती जगतो गतिः । सदेवकेषु लोकेषु भगवान्केशवो मुखम् ॥

ūrdhvaṃ tiryagadhaścaiva yāvatī jagato gatiḥ | sadevakeṣu lokeṣu bhagavānkeśavo mukham

और ऊपर, तिरछे और नीचे, जहाँ तक जगत की गति है, देवताओं सहित सब लोकों में भगवान केशव ही प्रधान हैं।

श्लोक 31 (2.41.31)

अयं तु पुरुषो बालः शिशुपालो न बुध्यते । सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभाषते ॥

ayaṃ tu puruṣo bālaḥ śiśupālo na budhyate | sarvatra sarvadā kṛṣṇaṃ tasmādevaṃ prabhāṣate

परन्तु यह शिशुपाल बालक है; यह नहीं समझता कि कृष्ण सर्वत्र और सर्वदा हैं, इसीलिए ऐसा बोल रहा है।

श्लोक 32 (2.41.32)

यो हि धर्मं विचिनुयादुत्कृष्टं मतिमान्नरः । स वै पश्येद्यथा धर्मं न तथा चेदिराडयम् ॥

yo hi dharmaṃ vicinuyādutkṛṣṭaṃ matimānnaraḥ | sa vai paśyedyathā dharmaṃ na tathā cedirāḍayam

जो बुद्धिमान मनुष्य उत्तम धर्म का विचार करता है, वह धर्म को जैसा है वैसा देखता है; यह चेदिराज वैसा नहीं देखता।

श्लोक 33 (2.41.33)

सवृद्धबालेष्वथवा पार्थिवेषु महात्मसु । को नार्हं मन्यते कृष्णं को वाप्येनं न पूजयेत् ॥

savṛddhabāleṣvathavā pārthiveṣu mahātmasu | ko nārhaṃ manyate kṛṣṇaṃ ko vāpyenaṃ na pūjayet

यहाँ के वृद्ध और युवा महात्मा राजाओं में कौन कृष्ण को योग्य नहीं मानता, या कौन उनकी पूजा नहीं करेगा?

श्लोक 34 (2.41.34)

अथैनां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति । दुष्कृतायां यथान्यायं तथाऽयं कर्तुमर्हति ॥

athaināṃ duṣkṛtāṃ pūjāṃ śiśupālo vyavasyati | duṣkṛtāyāṃ yathānyāyaṃ tathā'yaṃ kartumarhati

यदि शिशुपाल इस पूजा को अनुचित मानता है, तो अनुचित कार्य के विषय में जो न्यायसंगत हो, वह करे।"

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42