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सभा पर्व · अध्याय 43

भीष्म द्वारा नारायण और सृष्टि का वर्णन

राजाओं की सभा में युधिष्ठिर भीष्म से कृष्ण के कर्मों, अवतारों और वास्तविक स्वरूप का विस्तार से वर्णन करने को कहते हैं। चेदिराज को शान्त करके भीष्म बताते हैं कि सहस्र सिरों वाले आदिपुरुष नारायण ने सबसे पहले जल की और उसमें ब्रह्मा की सृष्टि की, और हर महाप्रलय में सब कुछ उन्हीं में लीन हो जाता है, क्योंकि सारे देवता उनके ही अंग हैं। सृष्टि और प्रलय पहिये की भाँति घूमते रहते हैं, और सबके प्रपितामह नारायण लोकों के कल्याण के लिए क्षीरसागर में निवास करते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.43.1)

ततो भीष्मस्य तच्छ्रुत्वा वचः काले युधिष्ठिरः । ज्ञापनार्थाय सर्वेषां भीष्मं पुनरथाब्रवीत् ॥

tato bhīṣmasya tacchrutvā vacaḥ kāle yudhiṣṭhiraḥ | jñāpanārthāya sarveṣāṃ bhīṣmaṃ punarathābravīt

तब उस समय भीष्म के वचन सुनकर युधिष्ठिर ने, ताकि सब उपस्थित लोग जान सकें, भीष्म से फिर कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (2.43.2)

विस्तरेणास्य देवस्य कर्माणीच्छामि सर्वशः । श्रोतुं भगवतस्तानि प्रब्रवीहि पितामह ॥

vistareṇāsya devasya karmāṇīcchāmi sarvaśaḥ | śrotuṃ bhagavatastāni prabravīhi pitāmaha

"पितामह, मैं इन भगवान् के सभी कर्मों को विस्तार से सुनना चाहता हूँ। उन्हें मुझे बताइए।

श्लोक 3 (2.43.3)

कर्मणामानुपूर्वा च प्रादुर्भावाश्च ये विभोः । यथा च प्रकृतिः कृष्णे तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

karmaṇāmānupūrvā ca prādurbhāvāśca ye vibhoḥ | yathā ca prakṛtiḥ kṛṣṇe tanme brūhi pitāmaha

पितामह, उन सर्वव्यापी प्रभु के कर्मों का क्रम, उनके जो-जो अवतार हुए हैं, और कृष्ण का वास्तविक स्वरूप क्या है — यह सब मुझे बताइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (2.43.4)

एवमुक्तस्तदा भीष्मः प्रोवाच भरतर्षभ । युधिष्ठिरममित्रघ्नं तस्मिन्राजसमागमे ॥

evamuktastadā bhīṣmaḥ provāca bharatarṣabha | yudhiṣṭhiramamitraghnaṃ tasminrājasamāgame

हे भरतश्रेष्ठ, ऐसा पूछे जाने पर भीष्म ने राजाओं के उस समागम में शत्रुनाशक युधिष्ठिर से कहा।

श्लोक 5 (2.43.5)

समक्षं वासुदेवस्य देवस्येव शतक्रतोः । कर्माण्यसुकराण्यन्यैराचचक्षे जनाधिप ॥

samakṣaṃ vāsudevasya devasyeva śatakratoḥ | karmāṇyasukarāṇyanyairācacakṣe janādhipa

हे जनाधिप, वासुदेव के सामने — मानो सौ यज्ञ करने वाले इन्द्र के सामने — उन्होंने ऐसे कर्मों का वर्णन किया जो दूसरों के लिए करना कठिन है,

श्लोक 6 (2.43.6)

शृण्वतां पार्थिवानां च धर्मराजस्य चान्तिके । इदं मतिमतां श्रेष्ठः कृष्णं प्रति विशाम्पते ॥

śṛṇvatāṃ pārthivānāṃ ca dharmarājasya cāntike | idaṃ matimatāṃ śreṣṭhaḥ kṛṣṇaṃ prati viśāmpate

जब राजा सुन रहे थे और धर्मराज भी पास ही थे। हे प्रजापालक, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भीष्म ने कृष्ण के विषय में यह कहा।

श्लोक 7 (2.43.7)

साम्नैवामन्त्र्य राजेन्द्र चेदिराजमरिन्दमम् । भीमकर्मा ततो भीष्मो भूयः स इदमब्रवीत् ॥

sāmnaivāmantrya rājendra cedirājamarindamam | bhīmakarmā tato bhīṣmo bhūyaḥ sa idamabravīt

हे राजेन्द्र, पहले शत्रुदमन चेदिराज को मधुर वचनों से शान्त करके, भयंकर पराक्रम वाले भीष्म ने फिर यह कहा।

श्लोक 8 (2.43.8)

कुरूणामपि राजानं युधिष्ठिरमभाषत ॥

kurūṇāmapi rājānaṃ yudhiṣṭhiramabhāṣata

उन्होंने कुरुराज युधिष्ठिर से कहा —

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (2.43.9)

वर्तमानामतीतां च शृणु राजन्युधिष्ठिर ॥

vartamānāmatītāṃ ca śṛṇu rājanyudhiṣṭhira

हे राजा युधिष्ठिर, वर्तमान और अतीत की बात सुनो —

श्लोक 10 (2.43.10)

ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम् । अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान्प्रभुः ॥

īśvarasyottamasyaināṃ karmaṇāṃ gahanāṃ gatim | avyakto vyaktaliṅgastho ya eṣa bhagavānprabhuḥ

उन परमेश्वर के कर्मों की इस गूढ़ गति को सुनो, जो अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त रूप में स्थित ये भगवान् प्रभु हैं।

श्लोक 11 (2.43.11)

पुरा नारायणो देवः स्वयम्भूः प्रपितामहः । सहस्रशीर्षः पुरुषो ध्रुवोऽनन्तः सनातनः ॥

purā nārāyaṇo devaḥ svayambhūḥ prapitāmahaḥ | sahasraśīrṣaḥ puruṣo dhruvo'nantaḥ sanātanaḥ

आदि में देव नारायण थे — स्वयम्भू, सबके प्रपितामह; सहस्र सिरों वाले पुरुष, ध्रुव, अनन्त और सनातन;

श्लोक 12 (2.43.12)

सहस्रास्यः सहस्राक्षः सहस्रचरणो विभुः । सहस्रबाहुः सर्वज्ञो देवो नामसहस्रवान् ॥

sahasrāsyaḥ sahasrākṣaḥ sahasracaraṇo vibhuḥ | sahasrabāhuḥ sarvajño devo nāmasahasravān

सहस्र मुखों, सहस्र नेत्रों और सहस्र चरणों वाले, सर्वव्यापी; सहस्र भुजाओं वाले, सर्वज्ञ, सहस्र नामों वाले देव;

श्लोक 13 (2.43.13)

सहस्रमुकुटो देवो विश्वरूपो महाद्युतिः । अनेकवर्णो देवादिरव्यक्ताद्वै परे स्थितः ॥

sahasramukuṭo devo viśvarūpo mahādyutiḥ | anekavarṇo devādiravyaktādvai pare sthitaḥ

सहस्र मुकुटों वाले देव, विश्वरूप, महातेजस्वी, अनेक वर्णों वाले, देवताओं के आदि, जो अव्यक्त से भी परे स्थित हैं।

श्लोक 14 (2.43.14)

असृजत्सलिलं पूर्वं स च नारायणः प्रभुः । ततस्तु भगवांस्तोये ब्रह्माणमसृजत्स्वयम् ॥

asṛjatsalilaṃ pūrvaṃ sa ca nārāyaṇaḥ prabhuḥ | tatastu bhagavāṃstoye brahmāṇamasṛjatsvayam

उन प्रभु नारायण ने सबसे पहले जल की सृष्टि की; फिर उस जल में भगवान् ने स्वयं ब्रह्मा को उत्पन्न किया।

श्लोक 15 (2.43.15)

ब्रह्मा चतुर्मुखो लोकान्सर्वांस्तानसृजत्स्वयम् । आदिकाले पुरा ह्येवं सर्वलोकस्य चोद्भवः । पुरा यः प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥

brahmā caturmukho lokānsarvāṃstānasṛjatsvayam | ādikāle purā hyevaṃ sarvalokasya codbhavaḥ | purā yaḥ pralaye prāpte naṣṭe sthāvarajaṅgame

चतुर्मुख ब्रह्मा ने स्वयं उन सब लोकों को रचा। इस प्रकार प्राचीन काल में, सृष्टि के आरम्भ में, समस्त लोक की उत्पत्ति हुई। और पूर्वकाल में जब प्रलय आया और समस्त चर-अचर नष्ट हो गए, तब जो —

श्लोक 16 (2.43.16)

ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके चराचरे । आभूतसम्प्लवे प्राप्ते प्रलीने प्रकृतौ महान् ॥

brahmādiṣu pralīneṣu naṣṭe loke carācare | ābhūtasamplave prāpte pralīne prakṛtau mahān

जब ब्रह्मा आदि लीन हो गए, चर-अचर जगत् नष्ट हो गया, समस्त भूतों का महाप्रलय आ पहुँचा और महत् तत्त्व प्रकृति में लीन हो गया —

श्लोक 17 (2.43.17)

एकस्तिष्ठति सर्वात्मा स तु नारायणः प्रभुः । नारायणस्य चाङ्गानि सर्वदैवानि भारत ॥

ekastiṣṭhati sarvātmā sa tu nārāyaṇaḥ prabhuḥ | nārāyaṇasya cāṅgāni sarvadaivāni bhārata

वे सबके आत्मा अकेले ही रहते हैं — वही प्रभु नारायण हैं। हे भारत, सारे देवता नारायण के ही अंग हैं।

श्लोक 18 (2.43.18)

शिरस्तस्य दिवं राजन्नाभिः खं चरणौ मही । अश्विनौ कर्णयोर्देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ ॥

śirastasya divaṃ rājannābhiḥ khaṃ caraṇau mahī | aśvinau karṇayordevau cakṣuṣī śaśibhāskarau

हे राजन्, स्वर्ग उनका सिर है, आकाश उनकी नाभि और पृथ्वी उनके चरण; दोनों अश्विनीकुमार उनके कानों में हैं और चन्द्रमा तथा सूर्य उनके नेत्र हैं।

श्लोक 19 (2.43.19)

इन्द्रवैश्वानरौ देवौ मुखं तस्य महात्मनः । अन्यानि सर्वदैवानि सर्वाङ्गानि महात्मनः ॥

indravaiśvānarau devau mukhaṃ tasya mahātmanaḥ | anyāni sarvadaivāni sarvāṅgāni mahātmanaḥ

इन्द्र और वैश्वानर अग्नि — ये दोनों देव उन महात्मा का मुख हैं; अन्य सभी देवता उन महात्मा के शेष सारे अंग हैं।

श्लोक 20 (2.43.20)

सर्वं चापि हरौ संस्थं सूत्रे मणिगणा इव । आभूतसम्प्लवान्तेऽथ दृष्ट्वा सर्वं तमोन्वितम् ॥

sarvaṃ cāpi harau saṃsthaṃ sūtre maṇigaṇā iva | ābhūtasamplavānte'tha dṛṣṭvā sarvaṃ tamonvitam

सब कुछ हरि में उसी प्रकार स्थित है जैसे धागे में पिरोए मणियों के समूह। फिर महाप्रलय के अन्त में सब कुछ अन्धकार से घिरा देखकर,

श्लोक 21 (2.43.21)

नारायणो महायोगी सर्वज्ञः परमात्मवान् । ब्रह्मभूतस्तदात्मानं ब्रह्माणमसृजत्स्वयम् ॥

nārāyaṇo mahāyogī sarvajñaḥ paramātmavān | brahmabhūtastadātmānaṃ brahmāṇamasṛjatsvayam

महायोगी, सर्वज्ञ, परमात्मस्वरूप नारायण ने ब्रह्मभाव में स्थित होकर स्वयं अपने-आप को ब्रह्मा के रूप में उत्पन्न किया।

श्लोक 22 (2.43.22)

सोऽध्यक्षः सर्वभूतानां प्रभूतप्रभवोऽच्युतः । सनत्कुमारं रुद्रं च सप्तर्षीश्च तपोधनान् ॥

so'dhyakṣaḥ sarvabhūtānāṃ prabhūtaprabhavo'cyutaḥ | sanatkumāraṃ rudraṃ ca saptarṣīśca tapodhanān

वे समस्त प्राणियों के अध्यक्ष, प्रचुर उत्पत्ति के स्रोत और अच्युत हैं। सनत्कुमार, रुद्र और तपोधन सप्तर्षि —

श्लोक 23 (2.43.23)

सर्वमेवासृजद्ब्रह्मा तथा लोकांस्तथा प्रजाः । ते च तद्व्यसृजंस्तत्र प्राप्तकाले युधिष्ठिर ॥

sarvamevāsṛjadbrahmā tathā lokāṃstathā prajāḥ | te ca tadvyasṛjaṃstatra prāptakāle yudhiṣṭhira

यह सब ब्रह्मा ने रचा, और उसी प्रकार लोकों तथा प्रजाओं को भी। हे युधिष्ठिर, फिर उन्होंने भी समय आने पर वहाँ सृष्टि का विस्तार किया।

श्लोक 24 (2.43.24)

तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम् । कल्पानां बहुकोट्यश्च समतीतास्तु भारत ॥

tebhyo'bhavanmahātmabhyo bahudhā brahma śāśvatam | kalpānāṃ bahukoṭyaśca samatītāstu bhārata

उन महात्माओं से सनातन ब्रह्म अनेक रूपों में प्रकट हुआ। हे भारत, करोड़ों कल्प बीत चुके हैं,

श्लोक 25 (2.43.25)

आभूतसम्प्लवाश्चैव बहुधाऽद्धाऽपचक्रमुः । मन्वन्तरयुगा राजन्सङ्कल्पो भूतसम्प्लवाः ॥

ābhūtasamplavāścaiva bahudhā'ddhā'pacakramuḥ | manvantarayugā rājansaṅkalpo bhūtasamplavāḥ

और समस्त भूतों के महाप्रलय भी सचमुच अनेक बार बीत चुके हैं। हे राजन्, मन्वन्तर और युग, सृष्टि का संकल्प और भूतों के प्रलय —

श्लोक 26 (2.43.26)

चक्रवत्परिवर्तन्ते सर्वं विषमुखं जगत् । सृष्ट्वा चतुर्मुखं देवं देवो नारायणः प्रभुः ॥

cakravatparivartante sarvaṃ viṣamukhaṃ jagat | sṛṣṭvā caturmukhaṃ devaṃ devo nārāyaṇaḥ prabhuḥ

पहिये की भाँति घूमते रहते हैं, और जल से आरम्भ होने वाला सारा जगत् भी। चतुर्मुख देव ब्रह्मा को रचकर प्रभु देव नारायण

श्लोक 27 (2.43.27)

स लोकानां हितार्थाय क्षीरोदे वसति प्रभुः । ब्रह्मा च सर्वलोकानां लोकस्य च पितामहः ॥

sa lokānāṃ hitārthāya kṣīrode vasati prabhuḥ | brahmā ca sarvalokānāṃ lokasya ca pitāmahaḥ

लोकों के कल्याण के लिए क्षीरसागर में निवास करते हैं। ब्रह्मा सब लोकों के और लोक के पितामह हैं;

श्लोक 28 (2.43.28)

ततो नारायणो देवः सर्वस्य प्रपितामहः ॥

tato nārāyaṇo devaḥ sarvasya prapitāmahaḥ

इसलिए देव नारायण सबके प्रपितामह हैं।

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