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सभा पर्व · अध्याय 44

मधु और कैटभ का वध

भीष्म बताते हैं कि अव्यक्त भगवान् नर-नारायण बने और प्रयोजन के अनुसार बार-बार प्रकट होते हैं, और वे इन अवतारों का वर्णन आरम्भ करते हैं। एकार्णव में सोए विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न असुर मधु और कैटभ में ब्रह्मा की प्रेरणा से वायु ने प्रवेश किया, और वे बढ़कर आकाश तक छा गए तथा विष्णु की नाभि से उठे कमल में बैठे ब्रह्मा पर आक्रमण करने आए। हज़ारों वर्षों के युद्ध के बाद प्रसन्न होकर दोनों भाइयों ने ऐसी जगह मारे जाने की माँग की जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो; नारायण ने उन्हें अपनी जाँघों पर दबाकर मार डाला, और उनका मेद धरती पर फैल गया, जिससे तब से पृथ्वी मेदिनी कहलाती है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (2.44.1)

अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एव भगवान्प्रभुः । नरनारायणो भूत्वा हरिरासीद्युधिष्ठिर ॥

avyakto vyaktaliṅgastho ya eva bhagavānprabhuḥ | naranārāyaṇo bhūtvā harirāsīdyudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, जो अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त रूप में स्थित भगवान् प्रभु हैं, वही नर-नारायण बनकर हरि के रूप में प्रकट हुए।

श्लोक 2 (2.44.2)

ब्रह्मा च शक्रः सूर्यश्च धर्मश्चैव सनातनः । बहुशः सर्वभूतात्मा प्रादुर्भवति कार्यतः । प्रादुर्भावांस्तु वक्ष्यामि दिव्यान्देवगणैर्युतान् ॥

brahmā ca śakraḥ sūryaśca dharmaścaiva sanātanaḥ | bahuśaḥ sarvabhūtātmā prādurbhavati kāryataḥ | prādurbhāvāṃstu vakṣyāmi divyāndevagaṇairyutān

ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य और सनातन धर्म के रूप में — सब प्राणियों के आत्मा वे प्रभु प्रयोजन के अनुसार बार-बार प्रकट होते हैं। मैं तुम्हें देवगणों से युक्त उनके दिव्य अवतारों का वर्णन करूँगा।

श्लोक 3 (2.44.3)

सुप्त्वा युगसहस्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान् । अनेकबहुसाहस्रैर्देवदेवो जगत्पतिः ॥

suptvā yugasahasraṃ sa prādurbhavati kāryavān | anekabahusāhasrairdevadevo jagatpatiḥ

एक हज़ार युगों तक शयन करके देवों के देव, जगत् के स्वामी अपने कार्य के लिए अनेक सहस्रों रूपों में प्रकट होते हैं।

श्लोक 4 (2.44.4)

ब्रह्माणं कपिलं चैव परमेष्ठिं तथैव च । देवान्सप्तर्षिभिश्चैव शङ्करं च महायशाः ॥

brahmāṇaṃ kapilaṃ caiva parameṣṭhiṃ tathaiva ca | devānsaptarṣibhiścaiva śaṅkaraṃ ca mahāyaśāḥ

ब्रह्मा, कपिल और परमेष्ठी, सप्तर्षियों सहित देवगण, और महायशस्वी शंकर,

श्लोक 5 (2.44.5)

सनत्कुमारं भगवान्मनुं चैव प्रजापतिम् । पुरा चक्रे च देवादिः प्रदीप्ताग्निसमप्रभः ॥

sanatkumāraṃ bhagavānmanuṃ caiva prajāpatim | purā cakre ca devādiḥ pradīptāgnisamaprabhaḥ

सनत्कुमार और प्रजापति मनु — इन सबको प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, देवताओं के आदि भगवान् ने पूर्वकाल में रचा।

श्लोक 6 (2.44.6)

येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टदेवासुरवरे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥

yena cārṇavamadhyasthau naṣṭe sthāvarajaṅgame | naṣṭadevāsuravare praṇaṣṭoragarākṣase

उन्हीं के द्वारा — जब समुद्र के बीच समस्त चर-अचर नष्ट हो गए थे, श्रेष्ठ देवता और असुर मिट गए थे, और नाग तथा राक्षस भी पूरी तरह नष्ट हो चुके थे —

श्लोक 7 (2.44.7)

योद्धुकामौ सुदुर्धर्षौ भ्रातरौ मधुकैटभौ । हतौ भगवता तेन ततो दत्त्वा वरं परम् ॥

yoddhukāmau sudurdharṣau bhrātarau madhukaiṭabhau | hatau bhagavatā tena tato dattvā varaṃ param

समुद्र में स्थित, युद्ध के इच्छुक और अत्यन्त दुर्जय दोनों भाई मधु और कैटभ उन भगवान् द्वारा मारे गए, उन्हें एक उत्तम वर देने के बाद।

श्लोक 8 (2.44.8)

भूमिं बद्ध्वा कृतौ पूर्वावजेयौ द्वौ महाऽसुरौ । तौ कर्णमलसंभूतौ विष्णोस्तस्य महात्मनः ॥

bhūmiṃ baddhvā kṛtau pūrvāvajeyau dvau mahā'surau | tau karṇamalasaṃbhūtau viṣṇostasya mahātmanaḥ

पहले वे दोनों महान असुर मिट्टी को बाँधकर बनाए गए थे और अजेय थे। वे महात्मा विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न हुए थे,

श्लोक 9 (2.44.9)

महार्णवे प्रस्वपतः शैलराजसमौ स्थितौ । तौ विवेश स्वयं वायुर्ब्रह्मणा साधु चोदितः ॥

mahārṇave prasvapataḥ śailarājasamau sthitau | tau viveśa svayaṃ vāyurbrahmaṇā sādhu coditaḥ

जब वे महासागर में सो रहे थे; और वे दोनों पर्वतराज के समान खड़े थे। ब्रह्मा की भली-भाँति प्रेरणा पाकर स्वयं वायु ने उनमें प्रवेश किया।

श्लोक 10 (2.44.10)

तौ दिवं छादयित्वा तु ववृधाते महाऽसुरौ । वायुप्रमाणौ तौ दृष्ट्वा ब्रह्मा पर्यमृशच्छनैः ॥

tau divaṃ chādayitvā tu vavṛdhāte mahā'surau | vāyupramāṇau tau dṛṣṭvā brahmā paryamṛśacchanaiḥ

वे दोनों महान असुर आकाश को ढकते हुए बढ़ते गए। उन्हें वायु के समान विशाल देखकर ब्रह्मा ने धीरे से उन्हें छूकर टटोला।

श्लोक 11 (2.44.11)

एकं मृदुतरं वेत्ति कठिनं वेत्ति चापरम् । नामनी तु तयोश्चक्रे सविता सलिलोद्भवः ॥

ekaṃ mṛdutaraṃ vetti kaṭhinaṃ vetti cāparam | nāmanī tu tayoścakre savitā salilodbhavaḥ

उन्होंने पाया कि एक अधिक कोमल है और दूसरा कठोर। तब जल से उत्पन्न सृष्टिकर्ता ने उन दोनों के नाम रखे —

श्लोक 12 (2.44.12)

मृदुस्त्वयं मधुर्नाम कठिनः कैटभः स्वयम् । तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलगर्वितौ ॥

mṛdustvayaṃ madhurnāma kaṭhinaḥ kaiṭabhaḥ svayam | tau daityau kṛtanāmānau ceraturbalagarvitau

"यह कोमल वाला मधु नाम का है, और कठोर वाला कैटभ।" इस प्रकार नाम पाकर वे दोनों दैत्य अपने बल के घमण्ड में घूमने लगे।

श्लोक 13 (2.44.13)

तौ पुराऽथ दिवं सर्वां प्राप्तौ राजन्महासुरौ । प्रच्छाद्याथ दिवं सर्वां चेरतुर्मधुकैटभौ ॥

tau purā'tha divaṃ sarvāṃ prāptau rājanmahāsurau | pracchādyātha divaṃ sarvāṃ ceraturmadhukaiṭabhau

फिर हे राजन्, वे दोनों महान असुर सारे आकाश तक पहुँच गए; पूरे आकाश को ढककर मधु और कैटभ विचरने लगे,

श्लोक 14 (2.44.14)

सर्वमेकार्णवं लोकं योद्धुकामौ सुनिर्भयौ । तौ गतावसुरौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

sarvamekārṇavaṃ lokaṃ yoddhukāmau sunirbhayau | tau gatāvasurau dṛṣṭvā brahmā lokapitāmahaḥ

निर्भय और युद्ध के इच्छुक होकर, उस समस्त लोक में जो एक ही समुद्र बन गया था। उन दोनों असुरों को आते देखकर लोकपितामह ब्रह्मा

श्लोक 15 (2.44.15)

एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत । स पद्मात्पद्मनाभस्य नाभिदेशात्समुत्थितात् ॥

ekārṇavāmbunicaye tatraivāntaradhīyata | sa padmātpadmanābhasya nābhideśātsamutthitāt

उसी एकार्णव की जलराशि में वहीं अन्तर्धान हो गए। पद्मनाभ की नाभि से उठे कमल से

श्लोक 16 (2.44.16)

आससाद स्वयं जन्म तत्पङ्कजमपङ्कजम् । पूजयामास वसतिं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

āsasāda svayaṃ janma tatpaṅkajamapaṅkajam | pūjayāmāsa vasatiṃ brahmā lokapitāmahaḥ

उन्होंने स्वयं जन्म पाया था — उस कमल से जो कीचड़ से नहीं उपजा था — और लोकपितामह ब्रह्मा ने उसे अपना निवास मानकर पूजा।

श्लोक 17 (2.44.17)

तावुभौ जलगर्भस्थौ नारायणचतुर्मुखौ । बहून्वर्षायुतानप्सु शयानौ न च कम्पितौ ॥

tāvubhau jalagarbhasthau nārāyaṇacaturmukhau | bahūnvarṣāyutānapsu śayānau na ca kampitau

नारायण और चतुर्मुख ब्रह्मा — दोनों जल के भीतर अनेक दसियों हज़ार वर्षों तक लेटे रहे और विचलित नहीं हुए।

श्लोक 18 (2.44.18)

अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैटभौ । आजग्मतुस्तौ तं देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः ॥

atha dīrghasya kālasya tāvubhau madhukaiṭabhau | ājagmatustau taṃ deśaṃ yatra brahmā vyavasthitaḥ

फिर बहुत समय बीतने पर मधु और कैटभ दोनों उस स्थान पर आ पहुँचे जहाँ ब्रह्मा स्थित थे।

श्लोक 19 (2.44.19)

तौ दृष्ट्वा लोकनाथस्तु रोषात्संरक्तलोचनः । उत्पपाताथ शयनात्पद्मनाभो महाद्युतिः ॥

tau dṛṣṭvā lokanāthastu roṣātsaṃraktalocanaḥ | utpapātātha śayanātpadmanābho mahādyutiḥ

उन्हें देखकर लोकनाथ महातेजस्वी पद्मनाभ क्रोध से लाल आँखें किए अपनी शय्या से उठ खड़े हुए।

श्लोक 20 (2.44.20)

तद्युद्धमभवद्घोरं तयोस्तस्य च भारत । एकार्णवे तदा घोरे त्रैलोक्ये जलतां गते ॥

tadyuddhamabhavadghoraṃ tayostasya ca bhārata | ekārṇave tadā ghore trailokye jalatāṃ gate

हे भारत, तब उनके और उन दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, उस भयानक एकार्णव में, जब तीनों लोक जलमय हो गए थे।

श्लोक 21 (2.44.21)

तदभूत्तुमुलं युद्धं वर्षसङ्ख्यासहस्रशः । न च तावसुरौ युद्धे तदा श्रममवापतुः ॥

tadabhūttumulaṃ yuddhaṃ varṣasaṅkhyāsahasraśaḥ | na ca tāvasurau yuddhe tadā śramamavāpatuḥ

वह घमासान युद्ध हज़ारों वर्षों तक चलता रहा, फिर भी वे दोनों असुर युद्ध में थके नहीं।

श्लोक 22 (2.44.22)

अथ दीर्घस्य कालस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ । ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं प्रभुम् ॥

atha dīrghasya kālasya tau daityau yuddhadurmadau | ūcatuḥ prītamanasau devaṃ nārāyaṇaṃ prabhum

फिर बहुत समय बाद युद्ध के मद में चूर उन दोनों दैत्यों ने प्रसन्न मन से प्रभु देव नारायण से कहा —

मधुकैटभावूचतुः

श्लोक 23 (2.44.23)

प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः । आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥

prītau svastava yuddhena ślāghyastvaṃ mṛtyurāvayoḥ | āvāṃ jahi na yatrorvī salilena pariplutā

"हम तुम्हारे युद्ध से प्रसन्न हैं; तुम्हारे हाथों मृत्यु हमारे लिए गौरव की बात है। हमें वहाँ मारो जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो।

श्लोक 24 (2.44.24)

हतौ च तव पुत्रत्वं प्राप्नुयाव सुरोत्तम । यो ह्यावां युधि निर्जेता तस्यावां विहितौ सुतौ ॥

hatau ca tava putratvaṃ prāpnuyāva surottama | yo hyāvāṃ yudhi nirjetā tasyāvāṃ vihitau sutau

और हे देवश्रेष्ठ, मारे जाने पर हम तुम्हारे पुत्र बनें; क्योंकि जो हमें युद्ध में जीतेगा, हम उसी के पुत्र होने के लिए नियत हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 25 (2.44.25)

तयोस्तु वचनं श्रुत्वा तदा नारायणः प्रभुः । तौ प्रहस्य मृधे दैत्यौ दोर्भ्यां च समपीडयत् ॥

tayostu vacanaṃ śrutvā tadā nārāyaṇaḥ prabhuḥ | tau prahasya mṛdhe daityau dorbhyāṃ ca samapīḍayat

उनके वचन सुनकर प्रभु नारायण ने हँसकर उस युद्ध में दोनों दैत्यों को अपनी भुजाओं से दबोच लिया;

श्लोक 26 (2.44.26)

ऊरुभ्यां निधनं चक्रे तावुभौ मधुकैटभौ । तौ हतौ चाप्लुतौ तोये वपुर्भ्यामेकतां गतौ ॥

ūrubhyāṃ nidhanaṃ cakre tāvubhau madhukaiṭabhau | tau hatau cāplutau toye vapurbhyāmekatāṃ gatau

और अपनी जाँघों पर मधु और कैटभ दोनों का अन्त कर दिया। मारे जाने पर वे जल में बहने लगे और उनके दोनों शरीर एक हो गए।

श्लोक 27 (2.44.27)

मेदो मुमुचतुर्दैत्यौ मज्जमानौ जलोर्मिभिः । मेदसा तज्जलं व्याप्तं ताभ्यामन्तर्दधे तदा ॥

medo mumucaturdaityau majjamānau jalormibhiḥ | medasā tajjalaṃ vyāptaṃ tābhyāmantardadhe tadā

जल की लहरों में डूबते हुए उन दोनों दैत्यों ने मेद (चर्बी) छोड़ी। वह जल मेद से व्याप्त हो गया और तब वे दोनों अदृश्य हो गए।

श्लोक 28 (2.44.28)

नारायणश्च भगवानसृजद्विविधाः प्रजाः । दैत्ययोर्मेदसा छन्ना सर्वा राजन्वसुन्धरा ॥

nārāyaṇaśca bhagavānasṛjadvividhāḥ prajāḥ | daityayormedasā channā sarvā rājanvasundharā

और भगवान् नारायण ने अनेक प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि की। हे राजन्, सारी पृथ्वी उन दोनों दैत्यों के मेद से ढक गई।

श्लोक 29 (2.44.29)

तदाप्रभृति कौन्तेय मेदिनीति स्मृता मही । प्रभावात्पद्मनाभस्य शाश्वती च कृता नृणाम् ॥

tadāprabhṛti kaunteya medinīti smṛtā mahī | prabhāvātpadmanābhasya śāśvatī ca kṛtā nṛṇām

हे कुन्तीपुत्र, तभी से पृथ्वी "मेदिनी" कहलाती है; और पद्मनाभ के प्रभाव से वह मनुष्यों के लिए स्थायी बना दी गई।

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