सभा पर्व · अध्याय 45
वराह अवतार
भीष्म भगवान् के अवतारों का वर्णन आरम्भ करते हैं, जो हज़ारों हो चुके हैं। पहले वे पौष्कर अवतार का नाम लेते हैं, जब समुद्र में सोए भगवान् के कमल में देवता और ऋषि उत्पन्न हुए, और फिर यज्ञवराह का वर्णन करते हैं, जिनका शरीर वेदों और यज्ञ के अंगों से बना है। उस रूप में विष्णु ने मार्कण्डेय के देखते-देखते डूबती हुई पृथ्वी को अपनी दाढ़ पर उठाकर एकार्णव से बाहर निकाला और दानवों का संहार किया। अन्त में भीष्म नृसिंह की कथा सुनाने की घोषणा करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.45.1)
प्रादुर्भावसहस्राणि समतीतान्यनेकशः । यथाशक्ति तु वक्ष्यामि शृणु तान्कुरुनन्दन ॥
prādurbhāvasahasrāṇi samatītānyanekaśaḥ | yathāśakti tu vakṣyāmi śṛṇu tānkurunandana
भगवान् के हज़ारों अवतार अनेक बार हो चुके हैं। मैं यथाशक्ति उनका वर्णन करूँगा; हे कुरुनन्दन, उन्हें सुनो।
श्लोक 2 (2.45.2)
पुरा कमलनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि । पुष्करे यत्र सम्भूता देवा ऋषिगणैः सह ॥
purā kamalanābhasya svapataḥ sāgarāmbhasi | puṣkare yatra sambhūtā devā ṛṣigaṇaiḥ saha
प्राचीन काल में जब कमलनाभ भगवान् समुद्र के जल में सो रहे थे, तब वहाँ एक कमल (पुष्कर) में ऋषिगणों के साथ देवता उत्पन्न हुए।
श्लोक 3 (2.45.3)
एष पौष्करिको नाम प्रादुर्भावः प्रकीर्तितः । पुराणैः कथ्यते यत्र वेदश्रुतिसमाहितः ॥
eṣa pauṣkariko nāma prādurbhāvaḥ prakīrtitaḥ | purāṇaiḥ kathyate yatra vedaśrutisamāhitaḥ
यह "पौष्कर" नाम का अवतार कहा गया है; पुराणों में इसका वर्णन है और यह वेद-श्रुति से समर्थित है।
श्लोक 4 (2.45.4)
वाराहस्तु श्रुतिसुखः प्रादुर्भावो महात्मनः । यत्र विष्णुः सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः ॥
vārāhastu śrutisukhaḥ prādurbhāvo mahātmanaḥ | yatra viṣṇuḥ suraśreṣṭho vārāhaṃ rūpamāsthitaḥ
उन महात्मा का वराह-अवतार सुनने में सुखद है, जिसमें देवश्रेष्ठ विष्णु ने वराह का रूप धारण किया
श्लोक 5 (2.45.5)
उज्जहार महीं तोयात्सशैलवनकाननाम् । वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुर्दन्तश्चितीमुखः ॥
ujjahāra mahīṃ toyātsaśailavanakānanām | vedapādo yūpadaṃṣṭraḥ kraturdantaścitīmukhaḥ
और पर्वतों, वनों और काननों सहित पृथ्वी को जल से ऊपर उठा लिया। वेद उनके पैर थे, यूप (यज्ञ-स्तम्भ) उनकी दाढ़, यज्ञ उनके दाँत और चिति (अग्नि-वेदी) उनका मुख;
श्लोक 6 (2.45.6)
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः । अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाङ्गः श्रुतिभूषणः ॥
agnijihvo darbharomā brahmaśīrṣo mahātapāḥ | ahorātrekṣaṇo divyo vedāṅgaḥ śrutibhūṣaṇaḥ
अग्नि उनकी जीभ, दर्भ उनके रोम, ब्रह्म उनका सिर; वे महातपस्वी थे, दिन और रात उनके नेत्र थे, वे दिव्य थे, वेदांग उनके अंग और श्रुतियाँ उनका आभूषण;
श्लोक 7 (2.45.7)
आज्यनासः स्रुवं तुण्डं सामघोषस्वनो महान् । धर्मसत्यमयः श्रीमान्कर्मविक्रमसत्कृतः ॥
ājyanāsaḥ sruvaṃ tuṇḍaṃ sāmaghoṣasvano mahān | dharmasatyamayaḥ śrīmānkarmavikramasatkṛtaḥ
घी उनकी नासिका, स्रुवा उनका थूथन, सामगान का घोष उनका प्रचण्ड स्वर; वे धर्म और सत्य से बने, श्रीमान्, और अपने कर्म तथा पराक्रम से सम्मानित थे;
श्लोक 8 (2.45.8)
प्रायश्चित्तमुखो धीरः पशुजानुर्महावृषः । औद्गात्रहोमलिङ्गोऽसौ पशुबीजमहौषधिः ॥
prāyaścittamukho dhīraḥ paśujānurmahāvṛṣaḥ | audgātrahomaliṅgo'sau paśubījamahauṣadhiḥ
प्रायश्चित्त उनका मुख था, वे धीर थे, यज्ञ-पशु उनके घुटने, वे महावृषभ के समान बलवान् थे; उद्गाता का गान और होम उनका चिह्न, तथा पशु, बीज और महौषधियाँ उनका स्वरूप;
श्लोक 9 (2.45.9)
बाह्यान्तरात्मा मन्त्रास्थिविकृतः सौम्यदर्शनः । वेदिस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्याभिवेगवान् ॥
bāhyāntarātmā mantrāsthivikṛtaḥ saumyadarśanaḥ | vediskandho havirgandho havyakavyābhivegavān
बाहरी और भीतरी आत्मा, मन्त्रों से बनी अस्थियाँ, सौम्य दर्शन वाले; वेदी उनके कंधे, हवि उनकी गन्ध, और देवताओं तथा पितरों के हव्य-कव्य का वेग उनमें था;
श्लोक 10 (2.45.10)
प्राग्वंशकायो द्युतिमान्नानादीक्षाभिरूर्जितः । दक्षिणाहृदयो योगी महाशास्त्रमयो महान् ॥
prāgvaṃśakāyo dyutimānnānādīkṣābhirūrjitaḥ | dakṣiṇāhṛdayo yogī mahāśāstramayo mahān
प्राग्वंश (यज्ञशाला का पूर्वी भाग) उनका शरीर, वे तेजस्वी थे, अनेक दीक्षाओं से बलशाली; दक्षिणा उनका हृदय, वे योगी थे, महान् शास्त्रों से बने हुए, महान्;
श्लोक 11 (2.45.11)
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रावर्ग्यावर्तभूषणः । शालापत्नीसहायो वै मणिशृङ्गसमुच्छ्रितः ॥
upākarmoṣṭharucakaḥ prāvargyāvartabhūṣaṇaḥ | śālāpatnīsahāyo vai maṇiśṛṅgasamucchritaḥ
उपाकर्म उनके होठों का आभूषण, प्रवर्ग्य उनकी शोभा बढ़ाने वाला भँवर; यज्ञशाला उनकी पत्नी और सहायिका, और वे मणि-जैसे सींग के साथ ऊँचे उठे हुए थे।
श्लोक 12 (2.45.12)
एवं यज्ञवराहो वै भूत्वा विष्णुः सनातनः । महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ॥
evaṃ yajñavarāho vai bhūtvā viṣṇuḥ sanātanaḥ | mahīṃ sāgaraparyantāṃ saśailavanakānanām
इस प्रकार सनातन विष्णु यज्ञवराह बने; और समुद्र तक फैली, पर्वतों, वनों और काननों सहित पृथ्वी,
श्लोक 13 (2.45.13)
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः । मज्जन्तीं सलिले तस्मिन्स्वदेवीं पृथिवीं तदा ॥
ekārṇavajale bhraṣṭāmekārṇavagataḥ prabhuḥ | majjantīṃ salile tasminsvadevīṃ pṛthivīṃ tadā
जो एकार्णव के जल में गिर गई थी — प्रभु ने उस एकार्णव में जाकर अपनी देवी पृथ्वी को उस जल में डूबते हुए पाया,
श्लोक 14 (2.45.14)
उज्जहार विषाणेन मार्कण्डेयस्य पश्यतः । शृङ्गेण यः समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ॥
ujjahāra viṣāṇena mārkaṇḍeyasya paśyataḥ | śṛṅgeṇa yaḥ samuddhṛtya lokānāṃ hitakāmyayā
और मार्कण्डेय के देखते-देखते उसे अपनी दाढ़ पर उठा लिया। जिन्होंने लोकों के हित की इच्छा से अपने सींग से उसे ऊपर उठाया,
श्लोक 15 (2.45.15)
सहस्रशीर्षो देवेशो निर्ममे जगतीं प्रभुः । एवं यज्ञवराहेण भूतभव्यभवात्मना ॥
sahasraśīrṣo deveśo nirmame jagatīṃ prabhuḥ | evaṃ yajñavarāheṇa bhūtabhavyabhavātmanā
उन सहस्रशीर्ष देवेश प्रभु ने फिर जगत् की रचना की। इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान जिनका स्वरूप है, उन यज्ञवराह द्वारा
श्लोक 16 (2.45.16)
उद्धृता पृथिवी देवी पूज्या वै सागराम्बरा । निहता दानवाः सर्वे देवदेवेन विष्णुना ॥
uddhṛtā pṛthivī devī pūjyā vai sāgarāmbarā | nihatā dānavāḥ sarve devadevena viṣṇunā
समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली, पूजनीय पृथ्वी देवी का उद्धार हुआ; और देवाधिदेव विष्णु ने सभी दानवों का संहार किया।
श्लोक 17 (2.45.17)
वाराहः कथितो ह्येष नारसिंहमथो शृणु । यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥
vārāhaḥ kathito hyeṣa nārasiṃhamatho śṛṇu | yatra bhūtvā mṛgendreṇa hiraṇyakaśipurhataḥ
यह मैंने वराह-अवतार कहा; अब नृसिंह-अवतार सुनो, जिसमें उन्होंने मृगराज (सिंह) बनकर हिरण्यकशिपु का वध किया।