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सभा पर्व · अध्याय 46

नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध

भीष्म बताते हैं कि दैत्यों में प्रथम हिरण्यकशिपु ने समुद्र में लम्बी तपस्या करके ब्रह्मा से यह वर पाया कि न देवता, न दानव, न मनुष्य, न पशु, न कोई शस्त्र, न सूखी न गीली वस्तु — दिन में या रात में, भीतर या बाहर, पृथ्वी पर या आकाश में — उसे मार सके। घमण्ड में चूर होकर उसने तीनों लोक जीत लिए, देवताओं के स्थान और कार्य छीन लिए और करोड़ों वर्षों तक ऋषियों को सताया; तब देवता ब्रह्मा के पास और फिर उनके साथ क्षीरसागर के श्वेतद्वीप में विष्णु के पास गए। विष्णु ने उन्हें अभय दिया, आधे मनुष्य और आधे सिंह का रूप धारण किया, दैत्यों के शस्त्रों को खा डाला, और सन्ध्या के समय महल की देहली पर हिरण्यकशिपु को अपनी जाँघ पर रखकर नखों से चीर डाला। इसके बाद भीष्म वामन अवतार की ओर मुड़ते हैं।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (2.46.1)

दैत्येन्द्रो बलवान्राजन्सुरारिर्बलगर्वितः । हिरण्यकशिपुर्नाम आसीत्त्रैलोक्यकण्टकः ॥

daityendro balavānrājansurārirbalagarvitaḥ | hiraṇyakaśipurnāma āsīttrailokyakaṇṭakaḥ

हे राजन्, दैत्यों का एक बलवान् राजा था, देवताओं का शत्रु, बल के घमण्ड में चूर, जिसका नाम हिरण्यकशिपु था — वह तीनों लोकों के लिए काँटा था।

श्लोक 2 (2.46.2)

दैत्यानामादिपुरुषो वीर्येणाप्रतिमो बली । प्रविश्य जलधिं राजंश्चकार तप उत्तमम् ॥

daityānāmādipuruṣo vīryeṇāpratimo balī | praviśya jaladhiṃ rājaṃścakāra tapa uttamam

दैत्यों का आदिपुरुष, बलवान् और पराक्रम में अनुपम — हे राजन्, उसने समुद्र में प्रवेश करके उत्तम तपस्या की।

श्लोक 3 (2.46.3)

दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च । व्रतोपवासतस्तस्थौ स्थाणुमौनव्रतो दृढः ॥

daśavarṣasahasrāṇi śatāni daśa pañca ca | vratopavāsatastasthau sthāṇumaunavrato dṛḍhaḥ

दस हज़ार और फिर पन्द्रह सौ वर्षों तक वह व्रत और उपवास करते हुए, स्तम्भ की भाँति निश्चल और मौन-व्रत में दृढ़ रहकर खड़ा रहा।

श्लोक 4 (2.46.4)

ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ । ब्रह्मा प्रीतमनास्तस्य तपसा नियमेन च ॥

tataḥ śamadamābhyāṃ ca brahmacaryeṇa cānagha | brahmā prītamanāstasya tapasā niyamena ca

तब हे निष्पाप, उसकी शान्ति और इन्द्रिय-निग्रह, ब्रह्मचर्य, तप और नियम से ब्रह्मा का मन प्रसन्न हुआ।

श्लोक 5 (2.46.5)

ततः स्वयम्भूर्भगवान्स्वयमागम्य भूपते । विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥

tataḥ svayambhūrbhagavānsvayamāgamya bhūpate | vimānenārkavarṇena haṃsayuktena bhāsvatā

तब हे भूपते, भगवान् स्वयम्भू स्वयं सूर्य के समान वर्ण वाले, हंसों से जुते, चमकते विमान में आए,

श्लोक 6 (2.46.6)

आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्दैवतैस्तथा । रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥

ādityairvasubhiḥ sādhyairmarudbhirdaivataistathā | rudrairviśvasahāyaiśca yakṣarākṣasakinnaraiḥ

आदित्यों, वसुओं, साध्यों, मरुतों और देवताओं के साथ, रुद्रों और विश्वेदेवों को सहायक लिए, यक्षों, राक्षसों और किन्नरों सहित,

श्लोक 7 (2.46.7)

दिशाभिर्विदिशाभिश्च नदीभिः सागरैः सह । नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्चापरैर्ग्रहैः ॥

diśābhirvidiśābhiśca nadībhiḥ sāgaraiḥ saha | nakṣatraiśca muhūrtaiśca khecaraiścāparairgrahaiḥ

दिशाओं और विदिशाओं, नदियों और समुद्रों, नक्षत्रों और मुहूर्तों, आकाशचारियों और अन्य ग्रहों के साथ,

श्लोक 8 (2.46.8)

देवर्षिभिस्तपोयुक्तैः सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तदा । राजर्षिभिः पुण्यतमैर्गन्धर्वैरप्सरोगणैः ॥

devarṣibhistapoyuktaiḥ siddhaiḥ saptarṣibhistadā | rājarṣibhiḥ puṇyatamairgandharvairapsarogaṇaiḥ

तपस्वी देवर्षियों, सिद्धों और सप्तर्षियों के साथ, परम पुण्यात्मा राजर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओं के समूहों के साथ।

श्लोक 9 (2.46.9)

चराचरगुरुः श्रीमान्वृतः सर्वसुरैस्तथा । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यमागम्य चाब्रवीत् ॥

carācaraguruḥ śrīmānvṛtaḥ sarvasuraistathā | brahmā brahmavidāṃ śreṣṭho daityamāgamya cābravīt

इस प्रकार सब देवताओं से घिरे हुए, चर-अचर के गुरु, श्रीमान् ब्रह्मा — ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ — उस दैत्य के पास आकर बोले —

ब्रह्मोवाच

श्लोक 10 (2.46.10)

प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसाऽनेन सुव्रत । वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥

prīto'smi tava bhaktasya tapasā'nena suvrata | varaṃ varaya bhadraṃ te yatheṣṭaṃ kāmamāpnuhi

"हे सुव्रत, तुम मेरे भक्त हो; तुम्हारी इस तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो — तुम्हारा कल्याण हो — और जो चाहो वह पाओ।"

हिरण्यकशिपुरुवाच

श्लोक 11 (2.46.11)

न देवा न च गन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । न मानुषाः पिशाचाश्च हन्युर्मां देवसत्तम ॥

na devā na ca gandharvā na yakṣoragarākṣasāḥ | na mānuṣāḥ piśācāśca hanyurmāṃ devasattama

"हे देवश्रेष्ठ, न देवता, न गन्धर्व, न यक्ष, नाग और राक्षस, न मनुष्य और पिशाच मुझे मार सकें।

श्लोक 12 (2.46.12)

ऋषयो वा न मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह । शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥

ṛṣayo vā na māṃ śāpaiḥ kruddhā lokapitāmaha | śapeyustapasā yuktā vara eṣa vṛto mayā

और हे लोकपितामह, तपस्या से सम्पन्न ऋषि भी क्रुद्ध होकर मुझे अपने शापों से शाप न दे सकें। यही वर मैंने चुना है।

श्लोक 13 (2.46.13)

न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च । न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न वाऽन्येन मे वधः ॥

na śastreṇa na cāstreṇa giriṇā pādapena ca | na śuṣkeṇa na cārdreṇa syānna vā'nyena me vadhaḥ

न शस्त्र से, न अस्त्र से, न पर्वत से, न वृक्ष से, न सूखी वस्तु से, न गीली से, और न किसी अन्य वस्तु से मेरी मृत्यु हो।

श्लोक 14 (2.46.14)

नाकाशे नाथ भूमौ वा रात्रौ वा दिवसेऽपि वा । नान्तर्वा न बहिर्वापि स्याद्वधो मे पितामह ॥

nākāśe nātha bhūmau vā rātrau vā divase'pi vā | nāntarvā na bahirvāpi syādvadho me pitāmaha

न आकाश में, न पृथ्वी पर, न रात में, न दिन में, न भीतर, न बाहर — हे पितामह, कहीं भी मेरी मृत्यु न हो।

श्लोक 15 (2.46.15)

पशुभिर्वा मृगैर्न स्यात्पक्षिभिर्वा सरीसृपैः । ददासि चेद्वरानेतान्देवदेव वृणोम्यहम् ॥

paśubhirvā mṛgairna syātpakṣibhirvā sarīsṛpaiḥ | dadāsi cedvarānetāndevadeva vṛṇomyaham

न पशुओं से, न वन्य जीवों से, न पक्षियों से, न रेंगने वाले जीवों से। हे देवदेव, यदि आप ये वर देते हैं, तो मैं यही वर माँगता हूँ।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 16 (2.46.16)

एते दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः । सर्वकामवरांस्तात प्राप्स्यसि त्वमसंशयम् ॥

ete divyā varāstāta mayā dattāstavādbhutāḥ | sarvakāmavarāṃstāta prāpsyasi tvamasaṃśayam

"वत्स, ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दिए। वत्स, तुम निःसन्देह सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले वर प्राप्त करोगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (2.46.17)

एवमुक्त्वा स भगवाञ्जगामाकाशमेव हि । रराज ब्रह्मलोके हि ब्रह्मर्षिगणसेवितः ॥

evamuktvā sa bhagavāñjagāmākāśameva hi | rarāja brahmaloke hi brahmarṣigaṇasevitaḥ

यह कहकर भगवान् आकाश में चले गए और ब्रह्मर्षियों के समूहों से सेवित होकर ब्रह्मलोक में सुशोभित हुए।

श्लोक 18 (2.46.18)

ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनयस्तथा । वरप्रदानं श्रुत्वैव ते ब्रह्माणमुपस्थिताः ॥

tato devāśca nāgāśca gandharvā munayastathā | varapradānaṃ śrutvaiva te brahmāṇamupasthitāḥ

तब देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि, वरदान की बात सुनते ही ब्रह्मा के पास उपस्थित हुए।

देवा ऊचुः

श्लोक 19 (2.46.19)

वरेणानेन भगवन्बाधिष्यति स नोऽसुरः । तत्प्रसीदस्व भगवन्वधोपायोऽस्य चिन्त्यताम् ॥

vareṇānena bhagavanbādhiṣyati sa no'suraḥ | tatprasīdasva bhagavanvadhopāyo'sya cintyatām

"भगवन्, इस वर के बल से वह असुर हमें सताएगा। अतः भगवन्, कृपा कीजिए और उसके वध का कोई उपाय सोचिए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (2.46.20)

ततो लोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः । प्रोवाच भगवान्वाक्यं सर्वदेवगणांस्तदा ॥

tato lokahitaṃ vākyaṃ śrutvā devaḥ prajāpatiḥ | provāca bhagavānvākyaṃ sarvadevagaṇāṃstadā

लोकहित के लिए कहे गए ये वचन सुनकर भगवान् देव प्रजापति ने तब सब देवगणों से कहा —

ब्रह्मोवाच

श्लोक 21 (2.46.21)

अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् । तपसोऽन्तेऽस्य भगवान्वधं कृष्णः करिष्यति ॥

avaśyaṃ tridaśāstena prāptavyaṃ tapasaḥ phalam | tapaso'nte'sya bhagavānvadhaṃ kṛṣṇaḥ kariṣyati

"हे देवताओ, उसे अपनी तपस्या का फल अवश्य मिलना चाहिए। उसकी तपस्या का फल पूरा होने पर भगवान् कृष्ण उसका वध करेंगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (2.46.22)

एतच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे ब्रह्मणा तस्य वै वधम् । स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वै मुदान्विताः ॥

etacchrutvā surāḥ sarve brahmaṇā tasya vai vadham | svāni sthānāni divyāni jagmuste vai mudānvitāḥ

ब्रह्मा से उसके वध की बात सुनकर सब देवता प्रसन्न होकर अपने-अपने दिव्य धामों को चले गए।

श्लोक 23 (2.46.23)

लब्धमात्रे वरे चापि सर्वास्ता बाधते प्रजाः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥

labdhamātre vare cāpi sarvāstā bādhate prajāḥ | hiraṇyakaśipurdaityo varadānena darpitaḥ

वर मिलते ही वरदान से घमण्डी बना दैत्य हिरण्यकशिपु सारी प्रजाओं को सताने लगा।

श्लोक 24 (2.46.24)

राज्यं चकार दैत्येन्द्रो दैत्यसङ्घैः समावृतः । सप्तद्वीपान्वशे चक्रे लोकालोकान्तरं बलात् ॥

rājyaṃ cakāra daityendro daityasaṅghaiḥ samāvṛtaḥ | saptadvīpānvaśe cakre lokālokāntaraṃ balāt

दैत्यों के समूहों से घिरे उस दैत्यराज ने राज्य किया और बलपूर्वक सातों द्वीपों को लोकालोक पर्वत तक अपने वश में कर लिया।

श्लोक 25 (2.46.25)

दिव्यभोगान्समस्तान्वै लोके सर्वानवाप सः । देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तु पराजित्य महासुरः ॥

divyabhogānsamastānvai loke sarvānavāpa saḥ | devāṃstribhuvanasthāṃstu parājitya mahāsuraḥ

उसने संसार के सारे दिव्य भोग प्राप्त कर लिए; और तीनों लोकों में रहने वाले देवताओं को पराजित करके वह महान असुर

श्लोक 26 (2.46.26)

त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः । यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद्दानवो दिवि ॥

trailokyaṃ vaśamānīya svarge vasati dānavaḥ | yadā varamadonmatto nyavasaddānavo divi

तीनों लोकों को वश में करके स्वर्ग में रहने लगा। जब वरदान के मद से उन्मत्त वह दानव स्वर्ग में रहने लगा,

श्लोक 27 (2.46.27)

अथ लोकान्समस्तांश्च विजित्य स महाबलः । भवेयमहमेवेन्द्रः सोमोऽग्निर्मारुतो रविः ॥

atha lokānsamastāṃśca vijitya sa mahābalaḥ | bhaveyamahamevendraḥ somo'gnirmāruto raviḥ

तब उस महाबली ने समस्त लोकों को जीतकर कहा — "मैं ही इन्द्र, सोम, अग्नि, वायु और सूर्य बनूँगा,

श्लोक 28 (2.46.28)

सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश । अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वसवोऽर्यमा ॥

salilaṃ cāntarikṣaṃ ca nakṣatrāṇi diśo daśa | ahaṃ krodhaśca kāmaśca varuṇo vasavo'ryamā

जल, अन्तरिक्ष, नक्षत्र और दसों दिशाएँ; मैं ही क्रोध और काम, वरुण, वसुगण और अर्यमा,

श्लोक 29 (2.46.29)

धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षकिम्पुरुषाधिपः । एते भवेयमित्युक्त्वा स्वयं भूत्वा बलात्स च ॥

dhanadaśca dhanādhyakṣo yakṣakimpuruṣādhipaḥ | ete bhaveyamityuktvā svayaṃ bhūtvā balātsa ca

और धनाध्यक्ष कुबेर, यक्षों और किम्पुरुषों का स्वामी — मैं ये सब बनूँगा।" यह कहकर वह बलपूर्वक स्वयं वे सब बन बैठा,

श्लोक 30 (2.46.30)

एषां गृहीत्वा स्थानानि तेषां कार्याण्यवाप सः । इज्यश्चासीन्मखवरैर्देवकिन्नरसत्तमैः ॥

eṣāṃ gṛhītvā sthānāni teṣāṃ kāryāṇyavāpa saḥ | ijyaścāsīnmakhavarairdevakinnarasattamaiḥ

उसने उनके स्थान छीनकर उनके कार्य भी अपने हाथ में ले लिए। श्रेष्ठ देवता और किन्नर उत्तम यज्ञों से उसकी पूजा करने लगे।

श्लोक 31 (2.46.31)

नरकस्थान्समानीय स्वर्गस्थांश्च चकार सः । एवमादीनि कर्माणि कृत्वा दैत्यपतिर्बली ॥

narakasthānsamānīya svargasthāṃśca cakāra saḥ | evamādīni karmāṇi kṛtvā daityapatirbalī

वह नरक में पड़े हुओं को लाकर स्वर्ग में बसाने लगा। ऐसे-ऐसे कर्म करके उस बलवान् दैत्यपति ने

श्लोक 32 (2.46.32)

आश्रमेषु महाभागान्मुनीन्वै शंसितव्रतान् । सत्यधर्मपरान्दान्तान्पुरा धर्षितवांस्तु सः ॥

āśrameṣu mahābhāgānmunīnvai śaṃsitavratān | satyadharmaparāndāntānpurā dharṣitavāṃstu saḥ

आश्रमों में रहने वाले, कठोर व्रतों वाले, सत्य और धर्म में तत्पर, संयमी महाभाग मुनियों को सताया।

श्लोक 33 (2.46.33)

यज्ञीयान्कृतवान्दैत्यान्याजकांश्चैव देवताः । यत्रयत्र सुरा जग्मुस्तत्रतत्र व्रजत्युत ॥

yajñīyānkṛtavāndaityānyājakāṃścaiva devatāḥ | yatrayatra surā jagmustatratatra vrajatyuta

उसने दैत्यों को यज्ञ-भाग का अधिकारी बना दिया और देवताओं को यज्ञ करने वाला। जहाँ-जहाँ देवता जाते, वहाँ-वहाँ वह भी पहुँच जाता।

श्लोक 34 (2.46.34)

स्थानानि देवतानां तु हृत्वा राज्यमकारयत् । पञ्चकोट्यश्च वर्षाणि अयुतान्येकषष्टि च ॥

sthānāni devatānāṃ tu hṛtvā rājyamakārayat | pañcakoṭyaśca varṣāṇi ayutānyekaṣaṣṭi ca

देवताओं के स्थान छीनकर वह राज्य करता रहा। पाँच करोड़ वर्ष, इकसठ अयुत (इकसठ बार दस हज़ार)

श्लोक 35 (2.46.35)

षष्टिश्चैव सहस्राणां जग्मुस्तस्य दुरात्मनः । एतद्वर्षं स दैत्येन्द्रो भोगैश्वर्यमवाप सः ॥

ṣaṣṭiścaiva sahasrāṇāṃ jagmustasya durātmanaḥ | etadvarṣaṃ sa daityendro bhogaiśvaryamavāpa saḥ

और साठ हज़ार वर्ष उस दुष्टात्मा के बीत गए। इतने वर्षों तक उस दैत्यराज ने भोग और ऐश्वर्य का सुख भोगा।

श्लोक 36 (2.46.36)

तेनातिबाध्यमानास्ते दैत्येन्द्रेण बलीयसा । ब्रह्मलोकं सुरा जग्मुः शर्वशक्रपुरोगमाः ॥

tenātibādhyamānāste daityendreṇa balīyasā | brahmalokaṃ surā jagmuḥ śarvaśakrapurogamāḥ

उस बलशाली दैत्यराज से अत्यन्त पीड़ित होकर शर्व (शिव) और इन्द्र को आगे करके देवता ब्रह्मलोक गए।

श्लोक 37 (2.46.37)

पितामहं समासाद्य खिन्नाः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ॥

pitāmahaṃ samāsādya khinnāḥ prāñjalayo'bruvan

पितामह के पास पहुँचकर खिन्न देवताओं ने हाथ जोड़कर कहा —

देवा ऊचुः

श्लोक 38 (2.46.38)

भगवन्भूतभव्येश नस्त्रायस्व इहागतान् । भयं दितिसुताद्घोराद्भवत्यद्य दिवानिशम् ॥

bhagavanbhūtabhavyeśa nastrāyasva ihāgatān | bhayaṃ ditisutādghorādbhavatyadya divāniśam

"हे भूत और भविष्य के स्वामी भगवन्, यहाँ आए हुए हमारी रक्षा कीजिए। दिति के उस भयंकर पुत्र से अब दिन-रात भय बना रहता है।

श्लोक 39 (2.46.39)

भगवन्सर्वदैत्यानां स्वयम्भूरादिकृत्प्रभुः । स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तः प्रकृतिर्ध्रुवः ॥

bhagavansarvadaityānāṃ svayambhūrādikṛtprabhuḥ | sraṣṭā tvaṃ havyakavyānāmavyaktaḥ prakṛtirdhruvaḥ

भगवन्, आप सब दैत्यों के भी आदिकर्ता प्रभु स्वयम्भू हैं; आप हव्य और कव्य के स्रष्टा, अव्यक्त, प्रकृति और ध्रुव हैं।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 40 (2.46.40)

श्रूयतामापदेवं हि दुर्विज्ञेया मयापि च । नारायणस्तु पुरुषो विश्वरूपो महाद्युतिः ॥

śrūyatāmāpadevaṃ hi durvijñeyā mayāpi ca | nārāyaṇastu puruṣo viśvarūpo mahādyutiḥ

"सुनो, यह विपत्ति मेरे लिए भी कठिनता से समझ में आने वाली है। परन्तु विश्वरूप, महातेजस्वी पुरुष नारायण —

श्लोक 41 (2.46.41)

अव्यक्तः सर्वभूतानामचिन्त्यो विभुरव्ययः । ममापि स तु युष्माकं व्यसने परमा गतिः ॥

avyaktaḥ sarvabhūtānāmacintyo vibhuravyayaḥ | mamāpi sa tu yuṣmākaṃ vyasane paramā gatiḥ

जो सब प्राणियों के लिए अव्यक्त, अचिन्त्य, सर्वव्यापी और अविनाशी हैं — वही संकट में मेरे भी और तुम्हारे भी परम आश्रय हैं।

श्लोक 42 (2.46.42)

नारायणः परोऽव्यक्तादहमव्यक्तसम्भवः । मत्तो जज्ञुः प्रजा लोकाः सर्वे देवासुराश्च ते ॥

nārāyaṇaḥ paro'vyaktādahamavyaktasambhavaḥ | matto jajñuḥ prajā lokāḥ sarve devāsurāśca te

नारायण अव्यक्त से भी परे हैं; मैं अव्यक्त से उत्पन्न हुआ हूँ। मुझसे ही प्रजाएँ, लोक और तुम सब देवता तथा असुर उत्पन्न हुए।

श्लोक 43 (2.46.43)

देवा यथाहं युष्माकं तथा नारायणो मम । पितामहोऽहं सर्वस्य स विष्णुः प्रपितामहः ॥

devā yathāhaṃ yuṣmākaṃ tathā nārāyaṇo mama | pitāmaho'haṃ sarvasya sa viṣṇuḥ prapitāmahaḥ

हे देवताओ, जैसे मैं तुम्हारे लिए हूँ, वैसे ही नारायण मेरे लिए हैं। मैं सबका पितामह हूँ, और वे विष्णु प्रपितामह हैं।

श्लोक 44 (2.46.44)

निश्चितं विबुधा दैत्यं स विष्णुस्तं हनिष्यति । तस्य नास्ति न शक्यं च तस्माद्व्रजत माचिरम् ॥

niścitaṃ vibudhā daityaṃ sa viṣṇustaṃ haniṣyati | tasya nāsti na śakyaṃ ca tasmādvrajata māciram

हे देवताओ, यह निश्चित है कि वे विष्णु उस दैत्य को मारेंगे। उनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है; इसलिए बिना देर किए उनके पास जाओ।"

भीष्म उवाच

श्लोक 45 (2.46.45)

पितामहवचः श्रुत्वा सर्वे ते भरतर्षभ । विबुधा ब्रह्मणा सार्धं जग्मुः क्षीरोदधिं प्रति ॥

pitāmahavacaḥ śrutvā sarve te bharatarṣabha | vibudhā brahmaṇā sārdhaṃ jagmuḥ kṣīrodadhiṃ prati

हे भरतश्रेष्ठ, पितामह के वचन सुनकर सब देवता ब्रह्मा के साथ क्षीरसागर की ओर गए —

श्लोक 46 (2.46.46)

आदित्या वसवः साध्या विश्वे च मरुतस्तथा । रुद्रा महर्षयश्चैव अश्विनौ च सुरूपिणौ ॥

ādityā vasavaḥ sādhyā viśve ca marutastathā | rudrā maharṣayaścaiva aśvinau ca surūpiṇau

आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव और मरुद्गण, रुद्र और महर्षि, तथा सुन्दर रूप वाले दोनों अश्विनीकुमार,

श्लोक 47 (2.46.47)

अन्ये च दिव्या ये राजंस्ते सर्वे सगणाः सुराः । चतुर्मुखं पुरस्कृत्य श्वेतद्वीपमुपागताः ॥

anye ca divyā ye rājaṃste sarve sagaṇāḥ surāḥ | caturmukhaṃ puraskṛtya śvetadvīpamupāgatāḥ

और हे राजन्, अन्य सब दिव्य प्राणी — अपने गणों सहित सारे देवता — चतुर्मुख ब्रह्मा को आगे करके श्वेतद्वीप पहुँचे।

देवा ऊचुः

श्लोक 48 (2.46.48)

त्रायस्व नोऽद्य देवेश हिरण्यकशिपोर्वधात् । त्वं हि नः परमो धाता ब्रह्मादीनां सुरोत्तम ॥

trāyasva no'dya deveśa hiraṇyakaśiporvadhāt | tvaṃ hi naḥ paramo dhātā brahmādīnāṃ surottama

"हे देवेश, आज हिरण्यकशिपु का वध करके हमारी रक्षा कीजिए। हे देवश्रेष्ठ, आप ही हमारे और ब्रह्मा आदि के भी परम विधाता हैं।

श्लोक 49 (2.46.49)

उत्फुल्लाम्बुजपत्राक्ष शत्रुपक्षभयङ्कर । क्षयाय दितिवंशस्य शरणं त्वं भविष्यसि ॥

utphullāmbujapatrākṣa śatrupakṣabhayaṅkara | kṣayāya ditivaṃśasya śaraṇaṃ tvaṃ bhaviṣyasi

हे खिले कमल की पंखुड़ियों जैसे नेत्रों वाले, शत्रुपक्ष को भयभीत करने वाले, दिति के वंश के विनाश के लिए आप ही हमारे शरण होंगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 50 (2.46.50)

तद्देवानां वचः श्रुत्वा तदा विष्णुः शुचिश्रवाः । अदृश्यः सर्वभूतात्मा वक्तुमेवोपचक्रमे ॥

taddevānāṃ vacaḥ śrutvā tadā viṣṇuḥ śuciśravāḥ | adṛśyaḥ sarvabhūtātmā vaktumevopacakrame

देवताओं के ये वचन सुनकर पवित्र कीर्ति वाले, अदृश्य, सर्वभूतात्मा विष्णु ने तब बोलना आरम्भ किया —

विष्णुरुवाच

श्लोक 51 (2.46.51)

भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् । तदेव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत माचिरम् ॥

bhayaṃ tyajadhvamamarā abhayaṃ vo dadāmyaham | tadeva tridivaṃ devāḥ pratipadyata māciram

"हे अमरो, भय त्याग दो; मैं तुम्हें अभय देता हूँ। हे देवताओ, बिना देर किए उसी स्वर्ग को लौट जाओ।

श्लोक 52 (2.46.52)

एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् । अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥

eṣo'haṃ sagaṇaṃ daityaṃ varadānena darpitam | avadhyamamarendrāṇāṃ dānavendraṃ nihanmyaham

मैं यहाँ हूँ — वरदान से घमण्डी, देवराजों के लिए अवध्य, उस दानवराज दैत्य को उसके गणों सहित मैं मार डालूँगा।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 53 (2.46.53)

भगवन्देवदेवेश खिन्ना एते भृशं सुराः । तस्मात्त्वं जहि दैत्येन्द्रं क्षिप्रं कालोऽस्य माचिरम् । एष त्वं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ॥

bhagavandevadeveśa khinnā ete bhṛśaṃ surāḥ | tasmāttvaṃ jahi daityendraṃ kṣipraṃ kālo'sya māciram | eṣa tvaṃ sagaṇaṃ daityaṃ varadānena darpitam

"हे भगवन्, देवदेवेश, ये देवता बहुत खिन्न हैं। इसलिए आप शीघ्र दैत्यराज का वध कीजिए; उसका समय आ गया है, देर न कीजिए। वरदान से घमण्डी उस दैत्य को उसके गणों सहित आप ही मारेंगे।"

विष्णुरुवाच

श्लोक 54 (2.46.54)

क्षिप्रमेव करिष्यामि त्वरया दैत्यनाशनम् । तस्मात्त्वं विबुधाश्चैव प्रतिपद्यत वै दिवम् ॥

kṣiprameva kariṣyāmi tvarayā daityanāśanam | tasmāttvaṃ vibudhāścaiva pratipadyata vai divam

"मैं शीघ्र ही, बिना देर किए, उस दैत्य का नाश करूँगा। इसलिए आप और ये देवता स्वर्ग लौट जाएँ।"

भीष्म उवाच

श्लोक 55 (2.46.55)

एवमुक्त्वा तु भगवान्विसृज्य त्रिदिवेश्वरान् । नरस्यार्धतनुर्भूत्वा सिंहस्यार्धतनुः पुनः ॥

evamuktvā tu bhagavānvisṛjya tridiveśvarān | narasyārdhatanurbhūtvā siṃhasyārdhatanuḥ punaḥ

यह कहकर और स्वर्ग के स्वामियों को विदा करके भगवान् आधे शरीर से मनुष्य और आधे से सिंह बन गए।

श्लोक 56 (2.46.56)

नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना । भीमरूपो महातेजा व्यादितास्य इवान्तकः ॥

nārasiṃhena vapuṣā pāṇiṃ saṃspṛśya pāṇinā | bhīmarūpo mahātejā vyāditāsya ivāntakaḥ

नृसिंह रूप धारण करके, हाथ से हाथ मलते हुए, भयंकर रूप वाले, महातेजस्वी, मुँह फाड़े हुए काल के समान,

श्लोक 57 (2.46.57)

हिरण्यकशिपुं राजञ्जगाम हरिरीश्वरः । दैत्यास्तमागतं दृष्ट्वा नारसिंहं महाबलम् ॥

hiraṇyakaśipuṃ rājañjagāma harirīśvaraḥ | daityāstamāgataṃ dṛṣṭvā nārasiṃhaṃ mahābalam

हे राजन्, ईश्वर हरि हिरण्यकशिपु के पास गए। महाबली नृसिंह को आया देखकर दैत्यों ने

श्लोक 58 (2.46.58)

ववर्षुः शस्त्रवर्षैस्ते सुसङ्क्रुद्धास्तदा हरिम् । तैः सृष्टसर्वशस्त्राणि भक्षयामास वै हरिः ॥

vavarṣuḥ śastravarṣaiste susaṅkruddhāstadā harim | taiḥ sṛṣṭasarvaśastrāṇi bhakṣayāmāsa vai hariḥ

अत्यन्त क्रुद्ध होकर हरि पर शस्त्रों की वर्षा की; और हरि ने उनके छोड़े हुए सारे शस्त्र खा डाले।

श्लोक 59 (2.46.59)

जघान च रणे दैत्यान्सहस्राणि बहूनि च । तान्निहत्य च दैतेयान्सर्वान्क्रुद्धान्महाबलान् ॥

jaghāna ca raṇe daityānsahasrāṇi bahūni ca | tānnihatya ca daiteyānsarvānkruddhānmahābalān

उन्होंने युद्ध में कई हज़ार दैत्यों को मार डाला; और उन सब क्रुद्ध, महाबली दैत्यों को मारकर

श्लोक 60 (2.46.60)

अभ्यधावत्सुसङ्क्रुद्धो दैत्येन्द्रं बलगर्वितम् । जीमूतघनसङ्काशो जीमूतघननिस्वनः ॥

abhyadhāvatsusaṅkruddho daityendraṃ balagarvitam | jīmūtaghanasaṅkāśo jīmūtaghananisvanaḥ

वे अत्यन्त क्रोध में बल के घमण्डी दैत्यराज की ओर दौड़े — घने बादलों के समान आकार वाले, घने मेघों के समान गर्जना करने वाले,

श्लोक 61 (2.46.61)

जीमूत इव दीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् । दैत्यं सोऽतिबलं दृप्तं दृप्तशार्दूलविक्रमम् ॥

jīmūta iva dīptaujā jīmūta iva vegavān | daityaṃ so'tibalaṃ dṛptaṃ dṛptaśārdūlavikramam

मेघ के समान दीप्त तेज वाले, मेघ के समान वेगवान् — उस अत्यन्त बलवान्, अभिमानी, गर्वीले बाघ के समान पराक्रमी दैत्य पर,

श्लोक 62 (2.46.62)

दृप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं खरैर्नखमुखैरुत । ततः कृत्वा तु युद्धं वै तेन दैत्येन वै हरिः ॥

dṛptairdaityagaṇairguptaṃ kharairnakhamukhairuta | tataḥ kṛtvā tu yuddhaṃ vai tena daityena vai hariḥ

जो तीखे नखों और मुखों वाले अभिमानी दैत्यगणों से रक्षित था। फिर उस दैत्य के साथ युद्ध करके हरि ने,

श्लोक 63 (2.46.63)

सन्ध्याकाले महातेजा भवनान्ते त्वरान्वितः । ऊरौ निधाय दैत्येन्द्रं निर्बिभेद नखैस्तदा ॥

sandhyākāle mahātejā bhavanānte tvarānvitaḥ | ūrau nidhāya daityendraṃ nirbibheda nakhaistadā

सन्ध्या के समय, महल की देहली पर, उस महातेजस्वी ने शीघ्रता से दैत्यराज को अपनी जाँघ पर रखकर नखों से चीर डाला।

श्लोक 64 (2.46.64)

महाबलं महावीर्यं वरदानेन गर्वितम् । दैत्यश्रेष्ठं सुरश्रेष्ठो जघान तरसा हरिः ॥

mahābalaṃ mahāvīryaṃ varadānena garvitam | daityaśreṣṭhaṃ suraśreṣṭho jaghāna tarasā hariḥ

देवश्रेष्ठ हरि ने वरदान के घमण्डी, महाबली, महापराक्रमी उस दैत्यश्रेष्ठ को वेग से मार डाला।

श्लोक 65 (2.46.65)

हिरण्यकशिपुं हत्वा सर्वदैत्यांश्च वै तदा । विबुधानां प्रजानां च हितं कृत्वा महाद्युतिः ॥

hiraṇyakaśipuṃ hatvā sarvadaityāṃśca vai tadā | vibudhānāṃ prajānāṃ ca hitaṃ kṛtvā mahādyutiḥ

हिरण्यकशिपु और सब दैत्यों को मारकर, देवताओं और प्रजाओं का हित करके वे महातेजस्वी

श्लोक 66 (2.46.66)

प्रमुमोद हरिर्देवः प्राप्य धर्मं तदा भुवि । एष ते नारसिंहोऽत्र कथितः पाण्डुनन्दन ॥

pramumoda harirdevaḥ prāpya dharmaṃ tadā bhuvi | eṣa te nārasiṃho'tra kathitaḥ pāṇḍunandana

देव हरि पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करके प्रसन्न हुए। हे पाण्डुनन्दन, यह मैंने तुम्हें नृसिंह-अवतार सुनाया।

श्लोक 67 (2.46.67)

शृणु त्वं वामनं नाम प्रादुर्भावं महात्मनः ॥

śṛṇu tvaṃ vāmanaṃ nāma prādurbhāvaṃ mahātmanaḥ

अब उन महात्मा के वामन नामक अवतार के विषय में सुनो।

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