सभा पर्व · अध्याय 47
वामन अवतार: विष्णु द्वारा बलि से त्रिलोक की प्राप्ति
युधिष्ठिर को विष्णु के अवतारों का वर्णन जारी रखते हुए भीष्म बताते हैं कि दैत्यराज बलि ने इन्द्र का स्थान छीन लिया था, और विष्णु अदिति के गर्भ से इन्द्र के छोटे भाई के रूप में जन्म लेकर ब्राह्मण वामन के वेश में बलि के अश्वमेध यज्ञ में पहुँचे और तीन पग भूमि माँगी। विराट रूप धारण कर उन्होंने तीन पगों में पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग को लाँघ लिया, उनके चरण से ब्रह्माण्ड फटा और एक पावन नदी बह निकली; उन्होंने असुरों को कुचला, बलि को बाँधा, उसके कुल को पाताल भेजा और तीनों लोक इन्द्र को लौटा दिए। यह दाक्षिणात्य अंश समीक्षित संस्करण के मूल पाठ में नहीं है, केवल उसके परिशिष्ट में मिलता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.47.1)
पुरा त्रेतायुगे राजन्बलिर्वैरोचनोऽभवत् । दैत्यानां पार्थिवो वीरो बलेनाप्रतिमो बली ॥
purā tretāyuge rājanbalirvairocano'bhavat | daityānāṃ pārthivo vīro balenāpratimo balī
हे राजन्, बहुत पहले त्रेतायुग में विरोचन के पुत्र बलि दैत्यों के राजा थे — वीर, बलवान और बल में अद्वितीय।
श्लोक 2 (2.47.2)
तदा बलिर्महाराज दैत्यसङ्घैः समावृतः । विजेतुं तरसा शक्रमिन्द्रस्थानमवाप सः ॥
tadā balirmahārāja daityasaṅghaiḥ samāvṛtaḥ | vijetuṃ tarasā śakramindrasthānamavāpa saḥ
तब, हे महाराज, दैत्यों के दलों से घिरे बलि ने बलपूर्वक इन्द्र को जीतने के लिए चढ़ाई की और इन्द्र का स्थान प्राप्त कर लिया।
श्लोक 3 (2.47.3)
तेन वित्रासिता देवा बलिनाऽऽखण्डलादयः । ब्रह्माणं तु पुरस्कृत्य गत्वा क्षीरोदधिं तदा ॥
tena vitrāsitā devā balinā''khaṇḍalādayaḥ | brahmāṇaṃ tu puraskṛtya gatvā kṣīrodadhiṃ tadā
बलि से भयभीत होकर इन्द्र आदि देवता ब्रह्मा को आगे करके क्षीरसागर गए।
श्लोक 4 (2.47.4)
तुष्टुवुः सहिताः सर्वे देवं नारायणं प्रभुम् । स तेषां दर्शनं चक्रे विबुधानां हरिस्तदा ॥
tuṣṭuvuḥ sahitāḥ sarve devaṃ nārāyaṇaṃ prabhum | sa teṣāṃ darśanaṃ cakre vibudhānāṃ haristadā
वहाँ सबने मिलकर भगवान नारायण की स्तुति की, और तब श्रीहरि ने उन देवताओं को दर्शन दिए।
श्लोक 5 (2.47.5)
प्रसादजं तस्य विभोरदित्यां जन्म उच्यते । अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ॥
prasādajaṃ tasya vibhoradityāṃ janma ucyate | aditerapi putratvametya yādavanandanaḥ
कहा जाता है कि उन्हीं सर्वव्यापी प्रभु की उस कृपा से अदिति के गर्भ से उनका जन्म हुआ; यादवों को आनन्द देने वाले वे अदिति के पुत्र बने,
श्लोक 6 (2.47.6)
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजोऽभवत् । तस्मिन्नेव च काले तु दैत्येन्द्रो बलवीर्यवान् ॥
eṣa viṣṇuriti khyāta indrasyāvarajo'bhavat | tasminneva ca kāle tu daityendro balavīryavān
और विष्णु नाम से विख्यात होकर इन्द्र के छोटे भाई के रूप में प्रकट हुए। उसी समय बल और पराक्रम से युक्त दैत्यराज ने
श्लोक 7 (2.47.7)
अश्वमेधं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे । वर्तमाने तदा यज्ञे दैत्येन्द्रस्य युधिष्ठिर ॥
aśvamedhaṃ kratuśreṣṭhamāhartumupacakrame | vartamāne tadā yajñe daityendrasya yudhiṣṭhira
यज्ञों में श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किया। हे युधिष्ठिर, जब दैत्यराज का वह यज्ञ चल रहा था,
श्लोक 8 (2.47.8)
स विष्णुर्मानवो भूत्वा प्रच्छन्नो ब्रह्मसंवृतः । मुण्डो यज्ञोपवीती च कृष्णाजिनधरः शिखी ॥
sa viṣṇurmānavo bhūtvā pracchanno brahmasaṃvṛtaḥ | muṇḍo yajñopavītī ca kṛṣṇājinadharaḥ śikhī
तब विष्णु मनुष्य बनकर ब्राह्मण के वेश में छिप गए — मुण्डित सिर, यज्ञोपवीत धारण किए, काले मृगचर्म से युक्त और शिखाधारी।
श्लोक 9 (2.47.9)
पालाशदण्डं सङ्गृह्य वामनोऽद्भुतदर्शनः । प्रविश्य स बलेर्यज्ञे वर्तमाने च दक्षिणाम् ॥
pālāśadaṇḍaṃ saṅgṛhya vāmano'dbhutadarśanaḥ | praviśya sa baleryajñe vartamāne ca dakṣiṇām
पलाश का दण्ड लिए, अद्भुत रूप वाले वामन बनकर वे चलते हुए बलि-यज्ञ में प्रविष्ट हुए और दक्षिणा के रूप में
श्लोक 10 (2.47.10)
देहीत्युवाच दैत्येन्द्रं विक्रमांस्त्रीनिहैव ह । दीयतां त्रिपदीमात्रमित्ययाचन्महासुरम् ॥
dehītyuvāca daityendraṃ vikramāṃstrīnihaiva ha | dīyatāṃ tripadīmātramityayācanmahāsuram
दैत्यराज से बोले — "मुझे यहीं तीन पग दो।" "केवल तीन पग भर भूमि दी जाए" — इस प्रकार उन्होंने उस महान असुर से याचना की।
श्लोक 11 (2.47.11)
स तथेति प्रतिश्रुत्य प्रददौ विष्णवे तदा । तेन लब्ध्वा हरिर्भूमिं जृम्भयामास वै भृशम् ॥
sa tatheti pratiśrutya pradadau viṣṇave tadā | tena labdhvā harirbhūmiṃ jṛmbhayāmāsa vai bhṛśam
बलि ने "ऐसा ही हो" कहकर वचन दिया और तब विष्णु को वह भूमि दे दी। उससे भूमि पाकर श्रीहरि अत्यन्त विशाल होकर बढ़ने लगे।
श्लोक 12 (2.47.12)
स शिशुः सदिवं खं च पृथिवीं च विशाम्पते । त्रिभिर्विक्रमणैश्चैव सर्वमाक्रमताभिभूः ॥
sa śiśuḥ sadivaṃ khaṃ ca pṛthivīṃ ca viśāmpate | tribhirvikramaṇaiścaiva sarvamākramatābhibhūḥ
हे प्रजानाथ, उस बालक ने तीन पगों में स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी — सब कुछ लाँघकर अपने अधीन कर लिया।
श्लोक 13 (2.47.13)
बलेर्बलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा । विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः ॥
balerbalavato yajñe balinā viṣṇunā purā | vikramaistribhirakṣobhyāḥ kṣobhitāste mahāsurāḥ
प्राचीन काल में बलवान बलि के यज्ञ में बलशाली विष्णु के तीन पगों से वे महान असुर विचलित हो उठे, जिन्हें कोई डिगा नहीं सकता था।
श्लोक 14 (2.47.14)
विप्रचित्तिमुखाः क्रुद्धाः सर्वसङ्घा महासुराः । नानावक्त्रा महाकाया नानावेषधरा नृप ॥
vipracittimukhāḥ kruddhāḥ sarvasaṅghā mahāsurāḥ | nānāvaktrā mahākāyā nānāveṣadharā nṛpa
विप्रचित्ति आदि सभी महान असुर-दल क्रोध से भर उठे — हे राजन्, वे अनेक प्रकार के मुखों वाले, विशालकाय और नाना वेश धारण किए हुए थे;
श्लोक 15 (2.47.15)
नानाप्रहरणा रौद्रा नानामाल्यानुलेपनाः । स्वान्यायुधानि सङ्गृह्य प्रदीप्ता इव तेजसा ॥
nānāpraharaṇā raudrā nānāmālyānulepanāḥ | svānyāyudhāni saṅgṛhya pradīptā iva tejasā
नाना प्रकार के शस्त्र लिए, भयंकर, अनेक मालाओं और अंगरागों से सजे वे अपने-अपने आयुध उठाकर मानो तेज से जलते हुए,
श्लोक 16 (2.47.16)
क्रममाणं हरिं तत्र उपावर्तन्त भारत । प्रमथ्य सर्वान्दैतेयान्पादहस्ततलैस्तु तान् ॥
kramamāṇaṃ hariṃ tatra upāvartanta bhārata | pramathya sarvāndaiteyānpādahastatalaistu tān
हे भारत, वहाँ पग बढ़ाते हुए श्रीहरि पर टूट पड़े। उन सब दैत्यों को अपने पैरों और हथेलियों से मसलकर
श्लोक 17 (2.47.17)
रूपं कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम् । सम्प्राप्य दिवमाकाशमादित्यसदने स्थितः ॥
rūpaṃ kṛtvā mahābhīmaṃ jahārāśu sa medinīm | samprāpya divamākāśamādityasadane sthitaḥ
उन्होंने अत्यन्त भयानक रूप धारण किया और शीघ्र ही पृथ्वी को ले लिया। फिर स्वर्ग और आकाश तक पहुँचकर वे सूर्य के धाम में स्थित हुए।
श्लोक 18 (2.47.18)
अत्यरोचत भूतात्मा आदित्यस्यैव तेजसा । प्रकाशयन्दिशः सर्वाः प्रदिशश्च महायशाः ॥
atyarocata bhūtātmā ādityasyaiva tejasā | prakāśayandiśaḥ sarvāḥ pradiśaśca mahāyaśāḥ
सब प्राणियों के आत्मा, वे महायशस्वी प्रभु सूर्य के समान तेज से दमक उठे और सभी दिशाओं तथा उपदिशाओं को आलोकित करने लगे।
श्लोक 19 (2.47.19)
शुशुभे स महाबाहुः सर्वलोकान्प्रकाशयन् । तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे ॥
śuśubhe sa mahābāhuḥ sarvalokānprakāśayan | tasya vikramato bhūmiṃ candrādityau stanāntare
वे महाबाहु सब लोकों को प्रकाशित करते हुए शोभायमान हुए। जब वे पृथ्वी पर पग रख रहे थे, तब चन्द्रमा और सूर्य उनके वक्षःस्थल पर थे;
श्लोक 20 (2.47.20)
नभस्तु क्रममाणस्य नाभ्यां किल तदा स्थितौ । परमाक्रममाणस्य जानुभ्यां तौ व्यवस्थितौ ॥
nabhastu kramamāṇasya nābhyāṃ kila tadā sthitau | paramākramamāṇasya jānubhyāṃ tau vyavasthitau
जब वे आकाश को लाँघ रहे थे, तब वे दोनों उनकी नाभि पर थे, और जब वे उससे भी परे पग बढ़ा रहे थे, तब वे उनके घुटनों पर स्थित थे।
श्लोक 21 (2.47.21)
विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः । अथास्य पादाक्रमणात्पफालाण्डो युधिष्ठिर ॥
viṣṇoramitavīryasya vadantyevaṃ dvijātayaḥ | athāsya pādākramaṇātpaphālāṇḍo yudhiṣṭhira
अपरिमित पराक्रमी विष्णु के विषय में द्विज ऐसा ही कहते हैं। हे युधिष्ठिर, तब उनके चरण के दबाव से ब्रह्माण्ड फट गया।
श्लोक 22 (2.47.22)
तच्छिद्रात्स्यन्दिनी तस्य पादभ्रष्टा तु निम्नगा । ससार सागरं सा तु पावनी सागरंगमा ॥
tacchidrātsyandinī tasya pādabhraṣṭā tu nimnagā | sasāra sāgaraṃ sā tu pāvanī sāgaraṃgamā
उस छिद्र से उनके चरण से गिरती हुई एक नदी बह निकली; सागर की ओर जाने वाली वह पावन नदी समुद्र तक बह चली।
श्लोक 23 (2.47.23)
जहार मेदिनीं सर्वां हत्वा दानवपुङ्गवान् । आसुरीं श्रियमाहृत्य त्रील्लोकान्स जनार्दनः ॥
jahāra medinīṃ sarvāṃ hatvā dānavapuṅgavān | āsurīṃ śriyamāhṛtya trīllokānsa janārdanaḥ
जनार्दन ने श्रेष्ठ दानवों को मारकर समूची पृथ्वी ले ली और असुरों की लक्ष्मी तथा तीनों लोक हर लिए।
श्लोक 24 (2.47.24)
सपुत्रदारानसुरान्पाताले संन्यवेशयत् । नमुचिः शम्बरश्चैव प्रह्लादश्च महामनाः । पादपाताभिनिर्धूताः पाताले विनिपातिताः ॥
saputradārānasurānpātāle saṃnyaveśayat | namuciḥ śambaraścaiva prahlādaśca mahāmanāḥ | pādapātābhinirdhūtāḥ pātāle vinipātitāḥ
उन्होंने असुरों को उनके पुत्रों और स्त्रियों सहित पाताल में बसा दिया। नमुचि, शम्बर और महामना प्रह्लाद उनके चरण-प्रहारों से झकझोरे जाकर पाताल में गिरा दिए गए।
श्लोक 25 (2.47.25)
महाभूतानि भूतात्मा सविशेषाणि वै हरिः । कालं च सकलं राजन्गात्रभूतान्यदर्शयत् ॥
mahābhūtāni bhūtātmā saviśeṣāṇi vai hariḥ | kālaṃ ca sakalaṃ rājangātrabhūtānyadarśayat
हे राजन्, भूतात्मा श्रीहरि ने अपने सब विशेषों सहित महाभूतों को और सम्पूर्ण काल को अपने शरीर के अंगों के रूप में दिखा दिया।
श्लोक 26 (2.47.26)
तस्य गात्रे जगत्सर्वमानीतमधिपश्यति । न किञ्चिदस्ति लोकेषु यदनाप्तं महात्मना ॥
tasya gātre jagatsarvamānītamadhipaśyati | na kiñcidasti lokeṣu yadanāptaṃ mahātmanā
उनके शरीर में सम्पूर्ण जगत समाया हुआ दिखाई देता था; लोकों में ऐसा कुछ भी नहीं जो उन महात्मा को प्राप्त न हो।
श्लोक 27 (2.47.27)
तद्धि रूपमुपेन्द्रस्य देवदानवमानवाः । दृष्ट्वा संमुमुहुः सर्वे विष्णुतेजोऽभिपीडिताः ॥
taddhi rūpamupendrasya devadānavamānavāḥ | dṛṣṭvā saṃmumuhuḥ sarve viṣṇutejo'bhipīḍitāḥ
उपेन्द्र का वह रूप देखकर देवता, दानव और मनुष्य सब विष्णु के तेज से अभिभूत होकर मोहित हो गए।
श्लोक 28 (2.47.28)
बलिर्बद्धोऽभिमानी च यज्ञवाटे महात्मना । विरोचनकुलं सर्वं पाताले विनिवेशितम् ॥
balirbaddho'bhimānī ca yajñavāṭe mahātmanā | virocanakulaṃ sarvaṃ pātāle viniveśitam
अभिमानी बलि को उन महात्मा ने यज्ञशाला में ही बाँध लिया, और विरोचन का सारा कुल पाताल में बसा दिया गया।
श्लोक 29 (2.47.29)
एवंविधानि कर्माणि कृत्वा गरुडवाहनः । न विस्मयमुपागच्छत्पारमेष्ठ्येन तेजसा ॥
evaṃvidhāni karmāṇi kṛtvā garuḍavāhanaḥ | na vismayamupāgacchatpārameṣṭhyena tejasā
ऐसे-ऐसे कर्म करके भी गरुडवाहन अपने परमेष्ठी तेज के कारण तनिक भी गर्व को प्राप्त नहीं हुए।
श्लोक 30 (2.47.30)
स सर्वमसुरैश्वर्यं सम्प्रदाय शचीपतेः । त्रैलोक्यं च ददौ शक्रे विष्णुर्दानवसूदनः ॥
sa sarvamasuraiśvaryaṃ sampradāya śacīpateḥ | trailokyaṃ ca dadau śakre viṣṇurdānavasūdanaḥ
दानवों का संहार करने वाले विष्णु ने असुरों का सारा ऐश्वर्य शचीपति को सौंप दिया और तीनों लोक इन्द्र को दे दिए।
श्लोक 31 (2.47.31)
एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः । वेदविद्भिर्द्विजैरेतच्छ्रूयते वैष्णवं यशः । मानुषेषु ततो विष्णोः प्रादुर्भावांस्तथा शृणु ॥
eṣa te vāmano nāma prādurbhāvo mahātmanaḥ | vedavidbhirdvijairetacchrūyate vaiṣṇavaṃ yaśaḥ | mānuṣeṣu tato viṣṇoḥ prādurbhāvāṃstathā śṛṇu
यह उन महात्मा का वामन नामक अवतार है; विष्णु का यह यश वेदज्ञ ब्राह्मणों से सुना जाता है। अब इसी प्रकार मनुष्यों में हुए विष्णु के अवतारों के विषय में सुनो।