सभा पर्व · अध्याय 48
दत्तात्रेय अवतार और कार्तवीर्य अर्जुन के वर
भीष्म विष्णु के दत्तात्रेय नामक ऋषि-अवतार का वर्णन करते हैं, जिन्होंने धर्म के क्षीण होने पर लुप्त वेदों, यज्ञ-कर्मों और चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था को फिर से स्थापित किया। हैहयराज अर्जुन ने वन में दीर्घकाल तक उनकी सेवा की और चार वर पाए — सहस्र भुजाएँ और राजोचित गुण, सब प्राणियों पर धर्मपूर्वक शासन, यज्ञ और शत्रुओं पर विजय, तथा केवल अद्वितीय पुरुष के हाथों मृत्यु। कार्तवीर्य ने पृथ्वी और द्वीपों को जीता, राज्य को चार भागों में बाँटा और ऐसा पालन किया कि कहीं द्वार बंद नहीं होते थे। इस प्रसंग-शृंखला का यह अंश भी समीक्षित संस्करण में केवल परिशिष्ट में है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.48.1)
विष्णोः पुनर्महाभागः प्रादुर्भावो महात्मनः । दत्तात्रेय इति ख्यात ऋषिरासीन्महायशाः ॥
viṣṇoḥ punarmahābhāgaḥ prādurbhāvo mahātmanaḥ | dattātreya iti khyāta ṛṣirāsīnmahāyaśāḥ
फिर महात्मा विष्णु का एक और अत्यन्त भाग्यशाली अवतार हुआ — महायशस्वी ऋषि, जो दत्तात्रेय नाम से विख्यात हुए।
श्लोक 2 (2.48.2)
तेन नष्टेषु वेदेषु क्रियासु च मखेषु च । चातुर्वर्ण्ये च सङ्कीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ॥
tena naṣṭeṣu vedeṣu kriyāsu ca makheṣu ca | cāturvarṇye ca saṅkīrṇe dharme śithilatāṃ gate
जब वेद, कर्मकाण्ड और यज्ञ लुप्त हो गए थे, चारों वर्ण आपस में मिल गए थे और धर्म शिथिल पड़ गया था;
श्लोक 3 (2.48.3)
अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टे स्थितेऽनृते । प्रजासु क्षीयमाणासु धर्मे चामूलतां गते ॥
abhivardhati cādharme satye naṣṭe sthite'nṛte | prajāsu kṣīyamāṇāsu dharme cāmūlatāṃ gate
जब अधर्म बढ़ रहा था, सत्य नष्ट हो गया था और असत्य जम गया था, प्रजा क्षीण हो रही थी और धर्म की जड़ें उखड़ गई थीं;
श्लोक 4 (2.48.4)
सयज्ञाः सक्रिया वेदाः प्रत्यानीता हि तेन वै । चातुर्वर्ण्यमसङ्कीर्णं कृतं तेन महात्मना ॥
sayajñāḥ sakriyā vedāḥ pratyānītā hi tena vai | cāturvarṇyamasaṅkīrṇaṃ kṛtaṃ tena mahātmanā
तब उन्होंने ही यज्ञों और कर्मकाण्ड सहित वेदों को फिर से लौटाया, और उन महात्मा ने चारों वर्णों को फिर से अलग-अलग व्यवस्थित किया।
श्लोक 5 (2.48.5)
स एव वै यदा प्रादाद्धैहयाधिपतेर्वरम् । तं हैहयानामधिपस्त्वर्जुनोऽभिप्रसादयन् ॥
sa eva vai yadā prādāddhaihayādhipatervaram | taṃ haihayānāmadhipastvarjuno'bhiprasādayan
उन्होंने ही हैहयों के अधिपति को वर दिया था, जब हैहयराज अर्जुन उन्हें प्रसन्न करने में लगे थे।
श्लोक 6 (2.48.6)
वनं पर्यचरन्सम्यक्छुश्रूषुरनसूयकः । निर्ममो निरहङ्कारो दीर्घकालमतोषयत् ॥
vanaṃ paryacaransamyakchuśrūṣuranasūyakaḥ | nirmamo nirahaṅkāro dīrghakālamatoṣayat
वन में भली-भाँति उनकी सेवा करते हुए, आज्ञाकारी और ईर्ष्या-रहित, ममता और अहंकार से मुक्त रहकर उन्होंने दीर्घकाल तक उन्हें सन्तुष्ट किया।
श्लोक 7 (2.48.7)
आराध्य दत्तात्रेयं हि अगृह्णात्स वरानिमान् । आप्तादाप्ततरान्विप्राद्विद्वान्विद्वन्निषेवितात् ॥
ārādhya dattātreyaṃ hi agṛhṇātsa varānimān | āptādāptatarānviprādvidvānvidvanniṣevitāt
दत्तात्रेय की आराधना करके उस विद्वान राजा ने विश्वसनीयों में भी अधिक विश्वसनीय, विद्वानों से सेवित उन ब्राह्मण से ये वर प्राप्त किए।
श्लोक 8 (2.48.8)
ऋतेऽमरत्वं विप्रेण दत्तात्रेयेण धीमता । वरैश्चतुर्भिः प्रवृत इमान्वव्रे वरान्नृपः ॥
ṛte'maratvaṃ vipreṇa dattātreyeṇa dhīmatā | varaiścaturbhiḥ pravṛta imānvavre varānnṛpaḥ
बुद्धिमान ब्राह्मण दत्तात्रेय ने अमरता को छोड़कर चार वर देने को कहा, तब राजा ने ये वर माँगे —
श्लोक 9 (2.48.9)
श्रीमान्मनस्वी बलवान्सत्यवागनसूयकः । सहस्रबाहुर्भूयासमेषु मे प्रथमो वरः ॥
śrīmānmanasvī balavānsatyavāganasūyakaḥ | sahasrabāhurbhūyāsameṣu me prathamo varaḥ
"मैं श्रीमान, मनस्वी, बलवान, सत्यवादी और ईर्ष्या-रहित होऊँ तथा मेरी सहस्र भुजाएँ हों — यह मेरा पहला वर है।
श्लोक 10 (2.48.10)
जरायुजाण्डजं सर्वं सर्वं चैव चराचरम् । शास्तुमिच्छामि धर्मेण द्वितीयस्त्वेष मे वरः ॥
jarāyujāṇḍajaṃ sarvaṃ sarvaṃ caiva carācaram | śāstumicchāmi dharmeṇa dvitīyastveṣa me varaḥ
जरायुज और अण्डज सभी प्राणियों पर, सम्पूर्ण चराचर जगत पर मैं धर्म से शासन करना चाहता हूँ — यह मेरा दूसरा वर है।
श्लोक 11 (2.48.11)
पितृन्देवानृषीन्विप्रान्यजेयं विपुलैर्मखैः । अमित्रांश्च शितैर्बाणैस्तृतीयो वर एष मे ॥
pitṛndevānṛṣīnviprānyajeyaṃ vipulairmakhaiḥ | amitrāṃśca śitairbāṇaistṛtīyo vara eṣa me
मैं पितरों, देवताओं, ऋषियों और ब्राह्मणों का विपुल यज्ञों से यजन करूँ, और शत्रुओं का तीखे बाणों से (संहार करूँ) — यह मेरा तीसरा वर है।
श्लोक 12 (2.48.12)
यस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृशः पुमान् । इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति ॥
yasya nāsīnna bhavitā na cāsti sadṛśaḥ pumān | iha vā divi vā loke sa me hantā bhavediti
जिसके समान पुरुष न कभी हुआ, न होगा और न अभी है — इस लोक में या स्वर्ग में — वही मेरा वध करने वाला हो।"
श्लोक 13 (2.48.13)
सोऽर्जुनः कृतवीर्यस्य वरः पुत्रोऽभवद्युधि । स सहस्रं सहस्राणां माहिष्मत्यामवर्धत ॥
so'rjunaḥ kṛtavīryasya varaḥ putro'bhavadyudhi | sa sahasraṃ sahasrāṇāṃ māhiṣmatyāmavardhata
कृतवीर्य का वह श्रेष्ठ पुत्र अर्जुन युद्ध में पराक्रमी हुआ; माहिष्मती में वह सहस्रों-सहस्रों का स्वामी होकर समृद्ध हुआ।
श्लोक 14 (2.48.14)
स भूमिमखिलां जित्वा द्वीपांश्चापि समुद्रिणः । नभसीवाज्वलत्सूर्यः पुण्यैः कर्मभिरर्जुनः ॥
sa bhūmimakhilāṃ jitvā dvīpāṃścāpi samudriṇaḥ | nabhasīvājvalatsūryaḥ puṇyaiḥ karmabhirarjunaḥ
सारी पृथ्वी और समुद्र के द्वीपों को जीतकर अर्जुन अपने पुण्य कर्मों से आकाश में सूर्य के समान दमक उठा।
श्लोक 15 (2.48.15)
इन्द्रद्वीपं कशेरुं च कामद्वीपं गभस्तिमत् । गन्धर्ववरुणद्वीपं सौहृष्टममितप्रभः ॥
indradvīpaṃ kaśeruṃ ca kāmadvīpaṃ gabhastimat | gandharvavaruṇadvīpaṃ sauhṛṣṭamamitaprabhaḥ
अपरिमित तेज वाले उस वीर ने इन्द्रद्वीप, कशेरु, कामद्वीप, गभस्तिमान्, गन्धर्वद्वीप, वरुणद्वीप और सौहृष्ट —
श्लोक 16 (2.48.16)
पूर्वैरजितपूर्वांश्च द्वीपानजयदर्जुनः । इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः ॥
pūrvairajitapūrvāṃśca dvīpānajayadarjunaḥ | idaṃ tu kārtavīryasya babhūvāsadṛśaṃ janaiḥ
— इन द्वीपों को, जिन्हें पहले कोई नहीं जीत पाया था, अर्जुन ने जीत लिया। और कार्तवीर्य की यह बात मनुष्यों में अनुपम थी,
श्लोक 17 (2.48.17)
न पूर्वे नापरे तस्य गमिष्यन्ति गतिं नृपाः । यदर्णवे प्रयातस्य वस्त्रं न परिषिच्यते ॥
na pūrve nāpare tasya gamiṣyanti gatiṃ nṛpāḥ | yadarṇave prayātasya vastraṃ na pariṣicyate
जिस गति को वह प्राप्त हुआ, उसे न पहले के राजा पा सके, न आगे के पा सकेंगे — जब वह समुद्र पर चलता था तो उसका वस्त्र भी नहीं भीगता था।
श्लोक 18 (2.48.18)
सौवर्णं सर्वमप्यासीद्विमानवरमुत्तमम् । चतुर्धा व्यभजद्राष्ट्रं तद्विभज्यान्वपालयत् ॥
sauvarṇaṃ sarvamapyāsīdvimānavaramuttamam | caturdhā vyabhajadrāṣṭraṃ tadvibhajyānvapālayat
उसका उत्तम श्रेष्ठ विमान पूरा-का-पूरा सोने का था। उसने अपने राज्य को चार भागों में बाँटा और इस प्रकार बाँटकर उसका पालन किया —
श्लोक 19 (2.48.19)
एकांशेनाहरत्सेनामेकांशेनावसद्गृहान् । यस्तु तस्य तृतीयांशो राज्ञोऽभूज्जनसङ्ग्रहे ॥
ekāṃśenāharatsenāmekāṃśenāvasadgṛhān | yastu tasya tṛtīyāṃśo rājño'bhūjjanasaṅgrahe
एक भाग से उसने सेना का भरण किया, एक भाग से गृहस्थी चलाई; और उस राजा का जो तीसरा भाग प्रजा के पालन के लिए था,
श्लोक 20 (2.48.20)
आप्तः परमकल्याणस्तेन यज्ञानकल्पयत् । ये दस्यवो ग्रामचरा अरण्ये च वसन्ति ये ॥
āptaḥ paramakalyāṇastena yajñānakalpayat | ye dasyavo grāmacarā araṇye ca vasanti ye
वह विश्वसनीय और परम कल्याणकारी था — उससे उसने यज्ञों का आयोजन किया। जो लुटेरे गाँवों में घूमते थे और जो वन में रहते थे,
श्लोक 21 (2.48.21)
चतुर्थेन तु सोऽंशेन तान्सर्वान्प्रत्यषेधयत् । द्वाराणि नापिधीयन्ते पुरेषु नगरेषु च ॥
caturthena tu so'ṃśena tānsarvānpratyaṣedhayat | dvārāṇi nāpidhīyante pureṣu nagareṣu ca
उन सबको उसने चौथे भाग से रोक रखा। नगरों और पुरों में द्वार बंद नहीं किए जाते थे।
श्लोक 22 (2.48.22)
स एव राष्ट्रपालोऽभूत्स्त्रीपालोऽभवदर्जुनः । स एवासीदजापालः स गोपालो विशाम्पते ॥
sa eva rāṣṭrapālo'bhūtstrīpālo'bhavadarjunaḥ | sa evāsīdajāpālaḥ sa gopālo viśāmpate
हे प्रजानाथ, अर्जुन ही राष्ट्र का रक्षक था और वही स्त्रियों का रक्षक; वही बकरियों का पालक था और वही गौओं का पालक।
श्लोक 23 (2.48.23)
शतं वर्षसहस्राणामनुशिष्यार्जुनो महीम् । दत्तात्रेयप्रसादेन एवं राज्यं चकार सः ॥
śataṃ varṣasahasrāṇāmanuśiṣyārjuno mahīm | dattātreyaprasādena evaṃ rājyaṃ cakāra saḥ
अर्जुन ने एक लाख वर्षों तक पृथ्वी का शासन किया; दत्तात्रेय की कृपा से उसने इसी प्रकार राज्य किया।
श्लोक 24 (2.48.24)
एवं बहूनि कर्माणि चक्रे लोकहिताय सः । दत्तात्रेय इति ख्यातः प्रादुर्भावो ह्ययं हरेः । कथितो भरतश्रेष्ठ शृणु भूयो महात्मनः ॥
evaṃ bahūni karmāṇi cakre lokahitāya saḥ | dattātreya iti khyātaḥ prādurbhāvo hyayaṃ hareḥ | kathito bharataśreṣṭha śṛṇu bhūyo mahātmanaḥ
इस प्रकार उन्होंने लोकहित के लिए अनेक कर्म किए। हे भरतश्रेष्ठ, श्रीहरि का दत्तात्रेय नाम से विख्यात यह अवतार कहा गया; अब उन महात्मा के विषय में और सुनो।