सभा पर्व · अध्याय 49
जमदग्निपुत्र परशुराम
भीष्म भृगुवंश में जमदग्नि के पुत्र राम के रूप में विष्णु के जन्म का वर्णन करते हैं। उन्होंने सहस्रबाहु कार्तवीर्य का वध किया, क्षत्रियों से पीड़ित ब्राह्मणों की पुकार पर अनेक जनपदों के राजाओं का संहार किया, इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन किया, रक्त के सरोवरों में पितरों का तर्पण किया और सहस्रों अश्वमेध करके पृथ्वी कश्यप को दे दी। सौभ के स्वामी शाल्व से युद्ध करते समय उन्होंने कन्याओं को गाते सुना कि सौभ का नाश कृष्ण करेंगे, तब शस्त्र त्यागकर वे तप में लग गए। समीक्षित संस्करण में यह अंश केवल परिशिष्ट में है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.49.1)
तथा भृगुकुले जन्म यदर्थं च महात्मनः । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावश्च वैष्णवः ॥
tathā bhṛgukule janma yadarthaṃ ca mahātmanaḥ | jāmadagnya iti khyātaḥ prādurbhāvaśca vaiṣṇavaḥ
इसी प्रकार भृगुकुल में उन महात्मा के जन्म और उसके प्रयोजन के विषय में सुनो — विष्णु का वह अवतार जो जामदग्न्य नाम से विख्यात है।
श्लोक 2 (2.49.2)
जमदग्निसुतो राजन्रामो नाम स वीर्यवान् । हेहयान्तकरो राजन्स रामो बलिनां वरः ॥
jamadagnisuto rājanrāmo nāma sa vīryavān | hehayāntakaro rājansa rāmo balināṃ varaḥ
हे राजन्, जमदग्नि के पुत्र राम नाम के पराक्रमी वीर थे; हे राजन्, बलवानों में श्रेष्ठ वे राम हैहयों का अन्त करने वाले थे।
श्लोक 3 (2.49.3)
कार्तवीर्यो महावीर्यो बलेनाप्रतिमस्तदा । रामेण जामदग्न्येन हतो विषममाचरन् ॥
kārtavīryo mahāvīryo balenāpratimastadā | rāmeṇa jāmadagnyena hato viṣamamācaran
महापराक्रमी कार्तवीर्य, जो उस समय बल में अद्वितीय था, अन्याय करने के कारण जमदग्निपुत्र राम के हाथों मारा गया।
श्लोक 4 (2.49.4)
तं कार्तवीर्यं राजानं हेहयानामरिन्दमम् । रथस्थं पार्थिवं रामः पातयित्वाऽवधीद्रणे ॥
taṃ kārtavīryaṃ rājānaṃ hehayānāmarindamam | rathasthaṃ pārthivaṃ rāmaḥ pātayitvā'vadhīdraṇe
हैहयों में शत्रुओं का दमन करने वाले उस राजा कार्तवीर्य को, जो रथ पर खड़ा था, राम ने युद्ध में नीचे गिराकर मार डाला।
श्लोक 5 (2.49.5)
जम्भस्य यज्ञं हत्वा स ऋत्विजश्चैव संस्तरे । जम्भस्य मूर्ध्नि भेत्ता च हन्ता च शतदुन्दुभेः ॥
jambhasya yajñaṃ hatvā sa ṛtvijaścaiva saṃstare | jambhasya mūrdhni bhettā ca hantā ca śatadundubheḥ
उन्होंने जम्भ के यज्ञ को और यज्ञ-आसनों पर बैठे ऋत्विजों को नष्ट किया; उन्होंने जम्भ का सिर फोड़ा और शतदुन्दुभि का वध किया।
श्लोक 6 (2.49.6)
स एष कृष्णो गोविन्दो जातो भृगुषु वीर्यवान् । सहस्रबाहुमुद्धर्तुं सहस्रजितमाहवे ॥
sa eṣa kṛṣṇo govindo jāto bhṛguṣu vīryavān | sahasrabāhumuddhartuṃ sahasrajitamāhave
यही कृष्ण गोविन्द भृगुवंश में पराक्रमी रूप में जन्मे थे, ताकि युद्ध में सहस्रों को जीतने वाले सहस्रबाहु को उखाड़ फेंकें।
श्लोक 7 (2.49.7)
क्षत्रियाणां चतुष्पष्टिमयुतानि महायशाः । सरस्वत्यां समेतानि एष वै धनुषाऽजयत् ॥
kṣatriyāṇāṃ catuṣpaṣṭimayutāni mahāyaśāḥ | sarasvatyāṃ sametāni eṣa vai dhanuṣā'jayat
इन महायशस्वी ने अपने धनुष से सरस्वती के तट पर एकत्र हुए चौंसठ अयुत, अर्थात् छह लाख चालीस हज़ार क्षत्रियों को जीत लिया।
श्लोक 8 (2.49.8)
ब्रह्मद्विषां वधे तस्मिन्सहस्राणि चतुर्दश । पुनर्जघान शूराणामतिक्रूरो रथर्षभः ॥
brahmadviṣāṃ vadhe tasminsahasrāṇi caturdaśa | punarjaghāna śūrāṇāmatikrūro ratharṣabhaḥ
ब्राह्मणद्वेषियों के उस संहार में अत्यन्त कठोर, रथियों में श्रेष्ठ उन्होंने फिर चौदह हज़ार शूरवीरों को मार डाला।
श्लोक 9 (2.49.9)
ततो राज्ञां सहस्रं स भङ्क्ता पूर्वमरिन्दमः । सहस्रं मुसलेनाहन्सहस्रमुदकृन्तत ॥
tato rājñāṃ sahasraṃ sa bhaṅktā pūrvamarindamaḥ | sahasraṃ musalenāhansahasramudakṛntata
फिर उन शत्रुदमन ने पहले एक हज़ार राजाओं को तोड़ डाला; एक हज़ार को मूसल से मारा और एक हज़ार के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
श्लोक 10 (2.49.10)
चतुर्दशसहस्राणि कणधूममपाययत् । शिष्टान्ब्रह्मद्विषो जित्वा ततोऽस्नायत भार्गवः ॥
caturdaśasahasrāṇi kaṇadhūmamapāyayat | śiṣṭānbrahmadviṣo jitvā tato'snāyata bhārgavaḥ
चौदह हज़ार को उन्होंने भूसी का धुआँ पिलाया; फिर बचे हुए ब्राह्मणद्वेषियों को जीतकर भार्गव ने स्नान किया।
श्लोक 11 (2.49.11)
रामरामेत्यभिक्रुष्टो ब्राह्मणैः क्षत्रियार्दितैः । निघ्नञ्शतसहस्राणि रामः परशुनाभिभूः ॥
rāmarāmetyabhikruṣṭo brāhmaṇaiḥ kṣatriyārditaiḥ | nighnañśatasahasrāṇi rāmaḥ paraśunābhibhūḥ
क्षत्रियों से पीड़ित ब्राह्मणों ने "राम! राम!" कहकर पुकारा, तब समर्थ राम ने अपने परशु से लाखों को मार डाला।
श्लोक 12 (2.49.12)
न ह्यमृष्यत तां वाचमार्तैर्भृशमुदीरिताम् । भृगो रामाभिधावेति यदाऽक्रन्दन्द्विजातयः ॥
na hyamṛṣyata tāṃ vācamārtairbhṛśamudīritām | bhṛgo rāmābhidhāveti yadā'krandandvijātayaḥ
जब द्विज "हे भृगुवंशी राम, दौड़ो!" कहकर विलाप करने लगे, तब पीड़ितों की ज़ोर से उठी वह पुकार वे सह न सके।
श्लोक 13 (2.49.13)
काश्मीरान्दरदान्कुन्तीन्क्षुद्रकान्मालवाञ्छकान् । चेदिकाशिकरूशांश्च ऋषिकान्क्रथकैशिकान् ॥
kāśmīrāndaradānkuntīnkṣudrakānmālavāñchakān | cedikāśikarūśāṃśca ṛṣikānkrathakaiśikān
काश्मीर, दरद, कुन्ति, क्षुद्रक, मालव और शक; चेदि, काशि और करूश; ऋषिक, क्रथ और कैशिक;
श्लोक 14 (2.49.14)
अङ्गान्वङ्गान्कलिङ्गांश्च मागधान्काशिकोसलान् । रात्रायणान्वीतिहोत्रान्किरातान्मार्त्तिकावतान् ॥
aṅgānvaṅgānkaliṅgāṃśca māgadhānkāśikosalān | rātrāyaṇānvītihotrānkirātānmārttikāvatān
अंग, वंग और कलिंग, मगध, काशि और कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात और मार्त्तिकावत —
श्लोक 15 (2.49.15)
एतानन्यांश्च राजन्यान्देशेदेशे सहस्रशः । निकृत्य निशितैर्बाणैः सम्प्रदाय विवस्वते ॥
etānanyāṃśca rājanyāndeśedeśe sahasraśaḥ | nikṛtya niśitairbāṇaiḥ sampradāya vivasvate
इन्हें और देश-देश के अन्य सहस्रों क्षत्रियों को उन्होंने तीखे बाणों से काटकर सूर्य को अर्पित कर दिया।
श्लोक 16 (2.49.16)
कीर्णा क्षत्रियकोटीभिर्मेरुमन्दरभूषणा । त्रिः सप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥
kīrṇā kṣatriyakoṭībhirmerumandarabhūṣaṇā | triḥ saptakṛtvaḥ pṛthivī tena niḥkṣatriyā kṛtā
करोड़ों क्षत्रियों से पटी, मेरु और मन्दर से सुशोभित पृथ्वी को उन्होंने इक्कीस बार क्षत्रिय-विहीन कर दिया।
श्लोक 17 (2.49.17)
कृत्वा निःक्षत्रियां चैव भार्गवः स महायशाः । इन्द्रगोपकवर्णस्य जीवञ्जीवनिभस्य च ॥
kṛtvā niḥkṣatriyāṃ caiva bhārgavaḥ sa mahāyaśāḥ | indragopakavarṇasya jīvañjīvanibhasya ca
पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन करके उन महायशस्वी भार्गव ने इन्द्रगोप कीट के रंग वाले, जीवंजीव पक्षी जैसे लाल
श्लोक 18 (2.49.18)
पूरयित्वा च सरितः क्षतजस्य सरांसि च । चकार तर्पणं वीरः पितॄणां तासु तेषु च ॥
pūrayitvā ca saritaḥ kṣatajasya sarāṃsi ca | cakāra tarpaṇaṃ vīraḥ pitṝṇāṃ tāsu teṣu ca
रक्त से नदियों और सरोवरों को भर दिया, और उस वीर ने उन्हीं नदियों और सरोवरों में पितरों का तर्पण किया।
श्लोक 19 (2.49.19)
सर्वानष्टादश द्वीपान्वशमानीय भार्गवः । सोऽश्वमेधसहस्राणि नरमेधशतानि च ॥
sarvānaṣṭādaśa dvīpānvaśamānīya bhārgavaḥ | so'śvamedhasahasrāṇi naramedhaśatāni ca
सभी अठारह द्वीपों को वश में करके भार्गव ने सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों नरमेध यज्ञ किए,
श्लोक 20 (2.49.20)
इष्ट्वा सागरपर्यन्तां काश्यपाय महीं ददौ । तस्याग्रेणानुपर्येति भूमिं कृत्वा विपांसुलाम् ॥
iṣṭvā sāgaraparyantāṃ kāśyapāya mahīṃ dadau | tasyāgreṇānuparyeti bhūmiṃ kṛtvā vipāṃsulām
और यज्ञ करके समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी कश्यप को दे दी। धूल-रहित की गई पृथ्वी उनके आगे-आगे परिक्रमा करती है।
श्लोक 21 (2.49.21)
ततः कालकृतां सत्यां भार्गवाय महात्मने । गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ॥
tataḥ kālakṛtāṃ satyāṃ bhārgavāya mahātmane | gāthāmapyatra gāyanti ye purāṇavido janāḥ
तब पुराणों के ज्ञाता लोग इस विषय में महात्मा भार्गव के सम्बन्ध में काल द्वारा रची गई एक सच्ची गाथा गाते हैं —
श्लोक 22 (2.49.22)
वेदिमष्टादशोत्सेधां हिरण्यस्यातिपौरुषीम् । रामेण जामदग्न्येन प्रतिजग्राह काश्यपः ॥
vedimaṣṭādaśotsedhāṃ hiraṇyasyātipauruṣīm | rāmeṇa jāmadagnyena pratijagrāha kāśyapaḥ
"अठारह हाथ ऊँची, मनुष्य से भी ऊँची सोने की वेदी कश्यप ने जमदग्निपुत्र राम से ग्रहण की।"
श्लोक 23 (2.49.23)
एवमिष्ट्वा महाबाहुः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । अन्यद्वर्षशतं रामः सौभे साल्वमयोधयत् ॥
evamiṣṭvā mahābāhuḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ | anyadvarṣaśataṃ rāmaḥ saubhe sālvamayodhayat
इस प्रकार प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों से यजन करके महाबाहु राम ने और सौ वर्षों तक सौभ में स्थित शाल्व से युद्ध किया।
श्लोक 24 (2.49.24)
ततः स भृगुशार्दूलस्तं सौभं योधयन्प्रभुः । सुबन्धुरं रथं राजन्नास्थाय भरतर्षभ ॥
tataḥ sa bhṛguśārdūlastaṃ saubhaṃ yodhayanprabhuḥ | subandhuraṃ rathaṃ rājannāsthāya bharatarṣabha
तब, हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, जब भृगुश्रेष्ठ वे प्रभु सुन्दर रथ पर आरूढ़ होकर सौभ से युद्ध कर रहे थे,
श्लोक 25 (2.49.25)
नग्निकानां कुमारीणां गायन्तीनामुपाशृणोत् । रामराम महाबाहो भृगूणां कीर्तिवर्धन ॥
nagnikānāṃ kumārīṇāṃ gāyantīnāmupāśṛṇot | rāmarāma mahābāho bhṛgūṇāṃ kīrtivardhana
उन्होंने छोटी-छोटी कन्याओं को गाते सुना — "हे राम, हे राम, हे महाबाहु, भृगुवंश की कीर्ति बढ़ाने वाले,
श्लोक 26 (2.49.26)
त्यज शस्त्राणि सर्वाणि न त्वं सौभं वधिष्यसि । शङ्खचक्रगदापाणिर्देवानामभयङ्करः ॥
tyaja śastrāṇi sarvāṇi na tvaṃ saubhaṃ vadhiṣyasi | śaṅkhacakragadāpāṇirdevānāmabhayaṅkaraḥ
सब शस्त्र त्याग दो; तुम सौभ का नाश नहीं करोगे। शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, देवताओं को अभय देने वाले
श्लोक 27 (2.49.27)
युधि प्रद्युम्नसाम्बाभ्यां कृष्णः सौभं वधिष्यति । तच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रस्तत एव वनं ययौ ॥
yudhi pradyumnasāmbābhyāṃ kṛṣṇaḥ saubhaṃ vadhiṣyati | tacchrutvā puruṣavyāghrastata eva vanaṃ yayau
कृष्ण युद्ध में प्रद्युम्न और साम्ब के साथ सौभ का नाश करेंगे।" यह सुनकर वे पुरुषसिंह वहीं से वन को चले गए।
श्लोक 28 (2.49.28)
न्यस्य सर्वाणि शस्त्राणि कालकाङ्क्षी महायशाः । रथं सर्वायुधं चैव शरान्परशुमेव च ॥
nyasya sarvāṇi śastrāṇi kālakāṅkṣī mahāyaśāḥ | rathaṃ sarvāyudhaṃ caiva śarānparaśumeva ca
उन महायशस्वी ने समय की प्रतीक्षा करते हुए अपने सब शस्त्र रख दिए — रथ, उसके सारे आयुध, बाण और परशु भी,
श्लोक 29 (2.49.29)
धनूंष्यप्सु प्रतिष्ठाप्य रामस्तेपे परं तपः । ह्रियं प्रज्ञां श्रियं कीर्तिं लक्ष्मीं चामित्रकर्शनः ॥
dhanūṃṣyapsu pratiṣṭhāpya rāmastepe paraṃ tapaḥ | hriyaṃ prajñāṃ śriyaṃ kīrtiṃ lakṣmīṃ cāmitrakarśanaḥ
और धनुषों को जल में स्थापित करके राम ने परम तप किया। लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति और लक्ष्मी —
श्लोक 30 (2.49.30)
पञ्चाधिष्ठाय धर्मात्मा तं रथं विससर्ज ह । आदिकाले प्रवृत्तं तु व्यभजत्करमीश्वरः ॥
pañcādhiṣṭhāya dharmātmā taṃ rathaṃ visasarja ha | ādikāle pravṛttaṃ tu vyabhajatkaramīśvaraḥ
इन पाँचों में स्थित होकर शत्रुओं को क्षीण करने वाले उन धर्मात्मा ने वह रथ त्याग दिया। आदिकाल से चली आ रही व्यवस्था का बँटवारा ईश्वर ही करते हैं;
श्लोक 31 (2.49.31)
नाहनच्छ्रद्धया सौभं न ह्यशक्तो महायशाः । जामदग्न्य इति ख्यातो यस्त्वयं भगवानृषिः । सोऽस्य भागस्तपस्तेपे भार्गवो लोकविश्रुतः ॥
nāhanacchraddhayā saubhaṃ na hyaśakto mahāyaśāḥ | jāmadagnya iti khyāto yastvayaṃ bhagavānṛṣiḥ | so'sya bhāgastapastepe bhārgavo lokaviśrutaḥ
उन्होंने श्रद्धा के कारण सौभ को नहीं मारा, इसलिए नहीं कि वे महायशस्वी असमर्थ थे। जामदग्न्य नाम से विख्यात जो ये भगवान ऋषि हैं, वही विष्णु के अंश, लोकविख्यात भार्गव तप करने लगे।