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सभा पर्व · अध्याय 50

दाशरथि राम, कृष्ण और कल्कि

भीष्म दशरथ से राम के रूप में विष्णु के जन्म की कथा कहते हैं — विश्वामित्र के यज्ञ में सुबाहु का वध, शिवधनुष का भंग और सीता से विवाह, चौदह वर्षों का वनवास, जनस्थान के युद्ध, सुग्रीव से मैत्री, लंका तक सेतु, रावण का वध, विभीषण का अभिषेक और राम का दीर्घ आदर्श शासन। फिर वे संक्षेप में वृष्णिकुल में जन्मे कृष्ण का वर्णन करते हैं, जिन्होंने कंस आदि मनुष्य-रूपी दैत्यों को मारा, और कलियुग के अन्त में आने वाले कल्कि विष्णुयशा का; अन्त में कहते हैं कि ऐसे और भी अनेक अवतार पुराणों में गाए जाते हैं। विकिस्रोत में यहाँ वक्ता का शीर्षक नहीं छपा, पर यह स्पष्ट रूप से भीष्म का ही कथन है; समीक्षित संस्करण में यह अंश केवल परिशिष्ट में है।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (2.50.1)

शृणु राजंस्ततो विष्णोः प्रादुर्भावं महात्मनः । अष्टाविंशे युगे चापि मार्कण्डेयपुरःसरः ॥

śṛṇu rājaṃstato viṣṇoḥ prādurbhāvaṃ mahātmanaḥ | aṣṭāviṃśe yuge cāpi mārkaṇḍeyapuraḥsaraḥ

हे राजन्, अब अट्ठाईसवें युग में हुए महात्मा विष्णु के अवतार के विषय में सुनो, जिसके वर्णन में मार्कण्डेय अग्रणी हैं।

श्लोक 2 (2.50.2)

तिथौ नावमिके जज्ञे तथा दशरथादपि । कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा विष्णुरव्ययः ॥

tithau nāvamike jajñe tathā daśarathādapi | kṛtvā''tmānaṃ mahābāhuścaturdhā viṣṇuravyayaḥ

नवमी तिथि को दशरथ से अविनाशी महाबाहु विष्णु ने अपने को चार रूपों में बाँटकर जन्म लिया,

श्लोक 3 (2.50.3)

लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपमः । प्रसादनार्थं लोकस्य विष्णुस्तत्र सनातनः ॥

loke rāma iti khyātastejasā bhāskaropamaḥ | prasādanārthaṃ lokasya viṣṇustatra sanātanaḥ

और वे लोक में राम नाम से विख्यात हुए, जो तेज में सूर्य के समान थे। लोक को प्रसन्न करने के लिए वहाँ सनातन विष्णु

श्लोक 4 (2.50.4)

धर्मार्थमेव कौन्तेय जज्ञे तत्र महायशाः । तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस्तनुम् ॥

dharmārthameva kaunteya jajñe tatra mahāyaśāḥ | tamapyāhurmanuṣyendraṃ sarvabhūtapatestanum

हे कुन्तीपुत्र, केवल धर्म के लिए महायशस्वी रूप में वहाँ जन्मे। उन मनुष्येन्द्र को भी सब प्राणियों के स्वामी का शरीर कहा जाता है।

श्लोक 5 (2.50.5)

यज्ञविघ्नकरस्तत्र विश्वामित्रस्य भारत । सुबाहुर्निहतस्तेन मारीचस्ताडितो भृशम् ॥

yajñavighnakarastatra viśvāmitrasya bhārata | subāhurnihatastena mārīcastāḍito bhṛśam

हे भारत, वहाँ विश्वामित्र के यज्ञ में विघ्न डालने वाले सुबाहु को उन्होंने मार डाला और मारीच पर कठोर प्रहार किया।

श्लोक 6 (2.50.6)

तस्मै दत्तानि चास्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता । वधार्थं सर्वशत्रूणां दुर्वाराणि सुरैरपि ॥

tasmai dattāni cāstrāṇi viśvāmitreṇa dhīmatā | vadhārthaṃ sarvaśatrūṇāṃ durvārāṇi surairapi

बुद्धिमान विश्वामित्र ने उन्हें सब शत्रुओं के वध के लिए ऐसे अस्त्र दिए जिन्हें देवता भी रोक नहीं सकते थे।

श्लोक 7 (2.50.7)

वर्तमाने महायज्ञे जनकस्य महात्मनः । भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया भृशम् ॥

vartamāne mahāyajñe janakasya mahātmanaḥ | bhagnaṃ māheśvaraṃ cāpaṃ krīḍatā līlayā bhṛśam

महात्मा जनक के महायज्ञ के समय उन्होंने खेल-खेल में अनायास ही महेश्वर का धनुष तोड़ डाला।

श्लोक 8 (2.50.8)

ततस्तु सीतां जग्राह भार्यार्थे जानकीं विभुः । नगरीं पुनरासाद्य मुमुदे तत्र सीतया ॥

tatastu sītāṃ jagrāha bhāryārthe jānakīṃ vibhuḥ | nagarīṃ punarāsādya mumude tatra sītayā

तब उन प्रभु ने जनकनन्दिनी सीता को पत्नी के रूप में ग्रहण किया, और नगर लौटकर वहाँ सीता के साथ आनन्दपूर्वक रहे।

श्लोक 9 (2.50.9)

कस्यचित्त्वथ कालस्य पित्रा तत्राभिचोदितः । कैकेय्याः प्रियमन्विच्छन्वनमभ्यवपद्यत ॥

kasyacittvatha kālasya pitrā tatrābhicoditaḥ | kaikeyyāḥ priyamanvicchanvanamabhyavapadyata

कुछ समय बाद वहाँ पिता की प्रेरणा से, कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से, वे वन को चले गए।

श्लोक 10 (2.50.10)

यः समाः सर्वधर्मज्ञश्चतुर्दश वने वसन् । लक्ष्मणानुचरो रामः सर्वभूतहिते रतः ॥

yaḥ samāḥ sarvadharmajñaścaturdaśa vane vasan | lakṣmaṇānucaro rāmaḥ sarvabhūtahite rataḥ

सब धर्मों के ज्ञाता राम ने लक्ष्मण को साथ लेकर चौदह वर्ष वन में निवास किया, और वे सब प्राणियों के हित में लगे रहे।

श्लोक 11 (2.50.11)

चतुर्दश वने तीर्त्वा तदा वर्षाणि भारत । रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेत्यभिहिता जनैः ॥

caturdaśa vane tīrtvā tadā varṣāṇi bhārata | rūpiṇī yasya pārśvasthā sītetyabhihitā janaiḥ

हे भारत, जब वे वन में वे चौदह वर्ष बिता रहे थे, तब जिन्हें लोग सीता कहते थे, वे साक्षात् रूप में उनके पास स्थित थीं —

श्लोक 12 (2.50.12)

पूर्वोचितत्वात्सा लक्ष्मीर्भर्तारमनुशोचति । जनस्थाने वसन्कार्यं त्रिदशानां चकार सः ॥

pūrvocitatvātsā lakṣmīrbhartāramanuśocati | janasthāne vasankāryaṃ tridaśānāṃ cakāra saḥ

स्वयं लक्ष्मी, जो अपने सदा के स्वभाव के अनुसार पति के दुःख में दुःखी होती हैं। जनस्थान में रहते हुए उन्होंने देवताओं का कार्य सिद्ध किया।

श्लोक 13 (2.50.13)

मारीचं दूषणं हत्वा खरं त्रिशिरसं तथा । चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥

mārīcaṃ dūṣaṇaṃ hatvā kharaṃ triśirasaṃ tathā | caturdaśa sahasrāṇi rakṣasāṃ ghorakarmaṇām

मारीच, दूषण, खर और त्रिशिरा को, तथा भयंकर कर्म करने वाले चौदह हज़ार राक्षसों को —

श्लोक 14 (2.50.14)

जघान रामो धर्मात्मा प्रजानां हितकाम्यया । विराधं च कबन्धं च राक्षसौ घोरकर्मिणौ ॥

jaghāna rāmo dharmātmā prajānāṃ hitakāmyayā | virādhaṃ ca kabandhaṃ ca rākṣasau ghorakarmiṇau

इन सबका धर्मात्मा राम ने प्रजा के हित की कामना से वध किया। और भयंकर कर्म करने वाले दो राक्षसों, विराध और कबन्ध को —

श्लोक 15 (2.50.15)

जघान च तदा रामो गन्धर्वौ शापविक्षतौ । स रावणस्य भगिनीनासाच्छेदमकारयत् ॥

jaghāna ca tadā rāmo gandharvau śāpavikṣatau | sa rāvaṇasya bhaginīnāsācchedamakārayat

जो शाप से विकृत हुए दो गन्धर्व थे, राम ने तब मार डाला। उन्होंने रावण की बहन की नाक कटवा दी।

श्लोक 16 (2.50.16)

भार्यावियोगं तं प्राप्य मृगयन्व्यचरद्वनम् । स तस्मादृश्यमूकं तु गत्वा पम्पामतीत्य च ॥

bhāryāviyogaṃ taṃ prāpya mṛgayanvyacaradvanam | sa tasmādṛśyamūkaṃ tu gatvā pampāmatītya ca

पत्नी के उस वियोग को प्राप्त होकर वे उन्हें खोजते हुए वन में भटकते रहे। वहाँ से ऋष्यमूक जाकर और पम्पा को पार करके

श्लोक 17 (2.50.17)

सुग्रीवं मारुतिं दृष्ट्वा चक्रे मैत्रीं तयोः स वै । अथ गत्वा स किष्किन्धां सुग्रीवेण तदा सह ॥

sugrīvaṃ mārutiṃ dṛṣṭvā cakre maitrīṃ tayoḥ sa vai | atha gatvā sa kiṣkindhāṃ sugrīveṇa tadā saha

उन्होंने सुग्रीव और मारुति (हनुमान्) से भेंट की और उन दोनों से मैत्री की। फिर वे सुग्रीव के साथ किष्किन्धा गए,

श्लोक 18 (2.50.18)

निहत्य वालिनं युद्धे वानरेन्द्रं महाबलम् । अभ्यषिञ्चत्तदा रामः सुग्रीवं वानरेश्वरम् ॥

nihatya vālinaṃ yuddhe vānarendraṃ mahābalam | abhyaṣiñcattadā rāmaḥ sugrīvaṃ vānareśvaram

और युद्ध में महाबली वानरराज वाली को मारकर राम ने तब सुग्रीव को वानरों के स्वामी के पद पर अभिषिक्त किया।

श्लोक 19 (2.50.19)

ततः स वीर्यवान्राजंस्त्वरया वै समुत्सुकः । विचित्य वायुपुत्रेण लङ्कादेशं निवेदितः ॥

tataḥ sa vīryavānrājaṃstvarayā vai samutsukaḥ | vicitya vāyuputreṇa laṅkādeśaṃ niveditaḥ

हे राजन्, तब उत्सुक और शीघ्रता में लगे उन पराक्रमी को वायुपुत्र ने खोज करके लंका का स्थान बताया।

श्लोक 20 (2.50.20)

सेतुं बद्ध्वा समुद्रस्य वानरैः स समुत्सुकः । सीतायाः पदमन्विच्छन्रामो लङ्कां विवेश वै ॥

setuṃ baddhvā samudrasya vānaraiḥ sa samutsukaḥ | sītāyāḥ padamanvicchanrāmo laṅkāṃ viveśa vai

वानरों के साथ समुद्र पर सेतु बाँधकर, उत्सुक राम ने सीता का पता खोजते हुए लंका में प्रवेश किया।

श्लोक 21 (2.50.21)

देवोरगगणानां हि यक्षराक्षसपक्षिणाम् । तत्रावध्यं राक्षसेन्द्रं रावणं युधि दुर्जयम् ॥

devoragagaṇānāṃ hi yakṣarākṣasapakṣiṇām | tatrāvadhyaṃ rākṣasendraṃ rāvaṇaṃ yudhi durjayam

वहाँ देवताओं, नागों, यक्षों, राक्षसों और पक्षियों के समूहों से भी अवध्य, युद्ध में दुर्जय राक्षसराज रावण को —

श्लोक 22 (2.50.22)

युक्तं राक्षसकोटीभिर्भिन्नाञ्जनचयोपमम् । दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम् ॥

yuktaṃ rākṣasakoṭībhirbhinnāñjanacayopamam | durnirīkṣyaṃ suragaṇairvaradānena darpitam

जो करोड़ों राक्षसों से घिरा था, घिसे हुए अंजन के ढेर जैसा काला था, देवगणों के लिए भी जिसकी ओर देखना कठिन था और जो वरदान से घमंडी हो गया था —

श्लोक 23 (2.50.23)

जघान सचिवैः सार्धं सान्वयं रावणं रणे ॥

jaghāna sacivaiḥ sārdhaṃ sānvayaṃ rāvaṇaṃ raṇe

उस रावण का उन्होंने युद्ध में मन्त्रियों और समस्त वंश सहित वध किया।

श्लोक 24 (2.50.24)

त्रैलोक्यकण्टकं वीरं महाकायं महाबलम् । रावणं सगणं हत्वा रामो भूतपतिः पुरा ॥

trailokyakaṇṭakaṃ vīraṃ mahākāyaṃ mahābalam | rāvaṇaṃ sagaṇaṃ hatvā rāmo bhūtapatiḥ purā

तीनों लोकों के काँटे, वीर, विशालकाय और महाबली रावण को उसके गणों सहित मारकर, प्राचीन काल में भूतपति राम ने

श्लोक 25 (2.50.25)

लङ्कायां तं महात्मानं राक्षसेन्द्रं विभीषणम् । अभिषिच्य ततो रामोऽमरत्वं ददौ तदा ॥

laṅkāyāṃ taṃ mahātmānaṃ rākṣasendraṃ vibhīṣaṇam | abhiṣicya tato rāmo'maratvaṃ dadau tadā

लंका में महात्मा विभीषण का राक्षसराज के रूप में अभिषेक किया, और तब राम ने उन्हें अमरता प्रदान की।

श्लोक 26 (2.50.26)

आरुह्य पुष्पकं रामः सीतामादाय पाण्डव । सबलं स्वपुरं गत्वा धर्मराज्यमपालयत् ॥

āruhya puṣpakaṃ rāmaḥ sītāmādāya pāṇḍava | sabalaṃ svapuraṃ gatvā dharmarājyamapālayat

हे पाण्डव, पुष्पक विमान पर चढ़कर, सीता को साथ लेकर राम सेना सहित अपने नगर गए और धर्मपूर्वक राज्य का पालन किया।

श्लोक 27 (2.50.27)

दानवो लवणो नाम मधोः पुत्रो महाबलः । शत्रुघ्नेन हतो राजंस्तदा रामस्य शासनात् ॥

dānavo lavaṇo nāma madhoḥ putro mahābalaḥ | śatrughnena hato rājaṃstadā rāmasya śāsanāt

हे राजन्, तब मधु का महाबली पुत्र लवण नामक दानव राम की आज्ञा से शत्रुघ्न द्वारा मारा गया।

श्लोक 28 (2.50.28)

एवं बहूनि कर्माणि कृत्वा लोकहिताय सः । राज्यं चकार विधिवद्रामो धर्मभृतां वरः ॥

evaṃ bahūni karmāṇi kṛtvā lokahitāya saḥ | rājyaṃ cakāra vidhivadrāmo dharmabhṛtāṃ varaḥ

इस प्रकार लोकहित के लिए अनेक कर्म करके धर्मधारियों में श्रेष्ठ राम ने विधिपूर्वक राज्य किया।

श्लोक 29 (2.50.29)

शताश्वमेधानाजह्रे ज्योतिरुक्थ्यान्निरर्गलान् । नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नात्ययः प्राणिनां तदा ॥

śatāśvamedhānājahre jyotirukthyānnirargalān | nāśrūyantāśubhā vāco nātyayaḥ prāṇināṃ tadā

उन्होंने ज्योतिष्टोम और उक्थ्य सहित, बिना किसी बाधा के सौ अश्वमेध यज्ञ किए। उस समय न कोई अशुभ वचन सुनाई देता था, न प्राणियों पर कोई विपत्ति आती थी।

श्लोक 30 (2.50.30)

न दस्युजं भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति । ऋषीणां देवतानां च मनुष्याणां तथैव च ॥

na dasyujaṃ bhayaṃ cāsīdrāme rājyaṃ praśāsati | ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca manuṣyāṇāṃ tathaiva ca

राम के राज्य-शासन में लुटेरों का कोई भय नहीं था। ऋषियों, देवताओं और मनुष्यों में —

श्लोक 31 (2.50.31)

पृथिव्यां धार्मिकाः सर्वे रामे राज्यं प्रशासति । नाधर्मिष्ठो नरः कश्चिद्बभूव प्राणिनां क्वचित् ॥

pṛthivyāṃ dhārmikāḥ sarve rāme rājyaṃ praśāsati | nādharmiṣṭho naraḥ kaścidbabhūva prāṇināṃ kvacit

पृथ्वी पर सब धार्मिक थे, जब राम राज्य कर रहे थे। प्राणियों में कहीं भी कोई अधर्मी मनुष्य नहीं था।

श्लोक 32 (2.50.32)

प्राणापानौ समौ ह्यास्तां रामे राज्यं प्रशासति । गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ॥

prāṇāpānau samau hyāstāṃ rāme rājyaṃ praśāsati | gāthāmapyatra gāyanti ye purāṇavido janāḥ

राम के शासनकाल में प्राण और अपान सम रहते थे। पुराणों के ज्ञाता लोग इस विषय में यह गाथा भी गाते हैं —

श्लोक 33 (2.50.33)

श्यामो युवा लोहिताक्षो मातङ्गानामिवर्षभः । आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाबलः ॥

śyāmo yuvā lohitākṣo mātaṅgānāmivarṣabhaḥ | ājānubāhuḥ sumukhaḥ siṃhaskandho mahābalaḥ

"श्यामवर्ण, युवा, लाल नेत्रों वाले, हाथियों में श्रेष्ठ गजराज के समान, घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले, सुन्दर मुख वाले, सिंह जैसे कंधों वाले, महाबली —

श्लोक 34 (2.50.34)

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । राज्यं भोगं च सम्प्राप्य शशास पृथिवीमिमाम् ॥

daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca | rājyaṃ bhogaṃ ca samprāpya śaśāsa pṛthivīmimām

उन्होंने दस हज़ार वर्ष और दस सौ वर्ष तक राज्य और भोग प्राप्त करके इस पृथ्वी पर शासन किया।"

श्लोक 35 (2.50.35)

रामो रामो राम इति प्रजानामभवन्कथाः । रामभूतं जगदिदं रामे राज्यं प्रशासति ॥

rāmo rāmo rāma iti prajānāmabhavankathāḥ | rāmabhūtaṃ jagadidaṃ rāme rājyaṃ praśāsati

"राम, राम, राम" — प्रजा में यही चर्चा होती थी। राम के शासनकाल में यह जगत राममय हो गया था।

श्लोक 36 (2.50.36)

ऋग्यजुःसामहीनाश्च न तदाऽसन्द्विजातयः । उषित्वा दण्डके कार्यं त्रिदशानां चकार सः ॥

ṛgyajuḥsāmahīnāśca na tadā'sandvijātayaḥ | uṣitvā daṇḍake kāryaṃ tridaśānāṃ cakāra saḥ

उस समय कोई द्विज ऋग्, यजुः और साम वेदों से रहित नहीं था। दण्डकवन में रहकर उन्होंने देवताओं का कार्य सिद्ध किया।

श्लोक 37 (2.50.37)

पूर्वापकारिणं तं तु पौलस्त्यं मनुजर्षभः । देवगन्धर्वनागानामरिं स निजघान ह ॥

pūrvāpakāriṇaṃ taṃ tu paulastyaṃ manujarṣabhaḥ | devagandharvanāgānāmariṃ sa nijaghāna ha

उन मनुष्यश्रेष्ठ ने पहले अपकार करने वाले, देवताओं, गन्धर्वों और नागों के शत्रु पौलस्त्य रावण का वध किया।

श्लोक 38 (2.50.38)

सत्त्ववान्गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा । एवमेव महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥

sattvavānguṇasampanno dīpyamānaḥ svatejasā | evameva mahābāhurikṣvākukulavardhanaḥ

सत्त्व से युक्त, गुणों से सम्पन्न, अपने तेज से दीप्तिमान — इसी प्रकार इक्ष्वाकुकुल की वृद्धि करने वाले वे महाबाहु

श्लोक 39 (2.50.39)

रावणं सगणं हत्वा दिवमाक्रमताभिभूः । इति दाशरथेः ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥

rāvaṇaṃ sagaṇaṃ hatvā divamākramatābhibhūḥ | iti dāśaratheḥ khyātaḥ prādurbhāvo mahātmanaḥ

रावण को उसके गणों सहित मारकर स्वर्ग को चले गए। यह महात्मा का दाशरथि नाम से विख्यात अवतार है।

श्लोक 40 (2.50.40)

ततः कृष्णो महाबाहुर्भीतानामभयङ्करः । अष्टाविंशे युगे राजञ्जज्ञे श्रीवत्सलक्षणः ॥

tataḥ kṛṣṇo mahābāhurbhītānāmabhayaṅkaraḥ | aṣṭāviṃśe yuge rājañjajñe śrīvatsalakṣaṇaḥ

हे राजन्, फिर अट्ठाईसवें युग में भयभीतों को अभय देने वाले, श्रीवत्स चिह्न से युक्त महाबाहु कृष्ण ने जन्म लिया।

श्लोक 41 (2.50.41)

पेशलश्च वदान्यश्च लोके बहुमतो नृषु । स्मृतिमान्देशकालज्ञः शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥

peśalaśca vadānyaśca loke bahumato nṛṣu | smṛtimāndeśakālajñaḥ śaṅkhacakragadāsibhṛt

वे सौम्य और उदार थे, संसार में मनुष्यों के बीच अत्यन्त सम्मानित, स्मृतिमान, देश और काल के ज्ञाता, शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करने वाले;

श्लोक 42 (2.50.42)

वासुदेव इति ख्यातो लोकानां हितकृत्सदा । वृष्णीनां च कुले जातो भूमेः प्रियचिकीर्षया ॥

vāsudeva iti khyāto lokānāṃ hitakṛtsadā | vṛṣṇīnāṃ ca kule jāto bhūmeḥ priyacikīrṣayā

वासुदेव नाम से विख्यात, सदा लोकों का हित करने वाले, वे पृथ्वी का प्रिय करने की इच्छा से वृष्णियों के कुल में जन्मे।

श्लोक 43 (2.50.43)

शत्रूणां भयकृद्दाता मधुहेति स विश्रुतः । शकटार्जुनरामाणां कीलस्थानान्यसूदयत् ॥

śatrūṇāṃ bhayakṛddātā madhuheti sa viśrutaḥ | śakaṭārjunarāmāṇāṃ kīlasthānānyasūdayat

शत्रुओं को भय देने वाले, दानशील, वे मधुसूदन नाम से विख्यात हैं। उन्होंने शकट, यमलार्जुन वृक्षों आदि के जमे हुए स्थानों को नष्ट कर दिया।

श्लोक 44 (2.50.44)

कंसादीन्निजघानाजौ दैत्यान्मानुषविग्रहान् । अयं लोकहितार्थाय प्रादुर्भावो महात्मनः ॥

kaṃsādīnnijaghānājau daityānmānuṣavigrahān | ayaṃ lokahitārthāya prādurbhāvo mahātmanaḥ

उन्होंने युद्ध में कंस आदि उन दैत्यों का वध किया जो मनुष्य-शरीर धारण किए हुए थे। महात्मा का यह अवतार लोकहित के लिए है।

श्लोक 45 (2.50.45)

कल्की विष्णुयशा नाम भूयश्चोत्पत्स्यते हरिः । कलेर्युगान्ते सम्प्राप्ते धर्मे शिथिलतां गते ॥

kalkī viṣṇuyaśā nāma bhūyaścotpatsyate hariḥ | kaleryugānte samprāpte dharme śithilatāṃ gate

कलियुग का अन्त आने पर, जब धर्म शिथिल हो जाएगा, तब श्रीहरि फिर कल्कि विष्णुयशा नाम से उत्पन्न होंगे —

श्लोक 46 (2.50.46)

पाषण्डिनां गणानां हि वधार्थं भरतर्षभ । धर्मस्य च विवृद्ध्यर्थं विप्राणां हितकाम्यया ॥

pāṣaṇḍināṃ gaṇānāṃ hi vadhārthaṃ bharatarṣabha | dharmasya ca vivṛddhyarthaṃ viprāṇāṃ hitakāmyayā

हे भरतश्रेष्ठ, पाखण्डियों के समूहों का वध करने, धर्म की वृद्धि करने और ब्राह्मणों के हित के लिए।

श्लोक 47 (2.50.47)

एते चान्ये च बहवो विष्णोर्देवगणैर्युताः । प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥

ete cānye ca bahavo viṣṇordevagaṇairyutāḥ | prādurbhāvāḥ purāṇeṣu gīyante brahmavādibhiḥ

विष्णु के ये और अन्य बहुत-से अवतार, जो देवगणों से युक्त हैं, ब्रह्मवादियों द्वारा पुराणों में गाए जाते हैं।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51