सभा पर्व · अध्याय 51
विष्णु द्वारा कालनेमि-वध और पृथ्वी की पुकार
युधिष्ठिर भीष्म से फिर पूछते हैं कि विष्णु ने वृष्णियों में किस प्रकार जन्म लिया। भीष्म सत्ययुग के प्राचीन तारकामय संग्राम से कथा आरम्भ करते हैं: जब सौ भुजाओं वाले कालनेमि के नेतृत्व में दैत्य देवताओं को भगा देते हैं, तब विष्णु गरुड़ पर आकर कालनेमि के सिर और भुजाएँ काट डालते हैं, देवताओं को उनके स्थान लौटाते हैं और ब्रह्मलोक में छत्तीस लाख वर्षों तक शयन करते हैं। द्वापर के अन्त में जागकर वे मेरु पर देवसभा में जाते हैं, जहाँ पृथ्वी कहती है कि वह राजाओं, सेनाओं और दुष्ट दैत्यों का भार अब नहीं सह सकती; तब नारायण पृथ्वी पर निवास करने का निश्चय करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.51.1)
एवमुक्ते तु कौन्तेयस्ततः कौरवनन्दनः । आबभाषे पुनर्भीष्मं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
evamukte tu kaunteyastataḥ kauravanandanaḥ | ābabhāṣe punarbhīṣmaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
यह कहे जाने पर कुरुकुल को आनन्द देने वाले कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने फिर भीष्म से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (2.51.2)
भूय एव मनुष्येन्द्र उपेन्द्रस्य यशस्विनः । जन्म वृष्णिषु विज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ॥
bhūya eva manuṣyendra upendrasya yaśasvinaḥ | janma vṛṣṇiṣu vijñātumicchāmi vadatāṃ vara
"हे नरश्रेष्ठ, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, मैं यशस्वी उपेन्द्र के वृष्णियों में जन्म के विषय में फिर से जानना चाहता हूँ।
श्लोक 3 (2.51.3)
यथैव भगवाञ्जातः क्षिताविह जनार्दनः । माधवेषु महाबुद्धिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
yathaiva bhagavāñjātaḥ kṣitāviha janārdanaḥ | mādhaveṣu mahābuddhistanme brūhi pitāmaha
पितामह, मुझे बताइए कि महाबुद्धिमान भगवान जनार्दन यहाँ पृथ्वी पर माधवों के कुल में किस प्रकार जन्मे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (2.51.4)
एवमुक्तस्ततो भीष्मः केशवस्य महात्मनः । माधवेषु तथा जन्म कथयामास वीर्यवान् ॥
evamuktastato bhīṣmaḥ keśavasya mahātmanaḥ | mādhaveṣu tathā janma kathayāmāsa vīryavān
ऐसा पूछे जाने पर पराक्रमी भीष्म ने महात्मा केशव के माधवों में जन्म की कथा सुनाई।
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (2.51.5)
हन्त ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथातथम् । यतो नारायणस्येह जन्म वृष्णिषु कौरव ॥
hanta te kathayiṣyāmi yudhiṣṭhira yathātatham | yato nārāyaṇasyeha janma vṛṣṇiṣu kaurava
सुनो युधिष्ठिर, हे कौरव, मैं तुम्हें यथार्थ रूप से बताता हूँ कि नारायण ने यहाँ वृष्णियों में किस कारण जन्म लिया।
श्लोक 6 (2.51.6)
पुरा लोके महाराज वर्तमाने कृते युगे । आसीत्त्रैलोक्यविख्यातः सङ्ग्रामस्तारकामयः ॥
purā loke mahārāja vartamāne kṛte yuge | āsīttrailokyavikhyātaḥ saṅgrāmastārakāmayaḥ
महाराज, प्राचीन काल में, जब सत्ययुग चल रहा था, तारकामय नामक संग्राम हुआ था, जो तीनों लोकों में विख्यात है।
श्लोक 7 (2.51.7)
विरोचनो मयस्तारो वराहः श्वेत एव च । विप्रचित्तिः प्रलम्बश्च वृत्रजम्भबलादयः ॥
virocano mayastāro varāhaḥ śveta eva ca | vipracittiḥ pralambaśca vṛtrajambhabalādayaḥ
विरोचन, मय, तार, वराह और श्वेत; विप्रचित्ति, प्रलम्ब, वृत्र, जम्भ, बल आदि;
श्लोक 8 (2.51.8)
नमुचिः कालनेमिश्च प्रह्लाद इति विश्रुतः । लम्बः किशोरः स्वर्भानुररिष्टो राक्षसेश्वरः ॥
namuciḥ kālanemiśca prahlāda iti viśrutaḥ | lambaḥ kiśoraḥ svarbhānurariṣṭo rākṣaseśvaraḥ
नमुचि, कालनेमि और विख्यात प्रह्लाद; लम्ब, किशोर, स्वर्भानु और राक्षसों का स्वामी अरिष्ट —
श्लोक 9 (2.51.9)
एते चान्ये च बहवो दैत्यसङ्घाः सहस्रशः । नानाशस्त्रधरा राजन्नानाभूषणवाहनाः ॥
ete cānye ca bahavo daityasaṅghāḥ sahasraśaḥ | nānāśastradharā rājannānābhūṣaṇavāhanāḥ
ये और दूसरे बहुत-से दैत्यों के सहस्रों दल, राजन्, नाना प्रकार के शस्त्र धारण किए और नाना आभूषणों तथा वाहनों से युक्त —
श्लोक 10 (2.51.10)
देवतानामभिमुखास्तस्थुर्दैतेयदानवाः । देवास्तु युध्यमानास्ते दानवानभ्ययू रणे ॥
devatānāmabhimukhāstasthurdaiteyadānavāḥ | devāstu yudhyamānāste dānavānabhyayū raṇe
ये दैत्य और दानव देवताओं के सामने आ डटे। और देवता युद्ध करते हुए रणभूमि में दानवों पर चढ़ आए —
श्लोक 11 (2.51.11)
आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वे मरुद्गणाः । इन्द्रो यमश्च वरुणश्चन्द्रश्चैव धनेश्वरः ॥
ādityā vasavo rudrāḥ sādhyā viśve marudgaṇāḥ | indro yamaśca varuṇaścandraścaiva dhaneśvaraḥ
आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव और मरुद्गण; इन्द्र, यम, वरुण, चन्द्रमा और धनपति कुबेर;
श्लोक 12 (2.51.12)
अश्विनौ च महावीर्यौ ये चान्ये देवतागणाः । चक्रुर्युद्धं महाघोरं दानवैश्च यथाक्रमम् ॥
aśvinau ca mahāvīryau ye cānye devatāgaṇāḥ | cakruryuddhaṃ mahāghoraṃ dānavaiśca yathākramam
महापराक्रमी दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्य देवगण — इन सबने क्रम से दानवों के साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध किया।
श्लोक 13 (2.51.13)
युध्यमानाः समेयुश्च देवा दैतेयदानवैः । तद्युद्धमभवद्घोरं देवदानवसङ्कुलम् ॥
yudhyamānāḥ sameyuśca devā daiteyadānavaiḥ | tadyuddhamabhavadghoraṃ devadānavasaṅkulam
युद्ध करते हुए देवता दैत्यों और दानवों से भिड़ गए; देवताओं और दानवों से भरा वह युद्ध बड़ा भयानक हो उठा।
श्लोक 14 (2.51.14)
ताभ्यां बलाभ्यां सञ्जज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा । तीक्ष्णशस्त्रैः किरन्तोऽथ अभ्ययुर्देवदानवाः ॥
tābhyāṃ balābhyāṃ sañjajñe tumulo vigrahastadā | tīkṣṇaśastraiḥ kiranto'tha abhyayurdevadānavāḥ
उन दोनों सेनाओं के बीच तब घमासान संघर्ष छिड़ गया; तीखे शस्त्र बरसाते हुए देवता और दानव एक-दूसरे पर टूट पड़े।
श्लोक 15 (2.51.15)
घ्नन्ति देवान्सगन्धर्वान्सयक्षोरगचारणान् । ते वध्यमाना दैतेयैर्देवसङ्घास्तदा रणे ॥
ghnanti devānsagandharvānsayakṣoragacāraṇān | te vadhyamānā daiteyairdevasaṅghāstadā raṇe
दैत्य गन्धर्वों, यक्षों, नागों और चारणों सहित देवताओं को मारने लगे। तब रण में दैत्यों के हाथों मारे जाते हुए देवगण
श्लोक 16 (2.51.16)
त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र जगाम हरिरीश्वरः ॥
trātāraṃ manasā jagmurdevaṃ nārāyaṇaṃ prabhum | etasminnantare tatra jagāma harirīśvaraḥ
मन ही मन रक्षक प्रभु नारायण देव की शरण में गए। उसी समय भगवान हरि वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 17 (2.51.17)
दीपयञ्ज्योतिषा भूमिं शङ्खचक्रगदाधरः । तमागतं सुपर्णस्थं विष्णुं लोकनमस्कृतम् ॥
dīpayañjyotiṣā bhūmiṃ śaṅkhacakragadādharaḥ | tamāgataṃ suparṇasthaṃ viṣṇuṃ lokanamaskṛtam
अपनी ज्योति से पृथ्वी को प्रकाशित करते और शंख, चक्र तथा गदा धारण किए हुए। गरुड़ पर आरूढ़, लोकों द्वारा वन्दित उन विष्णु को आया हुआ
श्लोक 18 (2.51.18)
दृष्ट्वा मुदा युताः सर्वे भयं त्यक्त्वा रणे सुराः । चक्रुर्युद्धं पुनः सर्वे देवा दैतेयदानवैः ॥
dṛṣṭvā mudā yutāḥ sarve bhayaṃ tyaktvā raṇe surāḥ | cakruryuddhaṃ punaḥ sarve devā daiteyadānavaiḥ
देखकर सभी देवता हर्ष से भर गए और रण में भय त्याग दिया; सब देवता फिर दैत्यों और दानवों से युद्ध करने लगे।
श्लोक 19 (2.51.19)
तद्युद्धमभवद्घोरमचिन्त्यं रोमहर्षणम् । जघ्नुर्दैत्यान्रणे घोराः सर्वे शक्रपुरोगमाः ॥
tadyuddhamabhavadghoramacintyaṃ romaharṣaṇam | jaghnurdaityānraṇe ghorāḥ sarve śakrapurogamāḥ
वह युद्ध भयंकर, अचिन्त्य और रोंगटे खड़े कर देने वाला हो गया। इन्द्र के नेतृत्व में सभी उग्र देवताओं ने रण में दैत्यों का संहार किया।
श्लोक 20 (2.51.20)
ते बाध्यमाना विबुधैर्दुद्रुवुर्दैत्यदानवाः ॥
te bādhyamānā vibudhairdudruvurdaityadānavāḥ
देवताओं से पीड़ित होकर दैत्य और दानव भाग खड़े हुए।
श्लोक 21 (2.51.21)
विद्रुतान्दानवान्दृष्ट्वा तदा भारत संयुगे । कालनेमिरिति ख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत ॥
vidrutāndānavāndṛṣṭvā tadā bhārata saṃyuge | kālanemiriti khyāto dānavaḥ pratyadṛśyata
हे भारत, रण में दानवों को भागते देखकर कालनेमि नाम का एक दानव प्रकट हुआ।
श्लोक 22 (2.51.22)
शत्रुप्रहरणे घोरः शतबाहुः शताननः । शतशीर्षः स्थितः श्रीमाञ्छतशृङ्ग इवाचलः ॥
śatrupraharaṇe ghoraḥ śatabāhuḥ śatānanaḥ | śataśīrṣaḥ sthitaḥ śrīmāñchataśṛṅga ivācalaḥ
शत्रुओं पर प्रहार करने में भयानक, सौ भुजाओं, सौ मुखों और सौ सिरों वाला वह तेजस्वी दानव सौ शिखरों वाले पर्वत की भाँति खड़ा था।
श्लोक 23 (2.51.23)
भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः । धूम्रकेतुर्हरिश्मश्रुर्निर्दष्टोष्ठपुटाननः ॥
bhāskarākāramukuṭaḥ śiñjitābharaṇāṅgadaḥ | dhūmraketurhariśmaśrurnirdaṣṭoṣṭhapuṭānanaḥ
उसका मुकुट सूर्य के समान दमक रहा था, उसके आभूषण और बाजूबन्द झनझना रहे थे; उसकी ध्वजा धुएँ के रंग की थी, दाढ़ी भूरी-पीली थी, और वह क्रोध से होंठ चबा रहा था।
श्लोक 24 (2.51.24)
त्रैलोक्यान्तरविस्तारं धारयन्विपुलं वपुः । तर्जयन्वै रणे देवाञ्छादयन्वै दिशो दश ॥
trailokyāntaravistāraṃ dhārayanvipulaṃ vapuḥ | tarjayanvai raṇe devāñchādayanvai diśo daśa
तीनों लोकों के अन्तराल जितना विशाल शरीर धारण किए, रण में देवताओं को ललकारता और दसों दिशाओं को ढकता हुआ
श्लोक 25 (2.51.25)
अभ्यधावत्सुसङ्क्रुद्धो व्यादितास्य इवान्तकः । तत्र शस्त्रप्रतानैश्च देवान्धर्षितवान्रणे ॥
abhyadhāvatsusaṅkruddho vyāditāsya ivāntakaḥ | tatra śastrapratānaiśca devāndharṣitavānraṇe
वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर मुँह फाड़े यमराज के समान दौड़ा, और वहाँ शस्त्रों की झड़ी से उसने रण में देवताओं को दबा दिया।
श्लोक 26 (2.51.26)
अभ्याययुः सुरान्सर्वान्पुनस्ते दैत्यदानवाः । आपीडयन्रणे क्रुद्धास्ततो देवान्युधिष्ठिर ॥
abhyāyayuḥ surānsarvānpunaste daityadānavāḥ | āpīḍayanraṇe kruddhāstato devānyudhiṣṭhira
तब दैत्य और दानव फिर सब देवताओं पर चढ़ आए, और युधिष्ठिर, क्रोध में भरकर उन्होंने रण में देवताओं को पीड़ित किया।
श्लोक 27 (2.51.27)
ते वध्यमाना विबुधाः समरे कालनेमिना । दैत्यैश्चैव महाराज दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥
te vadhyamānā vibudhāḥ samare kālaneminā | daityaiścaiva mahārāja dudruvuste diśo daśa
महाराज, युद्ध में कालनेमि और दैत्यों से मारे जाते हुए देवता दसों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 28 (2.51.28)
विबुधान्विद्रुतान्दृष्ट्वा कालनेमिर्महासुरः । इन्द्रं यमं च वरुणं वायुं च धनदं रविम् ॥
vibudhānvidrutāndṛṣṭvā kālanemirmahāsuraḥ | indraṃ yamaṃ ca varuṇaṃ vāyuṃ ca dhanadaṃ ravim
देवताओं को भागते देखकर महादैत्य कालनेमि ने इन्द्र, यम, वरुण, वायु, कुबेर और सूर्य को —
श्लोक 29 (2.51.29)
एतांश्चान्यान्बलाज्जित्वा तेषां कार्याण्यवाप सः । तान्सर्वान्सहसा जित्वा कालनेमिर्महासुरः ॥
etāṃścānyānbalājjitvā teṣāṃ kāryāṇyavāpa saḥ | tānsarvānsahasā jitvā kālanemirmahāsuraḥ
इन्हें और दूसरों को बलपूर्वक जीतकर उसने उनके कार्य-अधिकार अपने हाथ में ले लिए। उन सबको शीघ्र जीतकर महादैत्य कालनेमि ने
श्लोक 30 (2.51.30)
ददर्श गगने विष्णुं सुपर्णस्थं महाद्युतिम् । तं दृष्ट्वा क्रोधताम्राक्षस्तर्जयन्नभ्ययात्तदा ॥
dadarśa gagane viṣṇuṃ suparṇasthaṃ mahādyutim | taṃ dṛṣṭvā krodhatāmrākṣastarjayannabhyayāttadā
आकाश में गरुड़ पर बैठे महातेजस्वी विष्णु को देखा। उन्हें देखते ही क्रोध से लाल आँखें किए वह ललकारता हुआ उन पर झपटा।
श्लोक 31 (2.51.31)
स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे । रोषाद्भारत दैत्येन्द्रो विष्णोरुरसि पातयत् ॥
sa bāhuśatamudyamya sarvāstragrahaṇaṃ raṇe | roṣādbhārata daityendro viṣṇorurasi pātayat
हे भारत, रण में सब प्रकार के अस्त्र थामे अपनी सौ भुजाएँ उठाकर उस दैत्यराज ने रोष में भरकर विष्णु की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 32 (2.51.32)
दैत्याश्च दानवाश्चैव सर्वे मयपुरोगमाः । स्वान्यायुधानि सङ्गृह्य सर्वे विष्णुमुपाद्रवन् ॥
daityāśca dānavāścaiva sarve mayapurogamāḥ | svānyāyudhāni saṅgṛhya sarve viṣṇumupādravan
मय आदि सभी दैत्य और दानव अपने-अपने आयुध लेकर एक साथ विष्णु पर टूट पड़े।
श्लोक 33 (2.51.33)
स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वायुधोद्यतैः । न चचाल हरिर्युद्धेऽकम्पमान इवाचलः ॥
sa tāḍyamāno'tibalairdaityaiḥ sarvāyudhodyataiḥ | na cacāla hariryuddhe'kampamāna ivācalaḥ
सब आयुध उठाए उन महाबली दैत्यों के प्रहार सहकर भी हरि युद्ध में तनिक नहीं डिगे; वे पर्वत की भाँति अविचल खड़े रहे।
श्लोक 34 (2.51.34)
पुनरुद्यम्य सङ्क्रुद्धः कालनेमिर्दृढां गदाम् । जघान गदया राजंस्तं विष्णुं गरुडं च वै ॥
punarudyamya saṅkruddhaḥ kālanemirdṛḍhāṃ gadām | jaghāna gadayā rājaṃstaṃ viṣṇuṃ garuḍaṃ ca vai
राजन्, कालनेमि ने फिर क्रोध में भरकर अपनी भारी गदा उठाई और उस गदा से विष्णु और गरुड़ पर प्रहार किया।
श्लोक 35 (2.51.35)
तं दृष्ट्वा गरुडं श्रान्तं चक्रमुद्यम्य वै हरिः । शतं शिरांसि बाहूंश्च सोच्छिनत्कालनेमिनः ॥
taṃ dṛṣṭvā garuḍaṃ śrāntaṃ cakramudyamya vai hariḥ | śataṃ śirāṃsi bāhūṃśca socchinatkālaneminaḥ
गरुड़ को थका हुआ देखकर हरि ने चक्र उठाया और कालनेमि के सौ सिर और भुजाएँ काट डालीं।
श्लोक 36 (2.51.36)
जघानान्यांश्च तान्सर्वान्समरे दैत्यदानवान् । विबुधानामृषीणां च स्वानि स्थानानि वै ददौ ॥
jaghānānyāṃśca tānsarvānsamare daityadānavān | vibudhānāmṛṣīṇāṃ ca svāni sthānāni vai dadau
उन्होंने युद्ध में अन्य सभी दैत्यों और दानवों का भी वध किया और देवताओं तथा ऋषियों को उनके अपने-अपने स्थान लौटा दिए।
श्लोक 37 (2.51.37)
दत्त्वा सुराणां सुप्रीतो योग्यकर्माणि भारत । जगाम ब्रह्मणा सार्धं ब्रह्मलोकं तदा हरिः ॥
dattvā surāṇāṃ suprīto yogyakarmāṇi bhārata | jagāma brahmaṇā sārdhaṃ brahmalokaṃ tadā hariḥ
हे भारत, प्रसन्न होकर देवताओं को उनके योग्य कार्य सौंपकर हरि तब ब्रह्मा के साथ ब्रह्मलोक को चले गए।
श्लोक 38 (2.51.38)
ब्रह्मलोकं प्रविश्याथ प्राप्य नारायणः प्रभुः । पौराणं ब्रह्मसदनं दिव्यं नारायणाश्रयम् ॥
brahmalokaṃ praviśyātha prāpya nārāyaṇaḥ prabhuḥ | paurāṇaṃ brahmasadanaṃ divyaṃ nārāyaṇāśrayam
ब्रह्मलोक में प्रवेश करके प्रभु नारायण उस प्राचीन, दिव्य ब्रह्मसदन में पहुँचे, जो नारायण का आश्रय है।
श्लोक 39 (2.51.39)
स प्रविश्य तदा देवः स्तूयमानो महर्षिभिः । सहस्रशीर्षा भूत्वा च शयनायोपचक्रमे ॥
sa praviśya tadā devaḥ stūyamāno maharṣibhiḥ | sahasraśīrṣā bhūtvā ca śayanāyopacakrame
उसमें प्रवेश करके, महर्षियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, वे देव सहस्र सिरों वाले होकर शयन करने लगे।
श्लोक 40 (2.51.40)
आदिदेवः पुराणात्मा निद्रावशमुपागतः । शेते सुखं सदा विष्णुर्मोहयञ्जगदव्ययः ॥
ādidevaḥ purāṇātmā nidrāvaśamupāgataḥ | śete sukhaṃ sadā viṣṇurmohayañjagadavyayaḥ
आदिदेव, पुराणपुरुष, अविनाशी विष्णु निद्रा के वश में होकर जगत को मोहित करते हुए सदा सुखपूर्वक शयन करते हैं।
श्लोक 41 (2.51.41)
जग्मुस्तस्याथ वर्षाणि शयानस्य महात्मनः । षट्त्रिंशच्छतसाहस्रं मानुषेणेह सङ्ख्यया ॥
jagmustasyātha varṣāṇi śayānasya mahātmanaḥ | ṣaṭtriṃśacchatasāhasraṃ mānuṣeṇeha saṅkhyayā
उन महात्मा के सोते हुए वर्ष बीतते गए — मनुष्यों की गणना से छत्तीस लाख वर्ष।
श्लोक 42 (2.51.42)
जग्मुः कृतयुगत्रेताद्वापरान्ते बुबोध ह । ब्रह्मादिभिः स्तूयमानः सुरैश्चापि सहर्षिभिः ॥
jagmuḥ kṛtayugatretādvāparānte bubodha ha | brahmādibhiḥ stūyamānaḥ suraiścāpi saharṣibhiḥ
सत्य, त्रेता और द्वापर युग बीत गए; द्वापर के अन्त में ब्रह्मा आदि देवताओं और ऋषियों से स्तुति पाते हुए वे जाग उठे।
श्लोक 43 (2.51.43)
उत्पत्य शयनाद्विष्णुर्ब्रह्मणा विबुधैः सह । देवानां च हितार्थाय ययौ देवसभां प्रति ॥
utpatya śayanādviṣṇurbrahmaṇā vibudhaiḥ saha | devānāṃ ca hitārthāya yayau devasabhāṃ prati
शय्या से उठकर विष्णु ब्रह्मा और देवताओं के साथ देवताओं के हित के लिए देवसभा की ओर गए।
श्लोक 44 (2.51.44)
मेरोः शिरसि विन्यस्तां ज्वलन्तीं तां शुभां सभाम् । विविशुस्ते सुराः सर्वे ब्रह्मणा सह भारत ॥
meroḥ śirasi vinyastāṃ jvalantīṃ tāṃ śubhāṃ sabhām | viviśuste surāḥ sarve brahmaṇā saha bhārata
हे भारत, मेरु के शिखर पर स्थित उस दीप्तिमान, शुभ सभा में सब देवताओं ने ब्रह्मा के साथ प्रवेश किया।
श्लोक 45 (2.51.45)
जग्मुस्तत्र निषेदुस्ते सा निःशब्दा ह्यभूत्तदा । तत्र भूमिरुवाचाथ खेदात्करुणभाषिणी ॥
jagmustatra niṣeduste sā niḥśabdā hyabhūttadā | tatra bhūmiruvācātha khedātkaruṇabhāṣiṇī
वे भीतर जाकर बैठ गए और सभा में सन्नाटा छा गया। तब वहाँ पृथ्वी ने खिन्न होकर करुण स्वर में कहा —
भूमिरुवाच
श्लोक 46 (2.51.46)
राज्ञां बलैर्बलवतां खिन्नास्मि भृशपीडिता । नित्यं भारपरिश्रान्ता दुःखं जीवाम्यहं सुराः ॥
rājñāṃ balairbalavatāṃ khinnāsmi bhṛśapīḍitā | nityaṃ bhārapariśrāntā duḥkhaṃ jīvāmyahaṃ surāḥ
"बलवान राजाओं की सेनाओं से मैं थक गई हूँ और अत्यन्त पीड़ित हूँ। हे देवताओ, भार से सदा थकी हुई मैं दुःख में जी रही हूँ।
श्लोक 47 (2.51.47)
पुरे पुरे च नृपतिः कोटिसङ्ख्यैर्बलैर्वृतः । राष्ट्रे राष्ट्रे च शतशो ग्रामाः कुलसहस्रिणः ॥
pure pure ca nṛpatiḥ koṭisaṅkhyairbalairvṛtaḥ | rāṣṭre rāṣṭre ca śataśo grāmāḥ kulasahasriṇaḥ
नगर-नगर में करोड़ों की सेनाओं से घिरा राजा है; राष्ट्र-राष्ट्र में सैकड़ों गाँव हैं, जिनमें हज़ारों कुल बसते हैं।
श्लोक 48 (2.51.48)
भूमिपानां सहस्रैश्च तेषां च बलिनां बलैः । ग्रामायुतैः पुरै राष्ट्रैरहं निर्विवरीकृता ॥
bhūmipānāṃ sahasraiśca teṣāṃ ca balināṃ balaiḥ | grāmāyutaiḥ purai rāṣṭrairahaṃ nirvivarīkṛtā
हज़ारों राजाओं से, उन बलवानों की सेनाओं से, दसियों हज़ार गाँवों, नगरों और राष्ट्रों से मैं ऐसी भर गई हूँ कि मुझमें कहीं खाली जगह नहीं बची।
श्लोक 49 (2.51.49)
तस्माद्धारयितुं शक्त्या न क्षमास्मि जनानहम् । दैत्यैश्च बाध्यमानास्ताः प्रजा नित्यं दुरात्मभिः ॥
tasmāddhārayituṃ śaktyā na kṣamāsmi janānaham | daityaiśca bādhyamānāstāḥ prajā nityaṃ durātmabhiḥ
इसलिए मुझमें इतनी शक्ति नहीं कि मैं इन लोगों का भार उठा सकूँ; और ये प्रजाएँ दुष्ट दैत्यों द्वारा सदा सताई जाती हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 50 (2.51.50)
भूमेस्तु वचनं श्रुत्वा देवो नारायणस्तदा । व्यादिश्य तान्सुरान्सर्वान्क्षितौ वस्तुं मनो दधे ॥
bhūmestu vacanaṃ śrutvā devo nārāyaṇastadā | vyādiśya tānsurānsarvānkṣitau vastuṃ mano dadhe
पृथ्वी के वचन सुनकर देव नारायण ने तब सब देवताओं को आदेश दिया और स्वयं पृथ्वी पर निवास करने का मन बनाया।