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सभा पर्व · अध्याय 53

श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएँ: कालिय-दमन से कंस-वध तक

भीष्म बताते हैं कि बालक कृष्ण वर्षा ऋतु में वन में घूमते और भाण्डीर वटवृक्ष के नीचे ग्वालों के बीच बाँसुरी बजाते थे। वे कालिय नाग का दमन करते हैं, बलदेव गधे के रूप वाले धेनुक को मारते हैं, और दोनों भाई खेल-खेल में गौएँ चराते हैं। कृष्ण गिरियज्ञ का भोग स्वयं खा लेते हैं, दिव्य रूप धारण करके सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठाए रखते हैं, और इन्द्र पृथ्वी पर आकर उनका "गोविन्द" के रूप में अभिषेक करते हैं। फिर वे अरिष्ट, केशी, चाणूर और सुदामा का वध करते हैं, बलदेव मुष्टिक को मारते हैं, और कृष्ण कंस को मारकर उग्रसेन को राजा बनाते हैं और माता-पिता के चरणों में प्रणाम करते हैं।

अध्याय 52अध्याय-सूचीअध्याय 54

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (2.53.1)

ततः कदाचिद्गोविन्दो ज्येष्ठं सङ्कर्षणं विना । चचार तद्वनं रम्यं सुस्वरूपो वराननः ॥

tataḥ kadācidgovindo jyeṣṭhaṃ saṅkarṣaṇaṃ vinā | cacāra tadvanaṃ ramyaṃ susvarūpo varānanaḥ

फिर एक दिन गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षण के बिना उस रमणीय वन में घूमने लगे — सुन्दर रूप और सुन्दर मुख वाले,

श्लोक 2 (2.53.2)

काकपक्षधरः श्रीमाञ्छ्यामः पद्मनिभेक्षणः । श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥

kākapakṣadharaḥ śrīmāñchyāmaḥ padmanibhekṣaṇaḥ | śrīvatsenorasā yuktaḥ śaśāṅka iva lakṣmaṇā

काकपक्ष धारण किए, शोभायुक्त, श्यामवर्ण, कमल जैसे नेत्रों वाले; उनके वक्ष पर श्रीवत्स चिह्न था, जैसे चन्द्रमा पर उसका चिह्न।

श्लोक 3 (2.53.3)

रज्जुयज्ञोपवीती स पीताम्बरधरो युवा । श्वेतचन्दनलिप्ताङ्गो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥

rajjuyajñopavītī sa pītāmbaradharo yuvā | śvetacandanaliptāṅgo nīlakuñcitamūrdhajaḥ

वह किशोर रस्सी का यज्ञोपवीत और पीताम्बर पहने था, उसके अंग श्वेत चन्दन से लिपे थे और केश काले और घुँघराले थे;

श्लोक 4 (2.53.4)

राजता बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना । क्वचिद्गायन्क्वचित्क्रीडन्क्वचिन्नृत्यन्क्वचिद्धसन् ॥

rājatā barhipatreṇa mandamārutakampinā | kvacidgāyankvacitkrīḍankvacinnṛtyankvaciddhasan

मन्द पवन से हिलते चमकीले मोरपंख से सुशोभित; कभी गाते, कभी खेलते, कभी नाचते, कभी हँसते,

श्लोक 5 (2.53.5)

गोपवेणुं सुमधुरं कामं तदपि वादयन् । प्रह्लादनार्थं च गवां क्वचिद्वनगतो युवा ॥

gopaveṇuṃ sumadhuraṃ kāmaṃ tadapi vādayan | prahlādanārthaṃ ca gavāṃ kvacidvanagato yuvā

अपनी इच्छा से ग्वालों की बाँसुरी अत्यन्त मधुर स्वर में बजाते; और गौओं को प्रसन्न करने के लिए वह किशोर कभी-कभी वन में चला जाता।

श्लोक 6 (2.53.6)

गोकुले मेघकाले तु चचार द्युतिमान्प्रभुः । बहुरम्येषु देशेषु वनस्य वनराजिषु ॥

gokule meghakāle tu cacāra dyutimānprabhuḥ | bahuramyeṣu deśeṣu vanasya vanarājiṣu

वर्षा ऋतु में वे तेजस्वी प्रभु गोकुल में, वन के अनेक रमणीय स्थानों और वृक्षों की पंक्तियों के बीच विचरते थे।

श्लोक 7 (2.53.7)

तासु कृष्णो मुदा युक्तः क्रीडयन्भरतर्षभ । स कदाचिद्वने तस्मिन्गोभिः सह परिव्रजन् ॥

tāsu kṛṣṇo mudā yuktaḥ krīḍayanbharatarṣabha | sa kadācidvane tasmingobhiḥ saha parivrajan

हे भरतश्रेष्ठ, कृष्ण उनमें आनन्दपूर्वक क्रीडा करते थे। एक बार उस वन में गौओं के साथ घूमते हुए

श्लोक 8 (2.53.8)

भाण्डीरं नाम दृष्ट्वाऽथ न्यग्रोधं केशवो महान् । तच्छायायां मतिं चक्रे निवासाय तदा प्रभुः ॥

bhāṇḍīraṃ nāma dṛṣṭvā'tha nyagrodhaṃ keśavo mahān | tacchāyāyāṃ matiṃ cakre nivāsāya tadā prabhuḥ

महान केशव ने भाण्डीर नाम का एक वटवृक्ष देखा, और प्रभु ने उसकी छाया में ठहरने का निश्चय किया।

श्लोक 9 (2.53.9)

स तत्र वयसा तुल्यैर्वत्सपालैस्तदाऽनघ । रेमे स दिवसं कृष्णः पुरा स्वर्गगतो यथा ॥

sa tatra vayasā tulyairvatsapālaistadā'nagha | reme sa divasaṃ kṛṣṇaḥ purā svargagato yathā

हे निष्पाप, वहाँ कृष्ण ने अपनी आयु के बछड़े चराने वाले बालकों के साथ दिन भर क्रीडा की, जैसे पहले स्वर्ग में रहते समय करते थे।

श्लोक 10 (2.53.10)

तं क्रीडमानं गोपालाः कृष्णं भाण्डीरवासिनः । रमयन्ति स्म बहवो मान्यैः क्रीडनकैस्तदा ॥

taṃ krīḍamānaṃ gopālāḥ kṛṣṇaṃ bhāṇḍīravāsinaḥ | ramayanti sma bahavo mānyaiḥ krīḍanakaistadā

कृष्ण के खेलते समय भाण्डीर में रहने वाले बहुत-से ग्वाले सुन्दर खिलौनों से उनका मन बहलाते थे।

श्लोक 11 (2.53.11)

अन्ये स्म परिगायन्ति गोपा मुदितमानसाः । गोपालकृष्णमेवान्ये गायन्ति स्म वनप्रियाः ॥

anye sma parigāyanti gopā muditamānasāḥ | gopālakṛṣṇamevānye gāyanti sma vanapriyāḥ

कुछ ग्वाले प्रसन्न मन से उनके चारों ओर गाते; दूसरे, वन से प्रेम करने वाले, स्वयं गोपाल कृष्ण का ही गुणगान करते।

श्लोक 12 (2.53.12)

तेषां सङ्गायतामेव वादयामास केशवः । पर्णवाद्यान्तरे वेणुं तुम्बवीणां च तत्र वै ॥

teṣāṃ saṅgāyatāmeva vādayāmāsa keśavaḥ | parṇavādyāntare veṇuṃ tumbavīṇāṃ ca tatra vai

उनके गाते समय केशव पत्तों के बाजों के बीच-बीच में बाँसुरी और तूँबे की वीणा भी बजाते थे।

श्लोक 13 (2.53.13)

एवं क्रीडान्तरैः कृष्णो गोपालैर्विजहार सः । तेन बालेन कौन्तेय कृतं लोकहितं तदा ॥

evaṃ krīḍāntaraiḥ kṛṣṇo gopālairvijahāra saḥ | tena bālena kaunteya kṛtaṃ lokahitaṃ tadā

इस प्रकार कृष्ण तरह-तरह के खेलों में ग्वालों के साथ विहार करते रहे। हे कुन्तीपुत्र, उस बालक ने तब संसार के हित का एक कार्य किया —

श्लोक 14 (2.53.14)

पश्यतां सर्वभूतानां वासुदेवेन भारत । ह्रदे निपतता तत्र क्रीडितं नागमूर्धनि ॥

paśyatāṃ sarvabhūtānāṃ vāsudevena bhārata | hrade nipatatā tatra krīḍitaṃ nāgamūrdhani

हे भारत, सब प्राणियों के देखते-देखते वासुदेव ने वहाँ कुण्ड में कूदकर नाग के फन पर क्रीडा की।

श्लोक 15 (2.53.15)

शासयित्वा तु कालीयं सर्वलोकस्य पश्यतः । विजहार ततः कृष्णो बलदेवसहायवान् ॥

śāsayitvā tu kālīyaṃ sarvalokasya paśyataḥ | vijahāra tataḥ kṛṣṇo baladevasahāyavān

सारे संसार के देखते-देखते कालिय का दमन करके कृष्ण फिर बलदेव के साथ विहार करने लगे।

श्लोक 16 (2.53.16)

धेनुको दारुणो राजन्दैत्यो रासभविग्रहः । तदा तालवने राजन्बलदेवेन वै हतः ॥

dhenuko dāruṇo rājandaityo rāsabhavigrahaḥ | tadā tālavane rājanbaladevena vai hataḥ

राजन्, गधे का रूप धारण करने वाला भयानक दैत्य धेनुक तब तालवन में बलदेव के हाथों मारा गया।

श्लोक 17 (2.53.17)

ततः कदाचित्कौन्तेय रामकृष्णौ वनं गतौ । चारयन्तौ प्रवृद्धानि गोधनानि शुभाननौ ॥

tataḥ kadācitkaunteya rāmakṛṣṇau vanaṃ gatau | cārayantau pravṛddhāni godhanāni śubhānanau

फिर एक दिन, हे कुन्तीपुत्र, सुन्दर मुख वाले राम और कृष्ण बढ़े हुए गोधन को चराते हुए वन में गए —

श्लोक 18 (2.53.18)

विहरन्तौ मुदा युक्तौ वीक्षमाणौ वनानि वै । क्ष्वेलयन्तौ प्रगायन्तौ विचिन्वन्तौ च पादपान् ॥

viharantau mudā yuktau vīkṣamāṇau vanāni vai | kṣvelayantau pragāyantau vicinvantau ca pādapān

आनन्द से घूमते, वनों को निहारते, किलकारियाँ भरते और गाते, और पेड़ों के बीच खोजते हुए;

श्लोक 19 (2.53.19)

नामभिर्व्याहरन्तौ च वत्सान्गाश्च परन्तपौ । चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ॥

nāmabhirvyāharantau ca vatsāngāśca parantapau | ceraturlokasiddhābhiḥ krīḍābhiraparājitau

बछड़ों और गौओं को उनके नाम से पुकारते हुए वे दोनों अजेय, शत्रुओं को तपाने वाले भाई लोक में प्रचलित खेल खेलते हुए विचरते रहे।

श्लोक 20 (2.53.20)

तौ देवौ मानुषीं दीक्षां वहन्तौ सुरपूजितौ । तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥

tau devau mānuṣīṃ dīkṣāṃ vahantau surapūjitau | tajjātiguṇayuktābhiḥ krīḍābhiśceraturvanam

देवताओं द्वारा पूजित वे दोनों देव मनुष्य-जीवन की दीक्षा लेकर उस जन्म के स्वभाव के अनुरूप खेलों के साथ वन में विचरते थे।

श्लोक 21 (2.53.21)

एवं बाल्येऽपि गोपालैः क्रीडाभिश्च विजह्रतुः ॥

evaṃ bālye'pi gopālaiḥ krīḍābhiśca vijahratuḥ

इस प्रकार बचपन में भी वे ग्वालों के साथ खेलों में विहार करते रहे।

श्लोक 22 (2.53.22)

ततः कृष्णो महातेजास्तदा गत्वा तु गोव्रजम् । गिरियज्ञं तमेवैष प्रवृत्तं गोपदारकैः ॥

tataḥ kṛṣṇo mahātejāstadā gatvā tu govrajam | giriyajñaṃ tamevaiṣa pravṛttaṃ gopadārakaiḥ

तब महातेजस्वी कृष्ण गोशाला में गए, जहाँ ग्वाल-बालों ने गिरियज्ञ आरम्भ किया था,

श्लोक 23 (2.53.23)

बुभुजे पायसं शौरिरीश्वरः सर्वभूतकृत् । तं दृष्ट्वा गोपकाः सर्वे कृष्णमेव समर्चयन् ॥

bubhuje pāyasaṃ śaurirīśvaraḥ sarvabhūtakṛt | taṃ dṛṣṭvā gopakāḥ sarve kṛṣṇameva samarcayan

और समस्त प्राणियों के रचयिता ईश्वर शौरि ने वह खीर खा ली। यह देखकर सब ग्वालों ने कृष्ण की ही पूजा की।

श्लोक 24 (2.53.24)

पूज्यमानस्तदा देवैर्दिव्यं वपुरधारयत् । धृतो गोवर्धनो नाम सप्ताहं पर्वतो धृतः ॥

pūjyamānastadā devairdivyaṃ vapuradhārayat | dhṛto govardhano nāma saptāhaṃ parvato dhṛtaḥ

तब देवताओं से पूजित होकर उन्होंने दिव्य शरीर धारण किया। गोवर्धन नाम का पर्वत सात दिन तक उठाए रखा गया —

श्लोक 25 (2.53.25)

शिशुना वासुदेवेन गवार्थमरिमर्दन । क्रीडमानस्तदा कृष्णः कृतवान्कर्म दुष्करम् ॥

śiśunā vāsudevena gavārthamarimardana | krīḍamānastadā kṛṣṇaḥ kṛtavānkarma duṣkaram

हे शत्रुमर्दन, शिशु वासुदेव ने गौओं के लिए उसे उठाया था। खेल-खेल में ही कृष्ण ने वह दुष्कर कार्य कर दिखाया।

श्लोक 26 (2.53.26)

तदद्भुतमतीवासीत्सर्वलोकस्य भारत । देवदेवः क्षितिं गत्वा कृष्णं नत्वा मुदान्वितः ॥

tadadbhutamatīvāsītsarvalokasya bhārata | devadevaḥ kṣitiṃ gatvā kṛṣṇaṃ natvā mudānvitaḥ

हे भारत, वह सारे संसार के लिए अत्यन्त अद्भुत था। देवों के देव इन्द्र ने पृथ्वी पर आकर, प्रसन्न होकर कृष्ण को प्रणाम किया,

श्लोक 27 (2.53.27)

गोविन्द इति तं ह्युक्त्वा ह्यभ्यषिञ्चत्पुरन्दरः । इत्युक्त्वाश्लिष्य गोविन्दं पुरुहूतोऽभ्ययाद्दिवम् ॥

govinda iti taṃ hyuktvā hyabhyaṣiñcatpurandaraḥ | ityuktvāśliṣya govindaṃ puruhūto'bhyayāddivam

और पुरन्दर ने उन्हें "गोविन्द" कहकर उनका अभिषेक किया। यह कहकर और गोविन्द को गले लगाकर इन्द्र स्वर्ग लौट गए।

श्लोक 28 (2.53.28)

अथारिष्ट इति ख्यातं दैत्यं वृषभविग्रहम् । जघान तरसा कृष्णः पशूनां हितकाम्यया ॥

athāriṣṭa iti khyātaṃ daityaṃ vṛṣabhavigraham | jaghāna tarasā kṛṣṇaḥ paśūnāṃ hitakāmyayā

फिर पशुओं के हित की इच्छा से कृष्ण ने बैल का रूप धारण करने वाले अरिष्ट नामक दैत्य को वेग से मार डाला।

श्लोक 29 (2.53.29)

केशिनामा ततो दैत्यो राजंस्तुरगविग्रहः । तथा वनगतं पार्थ गजायुतबलं हयम् ॥

keśināmā tato daityo rājaṃsturagavigrahaḥ | tathā vanagataṃ pārtha gajāyutabalaṃ hayam

फिर, राजन्, केशी नाम का दैत्य, जो घोड़े के रूप में था — हे पार्थ, वन में घूमने वाला वह घोड़ा, जिसमें दस हज़ार हाथियों का बल था —

श्लोक 30 (2.53.30)

कराम्भोरुहवज्रेण जघान मधुसूदनः । अथ मल्लं तु चाणूरं निजघान महाऽसुरम् ॥

karāmbhoruhavajreṇa jaghāna madhusūdanaḥ | atha mallaṃ tu cāṇūraṃ nijaghāna mahā'suram

उसे मधुसूदन ने अपने वज्र-समान कर-कमल से मार डाला। फिर उन्होंने चाणूर नामक मल्ल को, जो एक महान असुर था, मार गिराया।

श्लोक 31 (2.53.31)

सुदामानममित्रघ्न सर्वसैन्यपुरस्कृतम् । बालरूपेण गोविन्दो निजघान च भारत ॥

sudāmānamamitraghna sarvasainyapuraskṛtam | bālarūpeṇa govindo nijaghāna ca bhārata

हे शत्रुनाशक भारत, समस्त सेना जिसका आदर करती थी, उस सुदामा को भी गोविन्द ने बालक के रूप में ही मार डाला।

श्लोक 32 (2.53.32)

बलदेवेन चायत्नात्समाजे मुष्टिको हतः । ताडितश्च सहामात्यः कंसः कृष्णेन भारत ॥

baladevena cāyatnātsamāje muṣṭiko hataḥ | tāḍitaśca sahāmātyaḥ kaṃsaḥ kṛṣṇena bhārata

हे भारत, रंगभूमि में बलदेव ने बिना प्रयास के मुष्टिक को मार डाला, और कृष्ण ने मन्त्रियों सहित कंस पर प्रहार किया।

श्लोक 33 (2.53.33)

हत्वा कंसममित्रघ्नः सर्वेषां पश्यतां तदा । अभिषिच्योग्रसेनं तं पित्रोः पादमवन्दत ॥

hatvā kaṃsamamitraghnaḥ sarveṣāṃ paśyatāṃ tadā | abhiṣicyograsenaṃ taṃ pitroḥ pādamavandata

सबके देखते-देखते कंस का वध करके शत्रुनाशक कृष्ण ने उग्रसेन का राज्याभिषेक किया और अपने माता-पिता के चरणों में प्रणाम किया।

श्लोक 34 (2.53.34)

एवमादीनि कर्माणि कृतवान्वै जनार्दनः ॥

evamādīni karmāṇi kṛtavānvai janārdanaḥ

जनार्दन ने ऐसे ही अनेक कर्म किए।

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