सभा पर्व · अध्याय 54
कृष्ण की शिक्षा और कंस-वध
भीष्म युधिष्ठिर को कृष्ण के कर्मों का वर्णन आगे सुनाते हैं। कृष्ण और बलराम अवन्ति में सान्दीपनि से शिक्षा पाते हैं और कुछ ही दिनों में वेद, अनेक कलाएँ और सम्पूर्ण धनुर्वेद सीख लेते हैं; गुरुदक्षिणा के रूप में कृष्ण सान्दीपनि के पुत्र को हरने वाले समुद्री असुर को मारते हैं और मृत बालक को फिर जीवित कर देते हैं। फिर भीष्म कंस के बल और उसकी विशाल सेना का वर्णन युद्ध की ऐसी नदी के रूप में करते हैं जिसे नारायण के सिवा कोई पार नहीं कर सकता था; इन्द्र के रथ पर खड़े कृष्ण उस सेना को तितर-बितर करते हैं, कंस को मारते हैं, उग्रसेन का अभिषेक करते हैं और सरस्वती के तट पर जरासन्ध को पराजित करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (2.54.1)
ततस्तौ जग्मतुस्तत्र गुरुं सान्दीपिनिं पुनः । गुरुशुश्रूषणायुक्तौ धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ ॥
tatastau jagmatustatra guruṃ sāndīpiniṃ punaḥ | guruśuśrūṣaṇāyuktau dharmajñau dharmacāriṇau
तब धर्म को जानने वाले और धर्म का आचरण करने वाले वे दोनों भाई गुरु-सेवा में तत्पर होकर फिर अपने गुरु सान्दीपनि के पास गए।
श्लोक 2 (2.54.2)
व्रतमुग्रं महात्मानौ विचरन्ताववन्तिषु । अहोरात्रैश्चतुष्पष्ट्या साङ्गान्वेदानवापतुः ॥
vratamugraṃ mahātmānau vicarantāvavantiṣu | ahorātraiścatuṣpaṣṭyā sāṅgānvedānavāpatuḥ
कठोर व्रत का पालन करते हुए वे दोनों महात्मा अवन्ति देश में रहे और चौंसठ दिन-रात में उन्होंने अंगों सहित वेदों को प्राप्त कर लिया।
श्लोक 3 (2.54.3)
लेख्यं च गणितं चोभौ प्राप्नुतां यदुनन्दनौ । गान्धर्ववेदं वैद्यं च सकलं समवापतुः ॥
lekhyaṃ ca gaṇitaṃ cobhau prāpnutāṃ yadunandanau | gāndharvavedaṃ vaidyaṃ ca sakalaṃ samavāpatuḥ
यदुकुल को आनन्द देने वाले उन दोनों ने लेखन और गणित भी सीखा, और गान्धर्ववेद (संगीत-शास्त्र) तथा वैद्यक को भी पूर्ण रूप से प्राप्त किया।
श्लोक 4 (2.54.4)
हस्तिशिक्षामश्वशिक्षां द्वादशाहेन चाप्नुताम् । तावुभौ जग्मतुर्वीरौ गुरुं सान्दीपिनिं पुनः ॥
hastiśikṣāmaśvaśikṣāṃ dvādaśāhena cāpnutām | tāvubhau jagmaturvīrau guruṃ sāndīpiniṃ punaḥ
बारह दिनों में उन्होंने हाथियों और घोड़ों को साधने की विद्या सीख ली। फिर वे दोनों वीर पुनः गुरु सान्दीपनि के पास गए,
श्लोक 5 (2.54.5)
धनुर्वेदचिकीर्षार्थं धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ । ताविष्वासवराचार्यमभिगम्य प्रणम्य च ॥
dhanurvedacikīrṣārthaṃ dharmajñau dharmacāriṇau | tāviṣvāsavarācāryamabhigamya praṇamya ca
धनुर्वेद सीखने की इच्छा से। धर्म को जानने और उसका आचरण करने वाले उन दोनों ने धनुर्विद्या के उस श्रेष्ठ आचार्य के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 6 (2.54.6)
तेन वै सत्कृतौ राजंश्चरन्तौ ताववन्तिषु । पञ्चाशद्भिरहोरात्रैर्दशाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् ॥
tena vai satkṛtau rājaṃścarantau tāvavantiṣu | pañcāśadbhirahorātrairdaśāṅgaṃ supratiṣṭhitam
हे राजन्! उनसे सम्मान पाकर वे दोनों अवन्ति में रहे और पचास दिन-रात में उन्होंने दस अंगों वाला, सुदृढ़ रूप से प्रतिष्ठित धनुर्वेद,
श्लोक 7 (2.54.7)
सरहस्यं धनुर्वेदं सकलं ताववापतुः । दृष्ट्वा कृतार्थो विप्रेन्द्रो गुर्वर्थे तावचोदयत् ॥
sarahasyaṃ dhanurvedaṃ sakalaṃ tāvavāpatuḥ | dṛṣṭvā kṛtārtho viprendro gurvarthe tāvacodayat
उसके रहस्यों सहित सम्पूर्ण रूप से प्राप्त कर लिया। यह देखकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सन्तुष्ट हुआ और उसने उन दोनों से गुरुदक्षिणा माँगी।
श्लोक 8 (2.54.8)
अयाचतार्थं गोविन्दं तदा सान्दीपिनिर्विभुम् । मम पुत्रः समुद्रेऽस्मिंस्तिमिना चापवाहितः ॥
ayācatārthaṃ govindaṃ tadā sāndīpinirvibhum | mama putraḥ samudre'smiṃstiminā cāpavāhitaḥ
तब सान्दीपनि ने सामर्थ्यवान् गोविन्द से यह दक्षिणा माँगी — "मेरे पुत्र को इस समुद्र में एक तिमि (महामत्स्य) बहा ले गया था।
श्लोक 9 (2.54.9)
पुत्रमानय भद्रं ते भक्षितं तिमिना मम । आर्ताय गुरवे तत्र प्रतिशुश्राव दुष्करम् ॥
putramānaya bhadraṃ te bhakṣitaṃ timinā mama | ārtāya gurave tatra pratiśuśrāva duṣkaram
तुम्हारा कल्याण हो, तिमि के निगले हुए मेरे पुत्र को ले आओ।" वहाँ दुःखी गुरु को उन्होंने वह दुष्कर कार्य करने का वचन दिया,
श्लोक 10 (2.54.10)
अशक्यं सर्वभूतेषु कर्तुमन्येन केनचित् । यश्च सान्दीपिनेः पुत्रं जहार भरतर्षभ ॥
aśakyaṃ sarvabhūteṣu kartumanyena kenacit | yaśca sāndīpineḥ putraṃ jahāra bharatarṣabha
जिसे सब प्राणियों में कोई दूसरा नहीं कर सकता था। हे भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपनि के पुत्र का हरण किया था,
श्लोक 11 (2.54.11)
सोऽसुरः समरे ताभ्यां समुद्रे विनिपातितः । ततः सान्दीपिनेः पुत्रः प्रसादादमितौजसः ॥
so'suraḥ samare tābhyāṃ samudre vinipātitaḥ | tataḥ sāndīpineḥ putraḥ prasādādamitaujasaḥ
वह असुर उन दोनों के द्वारा समुद्र में युद्ध करके मार गिराया गया। तब उस अपार तेजस्वी की कृपा से सान्दीपनि का पुत्र,
श्लोक 12 (2.54.12)
दीर्घकालं कृतः प्रेतः पुनरासीच्छरीरवान् । तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ॥
dīrghakālaṃ kṛtaḥ pretaḥ punarāsīccharīravān | tadaśakyamacintyaṃ ca dṛṣṭvā sumahadadbhutam
जो दीर्घकाल से मृत था, फिर से देहधारी हो गया। उस असम्भव, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत घटना को देखकर
श्लोक 13 (2.54.13)
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत । आसनानि च सर्वाणि गवाश्वं च धनादिकम् ॥
sarveṣāmeva bhūtānāṃ vismayaḥ samajāyata | āsanāni ca sarvāṇi gavāśvaṃ ca dhanādikam
सभी प्राणी विस्मय से भर गए। सब प्रकार के आसन, गौएँ, घोड़े और धन आदि,
श्लोक 14 (2.54.14)
सर्वं तदुपजह्राते गुरवे रामकेशवौ । गदापरिघयुद्धे च सर्वास्त्रेषु च केशवः ॥
sarvaṃ tadupajahrāte gurave rāmakeśavau | gadāparighayuddhe ca sarvāstreṣu ca keśavaḥ
यह सब बलराम और केशव ने गुरु को भेंट कर दिया। गदा और परिघ के युद्ध में तथा सभी अस्त्रों में केशव ने
श्लोक 15 (2.54.15)
परमां मुख्यतां प्राप्तः सर्वलोकेषु विश्रुतः । कश्च नारायणादन्यः सर्वरत्नविभूषितम् ॥
paramāṃ mukhyatāṃ prāptaḥ sarvalokeṣu viśrutaḥ | kaśca nārāyaṇādanyaḥ sarvaratnavibhūṣitam
सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया और वे सभी लोकों में विख्यात हुए। नारायण के सिवा और कौन है जो सब रत्नों से विभूषित,
श्लोक 16 (2.54.16)
रथमादित्यसङ्काशमातिष्ठेत शचीपतेः । कस्य चाप्रतिमो यन्ता वज्रपाणेः प्रियः सखा ॥
rathamādityasaṅkāśamātiṣṭheta śacīpateḥ | kasya cāpratimo yantā vajrapāṇeḥ priyaḥ sakhā
सूर्य के समान तेजस्वी शचीपति इन्द्र के रथ पर आरूढ़ हो सके? और वज्रधारी इन्द्र का प्रिय सखा, अनुपम सारथि
श्लोक 17 (2.54.17)
मातलिः सङ्गृहीता स्यादन्यत्र पुरुषोत्तमात् । भोजराजात्मजो वापि कंसस्तात युधिष्ठिर ॥
mātaliḥ saṅgṛhītā syādanyatra puruṣottamāt | bhojarājātmajo vāpi kaṃsastāta yudhiṣṭhira
मातलि पुरुषोत्तम के सिवा और किसकी रास थामता? हे तात युधिष्ठिर! भोजराज का पुत्र कंस भी
श्लोक 18 (2.54.18)
अस्त्रजाते बले वीर्ये कार्तवीर्यसमोऽभवत् । तस्य भोजपतेः पुत्राद्भोजराजन्यवर्धनात् ॥
astrajāte bale vīrye kārtavīryasamo'bhavat | tasya bhojapateḥ putrādbhojarājanyavardhanāt
सब प्रकार के अस्त्रों में, बल और पराक्रम में कार्तवीर्य के समान था। भोज-क्षत्रियों का उत्कर्ष करने वाले उस भोजपति के पुत्र से
श्लोक 19 (2.54.19)
उद्विजन्ते स्म राजानः सुपर्णादिव पन्नगाः । चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिनः ॥
udvijante sma rājānaḥ suparṇādiva pannagāḥ | citrakārmukanistriṃśavimalaprāsayodhinaḥ
राजा वैसे ही काँपते थे जैसे सर्प गरुड़ से। विचित्र धनुषों, खड्गों और चमकते प्रासों से लड़ने वाले
श्लोक 20 (2.54.20)
शतं शतसहस्राणि पादातास्तस्य भारत । अष्टौ शतसहस्राणि शूराणामनिवर्तिनाम् ॥
śataṃ śatasahasrāṇi pādātāstasya bhārata | aṣṭau śatasahasrāṇi śūrāṇāmanivartinām
हे भारत! उसके पैदल सैनिक सौ लाख थे, और उनमें आठ लाख ऐसे शूरवीर थे जो कभी पीठ नहीं दिखाते थे।
श्लोक 21 (2.54.21)
अभवन्भोजराजस्य जाम्बूनदमया ध्वजाः । रुक्मकाञ्चनकक्ष्यास्तु रथास्तस्य युधिष्ठिर ॥
abhavanbhojarājasya jāmbūnadamayā dhvajāḥ | rukmakāñcanakakṣyāstu rathāstasya yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! भोजराज की ध्वजाएँ जाम्बूनद सोने की बनी थीं और उसके रथ चमकते सोने की पेटियों से सजे थे।
श्लोक 22 (2.54.22)
अभवन्भोजपुत्रस्य द्विपास्तावद्धि तद्बलम् । चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिनाम् ॥
abhavanbhojaputrasya dvipāstāvaddhi tadbalam | citrakārmukanistriṃśavimalaprāsayodhinām
भोजराज के पुत्र के हाथी भी उतने ही थे; विचित्र धनुषों, खड्गों और चमकते प्रासों से लड़ने वाले योद्धाओं की उसकी ऐसी ही सेना थी।
श्लोक 23 (2.54.23)
षोडशाश्वसहस्राणि किंशुकाभानि तस्य वै । अपरस्तु महाव्यूहः किशोराणां युधिष्ठिर ॥
ṣoḍaśāśvasahasrāṇi kiṃśukābhāni tasya vai | aparastu mahāvyūhaḥ kiśorāṇāṃ yudhiṣṭhira
उसके पास किंशुक (पलाश) के फूलों जैसे रंग वाले सोलह हजार घोड़े थे; और हे युधिष्ठिर, युवा घोड़ों का एक और बड़ा व्यूह था,
श्लोक 24 (2.54.24)
आरोहवरसम्पन्नो दुर्धर्षः केनचिद्बलात् । स च षोडशसाहस्रः कंसभ्रातृपुरःसरः ॥
ārohavarasampanno durdharṣaḥ kenacidbalāt | sa ca ṣoḍaśasāhasraḥ kaṃsabhrātṛpuraḥsaraḥ
जो श्रेष्ठ घुड़सवारों से युक्त था और किसी भी बल से दबाया नहीं जा सकता था। सोलह हजार की वह सेना, जिसका अगुआ कंस का भाई
श्लोक 25 (2.54.25)
सुनामा सर्वतस्त्वेनं स कंसं पर्यपालयत् । सगणो मिश्रको नाम षष्टिसाहस्र उच्यते ॥
sunāmā sarvatastvenaṃ sa kaṃsaṃ paryapālayat | sagaṇo miśrako nāma ṣaṣṭisāhasra ucyate
सुनामा था, चारों ओर से कंस की रक्षा करती थी। मिश्रक नाम का सैन्य-दल साठ हजार का बताया जाता है।
श्लोक 26 (2.54.26)
कंसरोषमहावेगां ध्वजानूपमहाद्रुमाम् । मत्तद्विपमहाग्राहां वैवस्वतवशानुगाम् ॥
kaṃsaroṣamahāvegāṃ dhvajānūpamahādrumām | mattadvipamahāgrāhāṃ vaivasvatavaśānugām
उस महायुद्ध-नदी का प्रबल वेग कंस का क्रोध था, ध्वजाएँ उसके तट के बड़े-बड़े वृक्ष थीं, मतवाले हाथी उसके विशाल ग्राह थे, और वह यमराज के वश में बहती थी;
श्लोक 27 (2.54.27)
शस्त्रजालमहाफेनां सादिवेगमहाजलाम् । गदापरिघपाठीनां नानाकवचशैवलाम् ॥
śastrajālamahāphenāṃ sādivegamahājalām | gadāparighapāṭhīnāṃ nānākavacaśaivalām
शस्त्रों के समूह उसका भारी फेन थे, घुड़सवारों का वेग उसका अथाह जल, गदाएँ और परिघ उसकी पाठीन मछलियाँ, और अनेक प्रकार के कवच उसकी काई;
श्लोक 28 (2.54.28)
रथनागमहावर्तां नानारुधिरकर्दमाम् । चित्रकार्मुककल्लोलां रथाश्वकलिलह्रदाम् ॥
rathanāgamahāvartāṃ nānārudhirakardamām | citrakārmukakallolāṃ rathāśvakalilahradām
रथ और हाथी उसके बड़े भँवर थे, अनेक प्राणियों का रक्त उसका कीचड़, विचित्र धनुष उसकी लहरें, और उसके कुण्ड रथों और घोड़ों से भरे थे।
श्लोक 29 (2.54.29)
महामृधनदीं घोरां योधावर्तननिस्वनाम् । कोऽन्यो नारायणादेत्य कंसहन्ता युधिष्ठिर ॥
mahāmṛdhanadīṃ ghorāṃ yodhāvartananisvanām | ko'nyo nārāyaṇādetya kaṃsahantā yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! योद्धाओं के कोलाहल से गरजती उस भयानक महायुद्ध-नदी तक पहुँचकर नारायण के सिवा और कौन कंस का वध कर सकता था?
श्लोक 30 (2.54.30)
एष शक्ररथे तिष्ठंस्तान्यनीकानि भारत । व्यधमद्भोजपुत्रस्य महाभ्राणीव मारुतः ॥
eṣa śakrarathe tiṣṭhaṃstānyanīkāni bhārata | vyadhamadbhojaputrasya mahābhrāṇīva mārutaḥ
हे भारत! इन्द्र के रथ पर खड़े होकर इन्होंने भोजराज के पुत्र की उन सेनाओं को वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दिया जैसे वायु बड़े-बड़े बादलों को उड़ा देती है।
श्लोक 31 (2.54.31)
तं सभास्थं सहामात्यं हत्वा कंसं सहान्वयम् । आनयामास मानार्हां देवकीं ससुहृद्गणाम् ॥
taṃ sabhāsthaṃ sahāmātyaṃ hatvā kaṃsaṃ sahānvayam | ānayāmāsa mānārhāṃ devakīṃ sasuhṛdgaṇām
सभा में बैठे कंस को उसके मन्त्रियों और समस्त वंश सहित मारकर वे सम्मान के योग्य देवकी को उनके सुहृदों सहित ले आए।
श्लोक 32 (2.54.32)
यशोदां रोहिणीं चैव अभिवाद्य पुनः पुनः । उग्रसेनं च राजानमभिषिच्य जनार्दनः ॥
yaśodāṃ rohiṇīṃ caiva abhivādya punaḥ punaḥ | ugrasenaṃ ca rājānamabhiṣicya janārdanaḥ
जनार्दन ने यशोदा और रोहिणी को बार-बार प्रणाम किया और उग्रसेन का राजा के रूप में अभिषेक किया।
श्लोक 33 (2.54.33)
अर्चितो यदुमुख्यैश्च भगवान्वासवानुजः । ततः पार्थिवमायान्तं सहितं सर्वराजभिः । सरस्वत्यां जरासन्धमजयत्पुरुषोत्तमः ॥
arcito yadumukhyaiśca bhagavānvāsavānujaḥ | tataḥ pārthivamāyāntaṃ sahitaṃ sarvarājabhiḥ | sarasvatyāṃ jarāsandhamajayatpuruṣottamaḥ
यदुवंश के प्रमुख पुरुषों से पूजित, इन्द्र के छोटे भाई भगवान् पुरुषोत्तम ने फिर सब राजाओं के साथ चढ़ आए जरासन्ध को सरस्वती के तट पर पराजित किया।